धातु कार्बोनिल , प्रकार या वर्गीकरण , बंध , प्रभावी परमाणु क्रमांक नियम effective atomic number rule

metal carbonyl  in hindi धातु कार्बोनिल : धातु एवं कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) के यौगिकों को धातु कार्बोनिल कहा जाता है।

इन यौगिकों में धातु की ऑक्सीकरण अवस्था 0 या +1 होती है।

उदाहरण : Ni(CO)4 , Fe(CO)5 , Cr(CO)6

धातु कार्बोनिल के प्रकार या वर्गीकरण

धातु परमाणुओं की संख्या के आधार पर धातु कार्बोनिल यौगिक निम्न प्रकार के होते है –
1. एक नाभिकीय धातु कार्बोनिल यौगिक : इन यौगिकों में एक केन्द्रीय धातु परमाणु होता है।
उदाहरण : Ni(CO)4 , Fe(CO)5 , Cr(CO)6 आदि।
2. द्वि नाभिकीय धातु कार्बोनिल यौगिक : इनमे दो केंद्रीय धातु परमाणु होते है।
उदाहरण : Mn2(CO)10 , Fe(CO)9 आदि।
3. ट्राई या बहुनाभिकीय कार्बोनिल यौगिक : इनमे केन्द्रीय धातु परमाणु तीन या तीन से अधिक होते है।
उदाहरण : OS3(CO)12 , CO4(CO)12 आदि

धातु कार्बोनिल यौगिकों में बंधन

धातु कार्बोनिल यौगिकों में कार्बोनिल लिगेंड (co) में c परमाणु के पास एक electron युग्म होता है , इस e युग्म के द्वारा धातु एवं कार्बोनिल लिगेंड के मध्य सिग्मा बंध बनता है।
इसके पश्चात् धातु के भरे हुए dπ कक्षकों से electron का स्थानान्तरण कार्बोनिल ligand (co) के रिक्त antibonding कक्षकों में हो जाता है जिसे back bonding  या π बंधन कहते है।
back bonding से धातु आयन पर बढ़ा हुआ ऋणावेश धातु एवं लिगेंड के मध्य विस्थानिकृत हो जाता है।
back bonding से sigma बंध दृढ हो जाता है एवं सिग्मा बंध से π बंध दृढ हो जाता है इस प्रक्रिया को synergi’s क्रियाविधि कहते है।

प्रभावी परमाणु क्रमांक नियम (effective atomic number rule )

धातु कार्बोनिल यौगिक में धातु परमाणु पर electron की संख्या एवं कार्बोनिल समूह द्वारा (co) दान किये गये electrons की संख्या के योग को EAN (effective atomic number rule) नियम कहते है।
ऐसे धातु कार्बोनिल यौगिक जिनमे धातु का प्रभावी परमाणु क्रमांक 36 (Kr) , 54(Xe) , 86(Rn) होता है , प्रभावी परमाणु क्रमांक नियम का पालन करते है।
उदाहरण : Cr(CO)6 में EAN की गणना
Cr का परमाणु क्रमांक = 24
6(co) , लिगेण्ड द्वारा प्राप्त electron की संख्या = 6×2 = 12
अत: Cr का EAN =24+12 = 36
अत: Cr(CO)6 EAN नियम का पालन करता है।
EAN नियम के आधार पर धातु कार्बोनिल यौगिकों को निम्न दो भागों में बांटा जाता है –
1. जिनमे धातु परमाणु का परमाणु क्रमांक सम संख्या में होते है ये EAN नियम का पालन करते है।
धातु परमाणु के कुल electrons की संख्या एवं co समूह द्वारा दान किये गए electrons का कुल योग आगामी अक्रिय गैस के परमाणु क्रमांक के बराबर होता है।
2. वे धातु कार्बोनिल यौगिक जिनमे धातु का परमाणु क्रमांक विषम संख्या में होते है।  सामान्यत: EAN नियम का पालन नहीं करते।

इलेक्ट्रॉन न्यून कार्बधात्विक यौगिक , विस्थानिकृत π e वाले यौगिक

(Electron low carbohydrate compounds ) इलेक्ट्रॉन न्यून कार्बधात्विक यौगिक : वे कार्ब धात्विक यौगिक जिनमे धातु या अधातु तत्व का अष्टक पूर्ण नहीं होता है वे इलेक्ट्रॉन (e) न्यून कार्बधात्विक यौगिक कहलाते है।

उदाहरण : B ,Mg , Al आदि तत्व इस प्रकार के यौगिक बनाते है।

Li , Be , Mg , Al आदि तत्वों के कुछ कार्बधात्विक यौगिक कार्बनिक समूह पर सेतु निर्माण के कारण बहुलक के रूप में पाये जाते है।

सेतु बंधन के आधार पर ये निम्न दो प्रकार के होते है –

1. तीन केंद्र दो e बंधन वाले यौगिक : तीन केंद्र दो e बंध से तात्पर्य है की तीन परमाणुओं के मध्य में 2eसे बंध का निर्माण हुआ है।

उदाहरण : Be ,Al एवं B के यौगिकों में इस प्रकार का बंध पाया जाता है।

Be के कार्बधात्विक यौगिक बहुलक एवं Al व B के यौगिक द्विलक के रूप में होते है।

2.बहु केन्द्र 2e बंधन : CH3Li या C2H5Li की संरचना में प्रत्येक c परमाणु चतुष्फलक के तीनों कोनो पर स्थित Li परमाणु से जुड़ा होता है , इस प्रकार प्रत्येक CH3 समूह तिहरे सेतु के समान कार्य करता है।

इसमें c एवं li के मध्य का यह बंध बहु केन्द्रीय बंध होता है।

विस्थानिकृत π e वाले यौगिक

इस प्रकार के कार्बधात्विक यौगिकों में असंतृप्त कार्बनिक समूह जैसे एल्किन , एरोमेटिक वलय की π e का अभ्र धातु के रिक्त कक्षकों से अतिव्यापन करता है।
साथ ही धातु के पूर्ण भरे d कक्षक एवं कार्बनिक समूह के c के रिक्त antibonding कक्षकों के मध्य अतिव्यापन होता है , जिसे dπ-pπ bonding कहते है।
इस प्रकार के बंधन में द्विबंध के गुण आ जाते है।
ये यौगिक निम्न दो प्रकार के होते है –
1. ओलिफिनिक एवं एसिटिलीन यौगिक  :
उदाहरण – जाइसे लवण  : जाइसे लवण ऑलिफीनिक प्रकार के कार्बधात्विक यौगिक का उदाहरण है।  इसका संश्लेषण एथिलीन एवं [ptCl4]2- की अभिक्रिया द्वारा होता है।
जाइसे लवण में एथिलीन का c-c बंध pt-cl बंधो के लम्बवत होता है।
इनमे तीनो pt-cl बंधों की बंध लम्बाई एकसमान नहीं होती।
2. सेंडविच प्रकार के यौगिक :
वे यौगिक जिनमे धातु परमाणु अथवा आयन दो समतलीय c समूहों के मध्य स्थित होता है सेंडविच यौगिक कहलाते है।
उदाहरण : फेरोसीन /बिस -(साइक्लोपेंटाडाइनिल) आयरन (II)

आयनिक यौगिक , सहसंयोजक यौगिक , कार्बधात्विक यौगिकों के प्रकार

कार्बधात्विक यौगिकों के प्रकार या वर्गीकरण (types of organometallic compounds in hindi) : प्रकृति के आधार पर कार्बधात्विक यौगिक को निम्न 4 भागों में बांटा जाता है।
1. आयनिक यौगिक
2.सहसंयोजक यौगिक
3.electron न्यून यौगिक
4. विस्थानीकृत यौगिक

1. आयनिक यौगिक (ionic compounds )

उच्च धन विद्युती तत्व जिनकी विद्युत ऋणता 1.2 से कम होतीहै, आयनिक कार्बधात्विक यौगिक बनाते है।
इन यौगिकों में धातु एवं कार्बनिक समूह के मध्य आयनिक बंध होता है।
उदाहरण : एथिल सोडियम (C2H5Na) ,मैथिल लिथियम (CH3Li) , डाई एथिल मैग्नीशियम ((C2H5)2Mg)
आयनिक यौगिक के लक्षण :-
1. आयनिक कार्बधात्विक यौगिक कार्बनिक विलायको जैसे बेंजीन , इथर आदि में अविलेय होते है।
2.ये ध्रुवीय विलायको जैसे जल आदि में विलेय होते है।
3.इनके विलयन में विद्युत धारा का प्रवाह होता है।
उदाहरण : C2H5Na का विलयन C2H5 एवं Na+ आयनों के कारण विद्युत का चालक होता है।
4. ये प्रतिस्थापन Rxn प्रदर्शित करते है।
नोट : आयनिक कार्बधात्विक यौगिकों का स्थायित्व ऋणायन कार्बनिक समूह के स्थायित्व पर निर्भर करता है।
जैसे : C2H5Na व (C5H5)2Mg में से (C5H5)2Mg अधिक स्थायी होता है क्योंकि इसमें कार्बनिक समूह साइकलो पेंटा डाइनिल  ऋणायन (C5H5) होता है जो अनुनाद के द्वारा स्थायी होता है।
इस कारण (C5H5)2Mg अधिक स्थायी होता है।

2.सहसंयोजक यौगिक

वे धात्विक एवं अधात्विक तत्व जिनकी विद्युत ऋणता 1.5 से 2.5 के मध्य होती है 2.सहसंयोजक यौगिक बनाते है।
इस प्रकार के तत्व कार्बनिक समूह के साथ electron के साँझा करके सहसंयोजक बंध बनाते है।
जैसे Li , Be, Al , B , Si आदि तत्व इस प्रकार के यौगिक बनाते है।
इन यौगिकों की ज्यामिति धातु परमाणु की संकरण अवस्था पर निर्भर करती है।
 संकरण
 ज्यामिति
SP
 रेखीय
SP2
 समतल त्रिकोणीय
SP3
 चतुष्फलकीय
dSp2
 वर्ग समतलीय
dsp3
 त्रिकोणीय द्विपिरेमिडी
d2sp3
 अष्ट फलकीय
नोट : धातु कर्बोनिल यौगिक ,सहसंयोजक यौगिक , सहसंयोजक कार्बधात्विक यौगिकों का उदाहरण है।

कार्बधात्विक यौगिक , organometallic compounds in hindi ,नामकरण  , पॉलीहेप्टो , हेप्टिसिटी

(organometallic compounds in hindi) कार्बधात्विक यौगिक : वे यौगिक जिनमें कार्बनिक समूह एवं धातु परमाणु सीधे c द्वारा जुड़े होते है कार्बधात्विक यौगिक कहलाते है।

या

वे यौगिक जिनमे c सीधा धातु परमाणु से जुड़ा होता है।

कार्बनिक समूह :-

1. एल्किल समूह (-R)

2. एरिल समूह (-Ar)

3. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन

4. विषम चक्रीय यौगिक

जैसे : डाई एथिल जिंक एक कार्बधात्विक यौगिक है।

कार्बधात्विक यौगिको मे धात्विक शब्द का अर्थ केवल धातु परमाणु से नहीं होता है।  कुछ अन्य तत्व जैसे बोरोन , सिलिकॉन , जर्मेनियम , आर्सेनिक आदि तत्व जिनकी विद्युत ऋणता कार्बन की विद्युत ऋणता से कम होती है आदि को भी धातु के समान मान लिया जाता है।

जैसे : टेट्रा मेथिल सिलेन  एक कार्बधात्विक यौगिक माना जाता है।

नोट : 1. धातु कर्बोनिल यौगिकों में कार्बनिक समूह अनुपस्थित होता है परन्तु फिर भी इन यौगिकों को कार्बधात्विक यौगिक मान लिया जाता है क्योंकि इन यौगिकों के कई गुण जैसे-वाष्पशीलता ,प्रतिचुम्बकीय प्रकृति आदि कार्बधात्विक यौगिको के समान होते है।

2. धातु कार्बाइड धातु सायनाइड आदि को कार्बधात्विक यौगिक नहीं मानते क्योंकि इनमे धातु कार्बन बंध तो होता है , परन्तु कार्बनिक समूह नहीं होने के कारण इनको कार्बधात्विक यौगिक नहीं मानते।

नामकरण

1. इनके सूत्र एवं नाम में कार्बनिक समूह को पहले को पहले तथा धातु को बाद में लिखा जाता है , एवं पूरा नाम एक साथ लिखा जाता है।
जैसे :  (CH3)3Al – ट्राइमेथिल एल्युमिनियम
C2H5Li – एथिल लिथियम
2. मिश्रित कार्बधात्विक यौगिकों के नाम में कार्बनिक समूह व धातु का नाम लिखकर बाद में अकार्बनिक भाग का नाम लिखा जाताहै।
उदाहरण : CH3-MgBr – मैथिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड
C6H-MgBr -फेनिल मैग्निशियम ब्रोमाइड
3. B , Si आदि तत्वों के कार्ब धात्विक यौगिकों के नाम इनके हाइड्राइडो के व्युत्पन्नो के रूप में लिखे जाते है।
अर्थात – BH3 -बोरेन
SiH– सिलेन
के रूप में लिखे जाते है।
उदाहरण : (CH3)3B – ट्राई मेथिल बोरेन
(CH3)4Si – टेट्रा मैथिल सिलिकेन
4. यदि कार्बनिक समूह में प्रतिस्थापी होता है तो कार्बनिक यौगिकों के नामकरण वाले सामान्य नियम काम में लेते है।
उदाहरण : (4-क्लोरो फेनिल)मर्करी
5. कार्बधात्विक ऋणायन का नाम लिखते समय धातु के नाम के अंत में ‘एट’ जोड़ दिया जाता है।
example : [Zn(C2H5)3]-1 – ट्राई एथिल जिंकेट(II ) आयन
पॉलीहेप्टो :  जिन कार्बनिक यौगिकों में कार्बनिक समूह के एक से अधिक c धातु के साथ बंध बनाते है , वे पॉलीहेप्टो यौगिक कहलाते है।
हेप्टिसिटी (hepticity) : यह लिगेंड का गुण होता है , लिगेंड जितने दाता परमाणुओं से धातुओं से जुड़ता है उसे हेप्टिसिटी  कहते है।
या
कार्बनिक समूह जितने c परमाणुओं द्वारा धातु से जुड़ता है उसे हेप्टिसिटी कहते है।
इसे “nx” से दर्शाते है।
यहाँ x = लिगेंड के दाता परमाणुओं की संख्या जिनसे वह धातु से जुड़ता है।

पश्च बंधन की परिभाषा क्या है , back bonding in hindi , आर्गल आरेख ,orgel diagram

back bonding in hindi , पश्च बंधन की परिभाषा क्या है पश्च बंधन (back bonding ) : स्पेक्ट्रो रासायनिक श्रेणी के अन्तिम लिगेण्ड जैसे NO2
, CN
, CO आदि लिगेंड धातु के साथ back bonding (पश्च बंध) दर्शाते है।
ये लिगेण्ड प्रबल लिगेण्ड होते है।
धातु के भरे हुए t2g कक्षकों में से electron लिगेण्ड के रिक्त कक्षकों में चले जाते है।  (M  L) इसे back bonding (पश्च बंध) कहते है।
back bonding के द्वारा धातु पर बढे हुए ऋणावेश की मात्रा कम हो जाती है जिससे धातु एवं लिगेण्ड के मध्य बना बंध स्थायी हो जाता है , फलस्वरूप संकुल यौगिक का स्थायित्व बढ़ जाता है।
back bonding के कारण धातु आयन एवं लिगेंड के मध्य बंध क्रम बढ़ता है जिससे संकुल का स्थायित्व बढ़ता है।
अत: इसे सिनेरजिक बंधन कहते है।

आर्गल आरेख (orgel diagram) : वे आरेख जो पद की उर्जा एवं लिगेण्ड क्षेत्र प्रबलता (LFS) के मध्य सह सबंध दर्शाते है “आर्गल आरेख” कहलाते है।

प्रश्न 1 : [Ti(H2O)6]Cl3 संकुल यौगिक के अवशोषण स्पेक्ट्रम की व्याख्या कीजिये।

उत्तर : [Ti(H2O)6]3+  संकुल आयन के अवशोषण स्पेक्ट्रम में निम्न दो बैण्ड प्राप्त होते है –

1. 27000 से 30000 cm-1 क्षेत्र में आवेश स्थानान्तरण के कारण एक अवशोषण बैण्ड मिलता है (पैराबैंगनी क्षेत्र में )

2. 20300 cm-1 के लगभग d-d संक्रमण के कारण दृश्य क्षेत्र में अवशोषण बैण्ड मिलता है।

d-d संक्रमण के कारण प्राप्त अवशोषण बैण्ड ही संकुल आयन के रंग के लिए उत्तरदायी होता है।

t2g कक्षकों में उपस्थित अयुग्मित electron दृश्य क्षेत्र से ऊर्जा ग्रहण कर eg कक्षकों में चला जाता है।  इस d-d संक्रमण के कारण यह संकुल बैंगनी रंग का होता है।

हुण्ड के नियम , प्रथम ,द्वितीय नियम या अधिकतम बहुकता का नियम ,  स्पेक्ट्रो रासायनिक श्रेणी 

hund’s law in hindi हुण्ड के नियम , प्रथम ,द्वितीय नियम या अधिकतम बहुकता का नियम ,  स्पेक्ट्रो रासायनिक श्रेणी

पद प्रतीक (term symbol ) : किसी ऊर्जा स्तर से सम्बन्ध पद को पद प्रतीक कहते है।

term symbol (पद प्रतीक)  = 2S+1XJ

यहाँ J = कुल कोणीय क्वाण्टम संख्या

यदि इलेक्ट्रॉनिक विन्यास अर्द्ध पूरित से अधिक होता है तो J का मान L+S लिया जाता है।

यदि electron विन्यास अर्द्धपूरित से कम होता है तो J का मान L-S लिया जाता है।

X = एक वर्णमाला अक्षर है जो L के मान के आधार पर लिया जाता है।

L =  0 1 2  3  4  5   6

X = S P D F G  H  I

यहाँ 2S + 1 = बहुकता होती है।

जिसमें S = कुल चक्रण क्वांटम संख्या = 1/2

अयुग्मित e की संख्या n हो तो बहुकता = n+1

नोट : पद प्रतीक होने पर उन्हें ऊर्जा के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित किया जाता है एवं हुण्ड का नियम काम में लेकर निम्नतम अवस्था ground state ज्ञात कर लेते है।

हुण्ड के नियम (hund’s law )

  1. प्रथम नियम या अधिकतम बहुकता का नियम:

इस नियमानुसार अधिकतम बहुकता वाला पद सर्वाधिक स्थायी होता है एवं ground state को प्रदर्शित करता है जैसे P2 एवं P4 विन्यास के लिए – 3P , 1S , 1D आदि पद प्रतीक होते है।

इनमे से 3P पद ground state को प्रदर्शित करता है।

  1. द्वितीय नियम :

किसी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के लिए समान बहुकता वाले एक से अधिक पद होते है तो वह पद ground state को प्रदर्शित करता है , जिसके लिए L का मान सर्वाधिक होता है।

जैसे d2 विन्यास के लिए 3f , 3P  समान बहुकता वाले पद होते है इनमें से 3f  के लिए L का मान 3 एवं 3P के लिए L का मान 1 है।

अत: 3f  पद ground state को प्रदर्शित करेगा।

 स्पेक्ट्रो रासायनिक श्रेणी

विभिन्न लिगेंड़ो को उनकी बढती हुई क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा के क्रम में व्यवस्थित करने पर जो श्रेणी प्राप्त होती है उसे स्पेक्ट्रो रासायनिक श्रेणी कहते है।

प्रबल लिगेंड़ो के लिए क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा का मान अधिक होता है जबकि दुर्बल लिगेंड़ो के लिए इनका मान कम होता है।

स्पेक्ट्रमी की निम्नतम अवस्था spectroscopic ground state in hindi , चक्रण , कक्षीय कोणीय संवेग

spectroscopic ground state in hindi स्पेक्ट्रमी की निम्नतम अवस्था : किसी परमाणु अथवा आयन में उपस्थित प्रत्येक electrons निम्न दो प्रकार की गति करता है।

  1. चक्रण गति →चक्रण क्वांटम संख्या (s)
  2. कक्षीय गति द्विगंशी क्वान्टम संख्या (l)

electron की इन दोनों गतियों से संबंधित दो कोणीय संवेग होते है –

चक्रण कोणीय संवेग →  (S)

कक्षीय कोणीय संवेग →  (l)

बहु electron वाले परमाणु अथवा आयनों के परिणामी संवेग निकालने के लिए इनमे उपस्थित सभी electron के चक्रण एवं कोणीय संवेगों को संयुक्त किया जाता है जिसे संवेगो का युग्मन (coupling) कहते है।

युग्मन दो प्रकार से होता है –

L-S या रसैल सान्डर्स coupling : इस विधि में सभी electrons के चक्रण कोणीय संवेगो का युग्मन कर कुल चक्रण कोणीय संवेग ज्ञात कर लिया जाता है जिसे s से दर्शाते है।

इसी प्रकार सभी electrons के कक्षीय कोणीय संवेगो के युग्मन से कुल कक्षीय कोणीय संवेग ज्ञात कर लिया जाता है जिसे L से दर्शाते है।

इन दोनों परिणामी अथवा कुल कोणीय संवेगो के coupling से परमाणु या आयन का कुल कोणीय संवेग ज्ञात करते है।

परिणामी चक्रण , कोणीय संवेग –  (S) = S1 + S2 + S3……………. कुल चक्रण क्वांटम संख्या

परिणामी कक्षीय कोणीय संवेग – (L) = L1 + L2 + L3……………. कुल कुल द्विगंशी क्वांटम संख्या

परमाणु के कुल कोणीय संवेग से संबधित कुल कोणीय क्वान्टम संख्या होती है , जिसे “J” से दर्शाते है।

J का मान L तथा S के coupling से प्राप्त किया जाता है।

J = L+S से L-S

नोट : यदि इलेक्ट्रॉनिक कोष या कक्षक अर्द्ध पूरित से अधिक भरा हो तो P9 , d6 , F8 तो J का मान – L+S होगा।

यदि विन्यास अर्द्धपूरित से कम भरा हुआ है जैसे – P2 , d4 , F6 तो J का मान L-S होगा।

  1. L का मान ज्ञात करना :-

ML = ml(1) + ml(2) + ml(3) ……..

यहाँ ml(1)  = प्रथम e की चुम्बकीय क्वांटम संख्या

ml(2) = द्वितीय e की चुम्बकीय क्वान्टम संख्या

ML = +L …….. 0 …….. -L   (कुल 2L + 1 मान )

  1. S का मान ज्ञात करना :

S = S1 + S2 + S3 …….. (कुल 2 S + 1 मान )

यहाँ

S1 = प्रथम electron की चक्रण क्वांटम संख्या

S=  द्वितीय e की चक्रण क्वांटम संख्या

संक्रमण के वर्ण नियम selection rules for d-d transition in hindi

selection rules for d-d transition in hindi d-d संक्रमण के वर्ण नियम : वे नियम जिनके द्वारा इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण निर्धारित होते है।  वर्ण नियम या selection rules कहलाते है।

ये नियम बताते है की किसी एक उर्जा स्तर से electron का स्थानान्तरण किन किन उर्जा स्तरों में अनुमत है और किनमे वर्जित है।

अनुमत संक्रमण (allowed transition) : वे संक्रमण जिनकी प्रायिकता अधिक होती है , अनुमत संक्रमण कहलाते है।

ये संक्रमण वर्ग नियमों का पालन करते है।

वर्जित संक्रमण : वे संक्रमण जिनकी प्रायिकता बहुत कम होती है , वर्जित संक्रमण कहलाते है।

ये संक्रमण वर्ग नियमों का पालन नहीं करते है।

वर्ण नियम (selection rule)

1. चक्रण चक्रण वर्ण नियम (spin selection rule ) : इस नियम के अनुसार वे ही इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण अनुमत होते है जिनमे अयुग्मित e की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
इस नियम के अनुसार वे संक्रमण जिनके लिए कुल चक्रण क्वांटम संख्या (s) में परिवर्तन शून्य होता है अर्थात △s = 0 होता है।  वे अनुमत संक्रमण होते है।
या
इस नियमानुसार समान बहुकता (multiplicity) वाली उर्जा अवस्थाओ में इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण अनुमत होते है।
जैसे : singlet → singlet , doublet  → doublet , triplet → triplet
आदि संक्रमण spin allowed होते है।  ऐसे संक्रमण जिनके लिए △s ≠ 0 वे चक्रण वर्जित संक्रमण होते है।
2. लॉपोर्ट वर्ण नियम  : इस नियम के अनुसार केवल वे इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण allowed होते है जिनमे सममिति का परिवर्तन होता है।
अर्थात सम (gerate)  → विषम (ungerate)
या विषम (ungerate) → सम (gerate)
संक्रमण अनुमत होते है।
परन्तु सम → सम , विषम → विषम  संक्रमण वर्जित होते है।
एक ही प्रकार के सभी कक्षकों की सम्मिति समान होती है।  सभी d-कक्षक gerate सममिति के होते है।
अत: इनके विभाजन के बाद होने वाले d-d संक्रमण लेपोर्ट वर्जित संक्रमण होते है।
लेपॉर्ट वर्ण नियम के अनुसार वे अनुमत होते है जिनके लिए  △L =  ± 1 होता है।

आवेश स्थानांतरण संक्रमण charge transfer transition in hindi

charge transfer transition in hindi आवेश स्थानांतरण संक्रमण : इस प्रकार के संक्रमणों में इलेक्ट्रॉन एक परमाणु से दूसरे परमाणु पर स्थानांतरित होते है अर्थात इनमे electron का संक्रमण एक परमाणु कक्षक से दूसरे परमाणु कक्षकों पर होता है।  आवेश स्थानान्तरण संक्रमण वाले संकुल यौगिकों में अवशोषण बैण्ड प्रबल होते है।  इस प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण को internal redox (आंतरिक रेडॉक्स) प्रक्रिया भी कहते है।

ये निम्न दो प्रकार के होते है –

1. लिगेण्ड  से धातु आवेश स्थानांतरण संक्रमण (ligand to metal charge transfer transition)(LMCT)

इनमें electron का स्थानांतरण लिगेंड के अणुकक्षकों से धातु के non bonding अथवा anti bonding अणु कक्षकों में होता है।
इस प्रकार का आवेश स्थानान्तरण संक्रमण सामान्यत उन संकुल यौगिकों में बनता है जिनमे लिगेंड के पास उच्च उर्जा के भरे अणु कक्षक उपस्थित है।
इस प्रकार के संक्रमण में प्रकाश के दृश्य क्षेत्र से ऊर्जा अवशोषित होती है , फलस्वरूप यौगिक गहरे रंग के होते है।

2. धातु से लिगेण्ड आवेश स्थानान्तरण संक्रमण (metal to ligand charge transfer transition) (MLCT)

इस प्रकार के charge transfer में electron का स्थानान्तरण धातु के non bonding एवं anti bonding अणु कक्षकों से लिगेंड के अणुकक्षकों में होता है।
यह संक्रमण सामान्यत: उन संकुल यौगिकों में होता है जिनमे लिगेंड (ligand) के पास निम्न ऊर्जा के रिक्त π anti bonding कक्षक होते है।
इनमे धातु के पास उच्च उर्जा के भरे हुए कक्षक होने चाहिए।
इस प्रकार के आवेश स्थानांतरण संक्रमणों के लिए धातु आयन निम्न ऑक्सीकरण अवस्था में होना चाहिए।
धातु आयन के मुख्य क्वांटम संख्या का मान अधिक होना चाहिए , लिगेंड (ligand) अधिक विद्युतऋणी होना चाहिए एवं साथ ही लिगेंड आसानी से अपचयित होना चाहिए।
MICT प्रकार का आवेश स्थानान्तरण संक्रमण उन संकुल यौगिकों में पाया जाता है जिनमे एरोमेटिक लिगेंड होते है।
इन लिगेंड़ो (ligands) में सामान्यत: दो दाता N-परमाणु होते है।

बैण्ड स्पेक्ट्रम की परिभाषा , क्या है band spectrum in hindi

band spectrum in hindi किसी अणु की कुल ऊर्जा  = इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा  + कम्पन्न ऊर्जा  + घूर्णन ऊर्जा

किसी अणु में प्रत्येक इलेक्ट्रॉनिक स्तर बहुत से कम्पन्न उर्जा स्तरों में तथा प्रत्येक कंपन्न ऊर्जा स्तर बहुत से घूर्णन उर्जा स्तरों में विभाजित रहते है।

फलस्वरूप किसी अणु में इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण के साथ साथ बहुत से कम्पन्न एवं घूर्णन संक्रमण पाए जाते है।  जिससे अणु का अवशोषण बैंड लाइन के रूप में न होकर एक चौड़े बैण्ड के रूप में प्राप्त होता है , ऐसे स्पेक्ट्रम को बैण्ड स्पेक्ट्रम कहते है।

संक्रमण धातु संकुलों में इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम प्रकाश के निकट IR एवं दृश्य या पराबैंगनी क्षेत्र में प्राप्त होते है।

दृश्य एवं IR क्षेत्र के स्पेक्ट्रम दुर्बल होते है।  क्योंकि इनका सम्बन्ध d-d संक्रमण से होता है।

पराबैंगनी स्पेक्ट्रम तीव्र होते है क्योंकि इनमे electron एक परमाणु से दूसरे परमाणु पर स्थानांतरित हो जाते है।  अत: इन्हें आवेश स्थानान्तरण स्पेक्ट्रम भी कहते है।

किसी संक्रमण की उर्जा △E को निम्न समीकरण से दर्शाते है –

E = hv = hc/λ  = hcv

यहाँ △E = E – E1

E= उत्तेजित अवस्था की उर्जा

E= निम्नतम अवस्था की उर्जा

h = प्लांक स्थिरांक

v = आवृति

c = प्रकाश का वेग

अणुओ में निम्नतम उर्जा अवस्था सामान्यत भरे हुए बंधी σ , π आण्विक कक्षक होते है या non bonding अणु कक्षक होते है।  जबकि उच्च ऊर्जा स्तर के रूप में σ* , π* अणुकक्षक होते है।

किसी अवशोषण बैण्ड की मुख्य दो विशेषताएं होती है –

1. स्थिति

2. तीव्रता

किसी अवशोषण बैण्ड की स्थिति अवशोषित विकिरणों की तरंगदैध्र्य द्वारा निर्धारित होती है।

अवशोषण बैंड की तीव्रता इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण की प्रायिकता पर निर्भर करती है।