नीट सिलेबस २०१९ (neet 2019 syllabus in hindi) , 11th , 12 th chemistry , biologi , physics

11th , 12 th chemistry , biologi , physics  नीट सिलेबस २०१९ (neet 2019 syllabus in hindi) : अगर आप कक्षा 11 या 12 वीं के विज्ञान वर्ग के जीव विज्ञान के छात्र या छात्रा है तो जाहिर सी बात है आपका सपना डॉक्टर बनने का होगा , अगर आप डॉक्टर बनने के लिए सरकारी कॉलेज में दाखिला लेना चाहते है तो उसके लिए आपको neet (नीट) की प्रतियोगी परीक्षा देनी होती है और इस परीक्षा में आपको अच्छे नम्बर लेकर आने होते है।

प्रतिवर्ष लाखो विद्यार्थी इस प्रतियोगी परीक्षा में बैठते है और अच्छे नंबर लाने का भरपूर प्रयास करते है , और लाखो विद्यार्थी इस प्रतियोगी परीक्षा के लिए कोचिंग करते है।

अगर आप कोचिंग करने में समर्थ नहीं है और सिर्फ स्कूल में पढ़ रहे है तो कोई बात नहीं आपको बोर्ड परीक्षा के अतिरिक्त अलग से हाई स्टैण्डर्ड पढाई करनी पड़ेगी जिससे आप इस परीक्षा (neet २०१८ – २०१९ ) में अच्छे नंबर ला सके।

यहाँ हम आपको neet 2019 syllabus बताने जा रहे है , यह जानकारी हिन्दी में उपलब्ध है इस सिलेबस के अनुसार अपनी पढाई करे।

neet 2019 syllabus physics in hindi (नीट २०१८ भौतिक विज्ञान पाठ्यक्रम )

भौतिक विज्ञान के लिए हमने पूरे पाठ्यक्रम को 19 पाठो में वर्गीकृत किया है ये निम्न है –

  • सामान्य भौतिकी (general physics)
  • शुद्ध गतिकी (kinematics)
  • गति के नियम (laws of motion)
  • कार्य , सामर्थ्य और ऊर्जा (work , power and energy)
  • द्रव्यमान केन्द्र और संवेग (centre of mass and momentum)
  • घूर्णन गति (rotational motion)
  • गुरूत्वाकर्षण (gravitation)
  • सरल आवर्त गति (simple harmonic motion)
  • पदार्थ के गुण (properties of matter)
  • तरंगें (waves)
  • ऊष्मा और उष्मागतिकी (heat and thermodynamics)
  • प्रकाशिकी (optics)
  • धारा वैद्युतिकी (current electricity)
  • स्थिर वैधुतिकी (electrostatics)
  • चुम्बकत्व (magnetics)
  • विद्युत चुम्बकीय प्रेरण और प्रत्यावर्ती धारा (electromagnetic induction and alternating current)
  • आधुनिक भौतिकी (modern physics)
  • प्रयोगात्मक भौतिकी (practical physics)
  • विविध प्रश्न (miscellaneous questions )

neet २०१८ – २०१९ जीव विज्ञान पाठ्यक्रम (NEET 2018 – 2019 syllabus biology in hindi )

  • सजीव जगत (the living world)
  • जीवन की विविधता (diversity of life)
  • मोनेरा (monera)
  • प्रॉटिस्टा (protista)
  • कवक (fungi)
  • पादप जगत (kingdom plantae)
  • जन्तु जगत (kingdom animalia)
  • जीवन की इकाई (unity of life)
  • कोशिकाओं का संरचनात्मक संगठन , कार्य और प्रजनन
  • कोशिकीय एंजाइम
  • पादपों और जन्तुओं की आकारिकी
  • पुष्पीय पादपों की आकारिकी
  • आवृतबीजीय पादपों की आन्तरिक संरचना
  • जन्तुओं की आकारिकी
  • जन्तु उत्तक
  • पादपों की कार्यिकी
  • पादप पोषण क्या है
  • प्रकाश संश्लेषण की परिभाषा , उदाहरण
  • श्वसन
  • बहुकोशिकीयता – संरचना और कार्य अर्थात मानव और जन्तुओं की शारीरिक और कार्यिकी
  • जन्तु पोषण
  • जन्तुओं में श्वसन
  • जन्तुओं में परिसंचरण
  • जन्तुओ में उत्सर्जन और परासरण नियमन
  • जन्तुओं में गति और प्रचलन
  • जन्तुओं में तंत्रिका समन्वयन और समाकलन
  • संवेदी अंग को कैसे परिभाषित करते है
  • जन्तुओं में रासायनिक समन्वयन क्या है
  • प्रजनन , वृद्धि और परिवर्तन
  • पुष्पीय पादपों में प्रजनन
  • पादप वृद्धि और गतियाँ
  • जन्तुओं में प्रजनन और परिवर्धन
  • वृद्धि , पुनरुद्भवन और व्यता क्या है
  • आनुवंशिकी (genetics)
  • पारिस्थितिकी और पर्यावरण
  • जिव और वातावरण
  • पारिस्थितिकी पादप समूह और अनुत्क्रमण
  • परितंत्र की संरचना और कार्य लिखिए
  • जीवोम , जीव मण्डल और जैव भूरासायनिक चक्र
  • प्रदूषण
  • प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण
  • जैव विविधता और वन्य जिव संरक्षण
  • जीव विज्ञान के अनुप्रयोग (application of biology)
  • पादपों का घरेलुकरण तथा फसल सुधार
  • आर्थिक वनस्पति विज्ञान
  • जन्तुओं का पालतुकरण और आर्थिक जन्तु विज्ञान
  • फसलीय पीडकनाशी
  • जैव उर्वरक एवं जैविक पीडक नियन्त्रण (biofertilizers and biological pest controls)
  • जीन संरक्षण और नई फसलें
  • मानव रोग का परिचय (human diseases)
  • सामान्य मानव रोग
  • धुम्रपान , मदिरापान , औषधि व्यसन , मानसिक और सामुदायिक स्वास्थ्य
  • चिकित्सीय अनुप्रयोगों के लिए तकनीकियाँ
  • जैवतकनीकी
  • जैव ऊर्जा
  • मानव जनसंख्या की वृद्धि

neet २०१८ – २०१९ रसायन विज्ञान पाठ्यक्रम (NEET 2018 – 2019 syllabus chemistry in hindi )

  • गैसीय अवस्था
  • मोल एवं तुल्यांक अवधारणा
  • परमाणु संरचना
  • रेडियोएक्टिवता
  • रासायनिक बन्ध एवं संकर लवण
  • ऑक्सीकरण अपचयन
  • विद्युत अपघटन एवं विद्युत अपघटनी सेल
  • रेडोक्स अनुमापन
  • अणुसंख्य गुण धर्म और विलयन क्या है
  • रासायनिक बल गतिकी
  • रासायनिक साम्य
  • आयनिक साम्य
  • विलयन की चालकता
  • उष्मागतिकी
  • ऊष्मा रसायन
  • क्रिस्टलोग्राफी

जिगलर नाटा बहुलकीकरण / उपसहसंयोजक ,आण्विक द्रव्यमान ,संश्लेषित , प्राकृतिक रबर 

Ziegler-Natta Polymerization in hindi जिगलर नाटा बहुलकीकरण / उपसहसंयोजक बहुलकीकरण : डाई इन या एल्किनों की वे बहुलकीकरण अभिक्रियाएँ जो कार्ब धात्विक यौगिक द्वारा उत्प्रेरित होती है , उपसहसंयोजक बहुलकीकरण क्रियाविधि कहलाती है।

अभिक्रिया के प्रथम पद में कार्बधात्विक यौगिक एवं एकलक इकाई के संयोग से नयी एकलक इकाई का निर्माण होता है।

जिगलर नाटा उत्प्रेरक एथीन के बहुलकीकरण अभिक्रिया में उत्प्रेरक का कार्य करता है , यह विशिष्ट प्रकार के उपसहसंयोजक उत्प्रेरक होते है जो त्रिविम विशिष्ट होते है।

जिगलर नाटा उत्प्रेरक विषमांगी उत्प्रेरक का उदाहरण है।

इसमें क्रियाशील स्पीशीज TiCl4 होता है।

बहुलको का त्रिविम रसायन

बहुलकों के गुण उनकी संरचना पर निर्भर करते है , सामान्य परिस्थिति में एकलक इकाई के बहुलकीकरण से तीन प्रकार के प्रकाशिक सक्रीय बहुलक बनने की सम्भावना होती है।
1. आइसोटैक्टिक बहुलक : जब बहुलकीकरण उत्पाद में सभी एल्किल समूह C-C श्रृंखला में एक ही ओर होते है तो इस प्रकार के बहुलक का निर्माण होता है अर्थात इनमे दीर्घ श्रृंखला में सभी निकटवर्ती असममित / किरैल C परमाणुओं का विन्यास समान होता है।
2. सिंडियो टैक्टिक / एकान्तर व्यवस्थित बहुलक : जब बहुलीकृत उत्पाद में सभी एल्किल समूह C-श्रृंखला के एकांतर क्रम हो तो इस प्रकार के बहुलक बनते है अर्थात वे बहुलक जिनमे निकटवर्ती असममित c-परमाणुओं पर एल्किन समूह विपरीत दिशा में होते है , सिण्डीयो टैक्टिक बहुलक कहलाते है।
3. एटैक्टिक बहुलक : इस प्रकार के बहुलकों में एल्किल समूह के जुड़ने की निश्चित व्यवस्था या क्रम नहीं होता है।

बहुलको का आण्विक द्रव्यमान

बहुलकीकरण की क्रिया से प्राप्त बहुलक अनेक विभिन्न प्रकार के बहुलक इकाइयों का समूह होता है अत: किसी बहुलक का आण्विक द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए उनमे उपस्थित विभिन्न बहुलक अणु के अणुभारो का औसत लिया जाता है।
यह निम्न दो प्रकार का होता है –
1. संख्या औसत अणुभार : इस विधि में बहुलक में उपस्थित विभिन्न अणुओं के अणुभारों का योग करके उसमें कुल अणुओं k संख्या का भाग दिया जाता है।
संख्या औसत अणुभारों को सामान्यत अणु संख्यक गुण जैसे : परासरण दाब मापन आदि द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।
2. भार औसत अणुभार : इस विधि में बहुलक में उपस्थित प्रत्येक अणु के कुल अणुभार की उसके अणुभार से गुणा किया जाता है , इस प्रकार सभी बहुलक अणुओं को गुणनफलो का योग किया जाता है और इस योग में बहुलक अणुओं के कुल अणुभार का भाग देने पर भार औसत अणुभार प्राप्त होता है।

संश्लेषित रबर

1. ब्यूना S : यह 1,3 ब्यूटाडाइईन तथा स्टाइरिन के सहबहुलकीकरण से बनता है।
इनका उपयोग वाहनों के टायर , जूते आदि बनाने में किया जाता है।
2. ब्यूना N : यह 1,3 ब्यूटाडाइईन व एक्रिलो नाइट्राइल से बनता है।
इनका उपयोग ऑयल शील , गैसकैट आदि बनाने में किया जाता है।
3. नियोप्रिन रबर : यह 2 क्लोरो 1,3 ब्यूटाडाइईन के बहुलकीकरण से बनता है। नियोप्रिन क्लोरो प्रिन एकलक इकाइयों के सम बहुलकीकरण से बनता है।
4. पॉली वाइनिल क्लोराइड : यह वाइनिल क्लोराइड के सम बहुलकीकरण से बनता है।
5. पॉलीटेट्रा क्लोरो एथिलीन / टेफ़लोन (PTFE) : यह टेट्रा फ्लोरो एथिलीन के बहुलकीकरण से बनता है।
इनका उपयोग स्नेहक के रूप में व विद्युत रोधी उपकरणों के रूप में किया जाता है।
6. नायलॉन 6 : इसका निर्माण केप्रोलेक्टस के बहुलकीकरण से होता है।
प्राकृतिक रबर : इनका संघटन (C5H8)n होता है।
प्राकृतिक रबर आइसोप्रिन का रेखीय बहुलक होता है।
रबर का वल्किनिकरण : प्राकृतिक रबर कम प्रत्यास्थ होता है एवं इसमें जल को प्रतिकर्षित करने की क्षमता कम होती है , इनकी तनन सामर्थ्य कम होती है और यह भंगुर होता है।  इस कारण प्राकृतिक रबर को सल्फर के साथ गर्म किया जाता है जिससे एकलक इकाइयों के मध्य द्विबंध पर सल्फर जुड़ने से व्यवस्था एवं तनन सामर्थ्य बढ़ जाती है इसे रबर का वल्किनिकरण कहते है।

बहुलकीकरण की परिभाषा क्या है , प्रकार , योगात्मक , संघनन बहुलकीकरण polymerization in hindi

बहुलकीकरण (polymerization in hindi) : एकलक इकाइयों से बहुलक बनने की प्रक्रिया को बहुलकीकरण कहते है।

सामान्यत बहुलकीकरण क्रिया दो प्रकार से होती है –

1. योगात्मक बहुलकीकरण

2. संघनन बहुलकीकरण

1. योगात्मक बहुलकीकरण

जब एकलक अणु / इकाइयाँ परस्पर योगात्मक अभिक्रिया द्वारा बहुलक का निर्माण करती है तो इस प्रक्रिया को योगात्मक बहुलकीकरण कहते है।

योगात्मक बहुलकीकरण में एकलक इकाइयाँ असंतृप्त अणु जैसे एल्किन , एल्काइन या इसके व्युत्पन्न होते है।

यह प्रक्रिया सामान्यत: श्रृंखला क्रियाविधि द्वारा सम्पन्न होती है अत: इसे श्रृंखला वृद्धि बहुलकीकरण भी कहते है।

योगात्मक बहुलकीकरण की क्रियाविधि दो प्रकार से सम्पन्न होती है।

(a) मुक्त मूलक योगात्मक बहुलकीकरण : O2 , पेरोक्साइड या परऑक्सी अम्ल की उपस्थिति में एल्किन , एल्काइन या इनके व्युत्पन्न मुक्त मूलक योगात्मक बहुलकीकरण द्वारा बहुलक बनाते है , यह क्रियाविधि तीन पदों में सम्पन्न होती है।

step 1 :  श्रृंखला प्रारम्भ पद : इस पद में प्रारम्भिक पदार्थ जैसे पेरोक्साइड , हाइड्रोपेरोक्साइड , एजोयोगिक परऑक्सी अम्ल आदि से पहले अपघटित होकर मुक्त मूलक बनाते है जो एकलक अणु से योग करके एक बड़ा मुक्त मूलक बना लेता है अत: इसलिए इस पद को प्रारम्भ पद कहते है।

step 2 : श्रृंखला संचरण पद : प्रारम्भिक संचरण पद : प्रारंभिक पद में बना एकलक मुक्त मूलक दूसरे एकलक अणु से योग करके दूसरा बड़ा मुक्त मूलक बनाता है जो फिर एकलक अणु से क्रिया कर अन्य मुक्त मूलक बना लेता है।

इस प्रकार विभिन्न एकलक इकाइयाँ जुडती जाती है तथा श्रृंखला वृद्धि के साथ बहुलक निर्माण हो जाता है।

step 3 : श्रृंखला समापन पद : श्रृखला का समापन मुक्त मुलको के युग्मन अथवा असमानुपातन द्वारा होता है।

असमानुपातन – दो मुक्त मूलक H के स्थानान्तरण द्वारा उदासीन अणु बनाते है तो इसे असमानुपातन कहते है।

(b) आयनिक योगात्मक बहुलकीकरण : वाइनिल एकलको की बहुलकीकरण क्रियाएं आयनिक पदार्थों की उपस्थिति में सम्पन्न होती है , इन्हें आयनिक क्रियाविधि कहा जाता है।

ये क्रियाविधि दो प्रकार से होती है –

(i) धनायनी बहुलकीकरण : ये अभिक्रिया लुईस अम्ल द्वारा प्रारम्भ होती है , यह तीन पदों में सम्पन्न होती है।

step 1 : श्रृंखला प्रारम्भ पद : इस पद में लुइस अम्ल electron स्नेही के समान व्यवहार करता है एवं वाइनिल एकलक इकाई पर आक्रमण करके मध्यवर्ती कार्बधनायन बनाता है जिसे अभिक्रिया प्रारम्भ हो जाती है।

step 2 : श्रृंखला संचरण पद।

step 3 : श्रृंखला समापन पद : इस पद में नाभिक स्नेही की उपस्थिति में एकलक श्रृंखलायें प्रोटोन त्यागकर बहुलक अणु का निर्माण करती है जिससे अभिक्रिया रुक जाती है।

(ii) ऋणायनी बहुलकीकरण : ये अभिक्रिया लुईस क्षार की उपस्थिति में सम्पन्न होती है , इनमे नाभिक स्नेही के आक्रमण से कार्बऋणायन का निर्माण होता है।

2. संघनन बहुलकीकरण

जब एकलक इकाई संघनन अभिक्रिया द्वारा बहुलक का निर्माण करती है तो इस प्रक्रिया को संघनन बहुलकीकरण कहते है।
इस प्रक्रिया में एकलक इकाइयों के जुड़ने पर छोटे अणु जैसे H2O , NH3 , HX आदि का विलोपन होता है।
इनमे प्रयुक्त एकलक इकाइयों में दो क्रियात्मक समूह होते है।
उदाहरण : नाइलोन-66

बहुलक की परिभाषा , संश्लेषित पॉलीमर क्या है , प्रकार , वर्गीकरण synthetic polymer in hindi

संश्लेषित बहुलक (synthetic polymer) : बहुलक (polymer) ग्रीक शब्द पोली मरोस से लिया गया है जिसका मतलब होता है बहुत  सी इकाइयाँ।

अतः बहुत सी छोटी छोटी इकाइयो से मिलकर बने उच्च अणुभार वाले यौगिक बहुलक कहलाते है।

वह छोटी संरचनात्मक इकाई जिसकी पुनरावर्ती से बहुलक का निर्माण होता है एकलक कहलाती हैं।

बहुलक निर्माण की प्रक्रिया को बहुलकीकरण कहते है।

बहुलको का वर्गीकरण

1. स्रोत के आधार पर : इस आधार पर बहुलक दो प्रकार के होते है।
(a) प्राकृतिक बहुलक : वे बहुलक जो प्राकृतिक पदार्थों से प्राप्त होते है , प्राकृतिक बहुलक कहलाते है।
उदाहरण : स्टार्च , सेलुलोस , प्रोटीन , न्यूक्लिक अम्ल और प्राकृतिक रबर।
(b) संश्लेषित बहुलक : वे बहुलक जो कृत्रिम विधियों द्वारा संश्लेषित किये जाते है संश्लेषित बहुलक कहलाते है। उदाहरण : पोलीथीन नाइलोन-66 , PVC , कृत्रिम रबर।
2. संरचना के आधार पर वर्गीकरण : संरचना के आधार पर बहुलक तीन प्रकार के होते है।
(a) रेखीय बहुलक : इन बहुलकों में एकलक इकाइयाँ आपस में जुड़कर एक सीधी श्रृंखला का निर्माण करती है , इस प्रकार रेखीय श्रृंखला का निर्माण होता है।
इन बहुलको के गलनांक , घनत्व , तनन सामर्थ्य आदि के मान उच्च होते है।
उदाहरण : उच्च घनत्व पॉलीथीन (HDP) , नाइलोन-66
(b) शाखित बहुलक : इन बहुलको में एकलक इकाइयाँ जुड़कर एक दीर्घ श्रृंखला बनाती है जिसे मुख्य श्रृंखला कहते है।  इस मुख्य श्रृंखला से जुडी विभिन्न लम्बाई की पाशर्व श्रृंखलायें होती है , जिन्हें शाखित श्रृंखला कहते है।
उदाहरण : निम्न घनत्व वाली पॉलीथीन (LDP) , ग्लाइकोसन।
(c) तिर्यक बद्ध बहुलक : इन बहुलको में एकलक इकाइयों की लम्बी श्रृंखला आपस में तिर्यक बन्धो द्वारा जुडी रहती है।
इनका आकार बडा होता है और एकलक इकाइयों के मध्य प्रबल बंध होते है।
ये कठोर , दृढ एवं भंगूर होते है।
उदाहरण – बैकेलाईट , मैलामिन फार्मेल्डिहाइड रेजिन आदि।
ये बहुलक पिघलते नहीं है परन्तु अधिक गर्म करने पर जलने लगते है।
3. आण्विक बलों के आधार पर वर्गीकरण : आण्विक बलों के आधार पर बहुलक 4 प्रकार के होते है।
(a) ताप प्लास्टिक / ताप शून्मय / थर्मोप्लास्टिक : वे बहुलक जो गर्म करने पर मुलायम हो जाते है इन्हें किसी भी आकार में परिवर्तित किया जा सकता है।
ठण्डा करने पर ये पुन: अपनी मूल अवस्था में आ जाते है ताप प्लास्टिक बहुलक होते है।
ये लम्बी श्रृंखला वाले रेखीय बहुलक होते है।
उदाहरण – पॉलीथीन , PVC , पॉलीस्टाइरिन।
(b) ताप दृढ बहुलक / थर्मोसैटिंग बहुलक : वे बहुलक जो गर्म करने पर रासायनिक परिवर्तन द्वारा कठोर दृढ पदार्थों में बदल जाते है , ताप दृढ बहुलक कहलाते है।
इन बहुलको को गर्म करने पर पुन: मुलायम अवस्था में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
इनमे प्रबल सहसंयोजक बंध होते है।
उदाहरण : बैकेलाईट , मैलामिन फार्मेल्डिहाइड।
(c) प्रत्यास्थ बहुलक : वे बहुलक जो रबर के समान प्रत्यास्थता दर्शाते है अर्थात खीचने पर शीघ्र ही अपनी लम्बाई से लगभग दो तीन गुना खीच जाते है एवं तनाव हटाने पर पुन: प्रारंभिक आकृति में आ जाते है , प्रत्यास्थ बहुलक कहलाते है।
उदाहरण : कृत्रिम रबर , प्राकृतिक रबर , स्लिकोन रबर।
(d) रेशे : वे बहुलक जिनकी दो श्रृंखलाओं के मध्य अंतराण्विक H बंध या द्विध्रुव – द्विध्रुव आकर्षण बल पाए जाते है रेशे कहलाते है।  इनमे तनन सामर्थ्य बहुत अधिक होती है , ये उच्च दृढ़ता वाले क्रिस्टलीय प्रकृति के रेशे होते है।
ये लचीले भी होते है।
उदाहरण – नाइलोन -66 , पोलीएस्टर
4. संगठक इकाइयों या एकलक इकाइयों के आधार पर वर्गीकरण : एकलक इकाइयों के आधार पर बहुलक दो प्रकार के होते है।
(a) समबहुलक : वे बहुलक जो एक ही प्रकार की एकलक इकाइयों से बनते है इन्हें सम बहुलक कहते है।
उदाहरण – पॉलीथीन , PVC
(b) सह बहुलक या विषम बहुलक : वे बहुलक जो दो या दो से अधिक प्रकार की एकलक इकाइयों से बनते है उन्हें सह बहुलक कहते है।
उदाहरण : स्टाइरिन ब्युटाडाईन रबर (SBR)

संश्लेषित अपमार्जक क्या है , परिभाषा , प्रकार , क्रांतिक मिसेल सान्द्रता (CMC) , साबुन और अपमार्जक में अंतर

synthetic detergents in hindi संश्लेषित अपमार्जक : लम्बी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला युक्त सल्फ्यूरिक अम्ल या सल्फोनिक अम्लों के सोडियम लवण अपमार्जक कहलाते है।

ये साबुन नहीं होते परन्तु साबुन के समान कार्य करते है अत: इन्हें साबुन रहित साबुन (soap less soap) भी कहते है।

अपमार्जक अणु के दो भाग होते है –

1. हाइड्रोकार्बन भाग या जल विरोधी भाग

2. आयनिक भाग या जल स्नेही भाग

जैसे : सोडियम लारिल सल्फेट

अपमार्जको के प्रकार

अपमार्जक निम्न प्रकार के होते है –

1. धनायनिक अपमार्जक : ये मुख्यत चतुष्क अमोनियम लवण होते है इनका जल स्नेही सिरा धनायन होता है इसलिए इन्हें प्रतीप साबुन कहते है , इनके अणुओं का बड़ा भाग धनावेशित होता है।  ये अधिक महंगे होते है अत: इनका उपयोग सिमित होता है।

उदाहरण : सैटिल ट्राई मेथिल अमोनियम क्लोराइड

2. ऋणायनिक अपमार्जक : इन अपमार्जको का ऋणायन पृष्ठ सक्रीय होता है इनमे लम्बी श्रृंखला युक्त भाग पर ऋणावेश होता है।

उदाहरण : सोडियम लोरिल सल्फेट

3. उदासीन अपमार्जक : आधुनिक अपमार्जक सामान्यत: उदासीन होते है ये मुख्यत: पोली हाइड्रोक्सी एल्कोहल एस्टर होते है इनमे जल स्नेही सिरा बहु क्रियात्मक समूह होता है जो H बंध द्वारा जल में विलेय होता है।

जैसे : पेंटा एरिथ्रिल मोनो स्टीयरेट

क्रांतिक मिसेल सान्द्रता (CMC)

वह न्यूनतम सांद्रता जो मिसेल बनाने के लिए आवश्यक होती है CMC कहलाती है।

इस सान्द्रता पर साबुन एवं अपमार्जक जल के साथ मिसेल का निर्माण करते है।

साबुन द्वारा मिसेल निर्माण की क्रिया विधि को निम्न प्रकार समझा जा सकता है –

साबुन या अपमार्जक के दो भाग होते है –

1. आयनिक / जल स्नेही भाग : यह भाग जल में घुलता है।

2. हाइड्रो कार्बन / जल विरोधी भाग : यह भाग चिकनाई या वसा में विलेय होता है।

उदाहरण : सोडियम स्टीयरेट

साबुन को जल में घोलने पर काफी संख्या में लगभग 100 अणु स्टीयरेट आयन व्यवस्थित होकर मिसेल का निर्माण करते है।

चिकनाई युक्त रेशे को साबुन या अपमार्जक के घोल में डाला जाता है तो साबुन के स्टीयरेट आयन चिकनाई को इस प्रकार घेर लेते है कि H-कार्बन सिरा तेल या चिकनाई में घुला रहता है एवं कर्बोक्सिलेट सिरे कांटे के समान जल में निकले रहते है।

अत: साबुन की हाइड्रोकार्बन भाग चिकनाई में तथा कर्बोक्सिलेट भाग जल में घुला होता है।

हिलाने पर चिकनाई युक्त मेल की सतह साबुन के साथ मिसेल बनाती है।  जो बहते जल के साथ रेशे से अलग अलग हो जाती है जिससे कपडे से चिकनाई हट जाती है।

साबुन का निर्माण : तेल या वसा का जल अपघटन NaOH या KOH क्षार की उपस्थिति में कराने पर साबुन का निर्माण होता है।

साबुन और अपमार्जक में अंतर लिखो

साबुन :

  • साबुन दुर्बल अम्ल एवं प्रबल क्षार के लवण होते है अतः इनका जलीय विलयन क्षारीय होता है।
  • कठोर जल के साथ झाग का निर्माण नहीं करता क्योंकि कठोर जल में उपस्थित कैल्सियम तथा मैग्नीशियम आयनों के साथ क्रिया करके यह अविलेय लवण बना लेते है।
  • ऊनी वे रेशमी वस्त्र जिनमे मृदु धागे होते है उनकी सफाई साबुन द्वारा नहीं की जाती है।

अपमार्जक :

  • अपमार्जक प्रबल अम्ल एवं प्रबल क्षार के लवण होते है अतः इनका जलीय विलयन उदासीन होता है।
  • ये कैल्शियम और मैग्नीशियम आयन द्वारा अवक्षेपित नहीं होते।  अतः ये कठोर जल के साथ भी काम में लिए जाते है।
  • इनके द्वारा सभी प्रकार के रेशो की सफाई की जाती है।

न्यूक्लिक अम्लों का जैविक कार्य , DNA की पुनरावर्ती व स्वप्रतिकृतिकरण , आनुवांशिक कूट 

न्यूक्लिक अम्लों का जैविक कार्य :
(1) डीएनए (DNA) की पुनरावर्ती एवं स्वप्रतिकृतिकरण (replication of dna) : वह गुण जिसमे कोई जैव अणु अपने समान दूसरे अणु का संश्लेषण करता है replication कहलाता है।
डीएनए अणु में यह गुण पाया जाता है और डीएनए के इसी गुण के कारण आन्वांशिक लक्षण जनको से संतति में स्थानांतरित होते है।
डीएनए की पुनरावर्ती में इसकी दोहरी कुण्डली धीरे धीरे खुलती है और इस प्रकार पृथक हुए दोनों स्तंभ दो नए स्तम्भ के संश्लेषण के लिए साचे के समान कार्य करते है।  डीएनए अणु में क्षार युग्म की विशिष्टता के कारण एक स्तम्भ के प्रत्येक क्षार के सामने उसके पूरक क्षार के निर्माण के साथ न्युक्लियोटाइडो का निर्माण होता जाता है जिससे प्रत्येक स्तम्भ द्विकुंडलित होती है इस प्रकार एक DNA अणु से उसके दो नये प्रतिरूप तैयार हो जाते है जो कोशिका विभाजन के समय नयी कोशिका में चले जाते है।
डीएनए का प्रतिकृतिकरण अर्द्धसंरक्षी विधि द्वारा होता है क्योंकि इस प्रक्रिया में मूल डीएनए का एक सांचा (templet) संरक्षित रहता है , केवल एक ही नये templet का संश्लेषण होता है।
एक स्तम्भ में नीचे से तो दूसरे स्तम्भ में ऊपर से नए templet का संश्लेषण होता है।

2. प्रोटीन संश्लेषण : न्यूक्लिक अम्ल द्वारा जीवों के शरीर में प्रोटीन संश्लेषण का कार्य होता है , प्रोटीन संश्लेषण में डीएनए , क्षारों के अनुक्रम के अनुसार RNA बनाता है एवं RNA एमीनो अम्लों का अनुक्रम तैयार कर प्रोटीन संश्लेषण का कार्य करता है।
इस प्रक्रिया में निम्न प्रकार के RNA काम आते है –

  •  m-RNA – यह सूचनाएं प्रेक्षित करता है।
  •  t-RNA – यह एमीनो अम्लों का स्थानान्तरण करता है।
  •  r-RNA – इस पर प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया होती है।

न्यूक्लिक अम्लों द्वारा प्रोटीन संश्लेषण में मुख्य रूप से दो पद होते है।
(i) अनुलेखन (transcription) : डीएनए द्वारा m-RNA के संश्लेषण की प्रक्रिया अनुलेखन कहलाती है।
यह क्रिया केन्द्रक में सम्पन्न होती है।
(ii) अनुवादन (translation) : m-RNA द्वारा प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया अनुवादन कहलाती है , इस प्रक्रिया में m-RNA , आनुवांशिक कूट के रूप में DNA द्वारा दी गयी सूचनाओं के अनुसार प्रोटीन संश्लेषण करता है।
3. उत्परिवर्तन : विशेष परिस्थितियों में न्यूक्लिक अम्लों के नाइट्रोजनी क्षारको का अनुक्रम परिवर्तित हो जाता है।
कई बार ये परिवर्तन स्थायी हो जाते है जिससे जीव के शरीर में किसी विशेष लक्षण की उत्पत्ति हो जाती है।
सजीव के शरीर में उत्पन्न हुए ये लक्षण DNA द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होते रहते है यह प्रक्रिया उत्परिवर्तन कहलाती है।

आनुवांशिक कूट

डीएनए द्वारा प्राप्त गुप्त आनुवांशिक सूचनाएँ RNA को प्रेक्षित करना आनुवांशिक कूट कहलाता है।
अर्थात DNA प्रोटीन संश्लेषण में RNA को आनुवांशिक कूट के रूप में सूचनाएँ देता है ये कोडित संकेत क्रिप्टोग्राम कहलाते है।
आनुवांशिक कूट के लक्षण :
  • आनुवांशिक कूट त्रिक होते है।
  • आनुवांशिक कूट सर्वव्यापी होती है अर्थात सभी कोशिकाओं में एक समान आनुवांशिक कूट होते है।
  • आनुवांशिक कूट कोमा रहित होते है अर्थात इनमे अतिव्यापन नहीं होता है।
  • आनुवांशिक कूट डीजनरेट होते है अर्थात एक से अधिक कोड़ोन एक ही एमीनो अम्ल को कोडित कर सकते है।
  • आनुवांशिक कूट ध्रुवीय होते है।
  • AUG कोडोन प्रारंभिक कोडोन होता है।
  • UAA , UGA , UAG तीन समापन कोडोन होते है।

 

न्यूक्लियोसाइड और न्यूक्लियोटाइड की परिभाषा क्या है , nucleoside and nucleotide in hindi

न्यूक्लियोसाइड (nucleoside in hindi) : एक नाइट्रोजनी क्षार व शर्करा के मध्य N ग्लाइकोसिडिक बंध के बनने से बनी इकाई न्यूक्लियोसाइड कहलाती है।
न्यूक्लियोसाइड = शर्करा + नाइट्रोजनी क्षार
न्यूक्लियोसाइड में शर्करा का C-1 पिरिमिडीन क्षार के N-1 के साथ एवं फ्यूरीन क्षार के N-9 के साथ जुड़ता हैं।
डीएनए व RNA प्रत्येक में 4-4 भिन्न प्रकार के न्यूक्लियोसाइड होते है।
जैसे : β-D-2 डी ऑक्सी राइबोज एवं एडिनीन नाइट्रोजनी क्षार के संयोग से बने न्यूक्लियोसाइड को एडिनोसिन कहते है , जिसे निम्न प्रकार दर्शाते है –

न्यूक्लियोटाइड (nucleotide): फॉस्फोरिक अम्ल एवं न्यूक्लियोसाइड के संयोजन से न्यूक्लियोटाइड बनता है।
न्यूक्लियोटाइड  = न्यूक्लियोसाइड + फॉस्फोरिक अम्ल
फास्फोरिक अम्ल एवं न्यूक्लियोसाइड के मध्य फास्फो एस्टर बन्ध बनता है , जिसमे फॉस्फोरिक अम्ल शर्करा के C-5′ या C-3′ से जुड़ सकता हैं।
राइबोज शर्करा में फॉस्फोरिक अम्ल C-2′ से भी जुड़ सकता है।
शर्करा फॉस्फेट समूह के जुड़ने के स्थान के आधार पर इन न्यूक्लियोटाइडो को क्रमशः 5′-P , 3′-OH या 3′-P , 5′-OH न्यूक्लियोटाइड कहा जाता है।
एडिनोसिन एवं फास्फोरिक अम्ल के संयोजन से बने न्यूक्लियोटाइड को एडिनोसीन मोनो फॉस्फेट (AMP) कहते है , इसे निम्न प्रकार दर्शाते है –

न्यूक्लियोटाइड जैविक तंत्र में ऊर्जा संचय का कार्य करते है।
जैसे एडिनोसीन ट्राई फॉस्फेट (ATP)
ATP की संरचना निम्न होती है –

पॉली न्यूक्लियोटाइड : न्यूक्लियोटाइडो की बहुत सी इकाइयां परस्पर फोस्फोडाइ एस्टर बंधो द्वारा जुड़कर बहुलकीय संरचना पॉलीन्यूक्लियोटाइड का निर्माण करती है , ये पॉली न्यूक्लियोटाइड ही न्यूक्लिक अम्ल बनाते है।
दो न्यूक्लियोटाइड परस्पर C-S’ व C-3′ के द्वारा जुड़े रहते है।

डीएनए की द्वितीयक संरचना (वाटसन व क्रिक मॉडल )

डीएनए अणु में दो पोली न्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाए परस्पर विपरीत दिशा में common axis पर दक्षिणावर्त हेलिक्स के रूप में वलयित होती है।
डीएनए अणु की संरचना में पॉली न्यूक्लियोटाइड श्रृंखला एक दूसरे के साथ नाइट्रोजनी क्षारों के मध्य H-बंध द्वारा जुडी रहती है।
एक श्रृंखला का एडिनिन क्षार दूसरी श्रृखला के थाईमिन क्षार के साथ द्विबंध द्वारा एवं एक श्रृंखला का साइटोसिन क्षार दूसरी श्रृंखला के ग्वानिन क्षार से त्रिबंध द्वारा जुड़ा रहता है।
इसे निम्न प्रकार दर्शाते है
DNA अणु की द्वितीय संरचना में प्रत्येक फेरे की लम्बाई 34 इंस्ट्रम होती है एवं प्रत्येक turn (फेरे) में 10 न्यूक्लियोटाइड ये युग्म उपस्थित होते है , हैलिक्स का व्यास 20 A (इंस्ट्रम)  होता है एवं किन्ही दो क्षार युग्मो के मध्य की दूरी 3.4 A होती है।
RNA की द्वितीयक संरचना   : RNA की द्वितीय संरचना भी हैलिक्स होती है परन्तु इसकी संरचना में एक strain होता है।
RNA में राइबोज़ शर्करा उपस्थित होती है इसमें फ्यूरिन क्षार एडिनीन व ग्वानिन होते है परन्तु पिरिमिडीन क्षार साइटोसीन व यूरेसिल होते हैं।

न्यूक्लिक अम्ल की परिभाषा क्या है , डी ऑक्सी राइबोज न्यूक्लिक अम्ल , राइबोज़ न्यूक्लिक अम्ल

Nucleic acid in hindi न्यूक्लिक अम्ल : वे यौगिक जो आनुवांशिक सूचनाओं को परिरक्षित करते हो एवं कोशिकाओं के अंदर प्रोटीन संश्लेषण की प्रक्रिया का अनुलेखित व अनुवादित करते हो न्यूक्लिक अम्ल कहलाते हैं।
न्यूक्लिक अम्ल जैव बहुलक होते है , जो न्युक्लिओटाइडो के बहुलकीकरण से बनते हैं।
न्यूक्लिक अम्ल दो प्रकार के होते हैं
1. डी ऑक्सी राइबोज न्यूक्लिक अम्ल (Deoxyribonucleic acid) (DNA)
2. राइबोज़ न्यूक्लिक अम्ल (Ribonucleic acid) (RNA)
न्युक्लिक अम्ल , न्यूक्लिओप्रोटीन के रूप में पाये जाते है।
1. डी ऑक्सी राइबोज न्यूक्लिक अम्ल (Deoxyribonucleic acid) (DNA) : यह केन्द्रक , माइट्रोकोन्ड्रिया एवं हरित लवक में पाया जाता हैं।
2. राइबोज़ न्यूक्लिक अम्ल (Ribonucleic acid) (RNA) : यह कोशिका द्रव्य में पाया जाता हैं।
नोट : पादप वायरस जैसे TMV , जन्तु वायरस रिट्रो वायरस बैक्टीरिया फैज आदि में आनुवांशिक पदार्थ RNA होता हैं इसके अलावा सभी जीवों में आनुवांशिक पदार्थ DNA होता हैं।
न्यूक्लिक अम्ल की प्राथमिक संरचना : न्युक्लिक अम्लों में शर्करा , फॉस्फेट एवं नाइट्रोजनी क्षार (कार्बनिक क्षार ) जिस क्रम में जुड़े रहते है उसे न्यूक्लिक अम्ल की प्राथमिक संरचना कहते है।
न्यूक्लिक अम्लों का मंद परिस्थितियों में जल अपघटन कराने पर न्यूक्लिओटाइड बनते है जो पुन: जल अपघटन पर न्यूक्लिओसाइड एवं फॉस्फोरिक अम्ल देते है , न्यूक्लिओसाइड आगे जल अपघटन पर शर्करा एवं नाइट्रोजनी क्षार देते हैं।
अतः न्यूक्लिक अम्लों के जल अपघटन से तीन प्रकार के यौगिक प्राप्त होते है।
1. पेन्टोज शर्करा : डीएनए व RNA दोनों में 5-C युक्त शर्करा पायी जाती है , जिसे पेंटोज शर्करा कहते है।
DNA में β-D-2 डीऑक्सी राइबो शर्करा एवं RNA में β-D- राइबोज शर्करा पायी जाती हैं।
ये दोनों शर्कराएं C-2 पर स्थित ऑक्सीजन की उपस्थिति में भिन्न होती हैं।

2. फॉस्फोरिक अम्ल :

3. नाइट्रोजनी क्षार : न्यूक्लिक अम्लों में दो प्रकार के नाइट्रोजनी क्षार होते हैं –
(a) प्यूरिन क्षार : इन नाइट्रोजनी क्षारो में प्यूरीन वलय होती है

फ्यूरिन क्षार दो होते है –

  • एडिनीन (A)
  • ग्वानीन (G)

दोनों फ्युरिन क्षार नाइट्रोजन -9 के द्वारा शर्करा के C-1 से जुड़ते है।
(b) पिरिडीन क्षार : इनमे पिरिमिडीन वलय उपस्थित होती हैं।
न्यूक्लिक अम्लों में तीन परिमिडीन क्षार होते है।

  • थाइमीन (T)
  • साइटोसीन (C)
  • यूरेसिल (U)

DNA में थाइमिन व साइटोसीन एवं RNA में थाइमीन के स्थान पर यूरेसिल पाया जाता है।
सभी पिरिमिडीन क्षार नाइट्रोजन -1 से शर्करा के C-1 के साथ जुड़ते है।

प्रोटीन की परिभाषा क्या है , गुण , लक्षण ,वर्गीकरण / प्रकार ,प्रोटिन की संरचना , विकृतिकरण

protein in hindi प्रोटीन की परिभाषा क्या है : α अमीनो अम्लों के रेखीय बहुलक प्रोटीन कहलाते है।
प्रोटीन शरीर की वृद्धि एवं मरम्मत में सहायक होते है।
प्रोटीन ग्रीक भाषा के प्रोटियस से लिया गया है जिसका मतलब होता है अति मत्वपूर्ण।
अत: प्रोटीन सजीव के शरीर के लिए अतिआवश्यक यौगिक है , प्रोटीन का जल अपघटन करने पर पोली पेप्टाइड प्राप्त होते है , जो आगे जल अपघटन करने पर α अमीनो अम्ल देते है अत: प्रोटीन α अमीनो अम्लों का बहुलक होता है।
प्रोटीन के सामान्य लक्षण

  • प्रोटिन उच्च अणुभार वाले बहुलक होते है।
  • प्रोटीन में एक फ्री -COOH एवं -NH2 समूह होता है , अत: इस कारण प्रोटीन का अणु उभयधर्मी होता है।
  • प्रोटीन L-विन्यास वाले α एमीनो अम्लों से मिलकर बनते है अत: ये प्रकाशिक सक्रीय होते है।
  • प्रोटीन के जलने व गलने , सड़ने पर इनका ऑक्सीकरण हो जाता है जिससे एमीन , N2O , H2O आदि बनते है।
  • वे पॉली पेप्टाइड जिनका आण्विक द्रव्यमान 10000 से अधिक होता है प्रोटीन कहलाते है।

प्रोटीन का वर्गीकरण / प्रकार (types of protein)
1. आण्विक संरचना एवं व्यवहार के आधार पर : इस आधार पर प्रोटीन 2 प्रकार के होते है –
(a) रेशेदार प्रोटीन : ये प्रोटिन जल में अविलेय परन्तु प्रबल अम्ल व क्षार में विलेय होते है।
ये मजबूत व रेशेदार संरचना वाली होती है , इनमे अन्तराण्विक H बंध पाए जाते है।
उदाहरण : मांशपेशियों में मायोशीन , बाल व नाखून में क्रेटीन व रेशो में फाइब्रीन प्रोटीन।
(b) गोलाकार प्रोटीन : ये प्रोटीन जल , अम्ल , क्षार और लवण में विलेय होती है।
एमीनो अम्लों के मध्य तिर्यक बंध बनने से इनका निर्माण होता है , इनकी आकृति गोलाकार होती है।
उदाहरण : अंडे में एल्ब्यूमिन , हीमोग्लोबिन में ग्लोबिन , दूध में कैसीन , एंजाइम , हार्मोन्स व प्रतिजैविक
2. जल अपघटन के प्रति व्यवहार के आधार पर या संघठन के आधार पर :
(a) सरल प्रोटिन : ये प्रोटीन जल अपघटन पर केवल α अमीनो अम्लों का मिश्रण देते है।
उदाहरण : एल्ब्यूमिन , क्रिटेनीन , ग्लुटेनीन , ग्लोब्युलिन
(b) संयुग्मित प्रोटीन : ये प्रोटीन जल अपघटन पर α अमीनो अम्लों के साथ अप्रोटिनीय भाग भी देते है जिसे प्रोस्थैटिक समूह कहते है।
प्रोस्थैटिक समूह प्रोटीन की जैविक क्रियाशीलता को नियंत्रित करता है।
(c) व्युत्पन्न प्रोटीन : ये प्रोटीन जल अपघटन पर lower प्रोटीन , प्रोटिएज , पेप्टोनस एवं पोली पेप्टाइड देते है।
पेप्टोनस पोली पेप्टाइडस एवं सरल प्रोटीन आदि जल में विलेय होते है।

प्रोटीन की संरचना (structure of protein)

प्रोटीन की संरचना निम्न 4 प्रकार की होती है
1. प्राथमिक संरचना : प्रोटीन की प्राथमिक संरचना को सर्वप्रथम सेंगर ने इन्सुलिन में खोजा था।
इसमें केवल सहसंयोजक बंध होते है।
प्राथमिक संरचना में प्रोटीन में उपस्थित विभिन्न प्रकार के एमीनो अम्ल , उनकी संख्या तथा उनके जुड़ने का अनुक्रम व्यक्त किया जाता है।
उदाहरण – प्रत्येक प्रकार की प्रोटीन में एमीनो अम्लों के जुड़ने का क्रम विशिष्ट होता है जो प्रोटीन की जैविक सक्रियता के लिए उत्तरदायी होता है। जैसे रक्त में पाये जाने वाले हीमोग्लोबिन की ग्लोबिन प्रोटीन स्वसन द्वारा ग्रहण की गयी ऑक्सीजन को फेफड़ो से विभिन्न कोशिकाओं तक पहुचाती है , यदि इसमें एक भी एमीनो अम्ल क्रम से परिवर्तन हो जाता है तो सिकिल शैल एनीमिया रोग हो जाता है।
हीमोग्लोबिन में 574 एमीनो अम्ल इकाइयाँ होती है।
2. द्वितीयक संरचना : प्रोटीन की द्वितीयक संरचना में सहसंयोजक बंध एवं H-बंध उपस्थित होते है।
द्वितीयक संरचना में पेप्टाइड बंधन के आधार पर दो भिन्न विन्यास होते है।
(a) α हेलिक्स संरचना
(b) β  संरचना
(a) α हेलिक्स संरचना : प्रोटीन की इस संरचना में पोली पेप्टाइड श्रंखला मुड़े हुए रिबन के समान सर्पिलाकार होकर हैलिक्स संरचना बनाती है।  इस श्रंखला में विभिन्न भाग परस्पर H बन्ध द्वारा जुड़े होते है , जिससे हेलिक्स में मुक्त घूर्णन नहीं होता है , इस कारण हेलिक्स दृढ होता है।  प्रोटीन में सभी हेलिक्स दक्षिणावर्ती होती है।
(b) β  संरचना : इस संरचना में पोली पेप्टाइड श्रंखलाएं खुली अवस्था में एक दूसरे से अंतराण्विक H बंधो व अन्य आबंधो से जुडी रहती है एवं प्रति समान्तर क्रम में एक दूसरे से जुड़ सकती है।
ये चद्दर नुमा संरचनाएँ एक दूसरे पर आसानी से फिसल सकती है इसलिए इस प्रकार की संरचना प्रोटीन मुलायम होती है।
3. तृतीयक संरचना : विभिन्न द्वितीयक संरचनाएं एक दूसरे पर अध्यारोपित होकर प्रोटीन की तृतीयक संरचना बनाती है।
इस संरचना में पोली पेप्टाइड श्रृंखला विशिष्ट पदों के रूप में सुव्यवस्थित क्रम में उपस्थित होती है।
तृतीयक संरचना द्वारा प्रोटीन के अणु का सम्पूर्ण आकार निर्धारित होता है , यह संरचना प्रोटीन के विशिष्ट कार्यो के लिए महत्वपूर्ण होती है।
प्रोटीन की तृतीयक संरचना में विभिन्न पोलीपेप्टाइड श्रृंखलाओं के मध्य निम्न चार बंध पाए जाते है
  • H बंध
  • डाई सल्फाइड बंध
  • आयनिक बंध
  • जल विरोधी बंध या वांडरवाल बंध

4. चतुर्थक संरचना : यदि किसी प्रोटीन की संरचना में दो या अधिक पोली पेप्टाइड श्रृंखलाएं हो और वे परस्पर सहसंयोजक बन्धो द्वारा संयोजित नहीं होकर अन्य बन्धो द्वारा जुडती हो तो ऐसी संरचना को चतुर्थक संरचना प्रोटीन कहा जाता है , जैसे हीमोग्लोबिन का ग्लोबिन प्रोटीन।

प्रोटीन का विकृतिकरण (denaturation of proteins)

प्रोटीन को गर्म किया जाता है या एल्कोहल , क्षार भारी लवण अथवा प्रिक्रिक अम्ल आदि के साथ अभिकृत किया जाता है तो प्रोटीन का स्कंदन या अवक्षेपण हो जाता है , इसे प्रोटीन का विकृतिकरण कहते है।
विकृतिकरण में प्रोटीन की प्राथमिक संरचना अपवर्तित रहती है इसमें केवल द्वितीयक एवं तृतीयक संरचनाएँ परिवर्तित होती है जिससे प्रोटीन की जैविक सक्रियण नष्ट हो जाती है।

पेप्टाइड की परिभाषा क्या है , प्रकार , पेप्टाइडो का नामकरण , अपघटन की विधि , संश्लेषण विधि

peptide in hindi पेप्टाइड की परिभाषा क्या है : एमीनो अम्लों के अणुओं के अम्लीय -COOH समूह एवं क्षारीय -NH2 दोनों प्रकार के समूह होते है अत: एक एमिनो अम्ल का COOH समूह दूसरे एमीनो अम्ल के -NH2 से अभिक्रिया करके एमाइड या लवण बना लेते है , इसे पेप्टाइड कहते है।

peptide in hindi

पेप्टाइड में एमीनो अम्ल परस्पर पेप्टाइड बंध से जुड़े होते है।

पेप्टाइडो में पेप्टाइड बंधों द्वारा जुड़े एमीनो अम्लों की संख्या के आधार पर इन्हें निम्न भागों में बांटा जाता है –

1. डाई पेप्टाइड   →  इनमे दो एमिनों अम्ल साथ जुड़ते है।

2. ट्राई पेप्टाइड    →  इनमे तीन एमीनो अम्ल जुड़ते है।

3. ऑलीगो पेप्टाइड  →  ये पेप्टाइड 4 से 10 एमीनो अम्लों से बनते है।

4. पॉली पेप्टाइड    →  ये पेप्टाइड 10 से अधिक एमीनो अम्लों से मिलकर बने होते है।

पॉलीपेप्टाइड में दो टर्मिनल होते है

1. N – टर्मिनल  →  Left always

2. C-टर्मिनल    →  Right always

पेप्टाइडो का नामकरण : पेप्टाइडो के एक सिरे पर मुक्त -NH2 समूह तथा दूसरे सिरे पर मुक्त COOH समूह होते है , पहला सिरा N-टर्मिनल तथा दूसरा सिरा C-टर्मिनल कहलाता है।

पेप्टाइड की संरचना में N-टर्मिनल को सदैव बाई ओर तथा C-टर्मिनल को सदैव दायी ओर लिखा जाता है।  पेप्टाइड के नामकरण में C-टर्मिनल वाले एमीनो अम्लों को छोड़कर अन्य एमीनो अम्लों के नाम के इन को हटाकर इल (-yl) जोड़कर बायें से क्रमानुसार लिखते है।

पेप्टाइड संरचना का निर्धारण : पेप्टाइड की संरचना उसमे उपस्थित एमिनों अम्लों की संख्या एवं उनके जुड़ने के क्रम के आधार पर निर्धारित की जाती है।

एमीनो अम्लों की संख्या पोली पेप्टाइड के अपघटन से ज्ञात की जाती है।

1. पॉली पेप्टाइड का अपघटन : पोली पेप्टाइड का अम्लीय जल अपघटन करने पर इसमें उपस्थित सभी पेप्टाइड बंध टूट जाते है एवं एमीनो अम्लों का मिश्रण प्राप्त होता है , एमीनो अम्लों के इस मिश्रण का क्रोमेटो ग्राफी , आयन विनिमय व इलेक्ट्रो फोरेसिर आदि के द्वारा एमीनो अम्ल का विश्लेषण करके इनकी संख्या व सांद्रता ज्ञात की जाती है।

2. पेप्टाइड में एमीनो अम्लों का अनुक्रम ज्ञात करना : पेप्टाइड द्विक्रियात्मक समूह होता है , इसमें एक सिरे पर free NH2 व दूसरे पर free COOH समूह होता है।

इनका अनुक्रम निम्न प्रकार ज्ञात किया जाता है –

(i) N-terminal एमीनो अम्ल निर्धारण की विधि : इस श्रेणी में निम्न दो विधियाँ काम में आती है

(a) सेंगर विधि / DNP विधि : इस विधि में संगर अभिक्रमक 1-फ्लोरो 2,4-डाई नाइट्रो बेंजीन (FDNB) की कमरे के ताप पर सोडियम बाई कार्बोनेट विलयन की उपस्थिति में पेप्टाइड से अभिक्रिया करायी जाती है तो पेप्टाइड का 2,4-डाई नाइट्रोफेनिल व्युत्पन्न (DNP) बनता है।

जिसका अम्लीय माध्यम में जल अपघटन करने पर डाई नाइट्रो फेनिल समूह बंधित N-टर्मिनल एमिनों अम्लों के साथ स्वतंत्र एमीनो अम्लों का मिश्रण प्राप्त होता है , डाई नाइट्रो फेनिल समूह युक्त एमीनो अम्ल पीले रंग का होता है अत: इसकी आसानी से पहचान कर पृथक कर लिया जाता है।

(b) एडमन विधि : इस विधि में पेप्टाइड की फेनिल आइसोथायो सायनेट के साथ तनु क्षार की उपस्थिति में अभिक्रिया करायी जाती है तो फेनिल आइसो थायो सायनेट पेप्टाइड के Fee NH2 समूह से अभिक्रिया करता है , इसके पश्चात चिन्हित पेप्टाइड का अम्लीय जल अपघटन करने पर फेनिल थायो हाई डेंटाइड बनता है जो चक्रीय एमाइड होता है , इसकी मानक एमिनों अम्ल से प्राप्त हाईडेंटाइड से तुलना कर पहचान कर ली जाती है।

(ii) C – टर्मिनल एमीनो अम्ल निर्धारण विधि : इस श्रेणी में निम्न दो विधियाँ काम आती है

(a) हाइड्रेजीनो ग्लाइसिस विधि : इस विधि में पेप्टाइड को शुष्क हाईड्रेजिन के साथ गर्म किया जाता है जिससे c-terminal एमीनों अम्लों के अलावा अन्य सभी एमीनो अम्ल हाईड्रेजाइड में परिवर्तित हो जाते है , इस मिश्रण को प्रबल धनायन विनिमय रेजिन अधिशोषक युक्त कोलम क्रोमेटो ग्राफी विधि द्वारा पृथक किया जाता है।  प्रबल क्षारीय प्रकृति के कारण हाईड्रेजाईड कोलम में अधिशोषित हो जाते है व C टर्मिनल एमीनो अम्ल कोलम से प्रवाहित होकर मिश्रण से अलग हो जाते है एवं आसानी से पहचाने जा सकते है।

पेप्टाइडो का संश्लेषण

पेप्टाइड संश्लेषण में स्वतंत्र NH2 या -COOH समूह का रक्षण करना आवश्यक होता है ,अन्यथा एमीनो अम्ल में उपस्थित दोनों क्रियात्मक समूह उसी एमिनों अम्ल के दूसरे अणु के साथ संघनित हो जाते है।
पेप्टाइड का संश्लेषण तीन पदों में सम्पन्न होता है –
(1)  NH2 या -COOH समूह का रक्षण : (protection)
(2) एमीनो अम्लों का संघनन
(3) रक्षित समूह को हटाना अर्थात (deprotection)
ठोस प्रावस्था पेप्टाइड संश्लेषण विधि :
R.B मैरी फिल्ड ने पेप्टाइड संश्लेषण की इस विधि को विकसित किया।
यह विधि मुख्यत: बड़ी पेप्टाइड श्रृंखला जैसे इन्सुलिन आदि के निर्माण में काम में आती है।
इस विधि में एमीनो अम्ल जो की पेप्टाइड के C-टर्मिनल पर होता है , एक ठोस बहुलक जैसे पॉली स्टाइरिन रेजीन के साथ एस्टर बंध द्वारा जुड़ जाता है यह उत्पाद सभी सामान्य विलायको में अविलेय होता है , इस प्रकार के पेप्टाइड के स्टेप वृद्धि संश्लेषण में यह एक ठोस आधार प्रदान करता है एवं अंत में पेप्टाइड श्रृंखला बहुलक से पृथक हो जाती है।
इस विधि में एमीनो अम्ल के NH2 समूह को तृतीयक ब्यूटीलोक्सी कार्बोनिल समूह द्वारा रक्षित किया जाता है।