Arecibo संदेश (Arecibo message in hindi)

(Arecibo message in hindi) Arecibo संदेश : आज से ठीक 44 साल पहले अन्तरिक्ष में भेजा गया था जिसे अरेसीबो सन्देश कहा गया था , यह सन्देश 1974 में अंतरिक्ष में भेजा गया था जिसे आज 44 साल हो गए और इस अवसर पर गूगल ने अपने डूडल पर इसे लगाकर याद किया है कि इस उपलब्धि को आज 44 साल पूरे हो गए है।

Arecibo संदेश एक रेडियो सन्देश था जिसमे मानवता और धरती से जुडी आधारभूत जानकारी थी जिसे गोलाकार सितारा क्लस्टर एम 13 में भेजा गया था और इससे यह उम्मीद की जा रही थी इससे अन्तरिक्ष की बहुत ही जरुरी और ख़ुफ़िया जानकरी हमें प्राप्त होगी जिससे हम हमारे भविष्य को और अधिक सुरक्षित बना सकेंगे और अन्तरिक्ष से जुडी अन्य कई ऐसी चीजों से अवगत हो पाएंगे जिन्हें अभी तक जाना नहीं गया है।
इस Arecibo संदेश को पहले उच्च आवृत्ति पर मॉड्यूटेड किया गया था अर्थात उच्च आवृति की तरंगों के साथ मिलाया गया था ताकि यह सन्देश अधिक दूरी तक पूरा और सही पहुँच सके इसके लिए इस सन्देश को पहले मॉडुलन द्वारा उच्च आवृति के रेडियो सन्देश तरंगों के साथ भेजा गया था।
यह सन्देश एक बार अन्तरिक्ष में 16 नवंबर 1974 में भेजा गया था और प्यूर्टो रिको (Puerto Rico) में स्थित अरेसीबो रेडियो दूरबीन (Arecibo radio telescope) द्वारा इस सन्देश पर विश्लेषण किया जाता है।
अन्तरिक्ष के जिस स्टार क्लस्टर में यह सन्देश भेजा गया था उसे M13 के नाम से जाना जाता है इसका पूरा नाम globular star cluster M13 कहा जाता है।  अगर इसकी स्थिति की बात करे तो यह 25,000 प्रकाश वर्ष दूर माना जाता है , जब यह सन्देश पहली बार भेजा गया था तब यह क्लस्टर बहुत बड़ा था और इसमें तारें भी बहुत अधिक थे।
Arecibo संदेश के मूल के बारे में बात करे तो यह सन्देश लगभग 1,679 बाइनरी अंक में था , याद रखे डिजिटल सन्देश भेजने के लिए बाइनरी अंक काम में लिए जाते है अर्थात यह सन्देश लगभग 210 बाइट्स में था।
इस Arecibo संदेश को भेजने के लिए लगभग 2,380 मेगा हेर्ट्स आवृति का प्रयोग किया गया था , तथा इस सन्देश को भेजने के लिए लगभग 450 kW का उपयोग किया गया था।
चूँकि हम जानते है कि डिजिटल संदेश को एक और शून्य के फॉर्म में भेजा जाता था अत: यह सन्देश भी बाइनरी अंक अर्थात शून्य व एक अंक के रूप में था और इसे लगभग 10 बिट्स प्रति सेकंड की स्पीड से भेजा गया था और इस पूरे सन्देश को भेजने में लगभग तीन मिनट से भी कम समय लगा था।
यह Arecibo संदेश लिखने के लिए Dr. Frank Drake , Cornell University , Carl Sagan आदि की मदद से बनाया गया था और इन सन्देश में काफी महत्वपूर्ण सूचनाओं को कोड किया था।
इस सन्देश में जिन महत्वपूर्ण चीजो को एनकोड किया था वे निम्न प्रकार है –
1. इस सन्देश में एक से दस तक के अंक लिखे गए थे। (सफेद)
2. जिन तत्वों की सहायता से डीएनए (DNA) बना होता है उन तत्वों के परमाणु क्रमांक को लिखा गया जिनमें हाइड्रोजन, कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, और फास्फोरस के परमाणु क्रमांक शामिल है। (बैंगनी)
3. DNA बनने के लिए जिन न्यूक्लियोटाइड की आवश्यकता होती है उनका सूत्र तथा सुगर आदि का सूत्र इस संदेश में लिखा गया। (हरा)
4. डीएनए के न्यूक्लियोटाइड की संख्या तथा डीएनए की ग्राफिक्स डबल हेलिक्स संरचना को भी इस सन्देश में कोड किया गया। (सफ़ेद नीला)
5. इसमें मानवता से सम्बंधित जानकारी को भी डाला गया था जैसे मानव की औसत लम्बाई , धरती पर मानव की जनसँख्या आदि। (क्रमशः लाल, नीला / सफेद, और सफेद)
6. इसमें सौर मंडल से सम्बंधित कोड डाला गया जिससे यह पता चल सके की आने वाला सन्देश किस ग्रह से आ रहा है। (पीला)
7. Arecibo radio telescope से सम्बंधित जानकारी जैसे इसकी लम्बाई , ऊंचाई आदि। (बैंगनी, सफेद, और नीला)
यह संक्षिप्त सन्देश है जिसे रंगों की सहायता से अलग अलग प्रदर्शित किया गया है , हमने ऊपर जब यह जाना की इस सन्देश में क्या क्या जानकारी थी उसमे हमने देखा की हर लाइन के आगे हमने रंग लिखा है वह यही दर्शाता है कि इस ग्राफिक्स में वह चीज कहा है और इसे रंगों के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है।

इलिसा लिओनिडा ज़ैमफायरेस्कू (Elisa Leonida Zamfirescu in hindi)

(Elisa Leonida Zamfirescu in hindi) इलिसा लिओनिडा ज़ैमफायरेस्कू : क्या आप जानते है कि गूगल ने आज जिनको अपने डूडल पर लगाया है वो कौन है ? अगर नहीं जानते तो हम आपको बताने जा रहे है इस महान हस्ती के बारे में।

इलिसा लिओनिडा ज़ैमफायरेस्कू का जन्म 10 नवम्बर 1887 को हुआ था और इनकी मृत्यु 25 नवम्बर 1973 को हुआ था। ये दुनिया की पहली महिला इंजिनियर (अभियन्ता) थी।

आज गूगल ने अपने डूडल पर इनको लगाया है क्यूंकि ये दुनिया की पहली अभियंता अर्थात इंजिनियर थी इसलिए पूरी दुनिया को उनके बारे में जानना चाहिए।

इलिसा लिओनिडा ज़ैमफायरेस्कू का बचपन और शिक्षा

इनका जन्म 10 नवम्बर 1887 को रोमेनिया देश के गलाटी नामक जगह पर हुआ था और इनके पिता का नाम Atanase Leonida था जो पेशे से एक करियर अधिकारी अधिकारी थे अर्थात वे लोगो को तथा बच्चो को उनकी पढाई या करियर से सम्बंधित जानकारी देते थे और उन्हें गाइड करते थे।
उनकी माता का नाम मातील्डा गिल था जो एक फ़्रांस के इंजिनियर की बेटी थी तथा इनके भाई का नाम Dimitrie लियोनिडा था ये भी पेशे से एक इंजिनियर थे , इनके भाई भी एक बहुत जाने माने इंजिनियर थे जिन्होंने Dimitrie Leonida तकनीकी संग्रहालय की स्थापना की थी।
हम उनके फैमिली पृष्ठभूमि के आधार पर बता सकते है कि वो एक अच्छी फैमिली से सम्बंधित थी लेकिन उस समय महिलाओं के लिए कामयाब होने के लिए ये सब काफी नहीं था।
प्रारम्भ में उन्हें बुच्रेस्ट की the School of Bridges and Roads नामक संस्था से उन्हें अस्वीकार कर दिया गया क्यूंकि शायद उस समय विज्ञान में अन्य कोई महिला नहीं थी या वो मानते थे की विज्ञान वर्ग केवल पुरुषों के लिए है।
लेकिन 1909  में उनको Charlottenburg की रॉयल एकेडमी ऑफ टेक्नोलॉजी बर्लिन में उनको पढने के लिए स्वीकार कर लिया गया अर्थात उनका वहां प्रवेश हो गया। वहां उन्होंने मन लगाकर पढाई की और 1912 में वो अपनी इंजिनियर की स्नातक की डिग्री प्राप्त कर ली। ऐसा माना जाता है उससे पहले दुनिया के किसी में देश में किसी महिला ने इंजिनियर की पढाई पूरी नहीं की थी इसलिए उन्हें दुनिया की पहली महिला इंजिनियर के नाम से भी जाना जाता है।
लेकिन एक मत ये भी कहता है कि इनसे 6 साल पहले आयरलेंड की एलिस पेरी (Alice Perry) ने 1906 में अपनी इंजिनियर की पढाई पूरी कर ली थी।

इलिसा लिओनिडा ज़ैमफायरेस्कू की उपलब्धियाँ

अपनी इंजिनियर की पढाई पूरी करने के बाद वो रोमानिया लौट आई और वहां रोमानिया के भूवैज्ञानिक संस्थान में सहायक के रूप में काम किया। जब विश्व युद्ध प्रथम चल रहा था उस समय उन्होंने रेड क्रॉस में शामिल हो गयी।
रेड क्रॉस एक ऐसी संस्था है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानव जीवन और उनके स्वास्थ्य की रक्षा करते है और इस संस्था से लगभग दुनिया के एक करोड़ 70 लाख लोग जोड़े हुए है।
इस संस्था में काम करने के दौरान वो वहां रसायनज्ञ (रसायन वैज्ञानिक) Constantin Zamfirescu से मिली और फिर उनसे शादी कर ली।
जब विश्व युद्ध ख़त्म हो गया तब वो अपने भू वैज्ञानिक संस्थान में वापस आ गयी , उन्होंने भू वैज्ञानिक से सम्बंधित कई प्रयोगशाला को नेतृत्व किया और अन्य कई क्षेत्रों में भी अपनी रूचि दिखाते हुए उन्हें ज्वाइन किया। उनमे से एक फील्ड था जो नए उर्जा के संसाधन जैसे कोयले, शैल, प्राकृतिक गैस, क्रोमियम, बॉक्साइट और तांबा आदि पर कार्य कर रहे थे , इलिसा लिओनिडा ज़ैमफायरेस्कू एक अच्छी अध्यापक भी थी उन्होंने बच्चों को रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान का ज्ञात दिया।
उनके जीवन की दो उपलब्धि सबसे महत्वपूर्ण थी एक तो वो दुनिया की सबसे पहली महिला इंजिनियर है और दूसरी वो A.G.I.R. (General Association of Romanian Engineers) की पहली महिला मेम्बर थी।
निष्कर्ष : आज गूगल ने डूडल पर उनको लगाया है ताकि लोग उस महिला के बारे में जान सके जो विश्व की पहला इंजिनियर महिला थी।

माइकल डेर्टूउज़ोस ( michael dertouzos in hindi )

( michael dertouzos in hindi) माइकल डेर्टूउज़ोस : आज हम जिस इन्सान के बारे में जानने जा रहे है वे बहुत ही खास है और इस खास इन्सान के बारे में दुनिया को बताने के लिए आज गूगल ने अपने डूडल पर इनके 82 वें जन्मदिन पर बधाई देते हुए उन्हें याद किया है और इनके अतुल्य योगदान को हमारे सामने लाया है।

माइकल डेर्टूउज़ोस का जन्म 5 नवम्बर 1936 को ग्रीस देश के एथेंस नामक जगह पर हुआ था , तथा इनकी मृत्यु 27 अगस्त 2001 को अर्थात 64 साल की उम्र में अमेरिका की बोस्टन जगह पर हुआ था।

ये ये महान प्रोफेसर के रूप में जाने जाते है।  ये एक बहुत अधिक समय तक कैम्ब्रिज की एक बहुत बड़ी शोध विश्वविद्यालय मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग एवं कम्प्यूटर साइंस अभियांत्रिकी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर रहे थे और इसके बाद इसी विश्वविद्यालय के कंप्यूटर विज्ञान की प्रयोगशाला के डायरेक्टर रहे थे। डायरेक्टर के रूप में इनके जीवन का बहुत अधिक समय बीता ये MIT विश्वविद्यालय में 1974 से 2001 तक डायरेक्टर के पद पर रहे।

MIT में  कम्प्यूटर लैब के डायरेक्टर रहते हुए उन्होंने कई नए काम किये और ये सभी कार्य अलग अलग क्षेत्रों में थे जैसे RSA के लिए मेसेज को कॉड और डिकोड करने का सिस्टम बनाया , इस कॉड- डिकोडिंग ऐसा सिस्टम होता है जिसमे जैसे आप किसी के पास कोई मेसेज भेजते है तो यही इस मेसेज को मध्य में कोई दूसरा पढ़े तो बिना डिकोड किये आपको वास्तविक मेसेज नहीं मिलेगा , डिकोड करके सिर्फ अथॉरिटी वाले आदमी ही इसे पूर्ण रूप से पढ़ सकते है।

स्प्रेडशीट पर भी उन्होंने अपना काफी योगदान किया , स्प्रेड शीट कंप्यूटर में चलने वाली सॉफ्टवेर होता है जो डाटा से सम्बंधित होता है , इसमें विभिन्न प्रकार के डाटा को एक सही तरीका से रखा जाता है और जरुरत पढने पर इनका उपयोग किया जा सकता है।

कंप्यूटर में एक बस होती है जिसका काम डाटा को एक जगह से दूसरी जगह लाने का होता है , MIT में अर्थात इसी शोध विश्वविद्यालय में 1987 में एक प्रोजेक्ट के रूप में बनाया गया था इसे NuBus कहते है। इस समय MIT के कंप्यूटर लैब के डायरेक्टर माइकल डेर्टूउज़ोस ही थे और इस प्रोजेक्ट में उनका योगदान था।

इनके अलावा उन्होंने X विंडोज में भी योगदान किया तथा इन्टरनेट के क्षेत्र में भी काफी योगदान रहा था।

माइकल डेर्टूउज़ोस का प्रारंभिक जीवन और पढाई

इनका जन्म 5 नवम्बर 1936 ग्रीस देश में हुआ था इनके पिता ग्रीस की नेवी में थे और इनकी माता कार्यक्रम में पियोन वादक थी अर्थात पियोन संगीतकार थी। इसी कारण उनका नौकायन और संगीत से बहुत प्रेम था और जीवन भर रहा। उन्होंने एथेंस कॉलेज से 1954 में जिमनासियम डिप्लोमा प्राप्त किया और इसके बाद एथेंस कॉलेज से चले गये क्यूनी उन्हें ओजार्क नामक जगह से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करने के लिए स्कॉलरशिप प्राप्त हो गयी थी इस विश्वविद्यालय का नाम आर्कान्सा विश्वविद्यालय था जहाँ से उन्हें यह स्कॉलरशिप प्राप्त हुई थी।
तीन साल इस इंजिनियर की पढाई करने के बाद 1957 में इनको यहाँ से स्नातक की डिग्री मिली , इसके बाद दो साल इन्होने मास्टर डिग्री (स्नातकोत्तर उपाधि) 1959 में पूरी की और इसके बाद उन्होंने MIT से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की तीन साल में 1964 में अपनी पीएचडी पूरी कर ली।
इसके तुरंत बाद उन्होंने MIT ज्वाइन कर ली यहाँ वे सहायक प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन किया था लेकिन बाद में 1973 में उनका प्रमोशन हो गया था और अब वे MIT में प्रोफेसर के रूप में थे।
MIT ज्वाइन करने के बाद उन्होंने अपना सपूर्ण समय यही पर व्यतीत किया।

माइकल डेर्टूउज़ोस का योगदान

इतने समय पहले ही इन्होने इन्टरनेट को लेकर कई भविष्यवाणी की थी , यहाँ इन्हें भविष्यवाणी कहना ठीक नहीं होगा , कहने का मतलब उन्होंने इन्टरनेट के क्षमता को समझा था और इससे सम्बंधित कई बाते कही थी जैसी की यह आने वाले समय में तकनिकी में क्रांति लायेगा , और हम आज देख सकते है की इन्टरनेट का आज की तकनिकी में कितना अधिक योगदान है।
अपने इसी विश्वास के कारण उन्होंने कंप्यूटर से सम्बंधित कई नयी चीजे की थी जैसे आरएसए एन्क्रिप्शन, स्प्रेडशीट, NuBus, एक्स विंडो सिस्टम, और इंटरनेट में अपना भरपुर योगदान किया था।
और कंप्यूटर की शिक्षा को जितना अधिक हो सके और जितना आसन हो सके करने की कोशिश की थी।
1968 में वे एक ग्राफिक्स से सम्बंधित Computek, Inc. के co- फाउंडर के रूप में भी रहे थे।
उन्होंने इन्टरनेट और कंप्यूटर से सम्बंधित कई कल्पना लोगो को इतने समय पहले ही बता दी थी जब इनके बारे में कोई अधिक नहीं जानता था और आज इनकी सभी कल्पना संभव हुई है इसलिए कह सकते है कि उनकी सोचने की क्षमता कमाल कि थी।
निष्कर्ष
आज इनका 82 वाँ जन्म दिन है और कंप्यूटर और इन्टरनेट की दुनिया में इनके अद्भुद योगदान और इतने समय पहले ही इस तकनीक को बढ़ाने के प्रयास करने वाले महान प्रोफेसर माइकल डेर्टूउज़ोस को श्रृद्धांजलि के रूप में अपने डूडल पर दिखाया है और इनके बारे में दुनिया को बताया है कि इतने समय पहले इन जैसे लोगो ने अपना योगदान दिया है उनकी वजह से आज इन्टरनेट और कंप्यूटर नयी तकनीकी का विकास कर पा रहे है।

टाइरस वोंग या टायरस वोंग

टायरस वोंग या टाइरस वोंग का जन्म 25 अक्टूबर 1910 को चाइना में हुआ था और इनकी मृत्यु 106 की उम्र में 30 दिसम्बर 2016 में हुआ था। आज इनका 108 वाँ जन्मदिन है और इस दिन के अवसर पर गूगल ने इन्हें अपने डूडल पर जगह देकर इनके कार्य और जीवनी के बारे में दुनिया को बताया है कि अपनी 106 साल के जीवन में ऐसे क्या काम किये जो हमारे लिए प्रेरणादायक है और हमें इनसे प्रेरणा लेकर अपने कार्य के प्रति रूचिकर होना चाहिए और अपने सपनो को पूरा करना चाहिए जिसमे आप पूर्ण है और जिसे पूरे मन के साथ करने में सक्षम है।

आइयें हम आगे इनके जीवन के बारे में पढ़ते है कि इन्होने क्या किया था जिसके कारण टाइरस वोंग इतने विख्यात हो गए और आज गूगल ने भी अपने डूडल के माध्यम से उनके 108 वें जन्मदिन पर याद किया है।

टाइरस वोंग की जीवनी

ये एक कलाकार थे जिनका जन्म चाइना में हुआ था और जीवन अमेरिका में बिता , इनका जन्म 25 अक्टूबर 1910 को ताइशन, गुआंग्डोंग, चीन में हुआ था और इनका बचपन का नाम वोंग जनरल येओ था। वे इतने अच्छे कलाकार थे की वे पेटिंग , एनीमेशन , सुलेखक , भित्तिचित्र, चीनी मिट्टी के बरतन, लिथोग्राफर आदि खूबियों के साथ साथ वे एक अच्छे डिजाईन के पतंग भी बना लेते थे तथा वे सेट डिजाईन और स्टोरीबोर्ड के भी काफी अच्छे कलाकार थे। उनकी इतनी खूबियों से आप अनुमान लगा सकते है कि वे 20 वीं सदी के सबसे बेहतरीन कलाकारों में से एक थे। वे फिल्म बनाने वाले चित्रकार के रूप में वे डिज्नी और वार्नर ब्रदर्स के साथ भी काम करते थे , उन्होंने ग्रीटिंग कार्ड डिजाईन करने के लिए भी जानी आमी हस्ती हॉलमार्क कार्ड के साथ काम किया था। डिजनी की 1942 में आई फिल्म बाम्बी में वे मुख्य चित्रकार थे और इस फिल्म की उनकी कलाकारी ने उनको खूब नाम दिया , इस फिल्म में उनकी कलाकारी देखने लायक और प्रसंशा के पात्र था। इस फिल्म के अलावा भी इन्होने कई अन्य फिल्मों में भी डिजाईन या चित्रकार के रूप में कार्य किया।
1960 के दशक के अंत में टायरस वोंग फिल्म लाइन से रिटायर्ड हो गए अर्थात उन्होंने फिल्म जगत से सन्यास ले लिया था। लेकिन इसका मतलब ये न था कि उन्होंने अपने कलाकारी को खत्म कर दिया था , फिल्म जगत छोड़ने के बाद उन्होंने अपनी डिजाईन का कार्य निरंतर रखा और अपना अधिक समय वे पतंग डिजाईन करने में व्यतीत करने लगे।
पतंग डिजाईन के साथ साथ वे पेटिंग बनाने इत्यादि कार्य में लगातार कार्यरत रहे।
2015 में  पेमला टॉम ने टायरस वोंग के जीवन पर आधारित एक फिल्म बनायीं जिसके अन्दर उनकी जीवनी को दिखाया गया था।
टाइरस वोंग का निधन 106 साल की उम्र में 30 दिसंबर, 2016 में सनलैंड-तुजुंगा, कैलिफ़ोर्नियअमेरिका में हुआ था।

टाइरस वोंग का बचपन और सफ़र

इनका जन्म चीन के ताइशन, गुआंग्डोंग जगह पर 25 अक्टूबर, 1910 में हुआ था , जब वोंग मात्र 9 साल के थे तब उनके पिता उन्हें अपनी अच्छी जीवनी के लिए उन्हें अमेरिका ले आये और अमेरिका में रहने लगे।  इसके बाद वे कभी चीन नही गए जहाँ उनकी माता और बहन रहती थी।
प्रारंभ में चीनी बहिष्करण अधिनियम के कारण उनको उनकी पहचान के कारण कुछ परेशानी हुई लेकिन बाद में वे लॉस एंजिलस में रहने लगे।
जब वे स्कूल में थे तभी उनके अन्दर का कलाकार सबको अपनी तरफ आकर्षित करने लगा और उनको ओटिस आर्ट इंस्टीट्यूट में छात्रवृति मिल गयी और वे अपने कार्य को अधिक समय देने लगे , उनके पिता ने भी उनका खूब साथ दिया और 1930 को वे स्नातक हो गए।

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प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर क्या है , सिद्धांत , कार्यविधि , कौनसी गैस काम आती है (Refrigerator in hindi)

(Refrigerator in hindi) प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर क्या है , सिद्धांत , कार्यविधि , कौनसी गैस काम आती है : हम ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम पढ़ चुके है जिसके अनुसार जब किसी ठंडी वस्तु को गर्म वस्तु के सम्पर्क में लाया जाता है तो ठंडी वस्तु गर्म होने लगती है और गर्म वस्तु ठण्डी होने लगती है।

और हम यह भी पढ़ चुके है कि इसी सिद्धांत पर ऊष्मा इंजन भी इसी सिद्धांत पर कार्य करता है।

लेकिन प्रशीतक ऊष्मा इंजन के बिल्कुल विपरीत सिद्धान्त पर कार्य करता है।

प्रशीतक में एक वाष्प अवस्था में गैस काम में ली जाती है तो वस्तु से ऊष्मा उत्सर्जित करने में मदद करती है और वस्तु को ठण्डा कर देती है।

अर्थात जैसे उष्मा इंजन में जैसे इंजन स्रोत से ऊष्मा ले रहा था और कुछ कार्य करने के बची ऊष्मा को सिंक में दे देता है वैसे ही यहाँ होगा लेकिन इसका बिल्कुल विपरीत होगा।

यहाँ प्रशीतक सिंक अर्थात वस्तु से ऊष्मा लेता है और इस ऊष्मा का कुछ भाग कार्य में परिवर्तित करने के बाद बची ऊष्मा को गर्म वस्तु अर्थात स्रोत मे दे देता है जिससे सिंक (वस्तु) और अधिक ठंडा हो जाता है।

प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर की कार्यप्रणाली या कार्य विधि (working of Refrigerator)

प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर के दो हिस्से होते है एक जहाँ बर्फ जमती है और दूसरा जहाँ वस्तुएं ठंडी होती है लेकिन बर्फ नहीं जमती है।  फ्रिज के दोनों हिस्से ही ऊष्मा विनमय के लिए चारो तरफ से पाइप से घिरे हुए होते है। प्रशीतक के नीचे एक भारी धातु की बनी युक्ति लगी रहती है जिसे कम्प्रेसर कहते है इस कम्प्रेसर को चलाने के लिए एक इलेक्ट्रिक मोटर लगी रहती है। और जिन पाइप के द्वारा अधिक ऊष्मा विनिमय की आवश्यकता होती है वो पाइप कुंडलित होती है।
रेफ्रिजरेटर का पूरा सिस्टम अमोनिया गैस पर आधारित रहता है और यह गैस लगभग -32 डिग्री सेल्सियस पर वाष्पित हो जाती है।
प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर की क्रिया विधि शुरू होती है कम्प्रेसर से , सबसे पहले अमोनिया गैस को संपीडित किया जाता है , इसके लिए दाब को बढाया जाता है जिससे अमोनिया गैस बहुत अधिक गर्म हो जाती है। यह गर्म गैस फ्रिज के पीछे लगे कुंडलित पाइप से गुजारी जाती है जहाँ अतिरिक्त गर्मी को मुक्त किया जाता है , यही कारण होता है कि फ्रिज के पीछे अधिक गर्मी होती है। ऊष्मा (गर्मी) त्यागने के बाद अमोनिया गैस ठंडी हो जाती है जिससे यह वाष्प से तरल में बदल जाती है।
यह तरल अमोनिया इसके बाद विस्तार वाल्व (expansion valve) में जाती है जहाँ यह और अधिक ठंडी हो जाती है , यह ठंडी अमोनिया , कुंडलित पाइप से होकर तेजी से गति करती है जिससे यहाँ की वाष्प का ताप कम होता जाता है और वस्तुएं ठंडी हो जाती है।

प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर के भाग (parts of refrigerator)

इसके तीन मुख्य भाग होते है –
1. स्रोत (source)
2 कार्यकारी पदार्थ (used substance)
3. सिंक (sink)
1. स्रोत (source)
यह ऊष्मा का भण्डार होता है या दुसरे शब्दों में कहे तो इसमें बहुत अधिक ऊष्मा ग्रहण करने की क्षमता होती है , यह एक ऐसा स्त्रोत होता है जिसे कितनी भी ऊष्मा दी जा सकती है।
2 कार्यकारी पदार्थ (used substance) 
ऐसा पदार्थ जो वस्तुओं को ठंडा करने में इस्तेमाल होता है , प्रशीतक , रेफ्रिजरेटर या फ्रिज में सामान्यत: अमोनिया और फ्रीओन गैस काम में आती है , कभी कभी यह प्रश्न पूछ भी लिया जाता है कि प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर या फ्रिज में कौनसी गैस काम में आती है ?
3. सिंक (sink)

यह एक ऐसी वस्तु या स्रोत होती है जिससे कितनी भी ऊष्मा ली जा सकती है अर्थात इसमें अनन्त उष्मा त्यागने की क्षमता होती है।

प्रशीतक की शीतलन क्षमता

इसे प्राय: β से व्यक्त किया जाता है , इसका मान ज्ञात करने के लिए ठंडी वस्तु से निकाली गयी ऊष्मा तथा इसके लिए किये गए कार्य के अनुपात को ही शीतलन क्षमता कहते है –
शीतलन क्षमता (β) = वस्तु द्वारा निकाली गयी ऊष्मा / किया गया कार्य