स्वप्नदर्शी समाजवाद क्या होता है | यूटोपियन समाजवाद किसे कहते है परिभाषा Utopian Socialism in hindi

By   February 2, 2022
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Utopian Socialism in hindi स्वप्नदर्शी समाजवाद क्या होता है | यूटोपियन समाजवाद किसे कहते है परिभाषा समर्थक कौन कौन है नाम लिखिए |
स्वप्नदशी समाजवाद (Utopian Socialism)
मार्क्स ने अपने से पहले के समाजवादी विचारों को स्वप्नदर्शी समाजवाद की संज्ञा दी है। इसका कारण यह है कि ये विचारक समाज में फैली हुई गरीबी और विषमता को दूर तो करना चाहते थे किंतु इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उनके पास कोई व्यावहारिक रणनीति नहीं थी। वे आमतौर पर अमीर वर्ग के लोगों से निवेदन करते थे कि गरीब किसानों और मजदूरों की दशा पर ध्यान दें।
स्वप्नदर्शी समाजवाद में तीन विचारकों का योगदान महत्त्वपूर्ण रहा है- सेंट साइमन, चार्ल्स फ्यूरिए और रॉबर्ट ओवन।

सेंट साइमन (Saint Simon)
सेंट साइमन के समाजवादी विचार बहुत स्पष्ट और निश्चित नहीं हैं, पर इतना जरूर है कि उसे पूंजीवाद से ज्यादा समस्या सामंतवाद से थी। उसका मानना था कि एक अच्छी व्यवस्था वह होगी जिसमें बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण होगाय सबको क्षमता के अनुसार काम तथा योग्यता के अनुसार वेतन मिलेंगाय राज्य का कार्य लोक-कल्याण करना होगा, न कि दूसरे देशों से युद्ध करना या उच्च वर्ग के हितों की रक्षा करना। वह यह भी चाहता था कि उत्पादन तथा वितरण के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व की जगह सार्वजनिक स्वामित्व की व्यवस्था लागू हो।

चार्ल्स फ्यूरिए (Charles Fourier)
चार्ल्स फ्यूरिए का मानना था कि जिस तरह प्राकृतिक व्यवस्था गुरुत्वाकर्षण जैसे निश्चित नियमों के अनुसार कार्य करती है, वैसे ही सामाजिक व्यवस्था को भी निश्चित नियमों के अनुसार पुनर्गठित किया जाना चाहिए। इस संबंध में उसने सुझाव दिया कि समाज को छोटे-छोटे समुदायों में संगठित किया जाना चाहिए जो सामान्य स्वामित्व (Common Ownership) के सिद्धांत के अनुसार कार्य करेंगे। निजी संपत्ति का निषेध तो नहीं होगा, पर अमीर-गरीब का अंतर अपने आप महत्त्वहीन हो जाएगा। ऐसी व्यवस्था में राज्य की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि समाज स्वयं ही सारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेगा। प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा तथा रोजगार की गारंटी होगी तथा सभी को अपनी योग्यता और श्रम के अनुसार उपलब्धियाँ हासिल होंगी। फ्यूरिए का सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांत ‘आकर्षक श्रम का सिद्धांत‘ (Principle of Attractive Labour) है जिसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को वही कार्य सौंपा जाएगा जो उसे पसंद हो। इसके अलावा, फ्यूरिए ने विवाह और परिवार के ढाँचे में विद्यमान विसंगतियों पर भी चोट की। कई मामलों में फ्यूरिए के विचार मार्क्सवाद को प्रभावित करते हुए दिखाई पड़ते हैं, जैसे राज्य के अनावश्यक होने का विचार, प्रत्येक व्यक्ति को रुचि के अनुसार कार्य देने का विचार तथा विवाह और परिवार के ढाँचों में निहित विषमताओं पर चोट।

रॉबर्ट ओवन (Robert Owen)
रॉबर्ट ओवन मार्क्सवाद-पूर्व समाजवाद के सबसे महत्त्वपूर्ण चिंतक माने जाते हैं। इन्होंने सिर्फ चिंतन करने की बजाय कुछ प्रयोगों के माध्यम से अपने समाजवादी विचारों की व्यावहारिकता को सिद्ध करने का प्रयास भी किया। उसने प्रतिस्पर्धा पर आधारित व्यापार प्रणाली की आलोचना की और सहयोग पर आधारित व्यापार प्रणाली को स्थापित करने का सुझाव दिया। उसने ‘मॉडल कॉटन मिल्स‘ नामक सहकारी उद्यम (ब्व-वचमतंजपअम म्दजमतचतपेम) को स्थापित करके सिद्ध किया कि आपसी सहयोग तथा मजदूरों के अनुकूल नीतियों के माध्यम से भी बाजार में टिका जा सकता है। इस प्रयोग के आधार पर ओवन ने दावा किया कि यदि सहकारिता पर आधारित गाँवों की स्थापना की जाए जिनमें सभी व्यक्ति गाँव की आय में हिस्सेदार हों तो ऐसी व्यवस्था से अमीरी और गरीबी का अंतर काफी हद तक दूर हो जाएगा। ओवन के अन्य विचारों में धर्म का विरोध, निजी संपत्ति का निषेध तथा विवाह व्यवस्था का विरोध शामिल हैं। वह उत्पादन के प्रमुख साधनों पर समाज के स्वामित्व का समर्थक है। उसका मानना है कि अगर वस्तुओं का उत्पादन और वितरण सभी मनुष्यों की जरूरतों के अनुसार हो तो समाज की अधिकांश समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा। गौरतलब है कि मार्क्सवाद पर ओवन के विचारों का प्रभाव भी खोजा जा सकता है। उदाहरण के लिए, धर्म, विवाह तथा निजी संपत्ति का विरोध ओवन की तरह मार्क्सवाद में भी दिखाई पड़ता है। इसी प्रकार मनुष्यों की जरूरतों के अनुसार उत्पादन और वितरण का सिद्धांत दोनों विचारों में समान रूप से विद्यमान है।

जर्मन सामाजिक लोकतंत्र (German Social Democracy)
1848 ई. में मार्क्स और एंजल्स ने ‘कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो‘ का प्रकाशन किया था जिसमें वर्ग संघर्ष और हिंसक क्रांति को अनिवार्य बताया गया था। यह सिद्धांत 1840 के दशक की परिस्थितियों को केंद्र में रखकर बनाया गया था जिसे इंग्लैंड में ‘भूखा दशक‘ कहा जाता है। इस समय राज्य का स्वरूप पूर्णतः शोषणकारी तथा विशिष्टवर्गवादी (Elitist) था और उसे जनसाधारण की समस्या से कोई लेना-देना नहीं था। किंतु, 1850 के दशक में यूरोप की परिस्थितियाँ बदलने लगी और कुछ ऐसे परिवर्तन दिखने लगे जो लोक-कल्याणकारी राज्य के उद्भव की ओर इशारा करते थे। इन परिस्थितियों में कुछ विचारकों को लगने लगा कि हिंसक क्रांति की जगह शांतिपूर्ण उपायों से भी समाजवादी आदर्शों की उपलब्धि की जा सकती है। ऐसा पहला प्रसिद्ध विचार जर्मनी में ‘जर्मन सामाजिक लोकतंत्र‘ के नाम से विकसित हुआ। इसके समर्थकों में सबसे महत्त्वपूर्ण विचारक फर्डिनेंड लासाल (Ferdinand Lassalle) थे।
फर्डिनेंड लासाल (तथा जर्मन सामाजिक लोकतंत्र) के वैचारिक योगदान को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है-
(1) लासाल मार्क्सवाद के ऐतिहासिक भौतिकवाद के इस निष्कर्ष से सहमत है कि निकट भविष्य में पूंजीवाद का पतन और मजदूर वर्ग का उत्थान होना अनिवार्य है, परंतु इसकी प्रक्रिया और राज्य की भूमिका जैसे बिंदुओं पर वह मार्क्सवाद से अलग रास्ता चुनता है।
(2) उसने पूंजीवाद के अंतर्गत मजदूर के शोषण की व्याख्या करते हुए एक नया सिद्धांत विकसित किया जिसे ‘मजदूरी का लौह नियम‘ (Iron Law of Wages) कहा जाता है। इस सिद्धांत का अर्थ है कि पूंजीवाद के अंतर्गत मजदूर की औसत मजदूरी सिर्फ इतनी ही होती है कि उससे उसका निर्वाह हो जाए, उससे अधिक नहीं। ऐसा मांग और पूर्ति के नियम के कारण होता है।
(3) एक ऐसे समाजवाद की स्थापना की जानी चाहिए जिसमें वस्तुओं का उत्पादन और नियंत्रण कुछ सहकारी समितियों के हाथ में हो तथा निर्णय प्रक्रिया में मजदूरों को भी प्रभावी हिस्सेदारी हो। ऐसा होने पर मजदूरों को अपनी मेहनत का पूरा मूल्य मिलेगा और वे सिर्फ निर्वाह स्तर पर काम करने को मजबूर नहीं होंगे।
(4) समाजवाद की स्थापना के लिए हिंसक क्रांति की आवश्यकता नहीं है। इसकी जगह, ज्यादा व्यावहारिक उपाय यह है कि
सभी मजदूर एक राजनीतिक दल के रूप में संगठित हो जाएँ और सरकार पर दबाव बनाकर सार्वजनिक वयस्क मताधिकार की प्रणाली शुरू कराएँ। चूँकि मजदूर वर्ग की जनसंख्या ज्यादा है. इसलिए लोकतंत्र के भीतर पूंजीपति उसकी शक्ति को नहीं रोक सकेंगे। राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित हो जाने पर मजदूर वर्ग के संसद सदस्य समाजवाद स्थापित करने वाले कानून बनाएंगे जिससे आर्थिक व्यवस्था भी उनके पक्ष में आ जाएगी। राज्य को समाप्त नहीं किया जाएगा बल्कि उसे लोक-कल्याणकारी स्वरूप दिया जाएगा। इसलिए, वर्तमान में मजदूर आंदोलन का तात्कालिक लक्ष्य यही होना चाहिए कि विधानमंडल में बहुमत प्राप्त किया जाए।