नीट सिलेबस २०१९ (neet 2019 syllabus in hindi) , 11th , 12 th chemistry , biologi , physics

11th , 12 th chemistry , biologi , physics  नीट सिलेबस २०१९ (neet 2019 syllabus in hindi) : अगर आप कक्षा 11 या 12 वीं के विज्ञान वर्ग के जीव विज्ञान के छात्र या छात्रा है तो जाहिर सी बात है आपका सपना डॉक्टर बनने का होगा , अगर आप डॉक्टर बनने के लिए सरकारी कॉलेज में दाखिला लेना चाहते है तो उसके लिए आपको neet (नीट) की प्रतियोगी परीक्षा देनी होती है और इस परीक्षा में आपको अच्छे नम्बर लेकर आने होते है।

प्रतिवर्ष लाखो विद्यार्थी इस प्रतियोगी परीक्षा में बैठते है और अच्छे नंबर लाने का भरपूर प्रयास करते है , और लाखो विद्यार्थी इस प्रतियोगी परीक्षा के लिए कोचिंग करते है।

अगर आप कोचिंग करने में समर्थ नहीं है और सिर्फ स्कूल में पढ़ रहे है तो कोई बात नहीं आपको बोर्ड परीक्षा के अतिरिक्त अलग से हाई स्टैण्डर्ड पढाई करनी पड़ेगी जिससे आप इस परीक्षा (neet २०१८ – २०१९ ) में अच्छे नंबर ला सके।

यहाँ हम आपको neet 2019 syllabus बताने जा रहे है , यह जानकारी हिन्दी में उपलब्ध है इस सिलेबस के अनुसार अपनी पढाई करे।

neet 2019 syllabus physics in hindi (नीट २०१८ भौतिक विज्ञान पाठ्यक्रम )

भौतिक विज्ञान के लिए हमने पूरे पाठ्यक्रम को 19 पाठो में वर्गीकृत किया है ये निम्न है –

  • सामान्य भौतिकी (general physics)
  • शुद्ध गतिकी (kinematics)
  • गति के नियम (laws of motion)
  • कार्य , सामर्थ्य और ऊर्जा (work , power and energy)
  • द्रव्यमान केन्द्र और संवेग (centre of mass and momentum)
  • घूर्णन गति (rotational motion)
  • गुरूत्वाकर्षण (gravitation)
  • सरल आवर्त गति (simple harmonic motion)
  • पदार्थ के गुण (properties of matter)
  • तरंगें (waves)
  • ऊष्मा और उष्मागतिकी (heat and thermodynamics)
  • प्रकाशिकी (optics)
  • धारा वैद्युतिकी (current electricity)
  • स्थिर वैधुतिकी (electrostatics)
  • चुम्बकत्व (magnetics)
  • विद्युत चुम्बकीय प्रेरण और प्रत्यावर्ती धारा (electromagnetic induction and alternating current)
  • आधुनिक भौतिकी (modern physics)
  • प्रयोगात्मक भौतिकी (practical physics)
  • विविध प्रश्न (miscellaneous questions )

neet २०१८ – २०१९ जीव विज्ञान पाठ्यक्रम (NEET 2018 – 2019 syllabus biology in hindi )

  • सजीव जगत (the living world)
  • जीवन की विविधता (diversity of life)
  • मोनेरा (monera)
  • प्रॉटिस्टा (protista)
  • कवक (fungi)
  • पादप जगत (kingdom plantae)
  • जन्तु जगत (kingdom animalia)
  • जीवन की इकाई (unity of life)
  • कोशिकाओं का संरचनात्मक संगठन , कार्य और प्रजनन
  • कोशिकीय एंजाइम
  • पादपों और जन्तुओं की आकारिकी
  • पुष्पीय पादपों की आकारिकी
  • आवृतबीजीय पादपों की आन्तरिक संरचना
  • जन्तुओं की आकारिकी
  • जन्तु उत्तक
  • पादपों की कार्यिकी
  • पादप पोषण क्या है
  • प्रकाश संश्लेषण की परिभाषा , उदाहरण
  • श्वसन
  • बहुकोशिकीयता – संरचना और कार्य अर्थात मानव और जन्तुओं की शारीरिक और कार्यिकी
  • जन्तु पोषण
  • जन्तुओं में श्वसन
  • जन्तुओं में परिसंचरण
  • जन्तुओ में उत्सर्जन और परासरण नियमन
  • जन्तुओं में गति और प्रचलन
  • जन्तुओं में तंत्रिका समन्वयन और समाकलन
  • संवेदी अंग को कैसे परिभाषित करते है
  • जन्तुओं में रासायनिक समन्वयन क्या है
  • प्रजनन , वृद्धि और परिवर्तन
  • पुष्पीय पादपों में प्रजनन
  • पादप वृद्धि और गतियाँ
  • जन्तुओं में प्रजनन और परिवर्धन
  • वृद्धि , पुनरुद्भवन और व्यता क्या है
  • आनुवंशिकी (genetics)
  • पारिस्थितिकी और पर्यावरण
  • जिव और वातावरण
  • पारिस्थितिकी पादप समूह और अनुत्क्रमण
  • परितंत्र की संरचना और कार्य लिखिए
  • जीवोम , जीव मण्डल और जैव भूरासायनिक चक्र
  • प्रदूषण
  • प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण
  • जैव विविधता और वन्य जिव संरक्षण
  • जीव विज्ञान के अनुप्रयोग (application of biology)
  • पादपों का घरेलुकरण तथा फसल सुधार
  • आर्थिक वनस्पति विज्ञान
  • जन्तुओं का पालतुकरण और आर्थिक जन्तु विज्ञान
  • फसलीय पीडकनाशी
  • जैव उर्वरक एवं जैविक पीडक नियन्त्रण (biofertilizers and biological pest controls)
  • जीन संरक्षण और नई फसलें
  • मानव रोग का परिचय (human diseases)
  • सामान्य मानव रोग
  • धुम्रपान , मदिरापान , औषधि व्यसन , मानसिक और सामुदायिक स्वास्थ्य
  • चिकित्सीय अनुप्रयोगों के लिए तकनीकियाँ
  • जैवतकनीकी
  • जैव ऊर्जा
  • मानव जनसंख्या की वृद्धि

neet २०१८ – २०१९ रसायन विज्ञान पाठ्यक्रम (NEET 2018 – 2019 syllabus chemistry in hindi )

  • गैसीय अवस्था
  • मोल एवं तुल्यांक अवधारणा
  • परमाणु संरचना
  • रेडियोएक्टिवता
  • रासायनिक बन्ध एवं संकर लवण
  • ऑक्सीकरण अपचयन
  • विद्युत अपघटन एवं विद्युत अपघटनी सेल
  • रेडोक्स अनुमापन
  • अणुसंख्य गुण धर्म और विलयन क्या है
  • रासायनिक बल गतिकी
  • रासायनिक साम्य
  • आयनिक साम्य
  • विलयन की चालकता
  • उष्मागतिकी
  • ऊष्मा रसायन
  • क्रिस्टलोग्राफी

दृष्टि दोष , नेत्र या आँख के रोग , कर्ण – श्रवणों – संतुलन संवेदांग के कार्य , क्रियाविधि , संरचना defects of vision

defects of vision in hindi  दृष्टि दोष

1. दूर दृष्टि दोष : इस दोष के दौरान निकट की वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है क्योंकि प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर रेटिना के पीछे बनता है।  यह लैंस का चपटा हो जाने के कारण होता है , उत्तल लेंस के चश्मे का उपयोग कर इस दोष को दूर किया जा सकता है।

2. निकट दृष्टि दोष : इस दोष के दौरान दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है क्योंकि प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर रेटिना से पहले बन जाता है।  यह नेत्र गोलक के व्यास का अधिक होने या लैंस का अधिक ऊत्तल होने के कारण होता है।  अवतल लेंस के चश्में का उपयोग कर इस दोष को दूर किया जा सकता है।

3. वृद्दावस्था दृष्टि दोष : इस दोष में निकट व दूर की वस्तुएं स्पष्ट दिखाई नहीं देती है क्योंकि लेंस या सिलियरी पेशियों की लूचक कम हो जाती है।  बाईफोकल लैंस का उपयोग कर इस दोष को दूर किया जा सकता है।

4. दृष्टि वैषम्य : इस दोष में धुंधला व अस्पष्ट दिखाई देता है क्योंकि प्रकाश का केन्द्रीयकरण नहीं होता है , बेलनाकार लैंस के चश्में का उपयोग कर इस दोष को दूर किया जा सकता है।

5. रंग अन्धता : इस विकार के दौरान लाल व हरे रंग के भेद करने की क्षमता नहीं होती है , यह एक आनुवांशिक विकार है।

आँख के रोग

1. मोतिया बिन्द : इस रोग में शुरू में धुंधला व बाद में बिल्कुल दिखाई नहीं देता है क्योंकि लैंस चपटा व अपारदर्शी हो जाता है।  शल्य क्रिया द्वारा इसका उपचार किया जा सकता है। उपचार हेतु इंट्रा ओक्युलर लेंस इस्तेमाल होते है।

2. ग्लोइकॉमा : इस विकार के दौरान व्यक्ति अंधा हो जाता है क्योंकि श्लेष्मा नाल में अवरोधन से नेत्र गोलक पर दबाव बढ़ जाता है जिससे रेटिना क्षतिग्रस्त हो जाता है।

3. फन्जीक्टिन बाइटिस : इस विकार के दौरान आँखे लाल हो जाती है क्योंकि वायरस या जीवाणु संक्रमण के कारण कंजक्टिवा में सूजन आ जाती है।

4. रतौंधी : इस विकार के दौरान मंद प्रकाश या रात्री में दिखाई नहीं देता है क्योंकि विटामिन ‘A’ की कमी के कारण रोडोक्सिन का संश्लेषण नहीं होता है।

कर्ण – श्रवणों – संतुलन संवेदांग (ear) :

मनुष्य में एक जोड़ी कर्ण पाये जाते है , प्रत्येक कर्ण उभागो से मिलकर बना होता है।

1. बाह्य कर्ण : यह कर्ण का बाहरी भाग होता है , यह स्तनधारियों में पाया जाता है , बाह्य कर्ण 2 भागों से निर्मित होता है।

(a) कर्ण पल्लव : स्तनधारियों में कर्ण पल्लव स्पष्ट रूप से पाये जाते है , मनुष्य को छोड़कर अधिकांश स्तनधारियों में कर्ण पल्लव गतिशील होते है।

(b) कर्णकुहर : यह एक छिद्र समान संरचना होती है , कर्ण कुहर 2.5 – 3cm लम्बा होता है।  इसकी दिवार में मिरूमीनास ग्रन्थि पाई जाती है।  यह ध्वनि को कर्ण पट्ट तक पहुंचाता है।

2. मध्य कर्ण : यह एक गुहा रुपी रचना होती है , यह कर्णपट्ट के बाहर व भीतर वायुदाब बनाएँ रखती है , जिससे कर्णपट्ट के फटने का डर नहीं रहता है।  मध्यकर्ण 2 छिद्रों द्वारा अन्त: कर्ण से जुड़ा रहता है।  ऊपर के छिद्र को फेनेस्ट्रा ओवेलिस व नीचे के छिद्र को कोनेस्ट्रा रोटणडम कहते है।  मध्य कर्ण 3 अस्थियों से बना होता है।

(a) मैलियास : यह नीचले जबड़े की आर्टिकुलर अस्थि का रूपांतरण है।  यह मध्य कर्ण की सबसे बड़ी होती है , यह हथौड़ा के आकार की होती है।  इसका एक सिरा कर्णपट्ट से व दूसरा सिरा इनकस से जुड़ा रहता है।  मैलिथस व इनकस के मध्य हिंज संधि पायी जाती है।

(b) इनकस : यह कवाड्रेट अस्थि का रूपांतरण होती है , यह निहाई के आकार की होती है , इसका एक सिरा मैलियास से व दूसरा सिरा स्टेपिज से जुड़ा रहता है।

(c) स्टेपीज : यह हायोमेंडीबुलर अस्थि का रूपांतरण होती है , यह शरीर की सबसे छोटी अस्थि होती है।  यह घोड़े की रकाव की आकृति की होती है।  एक सिरा इनकस व दूसरा सिरा फेनेस्ट्रा ओवेसिस के सम्पर्क में रहता है।

(3) अन्त: कर्ण : यह कर्ण का सबसे भीतरी भाग होता है , यह दो भागों से मिलकर बना होता है।

  • अस्थिल गहन : टेम्पोरल अस्थि से निर्मित अस्थिल घेरा अस्थिल गहन कहलाता है , अस्थिल गहन की परिलसिका गुहा में परि लसिका भरा होता है।  अस्थिल गहन बाहर की ओर मध्य कर्ण से सम्बन्धित होता है।
  • कला गहन : यह कोमल , अर्धपारदर्शी झिल्लीनुमा संरचना होती है इसमें दो वेश्म (कक्ष) यूट्रीक्यूलस व सैक्यूलास होते है।  यूट्रीक्यूलस से तीन अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएं निकलती है जिन्हें अग्र अर्द्धवृत्ताकार पश्च अर्द्धवृत्ताकार , बाह्य अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएं कहते है। प्रत्येक अर्द्धवृत्ताकार नलिका का दूरस्थ फूला हुआ भाग तुम्बिका कहलाता है।  सैक्युलस से एक लम्बी व स्प्रिंग के समान कुंडलित नलिका निकलती है जिसे कॉक्लियर नलिका या कणवित कहते है।
कॉक्लियर नलिका के उपरी भाग को स्केला वेस्टीबुलाई मध्य भाग को स्केला मिडिया व नीचले भाग को स्केला टिम्पेनाई कहते है।  स्केला मिडिया व स्केला टिम्पेनाई के मध्य बेसिलर कला पाई जाती है।  जिसकी मध्य रेखा पर संवेदी आयाम पाये जाते है जिसे कोर्टी के अंग कहते है।

कॉर्टि के अंग पर संवेदी रोम युक्त पट्टी पायी जाती है जिसे टेक्टोरियल कला कहते है।

कर्ण की क्रियाविधि

(a) संतुलन क्रिया : एम्पुला व यूट्रीक्यूलस में एण्डो लिम्फ भरा होता है जिसमे कैल्सियम आयन युक्त ऑटोकॉनिया कण पाये जाते है।  ये ऑटोकॉनियाँ कण श्रवणकुटो के संवेदी रोमों से टकराते है जिससे उत्पन्न उत्तेजनाओं को श्रवण तंत्रिकाओ द्वारा मस्तिष्क तक पहुचाते है।  जहाँ शरीर की पेशियों को संतुलित बनाएँ रखने के लिए प्रेरणा मिलती है।

नेत्र की कार्य विधि , संरचना चित्र , लेंस , आँख की क्रियाविधि / देखने की प्रतिक्रिया eye working in hindi

नेत्र (eye) :
बाह्य संरचना : मानव में एक जोड़ी नेत्र होते है , मानव में नेत्र कोठर स्थित होते है , नेत्र गोलक को कोठर में घूमने के लिए 6 प्रकार की पेशियाँ होती है।  नेत्र 2.5 व्यास के नेत्र गोलक के रूप में होते है।  नेत्र से संभावित सहायक संरचनाएँ पलकों बोरोनिया असरव ग्रंथियाँ आदि होते है , नवजात शिशु के चार महीने बाद असरु ग्रंथियों का संक्रियण होता है।  असरु में लवण , श्लेष्मा व जीवाणुओं को नष्ट करने में लाइसोजाइम पाये जाते है।
नेत्र गोलक खोखला व तीन स्तरीय होता है।

1. दृढ पटल (sclerotic coat) : यह सबसे बाहरी स्तर होता है।
यह दो भागों में बंटा होता है –
(A) बाहरी उभरा हुआ पारदर्शी भाग कोर्निया कहलाता है , यह नेत्र गोलक का 1/5 वा भाग होता है।
(B) शेष 4/5 वा भाग नेत्र कोटर के अन्दर रहता है , यह तन्तुमय संयोजी उत्तक का बना होता है।
कार्य

  • यह परत गोलक को सुरक्षा प्रदान करती है।
  • नेत्र गोलक को आकृति प्रदान करती है।
  • यह नेत्र पेशियों को संधि के लिए संधि स्थल प्रदान करती है।
2. रक्तक पटल (chriod coat) : यह मध्य स्तर होता है , यह कोमल संयोजी उत्तक द्वारा निर्मित होता है।  इस परत में रक्त कोशिकाओ का जाल पाया जाता है।  इस परत में रंगा कोशिकाएँ पायी जाती है , रंगा कोशिकाएं काली , भूरी या नीली हो सकती है।  कोर्निया को छोड़कर यह परत दृढपटल से चिपकी रहती है।
रक्तक पटल जो दृढ पटल से अलग होता है , कोर्निया के पीछे एक रंगीन पर्दे का निर्माण करता है , जिसे आइरिस कहते है।  आइरिस के मध्य में एक छिद्र पाया जाता है , जिसे पुतली या तारा कहते है।  आइरिस के व्यास को कम या अधिक करने के लिए दो प्रकार की पेशियाँ होती है।
3. दृष्टि पटल (ratina) : यह नेत्र गोलक का सबसे भीतरी पतला , कोमल व संवेदी स्तर होता है।  बाहरी की ओर दांतेदार होता है जिसे ओरा सिरेटा कहते है।
रेटिना प्रमुख दो स्तरों का बना होता है –
(A) संवेदी स्तर
(B) रंगा स्तर
(A) संवेदी स्तर : संवेदी स्तर तीन परतो में बंटा होता है –
(i) श्लाका एवं शंकु परत : इस परत में दो प्रकार की कोशिकाएँ होती है।
(क) श्लाका : ये नेत्र में 115 मिलियन तक होती है , इनकी संख्या अधिक होती है , इनमे रोडोक्सिन वर्णक पाया जाता है।  ये कोशिकाएँ प्रकाश व अंधकार में देखने के लिए सक्षम बनाती है।
(ख) शंकु : ये नेत्र में 6.5 मिलियन तक होती है , इनमे आयोडोक्सिन नामक वर्णन पाये जाते है।  ये रंग भेदने में सहायक होती है।
(ii) द्विध्रुवीय न्यूरोन स्तर : इस स्तर में द्विध्रुवीय तंत्रिका कोशिकाएँ सिनैप्स बनाती है।
(iii) गुच्छ्कीय स्तर : इस स्तर में एक्सोन भाग दृक तंत्रिकाओ के तन्तुओ में रूपांतरित हो जाते है। इस परत के आधार भाग को अंग बिंदु कहते है।

लेंस (lens)

आइरिस के ठीक पीछे एक पारदर्शी उभ उत्तल व लचीला लैंस होता है , जिस पर संयोजी ऊत्तक का लचीला लेन्स सम्पुट पाया जाता है।  लेंस व कोर्निया के मध्य अक्ष दृक अक्ष कहलाती है।  दृक अक्ष के सम्मुख स्थित दृष्टि पटल का मध्य भाग पीला दिखाई देता है इसे पीत बिंदु या मैकुला लुटिया कहते है।  लैंस सिलियरी काय के अन्दर लचीले निलम्बन रुनायु द्वारा गोलक की गुहा में fix रहता है।  लैंस व कोर्निया के बीच की गुहा में पारदर्शी द्रव भरा होता है जिसे तेजो जल कहते है।
लेंस व रेटिना के बीच पारदर्शक लसदार गाढ़ा द्रव भरा होता है जिसे काचाभ द्रव कहते है।

नेत्र की क्रियाविधि / देखने की प्रतिक्रिया (eye working in hindi )

वस्तु से निकलने वाली प्रकाश किरणें जब नेत्र में प्रवेश करती है तो तेजो जल प्रकाश किरणों को अपवर्तित कर देता है , आइरिस से गुजरती हुई ये किरणें लेंस में से होकर गुजरती है तो लेन्स इन्हें अपनी ओर फोकस दुरी के अनुसार झुका देता है और अब ये किरणें दृष्टिपटल पर पड़कर वस्तु का उल्टा व वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाती है।  दृष्टिपटल की संवेदी कोशिकाएँ उत्तेजित होकर दृक तंत्रिका तंत्र द्वारा मस्तिष्क में पहुंचती है।  मस्तिष्क में इनकी व्याख्या की जाती है जिससे जन्तु को वस्तु का दृष्टि ज्ञान हो जाता है।

प्रतिवर्त एवं प्रतिवर्ती क्रिया क्या है , परिभाषा , कार्य , प्रकार , क्रियाविधि , Reflexes and reflex action

(Reflexes and reflex action in hindi )प्रतिवर्त एवं प्रतिवर्ती क्रिया  : किसी उद्दीपन या बाहरी वातावरण में अचानक परिवर्तन के प्रति जन्मजात या बिना सोचे समझे होने वाली अनुक्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया कहते है।

प्रतिवर्त क्रिया की क्रियाविधि

अंगो से प्राप्त संवेदनाओ को संवेदी न्यूरोन मेरुरज्जु तक पहुँचाते है , ये संवेदनाएँ मेरुरज्जु के धूसर द्रव में पहुंचती है , जहाँ उचित निर्णय लेकर उचित आदेश धूसर द्रव में उपस्थित संयोजी न्यूरॉन को दिए जाते है , संवेदी न्यूरॉन मेरुरज्जु से प्राप्त प्रेरणाओं को प्रेरक न्यूरॉन को देते है जो कार्यकारी अंग या पेशी तक पहुंचाते है जिससे उचित अनुक्रिया हो जाती है।

 तंत्रिका कोशिका या न्यूरॉन

परिचय : न्यूरॉन तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई होती है , न्यूरॉन की कोशिकाएँ आवेगों का संचरण करने के लिए विशिष्ट होती है , इनका उद्भव भ्रूणीय एक्टोडर्म द्वारा होता है , प्रत्येक न्यूरॉन के निम्न भाग होते है –
1. कोशिका काय (cyton) : यह न्यूरॉन का गोल फैला हुआ भाग है , इसमें सभी कोशिकांग पाये जाते है , इसमें विशिष्ट कण निस्सल के कण उपस्थित होते है , कोशिका काय में उपस्थित द्रव को न्यूरोप्लाज्मा कहते है।  न्यूरोप्लाज्मा में आवेगों के संचरण के लिए महीन तंत्रिका तंतुक पाये जाते है।
2. डेन्ड्रोंस (dendrons) : कोशिका काय से कई शाखाएँ निकलती है , इन महीन धागे समान संरचनाओ को डेन्ड्रोंस कहते है।  ये तंत्रिका आवेगों को कोशिकाकाय की ओर लाती है।
3. एक्सोन (axon) तंत्रिकाक्ष : कोशिका काय से लगभग 20 माइक्रोन मोटाई का प्रवर्ध निकलता है , जिसे एक्सोन कहते है।  इसका प्रारंभिक भाग मोटा , लम्बा व बेलनाकार होता है , एक्सोन के अन्तिम सिरे गुन्दी के समान होता है जिन्हें साइनोप्टिक बटन या अक्ष तन्तु कहते है।  एक्सोन पर श्वान कोशिकाओ युक्त माइलीन आच्छाद पाया जाता है।  दो माइलिन आच्छादो के मध्य भाग को रेनवियर की पर्वसंधि कहते है।  कार्य की दृष्टि से न्यूरॉन दो प्रकार के होते है –
1. संवेदी न्यूरॉन : ये संवेदनाओं को संवेदी अंगो से मस्तिष्क व मेरुरज्जु तक लाती है।
2. प्रेरक न्यूरॉन : इन्हें चालक न्यूरॉन भी कहते है , ये प्रेरणा को मस्तिष्क व मेरुरज्जु से कार्यकारी अंग पेशी तक पहुंचाते है।

तंत्रिका आवेगों का संचरण

बाहरी उद्दीपनो से तंत्रिका कोशिकाओ का उत्तेजन तंत्रिका आवेग कहलाता है , इनका संचरण विद्युत रासायनिक तरंगो के रूप में होता है।  तंत्रिका तन्तु को उत्तेजित करने के लिए आवश्यक न्यूनतम शक्ति को दैहलीज उद्दीपन कहते है।  विश्रांति काल में तंत्रिका कला के बाहर सोडियम आयनों की अधिकता के कारण धनावेश होता है जबकि भीतर कार्बोनेट आयनों की अधिकता के कारण ऋणावेश होता है।  पोटेशियम आयन वाहक का कार्य करते है , विश्रांति काल में विश्रान्ति कला विभव -70mv होता है।  उद्दीपन की अवस्था में सोडियम आयन भीतर व पोटेशियम आयन बाहर निकलते है।  साम्यावस्था में लाने के लिए तीन सोडियम आयन अन्दर व दो पोटेशियम आयन बाहर पम्प किये जाते है। जिससे बाहर ऋणावेश व भीतर धनावेश हो जाता है इसे विध्रुवित अवस्था कहते है तथा उत्पन्न सक्रीय विभव +30mv हो जाता है।  यह क्रिया आगे की ओर संचरित होती रहती है तथा पुन: सामान्य ध्रुवित अवस्था होती रहती है , यह संचरण दर 45 मीटर / सेकंड से होती है।  मायलिन आच्छाद में संचरण तीव्र होती है , इसे साल्टेटोरियल आवेग संचरण कहते है।

अंतग्रथनी संचरण (synaptic transmission)

एक तंत्रिका कोशिका का एक्सोन दूसरे तंत्रिका कोशिका डेन्ड्रोन के मध्य संयोजन को सिनैप्स कहते है।  सिनैप्स के आवेग के संचरण को अन्तर: ग्रन्थि संचरण कहते है।  एक्सोन का अन्तिम सिरा घुण्डी के समान होता है जिसमे वेसिकल व माइटोकॉन्ड्रिया होते है , जब आवेग विभव सिनैप्स पर पहुंचते है तो सिनौप्टिक वेसिकल विदर में कटकर एसिटोकोलीन का स्त्राव करते है जो आवेगों में डेन्ड्रोन में डेन्ड्रोन संचरित करता है , जब आवेग गुजर जाते है तो एसिटोकोलीन एस्टरेन एंजाइम का स्त्राव करते है जो एसिटोकोलीन का विघटन कर देता है।  एसीटोकोलीन व स्पिथीन व ब्यूरोटाएनमिटसि कहते है।

संवेदिक अभिग्राहण एवं संसाधन

प्रकृति से प्राप्त उद्दीपनों को ग्रहण करने के लिए मानव में संवेदी अंग पाये जाते है।
मानव में संवेदी अंग तीन प्रकार के होते है –
1. बाह्य संवेदी अंग : नाक , आँख , जीभ , कान व त्वचा
2. आन्तरिक संवेदी अंग : कार्बन डाई ऑक्साइड व रक्त की सांद्रता में परिवर्तन भूख , प्यास आदि।

तंत्रिका तंत्र की परिभाषा क्या है , प्रकार , संरचना चित्र , कार्य , मस्तिष्क के काम , वर्गीकरण , nervous system

nervous system in hindi तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

परिचय : शरीर को वातावरण में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी व उसके अनुसार प्रतिक्रिया करने के लिए तंत्रिका तंत्र की आवश्यक होती है | तन्त्रिका तंत्र की क्रियाएँ तीव्र होती है , तंत्रिका तन्त्र भ्रूणीय परिवर्तन के दौरान बनने वाला प्रथम तंत्र होता है , तंत्रिका तंत्र का उद्भव एक्टोडर्म के द्वारा होता है , मनुष्य में तंत्रिका तंत्र को तीन भागों में बाँटा गया है –

  1. केन्द्रिय तंत्रिका तंत्र (CNS)
  2. परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS)
  3. स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (ANS)
  4. केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) : इसके द्वारा प्राप्त संवेदनाओ का विश्लेषण किया जाता है –
  • मस्तिष्क (Brain) : यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का महत्वपूर्ण भाग होता है , इसका भार 1.4Kg होता है , यह कपाल द्वारा घिरा रहता है , मस्तिष्क के चारो ओर संयोजी ऊत्तक से निर्मित मस्तिष्क आवरण पाया जाता है जो मस्तिष्क को चोट , दुर्घटना एवं बाहरी आघातों से सुरक्षा करता है तथा पोषण प्रदान करता है | मस्तिष्क आवरण निम्न तीन झिल्लियों का बना होता है –
  • दृढतानिका (ड्यूरामेटर) : यह मस्तिष्क की सबसे बाहरी झिल्ली होती है , यह मोटी व दृढ होती है , इस परत में कोलेजन तन्तु पाये जाते है इसमें अनेक रक्त पात्र होते है | दृढतानिका व जाल तानिका के मध्य ड्यूरल अवकाश पाया जाता है जिसमे सिरमी द्रव भरा होता है जो दोनों परतो को नम व चिकना बनाएँ रखता है |
  • जालतानिका (एरेकनॉइड) : यह मध्य मस्तिष्क आवरण है , इसमें रुधिर केशिकाओं का जाल पाया जाता है , जाल तानिका व मृदुतानिका के मध्य अद्योजालतानिका अवकाश पाया जाता है जिसमें प्रमस्तिष्क मेरुद्रव भरा होता है |
  • मृदु तानिका (पायामेटर) : यह सबसे भीतरी मस्तिष्क आवरण है , यह मस्तिष्क व मेरुराज्जू से चिपकी रहती है , इस परत में भी रूधिर कोशिकाओ का जाल पाया जाता है जिससे मेरुरज्जु व मस्तिष्क को पोषण व ऑक्सीजन प्राप्त होती रहती है |

प्रमस्तिष्क मेरुद्रव : यह द्रव क्षारीय प्रकृति का होता है , इसकी मात्रा 150ml होती है , इसमें प्रोटीन , ग्लूकोज , यूरिया Cl, K+ , Na+ , Ca++ , CO3 , SO4 , PO4 , क्रिएटिन व यूरिक अम्ल पाये जाते है |

कार्य

  • यह मस्तिष्क व मेरुरज्जु को सुरक्षित व नम बनाए रखता है |
  • यह मस्तिष्क व रक्त के मध्य पोषक पदार्थो CO2 व O2 का आदान प्रदान करता है |
  • यह मस्तिष्क व मेरुरज्जू की रोगाणुओं से सुरक्षा भी करता है |

मस्तिष्क की संरचना

मस्तिष्क निलय : मस्तिष्क में खोखली व अनियमित निलय पायी जाती है जिनमें मेरुद्रव भरा होता है , ये चार प्रकार की होती है –

  • दाँया व बाँया निलय : ये दोनों निलय प्रमस्तिष्क में स्थित होते है , ये मोनरो के छिद्र द्वारा तृतीय निलय से जुड़े होते है |
  • तृतीय निलय : यह थैलेमान के मध्य डायएनसेफेलोन में स्थित होता है , यह प्रमस्तिष्क जल सेतु द्वारा चतुर्थ निलय से जुड़ा होता है |
  • चतुर्थ निलय : यह अनुमस्तिष्क के नीचे स्थित होता है , इसकी छत के पिछले भाग में 3 छिद्र होते है , मध्य का छिद्र मेगेंडी का छिद्र तथा पाशर्व के छिद्र लुस्का के छिद्र कहलाते है |

मस्तिष्क के तीन भाग होते है –

  1. अग्रमस्तिष्क (fore brain)
  • प्रमस्तिष्क (cerebrelle) : यह पूरे मस्तिष्क का 80% भाग होता है , यह अनुलम्ब विदर से दो भागों में बाँटा होता है | जिन्हें दायाँ व बायाँ प्रमस्तिष्क गोलार्द कहते है , दोनों गोलार्द कोर्पस केलोसन नामक संयोजी तन्तु से आपस में जुड़े होते है , प्रत्येक प्रमस्तिष्क गोलार्द को तीन दरारें , चारपालियो या पिण्डो में बांटती है |
  • अग्र लाट पाली (frantal lobe) : यह सबसे आगे व सबसे बड़ी पाली होती है , यह बोलने की क्रिया को सम्पादित करती है |
  • भित्तिय पालि (Parietal lobe) : यह अग्रलाट पालि के पीछे स्थित होती है , इसे पाशर्व कपालखण्ड भी कहते है , इसमें संवेदी व प्रेरक केन्द्र होते है |
  • शंख पालि (Temporal lobe) : यह भित्तिय पाली के नीचे स्थित होती है , इसमें श्रवण व प्राण संवेदी केन्द्र होते है |
  • अनुकपाल पालि (oxipital lobe) : यह सबसे छोटी व सबसे पीछे की ओर स्थित होती है , इसमें दृष्टि संवेदी केंद्र होते है |

प्रमस्तिष्क के कार्य

  • यह शरीर के विभिन्न भागों से स्पर्श , दर्द , चूमन आदि संवेदी उत्तेजनाओ को ग्रहण करता है |
  • श्रवण संवेदी क्षेत्र शंखपालि में दृष्टि संवेदी केन्द्र अनुकपाल पालि में , घ्राण संवेदी क्षेत्र शंख पालि में तथा वाणि संवेदी केन्द्र अग्रलाट पालि में पाये जाते है |
  • प्रमस्तिष्क मानव मस्तिष्क का सर्वाधिक विकसित भाग होता है | यह बुद्धिमता , चेतना , अनुमत , विश्लेषण क्षमता , तर्कशक्ति , वाणि आदि उच्च मानसिक क्रियाकलापों का केन्द्र है |
  • यह संवेदी प्रेरक तथा समन्वय का केंद्र भी कहते है |
  • डायएनसेफेलॉन (अग्रमस्तिष्क पश्च) : यह अग्र मस्तिष्क का पश्च भाग है , इसे थैलमैनसेफेलॉन भी कहते है , इसके तीन भाग होते है –
  • एपिथैलेमस / अधिचेतन : यह तृतीय गुहा की छत के रूप में होता है , इसमें रक्तक जाल होता है , इसकी मध्य रेखा पर पीनियल ग्रन्थि व दोनों पाशर्व में थैलेमिक केन्द्र होते है |
  • थैलेमस / चेतन : यह अण्डाकार एवं दो मोटे पिण्डको के रूप में होता है , यह पूरे डायऐनसेफेलॉन का 80% होता है , इसके पिण्डक मेरुरज्जू व मस्तिष्क के विभिन्न भागों में संवेदी व प्रेरक आवेगों को ले जाने के लिए प्रसारण केन्द्र का कार्य करते है , ये संवेदी सूचनाएं जैसे – दृष्टि , स्वाद , स्पर्श , ताप , दाब कम्पन्न , पीड़ा आदि सूचनाओ का प्रसारण करते है | यह स्पर्श , दाब , पीडा , ताप , हर्ष , विषाद (दुःख) आदि की संवेदना की व्याख्या करने में समर्थ है |
  • हाइपोथैलेमस / अद्यचेतन : यह डायऐनसेफेलॉन की पाशर्व दीवारों का नीचला भाग तथा तृतीय निलय का फर्श बनाता है | इससे तंत्रिका कोशिकाओ के लगभग एक दर्जन बड़े बड़े केन्द्रक होते है , यह तन्त्रिका तन्त्र एवं अन्त: स्त्रावी तंत्र में सम्बन्ध स्थापित करता है | इसमें स्वायत्त तंत्रिका के उच्च केन्द्र होते है , यह शरीर के ताप तथा समस्थापन का नियंत्रण करता है , इसके द्वारा मोचक व निरोधी न्यूरो हार्मोन स्त्रवित होते है |

(2) मध्यमस्तिष्क (mid brain / mesencephalon) : यह मस्तिष्क का सबसे छोटा भाग है , प्रमस्तिष्क के नीचे व पश्च मस्तिष्क के ऊपर स्थित होता है , मध्य मस्तिष्क की गुहा सकरी होती है , इसे इटर कहते है | मध्य मस्तिष्क को दो भागों में बाँटा गया है |

(क) क्रूरा सेरिब्राई : यह एक जोड़ी डंडलनुमा वृन्त है , यह प्रमस्तिष्क को पश्च मस्तिष्क व मेरुरज्जू से जोड़ाता है |

(ख) कॉर्पोरा क्वादड्रीजेमिना : यह चार गोल उभारो का बना होता है , प्रत्येक उभार को कीलिकुलस कहते है , इसमें कई केन्द्रक होते है |

मध्य मस्तिष्क के कार्य

  • यह पेशियों गतियो का समन्वय करता है |
  • इसके कोलिकुलान दृष्टि व श्रवण सम्बन्धी क्रियाओं का प्रतिवृत्तो की तरह कार्य करते है |

(3) पश्च मस्तिष्क (Hind brain or rhombencephalon) : इसके तीन भाग होते है –

(A) अनुमस्तिष्क (cerebrum) : यह स्तनधारियों में अत्यधिक विकसित होता है , यह पाँच पिण्डको द्वारा निर्मित होता है | 1 वर्मिस पिण्डक 2 पाशर्व पिण्ड और 2 प्लोक्यूलस होते है , वर्मिस सबसे बड़ा पिण्ड होता है , इसकी सतह पर अनेक वलन पाये जाते है |

कार्य

  • यह प्रमस्तिष्क द्वारा प्रेरित ऐच्छिक गतियो के लिए पेशियों का समन्वय करता है |
  • यह कंकाल पेशियो के समुचित संकुचन द्वारा चलने फिरने , दौड़ने , लिखने आदि क्रियाओं को सुगम बनाता है |
  • यह शरीर का संतुलन व साम्यावस्था बनाए रखने में सहायक होता है |
  • पोन्स वेरोलाई (pons varalli) : यह मेडुला ऑव्लागेंटा के ऊपर व प्रमस्तिष्क वृतको के नीचे स्थित होता है , यह अनुमस्तिष्क की पालियो को जोड़ने का कार्य करता है |

कार्य

  • यह चर्वण क्रिया , लार स्त्रवण , अश्रुपात तथा नेत्रों की गतिशीलता का नियंत्रण करता है |
  • इसमें श्वसन नियन्त्रण केन्द्र पाये जाते है |
  • मेडुला ऑवलागेटा : यह मस्तिष्क का सबसे अन्तिम व नीचला भाग होता है , इसकी गुहा को चतुर्थ निलय कहते है | मस्तिष्क व मेरुरज्जु के मध्य थैले सभी संवेदी व प्रेरक तंत्रिका क्षेत्र मेडुला में ही विद्यमान होते है |

कार्य

मेडुला ऑवलागेटा सभी अनैच्छिक क्रियाओ जैसे श्वसन , आहारनाल के क्रमांकुचन , ह्रदय स्पंदन आदि क्रियाओ पर नियंत्रण करता है , मेडुला में निगलना , वमन , छिकने व खासने की क्रियाओ के केंद्र होते है |

  1. मेरुरज्जू (spinal cord) : यह मेडुला का ही खोपड़ी के महारन्ध्र के नीचे विस्तार है , यह तंत्रिका नाल में स्थित होता है , यह प्रथम कशेरुकी से अन्तिम कशेरुक तक फैली रहती है , मनुष्य में यह 45cm लम्बी , खोखली व बेलनाकार संरचना होती है , यह अग्र व पश्च भाग में फूलकर क्रमशः बाहुउत्फुलन व कटि उत्फुलन बनाती है | इसका अन्तिम पतला सिरा अन्तय सूत्र कहलाता है , मस्तिष्क के समान इस पर तीन झिल्लियाँ पायी जाती है | इसमें धूसर द्रव व श्वेत द्रव भरे होते है |

कार्य

  • यह प्रतिवर्ती क्रियाओ का मुख्य केन्द्र होता है |
  • यह शरीर के विभिन्न भागों व मस्तिष्क के मध्य सम्बन्ध बनाए रखने का कार्य करता है |

परिधीय तंत्रिका तंत्र (peripheral nervous system)

परिधीय तन्त्रिका तन्त्र में कपालीय तंत्रिकाएँ व मेरु तंत्रिकाएं शामिल है , मनुष्य में 12 जोड़ी जोड़ी कपालीय तंत्रिकाएँ पायी जाती है |

  • घ्राण तंत्रिकाएँ
  • दृक तंत्रिकाएँ
  • अक्षि चालक तंत्रिकाएं
  • चक्रक तंत्रिकाएँ
  • ट्राइजेमिनल तंत्रिकाएँ
  • अपचालक तंत्रिकाएं
  • आननी तंत्रिकाएँ
  • श्रवण तंत्रिकाएं
  • जिह्वा ग्रसनी तंत्रिकाएँ
  • वेगस तंत्रिकाएं
  • सुषुम्नीय तंत्रिकाएँ
  • जिव्हा अद्योग्रसनी तंत्रिकाएँ

मनुष्य में 31 जोड़ी मेरुतंत्रिकाएँ होती है जो मेरुरज्जु से निकलती है , ये मिश्रित प्रकृति की होती है |

  • ग्रीवा तंत्रिकाएँ – 8 जोड़ी
  • वक्षीय – 12 जोड़ी
  • कटि तंत्रिकाएँ – 5 जोड़ी
  • त्रिक तंत्रिकाएँ – 5 जोड़ी
  • पुच्छीय तंत्रिकाएं – 1 जोड़ी

स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (autonomic nervous system)

शरीर की अनैच्छिक क्रियाओ का नियंत्रण व नियमन स्वायत तंत्रिका तंत्र द्वारा किया जाता है , इस तंत्र की खोज लेंग्ले द्वारा की गई | यह केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से सम्बन्धित होता है , यह संरचनात्मक व क्रियात्मक आधार पर दो प्रकार का होता है |

अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र (sympathetic nervous system) : अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र की गुच्छिकाएं मेरुरज्जू व कटि के धूसर द्रव से निकलती है अत: इसे वक्षीय कटि तंत्र भी कहते है |

परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र (Ansympathetic nervous system) : यह शरीर की सभी सामान्य क्रियाओ का नियमन व नियंत्रण करता है , शरीर की आन्तरिक वातावरण की अखंडता को बनाए रखने में सहायक है | अनुकम्पी व परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र एक दूसरे के विपरीत कार्य करते है |

आंतरागो के नाम अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र
1.       आइरिस पुतली का फैलना पुतली का सुकड़ना
2.       अश्रु ग्रंथियाँ उत्तेजन संदमन
3.       लार ग्रंथियां संदमन उत्तेजन
4.       ह्रदय स्पन्दन ह्रदय स्पंदन बढाता है कम करता है
5.       फेफड़े फैलाव करता है सिकुडन करता है
6.       रुधिर वाहिकाएँ संकिर्णन करता है विस्तारण करता है
7.       आहारनाल क्रमांकुचन में कमी करता है क्रमांकुचन में वृद्धि करता है
8.       अधिवृक्क ग्रन्थि उत्तेजन संदमन
9.       बालों की पेशियाँ बालों को खड़ा करता है बालों को शिथिल करता है
10.    स्वेद ग्रंथियां उत्तेजन संदमन
11.    मूत्राशय मूत्राशय को शिथिल करता है मूत्राशय को सिकोड़ता है

 

पेशियाँ , कंकाल पेशी की संरचना , क्रियाविधि , कार्यिकी  , वक्ष की अस्थियाँ व कार्य muscles in hindi

पेशियाँ (muscles) : पेशी संयोजी ऊत्तक की बनी होती है , पेशियां पेशी तन्तुक द्वारा निर्मित होती है , ये गति एवं चलन में सहायक होती है , ये मनुष्य के सम्पूर्ण भार का 40% होती है।
पेशियों के प्रकार निम्न है –
1. कंकाल पेशियाँ : ये पेशियां कंकाल की गति एवं चलन में सहायक होती है , ये कण्डराओ द्वारा अस्थियों से जुडी रहती है इन्हे रेखित या ऐच्छिक पेशियाँ भी कहते है , ये जल्दी थक जाती है।
2. हृदय पेशियाँ : ये पेशियां ह्रदय के स्पंदन में सहायक होती है , ये रैखित व अनैच्छिक पेशियाँ होती है। ये कभी नहीं थकती है।
3. चिकनी पेशियाँ : ये आहारनाल में क्रमाकुंचन गति व रुधिर वाहिनियो में गति में सहायक होती है , ये आहारनाल व रुधिर वाहिनियों की भित्ति में पायी जाती है , ये अरेखित व अनैच्छिक पेशियाँ होती है।

कंकाल पेशी की संरचना

पेशी से पेशी तंतु समान्तर व्यवस्थित होकर समूह बनाती है , ऐसे प्रत्येक समूह को पूलिका कहते है।  पुलिका के चारो ओर संयोजी ऊत्तक का आवरण पाया जाता है इसे परिपेशिका कहते है।  कंकाल पेशियाँ कोलेजन से बनी कण्डराओ द्वारा अस्थि से जुडी रहती है , पेशी तंतु लम्बी , बेलनाकार कोशिका होती है।  इसका व्यास 10 माइक्रोमीटर से 100 माइक्रो मीटर तक होता है तथा लम्बाई कई सेंटीमीटर होती है।  कोशिका में अनेक परिधीय केन्द्रक होते है इसकी प्लाज्मा झिल्ली को सार्कोलेमा तथा कोशिका द्रव्य को पेशी प्रद्रव्य कहते है।  प्रत्येक पेशी तन्तु में अनेक पतले तंतु धागे के समान पेशी तन्तुक होते है।  प्रत्येक पेशी तन्तुक का व्यास 1 माइक्रोमीटर होता है।  पेशी तंतु में अनेक पतले तन्तु पुनरावर्ती क्रम में लंबवत व समान्तर व्यवस्थित रहते है , इनको सार्कोमियर कहते है।  जो क्रियात्मक इकाई होती है , पेशी तंतुओ का निर्माण संकुचनशील प्रोटीन अणुओ द्वारा होता है।
ये प्रोटीन तन्तु दो प्रकार के होते है , मोटे तंतुओ को मायोसीन तन्तु तथा पतले तन्तुओं को एक्टिन तंतु कहते है।
एक पेशिक तन्तु में लगभग 1500 मायोसीन तंतु व 3000 एक्टिन तन्तु होते है , प्रत्येक मायोसीन तंतु 6 एक्टिन तन्तुओं के नियमित षट्कोणीय क्रम द्वारा घिरा रहता है।

पेशी की क्रियाविधि

केन्द्रिय तंत्रिका तंत्र की प्रेरक तंत्रिकाओं द्वारा आदेश प्रेक्षण से पेशी संकुचन का आरम्भ होता है , तंत्रिका संकेत पहुँचने से तंत्रिका द्वारा एसिटिल कोलीन मुक्त होता है जो सार्कोलेना में एक क्रिया विभव उत्पन्न करता है जो जो समस्त पेशीय रेशे पर फैल जाता है , जिससे सार्कोप्लाज्मा में Ca2+ आयन मुक्त होते है , साथ ही ATP के जल अपघटन से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग कर मायोसीन तन्तु एक्टिन के सक्रिय स्थानों से क्रॉस सेतु बनाने के लिए बन्ध जाते है जिससे एक्टीन तंतु मायोसीन पर सरकने लगते है , ATP , ADP व फास्फेट में अपघटित हो जाता है , परिणामस्वरूप एक्टिन व मायोसीन के मध्य क्रॉस सेतु टूट जाता है , मायोसीन विश्राम अवस्था में चला जाता है , यह क्रिया बार बार दोहराई जाती है।

पेशी संकुचन की कार्यिकी

इस सिद्धांत के अनुसार संकुचन के समय एक्टिन तन्तु मायोसीन तंतुओ पर सरकते है जिससे सार्कोमीयर की लम्बाई कम होती है , मायोसीन तंतु के सिरे अपने सामने स्थित एक्टीन तन्तुओ से अनुप्रस्थ सेतु द्वारा जुड़ जाते है , इन सेतुओ के संरूपण में परिवर्तन होते है , जो एक्टिन तन्तुओ को सार्कोमियर के केन्द्रीय भाग की ओर खींचते है , इस कारण Z रेखाएं एक दूसरे के समीप आ जाती है , A-Bond की लम्बाई यथावत रहती है लेकिन H-Zone की लम्बाई कम हो जाती है और इस प्रकार संकुचन हो जाता है।

वक्ष की अस्थियाँ

वक्ष भाग में दो प्रकार की अस्थियाँ पाई जाती है –
1. पसलियाँ (Ribs) : मनुष्य में 12 जोड़ी पसलियाँ पायी जाती है जो वृक्काकार छड के समान होती है , पसलियाँ गतिमान संधियों द्वारा आगे की ओर स्टर्नम (उरोस्थि) से तथा पीछे की ओर वक्षीय कशेरुकीओ से जुडी रहती है , पसलियां सम्मिलित रूप से वक्षीय पिंजर बनाती है।  12 जोड़ी पसलियो में से प्रथम 7 जोड़ी अस्थियाँ सीधे स्टर्नम से जुडी होती है।  वे वास्तविक पसलियाँ कहलाती है , अगली तीन जोड़ी पसलियां अप्रत्यक्ष रूप से कोस्टल कोटिलेज से जुडी रहती है , इन्हें कूट पसलियाँ कहते है।  अन्तिम 2 जोड़ी पसलियो के सिरे स्वतंत्र होते है , ये मुक्त पसलियाँ कहलाती है।
2. उरोस्थि (sternum) : इसे ब्रेस्टबॉन भी कहते है , यह एक चपटी व चौड़ी अस्थि होती है जो वक्ष भाग के अधर पर पायी जाती है।  यह लगभग 12cm लम्बी होती है , यह पसलियों को जोड़ने में तथा उनको स्थिरता प्रदान करने में सहायक होती है।

वक्ष अस्थियों के कार्य

1. ये ह्रदय , रुधिर वाहिनियों एवं फेफडो को सुरक्षा प्रदान करती है।
2. इनसे श्वसन पेशियाँ जुडी रहती है जो श्वसन में सहायक होती है।
3. अन्तिम दो जोड़ी पसलियाँ वृक्क को सुरक्षा प्रदान करती है।

पेशीय और कंकाल तंत्र के विकार

1. माइस्थेनिया ग्रेनिस : यह एक स्व प्रतिरक्षा विकार है जो तंत्रिका तंत्र पेशी संधि को प्रभावित करता है , इस विकार के दौरान कमजोर व कंकाल पेशियों का पक्षाघात (लकवा) हो जाता है।
2. पेशीय दुष्पोषण : लम्बी बीमारी व रोगों के कारण कंकाल पेशियों का अनुक्रमित अपहासन होने लगता है।
3. अपतानिका : शरीर में कैल्शियम आयनों की कमी होने के कारण पेशियों में तीव्र एटन होता है।
4. सन्धि शोध : यह जोड़ो का शोंध रोग है , इस विकार के दौरान जोड़ो में दर्द रहने लगता है।
5. अस्थि सुषिरता : यह उम्र सम्बन्धित विकार है , आयु बढ़ने के साथ साथ अस्थियो के मौलिक पदार्थो में कमी होने लगती है जिससे अस्थि भंग होने की प्रबल संभावना होती है।  एस्ट्रोजन स्तर में कमी इसका एक प्रमुख कारण है।
6. गाऊट : इस विकार के दौरान जोड़ो में यूरिक अम्ल के क्रिस्टल जमा होने लगते है , जिससे जोड़ो में दर्द रहने लगता है।

मेखला व मेखलाएँ क्या है , परिभाषा , प्रकार , संरचना चित्र , संधियाँ girdle and joints in hindi

मेखलाएँ (मेखला) (girdle) : मनुष्य के अक्षीय कंकाल व अनुबंधी कंकाल को जोड़ने वाली अस्थियाँ मेखलाएँ कहलाती है , ये दो प्रकार की होती है –

  • अंश मेखला (pectoral girdle) : यह अक्षीय कंकाल व अग्र पाद (हाथ) को जोड़ने वाली मेखला होती है , अंश मेखला दो प्रथक अस्थियों से निर्मित होती है –
  • जत्रुक (clavicle) : यह सुविकसित , लम्बी , पतली छड रुपी अस्थि होती है , इसका एक सिरा अंस कुट प्रवर्ध से तथा दूसरा सिरा उरोस्थि से जुड़ा रहता है , जत्रुक को कोलर अस्थि भी कहते है |
  • अंस फलक (scapula) : यह चपटी त्रिभुजाकार अस्थि होती है , जो कंधे का भाग बनाती है | इस पर दो उभार होते है , जो क्रमशः अंसकुट प्रवर्ध व अंसतुड प्रवर्ध कहलाते है , इन प्रवार्धो के समीप अंस उलूखल होता है , जिसमे ह्र्मुरस का सिर जुड़ा रहता है |
  • श्रोणी मेखला (pelvic girdle) : यह अक्षीय कंकाल व पच्छ पाद के मध्य उपस्थित होती है , यह तीन अस्थियो – इलियम , इश्चियम व फ्युबिस से मिलकर बनी होती है | तीनो अस्थियां दृढ़ता पूर्वक जुडी रहती है , श्रोणी मेखला में तीनो अस्थियो के दो अर्धांश होते है , प्रत्येक अर्धांश के बाहरी किनारे पर एक खड्डा होता है , जिसे श्रोणी उलूखल कहते है जिसमें फीमर का सिर जुड़ा रहता है |

भुजाओ की अस्थियाँ

अग्र पाद में निम्न अस्थियां पायी जाती है –

  1. प्रगंडिका (Humurus) : यह हाथ के भुजा की अस्थि है , इसका एक सिरा अंस उलूखल से व दूसरा सिरा रेडियस अल्ना से जुड़ा रहता है |
  2. रेडियस अल्ना : ये कलाई की अस्थियां होती है , दोनों अस्थियाँ आपस में संयुक्त रहती है , बाहर की ओर रेडियम व अन्दर की ओर अल्ना होती है , इसका ऊपर सिरा हयूमुरस से व निचला सिरा मणिबन्ध से जुड़ा रहता है |
  3. मणिबंध (कार्पल्स) : ये चार गोलाकार अस्थियो का समूह होता है , ये कलाई का अन्तिम भाग बनाती है , इनके मध्य उपास्थि पायी जाती है |
  4. अन्गुलास्थियाँ (मेटाकार्पल्स) : ये हाथ के पंजे की अस्थियाँ होती है , हथेली में पाँच कृमिकाएं पायी जाती है तथा छोटी छोटी 14 अंगुला अस्थियाँ पायी जाती है |

पैर की अस्थियाँ

  1. फीमर : यह शरीर की सबसे लम्बी अस्थि होती है , यह ऊपर की ओर श्रोणी मेखला से तथा नीचे की ओर टिबिया फिबुला से जुडी रहती है |
  2. टिबिया फिबुला : फीमर के आगे टिबिया फिबुला जुडी रहती है , टिबिया बाहर की ओर व फिबुला अन्दर की ओर स्थित होती है |
  3. गुल्फा अस्थियाँ (टारसल्स) : ये तलवे व टखने की अस्थियां होती है इनकी संख्या 7 होती है , इनके मध्य उपास्थि पायी जाती है |
  4. प्रिपदीकाएं (मेटा टारसल्स) : इनकी संख्या पाँच होती है , ये अगुलि अस्थियो से जुडी रहती है |
  5. अँगुली अस्थियाँ : ये पैर की अँगुलियो की अस्थियाँ होती है , इनकी संख्या 14 होती है |
  6. पटेल्ला (घुटना फलक) : यह घुटने की अस्थि होती है , यह प्याले के समान संरचना की होती है , इसके मध्य इसके छिद्र को जानुफलक कहते है |

संधियाँ (joints)

दो या अधिक अस्थियो के मध्य या अस्थि व उपास्थि के मध्य सम्पर्क स्थल को संधि कहते है , सन्धि के कारण कंकाल गति कर सकता है , गति के आधार पर संधियाँ तीन प्रकार की होती है |

  1. स्थिर या अचल संधि : ऐसी सन्धि में तंतुमय संयोजी उत्तक द्वारा अस्थियाँ दृढ़ता से जुडी रहती है , अस्थियों के मध्य अवकाश नहीं होता है |

उदाहरण – करोटी की अस्थियाँ

  1. आंशिक चल संधि : तनाव व एंठन के कारण अस्थियो में सिमित गति संभव हो पाती है , ऐसी सन्धि को आंशिक चल सन्धि कहते है , यह दो प्रकार होती है –
  • धुराग्र सन्धि : इसमें पाशर्व गति होती है , जैसे एटलस एक्सिस व कशेरुकाओ के मध्य सन्धि |
  • विसर्पी संधि : इस सन्धि में अस्थियाँ एक दूसरे पर विर्सपण करती है जैसे – कलाई की सन्धि , टखने की संधि |
  1. चल सन्धि : इस संधि से जुडी अस्थियाँ एक या अधिक दिशा में गति कर सकती है , इन अस्थियों के मध्य अवकाश (संधि कोटर) उपस्थित रहता है | इन संधियों पर तरल कचाभ पायी जाती है जो पोषण तथा संधि को स्नेह प्रदान करता है |

यह संधि तीन प्रकार की होती है –

  • कन्दुक खलिका संधि : इस संधि से जुडी अस्थियो में एक अस्थि चारो ओर गति कर सकती है जैसे – कंधे व श्रोणी की संधियाँ |
  • कब्ज़ा संधि : इस सन्धि से जुडी अस्थियाँ एक दिशा में गति कर सकती है , जैसे : कोहनी , घुटने व अँगुलियो की संधियाँ |
  • दीर्घ वृतज संधि : इस संधि से जुडी अस्थियाँ एक दूसरे पर सरकर गति कर सकती है जैसे – रेडियस , टखने , व कार्पल्स की संधियाँ |

मनुष्य में कंकाल तंत्र , कार्य , प्रकार , चित्र , संरचना , गमन एवं संचालन , अस्थि के प्रकार human skeletal system

गमन एवं संचालन

गमन : ऐसी गति जिसमे प्राणी का सम्पूर्ण शरीर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है अर्थात स्थान परिवर्तन होता है , गमन कहा जाता है |

गति के प्रकार –

  1. अमीबीय गति (Amoebaid movement) : यह गति कूटपादों द्वारा होती है जो अस्थायी प्रवर्ध होते है , कुपादों का निर्माण कोशिका द्रव्य के प्रवाह के कारण आकृति में परिवर्तन होने से होता है | अमीबा के बाह्य द्रव में एक्टिन व मायोसीन प्रोटीन के बने सूक्ष्म तन्तु होते है , एक्टिन तंतुओ से निर्मित प्लैज्मा व जैल मायोसीन की उपस्थिति में संकुचित होता है |
  2. पक्ष्माभी गति (ciliary movement) : पक्ष्माभो से होने वाली गति को पक्ष्माभी गति कहते है , पक्ष्माभ मुख्यतः प्रोटोजोआ के सदस्यों में मुख्यतः पैरामिशियम में पाये जाते है | पक्ष्माभ संकुचनशील सूक्ष्म नलिकाओ द्वारा बनते है , ये गति के अतिरिक्त अन्य कार्य भी करते है , मैरामिशियम में ये पक्ष्माभ आगे पीछे दोलन गति करते है जिससे प्राणी आगे की ओर गति करता है | युग्लिना ट्रिपेनोसोमा आदि में कक्षाभ द्वारा तरंगित गति होती है |
  3. पेशीय गति (muscular movement) : पेशीय के संकुचन से होने वाली गति को पेशीय गति कहते है , इस प्रकार की गति स्पंजो के अलावा सभी बहुकोशिकीय जीवों में होती है , मनुष्य में गमन पेशियों को संकुचनशीलता के कारण होता है | चलन में प्रयुक्त होने वाली पेशियाँ अस्थियो से संलग्न होती है , पेशियाँ संकुचन के कारण उपांगो की अस्थियो में गति उत्पन्न होती है , अस्थियों व पेशियों की समन्वित गति के फलस्वरूप गमन संभव होता है |

मनुष्य में कंकाल तंत्र (human skeletal system)

मानव शरीर का ढांचा हड्डियों का बना होता है , ढांचा बनाने वाले अंगो को सामूहिक रूप से कंकाल तन्त्र कहते है | कंकाल तंत्र दो प्रकार का होता है –

  • बाह्य कंकाल : बाह्य कंकाल की उत्पत्ति भ्रूणीय एक्टोडर्म या मिसोडर्म से होती है जैसे त्वचा , बाल , शल्क , फर्न आदि बाह्य कंकाल बनाते है |
  • अन्त: कंकाल : शरीर के अन्दर पाये जाने वाले इस कंकाल की उत्पत्ति भ्रूणीय मीसोडर्म से होती है , यह शरीर का मुख्य ढांचा बनाता है , यह मांशपेशियों से ढका होता है , यह दो भागों से बना होता है –
  1. अस्थि (bone) : यह ठोस कठोर मजबूत संयोजी उत्तक है , जो तन्तुओ व मेट्रिक्स से बना होता है , मैट्रिक्स में Ca व Mg के लवण पाये जाते है , इनके कारण अस्थियाँ कठोर होती है , प्रत्येक अस्थि के चारो ओर तंतुमय संयोजी उत्तक से निर्मित दोहरा आवरण पाया जाता है , इस आवरण के द्वारा लीगामेन्टस , टेंडन्स व दूसरी पेशियाँ जुडी रहती है |

मोटी व लम्बी अस्थियों में एक खोखली गुहा पायी जाती है जिसे मज्जागुहा कहते है , मज्जागुहा में एक तरल पदार्थ भरा होता है जिसे अस्थिमज्जा कहते है | अस्थिमज्जा मध्य पीली तथा शिरो पर लाल होती है | लाल अस्थि मज्जा RBC का निर्माण करती है जबकि पीली अस्थिमज्जा WBC का निर्माण करती है |

अस्थि के प्रकार

  • कलाजात अस्थि : यह त्वचा के नीचे संयोजी उत्तक की झिल्लियो से निर्मित होती है , इसे मेम्ब्रेन अस्थि भी कहते है , खोपड़ी की सभी चपटी अस्थियाँ कलाजात अस्थियां होती है |
  • उपास्थि जात अस्थि : कशेरुकी दण्ड , हाथ व पैरो की अस्थियाँ उपास्थिजात अस्थियाँ होती है |
  1. उपास्थि (cortilage) : यह अर्द्ध ठोस , पारदर्शक एवं ग्लाइको प्रोटीन से बने मैट्रिक्स का बना होता है , इसके मैट्रिक्स में इलास्टिन तन्तु व कोलेजन तन्तु भी पाये जाते है | उपास्थि बाह्य कर्ण , नाक की नोक व संधियों के मध्य स्थित होती है , मनुष्य के कंकाल में कुल 206 अस्थियाँ होती है | कंकाल तंत्र दो भागों का बना होता है |

A . अक्षीय कंकाल (axial skeleton) : शरीर के मुख्य अक्ष बनाने वाले कंकाल को अक्षीय कंकाल कहते है , इसमें मनुष्य की खोपड़ी , कशेरुकी खण्ड व वक्ष की अस्थियां आती है , अक्षीय कंकाल में कुल 80 अस्थियाँ होती है | ये 29 अस्थियाँ होती है जो सवीनो द्वारा परस्पर जुडी रहती है –

  • कपालीय अस्थियां : ये कुल 8 अस्थियां होती है , जो परस्पर दृढ़ता से जुड़कर अस्थिल कोष्ठ बनाती है , जिसमे मस्तिष्क सुरक्षित रहता है |
  • आननी अस्थियाँ : इनकी संख्या 14 होती है , ये नासिका दृढतालु उपरी व निचली जबड़े व खोपड़ी का अग्र भाग बनाती है |
  • कंठीका अस्थि : यह मुखगुहा के फर्श पर पायी जाने वाली एकल अस्थि है |
  • मध्य कर्ण की अस्थियाँ : ये 6 अस्थियां होती है , प्रत्येक कर्ण में तीन अस्थियाँ पायी जाती है –

मैलियस

इन्कस

स्टेपिज

  • कशेरुकी दण्ड (vertebral column) : यह अक्षीय कंकाल का दूसरा प्रमुख भाग है , कशेरुकी दण्ड में 33 कशेरुकीयें पायी जाती है , ऊपर की ओर खोपड़ी से व नीचे की ओर श्रेणी मेखला से जुडी होती है | ऊपर की प्रथम कशेरुकी की एक्सिस तथा दूसरी कशेरुकी का एटलस कहते है , इन दोनों में त्रिविमीय गति संभव है , सबसे अन्तिम कशेरुकी पुच्छ कशेरुकी कहलाती है |

B . अनुबंधी कंकाल (appendicular skeleton) : मनुष्य की अंश मेखला , श्रेणी मेखला , अग्र व पच्छ पाद की अस्थियाँ मिलकर अनुबंधी कंकाल का निर्माण करती है , मनुष्य के अनुबन्धी कंकाल में 126 अस्थियां होती है |

 

वृषण तथा अण्डाशय क्या है , कार्य , प्रभाव , लक्षण , संरचना , चित्र Testes and ovaries in hindi

वृषण (Testes) : वृषण शुक्रजनन द्वारा शुक्राणु उत्पन्न करने के अतिरिक्त हार्मोन का स्त्राव भी करते है , वृषण की शुक्रजनन नलिकाओ (सेमेनीफेरस नलिकाओं) द्वारा शुक्राणु उत्पन्न होते है इन कोशिकाओ के बीच अनेक अन्तस्त्रावी कोशिकाएँ धँसी रहती है जिन्हें अन्तराली कोशिकाएँ या लैंडिंग कोशिकाएं कहते है | अन्तराली कोशिकाओ द्वारा नर लिंगी हार्मोन का स्त्राव होता है , ये नरलिंगी हार्मोन टेस्टेस्टेरॉन व एन्ड्रोस्टेरॉन होते है , ये हार्मोन नर में गौण लैंगिक लक्षणों का विकास करते है , जैसे आवाज का भारी होना , दाढ़ी मूंछो का विकसित होना , मांशपेशियों का विकसित होना , मैथुन इच्छा , आक्रामकता आदि , टेस्टेस्टेरॉन शुक्रजनन के लिए भी आवश्यक है |

अण्डाशय (ovaries)

मादा में एक जोड़ी अण्डाशय पाये जाते है , इसका प्रमुख कार्य अण्डजनन है , इसके अतिरिक्त इसकी ग्राफी पुटिकाओ द्वारा स्टेरॉइड प्रकृति के हार्मोन स्त्रवित होते है , ये दो प्रकार के होते है –

  1. एस्ट्रोजन : ग्राफी पुटिकाओ से स्त्रवित यह हार्मोन मादा में द्वितीय लैंगिक लक्षणों जैसे स्तनों का विकास , आवाज का महीन होना , नितम्ब का भारी होना , मासिक चक्र प्रारम्भ होना , शालीनता एवं मैथुन इच्छा जाग्रति का विकास होना आदि लक्षण विकसित होते है |
  2. प्रोजेस्ट्रॉन : कोपर्स ल्यूटियम द्वारा स्त्रवित यह हार्मोन मादा में स्तनों के विकास एवं दूध स्त्रवण को प्रेरित करता है साथ ही गर्भाधारण को प्रेरित करता है | एस्ट्रोजन की कमी से द्वितीय लैंगिक लक्षणों के विकास में कमी तथा मासिक चक्र में अनियमितता आ जाती है , एस्ट्रोजन की अधिकता से मासिक चक्र में अनियमितता के साथ कैंसर भी हो सकता है |

हार्मोन क्रिया की आण्विक क्रियाविधि

हार्मोन कोशिकाओ की उपापचय दर में वृद्धि करते है , हार्मोन की सूक्ष्म मात्रा ही कोशिकाओं की क्रियाशीलता को प्रभावित करने में सक्षम होती है | हार्मोन के कोशिकाओ की सक्रियता एवं उपापचय दर पर प्रभाव के आधार पर इनकी क्रियाविधि को तीन श्रेणियों में बाँट सकते है –

  1. कोशिका कला की पारगम्यता में परिवर्तन : कोशिकाओ की कोशिका कला में ग्राही प्रोटीन होती है जो सोडियम आयन पोटेशियम आयन , कैल्शियम आयन आदि के आवागमन के लिए चैनल की भांति कार्य करती है | हार्मोन ग्राही प्रोटीन से संयोग कर चैनल को बंद कर देते है जिससे आयनों की पारगम्यता प्रभावित हो जाती है , इस परिवर्तन के कारण ही लक्ष्य कोशिकाओ की उपापचय सक्रियता बदल जाती है |
  2. जींस के माध्यम से उपापचयी परिवर्तन : स्टिरोइड हार्मोन लिपिड में घुलकर कोशिका द्रव्य में प्रवेश करते है , कोशिका द्रव्य में ग्राही प्रोटीन से संयोजित होकर समिक्ष अणु (complex molecule) का निर्माण करते है , यह समिक्ष अणु केन्द्रक द्रव्य में प्रवेश कर विशेष जीन को प्रभावित करता है , सक्रीय जीन MKNA का निर्माण करने लगता है | MRNa कोशिका द्रव्य में विशेष प्रोटीन का संश्लेषण करने लगता है , यह संश्लेषित प्रोटीन कोशिका की सक्रियता को प्रभावित करती है , इस प्रकार हार्मोन का प्रभाव प्रदर्शित हो जाता है |
  3. द्वितीय संदेशवाहक से उपापचय में परिवर्तन

एड्रीनल ग्रन्थि के हार्मोन व प्रोटीन हार्मोन कोशिका कला से पारगमित नहीं हो पाते है , इनकी क्रियाविधि को सदरलैंड ने 6 चरणों में समझाया है –

  • लक्ष्य कोशिका की कोशिका कला पर उपस्थित ग्राही प्रोटीन हार्मोन के सम्पर्क में आने से उद्दीप्त हो जाती है |
  • उद्दीप्त ग्राही प्रोटीन अणु कोशिका कला के भीतर उपस्थित प्रोटीन को सक्रीय करती है |
  • G प्रोटीन का सक्रीय अणु कोशिका कला में उपस्थित एडीनिलेट साइकलेस एंजाइम के अणु को उद्दीप्त करता है |
  • सक्रीय एडिनिलेट साइकलेस एंजाइम ATP को CAMP में बदल देता है |
  • सक्रीय CAMP के द्वारा काइनेज एन्जाइम सक्रीय हो जाते है , जो एंजाइम तंत्र को सक्रीय कर देते है |
  • यह सक्रीय एंजाइम तंत्र कोशिका की उपापचयी क्रियाओ के विभिन्न एंजाइम की क्रियाशीलता को प्रभावित करते है |

अन्य स्त्रावी अंग

  1. वृक्क की जास्ट्रा मेड्युलरी कोशिकाएँ : रेनिन – एल्डोस्टेरोन के स्त्राव को प्रेरित करता है |
  2. त्वचा : विटामिन डी – अस्थियों के निर्माण में Ca++ के अवशोषण में सहायक है |
  3. अपरा : अपरा लेक्टोजन – गर्भावस्था को बनाए रखने में सहायक है |

अग्नाशय ग्रंथि , कार्य , स्थिति , संरचना चित्र , अधिवृक्क ग्रन्थि , हार्मोन pancreas gland in hindi

pancreas gland in hindi  अग्नाशय ग्रंथि

स्थिति : यह ग्रहणी के समीप स्थित होती है |

pancreas gland in hindi

संरचना : यह मिश्रित ग्रन्थि होती है , यह पत्ती के समान लगभग 15cm लम्बी व 85gm भार की होती है , इसकी पालियो के बीच बीच में अन्त: स्त्रावी कोशिकाएँ होती है जिन्हें लैंगर हैन्स के द्वीप कहते है | इनकी खोज 1869 में लैंगर हेंस ने की थी , ये कोशिकाएँ तीन प्रकार की होती है –

  1. एल्फा कोशिकाएँ = 25%
  2. बीटा कोशिकाएँ = 60/65%
  3. डेल्टा कोशिकाएं = 10%
  4. एल्फा कोशिकाएं (alpha cells) : ये मध्यम आकार की कोशिकाएँ होती है , इन कोशिकाओ द्वारा ग्लूकैगोन हार्मोन का स्त्राव होता है जो रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को बढाता है | यह यकृत में ग्लूकोजियोलाइसिस को प्रेरित करता है , यह यकृत में ग्लूकोनियोजिनेसिस को प्रेरित करता है | इसे हाइपरग्लाइसिमिक कारक भी कहते है , ग्लूकैगोन की खोज किम्बल व मर्लिन ने 1932 में की थी |
  5. बीटा कोशिकाएं : ये बड़े आकार की कोशिकाएँ होती है , इन कोशिकाओ द्वारा इन्सुलिन हार्मोन का स्त्राव होता है | इस हार्मोन को बेंटिक व बेस्ट (1921) में निष्कर्षण किया |

एबल ने इसके रर्वे प्राप्त किये | सेंगर ने इन्सुलिन की संरचना व इसकी प्रोटीन प्रकृति का पता लगाया , इस कार्य के लिए सेंगर को 1958 का नोबल पुरस्कार दिया गया |

कार्य : यह हार्मोन रुधिर में ग्लूकोज की मात्रा का नियमन करता है , यह रक्त में ग्लूकोज को बढ़ने से रोकता है |

प्रभाव :

कमी से :

इन्सुलिन के कम स्त्राव से मधुमेह रोग हो जाता है , इस रोग के दौरान रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है , जो मूत्र के साथ बाहर निकलने लगती है |इस रोग का उपचार इंसुलिन थैरेपी द्वारा किया जाता है |

अधिकता से :

इन्सुलिन के अधिक स्त्राव से रक्त में ग्लूकोज की मात्रा कम हो जाती है जिसे हाइपोग्लसिमिया कहते है , इस रोग के दौरान तेज पसीना चिडचिडापन , दृष्टि ज्ञान कम तथा जनन क्षमता भी कमी हो जाती है |

  1. डेल्टा (delta) कोशिकाएँ : ये कोशिकाएं छोटी आकार की कोशिकायें होती है , इन कोशिकाओ द्वारा सामेटोस्टेटिन हार्मोन स्त्रवित होता है , यह हार्मोन भोजन के पाचन , अवशोषण व स्वांगीकरण को बढाता है |

अधिवृक्क ग्रन्थि (adrenal gland)

स्थिति : प्रत्येक वृक्क के ऊपर टोपी के समान रचना के रूप में स्थित होती है |

संरचना : यह पीले भूरे रंग की होती है , इसका वजन 4-6 ग्राम का होता है , इसका बाहरी भाग वल्कुट व मध्य भाग मध्यांश कहलाता है , इस ग्रन्थि का उद्भव मिजोडर्म व एक्टोडर्म द्वारा होता है |

  1. वल्कुल : अधिवृक्क वल्कुट के तीन भाग –
  • जोनाग्लोमेरुलोसा
  • जोना फेसीकुल्टो
  • जोना रेटिकुलेरिस

इन तीनो भागों से अलग अलग हार्मोन स्त्रवित होते है जिन्हें सामूहिक रूप से कोटिकोस्टेराइड कहते है , ये हार्मोन निन है –

  • मिनरैलोकोर्टीकोइटस : यह जोनाग्लोमेरुलोसा द्वारा स्त्रवित होता है , इसमें मुख्यतः एल्डोस्टेरोन होते है , यह हार्मोन Na, K , Cl व जल की उपयुक्त मात्रा शरीर में बनाए रखने में सहायक है |
  • ग्लूकोकोर्टीकाइडस : यह कोर्तिसोन प्रकार के होते है , ये अंग प्रत्यारोपण घठिया व दया के उपचार में सहायक है , ये यकृत में एमीनो अम्लों का ग्लूकोज में परिवर्तन कर ग्लूकोज का रक्त में नियमन करते है , ये प्रतिरक्षी निषेधात्मक प्रदाह विरोद्धी व एन्टीएलर्जिक प्रकृति के होते है |
  • लिंगी हार्मोन : यह जोना रेटिकुलेरिस द्वारा स्त्रवित होता है , इनमे एंड्रोजन , एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रोन के सूक्ष्म मात्रा पायी जाती है , ये हार्मोन बाह्य जनन अंगो व यौन व्यवहार की प्रभावित को प्रभावित करते है |

अधिवृक्क मध्यांश के हार्मोन

मेड्युला की क्रोमोफिल कोशिकाओ से दो प्रकार के हार्मोन स्त्रवित होते है –

  1. एड्रीनेलिन : एड्रिनेलिन हार्मोन संकटकालीन परिस्थितियों का सामना करने के लिए मानव शरीर को प्रेरित करता है |यह अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र की क्रियाओ को संचालित करता है | अरैखित पेशियों को उत्तेजित करता है , जिससे रक्त दाब बढ़ना , ह्रदय की धडकन बढना , आँखे चौड़ी , व पुतली फैल जाना , रौंगटे खड़े होना , पसीना आना , ग्लाइकोजन का ग्लूकोज में परिवर्तन होना आदि | मानसिक तनाव , गुस्से तथा डर के समय यह हार्मोन अधिक स्त्रवित होता है |
  2. नॉर एड्रीनेलिन : यह हार्मोन एड्रिनेलिन के द्वारा नियमित होने वाली क्रियाओ को प्रेरित करता है , एड्रीनल मेड्युला को 3f ग्रन्थि भी कहते है , क्योंकि यह भय (Fear) संघर्ष (Fight) व पलायन (Flight) अनुक्रिया ऊत्पन्न करता है |

एड्रीनल ग्रन्थि को 4S ग्रंथि भी कहते है क्योंकि यह प्रतिक्रिया (stress) , शर्करा (Sugar) , लवण (salt) व लैंगिक विकास (sex) से सम्बन्धित क्रियाओं का नियमन करती है |

प्रभाव :

कमी से :

  • एडिसन रोग : यह मिनरेलोकार्टीकाइट की कमी से उत्पन्न होता है इसमें सोडियम आयनों की रक्त हो जाती है जिससे शरीर में निर्जलीकरण हो जाता है , इस रोग में रक्त दाब व शरीर ताप घट जाते है त्वचा कांस्य वर्ण हो जाती है , भूख कम , घबराहट व मितली होने लगती है |
  • कोंस रोग : यह भी मिनरेलोकार्टीकाइट की कमी से उत्पन्न होता है , इस रोग के दौरान सोडियम व पौटेशियम लवणों का संतुलन बिगड़ जाता है , पेशियों में अक्कड़न होने लगती है |

अधिकता से :

  • कुशिंग रोग : यह रोग ग्लूकोकार्टीकाईट की अधिकता से उत्पन्न होता है , इस रोग के दौरान शरीर में वसा का जमाव होने लगता है जिससे चेहरा लाल , गोलू व पेट फूल जाता है , परिणामस्वरूप शरीर भोंडा (बदसूरत) दिखाई देने लगता है |
  • एड्रीनल विरिलिज्म : यह लिंगी हार्मोन की अधिकता से उत्पन्न होता है , इस रोग के दौरान लड़कियो में लड़को जैसे लक्षण उत्पन्न हो जाते है |
  • आइनी कौमैस्ट्रिया : यह भी लिंगी हार्मोन की अधिकता से उत्पन्न होता है , इस विकार के दौरान स्त्रियों में नर जनन अंग बनने लगते है ऐसी स्त्रियाँ बाँझ होती है इसे आभासी उभयलिंगता कहते है , इस विकार के दौरान लडको में स्तन उभर आते है |
  • इडीमा : यह विकार मिनरेलोकोर्टिकाइड की अधिकता से उत्पन्न होता है , इस विकार के दौरान रक्त में सोडियम आयन व जल की मात्रा बढ़ जाती है , शरीर जगह जगह से फूल जाता है , रोगी को लकवा भी हो सकता है |