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hybrid variety in hindi संकर पादप किस्म क्या है सम्मिश्र पादप किस्म (Composite variety) संश्लिष्ट पादप किस्म (Synthetic variety)

पढ़िए hybrid variety in hindi संकर पादप किस्म क्या है सम्मिश्र पादप किस्म (Composite variety) संश्लिष्ट पादप किस्म (Synthetic variety) ?

पौधशाला स्रोत (Nursery source ) :-

श्रेष्ठ पौधों से 250 से 450 अंतःप्रजात वंशक्रम का चयन

चयनित वंशक्रम द्वारा संश्लिष्ट किस्म ← बहुल संकर संतति परीक्षण

30 से 60 पौधों → संश्लिष्ट किस्म का बीजों का गुणन एवं कृषकों

का बहुल संकरण विकास व नामकरण को वितरण

बहुल संकरण प्रक्रिया द्वारा संश्लिष्ट किस्म का विकास – फ्लो चार्ट

  1. संग्रथित किस्में (Compositve varieties)

संग्रथित या सम्मिश्र किस्मों का विकास दो किस्मों (Varieties) या उपजातियों (Races) के संकरण से किया जाता है। इन किस्मों के क्रास के बाद उत्पन्न F, या F, पीढ़ी के पौधों से प्राप्त बीजों को उचित मात्रा में मिला कर, इससे अगली पीढ़ी के पौधे तैयार करते हैं, इन पौधों को संग्रथित या सम्मिश्र किस्म (Composite variety) कहा जाता है ।

संग्रथित किस्मों के विकास या उत्पादन की संपूर्ण प्रक्रिया लगभग 5-6 सोपानों में सम्पूर्ण होती है। इन चरणों अथवा सोपानों का विधिवत व्यवस्था क्रम एवं इनमें सम्पन्न प्रक्रम अग्र प्रकार से है :-

परपरागित फसलों में लोकप्रिय एवं बहुउपयोगी सम्मिश्र किस्में मक्का (Maize) में विकसित की गई है, विजय, अम्बर एवं विकास ऐसी ही कुछ मक्का की सम्मिश्र किस्मों के उदाहरण है।

सर्वथा संकर किस्में (Exclusive hybrid varieties)

सामान्यतया संकर किस्मों का विकास बहुधा पर परागित फसलों में किया जाता है। हालांकि कुछ स्वपरागित पौधों, जैसे-मटर एवं टमाटर इत्यादि में भी संकर किस्मों का उत्पादन किया गया है। क्योंकि स्वपरागित पौधों में संकर किस्मों के उत्पादन हेतु अपनायी जाने वाली प्रक्रिया में हस्तविपुंसन (Emasculation) एवं कृत्रिम परागण (Artificial pollination) जैसे प्रक्रम (Steps) अत्यधिक खर्चीली एवं श्रमसाध्य विधियाँ है अतः प्रायः इनके उत्पादन हेतु नरबन्ध्यता क्रमों (Male sterile lines) का भी उपयोग किया जाता है। परंतु प्रत्येक स्वपरागत फसल में नर बन्ध्यता क्रमों का प्रयोग सदैव ही आवश्यक नहीं है।

आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण फसल उत्पादक पौधों, जैसे- कपास, में अनेक संकर किस्मों (Hybrid varieties) का विकास किया जा चुका है। अतः प्रजनन (Inbreeding) के , गेहूँ, बैंगन एवं अन्य कई उदाहरणों कारण विकसित स्वपरागित या परपरागित फसलों में संकर ओज (Heterosis) पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। अत: F, संतति पीढ़ी में प्राप्त पौधे नर एवं मादा दोनों जनक पौधों की तुलना में अनेक लक्षणों में उच्चतर (Superior) एवं जीवनक्षम (Virgorous) होते हैं। इनकी उत्पादन क्षमता भी उच्च स्तर (High yielding) की होती है। F, संकर पीढ़ी में बेहतर गुणवत्ता स्पष्टतया परिलक्षित होने के पश्चात ही संकर पादप किस्मों का आगे निर्माण किया जा सकता है। स्वपरागित फसलों की तुलना में संकर पौधों का निर्माण परपरागित किस्मों में अधिक किया जाता है क्योंकि इनमें परागण क्रिया मुक्त रूप (Open pollination) होती रहती है।

संकर, सम्मिश्र एवं संश्लिष्ट नव विकसित पौधों में हालांकि अनेक समानताएँ पाई जाती हैं, फिर भी उपरोक्त सभी किस्में अनेक महत्त्वपूर्ण लक्षणों में भिन्नता प्रदर्शित करती हैं । उपरोक्त तीनों पादप किस्मों का तुलनात्मक अध्ययन निम्न प्रमुख लक्षणों अथवा विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए किया जा सकता है-

संकर पादपं किस्म (Hybrid variety)सम्मिश्र पादप किस्म (Composite variety)संश्लिष्ट पादप किस्म (Synthetic variety)
इस पादप किस्म के विकास के लिये 2 से 4 जनक पौधे प्रयुक्त किये जाते हैं।

यहाँ अंत:प्रजात प्रकृति के जनक पादप उपयोग में लाये जाते हैं।

इन किस्मों के विकास में परागण क्रिया को नियंत्रित (Controlled) किया जाता है।

इनमें संकर ओज (Hybrid | vigour) की मात्रा अधिक होती है।

इन किस्मों के विकास में सामान्य संयोजन क्षमता का परीक्षण किया जाता है ।

इनमें प्राय: केवल F, पीढ़ी के बीजों का ही उपयोग किया जाता है।

यहाँ प्रत्येक वर्ष बीजों को बदला जाता है, एवं इनकी कीमत भी अधिक होती है।

संकर किस्मों के विकास की प्रक्रिया में इनकी देखभाल अपेक्षाकृत कठिन होती है ।

जनक पौधों की संख्या 2 से अधिक होती है।

यहाँ संकर या विषम युग्मजी पादप जनक के रूप में उपयोगी होते हैं।

परागण मुक्तरूप में (Open pollination)संचालित होता है।

यहाँ संकर ओज, अपेक्षाकृत कम क्षमतावान होती है।

प्रायः संयोजन क्षमता का परीक्षण संयोजन नहीं होता ।

इनके विकास में F पीढ़ी तक की संततियों के बीजों का उपयोग

यहाँ 3-4 वर्ष बाद बीजों को बदला जाता है व बीजों की कीमत कम होती है।

किस्मों की देखभाल आसान होती है।

जनक पौधे 4 से 10 होते हैं।

जनक अंत:प्रजात (Inbreds) होते हैं, कभी कभी क्लोन्स का प्रयोग भी होता है।

अविचारित (Random ) प्रकार की मुक्त परागण क्रिया संचालि होती है।

इनमें संकर ओज की मात्रा बाकी दोनों की तुलना में कम होती है।

संयोजन क्षमता का परीक्षण किया जाता है ।

F, से F पीढ़ियों तक के बीजों का उपयोग किया जाता

बीजों को 3-4 वर्ष की अवधि में बदला जाता है तथा बीजों की कीमत सबसे कम होती है।

देखभाल आसान होती है।

कायिक प्रवर्धित फसलों में संकरण (Hybridization in vegetatively propagated crops)— जैसा कि हम जानते हैं कि कुछ पौधों में व्यावसायकि रूप से फसल का उत्पादन कायिक अंगों के प्रवर्धन द्वारा किया जाता है, जैसे-गन्ना, आलू व केला इत्यादि में, अत: इनको कायिक प्रवर्धित कृष्य पौधे (Vegetatively propagated cultivated crop plants) कहा जा सकता है। पादप प्रजननविज्ञानियों द्वारा कभी-कभी इन पौधों की गुणवत्ता में सुधार के लिए या इन किस्मों में इच्छित लक्षणों के समावेश के लिए संकरण की विधि का उपयोग भी किया जाता है। इस संकरण विधि के महत्त्वपूर्ण सोपान निम्न प्रकार से है (चित्र 13.6 ) :-

  1. प्रथम वर्ष – संकरण (Cross) की प्रक्रिया प्रारम्भ करवाने से पूर्व इस वर्ष में जनक पीढ़ी के पौधों का चुनाव किया जाता है। यह संकरण का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चरण है क्योंकि जनकों के चुनाव में इच्छित लक्षणों की उपस्थिति का ध्यान रखा जाता है। जनक पौधों में वांछित लक्षणों का पाया जाना ही इनके चुनाव का आधार है, किसी लक्षण विशेष को आने वाली पीढ़ी में विकसित करने के लिये ही कायिक प्रवर्धित फसलों में संकरण (Hybridization) अपनाया जाता है।
  2. द्वितीय वर्ष – सामान्यतया पुष्प युक्त कायिक प्रवर्धित फसल उत्पादक पौधों में परपरागण क्रिया ही पाई जाती है, अत: इस परागण क्रिया का उपयोग करते हुए F, पीढ़ी के बहुसंख्य पौधे तैयार किये जाते हैं। इनकी संख्या 6 से 11 हजार तक हो सकती है।

अब F, पीढ़ी के पौधों को उपयुक्त दूरी पर लगाया जाता है, तथा इनमें से 600 से 1100 सर्वश्रेष्ठ पौधों को छाँटा जाता है। दुर्बल एवं अनिच्छित लक्षण वाले पौधों को हटा दिया जाता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया में स्थान, कीमत एवं समय की बचत का विशेष ध्यान रखा जाता है।

  1. तृतीय वर्ष-उपरोक्त सर्वश्रेष्ठ इच्छित लक्षणों से युक्त F, पीढ़ी के पौधों से अलग-अलग क्लोन्स (Clones) तैयार किये जाते हैं। इन क्लोन्स के गुणों का परीक्षण मानक (Standard) किस्म के साथ किया जाता है । परीक्षण के बाद 100 से 2500 सर्वश्रेष्ठ क्लोन्स का चयन किया जाता है।
  2. चौथा वर्ष – इस वर्ष चयनित सर्वश्रेष्ठ क्लोन्स का प्राथमिक पैदावार परीक्षण (Primary yield test) मानक किस्मों के साथ किया जाता है। यही नहीं, कुछ चयनित क्लोन्स का परीक्षण तो विभिन्न परीक्षण केन्द्रों पर किया जाता है।
  3. पाँचवें से नवाँ वर्ष – सर्वश्रेष्ठ क्लोन्स को विभिन्न केन्द्रों पर तैयार किया जाता है, एवं उनकी उत्पादन क्षमता का आंकलन भी किया जाता है। मानक किस्म (Standard variety) की तुलना में अधिक पैदावार देने वाले एवं अन्य गुणों में बेहतर क्लोन्स को छाँट कर एक नई किस्म का नाम दे दिया जाता है।
  4. दसवाँ वर्ष – नामांकित बेहतर किस्म के क्लोन्स का गुणन (Multiplication) कर इनको कृषकों के उपयोग हेतु मुक्त कर दिया जाता है।

कायिक प्रवर्धित कृष्य पौधों के संकरण में प्रमुख बाधाएँ या समस्याएँ (Major problems in vegetative crops)—यहाँ संकरण की विधि इतनी सरल दिखाई देती है, उतनी ही बाधाऐं एवं विषमताएँ इसके क्रियान्वयन में सामने आती है, इनमें से प्रमुख निम्न प्रकार से है :-

,

  1. कायिक प्रवर्धित कृष्य पौधों में पुष्पन (Flowering) सामान्यतया कम होता है तथा अल्प जनन क्षमता (Fertility) वाले होते हैं ।
  2. इनका आनुवंशिक विश्लेषण या आंकलन (Genetic assessment) भी कठिन होता है।
  3. इनका जीवन चक्र बहुवर्षीय होता है ।

अनेक फसल उत्पादक पौधों, जैसे- केला, सेब व आम आदि में तो पुष्पीकरण तो बहुतायात से होता है परंतु फल कम उत्पन्न होते हैं, अतः यहाँ श्रेष्ठ क्लोन्स का उपयोग संकरण प्रक्रिया में नहीं कर सकते।

क्लोन्स के विकास में संकरण का योगदान (Role of hybridization in clonal development)- यहाँ अनेक प्रकार के अंतर्जातीय संकरण प्रयोगों का उपयोग क्लोन्स के द्वारा की जाने वाली कायिक प्रवर्धित फसलों को सुधारने में सफलतापूर्वक किया गया है । अनेक नई पादप किस्मों की उत्पत्ति अंतरप्रजातीय संकरण (Interspecific hybridization) के द्वारा की गई है। जैसे-आम की आम्रपाली किस्म प्रथम पीढ़ी (F) संकर है जिसे IARI में विकसित किया गया। इस किस्म को लखनऊ की दशहरी व तमिलनाडु की नीलम किस्मों में संकरण करवाकर प्राप्त किया गया है। आम्रपाली किस्म में जनक पीढ़ी के लक्षणों के अलावा अन्य लक्षण, जैसे- पौधे का छोटा होना, फल में गूदा व B केरोटीन की अधिक मात्रा जैसे लक्षण भी हैं। आलू में कुफरी कुबेर किस्म का विकास सोलेनम की दो प्रजातियों क्रमशः सोलेनम ट्यूबेरोसम (Solanum tuberosum) एवं सोलेनम कर्टीलोबम (Solanum curtilobum) के क्रॉस या संकरण के द्वारा किया गया है। आलू की अन्य किस्में जैसे कुफरी अलंकार, कुफरी सिंधुरी, कुफरी ज्योति आदि भी संकरण विधि द्वारा विकसित की गयी है। कुफरी ज्योति लेट ब्लाइट रोग के प्रति प्रतिरोधक किस्म है। इसी प्रकार अंतरजातीय संकरण द्वारा गन्ने में भी अनेक बेहतर गुणवत्ता एवं उत्पादन वाली किस्मों का विकास किया गया है। इनमें शर्करा की अधिक मात्रा, उच्च पैदावार एवं अधिक रोग प्रतिरोधी क्षमता देखी गई है। जैसे – CO1148, CO1158, COS510, COS109, CO541 आदि।

अभ्यास-प्रश्न

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न (Very short answer questions) :

  1. विपुंसन प्रक्रिया में पुष्प के किस भाग को हटाया जाता है ?
  2. संश्लिष्ट किस्म (Synthetic variety) में कितने जनक पौधे होते हैं?
  3. संकरण की परिभाषा दीजिये ।
  4. संकरण कितने प्रकार का होता है ?
  5. संकरण अन्नोत्पादक फसलों में उपलब्धियां बताइये ।

लघूत्तरात्मक प्रश्न ( Short Answer Questions ) :

1.कायिक प्रवर्धन के लाभ बताइये ।

  1. संकर पादप किस्म के गुण बताइये ।
  2. अंतःप्रजात संकरण का विवरण दीजिए ।

निबन्धात्मक प्रश्न (Essay type Questions) :

  1. संकरण से क्या तात्पर्य है? यह कितने प्रकार का होता है? संकरण की कार्यप्रणाली के विभिन्न चरणों का विवरण दीजिए ।
  2. प्रतीप संकरण क्या है? एक प्रभावी जीन का स्थानान्तरण इस प्रक्रिया द्वारा कैसे किया जा सकता है? समझाइये।
  3. विपुंसन की परिभाषा दीजिए। यह कितने प्रकार का होता है। इसकी क्रियाविधि को विस्तार से समझाइये।
  4. स्वपरागित फसलों में प्रयुक्त होने वाली संकरण की विभिन्न विधियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए ।
  5. कायिक प्रवर्धित फसलों में संकरण प्रक्रिया को विस्तार से समझाइये |
  6. वंशावली विधि का विस्तृत विवरण दीजिए, इसे किस प्रकार की फसलों में उपयोग में लाया जाता है?
  7. प्रपुंज (Bulk) विधि का विस्तृत विवरण दीजिए ।
  8. पुनरावर्ती चयन को परिभाषित कीजिए एवं इसकी विभिन्न प्रक्रियाओं का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

टिप्पणी लिखिए-

  1. क्रॉसिंग या परागण
  2. अप्रभावी जीन स्थानान्तरण
  3. सरल पुनरावर्ती चयन
  4. संश्लिष्ट किस्में
  5. हस्तविपुंसन
  6. हस्तपरागण
  7. संयोजन क्षमता H. क्लोन्स ।

उत्तरमाला (Answers)

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न / रिक्त स्थानों की पूर्ति :

  1. परागकोषों को
  2. 4 से 10