कार्नो इंजन क्या है , सिद्धांत , कार्यप्रणाली , भाग , चित्र वर्णन (carnot engine in hindi)

(carnot engine in hindi) कार्नो इंजन क्या है , सिद्धांत , कार्यप्रणाली , भाग , चित्र वर्णन : इस प्रकार का इंजन हमारे रेफ्रिजरेटर और a.c में लगा रहता है।
इस इंजन में दो समतापी उत्क्रमणीय प्रक्रम होते है तथा दो ही रुद्धोष्म उत्क्रमणीय प्रक्रम होते है।
कार्नो इंजन एक आदर्श ऊष्मा इंजन ही होता है , यह एक सैद्धांतिक इंजन का रूप है , इस इंजन को बनाने में प्रायोगिक दोषों से मुक्त करके बनाया गया है।

कार्नो इंजन का सिद्धान्त (carnot engine principle)

जैसा की हम जानते है कि अनुत्क्रमणीय इंजन की दक्षता का मान उत्क्रमणीय इंजन की तुलना में बहुत कम होती है , दक्षता बढ़ाने के लिए दहन कक्ष में उत्पन्न होने वाले ताप का मान बढ़ा देना चाहिए , दहन कक्ष में ताप का मान बढ़ने से इंजन की दक्षता बढ़ जाती है।
उत्क्रमणीय इंजन की दक्षता का मान समान ताप पर हमेशा समान रहता है चाहे ताप किसी भी ईंधन से प्राप्त किया जाए , अगर उत्पन्न ताप का मान समान है तो दक्षता का मान भी समान होगा।
वैज्ञानिक लियोनार्ड कार्नाट ने ” एक ऐसे इंजन की कल्पना की जिसमे उत्पन्न पूरी ऊष्मा का इस्तेमाल कार्य के रूप में रूपांतरित करने में किया जाए अर्थात इस इंजन में किसी भी प्रकार की ऊष्मा या उर्जा का कोई नुकसान न हो , इसे कार्नो इंजन कहा गया। “
चूँकि हम जानते है कि किसी भी युक्ति की दक्षता का 100% नहीं होती है , उसमे किसी न किसी प्रकार की ऊर्जा हानि अवश्य होती है इसलिए ही कार्नो इंजन को एक कल्पना और आदर्श ऊष्मा इंजन कहा जाता है।  लेकिन यह इंजन व्यवहार में प्राप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि किसी भी इंजन की दक्षता का मान 100% प्राप्त नहीं किया जा सकता।

कार्नो इंजन के भाग (parts of carnot engine)

कार्नो इंजन को मुख्य रूप से चार भागो में बांटा गया है जैसा चित्र में दर्शाया गया है –
1. इसके पहले भाग में आधार चालक होता है तथा इसकी दीवारें कुचालक पदार्थ की बनी होती है , इसमें कार्यकारी पदार्थ के रूप में आदर्श गैस भरी होती है तथा एक पिस्टन लगा रहता है जिसके घर्षण को शून्य माना जाता है।
2. source (स्त्रोत) : यह उच्च ताप उत्पन्न करने का साधन होता है जहाँ से जरुरत अनुसार कितनी भी ऊष्मा का भंडार उत्पन्न किया जा सकता है।
3. सिंक (sink) : यह उच्च ताप को ग्रहण करने की क्षमता रखता है , इसका ताप निम्न होता है तथा स्त्रोत का ताप उच्च होता है अर्थात स्त्रोत में उत्पन्न ऊष्मा निम्न ताप (सिंक) की तरफ गति करता है और यह उस ताप को ग्रहण कर लेता है।
4. स्त्रोत और सिंक के मध्य में एक कुचालक स्टैंड लगा रहता है जैसा चित्र में दिखाया गया है।

 

प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर क्या है , सिद्धांत , कार्यविधि , कौनसी गैस काम आती है (Refrigerator in hindi)

(Refrigerator in hindi) प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर क्या है , सिद्धांत , कार्यविधि , कौनसी गैस काम आती है : हम ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम पढ़ चुके है जिसके अनुसार जब किसी ठंडी वस्तु को गर्म वस्तु के सम्पर्क में लाया जाता है तो ठंडी वस्तु गर्म होने लगती है और गर्म वस्तु ठण्डी होने लगती है।

और हम यह भी पढ़ चुके है कि इसी सिद्धांत पर ऊष्मा इंजन भी इसी सिद्धांत पर कार्य करता है।

लेकिन प्रशीतक ऊष्मा इंजन के बिल्कुल विपरीत सिद्धान्त पर कार्य करता है।

प्रशीतक में एक वाष्प अवस्था में गैस काम में ली जाती है तो वस्तु से ऊष्मा उत्सर्जित करने में मदद करती है और वस्तु को ठण्डा कर देती है।

अर्थात जैसे उष्मा इंजन में जैसे इंजन स्रोत से ऊष्मा ले रहा था और कुछ कार्य करने के बची ऊष्मा को सिंक में दे देता है वैसे ही यहाँ होगा लेकिन इसका बिल्कुल विपरीत होगा।

यहाँ प्रशीतक सिंक अर्थात वस्तु से ऊष्मा लेता है और इस ऊष्मा का कुछ भाग कार्य में परिवर्तित करने के बाद बची ऊष्मा को गर्म वस्तु अर्थात स्रोत मे दे देता है जिससे सिंक (वस्तु) और अधिक ठंडा हो जाता है।

प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर की कार्यप्रणाली या कार्य विधि (working of Refrigerator)

प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर के दो हिस्से होते है एक जहाँ बर्फ जमती है और दूसरा जहाँ वस्तुएं ठंडी होती है लेकिन बर्फ नहीं जमती है।  फ्रिज के दोनों हिस्से ही ऊष्मा विनमय के लिए चारो तरफ से पाइप से घिरे हुए होते है। प्रशीतक के नीचे एक भारी धातु की बनी युक्ति लगी रहती है जिसे कम्प्रेसर कहते है इस कम्प्रेसर को चलाने के लिए एक इलेक्ट्रिक मोटर लगी रहती है। और जिन पाइप के द्वारा अधिक ऊष्मा विनिमय की आवश्यकता होती है वो पाइप कुंडलित होती है।
रेफ्रिजरेटर का पूरा सिस्टम अमोनिया गैस पर आधारित रहता है और यह गैस लगभग -32 डिग्री सेल्सियस पर वाष्पित हो जाती है।
प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर की क्रिया विधि शुरू होती है कम्प्रेसर से , सबसे पहले अमोनिया गैस को संपीडित किया जाता है , इसके लिए दाब को बढाया जाता है जिससे अमोनिया गैस बहुत अधिक गर्म हो जाती है। यह गर्म गैस फ्रिज के पीछे लगे कुंडलित पाइप से गुजारी जाती है जहाँ अतिरिक्त गर्मी को मुक्त किया जाता है , यही कारण होता है कि फ्रिज के पीछे अधिक गर्मी होती है। ऊष्मा (गर्मी) त्यागने के बाद अमोनिया गैस ठंडी हो जाती है जिससे यह वाष्प से तरल में बदल जाती है।
यह तरल अमोनिया इसके बाद विस्तार वाल्व (expansion valve) में जाती है जहाँ यह और अधिक ठंडी हो जाती है , यह ठंडी अमोनिया , कुंडलित पाइप से होकर तेजी से गति करती है जिससे यहाँ की वाष्प का ताप कम होता जाता है और वस्तुएं ठंडी हो जाती है।

प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर के भाग (parts of refrigerator)

इसके तीन मुख्य भाग होते है –
1. स्रोत (source)
2 कार्यकारी पदार्थ (used substance)
3. सिंक (sink)
1. स्रोत (source)
यह ऊष्मा का भण्डार होता है या दुसरे शब्दों में कहे तो इसमें बहुत अधिक ऊष्मा ग्रहण करने की क्षमता होती है , यह एक ऐसा स्त्रोत होता है जिसे कितनी भी ऊष्मा दी जा सकती है।
2 कार्यकारी पदार्थ (used substance) 
ऐसा पदार्थ जो वस्तुओं को ठंडा करने में इस्तेमाल होता है , प्रशीतक , रेफ्रिजरेटर या फ्रिज में सामान्यत: अमोनिया और फ्रीओन गैस काम में आती है , कभी कभी यह प्रश्न पूछ भी लिया जाता है कि प्रशीतक या रेफ्रिजरेटर या फ्रिज में कौनसी गैस काम में आती है ?
3. सिंक (sink)

यह एक ऐसी वस्तु या स्रोत होती है जिससे कितनी भी ऊष्मा ली जा सकती है अर्थात इसमें अनन्त उष्मा त्यागने की क्षमता होती है।

प्रशीतक की शीतलन क्षमता

इसे प्राय: β से व्यक्त किया जाता है , इसका मान ज्ञात करने के लिए ठंडी वस्तु से निकाली गयी ऊष्मा तथा इसके लिए किये गए कार्य के अनुपात को ही शीतलन क्षमता कहते है –
शीतलन क्षमता (β) = वस्तु द्वारा निकाली गयी ऊष्मा / किया गया कार्य

पेट्रोल इंजन और डीजल इन्जन में क्या अंतर है (difference between petrol engine and diesel engine in hindi)

(difference between petrol engine and diesel engine in hindi) पेट्रोल इंजन और डीजल इन्जन में क्या अंतर है : हम यहां पेट्रोल और डीजल इंजन के बारे में अध्ययन करने वाले है , सबसे पहले आप यह समझे ले कि जो इंजन पेट्रोल इंधन से चलते है उन्हें पेट्रोल इंजन कहते है और जिन इंजन में डीजल को ईंधन की तरह काम में लिया जाता है उन्हें डीजल इंजन कहते है।

अब बात करते है कि दोनों इंजनो के मध्य क्या अंतर होता है।

पेट्रोल इंजन और डीजल इन्जन में अंतर

1. पेट्रोल इंजन में पेट्रोल और हवा कार्बोरेटर में जाकर अच्छे से मिल जाते है अर्थात कार्बोरेटर में पेट्रोल और हवा दोनों का मिश्रण बन जाता है , अब यह मिश्रण सिलेंडर में जाता है।
डीजल इंजन में ईंधन इंजेक्टर की सहायता से पहले डीजल को सिलेंडर में प्रवेश करवाया जाता है और इसके बाद सिलेंडर में हवा को प्रवेश करवाया जाता है और इसके बाद दोनों का मिश्रण सिलेंडर में बनता है।
2. पेट्रोल इंजन में पहले हवा और पेट्रोल को संपीडित किया जाता है और संपीडन के बाद इलेक्ट्रिक स्पार्क के द्वारा इसे प्रज्वलित किया जाता है। डीजल इन्जन में सिर्फ चार्ज हवा को संपीड़ित किया जाता है और संपीडन के बाद संपीडित हवा की ऊष्मा के द्वारा प्रजव्लित किया जाता है।
3. पेट्रोल इंजन में लगभग 2% पेट्रोल तथा 98% वायु को ईंधन की तरह काम में लिया जाता है तथा डीजल इंजन में डीजल , वायु तथा ऊष्मा के मिश्रण को ईंधन की तरह उपयोग किया जाता है।
4. पेट्रोल इंजन की दक्षता बहुत कम होती है तथा डीजल इंजन की दक्षता अधिक होती है , पेट्रोल इंजन की दक्षता का मान लगभग 52% होता है तथा डिजल ईंजन की दक्षता का मान लगभग 64% होती है।
5. पेट्रोल ईंजन में स्पार्क प्लग लगा होता है तथा डीजल इंजन में ईंधन इंजेक्टर या ऑइल प्लग लगा रहता है।
6. पेट्रोल इंजन में विस्फोट होने का खतरा अधिक होता है क्योंकि इसमें पेट्रोल और वायु दोनों संपीडित रहती है जबकि डीजल इंजन में विस्फोट का कोई खतरा नहीं होता है क्योंकि इसमें केवल वायु ही संपीडित अवस्था में रहती है।
7. पेट्रोल इंजन हल्का , सस्ता होता है तथा इसका रखरखाव का खर्चा भी कम रहता है जबकि डीजल इन्जन महंगा , भारी रहता है और इसका रख रखाव का खर्चा अधिक बैठता है।
8. पेट्रोल इंजन हलके वाहनों जैसे दुपहिया , जीप इत्यादि में लगा रहता है जबकि डीजल इंजन भारी वाहनों जैसे ट्रक , बस इत्यादि में लगा रहता है।

ऊष्मा इंजन क्या है , परिभाषा , कार्यप्रणाली , चित्र प्रकार , दक्षता (heat engine in hindi)

(heat engine in hindi) ऊष्मा इंजन क्या है , परिभाषा , कार्यप्रणाली , चित्र प्रकार , दक्षता : यह एक ऐसी डिवाइस है जो ऊष्मा ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा या कार्य में परिवर्तित करती है।
चाहे ऊष्मा कोयला हो या तेल या अन्य किसी से भी उत्पन्न की जाए लेकिन विश्व में लगभग 80% ऊर्जा , ऊष्मा के माध्यम से ही उत्पन्न की जाती है अत: हम कह सकते है ऊष्मा का उर्जा के क्षेत्र में बहुत अधिक योगदान है।
लगभग विश्व की 80% विद्युत ऊर्जा ऊष्मा के द्वारा प्राप्त की जाती है।
ऊष्मागतिकी का दैनिक जीवन में उपयोग कह सकते है इसे |
यह चित्रानुसार किसी स्त्रोत से ऊष्मा लेता है और इस ऊष्मा उर्जा का कुछ भाग कार्य में या यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तन कर देता है और कुछ ऊष्मा सिंक को दे देता है , क्योंकि हम जानते है है कि बिना ऊष्मा गति के कार्य या यांत्रिक ऊर्जा उत्पन्न करना संभव नहीं है।
अर्थात ऊष्मा इंजन में ऊष्मा स्त्रोत से सिंक की तरफ गति करती है और स्त्रोत से आई कुछ ऊष्मा का भाग कार्य में परिवर्तित हो जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है –

 

ऊष्मा इंजन के प्रकार (types of heat engine)

उष्मा इन्जन को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है
1. बाह्य दहन इंजन (external combustion engine)
2. आन्तरिक दहन इन्जन (internal combustion engine)
हम यहाँ दोनों प्रकारों को विस्तार से अध्ययन करेंगे और देखंगे कि दोनों इंजनों में क्या अंतर है , और क्या समानता है।
1. बाह्य दहन इंजन (external combustion engine) : जब किसी इंजन में इंधन को इंजन के बाहर जलाया जाता है तो इस प्रकार के इंजन को बाह्य दहन इंजन कहते है।  इस प्रकार के इंजन में इंजन के बाहर एक चैंबर बना होता है , जिसमें ईंधन जैसे गैस या कोई तरल तेल को डाला जाता है और इसे जलाकर एक बहुत बड़ी मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न की जाती है , और इस ऊष्मा का उपयोग इन्जन द्वारा कार्य करने या यांत्रिक ऊर्जा में किया जाता है।
वाष्प इंजन इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
2. आन्तरिक दहन इन्जन (internal combustion engine) : वह इंजन जिसमे ईंधन का दहन इंजन के अन्दर ही बने दहन चैम्बर में ही संपन्न होता है आंतरिक दहन इंजन कहलाता है।
इस प्रकार के इंजन बहुत अधिक इस्तेमाल होते है जैसे वाहनों में , हवाई जहाजो में इत्यादि।
जब इंजन के अन्दर ही बने इस दहन चैम्बर में इंधन को जलाया जाता है तो यह बहुत अधिक मात्रा में ऊष्मा और दाब उत्पन्न करता है जिससे इससे जुड़े पिस्टन या टरबाइन घूमना अर्थात कार्य करना प्रारम्भ कर देते है जैसा चित्र में दिखाया गया है –

ऊष्मा इन्जन के भाग तथा वर्णन (parts of heat engine )

ऊष्मा इंजन की व्याख्या करने के लिए इसे तीन भागों में बांटा जा सकता है अर्थात इंजन तीन भागो से मिलकर बना होता है जिनका वर्णन हम निचे पढने जा रहे है –
1. स्रोत (source) : वह भाग जहाँ से इंजन को उच्च मान की ऊष्मा उर्जा प्राप्त होती है।
2. इंधन (fuel) : वह पदार्थ जिसे जलाकर ऊष्मा उत्पन्न की जा सकती है , इन्धन गैस या द्रव या ठोस किसी भी रूप में हो सकती है जैसे पेट्रोल , कोयला आदि।
3. सिंक (sink) : इंजन का वह भाग जिसका ताप निम्न होता है , स्त्रोत से ऊष्मा के प्रवाह को बनाये रखने के लिए स्त्रोत से सिंक में ऊष्मा प्रवाहित की जाती है , सिंक ऊष्मा को अवशोषित करता है और ऊष्मा का कुछ भाग कार्य करने में व्यय करने के बाद स्त्रोत को पुन: बची ऊष्मा ऊर्जा लौटा देता है और अपनी मूल निम्न ताप वाली स्थिति में आ जाता है ताकि स्त्रोत से ऊष्मा का संचरण बना रहे और इसका कुछ भाग कार्य में परिवर्तित होता रहे।
ऊष्मीय इंजन की दक्षता (efficiency of heat engine)
कुल ऊर्जा में से जितनी कार्य में परिवर्तन हुई वो और स्रोता द्वाराउत्पन्न की गयी कुल उर्जा के अनुपात को ही उष्मीय इन्जन की दक्षता कहते है।
माना स्त्रोत द्वारा उत्पन्न की गयी कुल ऊष्मा ऊर्जा A है तथा सिंक द्वारा B ऊर्जा को कार्य में परिवर्तित कर दिया गया है तथा बाकी ऊष्मा उर्जा को स्त्रोत को पुन: लौटा दिया गया है तो ऊष्मीय इंजन की दक्षता को निम्न प्रकार दिया जा सकता है –
n = A – B / A
यहाँ n = ऊष्मीय इंजन की दक्षता
A = स्त्रोत द्वारा उत्पन्न कुल उर्जा
B = ऊष्मा का कार्य में परिवर्तित ऊर्जा

ऊष्मागतिकी का द्वितीय (दूसरा) नियम (second law of thermodynamics in hindi)

(second law of thermodynamics in hindi) ऊष्मागतिकी का द्वितीय (दूसरा) नियम : ऊष्मा गतिकी का दूसरा नियम यह बताता है कि ऊष्मा ऊर्जा को पूर्ण रूप से यांत्रिक उर्जा में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।  अर्थात यदि हम चाहे कि कोई ऊष्मा ऊर्जा पूर्ण रूप से अर्थात 100% यान्त्रिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाए तो यह संभव नहीं है।

यह नियम यह भी बताता है कि जब ऊष्मा उर्जा को कार्य में परिवर्तित किया जाए तो इसके लिए यह आवश्यक है की किसी उच्च ऊष्मा वाले स्त्रोत से ऊष्मा ली जाए जिससे उस ऊष्मा का कुछ भाग कार्य में परिवर्तित हो जाए और शेष भाग को किसी निम्न ऊष्मा वाली वस्तु में भेज दिया जाए।

कहने का अभिप्राय यह है कि ऊष्मा ऊर्जा को कार्य या यांत्रिक उर्जा में परिवर्तन के लिए ऊष्मा का प्रवाह होता रहना चाहिए , यदि ऊष्मा का प्रवाह नहीं हो रहा है तो ऊष्मा उर्जा का अन्य ऊर्जा के रूपों में रूपांतरण भी संभव नहीं है। ऊष्मा इंजन भी इसी नियम पर आधारित है।

ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम को केल्विन – प्लांक कथन द्वारा बताया जाता है जिसके अनुसार “किसी ऊष्मा ऊर्जा को पूर्ण रूप से कार्य में या अन्य उर्जा में परिवर्तन संभव नहीं है ”

यह नियम भी ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम के भांति ऊष्मा ऊर्जा तथा इसके कार्य में या अन्य उर्जाओं के रूप में परिवर्तन क समझने के लिए है |

गूगल २०थ बर्थडे Google’s 20th Birthday in hindi

Google’s 20th Birthday in hindi गूगल २०थ बर्थडे –  आज शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो गूगल के बारे में नहीं जानता होगा , आज गूगल को बने २० साल बीते गए और इन बीस साल में गूगल ने बहुत कुछ हासिल किया है। आज गूगल दुनिया का सबसे प्रचलित और सबसे अधिक उपयोग में लाये जाने वाला सर्च इंजन है , जिसका उपयोग हर एक व्यक्ति करता है चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में हो।

गूगल क्या है ?

गूगल एक सर्च इंजन है , अब आप सोच रहे होंगे की सर्च इंजन क्या होता है ? सर्च इंजन इन्टरनेट पर उपलब्ध सभी जानकारियों को एक सही क्रम में आवश्यकता के अनुसार हमारे सामने प्रस्तुत करता है।  जैसे मान लीजिये आपको 12th क्लास के नोट्स पढने है तो आप गूगल में लिखेंगे की कक्षा १२ के नोट्स , तो आप देखेंगे की आपके सामने बहुत सारी वेबसाइट आ जाती है , और गूगल उन्ही वेबसाइट को आपके सामने रखता है जिन वेबसाइट पर सबसे अच्छा लिखा हुआ होगा और आप जिसे पढ़कर संतुष्ट हो जाए।
अब मान लीजिये गूगल आपके सामने ऐसे वेबसाइट की लिस्ट रख दे जिन पर अच्छा लिखा हुआ न हो और आपके प्रश्न का जवाब न मिले तो स्वभाविक रूप से आप गूगल का इस्तमाल करना बंद कर देंगे।
गूगल इन बीस साल में सबसे अच्छा सर्च इंजन इसलिए ही बना हुआ है क्योंकि इसका सिस्टम और अल्गोरिथम सबसे बेहतरीन है जो इसे बाकी अन्य से भिन्न और अधिक सुविधा जनक बनाती है , यूजर के नजरिये से गूगल अच्छा माना जाता है , गूगल अपने सर्च इंजन को कभी भी पैसे कमाने के लिए समझोता नहीं करता है , यह हमेशा यूजर को प्राथमिकता देता है और हमेशा उनकी जरुरत का ध्यान रखता है , और दिन प्रतिदिन यह अपने सर्च इंजन में बदलाव करता रहता है जिससे यूजर अनुभव को और अधिक सुधारा जा सके।
हालाँकि गूगल कई फील्ड में कार्यरत है जैसे क्लाउड सर्विसेज , तेज पेमेंट , एडवरटाइजिंग  आदि कई ऑनलाइन इन्टरनेट से सम्बंधित सर्विसेज देता है।

गूगल का इतिहास (history of google)

कैलिफोर्निया से जब दो छात्र ph.D कर रहे थे तो उनके दिमाग में यह विचार आया कि इन्टरनेट पर उपलब्ध जानकारी हमें एक व्यवस्थित रूप से नहीं मिल रही है , हमें जो जिस समय चाहिए इन्टरनेट से वह उस समय ठीक से हमारे सामने प्रस्तुत नहीं हो पा रहा है , और तब उन्होंने एक सर्च इंजन बनाने का निश्चय किया और यह सर्च इंजन बाकी सब से अलग इस प्रकार होगा की यह यूजर अनुभव को अधिक महत्व देगा , तब उन्होंने 1998 में गूगल की नीव रखी , ये दोनों ph.D छात्र लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन थे , इन दोनों के मेहनत के बदोलत ही हम आज इतने अच्छे सर्च इंजन का प्रयोग कर रहे है और अपना जीवन और अधिक सुविधा जनक बना रहे है।
लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन उस समय स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय जो कैलिफोर्निया में है वहां से अपनी phD कर रहे थे।
गूगल अपना बर्थडे २७ सितम्बर को मनाता है , हालांकि google.com नाम १५ सितम्बर 1997 को रजिस्टर किया गया था लेकिन 4 सितम्बर 1998 तक गूगल एक बिज़नस कम्पनी की तरह रजिस्टर नहीं किया गया था , गूगल की जानकारी के अनुसार इसने अपना जन्म दिन 2002 में बदल दिया गया , वैसे देखा जाए तो गूगल का जन्मदिवस 4 सितम्बर को मनाना चाहिए लेकिन २००२ में जन्म दिवस को बदलने के बाद यह २७ सितम्बर को मनाया जाता है।

गूगल २०थ बर्थडे

आज 27 सितम्बर 2018 को गूगल अपना 20 वां बर्थडे मना रहा है इसका मतलब यह है कि गूगल ने अपने 20 का सफ़र पूरा कर लिया है और इन २० साल में गूगल विश्व की सबसे बेहतरीन कंपनी में से एक है , गूगल ने अपनी सफलता को आगे बढ़ाते हुए अपनी कई नयी सर्विसेज शुरू की है और दिन प्रतिदिन खुद की सर्विसेज को बेस्ट बनाने के लिए प्रयास करता रहता है।

उत्क्रमणीय प्रक्रम और अनुत्क्रमणीय प्रक्रम (reversible and irreversible processes in hindi)

(reversible and irreversible processes in hindi) उत्क्रमणीय प्रक्रम और अनुत्क्रमणीय प्रक्रम : अगर हम ऊष्मागतिकी प्रक्रमों के प्रकार की बात करे तो ये दो प्रकार के होते है पहला उत्क्रमणीय प्रक्रम तथा दूसरा अनुत्क्रमणीय प्रक्रम।  इनमे से उत्क्रमणीय प्रक्रम एक आदर्श स्थिति होती है जो कभी संभव नहीं हो सकती है और अनुत्क्रमणीय प्रक्रम एक प्रकार का प्राकृतिक प्रक्रम है जो प्रकृति में संभव है और पाया जाता है , लेकिन हम यहाँ यह पढेंगे की ये दोनों प्रक्रम क्या होते है , इनके उदहारण क्या है इत्यादि।

उत्क्रमणीय प्रक्रम (reversible process)

ऐसा प्रक्रम जिसे उल्टा या उत्क्रमणित करने पर वे सभी परिवर्तन विपरीत क्रम में वैसे ही संपन्न हो जैसे प्रक्रम को सीधा चलने पर संपन्न हो रहे थे उसे उत्क्रमणीय प्रक्रम कहते है।
जब किसी निकाय को अंतिम स्थिति से प्रारंभिक स्थिति की तरफ चलाया जाता है और यदि निकाय की ऊष्मागतिकी गुणों में कोई परिवर्तन न हो तो इसे उत्क्रमणीय प्रक्रम कहते है।
माना कोई निकाय स्थिति A से B में परिवर्तित हो रहा है यदि अब स्थिति B से A में परिवर्तित किया जाए और इसके परिवेश में कोई परिवर्तन न हो तो इस प्रकार के प्रक्रम को उत्क्रमणीय प्रक्रम कहते है।
इसमें निकाय का ताप नियत रखा जाता है।
निकाय की एन्ट्रापी का मान नियत रखा जाता है।
उत्क्रमणीय प्रक्रम के उदाहरण 
1. ऊष्मा को अवशोषित कर बर्फ का पानी में बदलना तथा कुछ ऊष्मा को उत्सर्जित कर पानी का बर्फ में बदलना।
2. धीरे धीरे संपन्न होने वाली वाष्पन तथा संघनन प्रक्रिया।

अनुत्क्रमणीय प्रक्रम ( irreversible process)

इन्हें प्राकृतिक प्रक्रम भी कहते है क्योंकि प्रकृति में जितने भी प्रक्रम संपन्न होते है वे सभी अनुत्क्रमणीय होते है।
अत: जो प्रक्रम उत्क्रमणीय नहीं होते है उन्हें अनुत्क्रमणीय प्रक्रम कहते है।
ये सभी प्रक्रम निकाय की दो स्थितियों के मध्य ढाल या अंतर के कारण होता है जैसे जब दो वस्तुओं में ताप का अंतर होता है तो ऊष्मा उच्च से निम्न की तरफ जाती है ठीक इसी प्रकार पानी की गति उच्च से निम्न की तरफ होती है।
यहाँ इसका उल्टा संभव नहीं है क्योंकि प्राकृतिक रूप से ऐसा नहीं होता है।

गैस का मुक्त प्रसार (free expansion of gases in hindi) , क्या है , परिभाषा , उदाहरण

(free expansion of gases in hindi) गैस का मुक्त प्रसार : गैसों का ऐसा प्रसार जिसमे गैस की आंतरिक ऊर्जा में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं होता है गैस का मुक्त प्रसार कहलाता है , इसे निम्न उदाहरण द्वारा समझ सकते है –
,माना एक गैस किसी चैम्बर में भरी हुई है जिसकी चारो दीवारे सिमित है अर्थात गतिशील नहीं , इस स्थिति में माना गैस का आयतन V1 है तथा गैस द्वारा दीवारों पर आरोपित दाब का मान P1है तथा इस समय ताप का मान Tहै। इसे हम स्थिति 1 कहते है।
दूसरी स्थिति में हम गैस को प्रसारित होने के लिए स्वतंत्र कर देते है जैसा चित्र में दर्शाया गया है

जब स्थिति 2 में अर्थात गैस के प्रसार होने के बाद ताप T का मान ज्ञात करते है तो क्या होता है ?
चूँकि हम जानते है  ऊष्मागतिकी का प्रथम (गैस) नियम बताता है कि गैस की आंतरिक ऊर्जा में आया परिवर्तन किये गए कार्य और ऊष्मा में आये परिवर्तन के योग के बराबर होता है।
अर्थात dU = Q + W
चूँकि चैम्बर पूरा इन्सुलेट है अत: गैस के आयतन में कोई परिवर्तन नहीं आता है अर्थात अगस का प्रसार मुक्त हो रहा है , तथा गैस द्वारा किसी प्रकार का कोई कार्य नहीं किया जा रहा है क्योंकि दोनों चैंबर एक इन्सुलेट है अर्थात समान है अत: हम कह सकते है कि गैस की आंतरिक उर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
अत: हम कह सकते है कि जब गैस का फ्री या मुक्त प्रसार होता है तो गैस की आंतरिक ऊर्जा में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं आता है।
गैस के मुक्त प्रसार को रुद्धोष्म प्रक्रम है जिसमे निकाय की प्रारंभिक तथा अंतिम ऊर्जाओं का मान समान होता है।

ऊष्मागतिकी का प्रथम (पहला) नियम (first law of thermodynamics in hindi)

(first law of thermodynamics in hindi) ऊष्मागतिकी का प्रथम (पहला) नियम : ऊष्मा गतिकी का पहला नियम यह बताता है कि ऊष्मा भी एक प्रकार की ऊर्जा ही है अर्थात ऊष्मा , उर्जा का एक रूप है।

ऊष्मा ऊर्जा संरक्षण नियम की पालना करती है अर्थात ऊष्मा उर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है लेकिन ऊष्मा उर्जा को एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित किया जा सकता है तथा एक फॉर्म से दूसरी फॉर्म में परिवर्तन किया जा सकती है।  अर्थात ऊष्मा ऊर्जा को एक रूप से दुसरे रूप में आसानी से रूपांतरित किया सकता है।

चूँकि हम जानते है कि ऊष्मागतिकी भौतिकी की वह ब्रांच है जिसमे ऊष्मा तथा अन्य उर्जाओं के मध्य सम्बन्ध को अध्ययन करते है , इसमें हम यह अध्ययन करते है कि ऊष्मा उर्जा को अन्य ऊर्जा के रूप में किस प्रकार रूपांतरित किया जा सकता है।

ऊष्मागतिकी का प्रथम (पहला) नियम “किसी भी निकाय की आन्तरिक ऊर्जा दो भागो के बराबर होती है एक तो निकाय द्वारा किया गया कार्य और दूसरा निकाय द्वारा निकली या प्रवेश ऊष्मा। ”

अर्थात जब किसी निकाय को बाहर से ऊष्मा दी जाती है तो निकाय द्वारा अवशोषित ऊष्मा का मान निकाय की आंतरिक ऊर्जा में आई वृद्धि और निकाय द्वारा किये गए कार्य के योग के बराबर होती है इसे ही ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम कहते है।

यह नियम पदार्थ की तीनो अवस्थाओं (ठोस , द्रव , गैस) के लिए मान्य है।

माना किसी निकाय को Q ऊष्मा दी जाती है जिससे इसकी आन्तरिक उर्जा में dU परिवर्तन आ जाता है अर्थात बढ़ जाती है , निकाय W कार्य करता है तो निकाय को निम्न प्रकार दर्शाया जाता है –

Q = dU + W

अत: निकाय की आंतरिक ऊर्जा में आया परिवर्तन

dU = Q – W

ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम की सीमाएँ 

1. इस नियम की सहायता से यह ज्ञात नहीं किया जा सकता कि निकाय द्वारा किये गए कार्य में ऊष्मा का कितना भाग काम आ गया या कितनी ऊष्मा निकाय द्वारा किये गए कार्य में परिवर्तन हो गयी है।
2. यह नियम ऊष्मा की प्रवाह की दिशा के बारे में किसी प्रकार की कोई जानकरी नहीं देता है।
3. इस नियम की सहायता से यह पता नही लगाया जा सकता है कि ऊष्मा ऊर्जा का यांत्रिक कार्य में सतत परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता।

ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ (शून्य) नियम (zeroth law of thermodynamics in hindi)

(zeroth law of thermodynamics in hindi) ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ (शून्य) नियम  : ऊष्मा गतिक का शून्य नियम यह बताता है कि जब दो निकाय किसी तीसरे निकाय के साथ उष्मीय साम्य में हो तो वे दोनों निकाय आपस में भी एक दुसरे के साथ उष्मीय साम्य अवस्था में होंगे।
उष्मीय साम्य का तात्पर्य है जब दो वस्तुओं या निकायों को संपर्क में लाया जाता है लेकिन दोनों पिंडो के मध्य एक दिवार लगा दी जाती है जिसमे से ऊष्मा का स्थानांतरण हो सके , यदि दोनों उष्मीय साम्य में उपस्थित है तो दोनों वस्तुओं या निकायों के मध्य कोई ऊष्मा स्थानांतरण नहीं होगा , इसे उष्मीय साम्य कहते है।
उदाहरण : जब दो निकाय A और B लिए जाते है , दोनों निकाय किसी तीसरे निकाय C के साथ यदि साम्य अवस्था में है तो निकाय A और B भी उष्मीय साम्य में होंगे जैसा चित्र में दर्शाया गया है –

सीधे शब्दों में समझे तो तीनों निकाय समान ताप को ग्रहण किये हुए है और जैसा हम जानते है कि जब दो वस्तुओं में ताप समान होता है तो वह स्थानांतरित नहीं होता है।
लेकिन यह नियम यह कहता है सभी वस्तुओं या निकायों में ताप या ऊष्मा का गुण समान होता है अर्थात ऊष्मा गुण सभी में समान होता है यह वस्तु या पिंड के बदलने से ऊष्मा के गुण में कोई अंतर नहीं आता है।