एक्टिनाइड इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ,ऑक्सीकरण अवस्था ,लैंथेनाइड और एक्टिनाइड में अंतर

एक्टिनोइड :

परिचय :

  1. यह श्रेणी Ac (89) (एक्टिनियम) के बाद प्रारम्भ होती है। इसमें परमाणु क्रमांक 90 से लेकर 103 तक के तत्व आते है।
  2. इसे 5f श्रेणी भी कहते है।
  3. इसके अधिकांश तत्व रेडियो तत्व है।
  4. ये आवर्त सरणी के 7 वे आवर्त तथा 3 वर्ग में आते है।
  5. यूरेनियम के बाद वाले तत्व को परायूरेनियम तत्व कहते है।
  6. ये प्रकृति में नहीं पाए जाते है।
  7. सभी तत्वों को An से व्यक्त करते है।
  8. इनका बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 5f0-146d0-17S2 होता है।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास :

 परमाणु क्रमांक  प्रतीक  इलेक्ट्रॉनिक विन्यास  ऑक्सीकरण अवस्था
89 Ac [Rn] 5f0 6d2 7S2 +3
90 Th [Rn] 5f2 6d1 7S2 +3   +4
91 Pa [Rn] 5f3 6d1 7S2 +3  +4   +5
92 U [Rn] 5f4 6d1 7S2 +3   +4  +5  +6
93 Np [Rn] 5f6 6d0 7S2 +3 , +4 , +5 , +6 , +7
94 Pu [Rn] 5f7 6d0 7S2 +3 , +4 , +5 , +6 , +7
95 Am [Rn] 5f7 6d1 7S2 +3 , +4 , +5 , +6
96 Cm [Rn] 5f8 6d0 7S2 +3 , +4
97 Bk [Rn] 5f9 6d0 7S2 +3 , +4
98 CF [Rn] 5f10 6d0 7S2 +3
99 ES [Rn] 5f11 6d0 7S2 +3
100 Fm [Rn] 5f12 6d0 7S2 +3
101 Md [Rn] 5f13 6d0 7S2 +3
102 No [Rn] 5f14 6d0 7S2 +3
103 Lr [Rn] 5f14 6d1 7S2 +3

ऑक्सीकरण अवस्था :

  1. ये +3 से लेकर +7 तक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते है क्योंकि 5f 6d 7s कक्षको की ऊर्जा में अंतर कम होता है।
  2. एक्टिनाइड संकुचन :

एक्टिनाइड श्रेणी में बाएं से दाएं जाने पर आकार में कमी हो जाती है इसे एक्टिनाइड संकुचन कहते है।

नोट : एक्टिनाइड संकुचन की तुलना में एक्टिनाइड संकुचन अधिक होता है क्योंकि 4f कक्षक की तुलना में 5f कक्षको का परिरक्षण प्रभाव कम होता है।

लैंथेनाइड और एक्टिनाइड में समानता :

  1. दोनों श्रेणी में f कक्षक में इलेक्ट्रॉन भरे जाते है।
  2. दोनों श्रेणी के बाह्यतम तीन कोश आंशिक भरे होते है।
  3. दोनों श्रेणी के वे तत्व इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनाते है।
  4. दोनों श्रेणी के वे तत्व जिनमे f कक्षक में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते है वे रंगीन होते है।

प्रश्न 1 : एक्टिनाइड श्रेणी का रसायन कठिन है ?

उत्तर : इस श्रेणी के अधिकांश सदस्य रेडियो एक्टिव है तथा प्रकृति में स्थायित्व नहीं है।

प्रश्न 2 : एक्टिनाइड में संकुल यौगिक बनाने की प्रवृति अधिक होती है क्यों ?

उत्तर : इन पर आवेश घनत्व अधिक व आकार छोटा तथा अनेक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते है जिससे लैंथेनाइड की तुलना में एक्टिनाइड आसानी से संकुल यौगिक बना लेते है।

लैंथेनाइड और एक्टिनाइड में असमानता

Lलैंथेनाइड  Aएक्टिनाइड
1.   ये +3 ऑक्सीकरण अवस्था के साथ साथ -2 , +3 , +4 ऑक्सीकरण अवस्था भी दर्शाते है।  ये +3 ऑक्सीकरण अवस्था के साथ +4 , +5 , +6 , +7 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते है।
2.  इस श्रेणी में केवल Pm रेडियो सक्रीय है।  इस श्रेणी के अधिकांश तत्व रेडियो सक्रीय है।
 3. लेंथेनाइड संकुचन कम होता है  ऐक्टिनाइड संकुचन अधिक होता है।
 4. इनका रसायन सरल है  इनकी केमिस्ट्री जटिल है
 5. इनकी चुंबकीय आघूर्ण की व्याख्या आसानी से की जा सकती है।  इनके चुंबकीय गुणों की व्याख्या आसानी से नहीं कि जा सकती
 6. 4f कक्षको का परिरक्षण प्रभाव अधिक होता है।  5f कक्षको का परिरक्षण प्रभाव कम होता है।
 7. ये ओक्सोनियम आयन नहीं बनाते है  ये ओक्सोनियम आयन बनाते है

जैसे : Uo22+

लेन्थैनाइड के उपयोग :

  1. लेंथेनाइड से बनी मिश्र धातुओ को मिश धातु कहते है।
  2. लेंथेनाइड मिश धातु से स्पात बनाया जाता है इसमें लगभग 95% लेंथेनाइड , 5% लोहा तथा अल्प मात्रा में कैल्शियम , कार्बन , सल्फर आदि होते है इसका उपयोग प्लेट बनाने में किया जाता है।
  3. मैग्नीशियम आधारित मिश धातु बंदूक की गोली , फ्लिंट कांच , कवच बनाने के काम आता है।
  4. लेंथेनाइड के ऑक्साइड पेट्रोल पदार्थो के भंजन में काम आते है तथा टेलीविजन पर्दे पर चमक उत्पन्न करने के काम आते है।

लेन्थेनाइड संकुचन प्रभावित करने वाले कारक ,प्रभाव , गुण Lentenide contraction

Lentenide contraction लेन्थैनाइड संकुचन :

लेन्थैनाइड तत्वों में बाएं से दाएं जाने पर आकार में कमी होती जाती है इसे लेन्थैनाइड संकुचन कहते है।
बाएं से दाएं जाने पर निम्न दो कारक परमाणु के आकार को प्रभावित करते है।
1. प्रभावी नाभिकीय आवेश :
बाएं से दाएं जाने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ता जाता है अतः आकार कम होता जाता है।
2. परिरक्षण प्रभाव :
अंदर के इलेक्ट्रॉन बाह्य इलेक्ट्रॉन को प्रतिकर्षित करते है इसे परिरक्षण प्रभाव कहते है जिससे आकार बढ़ता है।
लैंथेनॉइड में 4f कक्षक का आकार तथा ये परमाणु में अधिक अंदर स्थित होने के कारण इनका पररक्षण प्रभाव कम होता है अतः बाह्य इलेक्ट्रॉन पर केवल नाभिक का आकर्षण बल कार्य करता है जिससे आकार में कमी होती जाती है इसे लेन्थैनाइड संकुचन कहते है।
लेन्थैनाइड संकुचन के प्रभाव (Effects of Lenthenoid Contraction):
1. लेन्थैनाइड संकुचन के कारण द्वितीय और तृतीय संक्रमण श्रेणी के तत्वों के आकार लगभग समान होते है।
2. लेन्थैनाइड संकुचन के कारण तृतीय श्रेणी के तत्वों की आयनन एन्थैल्पी द्वितीय संक्रमण श्रेणी के तत्वों से अधिक होती है।
3. लेन्थैनाइड के आकार लगभग समान होने के कारण इनका पृथक्करण आसानी से नहीं किया जा सकता है क्योंकि इनके गुणों में पर्याप्त समानता होती है।
4. लेन्थैनाइड श्रेणी में बाएं से दाएं जाने पर हाइड्रोक्साइड की क्षारीय प्रकृति कम होती जाती है (सहसंयोजक गुण बढ़ने के कारण )
लेन्थैनाइड के गुण (Properties of lanthanide) :
1. ये चाँदी के समान श्वेत ठोस पदार्थ है।
2. वायु में इनकी सतह पर ऑक्साइड की परत बन जाती है जिससे सतह धुमिल हो जाती है।
3. इनका मानक अपचयन विभव ऋणात्मक होता है अतः ये अम्लों से क्रिया करके हाइड्रोजन गैस बनाते है।
4. बाएं से दाएं जाने पर इनकी क्रियाशीलता कम हो जाती है।
5. ये जल से क्रिया करके हाइड्रोजन गैस देते है।

f खण्ड के तत्व , लैन्थेनाइड , इलेक्ट्रॉनिक विन्यास , ऑक्सीकरण अवस्था

f खण्ड के तत्व : element of f block, lanthenide

परिचय :

  1. वे तत्व जिनमे आखिरी इलेक्ट्रॉन f कक्षक में जाता है उन्हें f खंड के तत्व कहते है।
  2. इनके बाह्य तीन कोश आंशिक रूप से भरे होते है अतः इन्हे आंतरिक संक्रमण तत्व भी कहते है।

लैन्थैनोड :

परिचय :

  1. यह श्रेणी La 57 के बाद प्रारम्भ होती है इसमें परमाणु क्रमांक 58 से 71 तक के तत्व आते है।
  2. इसे 4f श्रेणी भी कहते है क्योंकि इस श्रेणी में 4f कक्षक में इलेक्ट्रॉन भरे जाते है इस श्रेणी के तत्व आवर्त सारणी के 6 आवर्त व 3 वर्ग में रखे गए है।
  3. सभी लेन्थैनोड को सामूहिक रूप से L बड़ा N छोटा LN से व्यक्त करते है।
  4. इन्हे दुर्बल मृदा तत्व भी कहते है क्योंकि इनके खनिज (ऑक्साइड) मृदा में होते है।
  5. इनका बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 4f0-145d0-16S2 होता है।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास :

 परमाणु क्रमांक  प्रतीक  इलेक्ट्रॉनिक विन्यास  ऑक्सीकरण अवस्था
57 La [Xe] 4f0 5d1 6S2 +3
58 Ce [Xe] 4f1 5d1 6S2 +3  +4
59 Pr [Xe] 4f3 5d0 6S2 +3
60 Nd [Xe] 4f4 5d0 6S2 +3
61 Pm [Xe] 4f5 5d0 6S2 +3
62 Sm [Xe] 4f6 5d0 6S2 +3
63 Eu [Xe] 4f7 5d0 6S2 +2  +3
64 Gd [Xe] 4f7 5d1 6S2 +3
65 Tb [Xe] 4f9 5d0 6S2 +3  +4
66 Dy [Xe] 4f10 5d0 6S2 +3
67 Ho [Xe] 4f11 5d0 6S2 +3
68 Er [Xe] 4f12 5d0 6S2 +3
69 Tm [Xe] 4f13 5d0 6S2 +3
70 Yb [Xe] 4f14 5d0 6S2 +2   +3
71 Lu [Xe] 4f14 5d1 6S2 +1

 निम्न के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखो ;

  1. Ce4+

58Ce = [Xe] 4f1 5d1 6S2

Ce4+  = [Xe] 4f0 5d0 6S0

  1. Yb2+

70Yb = [Xe] 4f14 5d0 6S2

Yb2+  = [Xe] 4f14 5d0 6S0

ऑक्सीकरण अवस्था:

सभी तत्व ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते है।

68 में से 2 इलेक्ट्रॉन तथा 4f अथवा 5d में से 1 इलेक्ट्रॉन बाहर निकलने से +3 ऑक्सीकरण अवस्था बनती है।  +3 ऑक्सीकरण अवस्था सबसे अधिक स्थायी होती है क्योंकि तीन इलेक्ट्रॉन निकलने के पश्चात् शेष इलेक्ट्रॉन पर नाभिक का आकर्षण बल अधिक हो जाता है जिससे और इलेक्ट्रॉन निकलना कठिन हो जाता है।

कुछ तत्व स्थायित्व के कारण +2 व +4 ऑक्सीकरण अवस्था भी दर्शाते है परन्तु ये ऑक्सीकरण अवस्था +ऑक्सीकरण अवस्था की तुलना में कम स्थायी है अतः +2 व +ऑक्सीकरण अवस्था कम स्थायी है।

Ce = [Xe] 4f1 5d1 6S2

Ce4+  = [Xe] 4f0 5d0 6S0

Yb = [Xe] 4f14 5d0 6S2

Yb2+  = [Xe] 4f14 5d0 6S0

+4 ऑक्सीकरण अवस्था में ये ऑक्सीकारक होते है।

प्रश्न :  निम्न में से प्रबल ऑक्सीकारक है ?

La3+ , Yb2+ , Ce4+ , Eu2+

उत्तर : Ce4+

संक्रमण तत्व के अंतर्राकाशी यौगिको के गुण ,उत्प्रेरक ,मिश्र धातु ,आयनन ,कणन एन्थैल्पी

अंतर्राकाशी यौगिक :

संक्रमण तत्व अंतर्राकाशी यौगिक बनाते है।

व्याख्या :

संक्रमण तत्व जब एक दूसरे के नजदीक आते है तो उनके मध्य कुछ रिक्त स्थान शेष रह जाता है इसे अंतर्राकाशी स्थान कहते है।

अंतर्राकाशी स्थान में छोटे आकार के परमाणु जैसे H , B , C , N आदि के समा जाने से जो यौगिक बनते है उसे अंतर्राकाशी यौगिक कहते है।

अंतर्राकाशी यौगिको के गुण :

  • कठोरता बढ़ जाती है।
  • गलनांक अधिक हो जाता है।
  • घनत्व अधिक हो जाता है।
  • क्रियाशीलता कम हो जाती है।
  • चालकता में परिवर्तन नहीं होता।

उत्प्रेरक :

अधिकांश संक्रमण तत्व उत्प्रेरक के रूप में काम आते है।

व्याख्या :

  • इनमे आंशिक भरे हुए d कक्षक होते है।
  • ये परिवर्तित संयोजकता प्रदर्शित करते है।

मिश्र धातु :

दो या दो से अधिक धातुओं के विलयन को मिश्र धातु कहते है।

जैसे : पीतल (कॉपर + Zn) , कांसा (Cu + Sn )

अधिकतर संक्रमण तत्व मिश्र धातु बनाते है।

व्याख्या :

संक्रमण तत्वों के आकार लगभग समान होने के कारण इनके क्रिस्टल जालको में से परमाणु एक दूसरे को प्रतिस्थापित कर देते है।

आयनन एन्थैल्पी :

किसी गैसीय उदासीन परमाणु की आखिरी कक्षा से इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा को आयनन एन्थैल्पी कहते है।

किसी तत्व की प्रथम , द्वितीय , तृतीय , आयनन एन्थैल्पी में से तृतीय आयनन एन्थैल्पी सबसे अधिक होती है (आकार छोटा होने के कारण)

प्रश्न 1 : Cu की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी Zn की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक होती है।

उत्तर : Cu = [Ar] 3d10 4S1

Cu+ = [Ar] 3d10 4S0

Zn = [Ar] 3d10 4S2

Zn+ = [Ar] 3d10 4S1

Cu में 3d10 के कारण द्वितीय आयनन एन्थैल्पी अधिक होती है।

प्रश्न 2 : Mn की तृतीय आयनन एन्थैल्पी Fe की तृतीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक होती है।

उत्तर : Mn = [Ar] 3d5 4S2

Mn2+ = [Ar] 3d5 4S0

Fe = [Ar] 3d6 4S2

Fe2+ = [Ar] 3d6 4S0

Mn2+ में 3d5 कक्षक अर्द्धपूर्ण होने के कारण अधिक स्थायी होता है अतः Mn की तृतीय आयनन एन्थैल्पी अधिक होती है।

कणन एन्थैल्पी :

धातु को परमाणुओं में विभक्त करने के लिए आवश्यक ऊर्जा को कणन एन्थैल्पी कहते है , बाएं से दाएं जाने पर पहले अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या बढ़ती है , प्रति परमाणु बँधो की संख्या बढ़ती जाती है परमाणु अधिक नजदीक आते जाते है अतः कणन एन्थैल्पी तथा गलनांक बढ़ते जाते है।

Mn के पश्चात् अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या कम होती जाती है प्रति परमाणु बंधो की संख्या कम होती जाती है अतः गलनांक व कणन एन्थैल्पी कम होती जाती है।

संक्रमण तत्वों के चुंबकीय गुण , उपसहसंयोजक यौगिक , रंग व्याख्या 

संक्रमण तत्वों की :

चुंबकीय गुण :

वे परमाणु या आयन जिनमे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते है वे अनुचुंबकिय कहलाते है।

परन्तु वे परमाणु या आयन जिनमे सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते है वे प्रतिचुंबकिय कहलाते है।

चुंबकीय गुणों की व्याख्या चुंबकीय आघूर्ण से करते है चुंबकीय आघूर्ण को u से प्रदर्शित करते है इनका मान सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है।

U = √(n(n+2)) B.M

यहाँ n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या है।

चुंबकीय आघूर्ण की इकाई बोर मैग्नेटोन (B .M ) होती है।

वे यौगिक जिनका चुंबकीय आघूर्ण शून्य होता है वे प्रतिचुंबकिय है।

प्रश्न 1 : Ni2+ , Cr3+ का चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिये।

उत्तर : 28Ni = [Ar] 3d8 4S2

Ni2+ = [Ar] 3d8 4S0

यहाँ n = 2

अतः U = √(n(n+2)) B.M

U = √ 2(2+2)

U = √ 8 B.M

24Cr = [Ar] 3d5 4S1

Cr3+ = [Ar] 3d3 4S0

यहाँ n = 3

अतः U = √(n(n+2)) B.M 

U = √3(3+2)

U =  √15 B.M

उपसहसंयोजक यौगिक :

अधिकतर संक्रमण तत्व संकुल यौगिक बनाते है क्योंकि

  1. इनके (n -1)d , nS , nP कक्षको के मध्य ऊर्जा का अंतर कम होता है इनके खाली कक्षक आपस में मिलकर खाली संकर कक्षक बनाते है।

जिनमे लिगेंड अपने lone pair of electron त्यागते है जिससे संकुल यौगिक बनते है।  इन पर आवेश घनत्व अधिक होता है जिससे ये लिगेंड को अपनी ओर आकर्षित करते है।

ये परिवर्तित ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते है जिससे ये समान प्रकार के लिगेंड से मिलकर अलग अलग प्रकार के संकुल यौगिक बनाते है।

रंग :

अधिकतर संक्रमण तत्व या आयन जिनमे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते है वे रंगीन होते है जैसे Ti3+ , V3+ , Cr3+ , Mn3+ , Fe3+ , Ni2+ , Cu2+ etc.

व्याख्या 

वे संक्रमण तत्व या आयन जिनमे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते है , वे सूर्य के प्रकाश के दृश्य क्षेत्र में विकिरणों को अवशोषित कर लेते है।

जिससे इलेक्ट्रॉन t2g कक्षक से eg कक्षक में चले जाते है अर्थात d-d संक्रमण होता है।  अतः ये रंगीन होते है।

वे संक्रमण तत्व या आयन जिनमे सभी इलेक्ट्रॉन होते है वे रंगहीन होते है क्योंकि ये दृश्य क्षेत्र से विकिरणों को अवशोषित नहीं करते अर्थात d-d संक्रमण नहीं होता है। उदाहरण : Sc3+ , Ti4+ , Cu+1 , Zn2+ आदि

संक्रमण तत्वों की परमाणु त्रिज्या , ऑक्सीकरण अवस्था Atomic radius of transition elements, oxidation phase

Atomic radius of transition elements, oxidation phase संक्रमण तत्वों की :

परमाणु त्रिज्या :

संक्रमण तत्वों की श्रेणी में बायें से दाएं जाने पर निम्न दो कारक परमाणु के आकार को प्रभावित करते है।

1. प्रभावी नाभिकीय आवेश :

बाएं से दाएं जाने पर नाभिक में प्रोटोन की संख्या बढ़ती है अर्थात नाभिकीय आवेश बढ़ता जाता है , बाह्य इलेक्ट्रॉन पर नाभिक का आकर्षण बल बढ़ता है अतः परमाणु का आकार कम होता जाता है।

2. परिरक्षण प्रभाव या आवरणी प्रभाव :

(N – 1 )d के इलेक्ट्रॉन nS के इलेक्ट्रॉन को प्रतिकर्षित करते है इस प्रभाव को परिरक्षण प्रभाव कहते है।  परिरक्षण प्रभाव बढ़ने पर परमाणु का आकार बढ़ता है।

उपरोक्त दोनों कारक एक दूसरे के विपरीत कार्य करते है अतः परमाणु के आकार में विशेष कमी नहीं होती।

Sc से लेकर Cr तक कारक प्रभावी नाभिकीय आवेश अधिक प्रभावी होता है जिससे परमाणु का आकार कम होता जाता है।

Mn से लेकर Ni तक प्रभावी नाभिकीय आवेश तथा परिरक्षण प्रभाव दोनों कारक एक दूसरे के प्रति संतुलित रहते है अतः आकार लगभग समान रहता है।

Cu व Zn में कारक परिरक्षण प्रभाव अधिक प्रभावी रहता है अतः आकार में वृद्धि हो जाती है।

नोट : प्रथम संक्रमण श्रंखला से द्वितीय संक्रमण श्रंखला में जाने पर आकार में वृद्धि होती है जबकि द्वितीय से तृतीय में जाने पर आकार लगभग समान होते है।  (लेथेनाइड संकुचन के कारण )

ऑक्सीकरण अवस्था :

1. ये परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्था (संयोजकता ) प्रदर्शित करते है क्योंकि (N – 1 )d तथा nS कक्षको के मध्य ऊर्जा का अंतर कम होने के कारण दोनों कक्षको के इलेक्ट्रॉन बंध बनाने में भाग लेते है।

2. बाएं से दाएं जाने पर पहले अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या बढ़ती जाती है अतः उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में यौगिक बनाने की प्रवृति बढ़ती जाती है।

बाद में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या घटती जाती है जिससे ऑक्सीकरण अवस्था में यौगिक बनाने की प्रवृति बढ़ती है।

3. कॉपर सबसे कम ऑक्सीकरण +1 दर्शाता है जबकि Mn सबसे अधिक ऑक्सीकरण अवस्था +7 दर्शाता है।

4. कुछ तत्व d, d5 , d10 के अतिरिक्त स्थायित्व के कारण विशेष ऑक्सीाकरण अवस्था में स्थायी होते है।

5. F , O आदि अधिक विधुत ऋणिय तत्वों के कारण संक्रमण तत्व उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में पाएं जाते है क्योंकि अधिक विधुत ऋणिय तत्व इन्हे उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्सीकृत कर देते है।

6. निम्न ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्साइड क्षारीय प्रवृति के जबकि उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्साइड अम्लीय प्रवृति के होते है।

7. निम्न ऑक्सीकरण अवस्था में यौगिक आयनिक जबकि उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में यौगिक सहसंयोजक प्रकृति के होते है।

8. निम्न ऑक्सीकरण अवस्था में यौगिक अपचायक प्रकृति के जबकि उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में यौगिक ऑक्सीकारक प्रकृति के होते है।

d व f खण्ड के तत्व परिचय , प्रथम , द्वितीयक व तृतीय संक्रमण श्रेणी ,  प्रतिक , इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

d व f खण्ड के तत्व परिचय :

1. वे तत्व जिनमें आखिरी इलेक्ट्रॉन d कक्षक में जाते है उन्हें d खण्ड के तत्व कहते है।
2. इनके गुण S तथा P खण्डो के तत्वों के मध्यवर्ती होते है अतः इन्हे संक्रमण तत्व भी कहते है।
3. इनका बाह्यतम इलेक्ट्रॉन विन्यास (n-1)d1-10 nS1-2 होता है।
4. इन तत्वों में बाह्य दो कोश आंशिक रूप से भरे होते है।
जैसे : 23V = 1S2 2S2 2P6 3S2 3P6 3d3 4S2
5. ये तत्व आवर्त सारणी के 3 से लेकर 12 वें वर्ग तक आते है।
6. वे तत्व जिनकी परमाणु अवस्था या आयनिक अवस्था में d कक्षक आंशिक रूप से भरे होते है उन्हें संक्रमण तत्व कहते है।
7. 12 वे वर्ग के तत्व Zn , cd , Hg को संक्रमण तत्व नहीं कहते क्योंकि इनकी परमाणु अवस्था तथा आयनिक अवस्था में d कक्षक पूर्ण रूप से भरे होते है।
30Zn = [Ar] 3d10 4S2
48Cd = [Kr] 4d10 5S2

80Hg = [Xe] 4f14 5d10 6S2

इनका अध्ययन संक्रमण तत्वों के साथ किया जाता है क्योंकि इनके गुण संक्रमण तत्वों से मिलते है। 
8. 11 वें वर्ग तत्व Cu , Ag , Au की परमाणु अवस्था में तो d कक्षक पूर्ण रूप से भरे होते है।  परन्तु +2 ऑक्सीकरण अवस्था में d कक्षक आंशिक भरे होते है अतः इन्हे संक्रमण तत्व कहते है। 
9. संक्रमण तत्वों की चार श्रेणियाँ 3d , 4d , 5d , 6d ज्ञात है। 
संक्रमण तत्वों के गुण :
 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास :
1. प्रथम संक्रमण श्रेणी :

 परमाणु क्रमांक
 प्रतिक
 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन
21
Sc
[Ar] 3d1 4S2
1
22
Ti
[Ar] 3d2 4S2
2
23
v
[Ar] 3d3 4S2
3
24
Cr
[Ar] 3d5 4S1
6 अपवाद
25
Mn
[Ar] 3d5 4S2
5
26
Fe
[Ar] 3d6 4S2
4
27
Co
[Ar] 3d7 4S2
3
28
Ni
[Ar] 3d8 4S2
2
29
Cu
[Ar] 3d10 4S1
1  अपवाद
30
Zn
[Ar] 3d10 4S2
0


2. द्वितीयक संक्रमण श्रेणी :

39
Y
[Kr] 4d1 5S2
40
Zr
[Kr] 4d2 5S2
41
Nb
[Kr] 4d4 5S1  अपवाद
42
Mo
[Kr] 4d5 5S1अपवाद
43
Tc
[Kr] 4d6 5Sअपवाद
44
Ru
[Kr] 4d7 5Sअपवाद
45
Rh
[Kr] 4d8 5Sअपवाद
46
Pd
[Kr] 4d10 5S0
47
Ag
[Kr] 4d10 5S1
48
Cd
[Kr] 4d10 5S2


3 . तृतीय संक्रमण श्रेणी :

 परमाणु क्रमांक
 प्रतीक
 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
57
La
[Xe] 5d1 6S2
72
Hf
[Xe] 4f14 5d2 6S2
73
Ta
[Xe] 4f14 5d3 6S2
74
W
[Xe] 4f14 5d4 6S2
75
Re
[Xe] 4f14 5d5 6S2
76
Os
[Xe] 4f14 5d6 6S2
77
Ir
[Xe] 4f14 5d7 6S2
78
Pt
[Xe] 4f14 5d9 5Sअपवाद
79
Au
[Xe] 4f14 5d10 6S अपवाद
80
Hg
[Xe] 4f14 6d10 6S2

अल्कोहल, फेनोल और ईथर (Alcohols, Phenols and Ethers) notes in hindi

12th class chemistry chapter अल्कोहल, फेनोल और ईथर (Alcohols, Phenols and Ethers) notes in hindi topic wise complete unit with examples and question answers .

एल्कोहल समावयवता , अल्कोहल का वर्गीकरण , समावयवता Classification of Alcohol

 

अल्कोहल और फिनोल बनाने की विधियां Methods of making alcohol and phenols

 

एल्कोहल के भौतिक गुण Physical Properties of Alcohol in hindi

 

एल्कोहल के रासायनिक गुण Chemical properties of alcohol in hindi

 

एस्टरीकरण , PCl5, PX3 , SOCl2 से क्रिया , अल्कोहल का निर्जलीकरण , विहाइड्रोजनीकरण

 

फ़िनॉल का अभिक्रिया , नाइट्रीकरण , ब्रोमोनीकरण , राइमरटीमान , कोल्बे

 

ईथर का नामकरण , बनाने की विधियाँ , भौतिक गुण , रासायनिक गुण

ईथर का नामकरण , बनाने की विधियाँ , भौतिक गुण , रासायनिक गुण

ईथर का नामकरण :

CH3-CH2-O-CH2-CH2-CH3     (1-ethoxy propane)

CH3-CH2-O-C6H5    (ethoxy benzene) (फेनिटोल)

C6H5-O-CH2-CH2-CH2-CH2-CH2-CH2-CH2    (1-phenoxy heptane)

ईथर बनाने की विधियाँ :

  1. जब एथिल एल्कोहल की क्रिया सान्द्र H2SOके साथ 413k ताप पर की जाती है।  डाई एथिल ईथर बनता है।

क्रियाविधि :

यह क्रिया SN2 क्रियाविधि से होती है।

कमियाँ :

इस विधि द्वारा सम्मित ईथर ही बनाये जा सकते है , असममित ईथर नहीं , क्योंकि असममित ईथर के साथ साथ अन्य ईथर भी बनते है जिससे इनका पृथक्करण आसानी से नहीं होता।

उपरोक्त क्रिया में 20 अथवा 30 एल्कोहल लेने पर मुख्य पदार्थ एल्कीन बनता है न की ईथर।

क्योंकि 30 एल्कोहल में प्रतिस्थापन अभिक्रिया की तुलना में विलोपन अभिक्रिया सुगमता से होती है (30 कार्बोकैटायन के अधिक स्थायित्व के कारण )

विलियम सन संश्लेषण :

जब सोडियम एल्कोहल की क्रिया एल्किल हैलाइड से की जाती है तो ईथर बनते है।

R-ONa + X-R’  →  NaX + R-OR

नोट : इस विधि द्वारा सममित व असममित ईथर बनाई जा सकती है।

C2H5-ONa + X-C2H5 → NaX + 2C2H5O

C2H5-ONa + X-CH3 → NaX + C2H5-O-CH3

नोट : एनिसोल का निर्माण निम्न प्रकार से होता है।

C6H5-O-Na + X-CH3 → C6H5-O-CH3 + NaX

CH3-ONa + X-C6H5 → CH3-O-C6H5 + NaX

द्वितीय क्रिया संभव नहीं है क्योंकि हैलोबेंजीन अनुनाद के कारण C-X के मध्य द्विबंध आ जाते है जिससे बंध अधिक मजबूत हो जाता है।

नोट : तृतीयक हैलाइड की क्रिया सोडियम ऐथाऑक्साइड से करने पर मुख्य पदार्थ एल्कीन बनती है।

व्याख्या :

ऐथाऑक्साइड आयन नाभिक स्नेही के साथ साथ एक प्रबल क्षार भी है।  जो 30 कार्बोकैटायन में से प्रोटॉन बाहर निकाल देता है जिससे मुख्य पदार्थ एल्कीन बनता है।

भौतिक गुण :

  1. डाई मेथिल तथा डाइएथिन गैसीय अवस्था में जबकि अधिक कार्बन वाले ईथर द्रव अवस्था में होते है।
  2. कम कार्बन वाले ईथर जल के साथ हाइड्रोजन बंध बना लेते है इसलिए जल में विलेय हो जाते है।
  3. ईथर में C-O-C बंध कोण 11107’ मिनट होता है जो की चतुष्फलकीय कोण 109028मिनट से अधिक हो क्योंकि ईथर में दो एल्किल समूह में मध्य पारस्परिक प्रतिकर्षण होता है।
  4. एनिसोल में अनुनाद के कारण C-O bond की बंध लम्बाई कम होती है।

रासायनिक गुण :

H-X से क्रिया :

ईथर की क्रिया H-X से करने पर एल्कोहल व एल्किल हैलाइड बनते है।

R-O-R + HX → R-OH + RX

C2H5-O-C2H5 + HI → C2H5-OH + C2H5-I

नोट : असममित ईथर की क्रिया H-X से करने पर हैलोजन परमाणु उस एल्किल समूह से जुड़ता है जिसमे कार्बन कम होते है।

C2H5-O-CH3 + HI → C2H5-OH + CH3-I

नोट :  जब ईथर में ऑक्सीजन से बेंजीन वलय जुडी हो तो फिनॉल अवश्य बनती है।

C6H5-O-CH3 + HI → C6H5-OH + CH3-I

CH3-O-C6H5 + HI → XXXXX

द्वितीय क्रिया सम्भव नहीं है क्योंकि अनुनाद के कारण C6H5-O बंध में द्विबंध गुण आ जाते है जिससे बंध अधिक मजबूत हो जाता है।

नोट : यदि ईथर में ऑक्सीजन से तृतीय एल्किल समूह जुड़ा हो तो 30 हैलाइड अवश्य बनते है।

प्रश्न : एनिसोल में इलेक्ट्रॉन स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया O व P पर होती है क्यों ?

उत्तर : ऐनिसोल में +R प्रभाव के कारण O व P पर इलेक्ट्रॉन का घनत्व अधिक होता है जिससे electron स्नेही (+E) O व P पर प्रहार करता है।

फ़िनॉल का अभिक्रिया , नाइट्रीकरण , ब्रोमोनीकरण , राइमरटीमान , कोल्बे

Phenol reactions फ़िनॉल का अभिक्रिया :

1. इलेक्ट्रॉन स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया :
फीनॉल +R प्रभाव के कारण O व P पर इलेक्ट्रॉन का घनत्व अधिक हो जाता है जिससे इलेक्ट्रॉन स्नेही (E+) O व P पर प्रहार करता है अतः ये अभिक्रिया O व P पर होती है।
ये क्रियाएँ निम्न है।
1. नाइट्रीकरण :
जब फिनॉल की क्रिया तनु HNO3 के साथ की जाती है।   O व P नाइट्रोफिनॉल बनती है।
नोट : जब फिनॉल की क्रिया सांद्र HNO3 के साथ सांद्र H2SOकी उपस्थिति में की जाती है तो पिक्रिक अम्ल बनता है।
प्रश्न 1 : O-nitro फिनॉल का क्वथनांक कम है जबकि p -नाइट्रो फिनॉल का क्वथनांक अधिक होता है क्यों ?
उत्तर : O नाइट्रो फिनोल में अन्तः अणुक हाइड्रोजन बंध होता है।  अणुओ के मध्य संगुणन नहीं होता अतः क्वथनांक कम वाष्पशीलता अधिक होती है।
p nitro फिनॉल का क्वथनांक कम होने के कारण इसे भापिन आसव द्वारा अलग किया जा सकता है।
2. ब्रोमोनीकरण :
जब फिनॉल की क्रिया ब्रोमीन के साथ CHClया CS2 की उपस्थिति में की जाती है इसे O व P ब्रोमो फिनॉल बनती है।
जब फिनॉल की क्रिया ब्रोमीन जल से की जाती है 2,4,6 ट्राई ब्रोमो फिनॉल का सफ़ेद अवक्षेप बनता है (फिनॉल की पहचान )
3. राइमरटीमान अभिक्रिया :
जब फिनॉल की क्रिया CHCl3 व NaOH के साथ की जाती है तो सेलैसिल एल्डिहाइड बनता है।
4. कोल्बे अभिक्रिया :
जब सोडियम फिनेट की क्रिया CO2 के साथ उच्च दाब व ताप पर की जाती है तो सोडियम फेनिल कार्बोनेट बनता है जिससे पुनर्विन्यास से सोडियम से लैसिलेट बनता है इसे तनु HCl से क्रिया करने पर सैलैलीक अम्ल बनता है।
5. फिनॉल की क्रिया यशदरज (ज़िंक चूर्ण) के साथ करने पर बेंजीन बनती है।
6. ऑक्सीकरण :
फिनॉल का ऑक्सीकर क्रोमिक अम्ल (H2CrO4) अथवा वायु व प्रकाश की उपस्थिति में करने पर p बेंजोफिनोन बनता है।

औद्योगिक महत्व के एल्कोहल :

1. मैथिल एल्कोहल इसे काष्ट एल्कोहल या काष्ट स्प्रिट कहते है।
इसे लकड़ी के भंजक आसवन से बनाया जाता है।
मैथिल एल्कोहल की कम मात्रा के सेवन से अंधापन तथा अधिक मात्रा के सेवन से मृत्यु हो सकती है।
2. एथिल एल्कोहल :
इसे अंगूर , गन्ने का रस , मोलेसेज (शीरा)से किण्वन विधि से प्राप्त किया जाता है।
प्रश्न 1 : ऐल्कोहल का विकृतिकरण किसे कहते है।
उत्तर : एल्कोहल का उपयोग मदिरा के रूप में किया जाता है इसे पीने के अयोग्य बनाने के लिए इसमें विषैले पदार्थ जैसे मैथिल ऐल्कोहल व पिरिडिन मिला देते है।  इसे विकृत एल्कोहल कहते है।