द्विघटकीय मैग्मा का क्रिस्टलन Crystallization of binary magma in hindi

Crystallization of binary magma in hindi (द्विघटकीय मैग्मा का क्रिस्टलन) : मैग्मा के शीतलन या दबाव में परिवर्तन पर खनिज क्रिस्टलित होते है।   प्रकार संघटन के पश्चात् आग्नेय शैल निर्मित होते है।  शैलों में खनिजों की संख्या मैग्मा के संघटन और शीतलन की स्थितियों पर निर्भर करती है।  यहाँ हम द्वीखनिजीय शैलो के बारे में पढेंगे।
द्विघटकीय मैग्मा के क्रिस्टलन की सबसे बड़ी विशेषता घटकों का एक दूसरे के हिमांक पर प्रभाव है।  उदाहरणर्थ ल्यूसाइट का हिमांक 1420′ C है लेकिन औजाइट (1220′ c) की उपस्थिति में ल्यूसाइट का क्रिस्टलन 1220 डिग्री सेंटीग्रेट से कम पर प्रारम्भ हो जाता है।
द्विघटकीय मैग्मा को निम्न के आधार पर समझा जा सकता है –
1. Phase : शैल में उपस्थित घटक phase कहलाते है।
2. phase diagram : प्लेजिओक्लेज वर्ग के एल्बाईट और एनार्थाईट घटकों वाले द्विघटकीय मैग्मा से क्रिस्टलन निम्न चित्र से प्रदर्शित करते है –

3. Eutectic point : जिस बिन्दु पर दोनों घटकों का क्रिस्टलन एक स्थिर तापक्रम पर होता है , गलन क्रान्तिक बिन्दु कहलाता है।
4. सर्वान्गसम गलन (congruent melting ) : यदि किसी क्रिस्टल शैल को तापक्रम बढाकर गलाते है और उस शैल से उसी क्रिस्टल के घटक निकलते है जिससे वह बना है तो क्रिस्टल शैल congruent कहलाता है और यह क्रिया congruent melting कहलाती है।  यदि शैल से अलग क्रिस्टल के घटक निकलते है तो यह incongruent melting कहलाती है।
उदाहरण : ल्यूसाइट का हिमांक 1420’c है लेकिन औजाइट 1220’c की उपस्थिति में ल्यूसाइट का क्रिस्टलन 1220’c से कम पर ही प्रारम्भ हो जाता है।

 

आग्नेय शैलों का रूप Forms of igneous bodies in hindi , Description of igneous body

Forms of igneous bodies in hindi आग्नेय शैलों का रूप: आग्नेय शैल बॉडीज दो प्रकार की होती है –
1. बहिर्वेधी शैल रूप ( extrusive Igneous bodies )
2. अंतर्वेधी शैल रूप (intrusive Igneous bodies )
1. बहिर्वेधी शैल रूप ( extrusive Igneous bodies ) : बहिर्वेधी शैल रूप मैग्मा के भू पृष्ठ पर उद्गार के फलस्वरूप बनते है।  इनका उदाहरण है – लावा प्रवाह
2. अंतर्वेधी शैल रूप (intrusive Igneous bodies ) : ये मैग्मा के भू पृष्ठ के नीचे कुछ गहराई पर कनसोलिडेशन से बनते है।  इस प्रकार के शैल रूप उनकी आकृति , आकार में भिन्नता प्रकट करते है।
इनके उदाहरण – Batholith , stock , dyke , sill etc.
अन्तर्वेधी रूप दो प्रकार के होते है –

  • Discordant bodies (अननुस्तरी ) : अनुनस्तरी रूप में ये ऊपरी layer को काटकर ऊपर आ जाती है। इनके उदाहरण – batholith , stock and dykes
  • अनुस्तरी (Cordant bodies) : अनुस्तरी आग्नेय रूप है जो शैल परतों के बीच में ही रह जाती है।  इस प्रकार के रूपों के उदाहरण है – sills , lopoliths and laccoliths

Description of igneous bodies

Batholith : बैथोलिथ अंतर्वेधी आग्नेय शैलो की विशालतम राशि है।  प्रो.आर.ए. डेली के अनुसार बैथोलिथ पर्वत रचना मण्डल में पाए जाने वाले भू-पर्पटी के अधोलग्न या अध:शायी अंतर्वेधी पुंज है।  ये वलित मेखलाओ के अक्ष की दिशाओ में दीर्घत होते है।  इनकी छत अनियमित एवं गुम्बदाकार होती है।  इनके पाशर्व खड़े ढाल होते है तथा बैथोलिथ गहराई के साथ शैने: शैने: चौड़े ग्रेनाइटिक अथवा ग्रेनोडाईरोटिक होती है।  इनका सामान्य व्यास लगभग 100 KM या उससे अधिक होता है।
Stock and Boss : बैथोलिथ के छत पर आक्रान्त शैलो से घिरे हुए अंतर्वेधी के भाग को स्कंध (stock) कहते है।  ये छोटे होते है इनका व्यास लगभग 10 से 20km होता है।  बोस टर्म उस स्कंध के लिए काम ली जाती जो लगभग पूर्णतया गोलीय सतह रखती है।
Lopolith : लोपोलिथ एक रकाबी (soucer) के आकार की अनुस्तरी अंतर्वेधी राशि है जो की एक बेसिन की आकृति में नीचे की ओर मुड़ी हुई होती है।  इसका व्यास सामान्यत: इसकी मोटाई 10 से 20 गुना होता है।  इस प्रकार लोपोलिथ , लोकोलिथ से बहुत अधिक बड़ा होता है।  इसका कम्पोजिशन सामान्यत: बेसिक होता है।
Laccolith : एक लोकोलिथ लैंस के आकार की अन्तर्वेधि आग्नेय राशि है जो की ऊपर वाली परतों को एक गुम्बद के आकार के मेहराब के रूप में उठा देती है।  एक तल समतल और शीर्ष गुम्बद होता है।  एक लैकोलिक 2 से 3 km व्यास और कई सैकड़ो मीटर मोटाई का हो सकता है।  ये बैथोलिथ की तुलना में बहुत छोटा होता है।

 

Phacolith : फैकोलिथ चन्द्रमा की प्रथम व अंतिम चौथाई आकार की आग्नेय शैल रूप है।  वे फोल्डेड परतों के क्रिस्टस और ट्रफस में पाए जाते है।  फेकोलिथ तब बनता है जब आग्नेय पदार्थ फोल्डेड क्षेत्र में घुस जाता है।  आग्नेय पदार्थ क्रिस्टस और ट्रफस में पाया जाता है क्योंकि ये न्यूनतम तनाव वाले क्षेत्र होते है।
Sill : सिल एक आग्नेय राशि शीट है जो की पहले से निर्मित परतों के बेडिंग प्लेन्स के समान्तर बनी है।  वे परतों के attitude  के आधार पर उर्ध्वाधर अथवा क्षैतिज मुड़ी हुई हो सकती है।  सिलस की मोटाई कुछ सेंटीमीटर से कई सैकड़ो मीटर तक हो सकती है।  लेकिन इनकी मोटाई इनकी लम्बाई से बहुत कम होती है।  सामान्यत: डोलेराइट्स और बेसाल्ट के सिल्स बनते है।
Dyke: डाइक एक दिवार होती है जैसे की आग्नेय राशि की।  यदि पहले से निर्मित शैलो की परतों को काटते हुए बाहर निकली होती है।  डाइक प्राय: उर्ध्वाधर या जीवा रेखाओ के रूप में हो सकती है।  डाईक समूह के प्राप्त में प्राप्त की जाती है जहाँ वे एक दिशा के समान्तर अथवा एक केन्द्र से त्रिज्यीय रूप में गति करती हुई रहती है।  एक डाईक बाह्य गोलाकार आवरण अथवा कोणीय रूप जैसे रिंग डाईक कहते है।
ये दोनों मिलकर एक कोण शीट कही जाती है।  डाईक संभवत: एक क्रस्टल विभंग प्रदर्शित करती है जिसमे मैग्मा इन्जेक्टेड होते है।
Volcanic plug : वोल्केनिक प्लग एक उर्ध्वाधर सिलेंडरिकल आकृति की आग्नेय राशि है जो की एक खुरदरा अर्द्ध चंद्राकार या गोलाकार क्रोस सेक्शन होता है।  यह एक उद्गरित ज्वालामुखी के नाल को प्रदर्शित करता है।  वोल्केनिक प्लग का व्यास सैकड़ो मीटर से कई किलोमीटर या उससे भी अधिक होता है।

आग्नेय शैलों की संरचना Structures of IGneous rocks in hindi

Structures of IGneous rocks in hindi (आग्नेय शैलों की संरचना ) : शैलो की क्षेत्रीय अवस्था को संरचना कहते है।  आग्नेय शैलों की निम्नलिखित संरचना होती है –
1. flow structures : कभी कभी आग्नेय शैल समान्तर अथवा अंशीय समान्तर बेंड अथवा structure दिखाती है जिसका कारण है – मैग्मा अथवा लावा के शीतलन एवं क्रिस्टलन के दौरान प्रवाह होना।  इस प्रवाह की संरचना को फ्लो संरचना कहते है।
2. Reaction Rims : आग्नेय शैल के निर्माण के दौरान नये बने खनिज एवं मैग्मा में क्रिया होती है।  यदि यह क्रिया पूर्ण हो जाती है , नए बने खनिज पूर्णत: अदृश्य हो जाते है।  दूसरी ओर यदि ये क्रिया पूर्ण नहीं होती है तो तीव्र नाशी खनिज कणों के चारो ओर क्रिया उत्पाद आवृति रूप से प्राप्त होते है।  क्रिया उत्पादों का यह जोन जो खनिज कणों की सतह के पास प्राप्त होता है “reaction rim” कहा जाता है।  यह रिम दो प्रकार की होती है –

  • coronas (ताप) : यह rim प्राथमिक मैग्नेटिक क्रियाओ के द्वारा बनती है।  इस एरिये में मिलने वाले मिनरल को 5 carn मिनरल कहते है।
  • Kelyphitic borders : ये द्वितीय प्रक्रिया जैसे की metamorphism के दौरान विकसित होते है।
3. Xenolithic structures : जब मैग्मा भू पृष्ठ की ओर उठता है तो इसमें असंगत शैल कण मिल जाते है।  यदि वे संगृहीत नहीं हो पाते है तो वे आग्नेय शैलो में फंसे रह जाते है और ये गठन में विभिन्नता उत्पन्न कर देता है इस प्रकार असंगत शैल के फंसे हुए कण जिनोलिथस कहे जाते है और यह संरचना जिनोलिथ संरचना कहलाती है।
उदाहरण – Xenolith का सही उदाहरण diamond है।

4. Vesicular structure : भू गर्भस्थ मैग्मा में कुछ गैसे दाब पर घुली रहती है।  लावा के बहिर्वेधी उद्गार पर इन गैसों के निकलने से गुहिकाएं एवं बुदबुदों के आकार के गर्त बन जाते है।  इन्हें स्फोटगर्त (vesicles) कहते है।  कई बार ये स्फोटगर्त बेलनाकार या नालवत गुहिकाओं के रूप में होते है।  इन गर्तो पर उत्तरजात खनिजों (जिओलाइट इत्यादि) के द्वारा भरण पर वातामक बनते है।  इस प्रकार के बहिर्वेधी उद्गार को वातामकी शैल कहते है।

5. Pegmatitic structure : यदि ये मिश्रित खनिज कण आकार में कुछ सिमित सेंटीमीटर के हो तो ऐसे शैल को pegmatitic structure कहते है।
यह संरचना एक बड़ी व अनियमित प्रकार के क्रिस्टलन को दर्शाती है।
सारांश में यह कहा जा सकता है की आग्नेय शैलों गठन एवं संरचना शैलो के निर्माण की प्रक्रिया को बताते है।

 

आग्नेय शैलो के गठन व सूक्ष्म संरचनाएं Textures of igneous rocks in hindi

Textures of igneous rocks in hindi (आग्नेय शैलो के गठन व सूक्ष्म संरचनाएं) : texture का अर्थ है किसी शैल में खनिज कणों की आकृति , आकार , एवं स्थिति व्यवस्था। या शैलो के विभन्न खनिज घटकों एवं कांच के पारस्परिक संबंधो को शैल गठन कहते है।
विभिन्न गठन समुच्चयो के सानिध्य से सूक्ष्म संरचना का निर्माण होता है।  किसी शैल के गठन को निम्नलिखित के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है।
1. क्रिस्टलन की दर (degree of crystallization)
2. क्रिस्टलों का आकार या कणिकता (size of grains ओर granularity)
3. क्रिस्टलों की आकृति (shape of crystals)
4. mutual relationship of crystals and glass (क्रिस्टलों और काचीय द्रव का पारस्परिक सम्बन्ध)

1. क्रिस्टलन की दर (degree of crystallization)

क्रिस्टलन की दर के आधार पर आग्नेय शैल के गठन को निम्नलिखित समूहों में विभाजित किया जा सकता है –
a. पूर्ण क्रिस्टली (holo crystalline) : जो शैल पूर्णतया क्रिस्टलीय पदार्थों से बने होते है उन्हें पूर्ण क्रिस्टली कहते है।  गहराई पर निर्मित होने व शैल पूर्ण क्रिस्टलीत होते है।  example – ग्रेनाइट
b. holohyaline (पूर्ण कांचीय) : जो शैल पूर्णतया अक्रिस्टलिय पदार्थ काँच के बने होते है उन्हें पूर्ण कांचिक कहते है।  अंतर्वेधी के पाश्र्वो एवं भू पृष्ठ पर उद्गार की स्थितियों में श्यान मैग्मा में द्रुत शीतलन पर निर्मित होने वाले शैल पूर्ण कांचीय होते है।  उदाहरण – टैकीलाइट (बैसाल्टी संघटन)
c. अंश क्रिस्टली या अर्द्ध क्रिस्टली (mero or hypo crytalline) : जिन शैलो में कुछ अंश क्रिस्टल का तथा कुछ अंश कांच का बना होता है उन्हें अंश क्रिस्टली कहते है।  ये भू पृष्ठ पर उद्गार के फलस्वरूप निर्मित होते है।  उदाहरण – सामान्य बैसाल्ट

2. क्रिस्टलों का आकार या कणिकता (size of grains ओर granularity)

क्रिस्टल का आकार शीतलन की गति , मैग्मा की श्यानता तथा क्रिस्टलित होने वाले पदार्थ की मैग्मा में सान्द्रता पर निर्भर है।  यदि शीतलन की दर कम हो तो कणों को क्रिस्टलीत होने का समय मिल जाता है और बड़े क्रिस्टल बनते है।  यदि शीतलन की दर तेज हो तो छोटे क्रिस्टल बनते है और यदि शीतलन की दर इतनी तेज हो की कण क्रिस्टलित न हो पाए तो ग्लाशी texture बनता है।
यदि क्रिस्टल केवल नेत्रों या लैंस की सहायता से देखे जा सके तो शैल को दृश्य क्रिस्टली (phanero crystalline) कहते है और यदि क्रिस्टल न देखे जा सके तो उने अदृश्य क्रिस्टली (aphanatic) कहते है।
दृश्य क्रिस्टली शैलो को मुख्य तीन भागों में बांटा गया है
a. स्थूलकणी
b. मध्यकणी
c. सूक्ष्म कणी
अदृश्य क्रिस्टली शैलो को दो भागों में बांटा गया है –
d. सूक्ष्म क्रिस्टली
e. गूढ़ क्रिस्टली
a. स्थूलकणी (coarse grained texture) : दृश्य क्रिस्टली शैलो में यदि क्रिस्टलों का औसत व्यास ५म्म से अधिक हो तो वे स्थूलकणी कहलाते है।
b. मध्यकणी (medium grained texture) : यदि क्रिस्टलों का औसत व्यास 5 से 1 mm के बीच हो।
c. सूक्ष्म कणी (fine grained texture) : यदि क्रिस्टलों का औसत व्यास 1 mm से कम हो।
d. सूक्ष्म क्रिस्टली (micro crystalline texture) : अदृश्य क्रिस्टली शैलो के कण यदि सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखे जा सके तो उन्हें सूक्ष्म क्रिस्टली कहते है।
e. गूढ़ क्रिस्टली (crypto crystalline) : सूक्ष्मदर्शी की सहायता से न पहचाने जा सकने वाले क्रिस्टलों को गूढ़ क्रिस्टली कहते है।

3. क्रिस्टलों की आकृति (shape of crystals)

क्रिस्टलों की आकृति का वर्णन क्रिस्टल के ज्यामितीय रूप तथा क्रिस्टल फलकता के आधार पर किया जा सकता है।  इस आधार पर इन्हें तीन भागों में बांटा गया है।
i. पूर्ण फलकीय (Euhedral) : यदि क्रिस्टल में उसके समस्त क्रिस्टलीय फलकों के अनुरेख उपस्थित हो।
ii. अंश फलकीय (subhedral) : यदि क्रिस्टल फलक अंशत: फलकीय हो।
iii. अफलकीय (anhedral) : यदि क्रिस्टल में क्रिस्टल फलक न हो।

4. mutual relationship of crystals and glass (क्रिस्टलों और काचीय द्रव का पारस्परिक सम्बन्ध)

विभिन्न क्रिस्टलों के आपस में संबंधो के आधार पर आग्नेय शैलो के गठन के निम्नलिखित मुख्य प्रकार अभिनिर्धारित किये जाते है –
a. समकणिक गठन (equigranular texture)
b. असमकणिक गठन (inequigranular texture)
c. दैशिक गठन (directive texture)
d. अन्तर्वेधित गठन (intergrowth texture )
a. समकणिक गठन (equigranular texture) : यदि शैल के समस्त खनिज प्राय: समान आकार के हो तो उस शैल के गठन को समकणिक कहते है।
समकणिक गठन निम्न प्रकार के होते है –
  • सर्वस्वरूपी (panidiomorphic texture ) : यदि समस्त समकणिक खनिज पूर्ण फलकीय हो तो शैलो के गठन को सर्वस्वरूपी कहते है।  उदाहरण – lamprophyres
  • (अंश स्वरुपिक) Hypidiomorphic texture : यदि समस्त समकणिक खनिज अंश फलकीय हो तो शैलो के गठन को अंश स्वरुपिक कहते है।  example – granites and syenites
  • (अपरुपक) allotriomorphic texture : यदि समस्त समकणिक अफलकीय हो तो शैलो के गठन को अपरूपक कहते है।  उदाहरण – aplites
  • (सूक्ष्म कणिक) microgranular texture : सूक्ष्मक्रिस्टलीय आग्नेय शैलो के क्रिस्टल सामान्यत: अफलकीय अथवा अंश फलकीय होते है ऐसे गठन सूक्ष्म कणिक गठन कहते है।
  • orthophyric texture : कुछ उच्च फेल्सपेथिक शैल जैसे की ओर्थोफायरीज और पेलजियोफायरीज संभवतः सूक्ष्म कणिक व स्वरुपिक गठन रखते है।  ऐसे गठन को ऑर्थोफायरिक कहते है।
  • Felsitic texture: यदि एक आग्नेय शैल समान भार का गूढ़ क्रिस्टलीय पदार्थ रखती है तो ऐसे गठन को फेल्ससिटीक गठन कहते है।
b. असमकणिक गठन (inequigranular texture) : यदि आग्नेय शैल के विभिन्न खनिज क्रिस्टल एक ही आकार के न हो तो ऐसे गठन को असमकणिक गठन निम्न प्रकार के होते है –
  • (दीर्घ क्रिस्टल अंतर्वेधी ) Porphyritic texture : पॉर्फिराइटी में बड़े क्रिस्टल या लक्ष्य क्रिस्टल (phenocryst) सूक्ष्म कणिक अंश क्रिस्टलों अथवा कांचीय आधात्रिक (groundmass ) में समावृत्त होते है।  यदि आधा मैग्मा गहरायी पर अर्द्ध क्रिस्टलीत हो और एकाएक धरातल पर उद्ग्रित हो जाए तो पॉर्फिराइटी गठन विकसित होगी।  यदि कुछ पदार्थ मैग्मा में अपेक्षतया अधिक सांद्रित हो तो उनके लक्ष्य क्रिस्टल बनेंगे।  पॉर्फिराइटी गठन अधिकांशत: ज्वालामुखी एवं अधिवितलीय शैलो में सिमित है।
  • लघु अन्तर्वेशी गठन (Poikilitic texture) : इस गठन में छोटे क्रिस्टल बिना किसी अभिविन्यास के बड़े क्रिस्टलों में परिबद्ध होते है।  बड़े पोषक क्रिस्टल के लिए औयकोक्रिस्ट (ग्राही क्रिस्टल) तथा परिबद्ध क्रिस्टलों के लिए कैडाक्रिस्ट (गृहीत क्रिस्टल) नाम दिए जाते है।
  • ophitic texture : यदि ग्राही क्रिस्टल औजाइट तथा गृहीत प्लेजिओक्लेज हो तो इस विशेष प्रकार के पायकिलिटी गठन को ओफाइटी गठन कहते है।  इस प्रकार के गठन डोलेराइट के लिए प्रारूपिक है।  इस गठन का विकास अपेक्षतया अधिक जटिल है।  इस गठन के विकास के लिए आवश्यक है की एक मैग्मा में एक घटक अपेक्षतया अधिक मात्रा में उपस्थित हो तथा उसका क्रिस्टल मितस्थायी व्यवस्था में होता है।  इस प्रकार पूर्ण निर्मित खनिज उसमे परिबद्ध हो जाते है।
  • Intergranular and instersertal  : यदि प्लेजिओक्लेज के बने ढांचे या जालक के मध्य त्रिकोणीय या बहुभुजाकर अन्तराल औजाइट , ओलिविन या लौह ऑक्साइड के कणों से पूरित हो तो उस व्यवस्था को अन्तराकणिक गठन कहते है।  अन्तराल के कांचीय या गूढ़ क्रिस्टलीय पदार्थ भरण पर बने गठन को निर्विष्ट कांची कहते है।
c. दैशिक गठन (directive texture) : मैग्मा में क्रिस्टलन के समय प्रवाह के कारण दैशिक गठन का विकास होता है।  प्रवाह द्वारा क्रिस्टल और क्रिस्टलीकाएं समान्तर रेखाओ तथा पट्टियों में विन्यस्त हो जाते है।  मुख्य दैशिक गठन निम्न प्रकार के होते है।
  • Trachytic texture : कुछ ज्वालामुखी शैल जैसे – ट्रेकाइट , फेल्सपारों के प्रवाह लावा प्रवाह की दिशा में समान्तर रेखाओ में व्यवस्थित हो जाते है।  इसे ट्रेकाइटिक गठन कहते है।
  • Hyalopilitic texture : ज्वालामुखी शैल में यदि फेल्सपार प्रवाह , ग्लासी पदार्थ के साथ मिश्रित पाया जाए तो ऐसे गठन को हाइलोफिलिटिक गठन कहते है।

d. अन्तर्वेधित गठन (intergrowth texture )

गलन क्रांतिक पर क्रिस्टलन तथा अपविलयन (विलयन का प्रतिकूल खनिजों का विभिन्न क्रिस्टल प्रवास्थाओ में पृथक्करण ) के कारण दो खनिज एक दूसरे के भीतर विकसित होते है।  इस प्रकार विकसित गठन को अन्तवृद्धि गठन कहते है।
पर्थाइट (पोटाश फैल्सपार एवं प्लेजिओक्लेज ) तथा आलेखीय (क्वार्ट्ज तथा पोटाश फेल्सपार) अंतवृद्धि गलन क्रांतिक की स्थिति में क्रिस्टलन पर विकसित होती है।
पेग्मैटाइट तथा ग्रेनोफायर अन्तवृद्धि गठन के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।

आग्नेय शैलों का वर्गीकरण classification of igneous rocks in hindi

classification of igneous rocks in hindi आग्नेय शैलों का वर्गीकरण : पृथ्वी की भूपर्पटी का लगभग 90% भाग आग्नेय शैलो से निर्मित है लेकिन इसकी इतनी उपस्थिति अवसादी व कायान्तरित शैलो की पतली परतों से पृथ्वी की सतह के निचे छिपी हुई है।

आग्नेय शैलो का वर्गीकरण एक जटिल प्रश्न है , विभिन्न वैज्ञानिको ने विभिन्न उद्देश्यों से भिन्न वर्गीकरण प्रस्तुत किये है।  वर्गीकरण मुख्यतया निम्नलिखित आधारों पर किया गया है –

  1. रासायनिक संघटन व सिलिका प्रतिशत के आधार पर
  2. खनिज संघटन के आधार पर
  3. भू वैज्ञानिक उपस्थिति अवस्था के आधार पर
  4. शैलो के गठन के आधार पर

1. रासायनिक संघटन व सिलिका प्रतिशत के आधार पर

आग्नेय शैलो के रासायनिक वर्गीकरण के सन्दर्भ में क्रास , इंडीज , पिरसो एवं वाशिंगटन के नाम उल्लेखनीय है।  उन्होंने खनिज संरचना के सिद्धांतो के आधार पर रासायनिक संघटन से मानक खनिज समुदाय (norm) की गणना की।

आग्नेय शैल में ऑक्साइड कॉम्पोनेन्ट SiO2 शैल के वजन का 40-75% होता।  Al2O3 का प्रतिशत सामान्य 10-20% तक होता है।  इनके अतिरिक्त Ca , Mg , Fe के ऑक्साइड 10% तक उपस्थित रहते है।

सिलिका प्रतिशत के आधार पर 

सिलिका प्रतिशत के आधार पर आग्नेय शैलो को निम्न ग्रुपों में वर्गीकृत किया गया है।

  1. अल्ट्राबेसिक शैल : इन शैलो में सिलिका प्रतिशत 45% से कम होती है उदाहरण – पेरीडोटाइट (peridotite)
  2. बेसिक शैल : इन शैलो में सिलिका 45-55% तक होती है example – गेब्रो व बोसाल्ट (gabbro and basalt)

iii. बेसिक शैल : इन शैलो में सिलिका 55-65% तक होती है उदाहरण – डियोराइट (Diorite)

  1. ऐसिड शैल : इन शैलो में सिलिका की मात्रा 65% से भी अधिक होती है उदाहरण – ग्रेनाइट (granite)

2. खनिज संघटन के आधार पर

खनिज संघटन के आधार पर किये गए वर्गीकरण सहज और अधिक प्रचलित है।  आग्नेय शैलों में पाये जाने वाले खनिज मुख्यतया तीन प्रकार के होते है –

  • आवश्यक (essential)
  • गौण (accessory)
  • उत्तरजात (secondary)

वे समस्त खनिज जिनकी उपस्थिति शैल निदान के लिए आवश्यक है , आवश्यक खनिज कहलाते है।  वे खनिज जो अल्प मात्रा में पाए जाते है गौण खनिज कहलाते है।  आवश्यक व गौण खनिज सीधे मैग्मा से निर्मित होते है।  इन खनिजो पर ताप , दाब और परिसंचारी विलयन के प्रभाव में परिवर्तन से उत्पन्न खनिजो को उत्तरजात या द्वितीयक खनिज कहते है।

इन समस्त खनिजों को दो मुख्य वर्गों में रखा गया है –

 फेल्सिक (एसिड खनिज )  मैफिक (बैसिक खनिज )
 क्वार्ट्ज   अभ्रक 
 फेल्सपार   पाइरोक्सिन 
 फेल्सपैथोइड   एम्फिबोल 
   आलिविन 
   लौह ऑक्साइड 
   एपाटाइट 

फेल्सिक खनिज : बहुल क्षेत्र हल्के रंग के या अल्पवर्णी , कम आपेक्षिक घनत्व (about 2.7 ) वाले होते है।  इन्हें ऐसिड खनिज भी कहते है।  उदाहरण – ग्रेनाइट , एल्कली फेल्सपार मैफिक खनिज : ये खनिज श्यामवर्णी , अधिक आपेक्षिक घनत्व (about 3.2) वाले होते है।  इन्हें बेसिक खनिज भी कहते है।  इनमे अधिक मात्रा में फेरोमैग्नीशियम खनिज होते है।

3. भू वैज्ञानिक उपस्थिति अवस्था के आधार पर

शैंड एवं होम्स ने खनिजो की सिलिका संतृप्ति के आधार पर वर्गीकरण प्रस्तुत किया है।  उच्च सिलिका वाले खनिज , जो मुक्त सिलिका अर्थात क्वार्ट्ज के साथ रह सकते है।  संतृप्त खनिज कहलाते है।

इसके विपरीत निम्नसिलिकीयन के मुक्त सिलिका के साथ अस्थिर खनिज असंतृप्त खनिज कहलाते है।

क्वार्ट्ज , फेल्सपार , पाइराक्सिन इत्यादि संतृप्त तथा ओलिविन , फेल्सपैथोइड इत्यादि असंतृप्त खनिज है।

इन्ही खनिजो की उपस्थिति के आधार पर शैलो को निम्नलिखित वर्गों में रखा जा सकता है –

  • अति संतृप्त शैल (upper saturated) – मुक्त सिलिका युक्त
  • संतृप्त शैल (saturated) – संतृप्त खनिजयुक्त
  • असंतृप्त शैल (under saturated) – असंतृप्त खनिज युक्त

4. शैलो के गठन के आधार पर

खनिजो के अतिरिक्त शैलों का गठन भी वर्गीकरण के लिए उपयोगी है।  गठन की सहायता से शैलो की उत्पत्ति की अवस्था ज्ञात की जा सकती है।  आग्नेय शैल निम्नलिखित उत्पत्ति के होते है –

  1. अंतर्वेधी शैल (intrusive rocks)
  2. बहिर्वेधी शैल (extrusive rocks)
  3. अन्तर्वेधी शैल :भू पृष्ठ के अन्दर गहराई पर मैग्मा से निर्मित होने वाले आग्नेय शैलो को अंतर्वेधी आग्नेय शैल कहते है।  उदाहरण – गेब्रो , डायोराइट निर्माण की गहराई के आधार पर इन्हें दो ग्रुपों में बांटा गया है –
  • वितलीय शैल (plutonic)
  • अधिवितलीय (hypabyssal)
  • वितलीय शैल (plutonic) : जब शैल बहुत अधिक गहराई पर क्रिस्टलित होते है तो वे वितलीय शैल कहलाते है।  मैग्मा अधिक गहराई पर होने से इन्हें क्रिस्टलित होने का काफी समय मिल जाता है और ये सुविकसित क्रिस्टल शैल प्रदान करते है।
  • अधिवितलीय (hypabyssal) : इन शैलो का निर्माण तब होता है जब मैग्मा अर्द्ध सतह के समीप जमता है ये शैलो क्षेत्रीय शैल में इंजेक्शन की तरह प्राप्त होती है इनके texture वितलीय शैलो की तुलना में छोटे होते है।
  1. बहिर्वेधी शैल (extrusive rocks) :मैग्मा के भू सतह पर उद्गार के फलस्वरूप बने लावा के संघनन पर निर्मित आग्नेय शैलो को बहिर्वेधि शैल कहते है।  उदाहरण – बैसाल्ट , रायोलाइट

इसे ज्वालामुखी शैल भी कहते है।  जब लावा ठंडा होता है और तेजी से क्रिस्टलित होता है तो इस शैल के texture पतले , महीन एवं ग्लासी बनते है।

BOWEN’s reaction series in hindi एन.एल. बोवेन की अभिक्रिया श्रेणी

BOWEN’s reaction series : मैग्मा का ठण्डा होकर क्रिस्टलीत होना एक जटिल रासायनिक प्रक्रिया है जिसमे बहुत सारे सिलिकेट मिनरल एक निश्चित क्रम में क्रिस्टलीत होते है।
इन सिलिकेट पदार्थों के ठंडा होकर क्रिस्टलीत होने की क्रिया को N.L बोवेन ने दो अभिक्रिया श्रेणियो से समझाया है।
1. संतत श्रेणी (continuous series )
2. असंतत श्रेणी (discontinuous series)

 1. संतत श्रेणी (continuous series )

मैग्मा में गलन क्रांतिक पर क्रिस्टलित द्रव का अवशिष्ट द्रव से कोई सम्बन्ध नहीं रहता है लेकिन कुछ मैग्मा से विकसित क्रिस्टल द्रव से प्रतिक्रिया करते रहते है।  कुछ स्थितियों में मिश्र क्रिस्टलो में क्रिस्टल और द्रव की प्रतिक्रिया संतत रूप से चलती रहती है।  केवल क्रिस्टलों का संघटन बदलता रहता है।  इस प्रकार के मैग्मीय सम्बन्ध को बोवेन ने संतत श्रेणी नाम दिया है।  प्लेजिओक्लेज फेल्सपार इसके उदाहरण है।

2. असंतत श्रेणी (discontinuous series)

कुछ अन्य खनिज पूर्वनिर्मित क्रिस्टल द्रव से प्रतिक्रिया कर पूर्णतया भिन्न संघटन का क्रिस्टल बनाते है।  इस प्रकार की प्रतिक्रिया सम्बंधित खनिज क्रम को असंतत श्रेणी कहते है।
ओलिविन सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है जिसके क्रिस्टल द्रव से प्रतिक्रिया कर मैग्नीशियमी पाइराक्सिन बनाते है।  और भी कम तापक्रम होने पर मैग्नीशियमी पाइराक्सिन के क्रिस्टल द्रव से प्रतिक्रिया कर कैल्सियम पाइराक्सिन बनाते है।  इस प्रकार ओलिविन मैग्नीशियम पाइराक्सिन तथा कैल्सियमी पाइराक्सिन असंतत श्रेणी के उदाहरण है।
एन.एल. बोवेन ने शैल जनन को समझाते हुए असंतत और संतत श्रेणी खनिजो को निम्न प्रकार समझाया।
इसे n.l. bowen reaction series कहते है।

Differentiation (विभेदन) of magma in hindi , Assimilation (स्वांगीकरण)

Differentiation of magma : विभेदन वह प्रक्रम है जिसके द्वारा एक समांगी मैग्मा विभिन्न भागों में विभक्त हो जाता है।  ये विभक्त भाग अलग अलग राशि बनाते है लेकिन we भिन्न भाग एक राशि की सीमा के भीतर भी रह सकते है।

प्रथक्करण की कई विधियाँ हो सकती है जिनमे कुछ प्रमुख विधियाँ निम्न है –

1. gravity settling

2. liquid immiscibility (द्रव अवमिश्रण)

3. Fractional crystallization (क्रिस्टलन)

4.soret effect (filter pressing)

5. gaseous transfer

1. गुरुत्वीय विभेदन : इस प्रक्रम में अधिक आपेक्षिक घनत्व वाले क्रिस्टल अपने भार के कारण तली की ओर विभाजित होंगे।  इस प्रकार विभाजित होने वाले खनिजो में पाइराक्सिन , कैल्सियमी प्लेजिओक्लेज और लौह अयस्क प्रमुख है।

2. विमिश्रण : मैग्मीय अवस्था में उसके विभिन्न द्रव घटक विमिश्रण द्वारा भी विभेदित हो सकते है।  यह उसी प्रकार होगा जैसे एनिलिन जल का मिश्रण 100′ F के ऊपर पूर्णतया समान होता है लेकिन कम ताप पर वे अलग अलग हो जाते है।

3. क्रिस्टलन विभेदन : अंतर्वेध की सीमा पर मैग्मा द्रुत शितलित होता है।  फलस्वरूप वहाँ क्रिस्टलन प्रारम्भ होता है।  विसरण एवं संवहन द्वारा अंतर्वेधि मैग्मा के केन्द्रीय भाग में समुचित पदार्थ किनारे से लाया जाता है।  क्रमशः उपांत क्षेत्र के शैल मैग्मा से पहले क्रिस्टलित होने वाले अल्प सिलिकीय खनिज होंगे तथा केंद्र भाग के अधिसिलिक खनिज वाले शैल निर्मित होंगे।

4. Filter pressing  (निस्पंदन विभेदन) : क्रिस्टलों के संचय पर उनके मध्य कुछ अवशिष्ट द्रव रह जाता है।  ऊपर के शैलों के दाब या अन्य पाश्र्विक दाब के द्वारा द्रव दुर्बल स्थान में अंतक्षिप्त हो सकता है।  अवशिष्ट द्रव बाद में बनने वाले खनिज को विकसित कर एक अन्य शैल का निर्माण करेंगे।

5. गैसीय घटकों द्वारा विभेदन : अंतर्वेधि शैलो से मुक्त होने वाले गैसीय पदार्थ के साथ कुछ वाष्पशील पदार्थ है जो बाद में आसवित हो खनिज निक्षेपों का निर्माण करते है।  इसी प्रकार ग्रेनाइट  अन्तर्वेधि के पदार्थ में उपस्थित पेग्माटाइट एवं एप्लाईट अन्तर्वेधि की उत्पत्ति में गैसीय पदार्थ का महत्वपूर्ण योगदान है।

Assimilation (स्वांगीकरण)

स्वांगीकरण द्वारा बाह्य शैल पदार्थ ठोस या मैग्मीय रूप में मैग्मा में समाविष्ट हो जाते है।  इस प्रकार से एक नए प्रकार के मैग्मा का अविर्भाव होता है।  यदि ये बाह्य शैल पदार्थ मैग्मा में समविष्ट नहीं होती और अपनी पूर्व क्रिस्टलित अवस्था में ही रहते है , तो उन्हें “xenolith” कहते है।  उदाहरण : diamond
मैग्मा द्वारा ठोस पदार्थों के पाचन की मध्यवर्ती अवस्था को जबकि अपराश्म कुछ अंशो में विलीन हो गए हो , संकर शैल (hybrid rock) तथा क्रिया को शैल संकरण (hybridisation) कहते है।

मैग्मा Magma in hindi , Igneous rocks आग्नेय शैल

Igneous rocks : आग्नेय शैल मैग्मा के ठंडे होने व जमने से बनती है।  इन शैलों के खनिज अवयवो में सिलिकेट प्रमुख है।

इनमे भी क्वार्ट्ज , फेल्सपार , फेल्सपैयाइड , पाईराक्सिन , एम्फिबोल अभ्रक , जिओलाईट , क्लोराईट , ओलिविन इत्यादि प्रमुख सिलिकेट है।

आग्नेय शैल मैग्मा से बनने वाली शैल है।  भू पृष्ठ के अन्दर गहराई पर मैग्मा से निर्मित होने वाले आग्नेय शैलो को अंतर्वेधी आग्नेय शैल कहते है व मैग्मा के भूसतह पर उद्गार के फलस्वरूप बने लावा के संघनन पर निर्मित आग्नेय शैलो को बर्हिवेर्धि शैल कहते है।

Origin of Igneous rocks

आग्नेय शैल मैग्मा के जमने से निर्मित होती है अत: मैग्मा की उत्पत्ति ही आग्नेय शैल की उत्पत्ति होगी।
Magma 
Definition  : मैग्मा एक गर्म थिक व स्टीकी , सिलिसियस पदार्थ है जो जलीय वाष्प व गैसें रखता है।  यह बहुत अधिक गहराइयो से भूपर्पटी पर आता है।  इसमें मुख्यत: O , Si , Al , Fe , Ca  , Mg , Na और R होते है।
जब मैग्मा पृथ्वी की सतह पर आता है तो इसकी गैसे निकल जाती है।  ऐसे मैग्मा को “लावा” कहते है।
Generation :
मैग्मा जेनरेसन के लिए निम्न कारक कारगर है –
  • sunlight
  • geo thermal gradient (T and P)
  • Radioactivity
  • sudden pressure release
  • water

ये सभी कारक एक साथ कार्य करते है।  इनसे किसी प्लेट पर इतना ताप व दाब उत्पन्न हो जाता है जो उस प्लेट को liquid state में बदल देती है।  प्लेटों को द्रवीकृत होने के लिए लगभग 900 डिग्री C – 1600′ C ताप की आवश्यकता होती है।

भू सतह से गहराई पर जाने पर 30 डिग्री प्रति किलोमीटर ताप व 35Kb/KM दाब बढ़ता है।  लेकिन जैसे जैसे गहराई पर जाते है रेडियो सक्रियता के कारण अचानक दाब लगने आदि के कारण ताप अधिक बढ़ता है अत: मैग्मा का निर्माण अधिकतर अर्भ-क्रस्ट में ही होता है।
Accent of magma 
मैग्मा के ऊपर आने के लिए अधिक दाब व उर्जा की आवश्यकता होती है।  मैग्मा निम्न मुख्य कारको से ऊपर आ सकता है।
squeezing (दबाना)
volume expansion(आयतन बढ़ना)
boyency rise (उत्पलावन बल)
sudden presser release
जब मैग्मा निर्मित हो जाता है तो उसकी ऊर्जा बहुत अधिक हो जाती है यह ऊर्जा ऊपर वाली या अपने निकट की प्लेटों पर दबाव डालती है या अचानक प्रेसर रिलीज होने से आयतन एक्सपोज हो जाता है और निकटवर्ती प्लेटों में क्रेक उत्पन्न हो जाते है जिससे मैग्मा ऊपर आने लगता है या जब मैग्मा का घनत्व अन्य निकटवर्ती प्लेटों से कम होता है तो उत्पलावन के कारण भी मैग्मा ऊपर आने लगता है।  इस प्रकार मैग्मा के ऊपर आने के लिए ये चारो अलग अलग या एक साथ कार्य कर सकते है।

अवसादी शैलो का रासायनिक संघटन Chemical composition of sedimentary genres

Chemical composition of sedimentary genres अवसादी शैलो का रासायनिक संघटन : अवसादी शैलो का रासायनिक संघटन अत्यधिक परिवर्तनशील होने के कारण उनकी उत्पत्ति में निहित है।  इसी कारण ये आग्नेय शैलो से अलग है।  उदाहरण के लिए – सेंडस्टोन में 99% सिलिका होता है।  bended आयरन फोरमेसन में आयरन ऑक्साइड 58% से भी अधिक होता है।  pure चुना पत्थर में 55% तक CaO होता है।  ये सब वेदरिंग साइकिल के कारण होता है।

अवसादी शैलो का खनिजात्मक संघटन

अवसादी शैलो में दो प्रकार के खनिज पाए है।  एक प्रकार के खनिज मूल शैलो में अपक्षय से प्राप्त परिवहन के बाद निक्षेपण स्थान तक आते है और अवसादी शैल में पाए जाते है।  बलकृत रूप से प्राप्त इस प्रकार के खनिजों को अपरदी खनिज (Detrital mineral ) या अन्यत्रजात खनिज (Allogenic mineral ) कहते है।  इसके विपरीत निक्षेपण स्थान पर ही रासायनिक अवक्षेपण या जैविक विधियों से उत्पन्न खनिज को त्व्रजात खनिज (Authigenic mineral ) कहते है।

अन्यत्र जात मिनरल : क्वार्ट्ज़ , जरकॉन , इल्मेनाइट , मैग्नेटाइट , फेल्सपार इत्यादि।

तत्रजात खनिज : हेनाइट , सिल्वाइट , कैल्साइट , पायराइट इत्यादि।

कुछ प्रमुख अवसादी शैलो का वितरण –

1. संगुटीकाश्म (Conglomerate) :

Nature : consolidated gravels

colour : variable

Mineral composition : गोलीय गुटिकायें सुविकसित मेट्रिक्स रूप में स्थित होती है।

इस मेट्रिक्स में बालू अथवा गोंद होती है जो सिलिका , केल्सियम कार्बोनेट अथवा आयरन ऑक्साइड से जमी रहती है।  विषम विन्यास गुटिका में पूर्णत: क्वार्टज़ पाया जाता है।

texture : Very coarse grained

varieties : यदि किसी रोक के फ्रेगमेंट कोणीय या उपकणीय हो तो इसे “breccia” कहते है।

breccia में rock फ्रेगमेंट की कणीयता यह बताती है की यह मेटेरियल अपने स्रोत से अधिक दूर तक परिविहित नहीं हुआ है।

2. sand stone (बालुकाश्म)

Nature : arenaceous

colour : मेटेरियल के आधार पर परिवर्तनशील।  यदि rock में सिलिका अथवा केल्शाईट , आयरन ऑक्साइड , मृत्तिका (clay) अथवा क्लोराइड भी हो सकते है।

texture : बालुकाश्म में बालू कण पूर्णत: सुवर्गित , उपकोणीय से गोलीय होते है।  बालुकाश्म का गठन है – मोटी बालू – 2 से 0.5 mm मध्यम बालू 0.5-0.25 mm और महीन बालू – 0.25 से 0.1 mm

structure : बालुकाश्म में मुख्यत: परतदार अवसाद शैल , धारा संस्तरण , तरंग चिन्ह और वर्षा बिन्दु देख सकते है।

Varieties :

  • Orthoquartzite : वे सफ़ेद सिलिकामय बालुकाश्म जिनमे अधिकतम गुटिकाए सुविकसित quartz हो , ओर्थोक्वार्ट्ज कहलाते है।
  • grit : इसमें तीखे कोणीय कण होते है।
  • Arkose : एक मोटी गुटिका वाला बालुकाश्म जो notable मात्रा में फेल्सपार रखता है , Arkose होता है।
  • Graywackes : यह एक ग्रे कलर rock है जो क्वार्ट्ज के बहुत कम विकसित कोणीय फ्रेग्मेंट और बेसिक आग्नेय शैल रखती है और महीन गुटिका क्लोराइड एवं मृत्तिका पदार्थ रखती है।  Graywakes 30% से अधिक महीन गुटिका क्ले अथवा क्लोराइट अथवा दोनों रखता है। इससे भी महीन गुटिकामय graywakes shales में होते है।

3. shale : scratched by a knife

Nature : argillaceous

colour : variable

Mineral composition : shale मुख्यत: क्ले खनिज रखता है जैसे : kaolinite , montmorillonite and illite . बहुत कम मात्रा में पाए जाने वाले खनिज quartz , mica और clorite .

texture : बहुत महीन गुतिकाएं (size 0.01 mm से कम )

structure : Lamination , ripple marks और कुछ organic structure

Varieties :

  •  calarious shale : CaCO3 की पर्याप्त मात्रा हो।
  • Ferruginous shale : Fe2O3/FeO की पर्याप्त मात्रा उपस्थित हो।
  • Carbonaceous shale : Carbonaceous matter की पर्याप्त मात्रा।
  • siltstone : silt grain size 0.01 mm से 0.1 mm
  • mudstone : structureless rock containing compact mud .

4. Limestone (चूना पत्थर) 

Nature : Calcarious rock of ten contains fossils .

colour : white , grey अथवा cream .

Mineral composition : इसमें CaO व CO2 की मात्रा सर्वाधिक होती है।  कुछ चूना पत्थरो का 95% भाग CaO व CO2 ही होता है।  कुछ मात्रा में फास्फोरस , लौह ऑक्साइड , लौह सल्फाइड पाया जाता है।

चूना पत्थर के प्रमुख खनिज कैल्साईट , एरागोनाईट एवं डोलोमाईट , कैल्सिडोनी , मृत्तिका , पायराईट इत्यादि।

Texture : चूना पत्थर एक महीन गुटिकामय रॉक है।

oolitic and organic structure रखते है।

Variaties :

  • chalk : Foraminiferal shells रखते है।
  • oolitic limestone : Reunded grains resembling fish roe . CaCO3 layers
  • marl : Impure limestone जिसमे क्ले और कैल्सियम कार्बोनेट प्रतिशत समान हो।

 

अवसादी शैलो की संरचना structural features of sedimentary rocks in hindi

structural features of sedimentary rocks in hindi अवसादी शैलो की संरचना : अवसादी शैलो के मुख्य तथ्य है –
1. अवसादी परतें (stratification)
2. Lamination (स्तरिका)
3. graded bedding (क्रमित संस्तर)
4. current bedding (धारा संस्तर)
5. ripple marks (तरंग चिन्ह)
इनके अतिरिक्त कुछ और संरचनाएं है जैसे की :- वर्षा बिन्दु , पंक विदर (mud cracks) , खतरनाक जानवरों के पद चिन्ह इत्यादि।  ये संरचनाएं पूर्व वातावरण के संकेत देती है।
1. स्तरीय या परतदार होना (stratification) : अवसादी शैलो की सबसे बड़ी विशेषता है स्तरीय या परतदार होना।  विभिन्न स्तरों के बीच के तल संस्तरण तल कहते है।  दो संस्तरण तलों के बीच आबद्ध परत यदि 1 सेंटीमीटर से अधिक मोती है तो उसे स्तर (stratum) या संस्तर (bed) कहते है।
अलग अलग परतों को समझने के लिए निम्न तथ्य है –

  • खनिज संघटन में अंतर द्वारा
  • उनके texture में बदलाव या आकार द्वारा
  • रंग में अंतर द्वारा
  • परत मोटाई में अंतर द्वारा

2. Lamination (स्तरिका) : वह पतली परत जिसकी मोटाई 1 सेंटीमीटर से भी कम हो स्तरिका कहलाती है।  स्तरिका सामान्यत: बहुत महीन शैलो में पायी जाती है जैसे – शैल (shale)
स्तरिका संरचना हलचल से मुक्त गहरे जल में निक्षेपित सूक्ष्म कणीय शैलो में पायी जाती है।

3. क्रमिक संस्तरण (graded bedding) : यदि Bed के निचले भाग में मोटे कण हो तथा ऊपरी ओर कणों का आकार क्रमशः घटता जाए तो इस प्रकार के आवर्ती संस्तरो को क्रमिक संस्तर कहते है।  क्रमिक संस्तर पानी में तीव्र अवसादन का परिणाम है।  क्रमिक स्तर के ऊपरी स्तर में shale मुख्यत: होती है और निचले स्तर में coarse grit पायी जाती है।

4. current bedding (धारा संस्तरण) : दो समान्तर सामान्यतया क्षैतिज , संस्तरो के मध्य तिरछी रेखाओ की उपस्थिति पर निर्मित संरचना को तिर्यक संस्तरण कहते है।  इन्हें धारा संस्तरण भी कहते है।  तिरछी रेखाओ वाले भाग को अग्र समुच्चय (fore set) , निचले भाग को नितल समुच्चय (bottom set) तथा ऊपर वाले भाग को शीर्ष समुच्चय (top set) कहते है।

 

5. तरंग चिन्ह (ripple marks) : संस्तरो की ऊपरी सतह पर तरंग के आकार की विकसित संरचना को तरंग चिन्ह कहते है।  तरंग चिन्हों के शीर्ष द्रोणी सममितीय होने पर उन्हें सममितीय और असम्मितीय होने पर उन्हें असममितिय तरंग कहते है।