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Geomorphology and Hydrology in hindi भू-आकृति विज्ञान का जल विज्ञान में अनुप्रयोग क्या है ?

 भूआकृतिक विज्ञान और जल विज्ञान (Geomorphology and Hydrology) –
जल विज्ञान वास्तव में जल का अध्ययन है, खासतौर से जलधाराओं, झीलो और पाताल तोड़ कुँओं के रूप से जल की उत्पत्ति, उपयोग, नियंत्रण और संरक्षण को जल विज्ञान के अन्र्तगत शामिल किया जाता है। यहाँ हम स्थलाकृतियों की उपयोगिता का अध्ययन जल क्षेत्र के अनुमान के संदर्भ में करेंगे। यह बताने की विशेष जरूरत नहीं है कि जल का उपयोग हमारे जीवन में कितना है, लेकिन यह जानकारी सम्भवतः लाभप्रद होगी कि सतह पर प्रवाही जल और अघोभौमिक जल का असमान वितरण पाया जाता है। यह वितरण और वाष्पीकरण के अतिरिक्त विभिन्न स्थलाकृतियों द्वारा भी प्रभावित होता है। इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार हैः-
(अ) कास्र्ट स्थलाकृति और जल (Karst topography and water) – जल आपूर्ति की सबसे अधिक विषय और प्रभावित करने वाली स्थलाकृति है, कार्ट स्थलाकृति। चूना पत्थर के समान और कोई दूसरी चट्टान जल को समाहित करने मे विविधता का परिचय नहीं देती है। चूना प्रधान क्षेत्रों में प्रवेश करता हुआ जल चूना युक्त चट्टानों को घुला देता है, जिससे गुफाओं और अधोभौमिक मार्गों का निर्माण हो जाता है। ऐसी अवस्था में वर्षा के समय जो भी पानी गिरता है, तेजी से अन्दर की चट्टानों में समाहित हो जाता जिसके परिणामस्वरूप सतह पर जल का नितान्त अभाव मिलता है। यही नहीं, बल्कि कुछ चूना प्रधान क्षेत्रों में सोखे गए जल अधोभौमिक जल के रूप में भी नहीं प्राप्त किए जा सकते हैं। हालांकि कुछ क्षेत्रों में अधोभौमिक जल की उपलब्धता हो सकती है। लेकिन इस प्रकार के जल का उपयोग बहुत सावधानी से छानबीन करके ही किया जा सकता है, ताकि बैक्टीरिया आदि के कारण जल की दूषित मात्रा उपभोक्ताओं को हानि न पहुंचा सके।
(इ) ज्वालामुखीकृत मिट्टी और जल (Volcanic soils and water) – पृथ्वी की सतह पर कुछ ऐसे इस भाग है, जहाँ ज्वालामुखी मिट्टी के गहरे जमाव पाए जाते हैं। इन जमावों में प्रवेश्यता के कारण वर्षा व जल शीघ्र ही अन्दर रिस जाता है, इसलिए सतह पर बहने वाली नदियों का लगभग अभाव पाया जाता है। अमेरिका के उत्तरी-पश्चिमी भाग में ज्वालामुखी से निर्मित मिट्टी के लगभग 100 वर्गमील क्षेत्र में एक भी नदी नहीं पायी जाती है । अलबत्ता जहाँ कहीं प्रारम्भिक समय का नम काल में कोई नदी थी, अब वह नदी गहरी घाटी से होकर बहती है। इन नदियों के घाटी की गहराई जल-तल से नीचे है, इसीलिए विभिन्न स्त्रोतों के द्वारा इनमें बराबर जल बना रहता हैं।
9. भू आकृतिक विज्ञान एवं नगरीकरण:
नगरीकरण करते समय भी भूआकृतिक विज्ञान की अहम् भूमिका हो जाती हैं । भूआकृतिक दृष्टि ने कमजोर एवं अनुपयुक्त क्षेत्रों में नगरीकरण के निर्धारण में भूआकृतिक जानकारी का अत्याधिक महत्व होता है। नगरी विकास में भू आकृतिक ज्ञान का प्रयोग नगरी भू आकतिक विज्ञान के क्षेत्र के अन्तर्गत आता हैं नगरी भू आकृति विज्ञान, जो व्यावहारिक भू आकारिकी की अभिनव परन्तु उपयोगी शाखा है, स्थलरूपों एवं उनसे सम्बन्धित प्रक्रमों, भपदार्थों एवं प्रकोपों नगरीकत या नगरीकरण के सम्भावित क्षेत्रों के नियोजन, विकास एवं प्रबन्धन के लिए उपयोगी प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। इस प्रकार नगरी भू आकृति विज्ञान में अन्तर्गत किसी नगर की शैलिकीय एवं धरातलीय विशेषताओं, भूआकृतिक प्रक्रमों एवं जलीय दशाओं, जी नगरीकृत क्षेत्रों के आकार एवं नगरीकरण की दर एवं धरातलीय सतह को स्थिरता को निर्धारित करती है का अध्ययन किया जाता है।

2. भू-आकृति विज्ञान व क्षोभ-निक्षेप (Geomorphology & Placer Deposits) –
यांत्रिक रूप से एकत्रित वजनी खनिजों के निक्षेप को प्लेसर या प्लेसर निक्षेप या क्षोभ निक्षेप कहते हैं। दूसरे शब्दों में रासायनिक अपक्षय और अपरदन-निक्षेप की मिली-जुली प्रक्रिया के परिणामस्वरूप जिन खनिजों का निक्षेप होता है, उन्हें प्लेसर कहते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि प्लेसर निक्षेप एक निश्चित भूआकृतिक प्रक्रियाओं का परिणाम है। शायद इसीलिये भूआकृतिक सिद्धान्तों का प्रयोग आर्थिक भूगर्भशास्त्र के अन्य पहलुओं की अपेक्षा, प्लेसर-निक्षेप की जानकारी में सबसे अधिक किया जा सकता है। विभिन्न अध्ययनों के परिणामस्वरूप अब तक लगभग 9 प्लेसर-निक्षेपों की पहचान की जा चुकी है। इनमें से कुछ प्रमुख प्लेसर निम्न प्रकार है –
(i) जलोढ प्लेसर निक्षेप – के रूप में सोना प्रायः नदियों के निचले भागों में पाया जाता है, या फिर उस जगह, जहाँ नदी का बहाव धीमा हो। क्योंकि सोना एक वजनी खनिज है, जिसका आपेक्षिक गुरुत्व लगभग 19 है। इसीलिए यह क्वार्टज की अपेक्षा जल्दी निक्षेपित कर दिया जाता है।
(ii) पवनकृत प्लेसर निक्षेपों से आस्ट्रेलिया, निचली कैलीफोर्निया और मैक्सिको में सोने की प्राप्ति होती है।
(पपप) पुलिन प्लेसर निक्षेपों से सोना, हीरा और जिरकन जैसे खनिज मिलते है। दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका के तटवर्ती भागों में पुलिन प्लेसर निक्षेपों के रूप में लगभग 50 मिलियन डालर की कीमत का हीरा प्रतिवर्ष निकाला जाता हैं
3. भू आकृतिक सिद्धान्त एवं पेट्रोलियम क्षेत्र :
साधारणतया पेट्रोलियम छिद्रिल, पारगम्य या प्रवेश्य चट्टानों में निहित या संचित रहता है, इसलिए बालुका पत्थर या चूना पत्थर सदृश परतदार चट्टानों में पेट्रोलियम के मिलने की सबसे अधिक भावना रहती है। पेट्रोलियम की उत्पत्ति से सम्बन्धित कार्बनिक सिद्धान्त के अनुसार पेट्रोलियम का निर्माण पआर पौधों के सड़ने गलने से होता है। क्योंकि इस क्रिया के फलस्वरूप पौधों एवं प्रणियों के काबनिक नाथ हाइड्रोजन एवं कार्बन के यौगिकों में परिवर्तित हो जाते हैं। यह यौगिक जब तरल होता है तो तेल लाता है, और गैसीय अवस्था में होता है, तो प्राकृतिक गैस कहलाता है। कार्बनिक सिद्धान्त के ही अनुसार पर अवसादन चक्र के साथ-साथ ही पेट्रोलियम का निक्षेप होता रहता है। दूसरे शब्दों में महाद्वीपीय स ज्यों-ज्यों पेट्रोलियम की उत्पत्ति होती रहती है। इसके साथ-ही-साथ महाद्वीपीय मगनतट के छोरों समुद्र तलहटी से कुछ नीचे पेट्रोलियम संचित होता रहता है, इसीलिए परतदार चट्टानों में पेट्रोलियम मिलने की संभावना सबसे अधिक होती है। इसके अतिरिक्त प्राचीन महाद्वीपीय खण्डों के समुद्रीय मग्नतट वा में भी पेट्रोलियम मिलने की सम्भावना रहती है।
4. भू आकृतिविज्ञान व कोयला क्षेत्र (Geomorphology – Coal Area)
कोयला एक काला ज्वलनशील परतदार चट्टान है, जिसका निर्माण अधिकतर दलदली भूमि में पाये जाने वाले पौधों के धंसने तथा ऊपर अन्य पदार्थों के जमा होने के कारण दबाव एवं ताप के फलस्वरूप पौधों के विघटन तथा अश्मीकरण होने से होता है। यह सारी प्रक्रिया अत्यन्त धीमी गति से सम्पन्न होती है। एक अनुमान के अनुसार एक फीट मोटी पीट के निर्माण में 100 वर्ष लगते हैं और 5 से 8 फिट मोटी पीट से 1 फिट मोटा कोयला बनता है। लांग्वेल एवं बताया है कि 50 फिट मोटाई के पीट से 10 फिट मोटाई वाले बिटूमिनस का निर्माण हो सकता है।
कोयला साधारण तौर पर परतों या सीम में पाया जाता है। साधारणतया प्रत्येक सीम सपाट और लेंस आकार का होता है और इनकी मोटाई 2-10 फिट से 100 फिट तक हो सकती है। ये सीम या परतें प्रायः समूहों में पाये जाते हैं। जैसे पेन्सिलवेनिया में बिटूमिनस के लगभग 60 स्तर एक साथ मिलते है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यह क्षेत्र पिछले 300 मिलियन वर्षों में दलदली और पौधों से हरा-भरा था। एक अनुमान के अनुसार अटलांटिक खाड़ी के तटीय मैदान के दलदली इलाकों में प्रत्येक 30 साल में 1 फिट पीट का निर्माण हो रहा है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि आज के कोयला क्षेत्रों के आधार पर अनुमानित दलदली भूमि का स्वरूप लगभग इसी प्रकार रहा होगा। कोयला और दलदली भूमि का यह पारस्परिक सम्बन्ध एकरूपता सिद्धान्त का परिचायक है, जिसके आधार पर प्राचीन काल के दलदली क्षेत्रों की जानकारी नए कोयला क्षेत्रों की सम्भावनाओं का अता-पता दे सकते हैं।
5. भू आकृतिक विज्ञान एवं प्रादेशिक नियोजन-
प्रादेशिक नियोजन एवं विकास प्रत्येक विकासशील देश की सर्वप्रमुख प्राथमिकता है। वास्तव में नियोजन विकास की प्रक्रिया है जिसके दो प्रमुख उद्देश्य होते हैं:
(i) समाज का सर्वांगीण विकास एवं (ii) सभी प्रकार के प्राकृतिक तथा मानवीय संसाधनों का विदोहन एवं उपयोग करके- सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों एवं असमानताओं को दूर करना (सविन्द्र सिंह, 1991)। प्रादेशिक नियोजन के लिए एक समुचित स्थानिक नियोजन एवं इकाई की आवश्यकता होती है। वास्तव में नियोजकों के सामने समुचित नियोजन इकाई के चयन की प्रमुख समस्या होती है। यह उपागम प्रशासनिक दृष्टिकोण से सुविधाजनक हो सकता है परन्तु तार्किक दृष्टि से यह उपयुक्त नहीं है। क्योंकि इस तरह की स्थानिक इकाई भू आकृति या प्राकृतिक इकाइयों के आर-पार होती हैं। अतः ससाधनों की निरन्तरता खण्डित हो जाती है जिस कारण प्राकृतिक संसाधनों के विदोहन एवं उपयोग में बाधाएं उपस्थित हो जाती है।
1933 में संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रादेशिक नियोजन तथा विकास के लिए टेनेसी घाटी परियोजना के कार्यान्वयन से गतिक भूआकारिकी की ओर नियोजकों का ध्यान आकर्षित हुआ है और प्रादेशिक नियोजन के लिए आदर्श इकाई के रूप में नदी अपवाह बेसिन का चयन किया जा सकता है ओर किया भी जा रहा है। संयुक्त राज्य में टेनेसी घाटी परियोजना की सफलता के बाद मिसौरा घाटी परियोजना तय घाटी परियोजना तथा भारत में दामोदर घाटी परियोजन आदि का कार्यान्वयन इस बात के प्रमाण है। वास्तव में अपवाह बेसिन का भूआकृतिक इकाई को प्रदर्शित करती है जिसमें उच्चावच, जलीय प्रक्रम तथा मानव के बीच सीधा सम्बन्ध होता है।
उत्तरी भारत की गंगा, यमुना, गोमती, घाघरा, कोसी आदि नदियों में तीव्र कारण प्रकोप तथा व्यापक बाढ़ के कारण प्रक्रोप तथा पर्यावरण अवनयन होता जा रहा है। अपवाह बेसिन के जलीय अध्ययन द्वारा क्षेत्र विशेष के जल संसाधन का विधिवत विवरण प्राप्त हो जाता है जिससे प्रादेशिक नियोजन यदि प्रादेशिक नियोजन में सहायता मिलती है। यदि प्रादेशिक नियोजना के लिए प्रशासनिक इकाइयों को ही नियोजन इकाई के रूप चयनित किया जाता है तो भी धरातलीय आकृतियों, मिट्टियों, प्राकृतिक संसाधनों आदि की विशद जानकारी इस क्षेत्र में उपयोग हो सकती है। धरातल के मूल्यांकन एवं वर्गीकरण, अपवाह बेसिन की विशेषतायें भूमिगत जल की दशायें आदि नियोजनकों एवं नीति-निर्धारकों के लिए उपयोगी हो सकती हैं।
6. भू-आकृतिक विज्ञान एवं प्रकोप प्रबन्धन –
उन समस्त घटनाओं या दुर्घटनाओं को, जो या तो प्राकृतिक कारकों या मानवजनित कारकों से घटित की चरम घटना कहते हैं जो कभी-कभी घटित होती हैं तथा प्राकृतिक प्रक्रमों को इतना अधिक त्वरित कर देती हैं कि उनका मानव समाज पर इतना अधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है कि विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है यथा – अचानक विवर्तनित संचलन के कारण भूकम्प तथा ज्वालामुखी का आविर्भाव, लम्बी अवधि तक सूखे की स्थिति, बाढ़, वायुमण्डलीय तूफान, सुनामी आदि। प्राकृतिक या मानवजनित चरम घटनाओं को, जिनके द्वारा प्रलय एवं विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, धन-जन की अपार क्षति होती है, पर्यावरण प्रकोप कहते हैं।
प्राकृतिक भू आकृतिक प्रकोपों के सम्भावित खतरों एवं प्रभावों के निर्धारण, पूर्वकथन एवं आकलन तथा उनके प्रबंधन में भू आकृतिक ज्ञान से पर्याप्त सहायता मिलती है। किसी भी क्षेत्र में जहाँ पर पहले ज्वालामुखी के उद्गार हुए हैं उनकी निगरानी के आधार पर तथा ज्वालामुखियों की कतिपय आकृतिक विशेषताओं एवं उनके पूर्ववर्ती उद्गारों के आधार पर उनके भावी उद्गार की चेतावनी दी जा सकती है। प्राकृतिक प्रकोप प्रबन्धन में भू आकृतिक विज्ञान का निम्न प्रकार से सहयोग रहता है।
(i) भूकम्पलेखी द्वारा भूकम्पनीय घटनाओं एवं भूकम्पन का नियमित मापन।
(ii) ऊटर, गर्म जलस्रोत, गेसर आदि से निकलने वाली गैसों की निगरानी।
(iii) लेजर द्वारा सुसुप्त एवं शान्त ज्वालामुखी की बनावट की निगरानीय
(iv) स्थानीय गुरुत्व एवं मैग्नेटिक फील्ड आदि का मापन।
(v) क्रैटर झील, गर्म जलस्रोत, गेसर, फ्यूलमरोल आदि के तापमान का नियमित मापन एवं अंकन;
नदी तंत्र एवं उसकी आकृतिक विशेषताओं, नदी रूपान्तरण, नदी तट आकारिकी आदि के भूआकृतिक अध्ययन से नदी की बाढ़ की रोकथाम में पर्याप्त सहायता मिल सकती है।

इस सन्दर्भ में निम्न विधियाँ सहायक होती है :-
(i) नदी की घुमावदार जलधारा को सीधा करके शीघ्र जल विसर्जन करनाय
(ii) रक्षात्मक तटबंधों का निर्माण करके बाढ़ के प्रभाव को कम करनाय तथा
(iii) बाढ़ आने की पूर्व सूचना देना।
(iv) वैकल्पिक जलधारा का निर्माण करके मुख्य जलधारा के बहाव को मोड़ना।
(v) मूसलाधार वृष्टि से उत्पन्न धरातलीय वाही जल के नदियों तक पहुँचने के समय में देरी करना;
भूकम्प प्राकृतिक एवं मानव जनित भआकतिक प्रकोप होते हैं। धरातलीय स्थिरताध्अस्थिरता तथा मानव निर्मित संरचनाओं के धरातलीय स्थिरता पर पड़ने वाले सम्भावित प्रभावों से सम्बन्धित भू आकृतिक जानकारी कमजोर क्षेत्रों के निर्धारण में सहायक हो सकती है। इसी तरह पहाड़ी ढालों की स्थिरता/अस्थिरता एवं विभिन्न प्रकार के भूमिस्खलनों द्वारा ढाल की अस्थिरता के विषय में सूचनायें मिल जाती हैं। इस जानकारी के आधार पर अस्थिर पहाड़ी ढालों का निर्धारण एवं मानचित्रण किया जा सकता है।
7. भू आकृतिविज्ञान एवं इंजीनियरी कार्य –
वर्तमान आधुनिक युग में राष्ट्रीय विकास के लिए कई प्रकार की इंजीनियरिंग कार्य से संबंधित परियोजनाएँ चलायी जाती है जैसे सड़क निर्माण, बाँध निर्माण, हवाई अड्डे का निर्माण आदि। इन परियोजनाओं में अन्य कारकों (आर्थिक, राजनैतिक, तकनीकी) के अलावा स्थलरुपों की विशेषताएँ तथा भौमिकीय संरचना आदि की जानकारी अत्यावश्क होती हैं। भू आकृतिक ज्ञान से इजीनियरिंग कार्य में निम्न प्रकार से मदद मिलती है।
(i) सडक निर्माण – सड़क निर्माण तथा स्थलाकृति में सीधा सम्बन्ध होता है। विश्व के विभिन्न भागों तथा राष्ट्रों में विभिन्न प्रकार की स्थलाकृतियों पायी जाती है तथा ये कई प्रकार की समस्यायें उपस्थित करती हैं। अतः सड़क निर्माण के समय धरातल को भौमिकीय संरचना (चट्टान की प्रकति) चट्टान का स्वभाव शैलिको तथा स्तर शैल विज्ञान की जानकारी आत आवश्यक होती है। इस स्थलाकृति के भूआकृतिक इतिहास तथा धरातलीय सतह के नीचे चट्टान के स्वभाव आदि जानकारी आवश्यक होती है।
(ii) बाँध निर्माण – इन्जीनियरी तकनीक के अलावा भौमिकी तथा भू-आकारिकी से बाँध निर्माण का निकट का सम्बन्ध है। आर्थिक तथा राजनैतिक कारकों के अलावा बाँध निर्माण के लिए कई कारक उत्तरदायी होते हैं:-
1. नदी की अनुप्रस्थ घाटी का रूप।
2. नदी की अनुदैर्ध्य घाटी की प्रकृति,
3. नदी का प्रवणता ढाल
4. नदी में जल की मात्रा, आयतन तथा वेग,
5. बाँध के ऊपर जलग्रहण क्षेत्र तथा वाही जल की मात्रा,
6. नदी में तलछट की मात्रा तथा उसकी गति,
7. जल का विसर्जन आदि।
इन कारकों की सम्यक जानकारी अपवाह बेसिन की आकारमितिक अध्ययन से हासिल हो जाती है। अपवाह बेसिन की जलीय आकारमिति के समय जब विभिन्न नदी शाखाओं के आर्डर निश्चित हो जाते है तो यह अच्छी तरह ज्ञात हो जाता है कि किस स्थान पर कितनी सरितायें मिलती हैं, उनका प्रवाह क्षेत्र कितना है, वे कितना जल प्रति सेकेण्ड विसर्जित करती है आदि। इस तरह के अध्ययन से नदी के किसी खास बिन्दु पर जल की मात्रा, आयतन, वेग, अवसाद की मात्रा तथा गति का पता लग जाता है
(iii) हवाई अड्डे का निर्माण:- हवाई अड्डे का निर्माण के समय अभियन्ताओं को भूआकृतिक विज्ञानवत्ताआ से पर्याप्त सहयोग मिल सकता है क्योंकि यह कार्य पूर्ण रूप से स्थलाकृतिक के स्वभाव से आधारित हता है। हवाई अड्डे के निर्माण के लिए निम्न दशायें आवश्यक होती है-
1. विस्तृत सपाट मैदान, जिस पर चारों ओर हवाई पट्टी का निर्माण हो सके,
2. अपवाह दशायें,
3. ढाल का प्रतिरूप,
4. कुहरे का अभाव तथा
5. जल की आपूर्तिी
इस प्रकार भू आकृतिकविज्ञान के विस्तृत ज्ञान के इजीनियरिंग योजनाओं को क्रियान्वित करने में अधिक सुविधा होती है।

महत्वपूर्ण प्रश्न
दीर्घउत्तरीय प्रश्न
1. व्यवहारिक भू-आकृति विज्ञान की विस्तार पूर्वक व्याख्या करके उसका खनिज संसाधनों के साथ क्या संबंध है, स्पष्ट कीजिए।
2. भू-आकृति विज्ञान का प्रभावित करने वाले सभी खनिज संसाधनों के प्रयोग को स्पष्ट कीजिए।
3. भू-आकृति विज्ञान का इंजीनियरी कार्य के साथ के संबंधों को स्पष्ट कीजिए।
4. भू-आकृति विज्ञान एवं नगरीकरण के अंतर को समझाईए।
लघुउत्तरीय प्रश्न
1. व्यवहारिक भू-आकृतिक विज्ञान से क्या तात्पर्य है।
2. खनिज संसाधन का भू आकृतिक विज्ञान के संबंध को बताईए।
3. भू-आकृतिविज्ञान को पेट्रोलियम क्षेत्र में प्रयोग होता है स्पष्ट कीजिए।
4. कोयले की खोज में भू-आकृति विज्ञान का प्रयोग होता है, स्पष्ट कीजिए।
5. भू-आकृति विज्ञान का प्रादेशिक नियोजन से क्या संबंध है, स्पष्ट कीजिए।
6. भू-आकृति विज्ञान का प्राकृतिक प्रकोप प्रबन्धन से संबंध बताईए।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
1. व्यवहारिक भू आकृति विज्ञान की विस्तृत व्याख्या देने वाला भूगोलविद
(अ) लाप्लास (ब) थार्नबरी (स) मार्गेट (द) रिकीपोट
2. भारत में व्यवहारिक भू आकृतिक विज्ञान का प्रारंभ कहाँ से हुआ …………..
(अ) जोधपुर (ब) भोपाल (स) नागपुर (द) दिल्ली
3. भू आकृति विज्ञान का उपयोग …………..
(अ) खनिजों की खोज (ब) क्षोभ निक्षेप
(स) पेट्रोलियम क्षेत्रों की खोज (द) सभी
4. कोयला यह किस तरह की चट्टान का प्रकार है ……….
(अ) अवसादी (ब) आग्नेय (स) परतदार (द) मुलायम
उत्तर- 1. (ब), 2. (अ), 3. (द), 4. (स).