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अपवाह बेसिन को प्रभावित करने वाले घटक ANTHROPOGENIC GEOMORPHOLOGY in hindi मानवजनिक भूआकारिकी क्या है किसे कहते हैं , परिभाषा अर्थ बताइए ?

मानवजनिक भू-आकारिकी
(ANTHROPOGENIC GEOMORPHOLOGY)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व में मानवजनिक भूआकारिकी का महत्व बढ़ गया। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में तीव्र गति से प्रगति करने के कारण मानव का महत्व बढ़ा है। वर्तमान समय में मनुष्य प्राकृतिक भ्वाकृतिक प्रक्रमों की तुलना में धरातलीय सतह से कई गुना तेज गति से परिवर्तन करने में समर्थ हो गया है।
श्मानवजनिक भूआकारिकीश् की अवधारणा प्राकृतिक भूआकृतिक प्रक्रमों उदाहरणतः जलीय प्रक्रम, वायु प्रक्रम, सागरीय या सागर तटीय प्रक्रम, भूमिगत जल प्रक्रम, हिमानी प्रक्रम, परिहिमानी प्रक्रम आदि, में मनुष्य के आर्थिक क्रियाकलापों द्वारा होने वाले बदलाव से सम्बन्धित है। मनुष्य अपने अनेक कार्यक्रमों द्वारा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, इच्छित एवं अनिच्छित रूप से प्राकृतिक भ्वाकृतिक प्रक्रमों एवं भौतिक स्थलाकृतियों में पर्याप्त परिवर्तन करता है इसे निम्न उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता हैः
(1) मृदा अपरदन की दर में वृद्धि करता है।
(2) चट्टानों के विघटन की दर को अत्यधिक तीव्र कर देता है। उदाहरणः खनिजों के लिये चट्टाना कों डायनामाइट से उड़ा दिया जाता है, परिणामस्वरूप प्राकृतिक रूप से जो कार्य हजारो-लाखों वर्षों में होता था। वह कुछ ही मिनटों में हो जाता है।
(3) सागरीय तरंगों के माध्यम से होने वाले क्लिफ अपरदन का स्थगन कर देता है।
(4) पर्वतीय क्षेत्रों में वनविनाश एवं नगरीकरण के फलस्वरूप हिमनदों के पिघलने की गति तेज हो जाती है, जिस कारण उनका निवर्तन प्रारम्भ हो जाती है।
(5) नगरों एवं कृषि क्षेत्रों को नदियों की बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिए लम्बे-लम्बे तटबन्धों को बनाया जाता है, जिस कारण नदियों के जलविर्सजन में परिवर्तन हो जाने से नदियों द्वारा होने वाले अपरदन एवं निक्षेपण के प्रतिरूपों में व्यापक परिवर्तन हो जाता है।
(6) नदियों पर बड़ बाधों एवं जलभण्डारों के निर्माण के कारण नदियों के उत्प्रवाह दिशा में अवसादीकरण एवं अनुप्रवाह दिशा में अपरदन की गति तेज हो जाती है।
(7) परिहिमानी क्षेत्रों में वनविनाश एवं विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्यों द्वारा परमाफ्रास्ट की हिम के पिघलने से थर्मोकार्ट की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
(8) सागरीय पत्तनों को सागरीय निक्षेपण से बचाने के लिए मनुष्य द्वारा लगायी गयी विभिन्न प्रकार की ग्राएन द्वारा तरंगों के अवसादीकरण की प्रक्रिया में भारी परिवर्तन हो जाता है।
मानवजनिक भूआकारिकी : ऐतिहासिक परिवेश
यद्यपि मनुष्य ने अपने स्थायी जीवन यापन के समय से ही. अत्यन्त सीमित रूप में प्राकृतिक पर्यावरणीय एवं भूआकृतिक प्रक्रमों के साथ छेड़-छाड करना प्रारम्भ कर दिया था. परन्तु औघेगिक क्रान्ति, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में अधिक विकास के साथ ही मनुष्य द्वारा प्राकतिक भूआकृतिक प्रक्रमों में व्यापक परिवर्तन प्रारम्भ हो गया। सन् 1864 में जी. पी. मार्श ने अपनी पुस्तक ‘मैन एण्ड नेचर‘ के माध्यम से भूआकृतिक प्रक्रमों पर मनुष्य के प्रभावों को प्रदर्शित किया तथा पहली बार मनुष्य द्वारा पर्यावरण एवं भूआकृतिक प्रक्रमों में किए गये परिवर्तनों के परिणाम के प्रति समाज को आगाह किया व इससे सामान्य परिवर्तन होने के अवसर बढ़े।
मनुष्य तथा भूआकृतिक प्रक्रमों के बीच सम्बन्धों के अध्ययन के लिए सामूहिक प्रयासों का श्रीगणेश उस समय हुआ जबकि सन् 1955 में ‘पृथ्वी के स्वरूप को बदलने में मनुष्य की भमिका‘ नामक विषय पर एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का प्रिन्सटन में आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी की कार्यवाही सन 1956 में प्रकाशन के साथ ही शुरू हुई और इसी समय से प्राकृतिक भूआकृतिक प्रक्रमों में मानवजनित परिवर्तनों की क्रियाओं एवं क्रियाविधियों के गहन अध्ययन का सिलसिला प्रारम्भ हो गया। उसी प्रकार सन् 1970 में ई एच. ब्राउन ने अपने शोध लेख ‘मैन शेप्स द अर्थ‘ के माध्यम से भूआकृतिक प्रक्रमों पर मनुष्य के। क्रियाकलापों के प्रभावों को प्रदर्शित किया।
पर्यावरण पर मनुष्य के प्रभावों से उत्पन्न हुए तथा भविष्य में होने वाले दूरगामी दुष्परिणाम के प्रति विज्ञानियों के समुदाय में व्याप्त चिन्ता तथा इन प्रभावों के अध्ययन में बढ़े उत्साह तथा दिलचस्पी का यह परिणाम हुआ कि विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में इस विषय से सम्बन्धित कई अध्ययन किये गये, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर कई संगोष्ठियों तथा सम्मेलनों का आयोजन किया गया तथा कई शोध लेखों, शोध मोनोग्राफ तथा पुस्तकों का प्रकाशन किया गया।
पर्यावरणीय प्रक्रमों पर मनुष्य के प्रभाव:- पर्यावरणीय प्रक्रम वायुमण्डल की स्थिति व दशाओं का प्रतिफल है। यह वायुमण्डलीन दशाएँ व प्रक्रम सौर ऊर्जा पर आधारित व निर्भर होते हैं। इस प्रकार से प्रमुख पर्यावरणीय प्रक्रम यथा जलीय, हिमनदीय, परिहिमानी तथा वायु आदि सौर्यिक ऊर्जा के माध्यम से नियंत्रित होते हैं किन्तु पर्यावरणीय प्रक्रमों की कार्य क्षमता स्थलमण्डल के उच्चावचों की स्थितिज ऊर्जा से निर्धारित तथा नियंत्रित होती है। मनुष्य, सौर्यिक विकिरण तथा ऊष्मा की ऊर्जा को प्रभावित करके, वर्षण का प्रक्रियाओं तथा वायु-संचार को प्रभावित कर सकता है। इस तरह के प्रभाव बदले में पर्यावरणीय प्रक्रमों में परिवर्तन कर सकते हैं। मनुष्य तथा जलीय प्रक्रम
जलीय प्रक्रमों एवं जलीय चक्र पर मनुष्य की सोद्देश्य एवं अनिच्छित क्रियाओं के महती प्रभावों को देखकर उसे भी IHD (International Hydrological Decade, 1965-74) तथा IHP (International Hydrological Programme) के अन्तर्गत अध्ययन किये जाने वाले प्रमुख विषयों में सम्मिलित किया गया था। मनुष्य अपनी क्रियाओं द्वारा जलीय प्रक्रमों को स्थानीय स्तर से लेकर प्रादेशिक स्तर तक प्रभावित तथा परिवर्तित करता है। इन परिवर्तनों के परिमाण में पर्याप्त अन्तर होता है परन्तु इन परिवर्तनों से कुछ ऐसे परिणाम होते है जो नगण्य होते हैं व अनिष्ट होते हैं परन्तु कुछ प्रभावशाली भी होते हैं।
प्रायः सभी देशों में मनुष्य के क्रियाकलापों द्वारा प्राकृतिक अपवाह बेसिनों के जलीय चक्र बड़े पैमाने पर रूपान्तरित हुए हैं। मनुष्य द्वारा अपवाह बेसिन के जलीय चक्र में तब्दीली की जानकारी के पूर्व मनुष्य द्वारा अप्रभावित अपवाह बेसिन के जलीय चक्र के क्रियान्वयन को समझना आवश्यक है। सर्वप्रथम वनस्पतियाँ जलवर्षा को अन्तरारोधित करती है। इस तरह वनस्पतियों द्वारा अन्तरारोधित वर्षा का जल वनस्पतियों की पत्तियों, टहनियों, शाखाओं तथा तनों से होता हआ हवाई सरिता के रूप में धरातल पर पहुंचता है। वनस्पति के अभाव में वर्षा का जल सीधे धरातल पर पहँुचता है। जलवर्षा के कुछ भाग वाष्पीकरण वाष्पोत्सर्जन द्वारा वायुमण्डल में वाष्प के रूप में क्षय हो जाता है। धरातल पर सुलभ जल ‘धरातलीय भण्डार‘ का निर्माण करता है। इस भण्डार से जल का अधिकांश भाग निचले ढाल की और ‘धरातलीय वाही जल‘ के रूप् में गतिशील हो जाता है. कछ भाग का वाष्पीकरण हो जाता है, कुछ भाग सतह पर रुक जाता है तथा कुछ भाग का सतह के नीचे अन्तः संचरण हो जाता है जो ‘मृदा आर्द्रता भण्डार‘ का निर्माण करता है। इस भण्डार से कुछ भाग का जल प्रत्यक्ष वाष्पीकरण तथा पौधों के माध्यम से वाष्पोत्सर्जन द्वारा क्षय हो जाता है, कुछ जल ‘सीधा प्रवाह‘ तथा ‘आन्तरिक प्रवाह‘ के मार्गों से जलस्त्राव तथा स्रोतों के रूप में सतह पर पुनः प्रकट होता है जबकि जल का कुछ भाग निस्पन्दन द्वारा नीचे जाकर ‘भूमिगत जलभण्डार‘ का निर्माण करता है। इस जलभण्डार से कुछ जल ‘आधार प्रवाह‘ के माध्यम से सरिता तक पहुँच जाता है.है ‘केशिका चढाव‘ के माध्यम से ऊपर जाकर मृदा आर्द्रता भण्डार में मिल जाता है, तथा कुछ भाग और अधिक गहराई में चला जाता है। ‘श्सरिता भण्डार‘ को जल ‘धरातलीय भण्डार‘ से धरातली वाही जल द्वारा, ‘मृदा आर्द्रता भण्डार से ‘सीधा प्रवाह‘ तथा ‘आन्तरिक प्रवाह‘ द्वारा तथा ‘भूमिगत जल भण्डार‘ से ‘आधार प्रवाह‘ द्वारा प्राप्त होता है।
मनुष्य अपवाह बेसिन की जलीय व्यवस्था की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को कई रूपों में प्रभावित तथा रूपान्तरित करता है। इन परिवर्तनों के अनुकूल तथा प्रतिकूल दोनों तरह के प्रभाव होते हैं। मनुष्य अपवाह बेसिन के जलीय चक्र को ‘मेघ बीजन‘ द्वारा वायुमण्डलीय प्रदूषण द्वारा वायुमण्डलीय परिसंचरण में परिवर्तन द्वारा साफ करके वनस्पतियों के प्राकृतिक स्वरूप में परिवर्तन द्वारा आदि विधियों द्वारा प्रभावित तथा परिवर्तित करता है। ‘अन्तरारोधन भण्डार‘ (वृक्षों तथा पौधों के विभिन्न भागों यथा: पत्तियों टहनियों, शाखाओं आदि में जलवर्षा के रुके भाग) को निर्वनीकरण द्वारा तथा वनस्पतियों के प्राकृतिक स्वरूप में परिवर्तन द्वारा प्रभावित करता है। धरातलीय वाहीजल में निर्वनीकरण तथा कृषि द्वारा वृद्धि होती है तथा इसमें कृषि फसलों की सिंचाई के लिये निर्मित नालियों तथा नगरीय क्षेत्रों में प्रयोग किये गये जल के निकास से अतिरिक्त निवेश की आपूर्ति होती है। जल का सतह के नीचे होने वाला अतः संचरण निर्वनीकरण नगरीकरण, वनरोपण या वनीकरण तथा सिंचाई आदि द्वारा रूपान्तरित होता है। ‘भूमिगत जलभण्डार‘ घरेलू उपयोग एवं फसलों की सिंचाई के लिये सतह के नीचे से जल के निष्कासन एवं विदोहन द्वारा परिवर्तित होता है जब कि ‘सरिता भण्डार‘ में बाढ़ मैदानों के सम्बर्द्धन तथा विकास, जलधारा में रूपान्तर सरितानियंत्रण, बाँध तथा जलाशयों के निर्माण आदि द्वारा परिवर्तित होता है। बेसिन जलीय चक्र के विभिन्न संघटकों में मानव द्वारा किये गये परिवर्तनों का परिणाम होता है बाढ आपदा में वृद्धि तथा सरिता व्यवस्था में कमी, जल की गुणवत्ता में ह्रास या अवनयन, तथा जलभण्डारों एवं सरिता के जल में पोषक तत्वा के भार की वृद्धि के कारण अवांछित वनस्पतियों में व्यापक वृद्धि होती हैं।
अपवाह बेसिन को प्रभावित करने वाले घटक
नगरीकरण द्वारा अपवाह बेसिन की जलीय विशेषतायें निम्न रूपों में प्रभावित तथा रूपान्तरित होती हैंः
(1) बढ़ते नगरीकरण के कारण ज्यादातर धरातलीय भाग पर सीमेंट कांक्रीट कर पक्का कर दिया जाता है जिस कारण अपारगम्य धरातलीय सतह के क्षेत्र में वृद्धि हो जाती है, परिणामस्वरूप जल के अन्तः संचरण के अभाव में धरातलीय वाही जल में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है।
(2) संचरण में निहायत कमी के कारण भूमिगत जल के पुनः पूरण में कमी के कारण एक तरफ तो शहरी क्षेत्रों में भूमिगत जल के स्तर में गिरावट आ जाती है तो दूसरी तरफ शुष्क काल में आधार प्रवाह में निहायत कमी के कारण नदियों में वर्षोंपरान्त काल में जल की मात्रा में अत्यधिक कमी हो जाती है।
(3) नगरीय क्षेत्रों में धरातलीय वाही जल बरसाती नालों तथा गन्टे पानी के निकास के लिए निर्मित नालियों से होकर शीघ्रता से सीधे नदियों में पहुँचता है। इस तरह वाही जल का यात्रा-समय कम, हो जाता है। परिणामस्वरूप वृष्टि की अवधि एवं जल के अधिकतम प्रवाह की अवधि के मध्य समय शिथिलता कम हो जाती है और वर्षा होने पर जल कुछ ही समय बाद नदी तक पहुँच जाता है, इन सबका यह परिणाम होता है कि कभी-कभी नदियों में अचानक बाढ़ आ जाती है।
(4) गहन कृषि के क्षेत्रों, व्यापारिक वनों तथा अप्रवेश्य मिट्टी वाले क्षेत्रों में जलमग्न भागों में जल के निकास स्थलीय नालियों का निर्माण किया जाता है। इन स्थलीय नालियों का अपवाह बेसिन की जलीय विशेषताओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
इस प्रकार मनुष्य के क्रियाकलाप अपवाह बेसिन के जलीय चक्र के विभिन्न परस्पर आबद्ध संघको से होकर प्रवाहित होने वाले जल की मात्रा को प्रभावित तथा परिवर्तित तो करते ही हैं, साथ ही साथ रासायनिक एवं भौतिक गुणों के सन्दर्भ में जल की गुणवत्ता को भी प्रभावित करते हैं।
मनुष्य तथा अपक्षय एवं द्रव्यमान संचलन – चट्टानों तथा रिगोलिथ (आवरण) के विघटन एवं वियोजन को अपक्षय कहा जाता है। अपक्षय एक प्राकृतिक भौमिकीय प्रक्रिया है जो सर्यातप जल, तुषार, वायु, दबाव, आक्सीजन, कार्बन डाइआक्साइड, हाइड्रोजन, पौधों तथा जन्तुओं के विभिन्न संयोगों के तहत सम्पादित होती है। मनुष्य एक जैविक प्राणी के रूप में अपक्षय की दर में वृद्धि करता है या घटा देता है। खनिजों की प्राप्ति के लिए उत्खनन कार्य, बाँधों के निर्माण तथा खनिजों की प्राप्ति के लिए पहाड़ियों तथा पर्वत श्रेणियों को डायनामाइट से उड़ाना, औद्योगिक पदार्थों तथा विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्यों के लिए इमारती सामान की प्राप्ति के लिए पत्थरों एवं अन्य पदार्थों के उत्खनन आदि द्वारा भूपदार्थों में विघटन इतनी तीव्र गति से अल्प काल में सम्पादित होता है कि उतनी मात्रा में प्राकृतिक अपक्षय की प्रक्रियाओं द्वारा विघटन हजारों-लाखों वर्षों में ही सम्भव हो पायेगा। वनस्पतियाँ, मुख्य रूप से सघन वृक्ष, पहाड़ी ढाल को स्थिरता प्रदान करती हैं क्योंकि पहाड़ी ढालों पर वृक्षों की जड़ों का जाल रिगोलिथ तथा शैलों को यांत्रिक बलवर्द्धन प्रदान करता है तथा भूपदार्थों की संलग्नता को बढ़ाता है। इसके विपरीत निर्वनीकरण पहाड़ी ढालों पर असंगठित भूपदार्थों के यांत्रिक बलवर्द्धन एवं उनकी संलग्नता को कम करता है जिस कारण ढाल विनाश तथा पदार्थों शानिचले ढाल की ओर सामूहिक संचलन शुरू हो जाता है। इसके अर्न्तगत अवपात, मलबापात एवं स्खलन आदि को सम्मिलित करते हैं। हिमालय के निचले ढालों पर मनुष्य द्वारा जनित भूमिस्खलन आम बात है।
मनुष्य तथा तटीय प्रक्रम – सागरीय तटीय क्षेत्र प्राकृतिक दृष्टि से सागरीय प्रक्रमों, ज्वारीय तरंगों आदि से प्रभावित होते है। विभिन्न प्रकार तथा परिमाण वाली ये सागरीय तरंगें तटीय भागों का अपरदन करके कई प्रकार के स्थलरूपों की उत्पत्ति करती हैं तथा अपरदन से प्राप्त पदार्थों का यथास्थान निक्षेपण करके विभिन्न प्रकार की पलिनों तथा रोधिकाओं का भी निर्माण करती हैं। अधिकांश सागर तटीय आकृतियों का निर्माण प्राकृतिक सागरीय प्रक्रमों के माध्यम से होता है परन्तु मनुष्य की क्रियाओं ने कई सागरीय प्रक्रमों स्वभाव में तब्दीली की है तथा सागरीय तंरगों के अपरदनात्मक एवं निक्षपात्मक कार्यों की दर में वृद्धि या कमी की है।
मनुष्य द्वारा सागर तटीय प्रक्रमों में प्रतयक्ष परिवर्तनों के अन्तर्गत निम्न क्रियाओं को सम्मिलित करते हैः
(1) सागर तट के पास कांक्रीट का दीवार, तरंगरोध आदि के निर्माण द्वारा सागरीय तरंगों तथा धाराओं के प्रभाव को रोकने तथा उनकी दिशा को मोड़ने के प्रयास;
(2) सागरीय पुलिनों के पुनर्भरण केला जयवों से अपसाटों का लाया जाना या सागराय तरगों द्वारा लाये जाने वाले अवसादों को ट्रैप करना,
(3) तटीय पुलिनों तथा बालू के स्तूपों को उनके स्थान पर स्थायित्व प्रदान करने के लिए वृक्षारोपण उल्लेखनीय है कि सागरीय तट के पीछे यानी स्थल की ओर हटने की क्रिया के नियंत्रण हेतु तटीय अपरदन को रोकने के लिए किये गये प्रयल तट के सागर की ओर प्रसार को बढ़ाने हेतु अवसादों के निक्षेपण में वद्धि करने के लिए किये गये प्रयत्न सफल नहीं हो पाये है क्योंकि सागर तटीय प्रक्रमों की क्रियाविधि अत्यधिक जटिल होती है।
मनुष्य तथा नदी प्रक्रम – नदियाँ मुख्यतः जलीय भूआकृतिक प्रक्रम होती है जो विश्व स्तर पर भूतल की आकृतियों को निर्धारित करती है। यदि एक तरफ नदियाँ अपने अपरदनात्मक तथा निक्षेपात्मक कायों द्वारा विभिन्न प्रकार के स्थलरूपों का निर्माण करती हैं तो दूसरी तरफ स्वभावश प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा अपने आप में ये रूपान्तरित होती रहती हैं। प्राकृतिक रूप में नदियाँ मानव समाज के लिए लाभप्रद होती हैं, साथ ही साथ हानिकारक भी होती है। प्राकृतिक दशाओं में तथा मनुष्य के बिना हस्तक्षेप की स्थिति में नदियों द्वारा होने वाले प्रतिकूल प्रभावों में महत्वपूर्ण हैं रू आवर्ती बाढ़, नदी-मार्ग में परिवर्तन, नदियों के तटवर्ती भागों का अपरदन आदि। इनके द्वारा मानव क्रियाकलापों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं। उदाहरणार्थ, यदि एक तरफ ‘मिस्र को नील की देन‘ तथा गंगा नदी को उत्तरी भारत की अर्थव्यवस्था का मेरुदण्ड समझा जाता रहा है तो दूसरी तरफ ‘हवांगहो‘ को चीन का शेक टेनेसी नदी को ‘द. पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका का नरक‘ दामोदर नदी ‘पश्चिमी बंगाल का खतरा‘ समझा जाता है। प्रगत प्रौद्योगिकीय कौशल के माध्यम से मनुष्य सरिता जलमार्ग को दो रूपों में रूपान्तरित करता है: (प) नदियों के संहारक कार्यों से मुक्ति पाने के लिए उन्हें नियंत्रित करना, तथा (पप) विकासीय प्रक्रियाओं को तेज करने के लिए नदियों को प्राकृतिक संसाधनों के रूप में विकसित करना।
मनुष्य तथा परिहिमानी प्रक्रम – परिहिमानी क्षेत्र उन क्षेत्रों को कहते हैं जो सतत हिमीकृत अवस्था में होते है परन्तु धरातल पर हिम का स्थायी आवरण जमा नहीं होता है। औसत वार्षिक तापामान – 15° सेण्टीग्रेड तथा 1° सेण्टीग्रेड के मध्य रहता है तथा औसत वार्षिक वर्षा 120 से 1400 मिलीमीटर तक होती है। परिहिमानी क्षेत्रों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्षण ‘परमाफ्रास्ट‘ तथा ‘सक्रिय सतह‘ के रूप में होते है। ‘सक्रिय सतह‘ में ‘दैनिक हिमीकरण हिमद्रवण चक्र‘ चलता रहता है। यह ‘हिमीकरण हिमद्रण चक्र‘ जीमा एवं शीतकाल के आवान्तर कालों में अत्यधिक सक्रिय होता है। ‘सक्रिय सतह‘ की गहराई कुछ सेण्टीमाटर से 3 मीटर तक होती है। सभी परिहिमानी प्रक्रम यथा-तुषार अपक्षय, मृदा सर्पण, तुषार उत्क्षेपण, नाइवेशन तथा जलीय प्रक्रम, इसी सक्रिय सतह में ही कार्यशील होते हैं। परमाफ्रास्ट की तापीय दशा ही परिहमानी प्रक्रमा की मुख्य चालक बल है। सक्रिय सतह तथा अधिक गहराई में स्थित बिना जमा हुई आधार शैल मण्डल के मध्य हिमीकृत धरातल को परमॉफ्रास्ट कहते हैं जिसकी गहराई में स्थानीय स्तर पर योग्य अन्तर होता है। वर्तमान समय में ग्लोब के समस्त धरातलीय क्षेत्रफल के पांचवे भाग पर परमाजाला का विस्तार पाया जाता है। परिहिमानी क्षेत्रों में किसी भी विकासीय कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिये परमाक्रार की प्रकृति, उसके व्यवहार तथा उसकी विशेषताओं एवं परिहिमानी प्रक्रमों की क्रियाविधियों की जानकार हाना अत्यावश्यक है क्योंकि परिहिमानी क्षेत्रों में निर्माणात्मक एवं इजीनीयरिंग सम्बन्धी कार्यो म अब कठिनाई का सामना करना पड़ता है। वास्तव में परिहिमानी क्षेत्रों में मानव क्रियाकलापों के सभी पहलू परमार तथा परिहिमानी प्रक्रमों द्वारा प्रभावित होते हैं।
रूस, कन्नाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में परमाप्रास्ट के वैज्ञानिक अध्ययन की ओर अधिकाधिक ध्यान दिया जा रहा है। रूस की PISAS  संयुक्त राज्य अमेरिका की ब्त्त्म्स् आदि शोध संस्थान पमाफ्रास्टर तथा परिहिमानी प्रक्रमों के अध्ययन में सक्रिय योगदान कर रहे है। थर्मोकार्ट तथा तुषार उत्क्षेपण इन दो विशिष्ट परिहिमानी प्रक्रमों का विशेष रूप में उल्लेख करना आवश्यक है क्योंकि ये मनुष्य के निर्माण कार्यों को सर्वाधिक प्रभावित करते है तथा ये मानव क्रियाकलापों से भी अत्यधिक प्रभावित होते है। थर्मोकास्र्ट का प्रयोग स्थलरूप तथा प्रक्रम, दोनों रूपों में किया जाता है। तुषार उत्क्षेपण का अर्थ है हिम के संग्रह के द्वारा घरातलीय सतह में उभार तथा उठाव। इस तरह स्पष्ट है कि यदि थर्मोकार्ट द्वारा हिमीकृत आर्द्रता तथा जल के पिघल जाने से सतह में अवतलन होता है तथा विभिन्न प्रकार के विलयन छिद्रों तथा कुण्डावतरण अवतलन गर्ताें का निर्माण होता है तो तुषार उत्क्षेषण के कारण सतह पर उभार होने से विभिन्न टीलों तथा ढेरों के निर्माण कार खरातलीय सतह असमान हो जाती है।
मनुष्य तथा भूमिगत जल प्रक्रम
भूमिगत पर्यावरण मनुष्य के क्रियाकलापों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रभावित होता है तथा मानव समाज पर इसका प्रभाव अन्य पर्यावरणीय प्रक्रमों में परिवर्तनों से उत्पन्न परिणामों की तुलना में कहीं ज्यादा भयावह तथा संकटप्रद होता है और वर्तमान समय की मुख्य समस्याओं में से एक बढ़ती जनसंख्या के कारण मानव के कार्यों का पर्यावरण पर प्रभाव बढ़ता जा रहा है। मनुष्य द्वारा भूमिगत पर्यावरण में परिवर्तनों में मुख्यतया सतह के नीचे स्थित भूपदार्थों में परिवर्तनों को सम्मिलित किया जाता है यथा – भूपदार्थों का फैलना या सिकुड़ना, ढीला होना या सघन होना, फटना तथा विस्थापन, उपरिमुखी या अधोमुखी संचलन, तनाव का कम होना या बढ़ना, विरूपण आदि। इन परिवर्तनों के पश्चप्रभाव इतने जटिल होते है कि इनका पूर्वानुमान करना कठिन होता है मनुष्य निम्नलिखित कारणों से भूमिगत दशाओं में परिवर्तन करता है।
(1) बाँधों, जलभण्डारों, सड़कों तथा पुलों, नहरों, भवनों आदि के निर्माण द्वारा,
(1) भूमिगत जल के विदोहन द्वारा, खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस के निष्कासन द्वारा, खनिजों के भूमिगत खनन द्वारा तथा निर्माण कार्य हेतु सतह से तथा सतह के नीचे से ठोस तथा सघन पदार्थों (जैसे पत्थर) के खनन द्वारा भूमिगत पदार्थों के भार तथा दबाव को कम करके आदि। इसी प्रकार इन कार्यों की वजह से निम्न प्रभाव पड़ता है:-
(i) अतिरिक्त कृत्रिम भार- बड़े बांधों के निर्माण तथा जलभण्डारों में अपार जलराशि के संचय के कारण भूतल पर मानव द्वारा जनित अतिरिक्त कृत्रिम भार के परिणामस्वरूप जलभण्डारों के नीचे स्थित पहले से व्यवस्थित चट्टानों के संतुलन में अव्यवस्था हो जाने से असंतुलन हो जाता है। इस प्रक्रिया के कारण विभिन्न परिमाण वाले भूकम्पों का आविर्भाव होता है जिस कारण धन-जन की अपार क्षति होती है। बाँधों तथा जलभण्डारों के निर्माण के कारण जनित भूकम्पों के अन्य उदाहरणों में प्रमुख हैं – फ्रान्स में डवदजमलदंतक एवं ळतंदकअंसम के भूकम्पय पाकिस्तान में मंगला के भूकम्प, जाम्बिया में कैरिबा के भूकम्प, कनाडा में मौनिक के भूकम्प, जापान में ज्ञनतवइम के भूकम्प आदि प्रमुख हैं।
(ii) कृषि क्षेत्रों की सिंचाई- फसलों की सिंचाई के लिये जल की आपूर्ति द्वारा भी धरातलीय सतह पर भार बढ़ जाता है। जब शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में ढीली एवं शुष्क मिट्टियों वाले खतों में सिंचाई के माध्यम से जल भरा जाता है तो ढीले एवं शुष्क पदार्थ तर होकर संगठित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को हाइड्रोकाम्पैक्शन कहते हैं। इस प्रक्रिया के कारण सामान्य सतह में 1-2 मीटर तक अवतलन हो जाता जिस कारण सिंचाई की नालियों, नहरों, कुओं की खोल तथा जल एवं तेल की पाइपों को हानि उठानी पड़ती है।
(iii) अन्तः क्षेपी कुओं का उपयोग- कुछ स्थानों पर प्रयोग में लाए गए अपशिष्ट जल को सतह के नीचे पम्प द्वारा अन्तः क्षेपी कुओं में पहुँचाने के कारण भी भूमिगत संतुलन में अव्यवस्था निर्माण हो जाती है, कुछ स्थानों पर पेय जल के कुओं या जलभरों में खारे जल के प्रवेश को रोकने के लिये या तटीय क्षेत्रों के पास शहरों के कुओं में भूमिगत जल में खारे पानी के प्रवेश के कारण जल को दूषित होने बचाने के लिए बाहर से जल का प्रवेश कराया जाता है।
(iv) खनन कार्य- भूमिगत खनन के माध्यम ठोस पदार्थों, यथा: कोयला, सोना, तांबा, चूनाप्रस्तर आदि के खनन तथा विदोहन के कारण ऊपर स्थित सतह नीचे की ओर ध्वस्त हो जाती है। कभी-कभी भूमिगत खनन इतनी गहराई तक पहुँच जाता है कि खदानों की गहराई भूमिगत जलस्तर तक पहुंच जाती है इस परिस्थिति में खनन कार्य को और अधिक गहराई तक सम्भव बनाने के लिये नीचे से पानी की निकासी करनी पड़ती है। यदि यह स्थिति चूनाप्रस्तर या डोलोमाइट के क्षेत्रों में होती है तो सतह पर मानव जनित विलयन छिद्र बन जाते है। इन मानव जनित विलय छिद्रों से होकर धरातलीय वर्षा का जल नीचे जाता है जिस कारण उपरी सतह ध्वस्त होने लगती है। खदानों से जल को बाहर निकालने से भूमिगत जल का तल नींचे चला जाता है जिस कारण सतह पर स्थित जलस्रोत (water spring) तथा चश्मे सूख जाते हैं। दक्षिण अफ्रीकी संघ में जोहान्सबर्ग के पास ‘फार वेस्ट रैण्ड माइनिंग डिस्ट्रिक्ट‘ में सोने की खदानों से जल के निष्कासन के कारण सतह पर दर्जनों विलयन रध्रों का निर्माण हो गया। झारखण्ड की की चसनाला त्रासदी मनुष्य के मूर्खतापूर्ण कार्यों का जीता-जागता उदाहरण है। भूमिगत खनन के कारण जल के प्रवाह में दिशा परिवर्तन हो जाता है, जलप्रवाह की व्यवस्था अव्यवस्थित हो जाती है, हानिकारक गैसें मुक्त होकर सतह के बाहर निकल आती हैं, शैल प्रस्फोट तथा भूपदार्थों में प्रस्फोट होते हैं, अवतलन के कारण धरातलीय सतह में चटकनें आ जाती हैं तथा धरातलीय सतह में तोड़-फोड़ होने से असमानता उत्पन्न हो जाती है। नाभिकीय विस्फोट मनुष्य की क्रियाओं में सर्वाधिक घातक, संहारक तथा शक्तिशाली होते हैं। इनके द्वारा न केवल धरातल में क्षणभर में उलट-फेर हो जाता है वरन् शक्तिशाली भूकम्प भी आते हैं।