चुम्बक की परिभाषा क्या है , प्राकृतिक , कृत्रिम चुम्बक , स्थाई , अस्थाई चुंबक Definition of magnet

Definition of magnet in hindi चुम्बक की परिभाषा क्या है , प्राकृतिक चुम्बक , कृत्रिम चुम्बक : धातुओं जैसे लोहा , कोबाल्ट आदि को आकर्षित करने के गुण को चुम्बकत्व तथा जो पदार्थ चुंबकत्व गुण दर्शाते है उसे चुम्बक कहते है।

चुम्बक को दो भागों में अध्ययन किया जाता है

1. प्राकृतिक चुम्बक

2. कृत्रिम चुंबक

इन दोनों के बारे में हम यहाँ विस्तार से अध्ययन करते है।

1. प्राकृतिक चुम्बक (Natural magnets) :

प्रकृति में कुछ ऐसे पदार्थ पाए जाते है जिनमे लोहा , कोबॉल्ट इत्यादि को आकर्षित करने की क्षमता पायी जाती है , चूँकि ये पदार्थ सबसे पहले ग्रीस में एशिया माइनर के मैग्नीशिया में खोजे गए इसलिए इन पदार्थों को मैग्नेटाइड नाम से जाना जाता है तथा पदार्थो के इस गुण को चुम्बकत्व कहते है। प्राचीन समय में इनका उपयोग दिशा ज्ञात करने के लिए किया जाता था क्योंकि चुम्बक स्वतंत्रता पूर्वक लटकने पर हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरती है। मैग्नेटाइड का सूत्र Fe3O4 होता है जो की एक लोहे का अयस्क है। चूँकि इन पदार्थो में चुंबकत्व गुण बहुत कम पाया जाता है इसलिए इन्हे अधिक उपयोग में नहीं लिया जाता है।

2. कृत्रिम चुंबक (artificial magnet )

हमने प्राकृतिक चुम्बक में पढ़ा की इनमे चुम्बकत्व अत्यधिक अल्प होता है अतः चुंबकत्व को बढ़ाने के लिए कृत्रिम चुम्बक बनाई जाती है।  ये वो चुम्बक है जिनको कृत्रिम रूप से बनाया जाता है।
कृत्रिम चुंबक बनाने के लिए लोह चुम्बकीय पदार्थ को अत्यधिक चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है जिससे लोह चुम्बकीय पदार्थों में चुंबकीय गुण आ जाते है।
कृत्रिम चुम्बक को दो प्रकार की हो सकती है
  • स्थाई चुम्बक
  • अस्थाई चुंबक
इनके बार में अब हम विस्तार से अध्ययन करते है
  • स्थाई चुम्बक (Permanent magnet )

वे  लोह चुम्बकीय पदार्थ जिनको एक बार चुम्बकित करने के बाद वे एक लम्बे समय तक चुंबकीय गुण दर्शाती है उन्हें स्थाई चुम्बक कहते है। जैसे टंगस्टन , कोबाल्ट स्टील एलनिको इत्यादि।
  • अस्थाई चुंबक (Temporary magnets )

वे चुम्बक जो तब तक चुम्बकत्व गुण दर्शाती है जब तक की वे चुम्बकीय बल में उपस्थित हो , जैसे ही इस चुम्बककारी बल को हटा लिया जाता है इनमे चुम्बकत्व गुण समाप्त हो जाता है।  अस्थाई चुंबक का उपयोग प्राय: जनित्र , मोटर इत्यादि में किया जाता है।

टोरॉइड (टोरोइड) की अक्ष पर चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic field on the axis of toroid

Magnetic field on the axis of toroid in hindi टोरॉइड (टोरोइड) की अक्ष पर चुम्बकीय क्षेत्र : जब एक लम्बी परिनालिका को मोड़ कर एक वृत्ताकार आकार दिया जाता है अर्थात मोड़कर दोनों सिरों को आपस में मिलाया जाता है तो बनी आकृति को टोरॉइड (टोरोइड) कहते है।

यह एक खोखले छल्ले की तरह आकृति का होता है जिस पर अत्यधिक पास में तार लिपटे हुए होते है।
जब तोरोइड (टोरॉइड ) में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो इसके भीतर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है लेकिन इसके अन्दर खाली जगह में तथा टोरॉइड के बाहर चुंबकीय क्षेत्र का मान शून्य होता है।
मान लेते है की टोरोइड पर N फेरे तार के लिपटे हुए है तथा इसमें I मान की धारा प्रवाहित हो रही है तो धारा प्रवाहित होने के कारण इसमें एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है
एम्पीयर के नियम से
B.dl  = μΣI
 B व अल्पांश (dl) के मध्य कोण θ है तो
 B.dl cosθ  = μΣI
 θ = 0 तथा टोरॉइड में कुल धारा ΣI = NI
मान रखने पर
 B.dl = μNI
dl  = 2πr
B.2πr  = μNI
B = μNI /2πr
हम सूत्र से स्पष्ट रूप से देख सकते है की अक्ष पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र टोरॉइड की त्रिज्या पर निर्भर करता है। 
चूँकि हम जानते है की एकांक लम्बाई में लपेटे गए फेरों की संख्या n है तो इसको निम्न सूत्र द्वारा लिखा जाता है 
n = N/2πr
मान सूत्र में रखने पर 
B = μ0nI 
 

दण्ड चुम्बक एवं धारावाही परिनालिका के व्यवहार की तुलना bar magnet and current solenoid

Behavioral comparison of a bar magnet and current solenoid दण्ड चुम्बक एवं धारावाही परिनालिका के व्यवहार की तुलना : जब किसी धारावाही परिनालिका को धागे से लटकाया जाता है तो यह परिनालिका (सोलेनोइड) एक दंड चुम्बक की तरह व्यवहार करता है।

अर्थात जब धारावाही परिनालिका को धागे से स्वतंत्रता पूर्वक लटकाया जाए तो यह उत्तर दक्षिण दिशा में ठहरती है।

जब किसी परिनालिका में प्रवाहित धारा की दिशा को बदल दिया जाए तो इसके सिरों पर धुव्रता बदल जाती है अर्थात इसके सिरों के ठहरने की दिशा बदल जाती है।
हम पढ़ चुके है की परिनालिका में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर यह चुम्बक की तरह व्यवहार करती है अतः जब किसी अन्य परिनालिका को इसके पास लाया जाए तो समान ध्रुवित सिरे एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है तथा विपरीत ध्रुवित सिरे एक दूसरे को आकर्षित करते है जैसा चुम्बक में होता है।
चुम्बक की भाँति जब इसके पास लौह चुम्बकीय पदार्थ लेकर जाते है तो इनको परिनालिका आकर्षित करती है , इसी प्रकार जब किसी चुंबक को तोडा जाता है तथा प्रत्येक टुकड़ा एक चुम्बक की तरह व्यवहार करता है उसी प्रकार परिनालिका में प्रत्येक लूप चुंबक की तरह ही व्यवहार करता है।
इन सब को देखते हुए हम यह बात स्पष्ट रूप से कह सकते है की धारावाही परिनालिका एक दण्ड चुम्बक की तरह व्यवहार करती है।
धारावाही परिनालिका में चुम्बकीय रेखाएँ समांतर होती है लेकिन दण्ड चुम्बक में चुम्बकीय रेखाऐं वक्र होती है।
किसी भी धारावाही परिनालिका या सोलेनॉइड के बाहर चुम्बकीय क्षेत्र शून्य माना जाता है लेकिन दंड चुम्बक के बाहर स्थित बिन्दुओ पर कुछ चुम्बकीय क्षेत्र माना जाता है अर्थात शून्य नहीं माना जाता।

अनन्त लम्बाई की परिनालिका में चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic field inside an infinitely long solenoid

Magnetic field inside an infinitely long solenoid अनन्त लम्बाई की परिनालिका में चुम्बकीय क्षेत्र : किसी आदर्श परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र एक समान रहता है तथा बाहर शून्य रहता है , अब हम बात करते है की आदर्श सोलेनॉइड (परिनालिका) के भीतर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का मान कितना होता है इसके लिए सूत्र स्थापित करके अध्ययन करते है।

चित्रानुसार एक आदर्श परिनालिका है जिसके भीतर B चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो रहा है तथा इसके बाहर चुंबकीय क्षेत्र का मान शून्य है।  , इसके भीतर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र B का मान ज्ञात करने के लिए हम एक आयताकार लूप ABCD पर चर्चा करते है।
हम चित्र में स्पष्ट रूप से देख सकते है की ABCD का कुछ भाग परिनालिका के बाहर है तथा कुछ इसके अन्दर स्थित है।
AB भुजा परिनालिका की अक्ष के समान्तर है अतः हम कह सकते है की यह AB भुजा चुम्बकीय क्षेत्र B के समान्तर है यहाँ हम मान रहे है की AB भुजा की लम्बाई x है तथा परिनालिका (सोलेनोइड) की एकांक लम्बाई में फेरों की संख्या n है और इसमें I परिमाण की विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है।
चूँकि AB की लम्बाई x है तथा n एकांक क्षेत्र में फेरो की संख्या है
अतः AB भुजा में कुल फेरों की संख्या nx होगी।
एम्पीयर का नियम लगाने पर

B.dl  = μΣI
 चूँकि CD भुजा परिनालिका के बाहर है अतः इसके कारण चुम्बकीय क्षेत्र शून्य होगा।
AD तथा BC भुजा चुम्बकीय क्षेत्र के लंबवत है अतः इनके कारण भी चुम्बकीय क्षेत्र शून्य होगा।
भुजा AB के कारण चुम्बकीय क्षेत्र
Bdl  = μΣI
यहाँ dl  = x
ΣI = nxl
अतः
Bx  = μnxl
B = μnl

 

परिनालिका की परिभाषा क्या है solenoid (सोलेनोइड) in hindi

solenoid in hindi  परिनालिका की परिभाषा क्या है : जब किसी चीनी मिट्टी से बनी बेलनाकार नलिका जिसकी लम्बाई अधिक हो तथा त्रिज्या बहुत कम हो , पर ताँबे का तार लपेटा जाता है इस व्यवस्था को परिनालिका कहते है।

चीनी मिट्टी की बेलनाकार आकृति पर फेरे पास पास लपेटे जाते है अर्थात फेरों के मध्य जगह नहीं छोड़ी जाती है।
ऊपर दिखाया गया चित्र परिनालिका का है इसमें आप देख सकते है की एक चीनी मिट्टी की बनी हुई बेलनाकार आकृति पर तांबे का तार लम्बाई के अनुदिश लपेटा हुआ है।
जब किसी परिनालिका में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
जब किसी परिनालिका का सोलेनोइड में धारा I प्रवाहित की जाती है तो चित्रानुसार इसमें चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
इस चुंबकीय क्षेत्र की दिशा समान होती है तथा बाहर के बिन्दुओ पर चुंबकीय क्षेत्र एक दूसरे का विरोध करते है यही कारण है की बाहरी बिंदुओं पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान तुलनात्मक कम होता है।
ताम्बे के फेरे जितने ज्यादा पास पास होते है चुम्बकीय क्षेत्र बढ़ता जाता है , किसी भी आदर्श परिनालिका के अंदर चुम्बकीय क्षेत्र सभी जगह समान माना जाता है तथा परिनालिका का बाहर शून्य माना जाता है।

लम्बे बेलनाकार धारावाही चालक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic field due to cylindrical conductor

Magnetic field due to current carrying long cylindrical conductor लम्बे बेलनाकार धारावाही चालक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र : हमने अनन्त लम्बाई के सीधे धारावाही चालक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र के बारे में अध्ययन कर लिया है , अब हम बात करते है की एक लम्बे बेलनाकार धारावाही चालक के कारण कितना चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है तथा इसके लिए हम सूत्र की स्थापना भी करेंगे।

माना चित्रानुसार एक बेलनाकार चालक है जिसकी त्रिज्या R है , इस धारावाही चालक में I परिमाण की विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है।
यह धारा धारावाही चालक के सम्पूर्ण काट क्षेत्रफल में समान रूप से वितरित है।
इस बेलनाकार धारावाही चालक से r दुरी पर किसी बिंदु पर हमें चुम्बकीय क्षेत्र की गणना करनी है।
चूँकि हमने बताया की सम्पूर्ण क्षेत्र में धारा का वितरण समान है अतः चुम्बकीय क्षेत्र वृत्ताकार रेखाओं के रूप में होगा , इन चुंबकीय क्षेत्र की वृत्ताकार रेखाओं का केंद्र चालक के अक्ष पर ही होगा।
हम इस बेलनाकार धारावाही चालक के कारण r दूरी पर स्थित बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात कर रहे , इस बिंदु की भी तीन स्थितियां हो सकती है , हम तीनों स्थितियों में चुंबकीय क्षेत्र की गणना करते है।

1. जब बिन्दु बेलनाकार चालक के बाहर स्थित हो

जब बिंदु चालक के बाहर स्थित हो तो इस स्थिति में r > R होगा , इस स्थिति में हम r त्रिज्या के बन्द वृत्ताकार पथ की कल्पना करते है , चूँकि चालक में धारा नियत है अतः चुम्बकीय क्षेत्र भी नियत होगा अतः यहाँ एम्पीयर का नियम लगा सकते है
एम्पीयर का नियम लगाने पर

B.dl  = μΣI
B (चुम्बकीय क्षेत्र) तथा अल्पांश (dl) के मध्य कोण θ है तो

B.dl cosθ  = μΣI
मान लेते है θ = 0 तथा ΣI = I

अतः
B.dl  = μI
dl = l = 2πr (चूँकि वृत्ताकार पथ है तथा त्रिज्या r है )
अतः
B.2πr  = μI
अतः
B = μI /2πr

 2. जब बिन्दु बेलनाकार चालक की सतह पर स्थित हो

जिस बिंदु पर हमे चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करना है अगर वह बिंदु धारावाही चालक की सतह या परिधि पर स्थित हो तो इस स्थिति में R = r होगा।
अतः ऊपर ज्ञात समीकरण में r के स्थान पर R रखने पर
B = μI /2πR 

3. जब बिन्दु बेलनाकार धारावाही चालक के अन्दर स्थित हो

जब यह बिंदु बेलनाकार चालक के भीतर स्थित हो तो इस स्थिति में r < R होगा।
एम्पीयर के नियम से
B.dl  = μΣI
B (चुम्बकीय क्षेत्र) तथा अल्पांश (dl) के मध्य कोण θ है तो

B.dl cosθ  = μΣI
ΣI लूप में परिबद्ध विद्युत धारा
ΣI  = I πr2
/πR
2

ΣI का मान रखने पर
B.dl  = μΣI
B.dl  = μI r2 /R2 
dl = l = 2πr (चूँकि वृत्ताकार पथ है तथा त्रिज्या r है )
B. 2πr μI r2 /R
B = μI r /R2

अनन्त लम्बाई के सीधे धारावाही चालक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic field due to infinite conductor

Magnetic field due to infinitely long and straight current carrying conductor अनन्त लम्बाई के सीधे धारावाही चालक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र : मान लीजिये हमारे पास कोई अनंत लम्बाई का तार है यहाँ अनन्त लम्बाई से तात्पर्य है की तार की लम्बाई अत्यधिक है , इस तार में विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है , हम पढ़ चुके है की किसी तार में तार प्रवाहित होने पर इसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होगा।
हमें इस अनन्त लम्बाई के तार में विद्युत धारा प्रवाहित होने पर तार से किसी दुरी पर स्थित किसी बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करना है।

माना चित्रानुसार एक चालक तार है जिसमे I परिमाण की धारा प्रवाहित हो रही है , चालक तार से r दूरी पर कोई बिंदु P स्थित है , हमें इस बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करना है।
जैसा की हम सब जानते है की इस चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित होने पर इसके चारों ओर संकेन्द्रिय वृतों के रूप में चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है इसलिए हम इस तार के चारों तरफ वृत्ताकार पथ की कल्पना करते है।
हम जो वृत्ताकार पथ की कल्पना कर रहे है इसकी त्रिज्या r मान रहे है।
एम्पीयर का नियम बताता है की

B.dl  = μΣI
यदि B (चुम्बकीय क्षेत्र) तथा अल्पांश (dl) के मध्य कोण θ है तो
 B.dl cosθ  = μΣI
यहाँ मान लेते है की B तथा dl के मध्य कोण 0 है , तथा तार में प्रवाहित कुल धारा का मान I है तो
θ = 0 तथा ΣI = I
अतः
B.dl  = μI
चूँकि तार से दूरी r का मान नियत है अतः बिंदु P पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान नियत रहेगा अतः B को नियत मानकर समाकलन से बाहर ले सकते है
Bdl  = μI
तथा dl = l = 2πr
अतः
B.2πr  = μI
अतः
B = μI /2πr
 यदि  हमें इस चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा भी ज्ञात करनी हो तो हम दक्षिण हस्त का नियम काम में ले सकते है।
सूत्र में हम देख सकते है की अनन्त लम्बाई के सीधे धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का मान दूरी r के व्युत्क्रमानुपाती होता है अतः B तथा r के मध्य निम्न ग्राफ प्राप्त होता है

 

एम्पीयर का नियम चुम्बकीय क्षेत्र के सम्बन्ध में क्या है ampere’s law in hindi

ampere’s law in hindi एम्पीयर का नियम चुम्बकीय क्षेत्र के सम्बन्ध में क्या है : हम बायो सावर्ट का नियम पढ़ चुके है , इस नियम में हमने देखा था की कैसे हम किसी धारा वितरण के लिए चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात कर सकते है।  अर्थात जब किसी चालक तार इत्यादि में धारा समान रूप से प्रवाहित हो रही हो तो इस तार के कारण किसी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र का मान क्या होगा यह हमने पढ़ लिया था।
लेकिन
मान लीजिये चालक तार में विद्युत धारा का वितरण समान न हो अर्थात तार में एक समान धारा प्रवाहित न हो रही हो तो इस चालक तार के कारण किसी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करने में  बायो सावर्ट का नियम कठिन पड़ जाता है , इस स्थिति में हम दूसरा नियम काम में लेते है इस नियम को एम्पीयर का नियम कहते है।
अतः एम्पीयर का नियम तब काम में लिया जाता है जब विद्युत धारा का वितरण असममित हो और हमें इस असममित धारा के कारण किसी बिन्दु पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात करना हो।

एम्पीयर के नियम की परिभाषा

इस नियम के अनुसार ” निर्वात या वायु में किसी भी बंद पथ के अनुदिश चुम्बकीय क्षेत्र का रेखीय समाकलन (B.dl ) , निर्वात की चुंबकशीलता (μ0) व उस पथ से गुजरने वाली धाराओं के बीजगणितीय योग (ΣI) के बराबर होता है “
अतः इसको गणितीय रूप में निम्न प्रकार लिख सकते है
B.dl  = μΣI
यहाँ B.dl चुम्बकीय क्षेत्र का रेखीय समाकलन है , इसे ज्ञात करने के लिए तार को छोटे छोटे अल्पांश में मानकर जिनकी लम्बाई dl है के कारण चुम्बकीय क्षेत्र का मान ज्ञात किया जाता है और फिर सबका योग किया जाता है।
μनिर्वात की चुंबकशीलता है।
ΣI पथ से गुजरने वाली धाराओं के बीजगणितीय योग है , इसका मान ध्यान पूर्वक ज्ञात किया जाता है क्योंकि इसमें धारा किदिशा भी ज्ञात करनी पड़ती है।
धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए दाहिने हाथ का नियम काम में लेते है तथा विद्युत धारा के मान के साथ दिशा का उपयोग करते हुए  पथ से गुजरने वाली धाराओं के बीजगणितीय योग ज्ञात करते है।

वोल्टमीटर क्या है , धारामापी का वॉल्ट मीटर में रूपान्तरण , voltmeter in hindi

voltmeter in hindi वोल्टमीटर क्या है , धारामापी का वॉल्ट मीटर में रूपान्तरण : यह एक ऐसी युक्ति है जिसका प्रयोग दो बिंदुओं के मध्य विभवान्तर का मान ज्ञात करने के लिए किया जाता है , अर्थात किन्हीं दो बिन्दुओ के बीच विभवान्तर का मापन करने के लिए वोल्टमीटर का उपयोग किया जाता है।
यदि किसी किलकित कुण्डली धारामापी के श्रेणीक्रम में उचित मान का उच्च प्रतिरोध जोड़ दिया जाए तो यह वोल्टमीटर बन जाता है। जितना उचित व उच्च मान का प्रतिरोध धारामापी के श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है यह उतना ही विभवान्तर का मापन सही करता है।
किसी धारामापी को वोल्टमीटर में बदलने के के धारामापी की कुण्डली के श्रेणीक्रम में उच्च मान का प्रतिरोध जोड़ा जाता है इसे धारामापी का वॉल्ट मीटर में रूपान्तरण कहते है।

इसकी आन्तरिक संरचना समझने के लिए चित्र में दिखाया गया है की एक गैल्वेनोमीटर (धारामापी) के श्रेणीक्रम में प्रतिरोध R जोड़ा गया है जिससे यह सम्पूर्ण परिपथ मिलकर  वोल्टमीटर का निर्माण करते है।
किसी परिपथ में विभवांतर का सही या त्रुटिमुक्त मान ज्ञात करने के लिए यह जरुरी है की वोल्टमीटर परिपथ से कोई धारा ग्रहण न करे , यही कारण है की श्रेणी क्रम में जोड़ा गया प्रतिरोध का मान उच्च रखा जाता है।
नोट : किसी भी आदर्श वोल्टमीटर का प्रतिरोध का मान अनन्त माना जाता है।

अमीटर क्या है , धारामापी का अमीटर में रूपान्तरण , Ammeter in hindi

Ammeter in hindi अमीटर क्या है : यह एक ऐसी युक्ति है जिसका उपयोग किसी भी परिपथ में प्रवाहित धारा का मान ज्ञात करने या मापने के लिए होता है। अमीटर एक अत्यन्त कम प्रतिरोध वाली युक्ति है तथा इसकी सहायता से धारा का मापन करने के लिए इसको परिपथ में हमेशा श्रेणीक्रम में लगाया जाता है।
अमीटर का प्रतिरोध कम से कम रखा जाता है , इसका प्रतिरोध जितना कम रखा जाता है यह उतना ही सही धारा का मापन कर पाता है।
किसी भी आदर्श अमीटर का प्रतिरोध शून्य माना जाता है।
किसी भी धारामापी को अमीटर में बदलने के लिए धारामापी की कुण्डली के समान्तर क्रम में उचित मान का अल्प प्रतिरोध जोड़ देते है इसे धारामापी का अमीटर में रूपान्तरण भी कहते है तथा समान्तरक्रम में जोड़े गए प्रतिरोध को शण्ट (shunt) कहते है।
यहाँ समान्तर क्रम में प्रतिरोध जोड़ने का उद्देश्य धारामापी की कुंडली का प्रभावी प्रतिरोध कम करना है क्योंकि हम पढ़ चुके है की समांतर क्रम में प्रभावी प्रतिरोध 1/R   = 1/R1 + 1/R2

अमीटर का संरचना चित्र (construction of ammeter)

हम धारामापी तथा इसकी संरचना के बारे में विस्तार से पढ़ चुके है , हम यहाँ ऊपर यह पढ़ चुके है की धारामापी की कुंडली में समान्तर क्रम में अल्प प्रतिरोध जोड़ने से यह अमीटर में बदल जाता है।
अतः अमीटर में धारामापी की कुण्डली के समान्तरक्रम में उचित प्रतिरोध जोड़कर अमीटर बनाया जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है

किसी भी अमीटर का प्रभावी प्रतिरोध का मान लगाए गए शंट प्रतिरोध के लगभग बराबर ही होता है।