मीटर सेतु क्या है , सिद्धान्त , कार्यप्रणाली meter bridge principle , working in hindi

meter bridge principle , working in hindi मीटर सेतु क्या है , सिद्धान्त , कार्यप्रणाली :  जिस प्रकार व्हीटस्टोन सेतु का उपयोग अज्ञात प्रतिरोध को ज्ञात करने के लिए किया जाता है ठीक उसी प्रकार मीटर सेतु (मीटर ब्रिज ) का उपयोग भी अज्ञात प्रतिरोध का मान ज्ञात करने के लिए किया जाता है।
सिद्धान्त – कम प्रतिरोधों के लिए व्हीटस्टोन का उपयोग आसानी से किया जा सकता है लेकिन बड़े प्रतिरोधों के लिए यह उपकरण जटिल साबित होता है।
इसलिए व्हीटस्टोन सेतु सिद्धांत पर आधारित एक युक्ति बनाई गयी जिसकी सहायता से अज्ञात प्रतिरोधों का मान आसानी से ज्ञात किया जा सके , यह युक्ति मीटर सेतु थी जिसको व्हीटस्टोन का सरलतम रूप के रूप में देखा जा सकता है।

मीटर ब्रिज की संरचना या चित्र

इसका चित्र यहाँ दिखाया गया है।
इसमें निम्न उपकरण प्रयुक्त होते है
1. प्रतिरोध बॉक्स
2. धारामापी
3. अज्ञात प्रतिरोध
4. कुंजी
5 सर्पी कुंजी
इसमें समान अनुप्रस्थ काट का या मोटाई का एक मीटर लम्बा तार कंस्टेन्टन या मैगनिन का होता है जो चित्रानुसार एक मीटर के पैमाने के सहारे कसा होता है।

ऊपर वाले चित्र में देखे , तार के सिरों पर तार के सिरों A तथा C पर दो L आकार की पत्तियां जुडी हुई है जिनमे एक एक पेंच लगाया हुआ है , दोनों पत्तियों के बिच एक पत्ती लगी हुई है जिस पर तीन पेंच लगे हुए है ऊपर चित्र में इनको डॉट से दर्शाया गया है इन पेंचो पर सर्किट को कसा जाता है।
जब आप चित्र को ध्यान से देखेंगे ABCD आपको व्हीटस्टोन ब्रिज की तरह ही दिखेगा।
AC के मध्य 1 मीटर लम्बा तार सेट है।
AD के मध्य प्रतिरोध बॉक्स लगा हुआ है।
DB के मध्य धारामापी लगा हुआ है।
DC के मध्य अज्ञात प्रतिरोध जुड़ा हुआ है।

मीटर सेतु की कार्यप्रणाली (working of meter bridge) :

AC के मध्य चित्रानुसार एक सेल , धारा नियंत्रक और एक कुंजी को जोड़ देते है।
प्रतिरोध बॉक्स में उचित प्रतिरोध R लगाकर कुंजी K को बंद कर परिपथ को पूरा करते है , फिर सर्पी कुंजी को दाएं से बाएं एक मीटर वाले तार पर खिसकाकर तार पर वह स्थिति ज्ञात करते है जहाँ धारामापी में विक्षेप शून्य आ जाये, इस स्थिति को मीटर सेतु की संतुलन स्थिति कहते है।
संतुलन की स्थिति में AB तथा BC की लम्बाइयों को स्केल में देखकर सेंटीमीटर में नोट कर लेते है।
यहाँ AB की लम्बाई को L मान रहे है तथा BC की लम्बाई को (100 – L ).
प्रतिरोध बॉक्स में लगाए गए प्रतिरोध को R मान रहे है।
चूँकि
प्रतिरोध  लम्बाई
P / Q  = L / (100 – L )
सेतु की संतुलन की स्थिति में
P /Q = R / S
L / (100 – L ) = R / S
अज्ञात प्रतिरोध का मान ज्ञात करने के लिए सूत्र
S = R(100 – L) / L
इस प्रकार मीटर सेतु की सहायता से किसी अज्ञात प्रतिरोध का मान ज्ञात किया जाता है।
प्रायोगिक रूप या चित्र

व्हीटस्टोन सेतु क्या है , संरचना चित्र , सिद्धान्त , उपयोग wheatstone bridge in hindi

व्हीटस्टोन सेतु (wheatstone’s bridge) : किसी अज्ञात प्रतिरोध का मान ज्ञात करने के लिए इंग्लैंड के वैज्ञानिक सी. एफ. व्हीटस्टोन ने चार प्रतिरोध , एक सेल तथा एक धारामापी का उपयोग कर एक युक्ति (परिपथ) बनाई इसे व्हीटस्टोन सेतु कहते है।

इस विशेष परिपथ (युक्ति) का उपयोग करके किसी अज्ञात प्रतिरोध का मान आसानी से ज्ञात किया जा सकता है।
व्हीटस्टोन सेतु की रचना (structure of Wheatstone bridge)  : इसकी संरचना चित्र में दिखाई गयी है।
चित्रानुसार इसमें चार प्रतिरोध होते है P , Q , R , S
यहाँ प्रतिरोध P तथा Q श्रेणीक्रम में है और इसी प्रकार R व S आपस में श्रेणी क्रम में है।  फिर दोनों श्रेणीक्रम संयोजनों को आपस में समान्तर में जोड़ा गया है।
पॉइंट b तथा d के मध्य एक धारामापी जुड़ा हुआ है।
बिंदु a तथा c के मध्य E विद्युत वाहक बल की बैटरी जुडी हुई है।

 व्हीट स्टोन सेतु का सिद्धान्त (principle of wheatstone bridge)

परिपथ में E विधुत वाहक बल की बैटरी लगी हुई है माना परिपथ में मुख्य धारा I निकलती है जब यह धारा बिंदु a पर पहुँचती है तो इसे दो मार्ग मिलते है इसलिए यह I1 & I2 में विभक्त हो जाती है फिर I1 को b बिंदु पर  तथा Iको d बिंदु पर दोबारा दो मार्ग प्राप्त होते है यहाँ I1 & Iके विभाजन के लिए तीन स्थितियाँ बनती है
1. जब b बिंदु पर विभव (Vb) का मान d बिंदु पर उत्पन्न विभव (Vd) से ज़्यादा है अर्थात Vb > Vइस स्थिति में चूँकि b बिंदु पर विभव का मान ज़्यादा है और d बिंदु पर विभव कम है अतः b से d की तरफ धारा का प्रवाह होगा लेकिन धारा निम्न विभव से उच्च विभव की तरफ नहीं होता अतः d से b की तरफ धारा प्रवाहित नहीं हो सकती।
अतः जब Vb > Vहै इस स्थिति में Iधारा दो तरफ बंट जाती है इसका एक हिस्सा धारा मापी में चला जाता है और दूसरा हिस्सा Q प्रतिरोध में दूसरी तरफ d बिंदु पर विभव कम है अतः यह I2 धारा धारामापी की तरफ नहीं जाती है और सम्पूर्ण धारा S प्रतिरोध में चली जाती है।
2. दूसरी स्थिति पहली स्थिति की विपरीत होगी अर्थात d बिंदु पर विभव ज़्यादा हो सकता है और b बिंदु पर कम अर्थात Vb < Vइस स्थिति में चूँकि d बिंदु पर विभव अधिक है अतः धारा d से b की तरफ बह सकती है लेकिन b से d की तरफ नहीं बह सकती।
अतः इस स्थिति में  Iधारा दो तरफ बंट जाती है इसका एक हिस्सा धारा मापी में चला जाता है और दूसरा हिस्सा S प्रतिरोध में चला जाता है तथा दूसरी तरफ b बिंदु पर विभव कम है अतः यह I1 धारा धारामापी की तरफ नहीं जाती है और सम्पूर्ण धारा Q प्रतिरोध में चली जाती है।
3. तीसरी स्थिति में बिंदु b तथा d पर विभव का मान समान है अर्थात Vb =  Vइस स्थिति में चूँकि दोनों सिरों पर विभव समान है अतः धारा मापी की तरफ कोई धारा नहीं जाती है अर्थात b-d में कोई धारा प्रवाहित नहीं होती है क्योंकि धारा प्रवाहित होने के लिए विभान्तर की आवश्यकता होती है और चूँकि यहाँ दोनों बिंदु पर समान आवेश है।
अतः इस स्थिति में I1 धारा पूर्ण Q प्रतिरोध पर तथा Iधारा पूर्ण S प्रतिरोध पर पूर्ण रूप से पहुंच जाती है तथा धारामापी में शून्य धारा होने से कोई विक्षेप नहीं होता है इसे सेतु की संतुलन की स्थिति कहते है।
सेतु की संतुलन की अवस्था में  इस
Vb =  Vd

Va – Vb = Va – Vd
I1P = I2R

I1/I2 = R/P
दूसरी तरफ
Vb =  Vd

Vb – Vc = Vd – Vc
I1Q = I2S

I1/I2 = S/Q
I1/I2 की समीकरणों की तुलना करने हम पाते है 
R/P  S/Q
इस समीकरण का उपयोग किसी अज्ञात प्रतिरोध का मान ज्ञात करने के लिए की जाती है जैसे मान लीजिये व्हीट सेतु ब्रिज में S प्रतिरोध अज्ञात है तो
S = QR/P
इसमें P , Q , R का मान रखते ही अज्ञात S प्राप्त हो जाता है। 
इस प्रकार व्हीटसेतु ब्रिज की सहायता से अज्ञात प्रतिरोध का मान ज्ञात किया जाता है। 

किरचॉफ का प्रथम नियम , द्वितीय नियम , किरचॉफ़ के नियम Kirchhoff’s law in hindi

Kirchhoff’s law in hindi किरचॉफ का प्रथम नियम , द्वितीय नियम किरचॉफ के नियम : हमने ओम का नियम पढ़ा है जिसकी सहायता से परिपथ में प्रवाहित धारा , विभवान्तर इत्यादि का अध्ययन किया जाता है।

लेकिन ओम का नियम सरल परिपथों के लिए ही उपयोगी है।  जटिल परिपथों को हल करने के लिए ओम के नियम से कठिनाई हो जाती है।
अतः जटिल परिपथों को हल करने के लिए किरचॉफ ने दो नियम दिए इन्हे किरचॉफ के नियम कहते है।
हम इन दोनों नियमों को विस्तार से पढ़ेंगे उससे पहले इससे सम्बन्धित कुछ परिभाषाएं पढ़ लेते है।
संधि : विद्युत परिपथ का वह बिंदु जहाँ तीन या तीन से अधिक शाखाएँ मिलती है उसे संधि कहते है।
शाखा : परिपथ का वह भाग जिसमे धारा का मान नियत रहता है शाखा कहलाती है।
लूप : प्रतिरोधों , चालकों इत्यादि से बने बंद परिपथ को लूप कहते है।

किरचॉफ का प्रथम नियम (Kirchhoff’s first law)

किरचॉफ़ का पहला नियम  संधि नियम भी कहलाता है , क्यूंकि यह सन्धि से सम्बन्धित है।  इस नियम के अनुसार
“किसी वैद्युत परिपथ में किसी सन्धि पर मिलने वाली सभी धाराओं का बीजगणितीय योग शून्य होता है “
अर्थात
I = 0
इस नियम को हम इस प्रकार भी कह सकते है
” विद्युत परिपथ में किसी संधि पर प्रवेश करने वाली धारा का योग , उसी संधि से निकलने वाली धारा के योग के बराबर होता है “
किसी संधि पर आने वाली धाराओं का योग = उसी संधि से जाने वाली धाराओं का योग
इसे किरचॉफ का प्रथम नियम कहते है।
यह नियम आवेश संरक्षण के नियम पर आधारित है इसलिए तो संधि पर आने वाली धारा अर्थात आने वाला आवेश जाने वाले आवेश के बराबर होता है।
चित्र को ध्यान से देखिये इसमें किसी संधि से 5 धाराएं सम्बन्धित दिखाई गयी है। इनमे से
Iव Iधाराएं संधि में प्रवेश कर रही है जबकि I3 , I4 ,Iधाराएं संधि से बाहर निकल रही है।
किरचॉफ़ के नियम से
संधि पर प्रवेश करने वाली धाराओं का योग  = संधि से निकलने वाली धाराओं का योग
अतः

किरचॉफ का द्वितीय नियम (Kirchhoff’s second law)

किरचॉफ के दूसरे नियम को लूप का नियम भी कहते है क्यूंकि यह लूप से सम्बंधित है। इस नियम के अनुसार
” किसी बंद परिपथ या लूप में परिपथ का परिणामी विद्युत वाहक बल , परिपथ के सभी अवयवों के सिरों पर उत्पन्न विभवांतरों के योग के बराबर होता है “
या
” बंद परिपथ या लूप मे प्रतिरोधों के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर का बीजगणितीय योग उस परिपथ में स्थित सेलो के विद्युत वाहक बालो के बीजगणितीय योग के बराबर होता है।
IR  = ε
इस समीकरण को किसी परिपथ में लागू करने के लिए चिन्हों का ध्यान रखना पड़ता है ये निम्न है
1. परिपथ में विद्युत धारा की दिशा में चलने पर प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर का मान धनात्मक लेते है तथा धारा के विपरीत दिशा में चलने पर प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर ऋणात्मक लेते है।
2. परिपथ में विद्युत धारा की दिशा में चलने पर रास्ते में सेल के ऋण सिरे से धन सिरे की ओर चलने पर विधुत वाहक बल धनात्मक लेते है तथा सेल के धन सिरे से ऋण सिरे की ओर चलने पर विद्युत वाहक बल को ऋणात्मक लेते है।
हमें निम्न लूप के लिए किरचॉफ का नियम उपयोग लेते हुई समीकरण लिखकर हल करना है
R1 प्रतिरोध के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर = IR1
R प्रतिरोध के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर = IR2
चिन्हों का ध्यान का ध्यान रखते हुए विभवांतर IR1 तथा IR2 को धनात्मक लेते है तथा सेल में ऋण टर्मिनल से धन टर्मिनल की तरफ चला जा रहा है अतः सेल का विद्युत वाहक बल भी धनात्मक होगा 
अतः
किरचॉफ के द्वितीय नियम से
प्रतिरोधों के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर का बीजगणितीय योग =  सेलो के विद्युत वाहक बालो के बीजगणितीय योग
अतः

इसे आवश्यकतानुसार आगे भी निम्न प्रकार हल किया जा सकता है और हर मान ज्ञात किया जा सकता है।

विद्युत ऊर्जा तथा विधुत शक्ति की परिभाषा क्या है electric energy and electrical power in hindi

electric energy and electrical power in hindi विद्युत ऊर्जा तथा विधुत शक्ति की परिभाषा क्या है  : हम इन दोनों के बारे में विस्तार से पढ़ते है।

1. विद्युत ऊर्जा (electric energy) : हम जानते है की परिपथ में धारा प्रवाह के लिए विद्युत सेल द्वारा कार्य करना पड़ता है

“एक निश्चित समय में परिपथ में धारा प्रवाह के लिए सेल द्वारा किया गया कार्य विद्युत ऊर्जा कहलाती है ”

या

“निश्चित समय में सेल द्वारा परिपथ को दी गयी ऊर्जा ही विद्युत ऊर्जा कहलाती है ”

माना किसी सेल द्वारा R प्रतिरोध के परिपथ में I मान की धारा t समय तक प्रवाहित की जाए तो t समय में परिपथ में प्रवाहित कुल आवेश का मान q = It

माना सेल द्वारा परिपथ में V विभवांतर आरोपित किया गया है अतः सेल द्वारा किया गया कार्य होगा

W = qV

q का मान रखने पर

W =  ItV

हमने ओम का नियम पढ़ा था जिसके अनुसार

V = IR

मान पिछली समीकरण में रखने पर

W = It IR

W = IRt

विद्युत ऊर्जा का SI मात्रक जूल होता है।

विधुत शक्ति (electrical power )

सेल द्वारा परिपथ में धारा प्रवाह के लिए किये गए कार्य की दर या सेल द्वारा परिपथ को इकाई समय में दी गयी ऊर्जा उस परिपथ की विद्युत शक्ति कहलाती है।
इसको P से लिखा जाता है।
हमने ऊपर पढ़ा है की t समय में सेल द्वारा परिपथ में विद्युत धारा प्रवाह के लिए किया  कार्य या दी गयी ऊर्जा
W = IRt
विद्युत शक्ति होती है इकाई समय में किया गया कार्य अतः परिभाषा से
विद्युत शक्ति = विद्युत ऊर्जा /t
P = W /t
W का मान रखकर हल करने पर

P = IR

विद्युत शक्ति का मात्रक वाट (watt ) होता है।

वाट = जूल / सेकण्ड

विद्युत शक्ति मापने के लिए अश्व शक्ति का भी उपयोग करते है।

1 अश्व शक्ति = 746 वाट (watt )

सेलों का श्रेणीक्रम संयोजन , समान्तर क्रम संयोजन series & parallel combination of cells

सेलों का संयोजन (combination of cells in hindi ) : हर सेल की एक सीमा होती है है की वह उस सीमा से अधिक धारा परिपथ में प्रवाहित नहीं करता , लेकिन कभी कभी हमारे सामने ऐसी परिस्थिति आती है की हमें अधिक धारा की आवश्यकता होती है इसलिए हमें वांछित धारा प्राप्त करने के लिए सेलो को श्रेणी , समान्तर या मिश्रित क्रम में जोड़ा जाता है , हम आगे विस्तार से इनके बारे में अध्ययन करते है की सेलो को किस प्रकार जोड़ा जाना उचित होगा। तो आइये विस्तार से सेलो के संयोजन का अध्ययन करते है।

सामान्तया: सेलो को दो प्रकार से जोड़ा जा सकता है
१. श्रेणीक्रम संयोजन
२. समांतर क्रम संयोजन

सेलों का श्रेणीक्रम संयोजन (series combination of cells )

जब सेलों को इस प्रकार जोड़ा जाए की एक सेल का टर्मिनल दूसरे सेल के विपरीत ध्रुवता वाले टर्मिनल से जुड़ा हो तो इस प्रकार के संयोजन को श्रेणीक्रम संयोजन कहते है।
अर्थात एक सेल का धनात्मक सिरा दूसरे सेल के ऋणात्मक सिरे से जुड़ा होगा। जैसा चित्र में दर्शाया गया है।
चित्रानुसार दो सेल श्रेणीक्रम में जुड़े हुए है जिनके विद्युत वाहक बल क्रमशः E1 , E2 हैतथा सेलो का आन्तरिक प्रतिरोध क्रमशःr1 , r2 है।  इन सेलो को श्रेणी क्रम में जोड़कर इस संयोजन से कितनी धारा I प्राप्त की जा सकती है यह देखने के लिए एक प्रतिरोध R जोड़ा गया है , जिसमे संयोजन से कितनी धारा प्रवाहित हो रही है इस बात का अध्ययन किया जावेगा।
बिंदु A तथा B के मध्य विभवान्तर
VAB = V (A) – V (B) = ε1– Ir1.
बिंदु B तथा C के मध्य विभवांतर
VBC = V (B) – V (C) = ε2 – Ir2
अतः बिंदु A तथा C के बीच विभवान्तर
VAC  = V (A) – V(C) = [V (A) – V (B)] + V (B) – V (C)]
VAC  =  ε1– Ir+ ε2 – Ir2
VAC  ( ε1 + ε2) – I(r1+r2).
माना संयोजन में दोनों सेलो का कुल आंतरिक प्रतिरोध req के बराबर है तथा कुल विद्युत वाहक बल εeq है।
तो
 VAC = εeq – I req.
VAC  के दोनों समीकरणों की तुलना करने पर
εeq  = ( ε1 + ε2)
req  = (r1+r2)
पूरे परिपथ के लिए ओम के नियम से निम्न समीकरण बनेगा
VA – VC = I R = ε1– Ir1  ε2 – Ir2
I (R + r1 + r2) = εε2
I = εε/ (R + r1 + r2)
I = εeq / (R +  req)
निष्कर्ष
सेलो को श्रेणीक्रम में जोड़ा जाए तो परिणामी विद्युत वाहक बल सेलो के वि. वा.बल के योग के बराबर होता है।
यदि बैटरी की ध्रुवता बदल दी जाये तो ε1 – ε2 की जगह ε ε1  हो जायेगा।

सेलों का समान्तर क्रम संयोजन (parallel combination of cells )

जब एक सेल को दूसरे सेल से इस प्रकार जोड़ा जाये की उनके समान ध्रुवता वाले सिरे आपस में जुड़े हो तो इस प्रकार के संयोजन को समांतर क्रम संयोजन कहते है।
अर्थात बैटरी का धनात्मक सिरा अगले बैटरी के धनात्मक सिरे से जुड़ा होगा और इसी प्रकार आगे क्रम चलता रहेगा। जैसा चित्र में दिखाया गया है।
चित्रानुसार दो सेल E1 , E2  समांतर क्रम में जुड़े है जिनके आन्तरिक प्रतिरोध क्रमशः r1 , r2  है। कुल धारा I है तो परिपथ में I1 , I2 के रूप में बंट जाती है।
कुल धारा I = I1 + I2
हम जानते है की समांतरक्रम में विभवांतर समान होता है माना विभवांतर V है अतः
V = ε1– I1 r1
V = ε2 – I2 r2
समीकरणों  से I1 , I2 के मान निकालने पर
कुल धारा I = I1 + I2
I1 + Iके मान रखने पर
माना संयोजन का कुल विद्युत वाहक बल εeq तथा कुल आंतरिक प्रतिरोध req है अतः

सेल , विद्युत वाहक बल , टर्मिनल वोल्टता और आंतरिक प्रतिरोध cell, emf , terminal voltage, internal resistance

cell , electro motive force , terminal voltage and internal resistance in hindi सेल , विद्युत वाहक बल , टर्मिनल वोल्टता और आंतरिक प्रतिरोध  : हम इन सभी के बारे में विस्तार से चर्चा और अध्ययन करेंगे।

विद्युत सेल (electric cell )

वह युक्ति जो किसी परिपथ में स्थायी विद्युत धारा या दो बिन्दुओ के मध्य विभवांतर बनाये रखती है उसे विद्युत सेल कहते है। सभी सेल रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने का कार्य करते है।

अतः हम यह भी कह सकते है की ” सेल वह युक्ति है जो रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तन का कार्य करती है ”

विद्युत सेल परिपथ को ऊर्जा प्रदान करता है अर्थात विभवांतर उत्पन्न करता है जिससे परिपथ में उपस्थित आवेश बहने लगता है और फलस्वरूप परिपथ में धारा बहने लगती है।

विद्युत सेलों के प्रकार : सेल को मुख्यत: दो भागों में बांटा गया है

1. प्राथमिक सेल

2. द्वितीयक सेल

1. प्राथमिक सेल (primary cell )

ये वो सेल होते है जो एक बार रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देते है और इनको चार्ज नहीं किया जा सकता। अतः इनको सिर्फ एक बार उपयोग में लाया जा सकता है इन्हे प्राथमिक सेल कहते है।

उदाहरण – शुष्क सेल , डेनियल सेल

2. द्वितीयक सेल (secondary cell ) 

वे सेल जिनमे पहले विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदला जाता है और फिर रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा के रूप में परिपथ में काम में लिया जा सकता है और ऊर्जा खत्म होने पर पुन: चार्ज करके काम में लिए जा सकता है अर्थात पुन: विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा के रूप में संचित किया जा सकता है।

उदाहरण – सीसा संचायक सेल

विद्युत वाहक बल (electromotive force or emf )

एकांक आवेश को परिपथ में बहने के लिए या प्रवाहित होने के लिए सेल द्वारा किया गया कार्य या आवेश को दी गयी ऊर्जा को ही सेल का विद्युत वाहक बल कहा जाता है।

या

जब सेल से कोई धारा प्राप्त नहीं  रही उस स्थिति में दोनों इलेक्ट्रोडो के मध्य विभवान्तर को विद्युत वाहक बल कहते है।

हालंकि इसको बल कहा जाता है लेकिन यह वास्तव में बल नहीं है यह विभवांतर है जो परिपथ में आवेश को प्रवाहित करने के लिए सेल द्वारा परिपथ पर आरोपित किया जाता है।

टर्मिनल वोल्टता (terminal potential difference )

एकांक आवेश को सेल के एक टर्मिनल से दूसरे टर्मिनल तक बाहरी परिपथ में प्रवहित करने में सेल द्वारा जो कार्य करना पड़ता है उसे टर्मिनल वोल्टता कहते है।

या

सेल बंद परिपथ में लगा हो तो सेल के दोनों इलेक्ट्रोडो मध्य विभवांतर को टर्मिनल वोल्टता कहते है।

सेल आंतरिक प्रतिरोध (internal resistance of cell )

विद्युत सेल के भीतर धारा के मार्ग में आने वाली बाधा को सेल का आंतरिक प्रतिरोध कहते है।

यह बाधा कई कारण से आ सकती है जैसे

विद्युत अपघट्य के कारण , सांद्रता इत्यादि।

इसका मात्रक ओम होता है।

प्रतिरोधों का श्रेणी क्रम तथा समान्तर क्रम संयोजन series and parallel combination of resistances

series and parallel combination of resistances in hindi प्रतिरोधों का श्रेणी तथा समान्तर क्रम संयोजन  : विद्युत परिपथ के सभी भागो में हमें भिन्न धारा के मान की आवश्यकता होती है और यह प्रतिरोध के अलग अलग मानो वाले प्रतिरोधों की सहायता से संभव हो पाता है।

प्रतिरोधों का संयोजन हमें उस दशा में करना पड़ जाता है जब हमारे पास जो प्रतिरोध का मान चाहिए वो उपलब्ध नहीं होता लेकिन अन्य मान के प्रतिरोध उपलब्ध होते है , ऐसी स्थिति में हम प्रतिरोधों को का आपस में इस प्रकार संयोजित करते है की हमें आवश्यक प्रतिरोध का मान प्राप्त हो जाए यह संयोजन किसी आवश्यकतानुसार किसी भी प्रकार का हो सकता है श्रेणी , समांतर या मिश्रित।
सामान्तया: प्रतिरोधों का संयोजन दो प्रकार का होता है
1. श्रेणी क्रम संयोजन
2. समान्तर क्रम संयोजन
इनके बारे में विस्तार से पढ़ते है

1. श्रेणी क्रम संयोजन (series combination )

जब दो या दो से अधिक प्रतिरोधों को इस प्रकार से संयोजित किया जाए की प्रत्येक प्रतिरोध में विद्युत धारा का मान एकसमान हो तो इस प्रकार के प्रतिरोधों के संयोजन को श्रेणी क्रम संयोजन कहते है।
इस प्रकार के संयोजन में प्रतिरोध का दूसरा सिरा अगले प्रतिरोध के पहले सिरे से जुड़ा रहता है और इसी प्रकार दूसरे प्रतिरोध का दूसरा सिरा तीसरे प्रतिरोध के पहले सिरे से जुड़ा रहता है जैसा चित्र में दिखाया गया है।

चित्रानुसार 3 प्रतिरोध R1 , R2 , R3 है ये तीनो श्रेणीक्रम में जुड़े हुए है , तीनो प्रतिरोधों में समान मान की धारा I प्रवाहित हो रही है , तीनो प्रतिरोधों पर विभवांतर V1 , V2 , V3 है। V1 , V2 , V3 का मान ओम के नियम से निकाल सकते है।
V1 = IR1
V2 = IR2
V3 = IR3
चूँकि परिपथ में आरोपित कुल विभवांतर Vs है।
 V =  V1 +  V2 +  V3
V1 , V2 , V3 का मान रखने पर
V =   IR+ IR+ IR3
V =  I (R1 +  R2 + R3)
चूँकि हम जानते है की V = I R
V का मान ऊपर समीकरण में रखने पर
I R =  I (R1 +  R2 + R3)
अतः
R = R1 +  R2 + R3
यहाँ R को श्रेणी क्रम में प्रतिरोधों का तुल्य या कुल प्रतिरोध कहते है , यहाँ हमने देखा की श्रेणीक्रम में तुल्य प्रतिरोध का मान सभी प्रतिरोधों के योग के बराबर प्राप्त होता है।
नोट : हमने 3 प्रतिरोध लेकर इसको समझा है , लेकिन 3 से अधिक प्रतिरोध होने पर भी ये ही निष्कर्ष इसी प्रकार निकाला जा सकता है।
निष्कर्ष :
1. सभी प्रतिरोधों में समान धारा प्रवाहित होती है।
2. परिपथ का कुल विभवांतर सभी प्रतिरोधों के विभवान्तर के योग के बराबर होता है।
3. तुल्य प्रतिरोध का मान सभी प्रतिरोधों के योग के बराबर आता है।
4. तुल्य प्रतिरोध का मान परिपथ में उपस्थित सबसे बड़े प्रतिरोध के मान से भी अधिक प्राप्त होता है।

2. समान्तर क्रम संयोजन (parallel combination of resistances)

जब दो या दो से अधिक प्रतिरोधों को इस प्रकार से संयोजित किया जाए की प्रत्येक प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर का मान समान हो , प्रतिरोधों के इस प्रकार के संयोजन को समांतर क्रम संयोजन कहते है।
इसमें प्रतिरोधों को इस प्रकार जोड़ा जाता है की प्रतिरोधों के एक तरफ के सभी सिरे जुड़े हो और दूसरी तरफ दूसरे सभी सिरे आपस में जुड़े हो जैसा चित्र में दिखाया गया है।

चित्रानुसार 3 प्रतिरोध R1 , R2 , R3 है ये तीनो समांतर क्रम में जुड़े हुए है , तीनो प्रतिरोधों पर विभवांतर V का मान समान है तथा R1 , R2 , R3  में प्रवाहित होने वाली धारा क्रमशः I1 , I2 , I3 है और कुल धारा का मान I है।
ओम के नियम से
V =  I1R1 , V =  I2R2 , V =  I3R3
अतः
I1 = V/R1
I2 = V/R2
I3 = V/R3
परिपथ में प्रवाहित कुल धारा का मान
I = I1 +  I+  I3
 I1 , I2 , I3 का मान रखने पर
I = V/R+  V/R+ V/R3
I =V (1/R+  1/R+ 1/R3)
चूँकि I = V / R
I का मान समीकरण में रखने पर
V / R =V (1/R+  1/R+ 1/R3)
अतः
1 / R =1/R+  1/R+ 1/R3
अतः हम कह सकते है की प्रतिरोधों के समानांतर क्रम में तुल्य प्रतिरोध का मानव्युत्क्रम सभी प्रतिरोधों के व्युत्क्रम के योग के बराबर होता है।
निष्कर्ष
1. समांतर संयोजन में सभी प्रतिरोधों के सिरों पर विभवांतर का मान समान होता है।
2. तुल्य प्रतिरोध का व्युत्क्रम सभी प्रतिरोधों के व्युत्क्रम के योग के बराबर होता है।
3. इस प्रकार के संयोजन में जुड़े सबसे कम प्रतिरोध में सबसे अधिक धारा बहती है और सबसे अधिक प्रतिरोध में सबसे कम धारा बहती है।
4. संयोजन का तुल्य प्रतिरोध , परिपथ में उपस्थित सबसे कम प्रतिरोध से भी कम प्राप्त होता है।

अतिचालकता की परिभाषा क्या है , उदाहरण , क्रांतिक ताप , मेसनर प्रभाव , अतिचालक पदार्थ

super conductivity in hindi अति चालकता की परिभाषा क्या है : ऐसे पदार्थ या धातु जिनमे एक निश्चित ताप पर प्रतिरोधकता का मान बहुत तेजी से घटता है और शून्य हो जाता है इन पदार्थो या धातुओं को अतिचालक पदार्थ या धातु कहते है तथा इनके इस गुण को अतिचालकता कहते है। तथा जिस ताप पर अति चालकता की घटना होती है उस ताप को क्रांतिक ताप (critical temperature ) कहते है।

अतिचालकता प्रभाव को सर्वप्रथम पारे में देखा गया , जब पारे को 4.2 K ताप पर ठंडा किया गया तो पारा ने अति चालकता गुण दर्शाया।
अतिचालकता की अवस्था में पदार्थ में चुंबकीय क्षेत्र का मान भी शून्य हो जाता है इस प्रभाव को मेसनर प्रभाव (Messner effect ) कहते है।
यह घटना बहुत कम ताप पर घटित होती है।
उपयोग : इनका उपयोग अधिक चुम्कीय क्षेत्र वाली चुम्बक बनाने में , ट्रांसफॉर्मर एवं सुपर कंप्यूटर बनाने में किया जाता है।
अति चालकता की खोज डच ने April 8, 1911 में की थी , इन्होने सबसे पहले इसके बारे में बताया की जब पदार्थ को क्रांतिक ताप से निचे ताप पर ठंडा किया जाता है तो पदार्थ अति चालकता प्रदर्शित करता है और इस अवस्था में पदार्थ का प्रतिरोध और चुंबकीय क्षेत्र शून्य हो जाते है इस प्रभाव को उन्होंने पदार्थ की अति चालकता नाम दियातथा इन पदार्थो को अति चालक पदार्थ नाम दिया गया।
प्रतिरोध तथा ताप में ग्राफ खींचने पर यह निम्न प्रकार प्राप्त होता है

ग्राफ में देख सकते है की अति चालक पदार्थो में क्रांतिक ताप से कम ताप पर प्रतिरोध का मान शून्य दर्शाया गया है।

प्रतिरोध एवं प्रतिरोधकता पर ताप का प्रभाव effect of temperature on resistance or resistivity

effect of temperature on resistance or resistivity in hindi प्रतिरोध एवं प्रतिरोधकता पर ताप का प्रभाव : पदार्थ की प्रतिरोधकता भिन्न भिन्न ताप पर भिन्न होती है ,हम यहाँ पढ़ने वाले है की चालकों , कुचालको तथा अर्धचालको पर ताप का किस प्रकार प्रभाव रहता है। और इनकी प्रतिरोधकता को ताप कितना प्रभावित करता है।

1. चालकों पर ताप का प्रभाव (for conductors ) :

हम पढ़ चुके है की चालक के लिए प्रतिरोधकता का सूत्र ρ = m/ne2T से दिया जाता है।
यहाँ
m = इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान
n = इलेक्ट्रोनो की संख्या
e = इलेक्ट्रॉन पर आवेश
T = विश्रान्तिकाल
यहां m , n तथा e को नियत माना जा सकता है लेकिन T  विश्रान्तिकाल ताप पर निर्भर करता है।  जैसे जैसे ताप में वृद्धि की जाती है वैसे वैसे चालक के कम्पनों का आयाम व मुक्त इलेक्ट्रॉन की टक्कर की आवृति बढ़ जाती है इसलिए ताप बढ़ाने से T  विश्रान्तिकाल का मान घट जाता है और प्रतिरोधकता का मान बढ़ जाता है।
माना 0 डिग्री सेंटीग्रेट ताप पर तथा t डिग्री सेंटीग्रेट ताप पर पदार्थ की प्रतिरोधकता का मान क्रमशः ρ0 and ρt है। तो इनमे निम्न सम्बन्ध होगा
ρ = ρ(1 + αt )
यहाँ α एक नियतांक है जिसे प्रतिरोधकता ताप गुणांक  तथा इसका मान पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है। धात्विक चालकों के लिए  प्रतिरोधकता ताप गुणांक का मान धनात्मक होता है।

2. कुचालको पर ताप का प्रभाव (for insulators )

विद्युत रोधी या अचालक या कुचालको की प्रतिरोधकता का मान ताप बढ़ाने के साथ चरघातांकी के रूप में कम होती जाती है , तथा ताप कम करने पर प्रतिरोधकता का मान बढ़ने लगता है , तथा परम शून्य ताप पर कुचालको की चालकता का मान शून्य हो जाता है शून्य हो जाता है।
इसे निम्न समीकरण द्वारा व्यक्त किया जाता है
ρ = ρ0eEg/2KT
यहाँ
K = वोल्ट्ज़मान नियतांक है
T = ताप का मान (केल्विन में )
Eg = ऊर्जा अंतराल (चालक तथा संयोजकता बैंड के बीच ऊर्जा अंतराल )

3. अर्द्धचालकों पर ताप का प्रभाव (for semi conductors )

अर्धचालको में सहसंयोजी बंध पाए जाते है , जब ताप बढ़ाया जाता है तो ये सहसंयोजी बंध तेजी से टूटने लगते है , बढ़ टूटने से पदार्थ में इलेक्ट्रॉन तथा होल की संख्या में चरघातांकी रूप से वृद्धि होती है जिससे चालकों में चालकता बढ़ती है , अतः हम कह सकते है की अर्धचालकों में ताप बढ़ाने से प्रतिरोधकता का मान कम होता है।
अर्धचालको में प्रतिरोधकता ताप गुणांक (α) ऋणात्मक होता है।
चालकों कुचालको तथा अर्धचालको में ताप का प्रभाव निम्न प्रकार ग्राफ में दर्शाया जाता है 

कार्बन प्रतिरोध तथा वर्ण कोड क्या है , कैसे लिखते है carbon resistance and colour codes

carbon resistance and colour codes for carbon resistance कार्बन प्रतिरोध तथा वर्ण कोड : विद्युत तथा इलेक्ट्रॉनिकी में उपयोग आने वाले प्रतिरोध कई प्रकार के हो सकते है जैसे तार आबद्ध प्रतिरोधक और कार्बन प्रतिरोध इत्यादि।

तार आबद्ध प्रतिरोधक कम प्रतिरोध वाले होते है इनसे अधिकबड़े प्रतिरोध नहीं बना सकते अधिक मान के  प्रतिरोध बनाने के लिए  कार्बन प्रतिरोध उपयोग में लाये जाते है।
आपने इलेक्ट्रॉनिक परिपथ देखा होगा तो निश्चित रूप से कार्बन प्रतिरोध को भी देखा होगा हम यहाँ फोटो दिखा रहे है यह छोटे से छोटे व बड़े से बड़े परिपथ में देखा जा सकता है
अब आप सोच रहे होंगे की ये अलग अलग रंग के क्यों है , हम आपको बता दे की रंग वर्ण कोड कहलाते है इन रंगो से आप यह पता लगा सकते है की कोनसा प्रतिरोध कितने ओम का है। ]

आइये वर्ण कोड को पढ़ना सीखते है

सिरे से पहली दो धारियां ओम में प्रतिरोध के पहले दो सार्थक अंको को निर्देशित करती है।
तीसरी धारी दशमलव गुणांक को दर्शाती है।
अंतिम धारी प्रतिरोध में प्रतिशत विचरण को दर्शाती है इसे पता चलता है की यह इतने प्रतिशत कम या अधिक हो सकता है।
उदाहरण :

वर्ण कोड सारणी

Colour Digit Multiplier Tolerance
Black 0 1
Brown 1 10 ± 1%
Red 2 100 ± 2%
Orange 3 1,000
Yellow 4 10,000
Green 5 100,000 ± 0.5%
Blue 6 1,000,000 ± 0.25%
Violet 7 10,000,000 ± 0.1%
Grey 8 ± 0.05%
White 9
Gold 0.1 ± 5%
Silver 0.01 ± 10%
None ± 20%

उदाहरण :

निम्न कार्बन प्रतिरोध का प्रतिरोध मान ज्ञात कीजिये
पहला रंग हरा है , हरा = 5
दूसरा रंग लाल है , लाल = 2
तीसरा रंग Gold है , Gold = 0.1
चौथा रंग सिल्वर है , सिल्वर = ± 10%
अतः यह निम्न प्रकार लिखा जायेगा 
2 प्रारम्भ डिजिट x तीसरा रंग गुणक + टॉलरेंस 
52 x 0.1 ± 10%
5.2 ± 10% Ω