वीरशैववाद क्या है ? वीरशैव दर्शन किसे कहते है परिभाषा वीरशैव परंपरा के संस्थापक कौन थे veerashaiva in hindi

By   February 1, 2021

veerashaiva in hindi वीरशैववाद क्या है ? वीरशैव दर्शन किसे कहते है परिभाषा वीरशैव परंपरा के संस्थापक कौन थे ?

वीरशैववाद क्या है? (What is Veerashaivism)
वीरशैववाद एक सामाजिक धार्मिक आंदोलन था जो कि 12वीं शताब्दी के मध्य के आसपास उत्तरी कर्नाटक में उभरा था। वीरशैव (अर्थात बहादुर शैवा) के इस आन्दोलन ने जाति, कर्मकाण्डों व प्रदूषण तथा महिलाओं की स्थिति से जुड़े कुछ पारंपरिक हिन्दू विश्वासो व प्रचलनों को चुनौती दी थी। आन्दोलन ने अपने अनुयायियों के समक्ष एक नयी सामाजिक व्यवस्था की तस्वीर प्रस्तुत की थी जो कि कर्मकाण्डी समानता (पूजा तथा विश्वासों की दृष्टि से), सभी व्यवसाओं की पवित्रता तथा सार्वभौमिक कर्मकाण्डी पवित्रता, अर्थात लिंग, आयु तथा व्यवसाय की दृष्टि से किसी तरह के भेदभाव के बिना सभी अनुयायियों की पवित्रता पर आधारित थी। इस आन्दोलन ने अपने विचारों को जनता तक पहुँचाने के लिए आम जनता द्वारा बोली जाने वाली कन्नड़ भाषा का प्रयोग किया। यह आन्दोलन बसवेश्वर (1105-1167) के नाम के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है, जिन्हें अनेक लोग आन्दोलन का संस्थापक एवं जनक मानते हैं। उनके माध्यम से ही इसको दक्षिण भारत के कन्नड़ भाषी क्षेत्र में लोकप्रिय बनाने में मदद मिली । वीरशैव को एक अन्य लोकप्रिय नाम से जाना जाता है, वह है लिंगायत। लिंगायत के मायने हैं लिंग को लेकर चलने वाले लोग, जो कि शिव का प्रतीक है। वीरशैव अथवा लिंगायतों ने लिंग की अवस्था में केवल शिव की ही पूजा की। वीरशैवों का मानना था कि लिंग की पूजा करने वाले सभी लोग समान हैं तथा अमरत्व तक समान रूप से पहुँचते हैं। लिंगायतों के अनुसार अमरत्व की प्राप्ति कठिन परिश्रम तथा सामाजिक बुराइयों को दूर करने की प्रतिबद्धता के जरिये ही संभव है। इस इकाई के आगामी अनुभागों में हम इस पहलू पर विस्तार से विचार करेंगे।

वीरशैववाद की सामाजिक-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(Socio-Historical Background of Veerashaivism)
पिछले अनुभाग में, हमने संक्षेप में, यह व्याख्या की थी वीरशैववाद क्या है? इस अनुभाग में हम इस सामाजिक आन्दोलन की उत्पत्ति तथा उससे जुड़ी सामाजिक स्थितियों व कारकों की व्याख्या करेंगे। हम उन समान उद्देश्यों की तरफ भी इशारा करेंगे जिनकी पूर्ति वीरशैववाद तथा भक्ति आन्दोलन द्वारा समान ढंग से की गई है।

वीरशैववाद की उत्पत्ति (Origin of Veerashaivism)
वीरशैववाद अपनी उत्पत्ति का दावा प्राचीन काल से ही करता है। यह माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति शैववाद से हुई, जो कि भगवान शंकर की पूजा पर केन्द्रित है। लगभग 12वीं शताब्दी के आसपास तक वीरशैववाद के बारे में अस्पष्ट सी जानकारी मिलती है। जब बसवा उभर कर सामने आया तो अनेक लोगों का यह विश्वास है कि उसी के द्वारा शैववाद तथा अन्य धार्मिक प्रणालियों से पृथक रूप में वीरशैववाद के विचारों व प्रचलनों को प्रतिपादित किया था। उसके काल के बाद से ही वीरशैववाद को लिंगयातवाद के नाम से भी जाना जाने लगा क्योंकि इस विश्वास का सबसे महत्वपूर्ण अवयव इष्टलिंग पर श्रद्धा (शिव की प्रतीकात्मक मूरत को शरीर पर धारण करना) था। 12 वीं शताब्दी के बाद वीरशैववादियों को लिंगायत भी कहा जाने लगा, क्योंकि प्रत्येक वीरशैववादी भगवान शंकर की प्रतिमा लिंग को अपने शरीर पर धारण करते थे।

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कुछ लोगों का दावा है कि वीरशैववाद बसवा के काल से कहीं अधिक प्राचीन है। वे इस बात पर जोर देते हैं कि बसवा ने केवल इस मत का पुनर्सथान भर ही किया था। वे दावा करते हैं कि लिंगायत परंपराएँ परिष्कृत तपस्यिों-एकोरामा, पडिताराध्या, रवाना, मरूला तथा विश्वाराध्या-षरा स्थापित की गई थी जो कि भगवान शंकर के सिर से विखडिंत हुए थे। चूंकि 12वीं शताब्दी के आसपास एक वीरशैववाद के विस्तृत सामाजिक आन्दोलन के तौर पर मौजूद होने के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, अतः हम कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि वीरशैववाद 12वीं शताब्दी के आसपास बसवा के काल में उभरा। 12वीं शताब्दी से, वीरशैववाद तथा लिंगायतवाद, ये दोनों शब्द पर्याय बन गये। असल में हम उन अवस्थाओं व कारकों पर गौर करेंगे जिन्होंने इस आन्दोलन को बृहद रूप से उभार कर सामने लाने में सहायता की।

 मध्यकाल में प्रचलित सामाजिक स्थितियाँ (Social Conditions
Prevailing in Medieval Times
)
मध्यकाल में दक्कन पठार (जिसमें कर्नाटक भी शामिल था) में हिन्दू धर्म सर्वाधिक प्रभुत्वशाली धर्म था। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुभव में हिन्दू धर्म की स्वयं अपनी कुछ पृथक विशेषताएँ थीं। असंख्य देवी-देवताओं की पूजा, जटिल धार्मिक कर्मकाण्ड, मंदिरों व तीर्थ स्थानों का दौरा, तथा जीवन-चक्र कर्मकाण्डों की एक विस्तृत प्रणाली, हिन्दु सामाजिक जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से थे। एक जाति व्यवस्था, जो कि असमान अधिकारों, स्थितियों, कर्तव्यों, सुविधाओं तथा दायित्वों पर आधारित थी, व्यापक रूप से प्रचलित थी। उच्च जातियों का निम्न जातियों पर आधिपत्य था । ब्राह्मण पुजारियों द्वारा निर्मित तांत्रिक-धार्मिक प्रचलनों ने उन समूहों व व्यक्तियों के शोषण को एक व्यवस्था का निर्माण करने में मदद की, जो कि निम्न हैसियत व सम्मान की श्रेणी में दिये गये थे। आमतौर पर ब्राह्मणों की पहुँच भौतिक संपदा तथा आध्यात्मिक ज्ञान दोनों तक प्रायः पूरे तौर पर थी।

ब्राह्मणवादी जाति प्रथा में जाति के भीतर तथा व्यक्ति की कर्मकाण्डी स्थिति अनेक मानकों पर निर्भर करती थी। सबसे प्रमुख मानक, कर्मकाण्डी प्रदूषण के विरुद्ध ‘‘कर्मकाण्डी पवित्रता‘‘ बनाये रखना था। व्यक्तियों की पवित्रता तथा अपवित्रता की हैसियतों को सुस्पष्ट तथा कठोर ढंग से परिभाषित किया गया था। जन्म-मृत्यु जैसे जीवन संकटों को प्रदूषणकारी माना जाता था, अतः उन्हें पवित्र किये जाने की आवश्यकता पड़ती थी। जातियों को पवित्रता के आधार पर श्रेणीबद्ध किया गया था जिनमें दो उच्च जन्मगत जातियों को कर्मकाण्डी तौर पर अन्य जातियों से उच्च हैसियत प्रदान की गई थी तथा उन्हें अनेक बातों से वंचित करके रखा गया था । पुरुषों की तुलना में महिलाओं को भी कर्मकाण्डी तौर पर अपवित्र माना गया था, खासतौर पर रजोधर्म के कारण तथा शिशु के जन्म से पैदा होने वाले प्रदूषण की वजह से। महिलाओं को समाज में अत्यंत निम्न स्थान प्रदान किया गया जिससे वे बहुत सी गतिविधियों में भाग नहीं ले सकती थी, जिन्हें पुरुष करते थे।

व्यवसायों की बंशानुगत विशेषता भी देखी जा सकती थी। कुछ व्यवसायों को कर्मकाण्डी तौर पर अन्य व्यवसायों से उच्च दर्जा दिया गया था। उसी आधार पर अलग-अलग शक्ति, प्रतिष्ठा तथा सम्मान प्रदान किये गये थे । उदाहरण के लिये, पुजारियों तथा राजा के दरबार में मंत्री पद को उच्च प्रतिष्ठा वाला व्यवसाय माना जाता था। दूसरी तरफ नाई एवं भंगी के काम को समाज में अत्यंत निम्न दर्जा प्राप्त था। पवित्रता तथा प्रदूषण की धारणाओं द्वारा सदस्यों के बीच परस्पर अन्योन्यक्रियाएँ भी नियंत्रित की जाती थीं। जातियों के बीच अन्योन्यक्रियाएँ अत्यंत नियंत्रित थीं तथा नियमों का एक स्पष्टतः परिभाषित तानाबाना मौजूद था जो कि जातियों के बीच अन्योन्यक्रिया तथा परस्पर-विवाह पर नियंत्रण रखता था। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि इस काल में सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक असमानताएँ मौजूद थीं। जीवन के अनेक क्षेत्रों में उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों का शोषण व उत्पीड़न किया जाता था।

 वीरशैववाद का उदय (Emergence of Veerashaivism)
केवल जाति-प्रथा से उत्पन्न असमानताओं जैसी सामाजिक अवस्थाओं के अस्तित्व के चलते ही, इस सामाजिक आन्दोलन का विस्तार नहीं हो पाया। अनेक परस्पर संबन्धित कारकों ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक आन्दोलन के रूप में वीरशैववाद के उदय में मदद की। डॉ.सी.एन वेणुगोपाल ने इन कारकों की रूपरेखा इस तरह से पेश की है: प) कार्यकर्ताओं की परोपकारवादी भावना के साथ-साथ उन्हें राजसी संरक्षण देना, पप) देशी भाषा में लिंगायत धार्मिक साहित्य का प्रसार करना, पपप) आन्दोलन द्वारा प्रस्तावित नई जीवन स्थितियों पर निम्न जातियों की उत्साहजनक प्रतिक्रिया।

आइए अब इन कारकों का चरणबद्ध विश्लेषण करें:
प) राजसी संरक्षण (Royal Patronage)
दूसरी शताब्दी से 12वीं शताब्दी तक कर्नाटक में हिन्दू धर्म के अलावा, जैन धर्म भी एक अन्य प्रमुख धार्मिक-राजनीतिक शक्ति था। उत्तरवर्ती हिन्दू राजाओं ने जैन व्यापार, धर्म तथा वस्तुकला को पल्लवित किया। किन्तु 12वीं शताब्दी तक पहुँचते-पहुँचते अन्दरूनी टकराव तथा कर्नाटक के राजनीतिक क्षेत्र से बाहरी आक्रमणों के कारण, इस समय जैनियों को प्राप्त राजसी संरक्षण से वंचित होना पड़ा। इस आन्दोलन के नेताओं द्वारा किये जा रहे जबर्दस्त एवं प्रभावी प्रचार ने राजसी हलकों का ध्यान आकर्षित किया और उन्होंने नेताओं को भौतिक व नैतिक समर्थन देना शुरू कर दिया । बसवेश्वर (जिन्हें आमतौर पर बसवा के नाम से जाना जाता है) बिज्जता रियासत में एक महत्वपूर्ण पद पर थे । राजसी समर्थन के साथ राजनीतिक पद, आन्दोलन की विचारधारा के आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ। विजयनगर के राजा, मैसूर के राजा, कुर्ग के राजश्री परिवार व राजाओं जैसे कर्नाटक के अनेक शासकों ने उभरते हुए आन्दोलन को भौतिक व नैतिक सहायता प्रदान की।

पप) कार्यकर्ताओं की परोपकारी भावना के साथ-साथ नेतृत्व (Leadership combined
with the missionary zeal of the activists)
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, एक शक्तिशाली सामाजिक आन्दोलन के रूप में वीरशैववाद की उत्पत्ति का प्रमुख श्रेय बसवा द्वारा प्रदत्त नेतृत्व को जाता है। उसने अल्लामा प्रभु, केन्नाबसवा, सिद्धाराम जैसे वफादार सेवकों के साथ और आंदोलन को जीवन शक्ति प्रदान की। जबकि दूसरों ने आंदोलन को एक स्वरूप प्रदान किया। इस बिन्दु पर यह जरूरी है कि हम इस बात पर अधिक बारीकी से गौर करें कि बसवेश्वर तथा बसवा ने आन्दोलन के लिए क्या किया था?

बसवा का जन्म 1125 ई. में कर्नाटक के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अपनी छोटी उम्र से ही वह समाज में उच्च जाति के हिन्दुओं द्वारा, शाश्वत माने जाने वाले विश्वासों तथा प्रचलनों के आलोचक थे। उन्होंने अपने कालक्रम से परे आगे की दशा को देखा अपनी छोटी उम्र से ही उन्होंने प्रतिरोध तथा सुधार करने के लिए विचारधारा को सुस्पष्ट करना आरंभ कर दिया था। वह एक समतावादी आधार पर सामाजिक व्यवस्था को पुनर्गठित करना चाहते थे।

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वीरशैववादी आन्दोलन शायद ऐसा लगता है कि उत्तरी कर्नाटक के कल्याण नामक स्थान से शुरू हुआ। बसवा ने ऐलान किया कि भगवान शंकर सर्वोच्च शक्ति हैं तथा उनकी भक्ति करने वाले सभी लोग एक समान हैं, चाहे उनका लिंग, आयु अथवा जाति कोई भी हो। इस आन्दोलन का सदस्य बनने के लिए बसवा ने यह जोर दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर पर एक ‘लिंग‘ धारण करना चाहिए तथा रोजाना उसकी पूजा करनी चाहिये। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि सभी को अपनी जाति, लिंग तथा समुदाय पर आधारित प्रतिष्ठा के भेद का त्याग कर देना चाहिए। बसवा ने उस मत के समर्पण भाव पर भी काफी बल दिया जिसे वे स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ईश्वर की दृष्टि में सभी बराबर हैं तथा जो लोग वीरशैववाद में विश्वास करते है, उन सभी के बीच हर क्षेत्र में मुक्त अन्योन्यक्रिया होनी चाहिये।

इस आन्दोलन को लोकप्रिय बनाने के लिए उठाया गया बसवा का एक सबसे महत्वपूर्ण कदम कल्याण में अनुभव मंतपा (अनुभवों पर चर्चा करने के लिये भवन) की स्थापना करना था, विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमियों से निकलकर आये सदस्य यहाँ मिलते थे तथा अनेक मुद्दों पर विचार करते थे, खासतौर पर वीरशैववाद के विभिन्न पहलुओं पर । चर्चा नेताओं के मार्गदर्शन में होती थी तथा कन्नड़ भाषा में की जाती थी जो कि जनता की स्थानीय भाषा थी। अनुभव मंतप पर हुई इन चर्चाओं से ही वीरशैववाद का आदर्श प्रारूप प्राप्त किया गया।

बसवा की शिक्षाएँ सरल एवं आसानी से समझ में आने वाली थीं। उन्होंने सरल शैली का प्रयोग किया, जो कि वचन के नाम से जानी जाती है, जिसे आसानी से याद किया जा सकता था, जैसा कि अल्लामा प्रभु, चेन्नाबसवा सिद्धराम, तथा अन्य समर्पित अनुयायियों की मदद से किया गया कार्य । बसवा ने नये लोगो को स्वयं आदोलन में शामिल किया । नेताओं ने अनेक लोगों को लिंग की पूजा में शामिल करा दिया। उन्होंने अपने आन्दोलन में खुली भर्ती का पक्ष लिया और उसकी इजाजत दी। नेताओं की अधिकांश ऊर्जा विशेष एवं सुधार की विचारधारा को स्पष्ट करने तथा उसकी रूपरेखा तैयार करने के काम में लगी। उन्होंने भक्ति तथा नीति समर्पण पर जोर दिया तथा इस बात पर बल दिया कि शिव की नजर में सभी लोग बराबर एवं पवित्र हैं। पूजा में समानता, अमरत्व प्राप्त करने में समानता तथा काम में समानता पर जोर दिया गया। इस तरह का बल अत्यंत आकर्षक था, खासतौर से निम्न जातियों के लिये । इस तथ्य के नेताओं ने अपने मत के संदेश का प्रसार कन्नड़ भाषा में किया था, जनता से एक सकारात्मक प्रतिक्रिया को तीव्र बनाने में काफी मदद मिली थी।

पप) देशी भाषा में लिंगायत का प्रसार (The Spread of Vernacular lingayatreligious literature)
इस आन्दोलन के नेताओं ने अपने विचार व विश्वासों को कन्नड़ भाषा में लिखा व बोला। जैनियों ने कन्नड़ भाषा तथा साहित्य के विकास में योगदान किया था । बसवा तथा उनके समकालीन लोगों ने वीरशैववादी साहित्य को सरल गद्य में उपलब्ध करा दिया। यह एक ऐसी भाषा थी, जिसे आम आदमी द्वारा भी आसानी से समझा जा सकता था। इसने आन्दोलन को लोकप्रिय बनाने में काफी मदद की। अनेक लेखक उभर कर सामने आये, जिनमें अनेक महिलाएँ भी शामिल थीं। ऐसी एक प्रसिद्ध लेखिका थी अक्कामहादेव। कन्नड़ भाषा में छंदों की रचना ने आन्दोलन के भीतर स्फूर्ति तथा इसके लिये समर्थन पैदा किया। सरल गद्य पंक्तियाँ, जो कि तीन अथवा चार से अधिक नहीं होती थी आसानी से लोगों को कंठस्थ हो जाती थी। ‘‘सन्य संप्रदाय‘‘ नामक पुस्तक में अनेक वचनों को संकलित किया गया है। वे तब से लेकर आज तक माननीय आचार की मार्गदर्शिका के तौर पर काम कर रहे हैं। लिंगायत चिंतकों तथा संतों, खासकर महिला संतों व चिंतकों को तीज-त्यौहारों के अवसर पर उनकी रचनाओं का पाठ करके श्रद्धांजलि अर्पित करते. है।

पअ) वीरशैववाद को अपनाने में निम्न जातियों का उत्साह (Enthusiasm of the low castes for taking to Veerashaivism)
जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, वीरशैववाद ने अपने दरवाजे सभी के लिए खोल दिये थे। इसमें जाति, वर्ग, आयु अथवा लिंग की कोई बंदिश नहीं थी। आन्दोलन ने उन विश्वासों तथा प्रचलनों के विरुद्ध एक भीषण संघर्ष छेड़ा जो कि आदमी का आदमी से तथा आदमी का औरत से भेद करके चलता था। बसवा तथा उनके अनुयायियों ने इस.बात पर जोर दिया कि शारीरिक एवं मानसिक, दोनों तरह के श्रम बराबर प्रतिष्ठा वाले हैं तथा व्यक्ति को काम के प्रति समर्पित होना चाहिये।

आन्दोलन ने निम्न जातियों के अनेक दृढ़ समर्थकों को आकर्षित किया जो कि व्यवसाय से कुम्हार, नाई अथवा धोबी थे। इस विश्वास को अपनाये जाने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि ये जातियाँ अपना पिछले वाला पेशा छोड़ दें। किसानों, ग्वालों तथा व्यापारियों में से भी लोग इस आन्दोलन में शामिल हुए। जिन सामाजिक समूहों पर यह आन्दोलन टिका हुआ था वे अधिकतर निम्न जातीय सामाजिक हैसियत वाले थे। उदाहरण के रूप में कुछ सक्रिय वीरशैववादी सदस्य थे, जेन्नइया जो कि व्यवसाय से सफाई कामगार थे तथा अपन्ना जो कि व्यवसाय से नाई थे। बसवा के तीन निकट सहयोगी अछूत थे। कार्यकर्ताओं के जी तोड़ प्रयासों तथा नये मत की जनता में अपील ने जो कि नियंत्रण-विहीन अथवा भेदभाव-विहीन जीवन का आश्वासन देता था, कर्नाटक तथा इसके आसपास में फैले जनता के अनेक समूहों के बीच वीरशैववाद को बढ़ावा देने में प्रमुख भूमिका निभाई।

कार्यकलाप 1
अपने घर के नजदीक के किसी हिन्दू मठ का दौरा कीजिये तथा इसकी तुलना वीरशैववाद के मठों के साथ कीजिये। यदि आपके आसपास कोई भी मठ न हो, तो किसी गुरुद्वारे अथवा गिरजाघर अथवा मस्जिद में जाइये और उसकी गतिविधियों की सूची तैयार कीजिये। उनकी तुलना लिंगायत मठों की गतिविधियों से कीजिये । देखिए आपको कौन सी समानताएँ दिखाई पड़ती हैं?

भक्ति आन्दोलन तथा वीरशैववाद (Bhakti Movement and Veerashaivism)
वीरशैवाद की सामाजिक-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर हमारी चर्चा के संदर्भ में भक्ति आन्दोलन के बारे में कुछ पंक्तियों का उल्लेख करना अपरिहार्य है। भक्ति आन्दोलन एक प्रमुख आन्दोलन बन गया था । इसने विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों से आये लोगों को एक तरह का आध्यात्मिक मंच प्रदान किया था। भक्ति आन्दोलन के मुख्य लक्षण थे: प) ईश्वर के प्रति निजी आस्था को पल्लवित करना, पप) कर्मकाण्डों पर बल देना, पपप) कृतिवाद पर जोर देना तथा (पअ) भाईचारे तथा समानता की अनुभूति से काम करना । इकाई में हमने भक्ति आन्दोलन की विस्तृत व्याख्या की थी। इस आन्दोलन ने गाँवों व शहरों में बिखरी हुई हिन्दू जनता तथा मुस्लिम जनता के बीच एक सूक्ष्म सेतु उपलब्ध कराया। भक्ति आन्दोलन ने बौद्धिक, साहित्यिक, धार्मिक तथा अन्य अनेक स्तरों पर प्रतिष्ठिता बनाई व जनता के बीच भी संपर्क स्थापित किया।

वीरशैववाद की भी कुछ इससे मिलती जुलती विशेषताएँ रही हैं। इसने एक ही ईश्वर, अर्थात शिव की भक्ति पर जोर दिया। यह भी कर्मकाण्डों को दोहराता है। नेतागण तथा अनुयायी दोनों ही ईश्वर के साथ एक समान रिश्ते में एक दूसरे से बँधे हुए थे। भगवान शंकर के भक्तों की सामाजिक पृष्ठभूमि भी भिन्नतापूर्ण थी। इसमें स्त्री-पुरुष, शासक, मंत्री, व्यापारी समूह, नाई, कुम्हार, सफाईकर्मी इत्यादि सभी शामिल थे। श्रम की महत्ता तथा समानता पर बल देते हुए, ऐसे समाज में महत्वपूर्ण बदलाव लाने का सभी से वायदा किया गया जो कि असमानता एवं शोषण पर आधारित था।

अब हम अगले अनुभाग में वीरशैववाद के अनिवार्य लक्षणों, और विशेषताओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे।

बोध प्रश्न 1
1) वीरशैववाद 12वीं शताब्दी में कौन से राज्य में उभरा
क) तमिलनाडू
ख) पश्चिम बंगाल
ग) कर्नाटक
घ) असम
2) वीरशैववाद को आमतौर पर किस अन्य नाम से भी पुकारा जाता है,
क) लिंगायत
ख) नयनार
ग) वैष्णव
घ) अलवर
3) वीरशैववाद की एक सामाजिक आन्दोलन के रूप में उत्पत्ति निम्नलिखित व्यक्ति के नाम के साथ जुड़ी हुई है
क) नायक
ख) मीरा
ग) शूद्र
घ) बसवा
4) वे चार कारक कौन से हैं, जिन्होंने आन्दोलन के उदय में मदद की थी? लगभग 8 पंक्तियों में अपना उत्तर दीजिए।

बोध प्रश्न 1
1) ग
2) क
3) घ
4) आंदोलन की उत्पत्ति में योगदान देने वाले कारक को, राजसी संरक्षण, करिश्माई एवं प्रतिबद्ध नेतागण, कन्नड़ धार्मिक साहित्य का प्रसार तक निम्न जातियों से उत्साहपूर्ण समर्थन।