योजित मूल्य किसे कहते है | योजित मूल्य की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब बताइए value added in hindi

By   January 27, 2021

value added in hindi योजित मूल्य किसे कहते है | योजित मूल्य की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब बताइए ?

शब्दावली
आयात प्रतिस्थापन्न ः आयात की जाने वाली वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा में आयात का देश में ही उत्पादन करके प्रतिस्थापन्न करना।
ऋण योग्य निधियाँ ः उधार और निवेश के लिए निधियों की पूर्ति
पूर्ण उपादान उत्पादकता ः उत्पादन के आर्थिक सिद्धान्त से पता चलता है कि योजित मूल्य की वृद्धि-दर और कुल आदान फलन की वृद्धि-दर के बीच मुख्य रूप से अंतर है।
योजित मूल्य ः उपयोग किए गए कच्चे माल और अन्य एकल उपयोग आदानों में से उत्पादन का लागत निकाल देने से जो बचता है।

विगत् बीस वर्षों में औद्योगिक वृद्धि

1980 के दशक के आरम्भ से एक बार पुनः वृद्धि-दर में बढ़ोतरी हुई और उस पूरे दशक में कुछ हद तक उद्योगों का पुनरुद्धार हुआ। 1990 के दशक के आरम्भ में, सुधार कार्यक्रमों और व्यापार उदारीकरण के माध्यम से काफी हद तक औद्योगिक वृद्धि संबंधी नीतिगत बाधाएँ हटा दी गई। इसने वृद्धि-दर को अत्यधिक तेज कर दिया यद्यपि ऐसा अत्यन्त ही सीमित अवधि 1992-96 के लिए ही हुआ। इस भाग में पुनरुद्धार की अवधि (1981-90) और सुधार-पश्चात् अवधि के दौरान वृद्धि के स्वरूप का विश्लेषण किया गया है।
10.4.1 1980 के दशक के दौरान औद्योगिक पुनरुद्धार

1980 के दशक के पूर्वार्द्ध अर्थात् छठी योजना अवधि के दौरान औद्योगिक वृद्धि प्रतिवर्ष 6.4 प्रतिशत थी और दशक के उत्तरार्द्ध के दौरान बढ़ कर 8.5 प्रतिशत हो गया। यह मंदन के चरण से पहले अंतिम पाँच वर्षों के दौरान की उपलब्धि के लगभग बराबर था। यहाँ से देश में नई औद्योगिक युग का सूत्रपात होता है।

विनिर्माण क्षेत्र और उसके सभी ‘‘उपयोग आधारित क्षेत्रों‘‘ (न्ेम इंेमक ेमबजवते) में योजित मूल्य में तीव्र गति से वृद्धि के पूर्वार्द्ध में, विनिर्माण में योजित मूल्य में वृद्धि 7.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से हुई थी जबकि 1966-67 से 1979-80 की अवधि में मात्र 4.7 प्रतिशत से 5 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक वृद्धि हुई थी। वर्ष 1981-1985 के दौरान बुनियादी वस्तुओं में वृद्धि 8.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष हुई थी जबकि पूँजीगत वस्तु और मध्यवर्ती वस्तु दोनों क्षेत्रों में वृद्धि प्रतिवर्ष लगभग 6 प्रतिशत रही थी। 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में, बुनियादी वस्तुओं जिनकी वृद्धि-दर में मामूली गिरावट दर्ज की गई को छोड़कर अन्य सभी क्षेत्रों के वृद्धि-दर में तीव्रता आई।

औद्योगिक पुनरुद्धार का मुख्य कारण घरेलू औद्योगिक नीति की पुनःसंरचना, प्रक्रियाओं का सरलीकरण, बेहतर प्रौद्योगिकी की सुगमतापूर्वक उपलब्धता, मध्यवर्ती वस्तुओं का आसानी से आयात और अधिष्ठापित क्षमता के उपयोग में अधिक नम्यता था। परिणामस्वरूप कारकों की उत्पादकता में भारी वृद्धि हुई । वस्तुतः जैसा कि अहलूवालिया द्वारा भी नोट किया गया, 1980 के दशक के दौरान पुनरुज्जीवित वृद्धि-दरों का महत्त्वपूर्ण पहलू यह नहीं था कि यह आदानों के वृद्धि के त्वरण से सम्बद्धित था अपितु यह बेहतर उत्पादकता और कार्यनिष्पादन पर आधारित था। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि कुल उपादान उत्पादकता में 1966-67 से 1979-80 के दौरान प्रतिवर्ष -0.2 से -0.3 की नकारात्मक वृद्धि-दर रही थी में 1981-85 के दौरान काफी सुधार हुआ और वृद्धि-दर बढ़ कर प्रतिवर्ष 3.4 प्रतिशत हो गई।

आधारभूत संरचना के सार्वजनिक निवेश में फिर से वृद्धि हुई। 1979-80 से 1984-85 के दौरान इसमें प्रतिवर्ष 9.7 प्रतिशत वृद्धि हुई थी, 1985-86 में यह वृद्धि 16 प्रतिशत थी जबकि 1965-66 से 1975-76 के दौरान इसमें प्रतिवर्ष मात्र 4.2 प्रतिशत प्रतिवर्ष वृद्धि दर्ज हुई थी। सार्वजनिक कार्यों पर भी सरकारी व्यय में भारी वृद्धि हुई थी जिससे टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के माँग में वृद्धि हुई। इसके परिणामस्वरूप 1981-85 के दौरान टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं में प्रतिवर्ष 14.3 प्रतिशत और 1985-90 के दौरान प्रतिवर्ष 11.6 प्रतिशत वृद्धि देखी गई थी।

 सुधार पश्चात् अवधि (1991-200) में वृद्धि

1990 के दशक के आरम्भ में, भारतीय अर्थव्यवस्था की पुनःसंरचना के उद्देश्य से सुधार कार्यक्रमों के समपूरक भाग के रूप में औद्योगिक क्षेत्र में कुछ महत्त्वपूर्ण नीति परिवर्तन शुरू किए गए। इसमें प्रवेश बाधाओं, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के विनिवेश और निजीकरण, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति का उदारीकरण, पूँजी और मध्यवर्ती वस्तुओं के संबंध में आयात नीति का उदारीकरण सम्मिलित है।

सुधारों के पहले दो वर्षों, 1991-92 और 1992-93 में वृद्धि-दर अत्यन्त ही कम थी। किंतु अगले तीन वर्षों में वृद्धि-दर में काफी वृद्धि हुई। उद्योग में, कुल मिलाकर, 1994-95 और 1995-96 में क्रमशः 8.4 और 12.7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि-दर रिकार्ड की गई थी (तालिका 10.5)। विनिर्माण क्षेत्र में भी वृद्धि की दर इतनी ही थी जबकि विद्युत क्षेत्र में इस अवधि के दौरान प्रतिवर्ष 8 प्रतिशत के लगभग वृद्धि-दर देखी गई। बुनियादी और मध्यवर्ती वस्तु क्षेत्रों में मिलाजुला रुख रहा जबकि पूँजीगत वस्तु और उपभोक्ता वस्तु क्षेत्रों में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। बुनियादी वस्तुओं में, सीमेण्ट उद्योग की वृद्धि अत्यन्त ही आकर्षक थी। विशेषकर तब जबकि इसकी वृद्धि-दर 1991-92 में 9.8 प्रतिशत से गिरकर 1992-93 में 1 प्रतिशत रह गई थी।

तथापि, नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में वृद्धि-दर में अपेक्षाकृत उतार-चढ़ाव रहा । समुच्चय और क्षेत्रगत स्तरों दोनों पर, पहली बार 1996-97 और उसके बाद फिर 1998-99 के दौरान माँग के अभाव के कारण वृद्धि-दरों में मंदी आ गई। इन वर्षों में खनन और पत्थर तोड़ने के क्षेत्र में इन दोनों वर्षों में नकारात्मक वृद्धि-दर दर्ज की गई। दूसरी ओर, विनिर्माण क्षेत्र में, निर्गत वृद्धि में स्पष्ट अधोमुखी प्रवृत्ति तब तक थी जब तक कि 1999-2000 में इसमें स्वयं वृद्धि होना शुरू नहीं हो गया। तथापि, इसकी वृद्धि-दर अभी भी 1995-96 के चरम स्तर से काफी कम रही है।

उपयोगिता आधारित वर्गीकरण में, बुनियादी और मध्यवर्ती वस्तुओं की वृद्धि-दर में 1995-96 में क्रमशः 8.3 प्रतिशत और 10.9 प्रतिशत से सतत् गिरावट आई, जो 1998-99 में क्रमशः 1.6 प्रतिशत और 6 प्रतिशत रह गई। उपभोक्ता वस्तु और पूँजीगत वस्तु क्षेत्रों में वृद्धि-दर अपेक्षाकृत घटती-बढ़ती रही। यहाँ यह नोट करना उल्लेखनीय होगा कि पूँजीगत वस्तु क्षेत्र में 10.2 प्रतिशत वृद्धि-दर दर्ज की गई जो उद्योग की औसत वृद्धि-दर 4.5 प्रतिशत से काफी अधिक था।

औद्योगिक वृद्धि में मंदी का कारण कुल माँग की वृद्धि में कमी और विश्व व्यापार में समग्र मंदी के कारण गिरती हुई निर्यात वृद्धि थी। पूर्वी एशियाई देशों में भारी अवमूल्यन के कारण भारतीय निर्यात का कम प्रतिस्पर्धी रह जाना भी इसका एक मुख्य कारण था। पूर्ति पक्ष में, 1990 के दशक के मध्य में क्षमता में वृद्धि और माल के भण्डार में वृद्धि के कारण कारपोरेट क्षेत्र द्वारा कम निवेश और पूँजी बाजार, प्राथमिक और द्वितीयक दोनों, में सतत् निष्क्रियता के कारण निधियों का प्रवाह बंद हो जाना था।

बोध प्रश्न 3
1) 1980 के दशक में औद्योगिक पुनरुद्धार के कारण बताइए। (एक वाक्य में उत्तर दें)।
2) क्या आप इस विचार से सहमत हैं कि 1990 के दशक के आरम्भ में आर्थिक सुधारों – के कारण औद्योगिक वृद्धि में अस्थायी तेजी आई?
3) सही उत्तर पर ( ) निशान लगाइए:
क) सातवीं योजना अवधि के दौरान औद्योगिक वृद्धि थी।
प) 6.4 प्रतिशत प्रतिवर्ष
पप) 7.4 प्रतिशत प्रतिवर्ष
पपप) 6 प्रतिशत प्रतिवर्ष
पअ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
ख) 1996-97 के पश्चात् औद्योगिक वृद्धि में मंदी का कारण कहा जा सकता है:
प) आदान की कम उत्पादकता
पप) समुच्चय माँग की वृद्धि में मंदी
पपप) सार्वजनिक निवेश में ह्रास
पअ) उपर्युक्त सभी।

 बोध प्रश्नों के उत्तर अथवा संकेत

बोध प्रश्न 3
1) उपभाग 10.4.1 पढ़िए।
2) हाँ। उपभाग 10.4.2 पढ़िए।
3) (क) (प) (ख) (पप)

सारांश
भारत में, पहली तीन पंचवर्षीय योजना अवधियाँ (1951-65) औद्योगिक वृद्धि के लिए तेजी वाले वर्ष थे। तथापि, आकर्षक वृद्धि-दरों के बावजूद, पहली पंचवर्षीय योजना को छोड़ कर, वास्तव में प्राप्त वृद्धि-दर कभी भी लक्षित वृद्धि-दर को नहीं छू सका। वास्तव में यह नियोजन के पूरे पचास वर्षों में औद्योगिकरण की विशेषता रही है।

उस अवधि के दौरान औद्योगिक संरचना पर्याप्त रूप से विविधिकृत थी। दूसरी योजना अवधि से, उपभोक्ता वस्तुओं के आयात में तेजी से गिरावट आई। दूसरी ओर, रसायनों के उत्पादन में भारी वृद्धि और नए रासायनिक उत्पादों के पेश किए जाने से रसायन उद्योग का तेज गति से विकास हुआ। धातु आधारित और परिवहन उपकरण उद्योगों का भी तेजी से विकास हुआ।

1960 के दशक के मध्य से, भारतीय उद्योगों में समग्र और क्षेत्रगत दोनों में वृद्धि-दर में भारी कमी आई। उद्योग में संरचनात्मक ह्रास हुआ। जहाँ भारी उद्योग जैसे मशीनों, परिवहन उपकरण और बुनियादी धातुओं में भारी मंदी आई, वहीं हल्के उद्योग जैसे खाद्य विनिर्माण और वस्त्र कभी भी गतिं नहीं पकड़ सके। इस प्रकार मंदन और धीमी वृद्धि दोनों विद्यमान थी। किंतु वस्त्र और खाद्य विनिर्माण ने इस अवधि में न तो कभी गति पकड़ी और न ही इसमें मंदी आई।

कृषि आय में गिरावट, आधारभूत संरचना में सार्वजनिक निवेश की कमी और संरक्षणात्मक व्यापार के कारण प्रतिस्पर्धा की कमी और औद्योगिक लाइसेन्सिंग नीति, बताए गए अनेक अनुमानों में से सर्वाधिक युक्तिसंगत और अनुभव सिद्ध स्पष्टीकरण प्रतीत होते हैं।

1980 के दशक के आरम्भ से, एक बार पुनः वृद्धि-दरों में बढ़ोत्तरी शुरू हुई और कुछ हद तक पूरे दशक में उद्योग का पुनरुद्धार हुआ। 1990 के दशक के आरम्भ में, सुधार कार्यक्रमों और व्यापार उदारीकरण द्वारा बहुत हद तक औद्योगिक वृद्धि में नीतिगत अड़चनों को हटा दिया गया था। इससे वृद्धि-दरों में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई, अलबत्ता ऐसा अत्यन्त ही कम अवधि अर्थात् 1992-96 के दौरान ही हुआ। तथापि, 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध में, वृद्धि-दरों में अपेक्षाकृत उतार-चढ़ाव होता रहा था। समुच्चय और क्षेत्रगत स्तरों दोनों पर, पहली बार 1996-97 के दौरान और एक बार फिर 1998-99 के दौरान वृद्धि-दरों में गिरावट आई थी।

कुछ उपयोगी पुस्तकें एवं संदर्भ
अहलूवालिया, आई.जे. (1985). इण्डस्ट्रियल. ग्रोथ इन इंडिया: स्टैगनेशन सिन्स मिड सिक्सटीज, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली।
कपिला, उमा, (2000). अण्डरस्टैन्डिंग दि प्रॉब्लम्स ऑफ इंडियन इकानॉमी, एकेडेमिक फाउन्डेशन, गाजियाबाद।
नैय्यर, डी., (1994). इण्डस्ट्रियल ग्रोथ एण्ड स्टैगनेशन: दि डिबेट इन इंडिया, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस: मुम्बई।