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industrial recession in india 1966 और 1979 के दौरान मंदन या मंदी | recession between 1966 to 1979 in hindi ?

1966 और 1979 के दौरान मंदन
1960 के दशक के मध्य से, समग्र और क्षेत्रगत दोनों दृष्टियों से भारतीय उद्योगों में वृद्धि-दर काफी धीमी हो गई। जहाँ, भारी उद्योग जैसे मशीनें, परिवहन उपकरण और बुनियादी धातु, में गति काफी धीमी हो गई, वहीं हल्के उद्योग जैसे खाद्य विनिर्माण और वस्त्र कभी भी गति नहीं पकड़ सके। इस प्रकार, मंदता और धीमी वृद्धि दोनों बातें एक साथ मौजूद थीं।

1960 के दशक के मध्य में, दो बार भारी सूखा पड़ा था जिसका सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा इसके साथ-साथ विदेशी सहायता में भी भारी गिरावट आई। पाकिस्तान के साथ लड़ाई छिड़ने के साथ, बजट की भी कमी हो गई थी। इन सबने विकास प्रक्रिया को मंद कर दिया।

इस भाग में हम औद्योगिक गत्यावरोध के स्वरूप और इसके संभावित कारणों पर चर्चा करेंगे।

 1960 के दशक के मध्य के पश्चात् औद्योगिक गत्यावरोध
1965-76 की अवधि के दौरान औद्योगिक वृद्धि-दर में तीव्र गिरावट आई और यह तीसरी योजना (1961-65) के दौरान प्रतिवर्ष 9 प्रतिशत की तुलना में प्रतिवर्ष मात्र 4.1 प्रतिशत रह गई। इस अवधि के दौरान वार्षिक वृद्धि-दर, यदि 1976-77 जिसमें वृद्धि-दर में 10.6 प्रतिशत की तीव्र वृद्धि हुई थी, को छोड़ दें तो, यह और घटकर 3.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष रह गई थी।

तालिका 10.4 में प्रभावित उद्योगों में मंदता प्रक्रिया के विस्तार को दर्शाया गया है। कागज और
तालिका 10.4
औद्योगिक मंदता: शुद्ध योजित मूल्य
कूट
(Code) उद्योग समूह शुद्ध योजित मूल्य
1956-57 से
1965-66 1966-67 से
1979-80 1959-67 से
1981-82
1 खनन् और पत्थर तोड़ना 7.3 3.0 3.3
5 विद्युत और गैस 9.6 8.9 8.7
2 विनिर्माण (योग) 6.9 5.5 5.3
25 काष्ठ और कॉर्क 10.4 5.4 3.8
26 फर्नीचर और फिक्सचत्र 8.9 6.3 5.2
27 कागज और कागज उत्पाद 12.3 7.2 6.2
28 मुद्रण और प्रकाशन 7.0 1.7 1.8
30 रबर उत्पाद 7.9 4.2 4.1
31 रसायन और रसायन उत्पाद 12.6 9.1 7.9
33 अधात्विक खनिज उत्पाद 8.7 3.0 3.0
34 बुनियादी धातु 15.5 5.1 5.0
35 धातु उत्पाद 12.0 2.5 2.6
36 गैर विद्युत मशीनें 15.9 7.5 7.0
37 विद्युत मशीनें 13.1 9.8 9.4
38 परिवहन उपकरण 7.2 4.6 4.6
उद्योग 7.1 5.5 5.4
स्रोत: आई.जे. अहलूवालिया, 1985

कागज उत्पादों, रबर उत्पादों, गैर-धातु खनिज उत्पादों, मूल धातुओं और धातु, उत्पादों में कार्य निष्पादन सबसे खराब रहा।

विनिर्माण क्षेत्र के अंतर्गत, वस्त्र और खाद्य विनिर्माण में मंदन की स्थिति नहीं देखी गई। इन उद्योगों ने न तो आरंभिक अवधि में तीव्र विकास किया था और न ही 1960 के दशक की अवधि के बाद उन्होंने मंदी देखी। वस्त्र में वृद्धि-दर जो विनिर्माण में कुल योजित मूल्य का 20 प्रतिशत थी, वास्तव में 1956-65 के दौरान 2.3 प्रतिशत प्रतिवर्ष से 1966-79 के दौरान 4.4 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक साधारण वृद्धि दर्ज की गई थी। तथापि, यह दर उस अवधि के लिए औद्योगिक क्षेत्र की औसत वृद्धि से काफी कम थी। खाद्य विनिर्माण उद्योग में हर वर्ष घट-बढ़ होती रही। किंतु कुल मिलाकर इसमें काफी धीमी वृद्धि देखी गई।

दूसरी ओर खनन् और पत्थर तोड़ने तथा विद्युत का एक दूसरे से और विनिर्माण क्षेत्र से बिल्कुल भिन्न व्यवहार रहा। खनन् जिसका उद्योग में योजित मूल्य में 9 प्रतिशत के लगभग हिस्सा था, में 1956-65 के दौरान प्रति वर्ष 7.3 प्रतिशत की वृद्धि-दर में तीव्र गिरावट आई और बाद की अवधि के दौरान 3 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक घट गया। विद्युत और गैस जिसका योजित मूल्य में खनन् और पत्थर तोड़ने के बराबर ही हिस्सा था, में औसत वार्षिक वृद्धि-दर में अत्यंत अल्प गिरावट दिखाई पड़ी।

इस समय उद्योग में संरचनात्मक ह्रास भी व्याप्त था जिसने उद्योग को प्रभावित किया। इस अवधि के दौरान पूँजीगत वस्तु उद्योगों में मात्र 2.6 प्रतिशत की वार्षिक दर से वृद्धि हुई जबकि दूसरी और तीसरी योजना अवधियों में क्रमशः 13.1 प्रतिशत और 19.6 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि हुई थी। बुनियादी उद्योगों की स्थिति भी ऐसी ही है। वस्तुतः, दीर्घकालीन औद्योगिक विकास के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अधिकांश उद्योगों की भी यही कहानी रही है। बुनियादी वस्तुओं में, खनन् और मूल धातुओं ने अपनी वृद्धि-दर में तीव्र गिरावट दर्शाई। वहीं दूसरी ओर सीमेण्ट की वृद्धि-दर भी घटती-बढ़ती रही।

टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ ही एकमात्र श्रेणी थी जिसमें यद्यपि तीव्र वृद्धि हुई थी, इसके फर्नीचर और फिक्सचस्र सेक्टर (तालिका-10.4) को छोड़कर मंदी नहीं देखी गई। इसके साथ ही गैर टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ जैसे वस्त्र बुनाई और खाद्य विनिर्माण अपनी धीमी-वृद्धि-दर पर बढ़ते रहे जबकि इसमें अत्यधिक तेजी अथवा मंदी नहीं देखी गई।

औद्योगिक गत्यावरोध के कारण

औद्योगिक वृद्धि में मंदी की विवेचना के लिए अनेक अनुमान लगाए गए हैं। माँग पक्ष अनुमान के अनुसार कृषि द्वारा इसके विभिन्न अग्रानुबंधों के माध्यम से उद्योग को जबर्दस्ती चलाते रहना, आय वितरण का और बदतर हो जाना, आयात प्रतिस्थापन्न और सार्वजनिक निवेश का धीमा पड़ना है। दूसरी ओर, आपूर्ति पक्ष अनुमान के अनुसार अर्थव्यवस्था के अंदर और बाहर दोनों ओर से प्रतिस्पर्धा का कम हो जाना है।

कृषि औद्योगिक वृद्धि को मुख्यतः तीन प्रकार से प्रभावित करती है: (प) उपभोक्ता वस्तुओं जैसे खाद्य के आपूर्तिकर्ता के रूप में; (पप) कृषि-आधारित उद्योगों के लिए कच्चेमालों के संभरक के रूप में; और (पपप) कृषि आय के सृजनकर्ता के रूप में जो औद्योगिक वस्तुओं के लिए माँग पैदा करती है। यह अनुमान कि 1960 के दशक के दौरान उपभोक्ता-वस्तु बाधाओं के अंतर्गत उद्योग में कार्य किया, एक युक्तियुक्त स्पष्टीकरण नहीं है क्योंकि इसका तात्पर्य श्रम-गहन हल्के उद्योगों में मंदी आना होगा। किंतु इसके बदले, भारी उद्योगों में मंदता देखी गई। औद्योगिक वृद्धि संबंधी कृषि सामग्री बाध्यताएँ सिर्फ कृषि आधारित उद्योगों से संबंधित हैं जिसमें निर्गत मूल्य की दृष्टि से प्रतिवर्ष 5 से 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यद्यपि कि वाणिज्यिक फसलों के निर्गत वृद्धि में महत्त्वपूर्ण रूप से मंदी आई थी, यह कृषि आधारित उद्योगों की वृद्धि में मंदी से संबद्ध नहीं था। तीसरा अनुबंध स्वीकार्य स्पष्टीकरण हो सकता है हालाँकि यह ध्यान रखना होगा कि कृषि आय में धीमी वृद्धि के बावजूद भी जिस वृद्धि-दर को प्राप्त किया जा सकता था औद्योगिक वृद्धि-दर उससे भी कम रहा।

आय वितरण के अनुचित होने के प्रतिकूल प्रभाव का अनुमान (I) माँग के स्वरूप, (II) माँग के स्तर पर इसके प्रभाव पर आधारित है। तथापि, इशर अहलूवालिया (1985) ने यह तर्क दिया कि ऐसे बहुत कम प्रमाण हैं जिनसे या तो ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में उपभोग अथवा आय में असमानता में वृद्धि अथवा समय बीतने के साथ ग्रामीण निर्धनता में वृद्धि का पता चलता है। इतना ही नहीं, यदि यह कारण था तो उपभोक्ता वस्तुओं में वृद्धि सबसे ज्यादा प्रभावित होती जबकि वस्तुस्थिति ऐसी नहीं थी।

सार्वजनिक निवेश औद्योगिक वृद्धि को दो तरह से प्रभावित करता है। यह पूँजीगत वस्तुओं के लिए माँग पैदा करता है और आधारभूत संरचना बाधाओं को दूर करता है जिससे चतुर्दिक औद्योगिक क्षेत्र की वृद्धि को बढ़ावा मिलता है। तथापि, इसका ह्रासकारी प्रभाव है जिसके द्वारा सार्वजनिक निवेश में वृद्धि औद्योगिक वृद्धि को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है क्योंकि इसका अर्थ निजी निवेश के लिए ऋण योग्य निधियों का कम उपलब्ध होना है। निःसंदेह, सार्वजनिक निवेश में गिरावट आई और ऐसे निवेश पर आधारित उद्योगों की वृद्धि पर इसका अत्यधिक प्रभाव पड़ा था। तथापि, इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि सार्वजनिक निवेश में समग्र वृद्धि नहीं हुई थी। अपितु आधारभूत संरचना में अधिक निवेश हुआ था। इसने निश्चित तौर पर 1960 के दशक के मध्य के बाद औद्योगिक वृद्धि को रोके रखा।

अर्थशास्त्रियों में औद्योगिक वृद्धि में नीतिगत बाधाओं के संबंध में बहुत हद तक आम सहमति है। औद्योगिक लाइसेन्सिंग नीति और व्यापार नीति दोनों ही तीव्रतर वृद्धि के लिए अनुकूल नहीं थे। आयात प्रतिस्थापन्न को कुशलता पूर्वक आगे बढ़ाने में और वह भी लम्बे समय तक, भारतीय नीतियाँ असफल रहीं। बहुधा, देशी क्षमता की स्थापना को ही आयात प्रतिस्थापन के लिए पर्याप्त आधार माना जाता था और लागत तथा गुणवत्ता पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। इसके परिणामस्वरूप संरक्षण की आड़ में उच्च-लागत औद्योगिक संरचना का विकास हुआ। औद्योगिक नीति के विभिन्न तत्वों का समग्र प्रभाव यह हुआ कि इसने उत्पादकता में वृद्धि अथवा घटकों के उपयोग में कुशलता को बाधित किया। अधिकांश उद्योग समूहों में ‘‘पूर्ण उपादान उत्पादकता‘‘ का योगदान नगण्य था अथवा यहाँ तक कि नकारात्मक था।

बोध प्रश्न 2
1) क्या आप समझते हैं कि 1960 के दशक के मध्य के पश्चात् औद्योगिक वृद्धि में मंदी आई?
2) औद्योगिक गत्यावरोध के विभिन्न संभव कारणों की पहचान कीजिए।
3) सही उत्तर पर ( ) निशान लगाइए:
क) विनिर्माण क्षेत्र जिसकी वृद्धि-दरों में मंदन नहीं देखी गया वे थे,
प) खाद्य और वस्त्र
पप) रबर उत्पाद और कागज उत्पाद
पपप) काष्ठ और कॉर्क
पअ) बुनियादी धातु और धातु उत्पाद
ख) कृषि औद्योगिक वृद्धि को इस रूप में प्रभावित करता है,
प) उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्तिकर्ता के रूप में,
पप) कृषि आधारित उद्योगों को आदान का आपूर्तिकर्ता;
पपप) आय का सृजनकर्ता जो औद्योगिक वस्तुओं के लिए माँग पैदा करता है
पअ) उपर्युक्त सभी।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) हाँ। उपभाग 10.3.1 पढ़िए।
2) उपभाग 10.3.2 पढ़िए। तीन सर्वाधिक युक्तिसंगत स्पष्टीकरण हैं: कृषि आयत में गिरावट; आधारभूत संरचना में सार्वजनिक निवेश में ह्रास; औद्योगिक लाइसेन्सिंग नीति और व्यापार नीति जो प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र को कम करते हैं।
3) (क) (प) (ख) (पप)