अनेकता में एकता क्या है | अनेकता में एकता की परिभाषा अर्थ किसे कहते है मतलब (Unity in Diversity in hindi)

By   December 19, 2020

(Unity in Diversity in hindi) meaning definition अनेकता में एकता क्या है | अनेकता में एकता की परिभाषा अर्थ किसे कहते है मतलब भाषण शायरी का नारा किसने दिया था ?

अनेकता में एकता (Unity in Diversity)
हमारे जैसे अनेकवादी समाज में अनेकता में एकता की भावनात्मक स्तर पर प्राप्ति हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक नीति और दार्शनिक विश्व दर्शन है। हमारे धार्मिक पर्व भी तदनुरूप सामाजिक सांस्कृतिक सांचे में स्थित होते हैं।

सांस्कृतिक लक्षणों की तरह धार्मिक पर्र्वोें में भी प्रसार की प्रवृत्ति होती है। यह फैलाव और क्षैतिज दोनों प्रकार से होता है। उदाहरण के लिए , शक्त पंथ दोनों प्रकार से फैला है। क्षैतिज फैलाव की प्रक्रिया में परिणामजनक संशोधन का प्रसार, आत्मसातीकरण और एकीकरण जैसी क्रियाओं की भूमिका होती है। परिणामस्वरूप, धार्मिक पर्व के क्षेत्रीय स्वरूपों का विकास होता है। आइए इसे समझें देवी की अवधारणा का जन्म, दर्शन के स्तर पर कल्पित एक सर्वव्यापी दैवीय नारी शक्ति से होता है। लेकिन वह कई रूपों में व्यक्त होती है। जैसे, वैष्णो देवी, शंकुवरी, कामाख्या, दुर्गा, काली, शीतला आदि। ये सभी क्षेत्रीय स्तरों पर स्थापित हैं लेकिन इन सभी को एक ही शक्ति या सत्ता का रूप माना जाता है।

शक्ति पंथ की अनेकता में एकता एक और स्तर पर व्यक्त होती है। जो हैं, क्षेत्र और आवास का स्तर । मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में सांझी का पर्व पितृपक्ष के दौरान मनाया जाता है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पितृपक्ष के बाद में और मथुरा में यह सावन के महीने में मनाया जाता है। मालवा में सांझी एक दैवीय कुंवारी कन्या का प्रतीक है जहाँ हर साल वह अपने ससुराल के लिए विदा होती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, यह देवी का प्रतीक है, और बृज में राधा-कृष्ण का प्रतीक ।

बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश) में यह मामुलिया की प्रतीक है, और महाराष्ट्र में यह गुलाबी के रूप में पूजी जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में यह झींझिया के रूप में होती है और बंगाल में शक्तिशाली दुर्गा के रूप में। तमिलनाडू में यह गुड़ियों का पर्व बन जाता है। गुजरात में इसे जोरदार गरबा पर्व के रूप में धूमधाम के साथ मनाया जाता है और शक्ति पंथ के इन सभी क्षेत्रीय रूपों में युवा अविवाहित लड़कियों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

सारांश
इस इकाई में हमने पढ़ा कि धार्मिक पर्व क्या होता है। हमने धार्मिक पर्व के सामाजिक महत्व का भी विश्लेषण किया। इस संदर्भ में, हमने साझी, करवा चैथ, और रविदास जयंती जैसे कुछ धार्मिक पर्र्वोें की भी चर्चा की। फिर हमने धार्मिक पर्र्वोें के सामाजिक महत्व पर विचार किया। इसमें हमने संस्कृति, प्रकृति और समाज के बीच के तालमेल पर प्रकाश डाला। इसके बाद हमने व्यक्ति की भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा के बारे में चर्चा की। इसके अलावा, हमने अस्मिता, एकात्मता, विभेदन और संघर्ष के बाद स्तरीकरण के मुद्दों पर विचार किया। इस इकाई में हमने धार्मिक पर्र्वोें के उत्सव के संबंध में सांस्कारिक कला और अनेकता में एकता की चर्चा की।

शब्दावली
मानवीकरण (Anthropomorphic) ः ईश्वर को मनुष्य के स्वरूप, व्यक्तित्व और गुणों में प्रस्तुत करना।
पर्व (Festival) ः एक धार्मिक उत्सव जिसमें सांस्कारिक तत्वों का समावेश होता है।
अस्मिता (Identity) ः किसी समूह के साथ जुड़े होना और उसके
बारे में सजग होना।
करवा चैथ (Karwa Chauth) ः स्त्रियों का पर्व जिसमें वे अपने पतियों की लंबी आयु के लिए देवी दुर्गा और भगवान शंकर की पूजा करती हैं।
सांझी (Sanjhi) ः देवी/दुर्गा/शंकुवरी का उर्वरता पंथ संबंधी संस्कार।
दैवीय (Supernatural) ः परासामान्य प्रघटनाओं से संबंधित जैसे देवतागण, प्रेत और दैत्य ।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
भट्ट, जी. एस., 1961,‘‘ट्रेड्स एंड मेजर्स ऑफ स्टेटस मोबीलिटी अमंग द चमार्स ऑफ देहरादून‘‘, दि ईस्टर्न ऐंथ्रोपोलॉजिस्ट, गपअ, 3, लखनऊ, ई.एफ.सी.एस.
जॉनसन, हैरी एम., 1968 ‘‘सोशियोलॉजी, ए सिस्टमैटिक इंट्रोडक्शन‘‘ सतलेज एंड केगा पॉल: लंदन (अध्याय 15 और 17)
मैलिनोव्स्की, ब्रॉनिस्ला, 1954, ‘‘मैजिक, सांइस एंड रिलीजन‘‘ डबलडे ऐंकर बुक्स, गार्डन सिटी
माथुर, के. एस., 1961 मीनिंग ऑफ हिन्दुइज्म इन ए मालवा विलेज, इन ‘‘आस्पेक्ट्स ऑफ रिलीजन इन इंडियन सोसाइटी‘‘ (संपा) विद्यार्थी एल. पी.,रांची: जर्नल ऑफ सोशल रिसर्च प्ट/1-2, सी.एस.सी.आर.
नटराजन, एस. 1959 ‘‘ए सेंचरी ऑफ सोशल रिफॉर्म इन इंडिया‘‘, एशिया पब्लिकेशंस, बंबई
ओ. डी. थॉमस एफ. 1966, ‘‘द सोशियोलॉजी ऑफ रिलीजन‘‘, पेंटिस हॉल: नई दिल्ली वाइजर, डब्ल्यू. एच. 1958, ‘‘द हिन्दू जजमानी सिस्टम‘‘, लखनऊ पब्लिशिंग हाउस: लखनऊ।

बोध प्रश्न 1
प) साझी के पर्व का वर्णन कीजिए। इस पर्व का क्या महत्व है? 10-12 पंक्तियों में उत्तर दीजिए।
पप) करवा चैथ के धार्मिक पर्व का वर्णन कीजिए। इस पर्व का क्या महत्व है? 10-12 पंक्तियों में उत्तर दीजिए।

बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 1
प) सांझी का पर्व पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में मनाया जाता है। यह अक्तूबर के महीने में पड़ता है। देवी सांझी की मिट्टी की प्रतिमा बनाई जाती है उसके नीचे मिट्टी में जौ बोए जाते हैं। शाम को स्त्रियाँ उसकी स्तुति में गीत गाती हैं। दशहरा के दिन जौ की अंकुरित बालों को परिवार के पुरुषों के कान में खोंसा जाता है। फिर प्रतिमा को विसर्जित कर दिया जाता है। इस पूजा का महत्व यह है कि यह भारतीय दर्शन से जुड़ी है और उर्वरता और समृद्धि की प्रतीक है।
पप) करवा चैथ विवाहित स्त्रियों का पर्व है जो पंजाब और हिन्दी भाषी क्षेत्रों में मनाया जाता है। इस पर्व में स्त्रियाँ उपवास रखती हैं और गिरिजा/गौरी की पूजा करती हैं। भोज भी इस पर्व का एक आवश्यक संस्कार है। इसमें देवी दुर्गा की आकृति बनाई और रंगी जाती है। करवा चैथ का पर्व दिवाली से बारह दिन पहले मनाया जाता है। शाम को देवी की पूजा की जाती है और चंद्रमा को जल चढ़ाया जाता है। उसके बाद स्त्रियाँ छननी से चांद को देखती हैं। फिर वे अपने पति के पाँव छूती हैं और परिवार के सदस्य भोज में शामिल होते हैं। इस पर्व का महत्व स्त्रियों द्वारा अपने पति की लंबी आयु की कामना करने में निहित है। यह पर्व वहाँ मनाया जाता है जहां स्त्रियों को पुनर्विवाह की अनुमति नहीं है और जहां विधवापन को बुरा समझा जाता है।

 उद्देश्य
इस इकाई को पढ़ने के बाद, आपः
ऽ धार्मिक पर्व की समाजशास्त्रीय व्याख्या कर पाएंगे,
ऽ सामान्य रूप से व्यक्ति, समाज और संस्कृति के साथ और विशेषरूप से भारत में इसके संबंध का विश्लेषण कर पाएंगे,
ऽ इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के सामाजिक महत्व को रेखांकित कर सकेंगे, और
ऽ समाज और धर्म के बीच के संबंध को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे।

प्रस्तावना
इस खंड में अब तक हम जीवनचक्रीय संस्कार और तीर्थयात्रा पर तीन इकाइयों का अध्ययन कर चुके हैं। इन इकाइयों के अध्ययन से हमें यह ज्ञात होता है कि धर्म का सामाजिक महत्व हमारे जीवन में जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक प्रत्येक चरण में व्याप्त है। यह एक बेहतर जीवन जीने और पवित्र सत्ता से संपर्क करने के हमारे प्रयासों में भी नजर आता है। इस इकाई में हमें संस्कारों के महत्व का एक रंगीन पक्ष देखने को मिलेगा। इसमें यह बताया गया है कि कुछ विशेष पर्व किस तरह मनाए जाते हैं। इस तरह हमें धर्म के महत्व और सार्थकता के एक और पक्ष के दर्शन होते हैं।

इकाई के प्रारंभ में हम यह बताएंगे कि धार्मिक पर्व क्या है ? इसके सामाजिक महत्व का क्या अर्थ है ? इसके बाद हम सांझी, करवा चैथ और रविदास जयंती जैसे कुछ धार्मिक पर्र्वोें का विश्लेषण करेंगे। हम मनुष्य, प्रकृति और समाज के बीच समन्वय के विषय में भी जानेगे। उसके बाद हम व्यक्ति की भावनात्मक सामाजिक सुरक्षा के विषय में पढ़ेंगे और अस्मिता, एकात्मकता, विभेदन और संघर्ष का भी विश्लेषण करेंगे। इकाई का अंतःस्तरीकरण, सांस्कारिक कला और अनेकता में एकता के विवेचन के साथ किया गया है।

जब मनुष्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बजाय दैवीय और पारलौकिक शक्ति के माध्यम से भावनात्मक सामाजिक सुरक्षा प्राप्त करने का प्रयास करता है तब धर्म का जन्म होता है। यह शक्ति उसके अपने मस्तिष्क की उपज होती है। इस तरह, धर्म मानवीय अनुभव के उन तत्वों से जुड़ा है जो मानवीय अस्तित्व की अनिश्चितता, अशक्तता और अभाव जैसी स्थितियों से जन्म लेते हैं। इनके बदलने के साथ धर्म में भी बदलाव आता है।

इस संदर्भ में आपके लिए धर्म और जादू के भेद, उनके परस्पर संबंध और उनकी पारस्परिक अविच्छिन्नता को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि धर्म और जादू दोनों को उस स्थिति के परिणाम के रूप में देखा जा सकता है जिसे मैक्स वेबर ने ‘‘आनुष्ठानिक नैत्यीकरण‘‘ कहा है। इसके परिणामस्वरूप ही मान्यता, मूल्य और संस्कार और प्रतीक भी संस्थापित हो जाते हैं। वे व्यक्तिगत और सामूहिक स्तरों पर सामाजिक संबंधों का अंग बन जाते हैं। सामाजिक स्तर परिवार, जाति, समुदाय (गांव/शहर) जैसे सामाजिक क्षेत्रों में और सांप्रदायिक तथा धार्मिक समूहों के स्तरों पर व्यक्त होता है।

संस्कारों का उत्सवीकरण व्यक्तिगत स्तर पर न होकर सामूहिक स्तर पर होता है । यह सच है कि काला जादू के संस्कारों का उत्सवीकरण कभी सामूहिक नहीं होता और इसके साथ मनोरंजन, आमोद-प्रमोद (नाचना/गाना) तनाव का व्यवस्थापन, उपवास और भोज भी जुड़ जाते हैं। सामाजिक स्तर पर यह सब नातेदारी, सामाजिक स्तरीकरण, अर्थव्यवस्था और वार्षिक चक्र संस्कार और चर्च, संप्रदाय और पंथ जैसे धार्मिक समूहों और गाँव और जाति के राज्यतंत्र से भी आबद्ध बना रहता है और इस तरह धार्मिक पर्र्वोें का जन्म होता है। इस इकाई के लिए जिन स्रोतों से सामग्री ली गई है उनका उल्लेख ‘कुछ उपयोगी पुस्तकों‘ में किया गया है।