त्रिविम समावयवता किसे कहते है , उपसहसंयोजन यौगिकों में त्रिविमसमावयवता stereoisomerism in hindi

stereoisomerism in hindi त्रिविम समावयवता किसे कहते है , उपसहसंयोजन यौगिकों में त्रिविमसमावयवता ?

उपसहसंयोजन यौगिकों में त्रिविमसमावयवता

लिगन्डों की विविध स्थानिक व्यवस्थाओं (spatial arrangements) की संख्या धातु की समन्वय संख्या पर निर्भर करती है। समन्वय संख्या के बढ़ने पर व्यवस्थाओं की संख्या भी बढती है। विभिन्न के उपसहसंयोजन संकुल यौगिकों की त्रिविमरसायन का विवेचन नीचे किया गया है।

 (i) समन्वय संख्या 2

दो समन्वय संख्या वाले संकुल एक रेखीय होते हैं। इनमें त्रिविमसमावयवता नहीं पायी जाती क्योंकि उपसहसंयोजी समूहों की स्थानिक व्यवस्था एक से अधिक प्रकार से नहीं की जा सकती है। 10 विन्यास वाले Cut. Ag”. Au+ तथा Hg 2+ धनायन सामान्यतः 2- उपसहसंयोजित प्रतिचुम्बकीय एक रेखीय संकुल बनाते हैं, जो sp, संकरण से प्राप्त होते हैं।

उदाहरणार्थ-

[H3N – Ag– NH3]’, [NC-Ag-CN], [NC-Au-CNJ

[I-Au-P(C2H5)3], [Cl-Au-CO], [Hg(CN)2] तथा [CuCl2]

ये सामान्यतः कम स्थायित्व के संकुल हैं जो अधिक संख्या में लिगन्डों से संयुक्त होकर उच्च समन्वय संख्या के संकुलों का निर्माण कर देते हैं-

[Ag(NH3)2]+ + 2NH3 → [Ag(NH3)4]

[Hg(CN)2] + 2CN- → → [Hg(CN)4]2-

जिन धातु आयनों की समन्वय संख्या 2 है वे द्विदन्तुक लिगण्डों के साथ साधारण संकुल नहीं बना सकते, क्योंकि ऐसी स्थिति में कीलेट वलय में अत्यधिक विकृति (strain) उत्पन्न हो जाएगी। उदाहरण के लिए Ag+ आयन एथिलीनडाइऐमीन के साथ संरचना I वाला संकुल नहीं बनाकर संरचना II वाला द्विनाभिकीय संकुल बनाता है।

समन्वय संख्या 3

3- उपसहसंयोजित संकुल बहुत कम पाये जाते हैं। इस समन्वय संख्या के लिए दो ज्यामितीय व्यवस्थाएँ, समतल त्रिभुजीय (BCI3 जैसी) तथा त्रिकोणीय पिरेमिडी (NH3 जैसी), संभव है। लेकिन X- किरण द्वारा तीन समन्वय संख्या वाले जिन यौगिकों की संरचना का अध्ययन किया गया है उन सभी संकुलों की ज्यामिति समतल त्रिभुजीय पाई गई है जिनमें केन्द्र पर उपस्थित धातु को sp2 संकरित माना जा सकता है। इस प्रकार के उदाहरण ये हैं-

[Cu(SPMe3)3]’, [Cu(SPMe3 ) Cl2]. [Hgl3] – तथा [ Pt (PPh3)3]2+

समन्वय संख्या 4

चार समन्वय संख्या वाले संकुलों की त्रिविमरसायन संयोजकता बन्ध सिद्धान्त की सहायता आसानी से समझाई जा सकती है। हम जानते हैं कि sp3 संकरण चतुष्फलक व्यवस्था से संबद्ध होता है तथा dsp2 संकरण वर्गाकार समतलीय व्यवस्था से । इस प्रकार, किसी संकुल के चुम्बकीय गुण प्रकार का (अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या) जानने पर हम यह कह सकते हैं कि धातु आयन का किस प्र संकरण होना चाहिए और अतः इसके चारों ओर लिगण्डों की किस प्रकार की व्यवस्था होगी।

अब हम [Ma4] तथा [Ma3b] की तरह के संकुलों पर विचार करते हैं, जहाँ M केन्द्रीय धातु तथा दो a a b एकदन्तुक लिगण्ड हैं। चूँकि उपर्युक्त संघटनों के केवल एक-एक यौगिक ही बनाये जा सकते हैं, संकुल की ज्यामिति अवश्य ही ऐसी होनी चाहिए जिसमें चारों स्थान परस्पर समतुल्य हो | इसका अर्थ यह है कि यदि धातु को किसी ज्यामितीय आकृति के केन्द्र पर माना जाये तो उस आकृति के चारों कोने (जहाँ पर लिगण्ड स्थित माने जाते हैं) केन्द्र से समान दूरी पर होने चाहिये। इस प्रकार की व्यवस्थाएँ हो सकती हैं। (a) चतुष्फलकीय तथा (b) वर्गाकार समतलीय जैसा कि चित्र 3.13 में दिखाया गया है । 4- उपसहसंयोजित संकुलों में दोनों व्यवस्थाऐं देखी जाती हैं। संक्रमण धातुओं में वर्गाकार समतलीय संकुल अधिक सामान्य हैं जबकि असंक्रमण तत्वों में चतुष्फलकीय यौगिक अधिकतर पाये जाते हैं। इसलिए इन दोनों ज्यामितियों का अलग-अलग विवेचन उचित होगा ।

उपसहसंयोजन यौगिकों में समावयवता ( Isomerism)

कार्बनिक रसायन में यह अक्सर पाया जाता है कि एक ही आण्विक सूत्र वाले यौगिक गुणों में भिन्न होते हैं। इन यौगिकों को समावयवी तथा ऐसी घटना (phenomenon) को समावयवता कहा जाता हैं । यह घटना रसायनशास्त्र की केवल कार्बनिक शाखा तक ही सीमित नहीं है अपितु अकार्बनिक रसायन में भी पाई जाती है। उपसहसंयोजन यौगिकों में कार्बन के यौगिकों की अपेक्षा कही अधिक प्रकार की समावयवता देखने को मिलती है।

हम जानते हैं कि यौगिकों के गुण उनकी संरचना पर निर्भर करते हैं । अतः विभिन्न गुणों वाले दो यौगिक संरचना में भिन्न होने चाहिए चाहे उनका अणु सूत्र एक ही क्यों न हो। यह अन्तर दो कारणों से उत्पन्न हो सकता है अतः उपसहसंयोजन यौगिकों में समावयवता को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।

  1. संरचना समावयवता– यहाँ परमाणु परस्पर संयुक्त होकर विभिन्न समूह बनाते हैं ।
  2. स्टीरियो समावयवता – यहाँ समूह तो वे ही रहते है, लेकिन अन्तराल में उनकी आपेक्षिक व्यवस्थाएँ बदल जाती हैं। इनमें से प्रत्येक को फिर से विभाजित किया जा सकता है। जैसा कि आने वाली पंक्तियों में बताया गया है, इस प्रकार के समूहों (groups ) की भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं भिन्न-भिन्न समावयवी प्राप्त होते हैं। स्पष्टतः किसी धातु की जितनी अधिक उपसहसंयोजन संख्या (coordination number) होगी, ऐसी व्यवस्थाओं की संख्या भी उतनी ही अधिक होगी तथा उतने ही अधिक समावयवी बनेंगे। यही कारण है कि अष्टफलकीय संकुलों (octahedral complexes) में सबसे अधिक प्रकार के उदाहरण पाये जाते हैं।
  3. सरचना समावयवता (Structural isomerism ) इस समावयवता को निम्न श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
  4. आयनन समावयवता (lonisation isomerism ) – बाह्य क्षेत्र से उपसहसंयोजन क्षेत्र में आगन प्रवेश कर जाने पर इस प्रकार की समावयवता देखी जाती है। अतएव, इन समावयवों से विलयन में भिन्न-भिन्न आयन प्राप्त होंगे। उदाहरणार्थ [Co(NH3) 5SO4] Br तथा (CoBr (NH3) 5]SO4 इस प्रकार का एक युग्म बनाते हैं। पहला सकुल AgNO, विलयन के साथ AgBr का हलका पीलाअवक्षेप देता है लेकिन BaCl2 विलयन से कोई अवक्षेप प्राप्त नहीं होता। जबकि बाद वाला सकुल BaCl2 विलयन से BaSO4 का सफेद अवक्षेप देता है, अर्थात् पहले में Br तथा दूसरे में SO2 आयन उपस्थित है।

इस प्रकार के अन्य युग्म ये हैं-

[Co(NH3)5(NO3)]SO4 .[CO(NH3)5SO4]NO3

[PtCl2(NH3)4]Br2 व [PtBr2(NH3)4]Cl2

[CoCl(en)2(NO2)]C1 व [CoCl2(en)2]NO2

[Pt(NH3)3Cl] I व [Pt (NH3)3l]Cl

  1. हाइड्रेट समावयवता (Hydrate isomerism ) यह आयनन समावयव से कुछ-कुछ इस रूप में मिलता है कि जल (या सामान्य रूप से कोई भी विलायक) यौगिकों का एक भाग होता हैं। इन समावयवों में विलायक अणु लिगण्ड के रूप में पाया जा सकता है या अन्य किसी प्रकार से संबद्ध हो सकता है। उदाहरण के लिए CrCl3.6H2O मूलानुपाती सूत्र (empirical formula) रखने वाले तीन भिन्न-भिन्न समावयवी ज्ञात हैं। जब इन तीनों समावयवों के विलयनों की सिल्वर नाइट्रेट विलयन से अलग-अलग अभिक्रिया कराई जाती है तो अलग-अलग परिणाम देखने में आते हैं। एक में सारे क्लोरीन अवक्षेपित हो जाते हैं जबकि दूसरे में 2/3 तथा तीसरे से 1/3 भाग ही अवक्षेपित हो पाते हैं। स्पष्टतः आयननीय क्लोरीनों की संख्या क्रमशः 3,2 तथा 1 है। अतः इन समावयवों को निम्न प्रकार प्रदर्शित किया जाता है-

[Cr(H2O)6]CI3    (बैंगनी)

[Cr(H2O)5Cl]Cl2.H2O     ( हल्का हरा)

[Cr(H2O)4Cl2]Cl.2H2O   (गहरा हरा)

इस प्रकार की समावयवता का दूसरा उदाहरण निम्न है

[Cr(H2O)2(en)2] Br3 तथा [Cr (H2O) (en)2 Br]Br2.H2O

  1. बहुलकन समावयवता (Polymerisation isomerism ) – समान मूलानुपाती ( empirical) सूत्र तथा अलग-अलग आण्विक संघटन रखने वाले यौगिकों का इस पद द्वारा वर्णन किया जा सकता है। तथापि, वर्तमान संदर्भ में यह पद इस समावयवता का गलत नाम है, क्योंकि यहाँ वास्तव में कोई बहुलकीकरण नहीं पाया जाता। बहुलकीकरण में एक ही समूह की पुनरावृत्ति होनी चाहिए जो यहाँ नहीं होती । तथा कथित बहुलकन समावयवों के मध्य पाये जाने वाला अन्तर, इन्हें बनाने वाले विभिन्न समूहों की व्यवस्था में अन्तर के कारण उत्पन्न होता है। 4- तथा 6- समन्वय संख्याएँ इस प्रकार की समावयवता दर्शाती है। नीचे दिये गये उदाहरणों के प्रत्येक समूह में मूलानुपाती सूत्र तो वही रहता हैं लेकिन अणु भार मूलानुपाती भार के गुणक है।

(i) [Pt(NH3)2Cl2], [Pt(NH3)4] [PtCl4] तथा [P1 (NH3)4] [Pt(NH3CI3]

(ii) [Co(NH3)3(NO2)3)3], [Co(NH3)6] [CO(NO2)6], [Co(NH3)5NO2][CO(NH3)2(NO2)4]2 तथा [Co(NH3)4(NO2)2]3. [Co(NO2)6],

  1. उपसहसंयोजन समावयवता (Coordination isomerism ) – सकुल धनायन तथा सकुल ऋणायन से बने यौगिक इस प्रकार की समावयवता दर्शाते हैं। ऐसी अवस्थाओं में, समन्वय मण्डलों में लिगण्ड अपनी स्थितियों की अदला बदली कर सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न समावयवी प्राप्त होते हैं । वर्गाकार समतलीय तथा अष्टफलकीय संकुलों में इस तरह की समावयवता पाई जाती है । यहाँ दो सम्भावनाओं पर अवश्य विचार किया जाना चाहिये-

(a) पहली वह जिसमें धनायन तथा ऋणायनों में अलग-अलग धातु आयन विद्यमान होते हैं। इसे निम्न उदाहरणों की सहायता से स्पष्ट किया गया है जिनमें धातु आयन परस्पर अपनी स्थितियाँ बदल लेते हैं-

(i) [Cu(NH3)4] [PtCl4]    तथा  [Pt(NH3)4] [CuCl4]

(i) [Pt(NH3)4] [PdCl   तथा  [Pd(NH3)4] [PtCl4]

(iii) [Co(NH3)6] [Cr(CN)6]   तथा [Cr(NH3)6] [Co(CN)6]

(iv) [Co(NH3)6] [Cr(C2O4)3]   तथा  [Cr(NH3)3] [CO(C2O3]

(b) दूसरे प्रकार की उपसहसंयोजन समावयवता उन यौगिक में देखी जा सकती है। जिनके दोनों संकुल आयनों में एक धातु आयन केन्द्रीय आयन के रूप में उपस्थित होता है। ऐसे दोनों प्रकार के उदाहरण नीचे दिये गये हैं। इनमें धातु आयन दोनों उपसहसंयोजन क्षेत्रों में या तो समान ऑक्सीकरण अवस्था में हैं या भिन्न भिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं में-

(a) समान ऑक्सीकरण अवस्था में एक ही धातु आयन-

(i) [Cr(NH3)6] [Cr(SCN)6].    तथा

(i) [Co(NH3)6] [Co(NO2)6]  तथा

(ii) [Pt(NH3)4] [Pt(CI4)]   तथा

[Cr(NH3)4(SCN)2] [Cr(NH3) 2 (SCN) 4]

[Co(NH3)4(NO2)2] [Co(NH3)2(NO2)4]

[Pt(NH3)3Cl] [Pt(NH3)C3]

(b) विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं में धातु आयन उदाहरण से स्पष्ट है-

[Pi(NH3)4] [PtVClg] –

अपना स्थान बदल लेते हैं जैसा कि निम्न

तथा [PtV(NH3)4Cl2] [Pt°C1]

  1. उपसहसंयोजन स्थिति समावयवता (coordination position isomerism)– बहुनाभिक उपसहसंयोजन यौगिक में अनसेतुकारक (nonbridging) लिगण्ड परस्पर अपने स्थान बदलकर इस प्रकार से समावयवी देते हैं, उदाहरणार्थ,
  2. बन्धन या संरचनात्मक या लवण समावयवता (Linkage or structural or salt isomersim). कुछ लिगण्ड एक से अधिक प्रकार के परमाणुओं द्वारा धातु परमाणु के साथ बन्ध बनाने में होते हैं। थायोसायनेट (SCN) तथा नाइट्राइट (NO2 ) इस तरह के अति सामान्य उदाहरण हैं। SCN – स धातु आयन के साथ या तो सल्फर परमाणु के द्वारा संलग्न हो सकता है या नाइट्रोजन परमाणु के इस प्रकार प्राप्त समावयवों को क्रमशः थायोसायनेटो-S’ तथा थायोसायनेटो-N-संकुल कहते हैं। समूह में N या कोई भी एक ऑक्सीजन दाता परमाणु का काम कर सकता है। प्राप्त समावयों को नाइट्रिटो -N तथा नाइट्रिटो-O संकुल कहते हैं। उदाहरण इस प्रकार हैं-

(i) [(CO)5Mn-SCN]— तथा [(CO)5Mn-NCS]+

(ii) [(NH3)5 Cr-ONO]2+ तथा [(NH3) Cr—NO2]2+

  1. लिगन्ड समावयवता – बहुत से लिगन्ड स्वयं समावयवी रूपों में पाये जाते हैं। इस तरह के लिगण्ड अधिकांशतः कार्बनिक अणु होते हैं। उदाहरण के लिए, डाइऐमीनोप्रोपेन के दो रूप 1,2- डाइऐमीनोप्रोपेन (pm) तथा 1,3 – डाइऐमीनोप्रोपेन (tn) दो प्रकार के समावयवों को जन्म देते हैं, जैसे-

[Co(pn)2Cl2]Cl   तथा [Co(tn)2C2]Cl

  1. त्रिविमसमावयवता (Stereoisomerism ) – इस समावयवता के पाये जाने के बारे में सर्वप्रथम वर्नर ने भविष्यवाणी की थी। विभिन्न प्रकार के संकुलों के लिए इतने त्रिविमसमावयवी बनाये जा चुके हैं कि अभी तक बताई गई विभिन्न प्रकार की समावयवताओं में यह समावयवता सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। त्रिविमसमावयवता वह घटना (phenomenon) है तो कुछ अवयवी (constituent ) परमाणु या समूहों द्वारा विभिन्न आपेक्षित त्रिविम स्थितियाँ (relative spatial positions) ग्रहण करने उत्पन्न होती है । त्रिविम समावयवता दो प्रकार की होती हैं- (i) ज्यामितीय तथा (ii) प्रकाशीय । त्रिविम समावयवता का विस्तृत विवेचन आगे किया गया है।
  2. ज्यामितीय समावयवता (Geometrical isomerism ) – यह लिगण्डों की भिन्न-भिन्न ज्यामितीय व्यवस्थाओं के कारण उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए, वर्गाकार समतलीय संकुल [Pt(NH3)2Cl2] के दो समावयवी, नामतः सिस और ट्रॉन्स, हो सकते हैं। सिस समावयवी में दोनों क्लोरो या अमोनिया समूह पास-पास होते हैं (90° का कोण बनाते हुए), जब कि ट्रॉन्स समावयवों में ये विपरीत स्थान ग्रहण करते हैं ( 180° का कोण बनाते हुए) । इसी प्रकार 6- उपसहसंयोजित संकुलों में भी सिस तथा ट्रांस समावयवी देखे जा सकते हैं।
  3. प्रकाशिक समावयवता (Optical isomerism ) – ऐसे बहुत से उदाहरण ज्ञात है जिनमें ज्यामितीय समावयवी दो ऐसे समावयवों का बना होता है जिनमें प्रत्येक समावयवी रेखा ध्रुवित प्रकाश* के तल (plane of plane-polarized light) को घुमा देने में समर्थ होता है। ऐसे रेखा ध्रुवीय यौगिक जिनमें गलनांक, क्वथनांक तथा स्थायित्व समान होते हैं, लेकिन ये प्रकाश को विपरीत दिशाओं में घुमा देते हैं, प्रकाशिक समावयवी कहलाते हैं। सभी असममित (asymmet- ric) यौगिक अर्थात् वे जिनमें कोई सममित तल (plane of symmetry) नहीं होता ध्रुवण घूर्णक (optically active) होते हैं।

एक सामान्य किरण पुँज (beam of light) ऐसे विकिरणों से बनी होती है जो सभी तलों में तरंगीय रूप से गतिशील होते हैं। लेकिन जब इसे पोलोराइड जैसे पदार्थों में से होकर गुजारा जाता है तो पारगत (transmitted) किरणें केवल एक तल में ही कम्पित होती है। इस पारगत प्रकाश को रेखा ध्रुवित प्रकाश कहते हैं।