सामाजिक प्रणाली की संरचना के प्रकार social system types by talcott parsons in hindi सामाजिक व्यवस्था

By   November 26, 2020

सामाजिक व्यवस्था सामाजिक प्रणाली की संरचना के प्रकार social system types by talcott parsons in hindi टैल्कॉट पार्सन्स के द्वारा समाजशास्त्र में ?

सामाजिक प्रणाली की संरचना के प्रकार
पार्सन्स ने अपने समाजशास्त्रीय विश्लेषण में मुख्य रूप से चार प्रकार की सामाजिक प्रणालियों के बारे में विचार किया है। ये प्रणालियां हैं – आर्थिक प्रणाली, परिवार प्रणाली, राजनैतिक प्रणाली और व्यक्तित्व प्रणाली ।

विन्यास प्रकारांतर के रूप में निरूपित भूमिका अपेक्षाओं और भूमिका निष्पादन के संबंध में दुविधाओं के बारे में विचारकों और प्रकार्यात्मक पूपिक्षाओं के प्रतिपादन को यदि साथ-साथ लें तो विभिन्न समाजों के संबंध में हमारे ज्ञान में पर्याप्त वृद्धि होगी। इससे हमें विभिन्न प्रकार की सामाजिक प्रणालियों की संरचनाओं, उनकी सामाजिक विशेषताओं और समाज में उनके स्थान को पहचानने में सहायता मिलती है। सामाजिक प्रणालियों को केवल सैद्धांतिक रूप से ही हमने नहीं पहचाना, जैसा कि हमने पहले विन्यास प्रकारांतर और प्रकार्यात्मक पूपिक्षाओं वाले भागों में किया है, बल्कि हम उसे कई समाजों में अनुभवाश्रित ज्ञान से भी हमने पहचाना।

अपनी पुस्तक द सोशल सिस्टम (1951) में पार्सन्स ने कई प्रकार की अनुभवाश्रित सामाजिक प्रणालियों (अर्थात वह प्रणाली जिसे क्षेत्र में (समाज में) प्रेक्षित किया जा सकता है और उसका सत्यापन किया जा सकता है) का सामाजिक संरचनाओं के विभिन्न समुच्चयों के बारे में उल्लेख किया है। पार्सन्स ने सामाजिक प्रणाली और सामाजिक संरचना की अवधारणा में अंतर किया है। सामाजिक प्रणाली की अभिव्यक्ति सिद्धांतों के समग्र रूप से होती है, जिसके माध्यम से सामाजिक अंतःक्रिया की भूमिकाएं और संबंधित तत्वों का संगठन होता है। दूसरी ओर, सामाजिक संरचना उस विशिष्ट प्रकार को प्रतिबिंबित करती है, जिसमें अंतःक्रिया की स्थिति में ये भूमिकाएं साथ-साथ संस्थित और संघटित होती है। उदाहरण के लिए, परिवार एक सामाजिक प्रणाली है लेकिन इसकी सामाजिक संरचना देखनी हो तो इन्हें अनुभवाश्रित रिश्ते-नाते की भूमिकाओं के समूह में देखा जा सकता है।

इसी तरह, आर्थिक प्रणाली को सामाजिक प्रणाली के एक अन्य उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। लेकिन इसकी सामाजिक सरंचना की विशेषता उत्पादन, विपणन (उंतामजपदह) प्रबंध प्रणाली आदि से संबंधित हैं विन्यास प्रकारांतरों द्वारा सामाजिक संरचना के समुच्चयों के प्रमुख प्रकारों को परिशुद्ध रीति से उदाहरणों द्वारा प्रदर्शित किया है। पार्सन्स ने इस तरह के चारप्रकारों का उल्लेख किया हैः प) सार्वभौमवादी-अर्जित विन्यास, पप) सार्वभौमवादी-प्रदत्त विन्यास, पपप) विशिष्टतावादी-अर्जित विन्यास, पअ) विशिष्टतावादी-प्रदत्त विन्यास।

सार्वभौमवादी-अर्जित विन्यास (the universalistic&achievement pattern)
यह ऐसी सामाजिक प्रणाली की संरचना है, जिसकी भूमिकाओं में ऐसे मूल्यपरक उन्मुखताएं प्रमुख हैं जो समाज के सदस्यों में विधिसम्मत, तर्कसंगत विधियों पर आधारित उपलब्धि को बढ़ावा देते हैं। यह ऐसा समाज या.सामाजिक प्रणाली है जो आधुनिक औद्योगिक समाजों का उदाहरण है जहां समानता, लोकतंत्र, कार्य-स्वातंय, तर्कसंगत प्रबंध-व्यवस्था और सामाजिक अंतःक्रियाओं में खुलापन नियामक नैतिक मूल्य हैं। ऐसी सामाजिक प्रणाली में जाति, नृजातीयता (ethnicity) या अन्य विशिष्टतावादी मूल्यों के आधार पर समाज के विभाजन का कोई स्थान नहीं है। पार्सन्स के मत में ऐसी सामाजिक प्रणाली का सबसे नजदीकी उदाहरण अमरीकी समाज को कहा जा सकता है।

 सार्वभौमवादी-प्रदत्त विन्यास (the universalistic&ascriptive pattern)
यहां भूमिकाओं का संविन्यास (configuration) कुछ और ही प्रकार का है, जिससे ऐसी सामाजिक प्रणाली का निर्माण होता है जिसमें भूमिकाओं के निष्पादन में विधि-समप्रत तर्कसंगतता पर आधारित मूल्यों को बढ़ावा दिया जाता है लेकिन इसमें अधिकारों का वितरण, समानता या लोकतंत्र के आधार पर नहीं होता। कार्य और पेशे में उद्योग तथा संचार में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के आधुनिक सिद्धांतों को लागू किया जाता है, लेकिन जहां किसी विशिष्ट विचारधारा वाले संघ या पार्टी या मत की सदस्यता का प्रश्न है, इनका वितरण प्रदत्त सिद्धांतों से किया जाता है। पार्सन्स के अनुसार नाजी जर्मनी ऐसे ही एक समाज का उदाहरण है। नाजी शासन के दौरान जर्मनी के सामाजिक संरचना में उद्योग, प्रबंध व्यवस्था और उत्पादक संस्थाओं में एक तरफ तो भूमिकाओं के संगठन के तर्कसंगत तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था और दूसरी तरफ वहां जर्मन जाति के विशिष्ट गुणों से संपन्न लोगों में (जैसे यहूदियों) में स्पष्ट भेदभाव किया जाता था। ऐसे ही उदाहरण सामाजिक इतिहास के और कालों में भी मिल सकते हैं।

विशिष्टतावादी-अर्जित विन्यास (the particularistic achievement pattern)
पार्सन्स के अनुसार इस प्रकार की सामाजिक संरचना प्राचीन चीनी समाज में सबसे अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इस समाज में “परिवारवाद‘‘ के मूल्यों की प्रधानता थी। परिवारवाद का मतलब पूर्वजों के साथ (पूर्वजों की पूजा) सातत्य की धारणा, रिश्तेदारी के घनिष्ठ संबंध थे, लेकिन इस समाज में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की वंश परंपरा को हीन समझा जाता था। इसका स्वाभाविक परिणाम समाज में महिलाओं की अधीनता था। यह भूमिकाओं के संविन्यास पर आधारित था, जहां पेशे, अधिकार, प्रबंध व्यवस्था आदि का संगठन सार्वभौमवादी सिद्धांतों के बजाए विशिष्टतावादी सिद्धांतों में जन्म और नाते-रिश्ते के संबंधों पर सबसे अधिक बल दिया जाता था। लेकिन इसके साथ ही, समाज में भूमिकाओं के निर्वाह में उपलब्धि और औचित्य के नियमों को भी महत्व दिया जाता था। जो विधिसम्मत तर्कसंगतता (सार्वभौमवादी सिद्धांतों) के समान थे। ये सभी बातें कन्फ्यूशियस धर्म के अंतर्गत थीं। यह पुरातन चीन का राजधर्म था। प्रदत्त सिद्धांतों के साथ सार्वभौमवाद की प्रधानता को चीन में सरकारी सेवाओं में भर्ती से देखा जा सकता है। सरकारी सेवाओं में भर्ती के लिए प्रतियोगिता द्वारा प्रवेश होती थी जिसमें केवल वे उम्मीदवार भाग ले सकते थे जिनका राज्य धर्म में विश्वास था।

 विशिष्टतावादी-प्रदत्त विन्यास (the particularistic&ascription pattern)
यह ऐसी सामाजिक संरचनाओं की ओर संकेत करता है जिनमें भूमिकाओं का संगठन ऐसे मूल्यों की दृष्टि से किया जाता है जो रिश्ते-नाते, जन्म और दूसरे प्रदत्त अभिलक्षणों से संबंधित हैं। इस प्रकार की सामाजिक संरचनाओं में व्यक्तिगत प्रयासों से होने वाली उपलब्धियों को प्रोत्साहित नहीं किया जाता। टालकट पार्सन्स का कथन है कि इस प्रकार की प्रणाली में काम को ठीक उसी तरह अपरिहाग्र बुराई माना जाता है जैसे न्यूनतम स्थिरता के लिए नैतिकता आवश्यक शर्त है।

इस प्रकार के समाज में अभिव्यक्तिपरक और कलात्मक उन्मुखता पर आवश्यकता से कहीं अधिक बल दिया जाता है। यह समाज परंपरावाद समर्थक है क्योंकि यहां परंपरा को भंग करने के कलए किसी प्रकार का प्रोत्साहन नहीं है और स्थिरता के पक्ष में सशक्त निहित स्वार्थ विद्यमान है। पार्सन्स के विचार में इस प्रकार की सामाजिक संरचना के उदाहरण अमरीका में “स्पैनिश अमरीकी‘‘ है। लेकिन इस मुद्दे पर भी बहस की जा सकती है कि क्या परंपरागत भारतीय जाति समाज में ऐसे अभिलक्षण थे यहां नहीं जो विशिष्टतावादी-प्रदत्तवादी कहे जा सकते हैं।

इकाई का सारांश पढ़ने से पहले, बोध प्रश्न 3 को पूरा करें।

बोध प्रश्न 3
प) निम्नलिखित वाक्यों में दिये खाली स्थानों को भरिए।
क) पार्सन्स के अनुसार सभी सामाजिक प्रणालियों में …………….. है जिसे वे जीवित रहने के लिए बनाए रखते हैं।
ख) अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए सामाजिक प्रणालियों को अपने आंतरिक संगठन और बाहरी …………….. में कुछ …………….. समायोजन करने पड़ते हैं।
ग) अनुकूलन, लक्ष्य प्राप्ति, एकीकरण और विन्यास अनुरखण ……………………… है जिनके बिना सामाजिक व्यवस्था का अस्तित्व संभव नहीं है।
घ) विन्यास प्रकारांतरण बिल्कुल सही रूप में …………………… के समूहन के प्रमुख प्रकारों को प्रदर्शित करते हैं।
पप) किसी एक प्रकार्यात्मक पूर्वापेक्षा का उदाहरणों के साथ पाँच पंक्तियों में वर्णन कीजिए।
पपप) पार्सन्स द्वारा वर्णित सामाजिक प्रणाली की किसी एक संरचना के प्रकार का वर्णन सात पंक्तियों में कीजिए।

बोध प्रश्नों के उत्तर

बोध प्रश्न 3
प) क) सीमा
ख) वातावरण, अपरिहार्य
ग) प्रकार्यात्मक पूपिक्षाएं
घ) सामाजिक संरचना
पप) अनुकूलन एक प्रकार्यात्मक पूर्वपक्षा है। इसका अर्थ यह है कि प्रणाली के बाहर से यानी बाहरी वातावरण से आहार, पानी, निर्माण सामग्री आदि संसाधनों का उत्पादन और अधिग्रहण करना। समाज में संसाधनों का वितरण भी इसी के द्वारा होता है। इस प्रकार्यात्मक पूपिक्षा का सबसे अच्छा उदाहरण अर्थव्यवस्था है। यह व्यवस्था के बाहरी कारकों की ओर उन्मुख है और इसका स्वरूप साधनात्मक या नैमित्तिक है।
पपप) पार्सन्स के अनुसार सामाजिक प्रणाली के सविन्यास का विशिष्टतावादी अर्जित विन्यास में परिवारवादी मूल्यों का विशेष महत्व था। इस प्रकार में रिश्ते-नातों का संबंध, पूर्वज व्यवस्था पर विश्वास और पूर्वजों की पूजा आदि मूल्य प्रमुख थे। पेशों, अधिकार, प्रबंध व्यवस्था आदि के संगठन जन्म और रिश्ते नातों के विशिष्टतावादी सिद्धांतों पर आधारित थे। लेकिन इस समाज में विधि सममत तर्कपरक कार्य के समान भूमिकाओं के निष्पादन में अर्जित और “औचित्य-संहिता‘‘ का पालन किया जाता था। इस प्रकार की समाज प्रणाली का एक उदाहरण परंपरागत या पुरातन चीनी समाज है।

सारांश
इस इकाई में आपने सामाजिक प्रणालियों के अध्ययन के लिए आरंभिक दृष्टिकोणों के बारे में पढ़ा, ये दृष्टिकोण हैं उपयोगितावादी, प्रत्यक्षवादी और आदर्शवादी दृष्टिकोण। आपने यह भी पढ़ा कि पार्सन्स इन दृष्टिकोणों से सहमत नहीं था क्योंकि उपयोगितावाद के समर्थकों का बाहरी, अभिप्रेरणात्मक तत्वों पर बहुत अधिक बल था, प्रत्यक्षवादियों के यहां सामाजिक पात्रों और मूल्यों की किसी त्रुटि के लिए स्थान नहीं था और आदर्शवादियों ने मूल्यों पर बहुत अधिक बल दिया। इस प्रकार पार्सन्स ने अपने क्रियात्मक दृष्टिकोण संबंधी सिद्धांत का विकास किया, जो समन्वित ढंग का सिद्धांत है। अपने इस सिद्धांत में अपने अभिप्रेरणात्मक उन्मुखता और मूल्यपरक उन्मुखता-दोनों को शामिल किया है।

पार्सन्स ने भूमिका का सामाजिक प्रणाली के सबसे महत्वपूर्ण तत्व के रूप में वर्णन किया । अपनी भूमिकाओं के निर्वाह में व्यक्तियों को दुविधाओं का सामना करना पड़ता है। दुविधाओं का जन्म समाज द्वारा दिए गए विकल्पों से क्रमिक रूप से होता है। ये चुनाव या चयन अभिप्रेरणात्मक और मूल्यपरक दोनों प्रकार के उन्मुखताओं के दायरे में होते हैं। पार्सन्स के विन्यास प्रकारांतर में वर्णित उन्मुखताओं की प्रकृति के द्विभाजन (अर्थात दो भागों में बांटने के) द्वारा व्यक्तियों के समाज में की जाने वाली क्रिया दिशा निर्धारित होती है। इस इकाई में हमने अनुकूलन, लक्ष्य प्राप्ति, एकीकरण और विन्यास अनुरक्षण जैसी प्रकार्यात्मक पूपिक्षाओं का वर्णन किया है जिसके बिना सामाजिक प्रणाली का अस्तित्व संभव नहीं है। अंत में, हमने इस इकाई में सार्वभौमवाद, विशिष्टतावाद, प्रदत्त की संरचना के प्रकारों का वर्णन किया। पार्सन्स ने इस विभिन्न प्रकारों की सामाजिक प्रणालियों के उदारहण वास्तविक समाजों में से दिए हैं।

शब्दावली
अभिप्रेरणात्मक उन्मुखता यह सामाजिक क्रिया के पहलू की ओर संकेत करती है। किसी समाज के ऐसे कारण या (motivational orientation) प्रयोजन जो समाज के मूल्यों या प्रतिमानों से संबंधित नहीं होते, जैसे किसी अवसर के लिए सबसे अच्छी साड़ी का चुनाव या जन्मदिन के लिए उपयुक्त कार्ड का चयन ।
उपयोगितावादी दृष्टिकोण यह उस विश्वास की ओर संकेत करता है जिसके अनुसार समाज में व्यक्ति की आवश्यकताओं (utilitarian approach) की पूर्ति और कष्टों का निवारण तर्कसम्मति अभिप्रेरणों (rational motives) या प्रयोजनों से निर्देशित होता है। सुखवाद (यानी जीवन में सुख ही मूल तत्व है) उपयोगितावाद में विश्वास का एक भाग है।
क्रिया (action) पार्सन्स के अनुसार क्रिया एक मानव-व्यवहार है, जिसकी निम्नलिखित चार स्थितियां हैः
प) यह लक्ष्य प्राप्ति या अन्य प्रत्याशित क्रियाओं की ओर उन्मुख होता है।
पप) इसका निष्पादन विशिष्ट स्थिति में होता है।
पपप) यह समाज के मानदंडों और मूल्यों से नियमित होता है।
पअ) इसमें ‘‘ऊर्जा‘‘ या प्रयास लगाना जरूरी होता है।
मूल्यपरक उन्मुखता यह सामाजिक क्रिया के उस उन्मुखता की ओर संकेत करता है, जो सामाजिक मानदंडों और (अंसनम वतपमदजंजपवद) मूल्यों से नियंत्रित होते हैं। ये सामाजिक मूल्य हैं, जैसे अपनी ही जाति या वर्ग के व्यक्ति से विवाह करना अथवा किसी औपचारिक पार्टी में औपचारिक पोशाक पहनना।
मूल्यांकनात्मक/मूल्यांकन परक इसका संबंध तुलनात्मक मूल्य-निर्णय से है।
(evaluative)
बोधपरक (cognitive) इसका संबंध किसी विषय के बोधन या समझने से हैं। उदाहरण के लिए, जब आप कुर्सी को देखते हैं तो आप यह. जानते हैं कि यह कुर्सी है, क्योंकि इसका एक विशिष्ट आकार होता है और यह लकड़ी या धातु की बनी होती है, आदि।
भावप्रवण (cathectic) इसका संबंध व्यक्तियों के भावनाओं से होता है, जैसे स्नेह, प्यार, पसंद, अरूचि आदि। सामाजिक प्रणाली (social system) इसकी अभिव्यक्ति सिद्धांतों की समग्रता के माध्यम से होती है, जिसके द्वारा सामाजिक अंतःक्रिया की भूमिकाएं और संबंधित तत्वों को संगठित किया जाता है।
सामाजिक संरचना यह उस विशिष्ट प्रकार की ओर संकेत करती है, जिसमें परस्पर क्रिया की स्थिति में भूमिकाओं (social structure) का सविन्यास होता है।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
ब्लैक, मैक्स (सं.) 1961 द सोशल थ्योरीज ऑफ टालकट पार्सन्सः ए क्रिटिकल ऐक्जामिनेशन प्रेटिस हॉल, इन्कोः ईंगलवुड क्लिफ्स न्यूज
हैमिल्टन, पीटर 1983 टालकट पार्सन्स के, सोशियलिस्ट सीरीज रूटलेजः लंदन एंड न्यूयार्क
पार्सन्स, टालकट 1951 द सोशल सिस्टम द फ्री प्रेसः ग्लेनको इलिनॉय