सामाजिक विघटन के कारण और लक्षण क्या है | सामाजिक विघटन की परिभाषा किसे कहते है Social disorganization in hindi

By   December 28, 2020

Social disorganization in hindi theory meaning definition सामाजिक विघटन के कारण और लक्षण क्या है | सामाजिक विघटन की परिभाषा किसे कहते है ?

सामाजिक समस्याओं के प्रकार
मर्टन ने सामाजिक समस्याओं का वर्गीकरण निम्न दो भागों में किया है:
प) सामाजिक विघटन
पप) विचलनकारी व्यवहार।
सभी सामाजिक समस्याओं में विघटन तथा विचलन के कुछ तत्व पाए जाते हैं।
प) सामाजिक विघटन
मर्टन के मतानुसार सामाजिक विघटन दो स्थितियों को दर्शाता है:
ऽ सामाजिक प्रणाली में अपर्याप्तता,
ऽ परिस्थिति और भूमिका की निष्प्रभावी कार्यप्रणाली।

सामाजिक विघटन के निश्चित स्रोत होते हैं। सभी समाजों में मूल्यों और हितों पर कुछ सहमति पायी जाती है। जब कभी भी इस सहमति की मात्रा में संघर्षशील हितों से अव्यवस्था आती है तब हम उस विशेष समाज में विघटन की प्रवृत्ति पाते हैं। इसी प्रकार की अवस्था परिस्थिति और भूमिका में भी पायी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति की अनेक परिस्थितियाँ होती हैं जैसे – पिता, पति, राजनीतिक दल का सदस्य, व्यवसायी, अपने व्यावसायिक संगठन का सदस्य, आदि। वह अपनी भूमिकाएँ तदनुसार निभाता है। सामाजिक जीवन में वह भूमिकाओं की प्राथमिकताओं को निर्धारित करता है और तद्नुसार व्यवहार करता है। लेकिन यदि विभिन्न परिस्थितियों और भूमिकाओं के बीच संघर्ष है और लोगों का एक समूह इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी प्राथमिकताओं को निर्धारित कर सके या संघर्षरत भूमिकाओं में पुनर्मेल स्थापित कर सके तो वह समह सामाजिक विघटन की तरफ अग्रसर होने को बाध होता है। समाजीकरण की प्रक्रिया लोगों को समूह की भाषा, प्रथाओं, परंपराओं, संस्कृति और मूल्यों को सीखने में सहायता प्रदान करती है। यदि समाजीकरण की प्रक्रिया परिवार, विद्यालय या स्वजन-समूहों के स्तर पर दोषपूर्ण होती है तो वह समूह के सदस्यों के व्यक्तियों तथा स्वयं समूह के संगठित कार्यकलापों को प्रतिकूल ढंग से प्रभावित करती है। समाज अपने सदस्यों के व्यवहारों को नियमित करने के लिए सामाजिक नियंत्रण की औपचारिक तथा अनौपचारिक कार्यप्रणाली विकसित कर लेता है। जब कभी भी यह कार्यप्रणाली प्रभावी ढंग से कार्य नहीं करती तब समाज में विघटन की प्रवृत्ति दृष्टिगत होती है।

सामाजिक विघटन, प्रभावकारी संस्थाओं के कार्यकलापों का असफल होना, पारिवारिक विघटन, विवाह विच्छेद, निर्धनता, सामूहिक हिंसा, जनसंख्या विस्फोट, सामुदायिक विघटन और नगरीय समस्याओं जैसे गंदी बस्तियों तथा अमानवीय जीवन दशाओं में प्रकट होता है।

पप) विचलनकारी व्यवहार
विचलित व्यवहार की अवधारणा का प्रयोग समाजशास्त्रियों द्वारा गंभीर अपराधों के साथ ही आचार संहिताओं के उल्लंघन को सम्मिलित करने हेतु किया जाता है। प्रत्येक समाज में साधारण व्यहवार के प्रायः स्वीकृत विचार होते हैं। जब कभी भी कोई इन स्वीकृत प्रतिमानों से अलग हटता है और भिन्न प्रकार से व्यवहार करता है तो उसका यह व्यवहार असामान्य या विचलनकारी व्यवहार माना जाता है।

अपराध, बाल अपराध, मानसिक अस्वस्थता, मादक द्रव्य व्यसन और मद्यपान विचलनकारी व्यवहार के कुछ उदाहरण हैं।

कोष्ठक 1.3
सामाजिक व्याधिका
सामाजिक व्याधिकी समाजशास्त्र का एक उपखंड है जो अवधारणात्मक रूप से चिकित्साशास्त्र में अपनाया गया है। समाजशास्त्रीय साहित्य में सामाजिक विघटन और सामाजिक समस्याओं के शीर्षक से बहुत सी पुस्तकें लिखी गई हैं। समाजशास्त्र का वह उपखंड जो इन समस्याओं से संबंधित होता है उसे प्रायः सामाजिक समस्या या विचलन का समाजशास्त्र कहा जाता है। कुछ समाजशास्त्री जो संकट के पक्ष पर जोर देते हैं इस उपखंड को सामाजिक व्याधिकी कहना पसंद करते हैं।

 सामाजिक समस्याएँ और सामाजिक आंदोलन
सामाजिक समस्याएँ विभिन्न परिस्थितियों के अंतर्गत पुरानी घिसी-पिटी संस्थाओं के प्रतिफल हैं। उदाहरण के लिए, आज भी विश्व के बहुत से देशों में, एक संस्था के रूप में राजशाही, लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के विरुद्ध दमनकारी उपायों के लिए उत्तरदायी हैं। इसी प्रकार से, भारत में अस्पृश्यता की समस्या जाति प्रथा से जुड़ी हुई है। हमारे समाज में, तय किए गए विवाहों की व्यवस्था ही मूलतः दहेज एवं दहेज से होने वाली मौतों का कारण है। संस्थागत स्थितियों को छोड़कर, कभी-कभी विकास के कार्यक्रमों से भी सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। वनों की कटाई का कारण निर्माण कार्यों, रेलमार्ग, फर्नीचर और ईंधन के लिए व्यापक मात्रा में इमारती लकड़ियों की आवश्यकता ही है। औद्योगिकीकरण और कारखाना प्रणाली के विस्तार ने ही वायु जल और पृथ्वी को प्रदूषित किया है। बड़े बांधों, ऊर्जा परियोजनाओं, राजमार्गों इत्यादि के निर्माण से स्थानीय लोगों का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है।

इसके अतिरिक्त सामाजिक समस्याएँ सामाजिक आदर्शों और वास्तविक व्यवहार के मध्य के अंतराल का भी परिणाम हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध बहुत-सी बातें तथा मूल्य आधारित राजनीति के लिए नारे, समाचार पत्रों, नेताओं और बुद्धिजीवियों इन सभी ने सामाजिक समस्याओं के विरुद्ध सामाजिक समस्याओं के विरुद्ध सामाजिक आंदोलनों के लिए स्थिति पैदा की है। फिर भी हमारे समाज में सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार तथा राजनीति के अपराधीकरण में वृद्धि ही हुई है। जैसा कि जे.आर. फेयगिन ने उल्लेख किया है कि जनता द्वारा सामाजिक समस्याओं और सामाजिक परिवर्तन के विरुद्ध विरोध-प्रदर्शन और आंदोलनों का संगठन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 क्रियान्वयन में अवरोध
सामाजिक समस्याओं के विरुद्ध आंदोलनों को आयोजित करना सरल कार्य नहीं है। बहुत से ऐसे निहित स्वार्थ समूह होते हैं। जो चाहते हैं कि यथास्थिति निरंतर बनी रहे। वनों के ठेकेदार पेड़ों को काटे जाने संबंधी रोक का विरोध करेंगे। शराब की दुकान के मालिक मद्य निषेध का कभी भी पक्ष नहीं लेंगे। एक समय पश्चात् आंदोलन, सरकार तथा अन्य संस्थाओं को परिस्थितियों को मान्यता देने एवं दावों की वैधानिकता को मनवाने में समर्थ होते हैं। इसके परिणामस्वरूप सरकार द्वारा इस प्रकार की नीतियाँ बनाई जाती हैं जो परिस्थिति के अनुसार कार्य करें, यथा वनों की कटाई के विरुद्ध नियम, स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए बहुत से कानून (समान वेतन, दहेज विरोधी कानून, सती प्रथा, उत्तराधिकारी संबंधी आदि) नीतियों का बनना ही स्वयं में पर्याप्त नहीं है इसे क्रियान्वित करना होता है। प्रायः इसमें विलम्ब या अपर्याप्त प्रयास होता है। तब आंदोलन को नीतियों के क्रियान्वयन पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता है। कई बार समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होता है। सामाजिक आंदोलन दर्शाते हैं कि लोगों के सामूहिक प्रयत्न अधिकारियों को क्रियाशील बना देते हैं।

आंदोलन के सोपान
किसी समाज में अक्सर पुरानी संस्थात्मक स्थितियों, दोषपूर्ण कार्यक्रम तथा आदर्शों और आचरणों में बढ़ते अंतर को या तो अधिकांश शक्तिप्रिय लोगों द्वारा अनुभव नहीं किया जाता है या उस पर ध्यान नहीं दिया जाता है। कुछ लोग इस योग्य होते हैं कि इन समस्याओं पर ध्यान दें। प्रथम सोपान पर, सामाजिक समस्याओं के प्रति, कुछ लोगों की या एक छोटे समूह की जागरूकता होती है, द्वितीय सोपान पर, वे अपने दृष्टिकोण को लोगों के बीच प्रचारित करने की चेष्टा करते हैं, तृतीय सोपान पर, संगठित रूप से असहमति, विरोध तथा प्रदर्शन होता है और अंत में यह एक आंदोलन के निर्माण की ओर अग्रसर होता है। यदि हम सती प्रथा का उदाहरण लें जो भारत में 19वीं शताब्दी में प्रचलित थी और राजा राममोहन राय ने जिसके विरुद्ध आंदोलन प्रारंभ किया था जो हम पाते हैं कि सती प्रथा के विरुद्ध आंदोलन उन सभी दिशाओं से होकर गुजरा है जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। आजकल, सम्पूर्ण विश्व में और मुख्य रूप से भारत में महिलाओं के हितों तथा अधिकारों की रक्षा हेतु एक शक्तिशाली महिला आंदोलन चल रहा है। भारतीय महिलाओं के संगठन, प्रबुद्ध नागरिकों और जनसंचार के माध्यमों के साथ, दहेज तथा दहेज से होने वाली मौतों के विरुद्ध संघर्षरत हैं। इसी प्रकार पर्यावरणविदों को पारिस्थितिकी अपकर्ष और प्रदूषण के विरुद्ध आंदोलन है। उत्तर प्रदेश के पर्वतीय भाग में प्रारंभ किए गए ‘‘चिपको आंदोलन‘‘ ने जो वनों की कटाई के विरुद्ध है, विश्वव्यापी ध्यान आकर्षित किया है। स्वयंसेवी संगठनों और अधिकारियों द्वारा मादक द्रव्य-व्यसन तथा मद्यपान के विरुद्ध जागरूकता पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है।

सामाजिक समस्याओं के सुधारवादी उपायों तथा सामाजिक आंदोलन के बीच एक निकट का संबंध पाया जाता है। सामाजिक आंदोलन तब उत्पन्न होता है जब कुछ लोग यह अनुभव करते हैं कि एक विशेष परिस्थिति समाज के लिए लाभप्रद नहीं है और उसे परिवर्तित करने के लिए कुछ किया जाना चाहिए।