धर्म का सामाजिक महत्व बताइए | समाज और धर्म महत्व क्या है religion importance in society in hindi

By   February 7, 2021

क्या धर्म हमारी रोजमर्रा के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है व्याख्या करें religion importance in society in hindi धर्म का सामाजिक महत्व बताइए | समाज और धर्म महत्व क्या है ?

धर्म का अर्थ (Meaning of Religion)
इस बारे में हम सभी के अपने-अपने सवाल हैं कि जीवन का अर्थ क्या है, संसार में हमारा स्थान क्या है और क्या ऐसी कोई दिव्य शक्ति है जो हमारे जीवन में घटने वाली घटनाओं को नियंत्रित करती है, और जिससे हम अपने कर्मों के लिए मार्गदर्शन चाहते हैं। इस तरह के सवालों का जवाब देने के सिलसिले में जिन विभिन्न विश्वास या मतों और रीतियों का जन्म होता है वे विभिन्न रूप धारण कर लेती हैं। (देखिए खंड 1, ई.एस.ओ. 15)। इस तरह, कुछ लोग तो अदृश्य शक्ति में विश्वास करने लगते है और कुछ पेड़ों और पशुओं को पवित्र मानते हैं। इस बुनियादी सवाल का जवाब देने का प्रयास करने वाले विश्वास और रीतियां अनिश्चितता की स्थितियों में सांत्वना की स्रोत होती हैं। और यह सामाजिक व्यवस्था का आधार होता है। मिलजुल कर माने जाने वाले इन्हीं विश्वासों और रीतियों के तंत्र को धर्म कहते हैं। इस तरह धर्म को किसी पवित्र सत्ता पर ध्यान केंद्रित करने वाले सहभाजित और स्थिर विश्वासों, प्रतीकों और संस्कारों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है । (कौंकलिन 1984: 296)। हमारी परिभाषा इस बात पर भी जोर देती है कि धर्म सहभाजित होता है, अर्थात किसी धर्म को मानने वाले मिलजुल कर उस में अपना विश्वास व्यक्त करते हैं। इस तरह, किसी एक व्यक्ति की विश्वास पद्धति या किसी एक व्यक्ति के जीवन दर्शन को धर्म नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसमें दूसरों की सहभागिता नहीं होती। और अंत में धर्म किसी पवित्र सत्ता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है। इमाइल दुर्खाइम ने इस पवित्र सत्ता को एक ऐसी आदर्श और दैवीय सत्ता के रूप में परिभाषित किया है जो दैनिक जीवन से अलग है। दिव्य शक्ति के रूप में यह पवित्र सत्ता पशुओं या मनुष्यों में, प्राकृतिक या कृत्रिम वस्तुओं में वास कर सकती है। विभिन्न धर्मों में पवित्र सत्ता के प्रति अलग-अलग विश्वास होता है।

 धर्म का सामाजिक महत्व (Social Significance of Religion)
समाजशास्त्र के विद्यार्थी होने के नाते हमारा उद्देश्य विश्वास पद्धति के सही या गलत होने का पता लगाना नहीं है। हमारा ध्येय तो धर्म के सामाजिक महत्व और विभिन्न संस्थाओं के साथ इसके संबंध को समझना है। समाजशास्त्री धर्म को एक ऐसी संस्था के रूप में लेते हैं जो समाज का निर्माण करने वाली संस्थाओं के जटिल तंत्र का एक अंग है। धर्म का एक महत्वपूर्ण परिणाम विश्वासियों के बीच संबंध को मजबूत बनाना है। कुछ आलोचकों का मानना है कि कभी-कभी धर्म पवित्र सत्ता से संबंधित विश्वास और रीतियों के स्रोत से अधि कि सामाजिक पहचान के स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण हो जाता है। अनेक लोग अपने विश्वास के कारण नहीं बल्कि समाज में स्थान पाने के उद्देश्य से धर्म में हिस्सा लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप, अक्सर यह देखने को मिलता है कि गिरजाघर, मंदिर, मस्जिद और यहूदी उपासनाघर सामाजिक केंद्र का रूप ले लेते हैं। धर्म ही वह बिंदु है जहाँ विभिन्न समूह एकजुट हो कर किसी उद्देश्य के लिए लाभान्वित होते हैं।

एक ही समाज में कई धर्म होने से उनमें टकराव भी हो सकता है। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य जाति के इतिहास में धार्मिक समूहों का कितना दमन हुआ है। धर्म के नाम पर लड़ी गई लड़ाइयों ने पूरब और पश्चिम दोनों को नष्ट किया है। हाँ, अक्सर अर्थ और राजनीति भी लड़ाइयों के प्रमुख कारण रहे हैं। ईसाइयों ने मुसलमानों से लड़ाई लड़ी तो कैथोलिक अनुयायियों ने प्रोटेस्टैंट संप्रदाय के लोगों से लड़ाई लड़ी। भारत में ही हमने मुसलमानों और हिंदुओं में विभाजन के समय हुए झगड़ों में लाखों को शरणार्थी होते देखा है। मध्य पूर्व में वर्षों से यहूदियों और अरबों ने खूनी लड़ाइयाँ लड़ी हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये लड़ाइयाँ जितनी राजनीतिक थी उतनी ही धार्मिक भी थीं। जैसे कि हम देखते है, धर्म अक्सर अभिव्यक्ति का वाहक और पहचान का रूप होता है। जिसे आधार बना कर कोई समूह अपने लिए और अधिक सत्ता जुटाने या और किसी ऐसे ही उद्देश्य के लिए एकजुट होता है। राजनीति का बुनियादी अर्थ यह होता है कि किन्हीं विशिष्ट ध्येयों की प्राप्ति के लिए सत्ता का वितरण कहाँ और कैसे होता है। जिन समाजों में (भिन्न उद्देश्यों या ध्येयों वाले भिन्न-भिन्न समूह होते हैं वहाँ झगड़े अनिवार्य होते हैं। उनमें से प्रत्येक समूह तब अपनी एक पहचान बनाता है जिन की मदद से वह अपने उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास करता है। उनमें एक धार्मिक पहचान भी होती है। धर्म और राजनीति के बीच के इस अंतःसंबंध का विश्लेषण करने से पहले, हमारे लिए राजनीति का अर्थ समझ लेना उपयोगी रहेगा।

बोध प्रश्न 1
प) धर्म के सामाजिक महत्व को पाँच पंक्तियों में व्यक्त कीजिए।
पप) राजनीति और राजनीतिक प्रक्रिया के तीन परिप्रेक्ष्यों के नाम बताइए?
पपप) राजनीति को समझने का वितरणकारी दृष्टिकोण ………………………के लेखन से जुड़ा है।

बोध प्रश्न 1 उत्तर
प) धर्म विश्वासों और व्यवहारों का समूह होता है जिसमें लोगों के समुदाय की भागीदारी होती है जिसे जीवन और मृत्यु आदि के समय में प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। धर्म स्थायी रूप से अलौकिक शक्ति से जुड़ा होता है जो हमेशा दैनिक जीवन से अलग होता है। दरर्वाइम इसे पवित्र मानते हैं। धर्म व्यक्तिगत और उसी तरह से समुदाय के लिए भी सामाजिक महत्व रखता है, यह अनिश्चितता के समय राहत का स्रोत है। यह दैनिक व्यवहार के लिए जीवन में नैतिक और अचार संहिता के मानदंडों का निर्धारण करता है। अतः यह समूह को पहचान देता है।
पप) राजनीति और राजनीतिक प्रक्रिया पर ये तीन परिप्रेक्ष्य हैं: क) समाकलनात्मक दृष्टिकोण, ख) वितरणात्मक दृष्टिकोण, और ग) व्यवहारात्मक दृष्टिकोण ।
पपप) राजनीतिक विवरणात्मक दृष्टिकोण की समझ हारोल्ड डी. लासवंल के लेखन के साथ जुड़ी है।

उद्देश्य
इस इकाई को पढ़ने के बाद, आप,
ऽ धर्म और राजनीति का अर्थ समझ सकेंगे,
ऽ यह जान सकेंगे कि धर्म निरपेक्ष राज्य का उदय किस प्रकार हुआ,
ऽ राजनीति की प्रकृति का वर्णन और विश्लेषण कर सकेंगे, और
ऽ धर्म और राजनीति के बीच के संबंध को प्रभावित करने वाले कारकों पर चर्चा कर सकेंगे।

प्रस्तावना
इससे पहली इकाई में हमने धर्म और अर्थव्यवस्था के अंतःसंबंधों पर चर्चा की।
इस इकाई में हम धर्म और राजनीति/राज्य के बीच के संबंध की चर्चा करेंगे।

इस अंतःसंबंध को स्पष्ट करने के लिए हम पहले आप को धर्म और राजनीति का अर्थ बताएंगे। फिर हम राज्य की अवधारणा और धर्म निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया की चर्चा करेंगे जिसने मौजूदा भारत की प्रकृति को आकार दिया ।

इसके बाद हम राजनीति की प्रकृति और धर्म और राजनीति के बीच के संबंध को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की चर्चा करेंगे।

धर्म और राजनीति का अर्थ (Understanding Religion and Politics)
इस भाग में हम धर्म और राजनीति के अर्थ को समझने का प्रयास करेंगे। इस प्रक्रिया में यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि धर्म और राजनीति केवल धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं।

समूह की पहचान करने में, धर्म एक प्रभावशाली शक्ति है। ये समूह किसी भी राजनीतिक प्रक्रिया के अभिन्न अंग हैं।

सारांश
इस इकाई की शुरुआत हमने धर्म और राजनीति के बढ़ते अंतःसंबंध पर चर्चा के साथ की। इस समस्या को समझने के लिए हमने धर्म और राजनीति पर विस्तार से चर्चा की है। हमने यह भी चर्चा की कि किस प्रकार राजनीतिक प्राधिकरण और धार्मिक प्राधिकरण के बीच सत्ता के लिए होने वाले टकराव से धर्मनिरेपक्ष राज्य का उदय हुआ । इस इकाई में हमने राजनीति की प्रक्रिया का भी अध्ययन किया जिसमें विभिन्न समूहों के बीच सत्ता का संघर्ष अनिवार्य रूप से समाहित है। धर्म समूह निर्माण के लिए भी महत्वपूर्ण आधार तैयार करता है, और यह भी राजनीति को प्रभावित करने वाला एक कारक है।

अंत में, इस इकाई में हमने उन कुछ कारकों पर भी चर्चा की जो धर्म और राजनीति के संबंध को निश्चित आकार देने के लिए जिम्मेदार हैं।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें (Further Readings)
कौंकलिन जॉन ई. 1985, इंट्रोडक्शन टू सोशियालॉजी, मैंकमिलन: न्यूयार्क
एस.एन.झा एंड रशीदुद्दीन खां (संपादक गण), 1989, द स्टेट, पॉलिटिकलन प्रोसेस एंड आइडेंडिटी: रिफ्लेक्शनस् ऑन मॉडर्न इंडिया, सेज: नई दिल्ली।
अल्फोर्ड, आर.आर. 1963, पार्टी एंड सोसाइटी, रैंड मैकनेली।