ओझा किसे कहते हैं | ओझा कौन होते है क्या है परिभाषित करो Shaman in hindi meaning definition

By   February 10, 2021

Shaman in hindi meaning definition ओझा किसे कहते हैं | ओझा कौन होते है क्या है परिभाषित करो ?

ओझा (The Shaman)
पुजारी की भूमिका व कार्य का विस्तार से विश्लेषण करने के बाद अब हम ‘ओझा‘ के बारे में एक विशेषज्ञ के रूप में जानने का प्रयास करते हैं। पिछले अनुभागों में हम निरंतर समाज द्वारा धार्मिक अनुष्ठानों से फल प्राप्ति न होने की दशा में बहुधा चमत्कारी व जादू-टोने की कृत्यों की मदद लेने की आवश्यकता अनुभव करने के बारे में बताते रहे हैं। हमने यह भी चर्चा की है कि किस प्रकार बहुधा एक ही व्यक्ति द्वारा पुजारी तथा जादू-टोने करने वाले के रूप में कार्य किया जाता रहा है।

जहाँ तक ‘ओझा‘ को विशेषज्ञ के रूप में जानने का संबंध है (अनुभाग 13.4.6) में हमने उसकी भूमिका को जन-जाति के संदर्भ तक सीमित कर दिया है क्योंकि वहीं वह अधिकतर अपना कार्य करता दिखाई देता है। इस अनुभाग में हम ओझा तथा उसकी सामाजिक भूमिका की व्याख्या का प्रयास करेंगे।

 जादूगर के संबंध में वेबर के विचार (Weber on the Magician)
यदि हम धार्मिक विशेषज्ञों के बारे में वेबर के कार्य का अवलोकन करें तो हमें कहीं भी ओझा का उल्लेख नहीं मिलता, तथापि उसने जादूगर (जादू टोने करने वाला) के संबंध में बात अवश्य की है। हम संक्षेप में विश्लेषण करेंगे कि वह जादूगर के बारे में क्या कहता है क्योंकि ओझा की क्रियाएं मुख्यतः जादुई कारनामों पर आधारित हैं।

वेबर का विश्वास है कि मानव तथा ईश्वर के बीच का संबंध केवल पुजारी की मदद से की गई धार्मिक पुजा के द्वारा ही नहीं वरन जादुई मंत्रों तथा टोने-टोटकों द्वारा भी व्यक्त किया जा सकता है। वेबर इस ओर भी इशारा करता है कि पूजा तथा त्याग का आधार भी जादू अथवा टोना-टोटका ही है। ऐसे त्याग को इसके करने वाले के द्वारा ईश्वर को उसकी व्यक्गित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक प्रकार से बाध्य करने की पद्धति के रूप में देखा जाता है। इसे ईश्वर के क्रोध को किसी अन्य पदार्थ की ओर मोड़ देने की क्रिया के रूप में भी देखा जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि ब्राह्मणों के त्याग-तपस्या पूर्ण कृत्य, अपने दृढ़संकल्प तथा प्रक्रिया में जादू का पुट लिये हुए थे। वेबर के अनुसार जादूगर अहितकारी दैवीय शक्तियों से व्यक्तिगत स्तर पर जूझने वाला व्यक्ति है। उसके प्रयत्न अच्छे व बुरे दोनों प्रकार का परिणाम लिये हुए हो सकते हैं। प्रायः जादूगर स्वतः यह कार्य करने वाला होता है यद्यपि वह किसी संबंधित वंश अथवा संगठित समूह का सदस्य भी हो सकता है। ज्ञान के किसी विशेष सिद्धांत के प्रयोग के स्थान पर जादूगर अपना प्रभाव व्यक्तिगत गुणों तथा पारलौकिक शक्ति के बारे में अपने ज्ञान से प्राप्त करता है। जादूगर का अपने समाज में शक्तिशाली प्रभुत्व होता है तथा उसमें आस्था की बजाए, उससे डर की वजह से वह अधिक सम्मान प्राप्त करता है। कोई आवश्यक नहीं कि पुजारी की तरह उसके भी अनुयायी अथवा शिष्य हों।

कार्यकलाप 2
विविध स्थानों का भ्रमण करने वाले किसी जादूगर से बात कीजिए और उससे पूछिए कि अपने काम के बारे में, वह कैसा अनुभव करता है। इस बातचीत की मुख्य बातों को नोट कीजिए और अपने अध्ययन केंद्र के अन्य विद्यार्थियों से इन विचारों का आदान-प्रदान कीजिए।

 ओझा: एक सामान्य सर्वेक्षण (The Shaman : A General Overview)
हमने पहले विशेषज्ञ के रूप में जादूगर की विशिष्टताओं की रूपरेखा खींची है। जहाँ तक ओझा का संबंध है उसमें यह सभी तथा साथ में कुछ और विशिष्टताएं भी मिलती हैं। वह हितकारी तथा अहितकारी दोनों तरह के उद्देश्यों के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करने में प्रशिक्षित होता है। सामान्यतः शिक्षा-पूर्व समाज में मौजूद ओझा व उसके मिलते जुलते रूप को आधुनिक समाज में भी पाया जा सकता है। उदाहरण के लिए ओझा इन कार्यों को करता पाया जा सकता है। बीमारी के निवारण के लिए जादू अथवा टोने-टोटके का प्रयोग, किसी को अपने नियंत्रण/अधिकार में अथवा प्राकृतिक शक्तियों को अपने मंतव्य के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य करना, दूसरे शब्दों में उसकी यह बहुपक्षीय भूमिका उसे समाज में उसका पद तथा सम्मान दिलाती है। अधिकतर जनजातीय समाजों में ओझा एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वास्तव में ओझावाद मूल रूप से एक जनजातीय परंपरा अथवा धर्म है।

एक समय में भय तथा गलतफहमी पैदा करने वाले ओझा को हम आज सरल समाज में अपनी योग्यताओं का सामाजिक व राजनीतिक पहलुओं में उपयोग करते हैं। लंबे समय तक, नृविज्ञान साहित्य में उसी मार्ग से हर व्यक्ति की नकारात्मक पहचान बनी रही है। तथापि बाद के वर्षों में उसकी मनोवैज्ञानिक की भूमिका के महत्व को पहचाना गया। वास्तव में फ्रांसीसी तंत्रवेता कलॉद लेवी स्ट्रास द्वारा इस ओर ध्यान दिलाया गया है कि ओझा रोगियों के लिए एक ऐसी भाषा का प्रावधान करता है जिसकी मदद से वे अपनी स्थिति को व्यक्त कर पाते हैं तथा जिसे व्यक्त करना सामान्यतः उनके लिए संभव नहीं होता।

 ओझा के कार्य व भूमिका (The Functions and Role of a Shaman)
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, ओझावाद एक मूल जनजातीय धर्म है। शमन शब्द की उत्पत्ति उत्तर-पूर्व एशिया में हुई तथा इसका उद्भव तंगस शब्द समन से हुआ जिसका अर्थ है- “उत्तेजित, प्रेरित तथा उन्नत‘‘। हम पाते हैं कि ओझा को प्रायः चिकित्सक के रूप में देखा जाता है जो चमत्कारी शक्तियों तथा जादू-टोने की पद्धति को अपने साधन के रूप में प्रयोग करता है। वह अपनी शक्तियां दैवीय शक्ति से अपने संबंध के द्वारा प्राप्त करता है तथा ऐसा विश्वास किया जाता है कि उसके उद्देश्यों की पूर्ति में कोई माध्यम अथवा भूत-प्रेत उसकी मदद करते हैं। अधिकतर ओझा की फल प्राप्त करने की योग्यता की मांग रहती है कि उसकी मानसिक स्थिति पूरी तरह से बदल जाये तथा वह या तो अचैत्य अवस्था में चला जाता है अथवा उत्तेजना की अनियंत्रित स्थिति में जिसके परिणामस्वरूप वह पारलौकिक शक्ति से संवाद कर सकता है।

अलग-अलग जनजातियों से संबंधित ओझा अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अलग-अलग साधनों अथवा विधियों का प्रयोग करते हैं। तथापि कुछ निश्चित तत्व उनमें समान रूप से पाये जाते हैं जो कि निम्नलिखित हैं:
क) या तो उसका कार्यपद वंश के कारण उसे मिलता है अथवा उसका व्यक्तित्व उसे यह कार्य चुनने में मदद करता है।
ख) ओझा की एक विशिष्ट मानसिक स्थिति होती है अथवा उसमें कोई शारीरिक कमी भी हो सकती हैं जिसके कारण वह उन्मादी/विकृत छवि का अथवा अपस्मारिक लगता है।
ग) ऊपर वर्णित असामान्य विशेषताएं उसकी भूमिका के आधार में पाई जाती हैं।
घ) उसका बुजुर्ग ओझा की देख-रेख में प्रशिक्षण हो सकता है तथा वह एक विशिष्ट अजीबोगरीब व्यक्तित्व धारण कर सकता है।

बॉक्स 2
सिबेरियन ओझा के जन-सामान्य के सामने किये जाने वाले दीक्षा समारोहों में बुरिटा जाति के समारोह विशेष ध्यान आकर्षित करने वाले हैं। मुख्य रीति में एक टहनीदार पेड़ पर चढ़ाई शामिल है। एक मजबूत टहनीदार पेड़ ओझा के शमियाने में स्थापित किया जाता है जिसकी जड़े स्वर्ग में होती हैं तथा जिसका शिखर धुएं की चिमनी से बाहर निकलता है। इस टहनीदार पेड़ को उदेसी बुरखन (न्कमेप इनताींद) कहा जाता है जिसका अभिप्राय है-द्वार रक्षक क्योंकि यह ओझा के लिए स्वर्ग का द्वार खोलता है। यह पेड़ सदैव ओझा के शमियाने में उसके निवास स्थान की विशिष्ट पहचान बनाते हुए लगा रहा है। अभी तक सुरक्षित इस पारंपरिक समारोह के दिन प्रत्याशी पेड़ के शिखर पर हाथ में तलवार लिए हुए चढ़ता है। चिमनी से बाहर निकलते हुए धुंए से वह ईश्वर को मदद के लिए पुकारता है। तत्पश्चात शिक्षक ओझा तथा नौसिखिया तथा मौजूद समस्त जनसमूह एक सम्मिलित-यात्रा के रूप में गांव से दूर एक स्थान तक जाते हैं। जहाँ भूमि पर अनेक टहनीदार पेड़ सीधे तने हुए खड़े किये होते हैं। यात्रा समूह एक विशेष टहनी पेड़ के पास रूकता है, बकरे की बलि चढ़ाई जाती है तथा प्रत्याशी को कमर तक नंगा कर, उसके सिर, आंखों व कानों पर रक्त लगाया जाता है जबकि अन्य ओझा अपने ढोल बजाते रहते हैं। इसके पश्चात प्रत्याशी उस पेड़ पर चढ़ता है तथा उसके पीछे अन्य ओझा चढ़ते हैं। पेड़ पर अपनी चढ़ाई के दौरान वे सभी गिरते हैं अथवा परमानंदमय हो गिर जाने का नाटक करते हैं। वहाँ उस पेड़ अथवा डंडे को ऐसे पेड़ अथवा डंडे के रूप में माना जाता है जो विश्व के केंद्र में खड़ा है तथा जो ब्राह्मांड के तीन लोकों-पृथ्वी, स्वर्ग तथा नरक को एक दूसरे में जोड़ता है।

जहाँ तक ओझा के कार्यों का संबंध है यह विश्वास किया जाता है कि ओझा पुजारी, पैगम्बर तथा जादूगर तीनों का कार्य अकेले ही करता है। वह जादुई कृत्यों को करने के लिए जाना जाता है तथा बलिदान व तप को दैवीय शक्ति प्राप्त करने के रास्ते पर केंद्रीय रूप में प्रयोग करता है। वह देवताओं के प्रति अनुष्ठान व बलिदान आदि की रीतियों को भी पूरा करता है।

अंततः डर तथा शक्तियों के कारण ओझा एक चमत्कारी व्यक्तित्व का पद तथा पैगम्बर जैसे गुण प्राप्त कर लेता है। वह आभूषणों को धारण करता है, लम्बे तथा उलझे हुए बाल रखता है, अपने शरीर को राख इत्यादि से रंग लेता है तथा संगीत वाद्य अथवा हड्डियों को पहने रहता है। ऐसे व्यक्तित्व तथा गुणों के कारण वह उन्मादी तथा चतुर व्यक्ति की साख अर्जित करता है।

 संगठन (Organisation)
जहाँ तक ओझाओं के संगठन तंत्र का संबंध है यह पुजारियों के समान स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है। तथापि समाज के अंदर उसकी व्यक्तिगत शक्तियों तथा क्षमताओं पर उसके नियंत्रण की सीमा के आधार पर उसे विशिष्ट पदवी प्राप्त होती है। उनके वर्गीकरण का एक अन्य आधार उनके द्वारा किये जाने वाले कृत्यों की दिशा है। सुकृत्य-(सफेद जादू) जिसमें मानव के हित के लिए क्रियाएं की जाती हैं तथा बुरे कृत्य-(काला जादू) जिसमें मानव के हित के लिए क्रियाएं की जाती हैं। इसी गुण के आधार पर लोगों के मन में उनके प्रति डर की मात्रा निर्धारित होती है तथा उनका ऊंचा व नीचा पद भी। ओझा किसी संस्थान में विधिवत दीक्षा प्राप्त नहीं करता जैसे कि पुजारी/पादरी प्राप्त करता है तथा न ही उसके मुख्य कार्यों में उससे दक्ष होने की अपेक्षा की जाती है।

पुजारी वर्ग से भिन्न, ओझा वर्ग में महिलाओं को भी सम्मिलित किया जाता है। महिला ओझा प्रायः भूत प्रेतों से संबधित व जादू-टोने के कार्य से जुड़ी होती हैं। उन्हें ओझन के नाम से पुकारा जाता है।

ओझा को इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि उसका अंतिम संस्कार भी अलग व विशिष्ट प्रकार से किया जाता है। बहुधा जहाँ ओझा को दफनाया जाता है उसे एक पवित्र स्थान के रूप में निर्मित किया जाता है, जिसमें प्रवेश सीमित होता है। मृत ओझा का शरीर कभी-कभी पंथ का प्रतीक भी बन सकता है। तिब्बत, नेपाल, अमेरिका के रेड इंडियन तथा कुछ दक्षिण एशिया क्षेत्रों की जनजातियों में ओझा की महत्वपूर्ण भूमिका पाई जाती है। भारत के संदर्भ में हम पाते हैं कि उनकी कुछ जनजातीय समूहों में महत्वपूर्ण भूमिका है। अपने अगले अनुभाग में हम इसे एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करेंगे।

ओराँव ओझा: एक उदाहरण (An Example : The Oraon Shaman)
जैसा कि हमने पहले वर्णित किया है ओझा जनजाति जीवन तथा चिकित्सा के निकट रूप से जुड़ा है। यहाँ हम एक जनजाति का उदाहरण लेते हैं जहाँ ओझा अत्यंत महत्व रखता है। हम यहाँ एक द्रविड़ जनजाति ओराँव का संदर्भ ले रहे हैं जो पूर्व भारत के छोटा नागपुर भू-भाग में पाई जाती है। इस जाति में तथा अन्य जातियों में सामान्य रूप से ओझा का अध ययन सर्वप्रथम भारतीय सामाजिक नृविज्ञानी एस.सी. राय द्वारा सन 1929 में किया गया था। ओराँव, पहाड़ी तथा वन-प्रांतीय भाग में रहते हैं। वे कृषि का कार्य करते हैं जिनमें महिलाएं भी समान रूप से भाग लेती हैं। उनका जीवन विविध त्योहारों से रंगा है तथा उनके ग्राम-देवता के लिए वे अत्यंत पवित्र व आदर पूर्ण स्थान रखते हैं। ओराँव लोगों के जीवन में ‘भगत‘ (ओझा) का महत्वपूर्ण स्थान है। उसके घर की अलग से पहचान होती है-उसके घर के बाहर लंगे बांस के डंडों पर रंगीन झंडे होते हैं। ये डंडे उन देवी-देवताओं का प्रतीक हैं जिनकी पूजां ‘भगत‘ द्वारा की जाती हैं इनमें उस विशिष्ट देवता का भी झंडा शामिल होता है जो समाधि के दौरान ओझा में प्रवेश कर जाता है तथा कष्ट-निवारण व अन्य कृत्यों में उसकी मदद करता है। ‘भगत‘ का पद वंशगत है तथा परिवार में प्रायः एक बेटे अथवा बेटी को अगली पीढ़ी में यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है। कोई भी ओराँव तभी ओझा (भगत) बन सकता है अगर उसमें विशेष गुण पाये जाएं जिनकी मान्यता उस व्यक्ति के द्वारा की जाती है, जिसकी देख-रेख में वह शिक्षा प्राप्त करता है। ‘भगत‘ का जीवन खान-पान के संबंध में संयमी व कड़ा है तथा ओझा-शिक्षा के निश्चित नियमों व संहिताओं द्वारा संचालित होता है।

ओराँव ‘भगत‘ आवश्यक नहीं कि वंशगत परंपरा के आधार पर ही बने । वह दैवीय शक्ति द्वारा भी चुना जा सकता है जिस प्रक्रिया में दैवीय शक्ति द्वारा स्वयं अथवा काया-प्रवेश के द्वारा व्यक्ति विशेष को यह आदेश दिया जाता है कि वह किस प्रकार ओझा बनने के लिए ज्ञान व शिक्षा के मार्ग पर जायें ।

भगत बहुधा उन बीमारियों का इलाज करता है जो किसी पारलौकिक शक्ति द्वारा किसी पर नियंत्रण कर लेने के कारण उत्पन्न होती हैं। अथवा वह उन बीमारियों अथवा पागलपन का इलाज करता है जो मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती हैं। इलाज एक कष्ट-निवारण छूने अथवा झाड़ फूंक के द्वारा हो सकता है जिसे ‘इहर फोक‘ के नाम से जाना जाता है। इन रीतियों का प्रकार व सीमा पागलपन अथवा बीमारी की सीमा पर निर्भर करते हैं। अतः ‘भगत‘ को अच्छी व बुरी दोनों प्रकार की आत्माओं से संबंधित कार्यों को करते देखा जाता है। वह इन क्रियाओं को इलाज तथा कष्ट-निवारण के लिए करता है परन्तु इस संबंध में सफलता, विश्वास तथा पारलौकिक प्रभाव से प्राप्त होती है। ‘भगत‘ अचैतन्य अवस्था में भी जाता है तथा परमानंद की स्थिति प्राप्त कर मरीज के दुख की जड़ तक पहुँचने का कार्य करने के लिए भी जाना जाता है। अतः कहा जा सकता है कि ओझा और उसकी निजी शक्ति का दायरा एक समाज से दूसरे समाज में अलग होता है।

यदि हम ऊपर वर्णित उदाहरण को देखें जो भले ही संक्षेप में दिया गया है, हम पाते हैं कि ‘भगत‘ अथवा ओझा का व्यक्तित्व तथा जीवन पैगम्बर के व्यक्तित्व तथा जीवन से काफी साम्य है। ओझा की प्रकृति तथा सामाजिक जीवन में भूमिका का अध्ययन करने के बाद हम पैगम्बर की धार्मिक विशेषज्ञ के अंतिम प्रकार के रूप में प्रकृति, का अध्ययन करने के लिए बढ़ते हैं।

बोध प्रश्न 2
प) संक्षेप में जादूगर के बारे में वेबर के विचारों का वर्णन करें। अपना उत्तर लंगभग तीन पंक्तियों में दीजिए।
पप) ओझा कौन है? अपना उत्तर लगभग चार पंक्तियों में दीजिए।
पपप) संक्षेप में ओराँव ओझा का वर्णन करें? अपना उत्तर लगभग चार पंक्तियों में दीजिए।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) वेबर के अनुसार जादूगर ऐसा विशेषज्ञ है जो पारलौकिक संबंधी अपने ज्ञान, जादू-टोना, चमत्कार करने की कला तथा झाड़-फूंक का प्रयोग विभिन्न रीतियों तथा अनुष्ठानों को करने के लिए करता है, जिनकी प्रकृति हितकारी अथवा अहितकारी दोनों में से किसी भी प्रकार की हो सकती हैं। वह बुरी आत्माओं को नियंत्रित करता है तथा अपनी जादुई शक्तियों द्वारा बीमारी को दूर करने का प्रयास करता है।
2) ओझा जनजाति का नेता व जादूगर होता है। वह अपनी जादू-टोना, झाड़-फूंक तथा जादूगर के समान शक्तियों के लिए जाना जाता है । वह हित पहुंचाने वाले तथा अहितपहुंचाने वाले दोनों प्रकार के अनुष्ठानों को करता है।