वेदभाष्य का प्रकाशन (Publication of Vedabhashya in hindi) वेद ऋषि क्या है किसे कहते है परिभाषा

By   February 2, 2021

(Publication of Vedabhashya in hindi) वेदभाष्य का प्रकाशन वेद ऋषि क्या है किसे कहते है परिभाषा ?

वेदभाष्य का प्रकाशन (Publication of Vedabhashya)
स्वामी दयानन्द की वेदों के प्रति अटूट आस्था थी, परन्तु जब भी कोई व्यक्ति वेदों के किसी मंत्र का प्रचलित मतलब बताते हुए उसका जिक्र करता था, तो दयानन्द सदैव उस मंत्र की अपनी अलग व्याख्या किया करते थे। अपने कुछ मित्रों द्वारा आग्रह किये जाने पर स्वामी दयानन्द ने बहुत उत्साहपूर्वक वेदभाष्य का कार्य करना शुरू कर दिया। उनका कहना था कि अधिकांश वेद मंत्रों के तीन अर्थ होते हैंः

प) एक चढ़ावे एवं धार्मिक कृत्यों से संबंधित (सयाना आदि की परम्परागत व्याख्या)ः
पप) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक अर्थ (दयानन्द का योगदान), एवं
पपप) वैज्ञानिक अर्थ (दयानन्द द्वारा निर्मित)।

अपने जीवन के अन्तिम कुछ वर्षों में, स्वामी दयानन्द ने, स्वयं अपने आपको एवं अपने समाज को हिन्दुत्व के विश्वव्यापी विस्तार की गतिविधियों में संलग्न कर लिया था। हरिद्वार में उनके द्वारा जारी की गई जन सूचना में इस सिद्धान्त का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। प्रतिवाद के बजाय जनमत को मान्यता प्रदान की जानी चाहिए। आर्य समाज, जिसका पहले से ही कुछ साम्प्रदायिकता की तरफ झुकाव था, उसको समस्त सद्भावना वाले हिन्दुओं को मान्यता प्रदान करके एक मिलन क्षेत्र के रूप में मानना चाहिए। इसी विचार से ब्रह्मवादियों के साथ गठबंधन किया गया था एवं ‘‘परोपकारी सभा‘‘ के सन्यासियों की एक समिति का संगठन किया गया था। परन्तु आगे दिये गए तीन लगातार आन्दोलनों में आर्य समाज का सक्रिय रूप से भाग लेना सबसे महत्वपूर्ण बात थी:
प) इन्द्रमणि का मसला (समाज के नियमों को उल्लंघन करने के संबंध में)
पप) गऊ संरक्षाय एवं
पपप) हिन्दी का सार्वजनिकीकरण

इन तीनों कारणों में से, प्रत्येक के लिए अनेक हिन्दू जातिवाद, वर्ग एवं प्रान्तीयता के दायरे से ऊपर उठकर एक हो गये। आर्य समाज ने उत्साहपूर्ण रूप से भाग लेकर अपने आप को विस्तृत हिन्दू राष्ट्रीयता के समर्थक के रूप में प्रेक्षेपित किया । यथार्थ में इन आन्दोलनों को मूल रूप से स्वामी दयानन्द ने शुरू नहीं किया था, परन्तु उसने इन आन्दोलनों को, जिनमें हिन्दू एक बहुत बड़ी संख्या में समर्पित थे एवं इसे अच्छी तरह चला रहे थे, अपनी पूर्ण सहायता प्रदान कर रहे थे। इस प्रकार स्वामी दयानन्द ने कट्टरपंथी एवं साम्प्रदायिक हिन्दुओं को अपने समाज का पूर्ण सहयोग प्रदान किया था एवं यह आशा की थी कि इससे समस्त हिन्दू समुदाय एक होकर एक संगठन के रूप में उभरेगा।

कार्यकलाप 2
अपने नगर के किसी आर्य समाज केन्द्र का दौरा कीजिए तथा सदस्यों से आर्य समाज की समकालीन भूमिका के बारे में वर्णन करने के लिए कहिये।

स्वामी दयानन्द के दृष्टिकोण में विस्तार का अन्य महत्वपूर्ण प्रतीक यह था कि अपने जीवन के अन्तिम वर्षों से, उसने पहली बार दक्षिण भारत की तरफ ध्यान दिया था। ‘‘आर्य-व्रत‘‘ को वह सदैव से विन्धाचल की चोटी के उत्तरी क्षेत्र को मानता रहा था। परन्तु समय के साथ-साथ उनके दृष्टिकोण में बदलाव आया एवं उसका विस्तार हुआ एवं उसने राष्ट्रीय एवं राजनीतिक पहलू का रूप धारण कर लिया और उसका ध्यान दक्षिण की तरफ आकर्षित हुआ । परन्तु सम्पूर्ण भारत का यह सुनहरी सपना स्वामी दयानन्द की असामयिक मृत्यु के कारण बिखर गया।

आर्य समाज के सदस्य (Members of the Arya Samaj)
विधिवत 22 सदस्यों की एक समिति चुनी गई, जिसके सदस्यों की सूची बहुत प्रभावपूर्ण है। इन सदस्यों में से आधे सदस्य विश्वविद्यालयों की डिग्री प्राप्त थे: पांच सदस्य एम.ए. पास थे, तीन डाक्टर थे, एक वकील था एवं दो सदस्य बी.ए. पास थे। सन 1877 तक, एक दर्जन पंजाबियों से अधिक इन डिग्रियों को प्राप्त नहीं कर पाये थे। इसका मतलब है कि उनमें से करीब आधे आर्य समाज की समिति के सदस्य थे। यदि समिति के आधे सदस्य विश्वविद्यालयों की डिग्रियों से सम्मानित थे, तो अन्दाज यह लगाया जाता है कि अन्य अनेक आर्यसमाजी भी दसवीं कक्षा या और अधिक उच्च शिक्षा प्राप्त होंगे।

इससे, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि लाहौर की आर्य समाज की समिति में वास्तविक रूप से बहुत से शिक्षित पंजाबियों का प्रतिनिधित्व था।

समिति के 22 सदस्यों में ब्राहमण केवल एक था, जबकि खत्री 80 प्रतिशत से भी अधिक थे। यह बम्बई के आर्य समाज के सदस्यों की शैक्षिक योग्यताओं के बिल्कुल विपरीत था। स्वामी दयानन्द के लिए इतने उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को आर्य समाज में सम्मिलित करना एक गौरव का विषय था, क्योंकि इन व्यक्तियों में आर्य समाज एवं उसके कार्यक्रमों को बहुत ही उच्च स्तर पर ले जाने की क्षमता थी। समाज के लिए लाहौर प्रत्येक दृष्टि से प्रगति का द्वार साबित हुआ।

बॉक्स 26.03
आर्य समाज के सामाजिक सिद्धान्त, वेदों के उद्देश्यों को प्रतिबिम्बित करने के ध्येय से सृजित किए गए थे और ये निम्नलिखित थे:
प) ईश्वर का पिता होना तथा मनुष्य का भाईचारा
पप) लिंग की समानता अर्थात लिंग के आधार पर भेदभाव का न होना
पपप) लोगों व राष्ट्रों के बीच न्याय तथा ईमानदारी
पअ) सभी को उनकी योग्यतानुसार समान अवसर
अ) सभी के प्रति प्रेम व दया