त्रिज्या अनुपात नियम की परिभाषा क्या है , त्रिज्या अनुपात किसे कहते हैं chemistry (radius ratio rule in hindi)

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(radius ratio rule in hindi) त्रिज्या अनुपात नियम की परिभाषा क्या है , त्रिज्या अनुपात किसे कहते हैं chemistry

प्रस्तावना : रसायन विज्ञान के पाठ “ठोस अवस्था” में त्रिज्या अनुपात वाला टॉपिक इतना बड़ा नहीं है लेकिन किसी आयन के स्थायित्व को ज्ञात करने के लिए इसका महत्व बहुत अधिक होता है और इसलिए हम इसका अध्ययन करते है। इसके अलावा किसी क्रिस्टल में आयनों की व्यवस्था जानने के लिए इसका अध्ययन आवश्यक है।

” किसी आयनिक क्रिस्टल में उपस्थित धनायन और ऋणायन के अनुपात को त्रिज्या अनुपात कहते है। ”

माना धनायन की त्रिज्या r है और ऋणायन की त्रिज्या R है तो त्रिज्या अनुपात निम्न होगा –

त्रिज्या अनुपात = धनायन की त्रिज्या/ऋणायन की त्रिज्या

त्रिज्या अनुपात = r/R

किसी आयनिक क्रिस्टल में त्रिज्या अनुपात के आधार पर इसमें उपस्थित धनायन व ऋणायन की समन्वयी संख्या या उपसहसंयोजन संख्या का पता लगाया जाता है और इस समन्वयी संख्या के आधार पर इस आयनिक क्रिस्टल की संरचना का पता लगाया जा सकता है इसे ही रसायन विज्ञान में त्रिज्या नियम कहते है।

उदाहरण : यदि किसी आयनिक क्रिस्टल में त्रिज्या अनुपात 0.155-0.225 हो तो इस क्रिस्टल में धनायन या ऋणायन की समन्वयी संख्या 3 होगी और इस क्रिस्टल की संरचना समतल त्रिकोणीय होगी।

इसी प्रकार त्रिज्या अनुपात 0.225 से 0.414 होने पर समन्वय संख्या 4 होती है और आयनिक क्रिस्टल की संरचना चतुष्फलकीय होती है।

जब त्रिज्या अनुपात का मान 0.414 से 0.732 हो तो समन्वयी संख्या का मान 6 होगा और क्रिस्टल की संरचना अष्टफलकीय होगी।

इसी प्रकार जब किसी आयनिक क्रिस्टल में त्रिज्या अनुपात का मान 0.732 से 1 हो तो समन्वयी संख्या का मान 8 होगा और उस आयनिक क्रिस्टल की संरचना घनीय होगी।

नोट: किसी आयनिक क्रिस्टल में त्रिज्या अनुपात का मान अधिकतम 1 संभव है , इस स्थिति में धनायन और ऋणायन का आकार समान होगा।

यदि किसी क्रिस्टल में धनायनों और ऋणायनों के विद्युत आवेश संतुलित नहीं है अर्थात आवेश समान न है अर्थात क्रिस्टल में उपस्थित कुल धनायन व ऋणायन बराबर नहीं हो तो इस स्थिति में क्रिस्टल संरचना अस्थायी हो जाती है।

धनायन की त्रिज्या आकार में छोटी होती है और ऋणायन की त्रिज्या बड़ी होती है , इसलिए इसे निम्न प्रकार भी कहा जाता है –

त्रिज्या अनुपात = छोटे आयन की त्रिज्या (धनायन) / बड़े आयन की त्रिज्या (ऋणायन)

आयनिक क्रिस्टलों में त्रिज्या अनुपात (radius ratio rule for ionic crystals) :

एकक कोष्ठिका में 2 परमाणु है अत: संरचना bcc है।

धनायन तथा ऋणायन की त्रिज्याओं के मध्य अनुपात को त्रिज्या अनुपात कहते है।

त्रिज्या अनुपात = धनायन की त्रिज्या/ऋणायन की त्रिज्या

= r+/r

त्रिज्या अनुपात के मान से आयनिक क्रिस्टल में धनायन अथवा ऋणायन की समन्वयी संख्या की जानकारी प्राप्त होती है। अत: त्रिज्या अनुपात से आयनिक क्रिस्टल जालक की संरचना का पता लग जाता है। इसे त्रिज्या अनुपात नियम कहते है।

विभिन्न समन्वयी संख्या और क्रिस्टल जालक की संरचना के सीमान्त त्रिज्या अनुपात के मान निम्नलिखित सारणी में दिए गए है –

सीमांत त्रिज्या अनुपात तथा क्रिस्टलीय संरचना –

 सीमान्त त्रिज्या अनुपात समन्वयी संख्या क्रिस्टल की संरचना उदाहरण
 0.155 – 0.225 3 समतल त्रिकोणीय B2O3
 0.225 – 0.414 4 चतुष्फलकीय ZnS
 0.414 – 0.732 6 अष्टफलकीय NaCl , KCl
 0.732 – 1.00 8 घनीय CaCl , RbCl

उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि समन्वयी संख्या के मान केवल 3 , 4 , 6 अथवा 8 हो सकते है लेकिन 5 , 7 , 9 आदि होना संभव नहीं है। क्योंकि 5 , 7 , 9 आदि समन्वयी संख्या वाले क्रिस्टलों में निबिड़ संकुलन सम्भव नहीं है और धनायनों और ऋण आयनों के विद्युत आवेश संतुलित नहीं हो पाने के कारण क्रिस्टल संरचना अस्थायी हो जाती है।

आयनिक क्रिस्टलों के स्थायित्व में त्रिज्या अनुपात का महत्व

आयनिक क्रिस्टल धनायनों तथा ऋण आयनों के निबिड़ संकुलन से बनता है। क्रिस्टल में प्रत्येक आयन , चारों तरफ से विपरीत आवेशित आयनों से घिरा रहता है। आयनिक क्रिस्टल में विपरीत आवेशित आयनों के मध्य स्थिर विद्युत आकर्षण बल का मान अधिकतम होने पर क्रिस्टल का स्थायित्व बढ़ता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि धनायन , अधिकतम ऋण आयनों को स्पर्श करे तथा ऋणायन अधिकतम धनायनों को स्पर्श करे और सभी ऋणायन एक दुसरे को स्पर्श करे। यह धनायनों तथा ऋण आयनों के आकार अर्थात त्रिज्या पर निर्भर करता है।

धनायन की त्रिज्या बढ़ने पर , त्रिज्या अनुपात बढ़ता है , जिससे धनायन की समन्वयी संख्या भी बढती है। अत: धनायन , अधिक ऋण आयनों को स्पर्श करता है।

त्रिज्या अनुपात के प्रभाव को समझाने के लिए कल्पना करते है कि किसी धनायन की समन्वयी संख्या 3 है अर्थात एक धनायन को तीन ऋणायन स्पर्श कर रहे है तो धनायन के आकार के आधार पर इसकी समतल त्रिकोणीय में निम्नलिखित तीन स्थितियाँ संभव है –

चित्र A में धनायन इतना छोटा है कि वह किसी ऋण आयन को स्पर्श नहीं कर रहा है लेकिन ऋण आयन परस्पर स्पर्श कर रहे है। अत: इसमें धनायन तथा ऋण आयन के मध्य आकर्षण कम लेकिन ऋण आयनों के मध्य प्रतिकर्षण अधिक होगा। अत: यह व्यवस्था अस्थायी होगी।

इस व्यवस्था में समन्वयी संख्या घटने पर स्थायित्व बढेगा।

चित्र B में धनायन और ऋणायन एक दूसरे को स्पर्श कर रहे है और तीनों ऋण आयन परस्पर स्पर्श कर रहे है। अत: इसमें आकर्षण बल तथा प्रतिकर्षण बल एक दूसरे को संतुलित कर लेते है। अत: यह व्यवस्था पूर्ण रूप से स्थायी है।

चित्र C में धनायन , तीनों ऋण आयनों को स्पर्श कर रहा है लेकिन तीनों ऋणायन परस्पर एक दूसरे को स्पर्श नहीं कर रहे है। यहाँ आकर्षण बल , प्रतिकर्षण बल से अधिक है लेकिन ऋण आयनों के मध्य रिक्त स्थान होने के कारण , यह व्यवस्था अस्थायी होगी अत: इस परिस्थिति में समतल त्रिकोणीय संरचना निम्न चतुष्फलकीय संरचना में बदल जाएगी।

इस चतुष्फलकीय व्यवस्था में धनायन , चारों ऋणायनों को स्पर्श कर रहा है और चारों ऋण आयन एक दूसरे को स्पर्श कर रहे है। अत: यह संरचना स्थायी है।

उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि त्रिज्या अनुपात बदलने पर , क्रिस्टल की ज्यामिति बदल जाती है। अत: किसी क्रिस्टल की समन्वयी संख्या और संरचना , आयनों के त्रिज्या अनुपात पर निर्भर करती है।