भारत में नव-बौद्ध आंदोलन (Neo & Buddhist Movement in India in hindi) नवबौद्ध आंदोलन या क्रांति

By   January 31, 2021

नवबौद्ध आंदोलन या क्रांति भारत में नव-बौद्ध आंदोलन (Neo&Buddhist Movement in India in hindi) क्या है अथवा किसे कहते है समझाइये ?

भारत में नव-बौद्ध आंदोलन (Neo&Buddhist Movement in India)
बौद्ध धर्म ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था का विरोधी रहा है। यह जाति पर आधारित असमानता का भी विरोध करता रहा है क्योंकि प्राचीन भारत में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध उठी आवाज की तरह ही यह उभरा था। समकालीन भारत में बौद्ध धर्म सामाजिक असमानताओं को समाप्त करने के लिए एक औजार की तरह प्रयुक्त हुआ है। इसलिए वर्तमान युग में भारत में बौद्ध धर्म को बड़े पैमाने पर पुनर्जीवित करने का काम डॉ० बी.आर. अम्बेडकर के नेतृत्व में किया गया। उन्होंने बौद्ध धर्म के माध्यम से भारत के दलितों के उत्थान का संदेश दिया । दलितों, विशेषकर अनुसूचित जातियों को सामाजिक समानता और न्याय दिलाने के लिए उन्होंने बौद्ध धर्म की व्याख्या की और उसका उपयोग किया । कई वर्षों के चिंतन-मनन के बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे कि बौद्ध धर्म ही ऐसी विचारधारा है जो भारत के अछूतों को मुक्ति दिला सकती है। महाराष्ट्र के नागपुर में 14 अक्तूबर 1956 को उन्होंने बौद्ध धर्म में अनुसूचित जाति के लोगों का विशाल धर्म परिवर्तन सम्मेलन आयोजित किया। धर्म परिवर्तन करने वाले अधिकांश महार जाति (एक अनुसूचित जाति) के थे। (एल.ओ. गेमज, 1987ः381) इतने बड़े पैमाने पर हुए इस धर्म परिवर्तन का उद्देश्य था कि अस्पृश्यता को अस्वीकार किया जाए तथा दलित जातियां शोषक जातियों से अपनी मुक्ति के लिए सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियां चलाना शुरू करें। धर्मान्तरण आंदोलन का एक प्रगतिशील पहलू यह भी था कि प्रभुत्ववादी हिन्दू संस्कृति की वर्णाश्रम पद्धति, शुद्धतावादी दृष्टिकोण तथा सामाजिक प्रदूषण के तथाकथित महत्व को नकारें। हिन्दू संस्कृति के बारे में इस समझ से महाराष्ट्र के दलितों में निषेधवादी चेतना विकसित हुई। यह निषेधवाद बहुत महत्वपूर्ण था जिसके चलते महाराष्ट्र के दलितों में निषेधवादी चेतना विकसित हुई जिससे वे अपनी मुक्ति के लिए रचनात्मक तथा राजनीतिक आंदोलन करने के लिए प्रेरित हुए। भारतीय समाज में मौजूद ठोस विडम्बनाओं के आधार पर धर्मान्तरण के जरिये राजनीतिक आंदोलन विकसित करना ही डॉ० बी.आर. अम्बेडकर का उद्देश्य था। (गुरू, 1989ः419-420)

 भारत में बौद्ध धर्म का पतन (Decline of Buddhism in India)
भारत में बौद्ध धर्म के पतन की प्रक्रिया का विश्लेषण करने से पूर्व हमें बौद्ध तथा हिन्दू धर्म की समानताओं तथा बौद्ध धर्म का हिन्दू धर्म पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना जरूरी है। क्योंकि इन पहलुओं ने भारत में बौद्ध धर्म के पतन में खासा योगदान दिया है। शुरुआत में बौद्ध तथा हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों में कुछ समानताएं थी। आत्मा का जन्मांतरण तथा अवतार की अवधारणा दोनों धर्मों में रहे हैं। ये दोनों धर्म पशु बलि के विरोध में रहे हैं। निश्चित रूप से पशु बलि की प्रथा वैदिक युग से चली आ रही थी लेकिन बौद्ध धर्म के प्रभाव के चलते वह बंद कर दी गई थी। हिन्दू धर्म में पूजा तथा अनुष्ठान को बौद्ध धर्म ने जबर्दस्त ढंग से प्रभावित किया। वैदिक युग से चली आ रही पशु-बलि की प्रथा की जगह मंदिर में होने वाली पूजा एवं मूर्ति पूजा ने ले ली ! भगवान बुद्ध ने अपने अनुयायियों से उपदेश सुनने और साधना करने के लिए कहा था। लेकिन काफी बाद में बौद्ध धर्म के अनुयायी भगवान बुद्ध तथा उसके प्रमुख फिव्यों की मूर्तियों को पूजने लगे। महान उपदेशकों को पूजने की बौद्ध परंपरा ने राम एवं कृष्ण को भी देवता बना दिया। यहाँ तक कि हिन्दु धर्म में बद्ध को भी विष्णु का दसवां अवतार माना जाने लगा।

गौर करने की बात है कि हिन्दुओं के मठों का मूल बौद्ध धर्म में रहा है। हिन्दू धर्म के इतिहास में पहली बार दक्षिण के धर्म प्रचारक आदि शंकराचार्य ने मठों की स्थापना नवीं शताब्दी (ई.पू.)में बौद्ध संघों की तर्ज पर की। उनके द्वारा स्थापित चार मठों: श्रृंगेरी, पुरी, द्वारका तथा बद्रीनाथ ने बौद्ध धर्म के समान अनुशासन की अवधारणाओं को लागू कर हिन्दू धर्म के पुनर्जीवन में योगदान दिया है। हजारों तीर्थयात्री अभी भी इन मठों पर पहुंचते हैं। अपने जन्म वाले देश में बौद्ध धर्म को धक्का पहुंचा। हिन्दू धर्म के उदार ढांचे में बौद्ध धर्म के अनेक सदविचार शामिल कर लिए गये । यहाँ तक कि भगवान बुद्ध को भी विष्णु का अवतार मान लिया गया। चैथी से लेकर नवीं शताब्दी तक हिन्दू और बौद्ध धर्म का संघर्ष चलता रहा। बौद्ध धर्म का पतन तब शुरू हुआ जब उसने तंत्र तथा वाम मार्गी तंत्र साधना “शक्ति‘‘ पंथ को अपनाया। इस बीच हिन्दू धर्म ने बौद्ध धर्म के सारे अच्छे विचारों-सिद्धांतों को अपना लिया था। आठवीं-नवीं शताब्दी में शंकराचार्य ने बौद्धों के विरुद्ध एक अभियान चलाया। उन्होंने बौद्ध संस्थाओं के ही प्रारूप को अपनाया तथा हिन्दुओं की धार्मिक व्यवस्था को. तदनुरूप बनाया। उनका दर्शन भी बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय के दर्शन पर आधारित था। लेकिन बौद्ध धर्म की समाप्ति भारत में तब हुई जब मुसलमान आक्रमणकारियों ने बौद्ध धर्म के महान मठों को ध्वस्त कर दिया। फिर भी यह याद रखना चाहिए कि भारत से बौद्धों के लुप्त होने के पीछे उनकी हत्या या देश निकाला जैसा कारण नहीं था। (पी.एन. चोपड़ा, 198ः48-50)

बोध प्रश्न 4
1) भगवान बुद्ध के नये सामाजिक दर्शन में,
क) ब्राह्मणवाद के साथ समझौता था।
ख) ब्राह्मणवाद की तुलना में, यह अधिक बेहतर रूप था।
ग) ब्राह्मणवाद से अलगाव था।
घ) ब्राह्मणवाद के ही समानांतर ही इसका विकास हुआ था।
2) बौद्ध धर्म की देवियों के बारे में छह पंक्तियों की एक टिप्पणी लिखें।

बोध प्रश्न 4 उत्तर
प) ग)
पप) वजयान के अनुयायी मानते हैं कि तंत्र-शक्ति प्राप्त करके ही सर्वोत्तम ढंग से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। बौद्ध धर्म का यह संप्रदाय देवताओं की शक्ति यानी देवियों को महत्व देता है। बुद्ध से संबंधित ये देवियाँ ही इन अनुयायियों की मोक्ष दात्री मानी जाती हैं।

सारांश
इस इकाई में हमने बौद्ध तथा जैन धर्म पर चर्चा की। चर्चा की शुरुआत हमने बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म के उत्थान की पृष्ठभूमि से की थी। इसी क्रम में हमने तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था एवं राजनीतिक दर्शन, आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था तथा धार्मिक दर्शनों की विवेचना की जिनके परिप्रेक्ष्य में बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म का उदय हुआ था । बौद्ध धर्म की विवेचना के क्रम में उसकी मूल शिक्षाओं, तत्कालीन समाज तथा उसके मूल दर्शन के बीच संबंध तथा उसके उत्थान एवं विकास को समेटा गया था। जैन धर्म बौद्ध धर्म का समकालीन रहा है। इस इकाई में जैन धर्म का केन्द्रीय सिद्धांत तथा उसके विकास की भी विवेचना की गई।

शब्दावली
शस्त्र विरुद्ध (Heterodox) ः प्रचलित धार्मिक विश्वास के विरुद्ध विचार
गण-संघ (Gan&Sanghas) ः ऐसी भौगोलिक इकाई जिसमें क्षत्रिय-गोत्र के लोग रहते थे और शासन करते थे।
कुलीन-तंत्र (Oligarchies) ः एक प्रकार की सरकार जिसमें सत्ता कुछ लोगों के हाथ में रहती है।
पुराणपंथी (Orthodox) ः स्थापित धार्मिक सिद्धांतों पर चलने वाला।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
ए. बेसेंट, 1985, सैवन ग्रेट रिलिजन, द थियोसोफिकल पब्लिशिंग हाउस, मद्रास।
पी.एन. चोपड़ा, संपादक, 180, बुद्धिज्म इन इंडिया एंड एब्रोड, मिनिस्ट्री ऑफ एडुकेशन एंड कल्चर, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, नई दिल्ली।