राष्ट्रीय सुरक्षा क्या है | राष्ट्र सुरक्षा की परिभाषा किसे कहते है | प्रकार , अवधारणा निबंध National security in hindi

By   September 29, 2020
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National security in hindi defintion राष्ट्रीय सुरक्षा क्या है | राष्ट्र सुरक्षा की परिभाषा किसे कहते है | प्रकार , अवधारणा निबंध तत्व |

सुरक्षा
सुरक्षा और राष्ट्रीय हित
सुरक्षा की अवधारणा सीधे तौर पर राष्ट्रीय हित से जुड़ी हई है। तमाम राज्य व्यवस्था आदमी की इस इच्छा से जुड़ी हुई है कि वह विभिन्न स्त्रोतों से अपने खिलाफ उठने वाली चुनौतियों का मुकाबला किस प्रकार करें। इसके पहले हमे सुरक्षा से संबंधित दो तरीकों पर चर्चा कर चुके हैं। शक्ति के प्रबंधन की अंतर्निहित अवधारणा भी यही होती है कि शक्ति को इस प्रकार नियंत्रित रखा जाए कि राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि रहे और किसी के पास ऐसी ताकत पैदा हो जाए जो दूसरे राष्ट्रों की सुरक्षा को खतरे में डाल दे। जब कभी राष्ट्रों की सुरक्षा खतरे में पड़ी है तब तब ही इंसान ने राष्ट्रों की भौगोलिक अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता को बचाये रखने और उसे निश्चित करने के तरीके खोजे हैं। हमने देखा कि राष्ट्र राज्य की अवधारणा की पैदाइश की वेस्टफालिया शांति समझौते से हुई थी। जो खुद तीस वर्षों के युद्ध की समाप्ति का नतीजा था। जब नेपोलियन परास्त हुआ तब उसके हाथों कष्ट भोग चुके युरोप के राष्ट्रों ने विएना कांग्रेस की बैठक के बाद कंसर्ट ऑफ युरोप का गठन किया। इसके पीछे भी यही भावना थी कि नये उभर रहे राष्ट्र राज्यों की सुरक्षा का इंतजाम कैसे हो। जब रूस के जार ने हेग कांफ्रेस (1899 एवं 1907) के लिए पहल की तब उसका भी लक्ष्य राष्ट्र राज्यों की सुरक्षा के रास्ते टटोलना ही था। हेग कांफ्रेंस ने इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधानों के लिए हेग में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना की। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान छिड़े सिद्धांतहीन लड़ाइयों में जब अंतर्राष्ट्रीय नियमों और नैतिकता की धज्जियाँ उड़ने लगी तब विश्व नेताओं और सिद्धांतकारों ने अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के नये विकल्प के रूप में लीग ऑफ नेशन्स की स्थापना की। लीग ऑफ नेशन्स की प्रस्तावना में ही इस लक्ष्य को सुपरिभाषित कर दिया गया था और स्पष्ट कर दिया था। इसके अनुसार, संस्था के सदस्य राष्ट्र मिल जुल कर एक ऐसी व्यवस्था के गठन पर सहमत थे जिससे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के अवसर बढ़े, विवादों के समाधान के लिए युद्ध का रास्ता नहीं अपनाया जाए। लीग ऑफ नेशन्स ने अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा का माहौल बनाने के लिए अनेक प्रयास भी किये, लेकिन अंततः यह व्यवस्था असफल हो गई। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ। इसका चार्टर भी यही कहता है कि ‘‘हम संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य संकल्प लेते हैं कि ……. अपनी सामर्थ्यो को एकजुट करके अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा का माहौल बनायेंगे . . . . . कि एकमात्र साझे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सेना का उपयोग नहीं करेंगे।’’ इस प्रकार ऐसे प्रयासों के जरिए सुरक्षा की चिंता अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की सोच में निरंतर शामिल रही

सुरक्षा एवं परमाणु हथियार
परमाणु हथियारों के आगमन ने राष्ट्र राज्यों की सुरक्षा की अवधारणा में बुनियादी परिवर्तन कर लिया। लेकिन, ऐसे विनाशकारी हथियारों के इजाद के पहले भी राष्ट्र की सुरक्षा की चिंता सदैव सताती रहती थी। इस चिंता को दूर करने के लिए ऐसे राष्ट्र नित नये गठबंधनों तथा जवाबी गठबंधनों की तालाश में रहते थे। इसी चिंता के कारण हथियारों की प्रतिस्पर्धा भी दिनोंदिन तेज होती जा रही थी। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद फ्रांस जीतने के बावजूद पराजित जर्मनी से इतना भयभीत था कि उसने पेरिस कांफ्रेंस लीग ऑफ नेशन्स तथा इनके बाहर भी बार-बार अपनी सुरक्षा की गांरटी मांगी। पहले और दूसरे महायुद्ध के बीच की अवधि में फ्रांस की यह चिंता तमाम तरह के अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में हावी रही थी। लीग की बैठक में मिले आश्वासन फ्रांस की आशंका को निर्मूल नहीं कर पाये। सुरक्षा की उसकी तलाश निरंतर जारी रही। संयुक्त एंग्लो-अमरीकन गारंटी (जो बाद में निष्फल साबित हुआ, आपसी सहायता की संधि (हाफट ट्रीटी ऑफ म्यूचुअल असिसटेंस -1923) एवं जेनेवा प्रोटोकाल (1924) ये दोनों तो शुरू भी नहीं हो सके, लौका! समझौता (8925) और पेरिस समझौते (1928) इन तमाम बैठकों और संधियों में फ्रांस की सुरक्षा की चिंता झलक रही थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले भी और बाद में भी सुरक्षा की तलाश अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों का अहम हिस्सा रही है।

नाटो, सीटो, बगदाद संधि तथा वारसा संधि जैसे गठबंधनों के गठन ही संबद्ध की सुरक्षा के मद्देनजर किये गये। ये तमाम गठबंधन या तो सोवियत संघ के खिलाफ थे या अमरीका के। इसके अलावा, सैन्य अड्डों की तलाश तथा अनेक राष्ट्रों को दी जाने वाली सैन्य सहायता (पाकिस्तान सहित) के पीछे भी संबद्ध राष्ट्रों की सुरक्षा की चिंता को निर्मूल करना ही था।

जब अमरीका ने अगस्त 1945 में जापान के दो शहरों, हिरोशिमा तथा नागासाकी पर एटम बम गिराये तो जापान के आत्म समर्पण के साथ ही अब तक के युद्ध के तमाम समीकरण ही बदल गये। दूसरे, इसके साथ ही सुरक्षा की प्रकृति और इससे जुड़े सवालों के नजरिए भी बदल गये। बम गिराने के अगले चार वर्षों तक (1949) तक अमरीका इकलौता एटोमिक ताकत बना रहा और इस दौरान पूरी दुनिया की सुरक्षा उसके रहमोकरम पर टिकी रही। इस वक्त कोई भी राष्ट्र सुरक्षा को लेकर निश्चिंत नहीं था। यहां तक कि सोवियत संघ भी निरंतर चिंता से ग्रस्त था क्योंकि यह किसी को मालूम नहीं था कि अमरीका के पास ऐसे और खतरनाक कितने बम हैं या नहीं हैं और वह रूस के खिलाफ इनका प्रयोग करने वाला है या नहीं। रूस और अमरीका तब अपने-अपने सिद्धांतों को लेकर दूसरे के साथ बुरी तरह उलझे हुए थे।

इसी चिंत के बीच सोवियत संघ ने 1949 में अपने एटम बम का परीक्षण किया और इसके साथ ही इस विनाशक हथियार की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी। ब्रिटेन, फ्रांस और अंत में चीन भी इस प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गये। इसके बाद से कम से कम तीन और ऐसे देश निकल आये जिन्हें परमाणु हथियारों के द्वार पर खड़ा माना जाता है इनमें भारत, पाकिस्तान और इजराइल शामिल हैं। भारत का कहना है कि वह परमाणु ताकतों का इस्तेमाल केवल शांतिपूर्ण कार्यों के लिए करेगा। इसके अलावा और भी कई देश हैं जो परमाणु ताकत प्राप्त करने की सामर्थ्य रखते हैं। परमाणु हथियारों के आज के जमाने में राष्ट्रों की सुरक्षा की चिंता केवल पारम्परिक हथियारों को जमा करने तथा गठबंधनों का निर्माण करने मात्र से दूर नहीं होने वाली है। अब ये देश सुरक्षा के लिए मातीय छतरी की तलाश भी करने लगे हैं। शीत युद्ध ने राष्ट्रों की सुरक्षा की चिंता को और बढ़ा लिया और अब वे महाशक्तियों से परमाणु मिसाइलें तथा सैन्य अड्डों की सुविधा भी मांगने लगे हैं। परमाणु हथियार दुनिया में कैसा विनाश फैला सकते हैं इसकी झलक तो हिरोशिमा और नागाशाकी की घटनाओं से मिल ही चुकी है। मैक्स लर्नर ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि हम संहारक युग में रह रहे हैं क्योंकि परमाणु हथियारों का जो विशाल जमावड़ा विभिन्न देशों के पास भोजद है वह दुनिया को अनेक बार बरबादी की आग में धकेल सकता है। परमाणु हथियारों के कारण आज की दुनिया में युद्ध अब केवल सेना पर आश्रित नहीं रह गया है। अब नागरिक आबादी हथियारों के लक्ष्य में लाये जाते हैं। भले ही इसके लिए गैर परमाणु, परम्परागत बमों का ही भोग क्यों न किया जाए। ऐसे विस्फोटक हालातों में सुरक्षा की तलाश पूरी दुनिया के लिए सबसे गंभीर मसला बना हुआ है।

बोध प्रश्न 4
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तर की तुलना कीजिए।
1) सुरक्षा एवं राष्ट्रीय हितों के बीच के संबंध की व्याख्या कीजिए।
2) आज के परमाणु युग में सुरक्षा की चिंता कितनी गंभीर हो गयी है, इस पर प्रकाश डालिए।

बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 4
1) प्रत्येक सरकार का बुनियादी लक्ष्य राष्ट्र की सुरक्षा है। विदेश नीति वह औजार है जिसके द्वारा राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जाती है। इसलिए यदि सुरक्षा के लिए पर्याप्त उपाय नहीं किये गये तो इससे राष्ट्रीय हित की बली चढ़ जाती है।
2) परमाणु हथियारों के आगमन ने परम्परागत युद्ध की शैली एवं हथियारों की महत्ता में व्यापक फेरबदल कर दिये है। यह ओवरकिल का युग है। परमाणु हथियार ऐसे विनाशक हैं कि इनके इस्तेमाल से पूरी दुनिया के इंसानों का नामोनिशां मिटाया जा सकता है।

सारांश
इस इकाई में हम अब तक चार अवधारणाओं पर चर्चा कर चुके हैंः राज्य व्यवस्था, शक्ति, राष्ट्रीय हित और सुरक्षा। राज्य व्यवस्था प्राचीन काल में भी अस्तित्व में थी। भारत और यूनान के नगर राज्य इसके उदाहरण हैं। इनके बाद विशाल साम्राज्यों यथा, होली रोमन एम्पायर का जमाना आया। आधुनिक काल की राज्य व्यवस्था का विकास वेस्टफालिया की संधि (1648) से शुरू हुआ। विएना कांग्रेस की समाप्ति तक यह व्यवस्था संप्रभुता प्राप्त राष्ट्र राज्य की अवधारणा को स्वीकार कर चुकी थी। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का स्वर्णिम युग प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद आया जब बड़ी संख्या में राष्ट्र राज्यों का विश्व के नक्शे पर प्रादुर्भाव हुआ। आज की राज्य व्यवस्था मूलतः निश्चित भू-भाग वाले ऐसे राष्ट्र राज्यों के समूह से बनी है जिन्हें आंतरिक एवं बाह्य सम्प्रभुता प्राप्त है। इस प्रकार की राज्य व्यवस्था पुरानी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था से स्पष्टतः लाभ की स्थिति में है। नई व्यवस्था का मूलाधार राष्ट्रों की समानता पर टिका है। वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की बुनियाद राष्ट्र राज्यों में है।

शक्ति वह क्षमता है जिससे दूसरों की सोच और उनके क्रियाकलापों को नियंत्रित किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के सिलसिले में इसका अर्थ राष्ट्रों की उस क्षमता से लगाया जाता है जिससे वे दूसरे राष्ट्रों के आचार व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। शक्ति का वस्तुतः वही महत्व है जो बाजार व्यवस्था में पैसे का होता है। राजनीति के तमाम अंगों की तरह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भी शक्ति के लिए किया जाने वाला संघर्ष ही है। शक्ति कई तत्वों से मिलकर बनी है-इनके अलावा शक्ति के अमूर्त या अदृश्य तत्व भी हैं जिन्हें मापना या जिनका आकलन तो सहज नहीं है लेकिन किसी संप्रभुता राष्ट्र सम्पन्न की शक्ति के संदर्भ में इनके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। शक्ति के मूर्त तत्वों में आबादी, भूखंड (इसका आकार, मौसम बनावट और नक्शे में इसका स्थान), प्राकृतिक संसाधन, कृषि क्षमता तथा सैन्य क्षमता शामिल है। इन सभी तत्वों की स्थितियाँ सापेक्षिक होती हैं। अमूर्त तत्व भी राष्ट्र की शक्ति के संदर्भ में जुड़े बेशकीमती होते हैं। इनमें नेतृत्व की क्षमता, सत्ता का प्रकार, समाज में जुड़ाव तथा राष्ट्रीय नैतिकता शामिल है।

बल या धमकी शक्ति का महत्वपूर्ण अंग तो है परन्तु इसका नतीजा सदैव अल्पकालिक होता है। यह सिद्धांत स्थायित्व और शांति की उस संरचना नजरअंदाज कर देता है जो स्वतंत्र राष्ट्रो को आपसी प्रयासों के अथक परिश्रम से वर्षों में बनी है और जिनके पीछे अहिंसक सामूहिक प्रयासों की कुछ सफल रणनीतियां रही हैं। किसी राष्ट्र की शक्ति को पूर्ण तौर पर मापना सहज नहीं है। यह अनेक कारकों पर आधारित होती है। शक्ति के इस्तेमाल के चार लोकप्रिय तरीके हैं-समझा बुझा कर, ईनाम देकर, दंड के द्वारा या बल लगा कर। आजकल की दुनिया के अस्तित्व के लिए शांति सबसे बड़ी जरूरत बन गयी है। शक्ति के संतुलित प्रबंध से ही शांति की स्थापना संभव है। इस प्रबंध के तीन लोकप्रिय तरीके हैं – शक्ति संतुलन, सामूहिक सुरक्षा तथा विश्व सरकार। शक्ति संतुलन के जरिए यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि किसी भी राष्ट्र विशेष के पास शक्ति की ऐसी प्रबलता न हो जाए कि वह दूसरों के लिए खतरा न बन जाए। शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाले राष्ट्र की इसमें बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है और उसे लाफिंग थर्ड के नाम से पुकारा जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार की समझ बनाने में राष्ट्रीय हित की अवधारणा केन्द्रीय महत्व वाली होती है। इस अवधारणा की परिभाषा तो कठिन है। लेकिन प्रत्येक विदेशनीति का रास्ता इसी से होकर निकलता है। इसमें राष्ट्रों का कल्याण, उनकी राजनीतिक विचारधारा की सुरक्षा, उनके स्वतंत्रता एवं अखंडता की सुरक्षा आदि शामिल होती है। राष्ट्रीय हित का बुनियादी लक्ष्य सुरक्षा, आर्थिक विकास तथा ऐसे विश्व व्यवस्था का निर्माण है जो स्थायित्व के साथ चलें तथा जिसमें गंभीर विवादों के विस्फोट के अवसर कम से कम रहें।

प्रत्येक राष्ट्र की बुनियादी समस्या उसकी सुरक्षा से जुडी होती है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, यह प्रत्येक राष्ट्र का आधारभूत लक्ष्य तथा उसकी बुनियादी राष्ट्रीय हित है। शक्ति का इस्तेमाल राष्ट्रीय हित के प्रतिपादन में तथा सुरक्षा को सुनिश्चित करने में होता है। आज के परमाणु युग में सुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है जिस कारण इसका महत्व सबसे अधिक माना जा रहा है।

शब्दावली
संप्रभुता ः राष्ट्रों की वह निरंकुश शक्ति जिस पर किसी किस्म का आंतरिक या बाह्य नियंत्रण न हो।
राष्ट्र राज्य ः राष्ट्र का वह स्वरूप जो उसकी आबादी की जाति की पहचान पर आधारित हो इसकी आबादी खुद को साझे बंधनों से जुड़ी महसूस करती है एक निश्चित भौगोलिक खंड होता है जिसकी निश्चित सीमा होती है एंव एक स्वतंत्र सरकार की देखरेख में सत्ता होती है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था ः अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की निर्माण राष्ट्रों, राज्यों या साम्राज्यों के ऐसे स्वतंत्र राजनीतिक इकाइयों द्वारा होता है जो शांतिपूर्ण सहअस्तित्व में विश्वास रखते हैं।
शक्ति ः वह सामर्थ्य जिसकी बिना पर कोई दूसरों से अपना मनचाहा कार्य सम्पादित करा सके और यह सुनिश्चित कर सके कि दूसरे वह नहीं करें जो उसकी इच्छा नहीं हो।
मूर्त तत्व ः आबादी और भूखड जैसे तत्व जिनकी माप या गणना की जा सके।
अमूर्त ः ऐसे तत्व जो आंखों से दिखाई न दें और जिनका आंकलन सहज न हो।
सामुहिक सुरक्षा ः हमलों के खिलाफ सुरक्षा स्थापित करने की ऐसी रणनीति जिसमें दुनिया के देश मिल जुल कर साझी आर्थिक व सैन्य कार्यवाई की योजना बनाते हैं।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
हैज, जॉन एच, द नेशन स्टेट एंड दा काइसिस ऑफ वर्ल्ड पालिटिक्स
मारेगेंथाई, हेंस, पालिटिक्स एमोंग नेशंस
डयूश, कार्ल डब्ल्यू, द एनालिसिस ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस
पामर एंड पार्किस, इंटरनेशनल रिलेशंस
मार्टिन वाइट, सिस्टम्स ऑफ स्टेटस, लिसेस्टर, 1977
केनेथ ई वल्डिंग, श्री पेसेज ऑफ पावर, कैलिफोर्निया

इकाई 3 कुछ अवधारणाएँ: राज्य व्यवस्था, शक्ति, राष्ट्रहित
और राष्ट्रीय सुरक्षा

इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
राज्य व्यवस्था
राज्य व्यवस्था की विशेषताएँ
राज्य व्यवस्था का विकास
शक्ति
शक्ति क्या है
शक्ति के तत्व
शक्ति का आंकलन
शक्ति का तरीके
शक्ति का प्रबंध
राष्ट्रीय हित
राष्ट्रीय हित की परिभाषा
राष्ट्रीय हित-विदेश नीति का आधारमूल तत्व
सुरक्षा
सुरक्षा और राष्ट्रीय हित
सुरक्षा और परमाणु हथियार
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों से जुड़े चार महत्वपूर्ण अवधारणाओं पर चर्चा की गयी है। इस इकाई का अध्ययन करने के बाद आपः
ऽ राज्य व्यवस्था (स्टेट सिस्टम) का क्या अर्थ है और उसका क्या महत्व है स्पष्ट कर सकेंगे, समकालीन सम्प्रभुता प्राप्त राष्ट्रीय-राज्य व्यवस्था का विकास किस प्रकार हुआ यह जान सकेंगे,
ऽ शक्ति को परिभाषित कैसे करें तथा अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों में इसकी प्रभावी भूमिका की व्याख्या कर सकेंगे,
ऽ शक्ति के विभिन्न तत्वों को पहचान कर उनकी विवेचना कर सकेंगे,
ऽ शक्ति के इस्तेमाल के विभिन्न तरीकों की व्याख्या कर सकेंगे,
ऽ शक्ति प्रबंधन के तरीकों के रूप में शक्ति संतुलन तथा सामूहिक सुरक्षा की विवेचना कर सकेंगे,
ऽ किसी राष्ट्र राज्य के संदर्भ में उसके राष्ट्रीय हित के महत्व को स्पष्ट कर सकेंगे,
ऽ राष्ट्रीय हित तथा विदेशनीति के बीच के संबंधों का विश्लेषण कैसे करें, यह जान सकेंगे, और
ऽ सुरक्षा की परिभाषा कैसे करें और राष्ट्रीय हित एंव शक्ति के इस्तेमाल का बचाव करने में सुरक्षा की भूमिका को व्याख्यायित कैसे करें यह समझ सकेंगे।

प्रस्तावना
आधुनिक संदर्भ में राज्य का तात्पर्य एक निश्चित भूभाग में मौजूद राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से समझा जाता है। इसका विकास यूरोप में पंद्रहवीं और सतरहवीं शताब्दी के बीच अनेक युगान्तरकारी परिवर्तनों के मध्य हुआ। आज की दुनिया में ऐसे तकरीबन 185 राज्य हैं जो अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के तहत निर्मित हैं। इन संप्रभुता प्राप्त राष्ट्रों के आपसी क्रियाओं प्रतिक्रियाओं तथा अंतरक्रियाओं का संचालन जब उनकी विदेश नीतियों के माध्यम से होता है तो इससे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और राजनीति का प्रभुद्य होता है। पूर्ण अधिकार संपन्न राजनीतिक संस्थान के रूप में ये देश अपने तमाम घरेलू संसाधनों का उपयोग युद्ध, राजनय, क्रियाओं या शांति समाधान जैसे अंतर्राष्ट्रीय अंतः क्रियाओं के प्रति सामर्थ्यवान और सक्षम हैं। इस इकाई में हम राज्य व्यवस्था का विकास कैसे हुआ और समकालीन अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और विश्व समुदाय के प्रति इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा करेंगे।

शक्ति वह क्षमता है जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति दूसरों की सोच और उनकी क्रियाओं को नियंत्रित कर सके। सम्प्रभुता प्राप्त राष्ट्रों के संदर्भ में शक्ति को किसी राष्ट्र ष्कष् के ऐसे सामर्थ्य के रूप में परिभाषित किया गया है जिसके माध्यम से वह (राज्य ‘‘क‘‘) किसी अन्य राज्य ‘‘ख‘‘ या दूसरे राष्ट्रों के बर्ताव को प्रभावित कर सके। इस प्रकार, एक शक्तिशाली राज्य यह सुनिश्चित कर सकता है कि दूसरे अन्य राज्यों की क्रियाएं वैसी ही हों जैसा कि वह उनसे चाहता है। अब, यह किसी राज्य के पास मौजूद शक्ति से आंका जाता है कि उसे सबसे बड़ी ताकत (ैनचमत च्वूमत) के रूप में आँका जाए। आम तौर पर किसी राष्ट्र की शक्ति को उसके सही रूप में या पूरा का पूरा माप पाना बड़ा कठिन कार्य है। वस्तुतः किसी राज्य की शक्ति उसके उन विभिन्न घटकों (ंसपउंदजे) के माध्यम से मापी जाती है जिनसे उस राज्य विशेष का गठन होता है। ऐसे घटक स्थूल रूप में हो सकते हैं जिन्हें देखा जा सके और उनके आकार का अंदाज लगाया जा सके। दूसरी तरफ ऐसे घटक अदृश्य या अमूर्त रूप में भी हो सकते हैं जिन्हें देखा तो नहीं जा सकता परन्तु जिनका अंदाजा लगाया जा सके या जिनका अहसास किया जा सके। इस प्रकार राज्य का आकार, उसकी भोगौलिक बनावट, नक्शे में उसका स्थान आबादी, सेना का आकार और मौजूद प्राकृतिक संसाधन ऐसे स्थूल या मूर्त घटकों के रूप में आते हैं जिनसे राज्य विशेष की शक्ति का आंकलन किया जा सकता है। अदृश्य या अमूर्त घटकों को किसी राज्य की मौजूदा नेतृत्व की प्रभावकारी क्षमता या उसकी आबादी और सेना में व्याप्त नैतिक साहस जैसे तत्वों से आँका जा सकता है। राज्य अपनी शक्ति का इस्तेमाल विभिन्न माध्यमों से कर सकते हैं। इसके लिए वे साम दाम, दंड भेद या ताकत का सहारा ले सकते हैं। वस्तुतः शक्ति भी पैसे की तरह अलग-अलग तरीकों से प्रदर्शित की जा सकती है। शक्ति सम्पन्न राष्ट्र इसके लिए जिन तरीकों का इस्तेमाल करते हैं उनमें दो बड़े महत्वपूर्ण है। ये हैं, शक्ति संतुलन बैलेंस ऑफ पावर) तथा सामूहिक सूरक्षा (क्लेक्टिव सिक्यूरिटी)।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को प्रायः विदेशनीति से जोड़ कर देखा जाता है। हालांकि, ऐसा करना हमेशा उपयुक्त साबित नहीं होता है, लेकिन यह भी सत्य है कि राष्ट्र राज्यों के पारस्परिक संबंधों में उनकी विदेश नीतियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विदेश नीति का आधार राष्ट्र हित पर टिका होता है इसलिए विदेश नीति के निर्माताओं को अपनी परिकल्पना सदैव इस समझ के साथ शुरू करनी होती है कि उनके राष्ट्र के हित किन बातों पर आधारित हैं। यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्र हित को ही अंतिम शब्द के रूप में जाना जाता है।

विदेशनीति के निर्माताओं के सामने पहला दायित्व यही होता है कि वे किस प्रकार अपने राज्य की सुरक्षा का निर्वहन करते हैं। वस्तुतः राष्ट्र हित का सबसे महत्वपूर्ण अवयव सुरक्षा ही होता है। सुरक्षा का मतलब महज किसी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या उसकी संप्रभुता का बचाव ही नहीं है। बल्कि इसका एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवयव आर्थिक विकास भी है क्योंकि इसके ही सहारे कोई राज्य विशेष अपनी शक्ति में इजाफा कर सकता है और फिर उस शक्ति का उपयोग वह विश्व समुदाय के बीच अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने में कर सकता है। इस प्रकार, इस इकाई में हम जिन चार अवधारणाओं पर चर्चा करेंगे वे वास्तव में आपस में काफी अंतरंगता से जुड़े हुए हैं। इन अवधारणाओं को गहराई से समझ बूझकर ही हम अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का वास्तविक आंकलन कर सकते हैं।