प्रथम विश्व युद्ध के कारण क्या है | प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम क्या थे | प्रभाव first world war in hindi

By   September 30, 2020

first world war in hindi first world war reason and result in hindi प्रथम विश्व युद्ध के कारण क्या है | प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम क्या थे | प्रभाव ? प्रथम विश्व युद्ध कब हुआ था कौनसे देश शामिल है |

प्रथम विश्वयुद्ध: कारण, घटनाएँ एवं प्रभाव
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
कारण
आर्थिक प्रतिस्पर्धा
औपनिवेशिक विवाद
स्पर्धकारी संधि व्यवस्था
बढ़ती राष्ट्रीय अपेक्षाएँ
युद्ध का सूत्रपात
युद्ध की घटनाओं की क्रमिकता
युद्ध का यूरोपीय चरण
युद्ध का विश्वव्यापी चरण
युद्ध की समाप्ति
युद्ध के परिणाम
पेरिस शांति सम्मेलन
वर्मा की संधि
अल्प संधियं
युद्ध के प्रभाव
यूरोप पर प्रभाव
विश्व पर प्रभाव
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई में प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) की चर्चा की गयी है । इस इकाई के अध्ययन के बाद आप
ऽ युद्ध के कारणों का पता लगा सकेंगे,
ऽ युद्ध की घटनाओं की प्राथमिकता का निर्धारण कर सकेंगे,
ऽ युद्ध के परिणामों की चर्चा कर सकेंगे तथा
ऽ युद्ध के प्रभावों का विश्लेषण कर सकेंगे।

प्रस्तावना
प्रथम विश्वयुद्ध 1914 के तृतीय चैथाई में आरम्भ हुआ था। शुरुआत में यह यूरोप तक ही सीमित था। तदुपरांत यह पूरे विश्व में फैल गया। यह चार सालों से ज्यादा चला। दुनिया को अभूतपूर्व विभीषिका का सामना करना पड़ा। स्थापित राजतंत्र ध्वस्त हुए, यूरोप का पतन तथा अमरीका का आधिपत्य शुरू हुआ। युद्ध ने नई विचारधाराओं को जन्म दिया, नई संस्थाओं को स्थापित किया तथा दुनिया में नवीन नेतृत्व का सूत्रपात हुआ। सच तो यह है कि युद्ध समाप्त होते-होते पूरी दुनिया बदल गयी थी। यह इकाई उन कारणों की छानबीन करती है जिनसे प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत होती है । तदुपरांत यह युद्ध के क्रमिक विकास की चर्चा करती है, साथ ही इस बात की भी छानबीन करती है कि उसने अंतर्राष्ट्रीय संबंध के विकास व उसके भविष्य को कैसे निर्धारित किया।

कारण
हैप्सवर्ग की गद्दी के संभावित उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फ्रांसिस फडनिड था, उनकी उनीसवीं सदी की आखिरी चैथाई में हत्या कर दी गई। इस हत्या के विरोध में युद्ध की शुरुआत हुई। 28 जून 1914 को बोस्निया के क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों ने उसकी हत्या कर दी थी। फिर भी हत्या युद्ध का असल कारण नहीं थी। यह तो महज एक बहाना था। युद्ध के असल कारणों का पता उन राजनीतिक आर्थिक विकासों में ढूँढा जा सकता है जो 1870 के फ्रांस जर्मनी युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में प्रकट हुए थे। उस युद्ध के फलस्वरूप यूरोप में आर्थिक प्रतियोगिता, उपनिवेशों के लिए विवाद तथा परस्पर विरोधी गठबंधन व्यवस्था का सूत्रपात हुआ। गुलाम जनता की बढती राष्ट्रीय आकांक्षाओं ने आग में घी का काम किया।

आर्थिक प्रतिस्पर्धा
19वीं सदी की अंतिम चैथाई तथा बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में अधिकांश यूरोपीय देशों के बीच टैरिफ युद्ध चल रहा था। तथा समुद्र पार के बाजार को लेकर उनमें गंभीर प्रतियोगिता चल रही थी। टैरिफ युद्ध इटली और फ्रांस, रूस और जर्मनी तथा आस्ट्रिया एवं सर्बिया आदि के बीच चल रहा था । समुद्रपार के बाजार को लेकर आमतौर पर सभी यूरोपीय ताकतों, खासकर इग्लैंड और जर्मनी के बीच गहन प्रतिस्पर्धा चल रही थी। पूरी 19वीं सदी के दौरान ग्रेट ब्रिटेन सर्वोच्च आर्थिक ताकत बना रहा था। उसकी इस हैसियत में नौसेना तथा थलसेना का भी विशेष योगदान था। अचानक यूरोप में जर्मनी महान
आर्थिक शक्ति के रूप में प्रकट हुआ क्योंकि उसके छोटे-छोटे सामंती जागीर एकजुट होकर राष्ट्र राज्य का निर्माण कर चुके थे। जर्मनी का आर्थिक महाशक्ति के रूप में उदय ने समुद्रपार के बाजार में भी उसे कड़ा प्रतियोगी बना डाला। कहना न होगा कि इस बाजार में सभी यूरोपीय ताकतों जिनमें ग्रेट ब्रिटेन भी शामिल था, का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ था। इस प्रतियोगिता के दूरगामी राजनीतिक नतीजे निकले। इससे उन राज्यों के संबंधों के बीच अंतहीन तनाव का सिलसिला चल पड़ा। इन संबंधों में कटुता तब और भी बढ़ गयी जब प्रतियोगी देश व्यापार मार्गों तथा व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए अपनी अपनी नौसेनाओं को मजबूत करने लगे। जर्मनी, जिसके पास पहले से ही एक बड़ी सेना थी, ने अपनी पूरी ताकत नौसेना को मजबूत करने में झोंक दी और जल्दी ही वह अपने मकसद में कामयाब भी हो गया। जर्मनी की बढ़ती आर्थिक शक्ति तथा मजबूत नौसेना और अतिविशाल आर्मी को ग्रेट ब्रिटेन एवं जर्मनी के अन्य विरोधी सहन न कर सके। नतीजतन प्रतिस्पर्धा बढी तथा जोर आजमाईश अनिवार्य हो गया।

औपनिवेशिक विवाद
अपनी अतिरिक्त पूँजी एवं औद्योगिक उत्पाद के लिए सुरक्षित बाजार की तलाश में यूरोपीय ताकतें उपनिवेशों पर कब्जा बनाने की गरज से एक दूसरे के साथ उलझ पड़ी। उपनिवेशों की दौड़ में जर्मनी सबसे पीछे था। आर्थिक रूप से महाशक्ति बनते ही जर्मनी विदेशी बाजार की माँग आक्रामक ढंग से करने लगा ताकि उसके बढ़ते अर्थतंत्र के लिए बाजार मिल सके। जर्मनी में यह आम बात बनती जा रही थी कि उसे भी किसी न किसी उपनिवेश का मालिक होना ही चाहिए। उपनिवेशों की इस लड़ाई में जर्मनी के लिए ग्रेट ब्रिटेन सबसे बड़ा रास्ते का रोड़ा था। ग्रेट ब्रिटेन को जर्मनी दाल भात में मूसलचंद कहकर खिल्ली उड़ाता था। उपनिवेशों के लिए यह लड़ाई केवल जर्मनी एवं इंग्लैंड तक ही सीमित नहीं थी। सच तो यह है कि प्रथम विश्वयुद्ध से पहले सभी बड़ी ताकतें इस छीनाझपटी में शामिल थी। अफ्रीका और एशिया में उपनिवेश में यह अंतर्विरोध और तीव हुआ। नतीजतन यूरोपीय देशों के आपसी संबंधों में कटुता आई।

 स्पर्धाकारी संधि व्यवस्था
दुनिया के विविध भागों में उपनिवेशों पर कब्जा जमाने के सवाल पर परस्पर विरोधी ताकतों के बीच स्पर्धी गठबंधन बनने लगे। रास्ता दिखाने का काम जर्मनी ने किया। उसने 1879 में आस्ट्रिया हंगरी के साथ द्वैत संधि की। इस संधि का मकसद जर्मनी को ताकतवर बनाना था ताकि वह संभावित फ्रांसीसी आक्रमण का मुकाबला कर सके। मालम हो, जर्मनी ने फ्रांस के अल्सेस लोरेन पर कब्जा कर रखा था। संधि का मकसद आस्ट्रिया एवं हंगरी को रूसी आक्रमण से बचाना भी था क्योंकि वाल्कन क्षेत्र में इनके बीच दीर्घकालिक संघर्ष पहले से ही चल रहा था। यह संधि 1882 में त्रिसंधि बन गयी क्योंकि जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी के साथ इटली भी शामिल हो गया। उपनिवेशों की लड़ाई इटली एवं फ्रांस के खिलाफ थी और यह संधि इटली के समर्थन में बनी थी।

त्रिसंधि में शामिल देशों ने महादेश में यथास्थिति बनाये रखने का प्रयास किया। जबकि दूसरे देशों के लिए उनकी यह चाल यूरोप में आधिपत्य स्थापित करने तथा उन्हें एक दूसरे से अलग-थलग रखने की साजिश थी। इसीलिए उन्होंने प्रतिसंधि बनाने की पहल करने का प्रयास किया। नतीजतन 1893 में फ्रांस और रूस के बीच संधि हुई। यह संधि त्रिसंधि के बढ़ते प्रभाव को रोकने तथा ब्रिटेन को औकात में रखने के लिए की गयी थी। मालूम हो, उपनिवेशों को लेकर फ्रांस और रूस दोनों ही ब्रिटेन के साथ संघर्ष कर रहे थे। हालांकि समय बीतने के साथ-साथ फ्रांस, रूस एवं ब्रिटेन के विवादों का शांतिपूर्ण निपटारा हो गया। बाद में उनके बीच संधि हुई। पहले ब्रिटेन एवं फ्रांस के बीच 1904 में समझौता हुआ। तदन्तर 1907 में ब्रिटेन और रूस के बीच हुआ। ये दोनों संधिया बाद में त्रिसंधि में तबदील हो गयी। इस प्रकार यूरोप दो विरोधी गठबंधनों में विभाजित हो गया। नतीजतन पहले से ही कटु होते जा रहे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में और भी कड़वाहट आ गयी।

 बढ़ती राष्ट्रीय अपेक्षाएँ
उस समय यूरोप के विभिन्न हिस्सों में गुलाम अल्पसंख्यक समुदाय मौजुद थे। ये अल्पसंख्यक अपने संबद्ध साम्राज्यवादी शासकों के खिलाफ थे। उनकी बढ़ती हुई राष्ट्रीय चेतना ने उन्हें विदेशी शासन के विरोध में ला खड़ा किया। वे स्वशासन की मांग करने लगे। अल्सासे लोरेन की फ्रांसिसी जनता जर्मनी के अतिक्रमण के खिलाफ थी। इसी तरह हैप्सवर्ग साम्राज्य को गुलाम जनता के विरोध का सामना करना पड़ रहा था। इस साम्राज्य पर, आस्ट्रिया और हंगरी का शासन कायम था। आस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य के विरूद्ध इटालियन, रामैनियन तथा स्लैविक जनता भी उठ खड़ी हुई तथा स्वनिर्णय अथवा पडोसी राज्यों में रहने वाले अपने भाई बंधुओं के साथ एकाकार होने की मांग करने लगी। फिर भी शासकों ने राष्ट्रवादी चेतना के उभार को शामिल करने की भरपूर कोशिश की। नतीजतन, राष्ट्रीय आन्दोलन उग्र क्रांतिकारी आंदोलनों में तबदील हो गये । बाल्कन क्षेत्र में कई स्थानों पर गुप्त क्रांतिकारी एवं उग्रवादी संगठन खड़े हो गये। ऐसे ही एक संगठन जिसका नाम ब्लैक हैड था, की स्थापना । बोस्नियाई सर्वो ने वेल्ग्रेड में की। 1911 में स्थापित इस संगठन ने आर्कड्यूक फ्रांसीस फ्रेडीबैंड की हत्या करने की साजिश की तथा इस साजिश को अंजाम देने की जिम्मेदारी ने गैवरिलों प्रिसिप तथा उसके साथियों को सौप दी। फ्रेडीवेंड उस समय सराजेनों की राजकीय यात्रा पर था । प्रिसिप में अपनी योजना में सफल रहा।

 युद्ध का सूत्रपात
आर्कड्यूक की हत्या के उपरांत आस्ट्रिया ने 23 जुलाई 1914 को सर्बिया को कड़ी धमकी दी। सर्बिया को ड्यूक की हत्या की साजिश के बारे में कुछ भी पता नहीं था। फिर भी सर्बिया ने धमकी का विनीत जवाब दिया। वह सभी माँगोंध्शर्तों के पालन के लिए तैयार हो गया, किन्तु एक माँग उसे स्वीकार नहीं थी। धमकी में अन्य बातों के अलावा माफी माँगने, आस्ट्रिया विरोधी आंदोलनों के दमन तथा हत्या की जवाबदेही तय करने में आस्ट्रियाई अधिकारियों की भागीदारी की माँगे शामिल थी। सर्बिया ने छानबीन में आस्ट्रियाई अधिकारियों की भागीदारी की माँग ठुकरा दी। आस्ट्रिया ने सर्बिया के जवाब को अस्वीकार करते हुए उसके विरूद्ध 28 जुलाई 1914 को युद्ध की घोषणा कर दी। सर्बिया के समर्थन में रूस भी इस युद्ध में 30 जुलाई को कूद पड़ा। रूस की भागीदारी ने जर्मनी को युद्ध में कूदने के लिए बाध्य कर दिया। उसने रूस और फ्रांस के खिलाफ क्रमशः पहली तथा तीसरी अगस्त को युद्ध की घोषणा कर दी। फ्रांस पर आक्रमण करने के लिए जर्मनी ने बेल्जियम को परास्त करने की एणनीति अपनाई। इससे ब्रिटेन खफा हो उठा। 4 अगस्त को उसने युद्ध की घोषणा कर दी। इस तरह दोनों खेमों के बीच युद्ध पूर्णरूपेण शुरू हो गया। एक खेमे में आस्ट्रिया-हंगरी और जर्मनी थे तो दूसरे खेमें में फ्रांस, ब्रिटेन और रूस। पहला केन्द्रीय शक्ति के रूप में जाना गया तो दूसरा गठबंधन के रूप में मशहूर हुआ।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर का मिलान कीजिए।
1) प्रथम विश्वयुद्ध के मूल कारणों की पहचान कीजिए ?
2) युद्ध में विरोधी खेमे कौन-कौन से थे।

बोध प्रश्न 1 उत्तर
1. युद्ध के मुख्य कारण थे-बड़ी ताकतों के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा,उपनिवेशों को लेकर उनके बीच होने वाले विवाद तथा विरोधी गठबंधन व्यवस्थाएँ, उनका बढ़ता सैन्यीकरण तथा गुलाम राष्ट्रों में बढ़ती राष्ट्रीय आकांक्षाएं । आर्कड़ यूक फनिउ की हत्या, इस युद्ध का तात्कालिक कारण थी।

2. सभी बडी ताकतें दो खेमों में बँटी थी-गठबंधन व केन्द्रीय शक्ति। जर्मनी आस्टिया हंगरी बुल्गारिया तथा टर्की केन्द्रीय शक्ति के खेमे में शामिल थे,तो फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, रूस, अमरीका व अन्य दूसरे देश गठबंधन खेमें में। गठबंधन व केन्द्रीय शक्तियां युद्ध में विरोधी शक्तियों के रूप में शामिल थी।

 युद्ध की घटनाओं की क्रमिकता
युद्ध के आरम्भ में माना जा रहा था कि यह एक छोटी सी मुठभेड़ होगी जिसमें कोई न कोई एक विजेता होगा। लेकिन ये मान्यताएँ झूठी साबित हुई। यह युद्ध लगभग चार साल तक जारी रहा जिसमें जान माल की अभूतपूर्व हानि हुई । विजेता और हारने वाले दोनों को ही बराबर नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि गठबंधन की जीत हुई थी, किन्तु उसे भी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी।

युद्ध का यूरोपीय चरण
1917 के आरम्भ तक युद्ध जारी रहा और तब तक यह अनिवार्य रूप से माना जा रहा था कि यह यूरोपीय घटना थी। युद्ध यूरोप के मसले तथा उपनिवेशों पर उसके नियंत्रण के सवाल पर लड़ा जा रहा था। यूरोप ही युद्ध का मुख्य मंच था । जर्मन रणनीति युद्ध को एकाध महीने में खत्म करने की थी। इसलिए उसने फ्रांस पर आक्रमण करने से पहले बेल्जियम को रोंद डाला। कुछ ही दिनों में जर्मन की सेना पेरिस के नजदीक तक पहुँच गयी। किन्तु जर्मन अपनी इस जीत को कायम नहीं रख सका। फ्रांसीसी. सैनिकों ने उसे आइसे नदी के किनारे तक वापस जाने पर मजबूर कर दिया। यह नदी स्वाभाविक सुरक्षा रेखा के रूप में जानी जाती थी। अगले तीन वर्षों तक युद्ध में शामिल पक्षों ने कोई प्रगति नहीं की। एक तरह का गतिरोध पैदा हो गया था। इस मोर्चे पर भारी क्षति उठानी पड़ी। प्रारंभिक चार महीनों में ही 7,00,000 जर्मन, 8,50,000 फ्रांसीसी तथा 90,000 ब्रिटिश लोग मारे जा चुके थे। रूसी तथा बाल्कन के मोर्चे पर निर्णायक युद्ध लड़ा जा रहा था। रूसी मोर्चे पर अगर रूसी सैनिक पूर्वी एशिया पर कब्जा करने में नाकामयाब रहे तो बाल्कन क्षेत्र में आस्ट्रिया को अपमानजनक हार का मुंह देखना पड़ा। सर्बो ने आस्ट्रियाइयों को खदेड़ भगाया। 1914 में टर्की केन्द्रीय शक्तियों से आ मिला। टर्की ने आपूर्ति मार्ग बंद कर दिया तथा गठबंध को समुद्री मार्ग से रूस को भी जाने वाली आपूर्ति को ठप्प करने का प्रयास किया।

नतीजतन 1915 के मध्य में जर्मनी तथा आस्ट्रिया की संयुक्त सेना के हाथों रूस की अपमानजनक हार हुई। इस हार के साथ ही जार शासन का पतन भी आरम्भ हो गया। इसी बीच बुल्गारिया केन्द्रीय ताकतों के साथ आ मिला जिससे उनकी ताकत तथा मारक क्षमता में इजाफा हुआ। अब सर्बिया केन्द्रीय ताकतों के अधीन था। इस बिंदु पर इटली को संधि वाली ताकतों के समर्थन में हस्तक्षेप करने के लिए राजी किया गया । तथापि, इटली के हस्तक्षेप से युद्ध में कोई अंतर नहीं आया। केन्द्रीय ताकतों को महत्त्वपूर्ण जीतें हासिल हुई और हैम्बर्ग से परसियन खाड़ी तक का इलाका उनके कब्जे में आ गया।

1916 के फरवरी में केन्द्रीय ताकतों ने गठबंधन पर चैतरफा धावा बोल दिया। उनकी रणनीति गठबंधन को करारी हार देकर युद्ध की समाप्ति के लिए शांति शर्तों को निर्देशित करने की थी। जर्मनी को जान और माल दोनों की भारी क्षति उठानी पड़ी। रूस ने आस्ट्रिया को पराजित किया। इसी समय रोमानिया गठबंधन से आ मिला तथा पुर्तगाल ने अपनी तटस्थता को तिलांजली देते हुए गठबंधन के समर्थन में युद्ध में कूद पड़ा । बाल्कन मोर्चे पर केन्द्रीय ताकतों के खिलाफ गठबंधन के संयुक्त आक्रमण ने जर्मनी सेना को कई मोर्चों पर हार का सामना करना पड़ा। उसने समुद्र में अंधाधुंध पनडुब्बी युद्ध छेड़ दिया। ताकि ब्रिटेन की आपूर्ति पहुँचाने वाले जलयानों का मार्ग अवरूद्ध हो सके। हालांकि यह रणनीति काफी कामयाब रही, किन्तु इससे अमरीका गठबंधन के समर्थन में युद्ध में शामिल होने के लिए मजबूर भी हो गया। इस तरह युद्ध का पाश्विक दौर आरंभ हुआ।

अब युद्ध चैथे साल में प्रविष्ट हुआ। यूरोप को जानमाल का भारी नुकसान उठाना पड़ा। सच तो यह है कि यूरोप ढहने के कगार पर था। शांति अब सबकी माँग बन गयी थी। 1917 में जर्मनी की संसद रिक्शटैग ने शांति का मसौदा तैयार किया। महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों द्वारा यूरोपीय सभ्यता की रक्षा के लिए अपीलें की गई। लेकिन अभी तो इससे भी बुरे दिन आने बाकी थे।

 युद्ध का विश्वव्यापी चरण
युद्ध में संयुक्त राज्य अमरीका के कूदने तथा 1917 की रूसी क्रांति की सफलता ने युद्ध के रंग को पूरी तरह बदल दिया। अब वह यूरोपीय घटनामात्र न रहकर विश्वव्यापी मामला बन गया। अमरीकी हस्तक्षेप और रूसी क्रांति की वजह से विचारधारा का संघर्ष भी उभर कर सामने आया। रूसी क्रांति से क्रांतिकारी विचारधारा का सूत्रपात हुआ और अमरीका लोकतंत्र और शांति व सुरक्षा का । इंतजाम करने लगा। इसी समय अमरीकी राष्ट्रपति विल्सन के मशहूर चैदह सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की गयी। जार प्रशासन के पतन में युद्ध का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा ।

जार प्रशासन के खात्मे के बाद बोल्शेविक सरकार की स्थापना हुई जिसने जर्मनी के साथ मार्च 1918 में ब्रेस्ट लिटोवस्क संधि पर हस्ताक्षर किये। इस संधि की वजह से रूस युद्ध से बाहर आ गया तथा जर्मनी और रूस के बीच युद्ध का अंत हो गया। युद्ध के आरंभ से अमरीका अपनी तटस्थता बनाए हुए था। किंतु कई कारणों, जिनमें व्यापारिक जहाजों पर जर्मनी द्वारा किया जाने वाला अंधाधुंध पनडुब्बी आक्रमण तथा अमरीका के आर्थिक हितों को दाव पर लगाना एवं अंदर ही अंदर होने वाली उसकी सैन्य तैयारी शामिल थी, जिससे उसे अपनी यह चुप्पी तोड़नी पड़ी।

1917 के अप्रैल महीने में अमरीका संधि ताकतों के समर्थन में युद्ध में शामिल हुआ। युद्ध में शामिल होने के बाद राष्ट्रपति विल्सन ने अपने 14 सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की। इस 14 सूत्री कार्यक्रम में अन्य बातों के अलावा निम्नांकित बिंदुओं को शामिल किया गया था। गुप्त समझौतों के बजाय शांति की खुली प्रतिज्ञा करना, समुद्री मार्गों की आजादी, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से अवरोधों को हटाना, शस्त्र भंडारण में कमी, औपनिवेशिक प्रजा के लिए न्याय, यूरोप के विविध गुलाम, अल्पसंख्यकों के लिए स्वनिर्णय का अधिकार तथा विश्व में शांति कायम करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय निकाय की स्थापना।

 युद्ध की समाप्ति
युद्ध में अमरीका के शामिल हो जाने से गठबंधन की मारक क्षमता काफी बढ़ गयी। अमरीका सैनिक और युद्ध सामग्री दोनों की आपूर्ति करता था। 1918 के जुलाई तक विविध मोर्चों पर तैनात अमरीकी सैनिकों की संख्या 3,00,000 थी। दूसरी तरफ, केन्द्रीय शक्ति को कहीं से भी आपूर्ति की आशा नहीं रह गयी। नतीजतन, उन्हें गठबंधन के आक्रमण को झेलने के लिए मजबूर होना पड़ा। 1918 के आते आते केन्द्रीय शक्ति में शामिल देशों ने एक के बाद एक आत्म समर्पण कर दिये। हैप्सबर्ग साम्राज्य का विघटन को गया तथा सम्राट चार्ल्स पदच्युत कर दिया गया अब जर्मनी के लिए कोई रास्ता नहीं बचा था। सम्राट कैसर विलियम प्प् को पदच्युत कर दिया गया। अंततः जर्मनी ने नवम्बर की शुरुआत में समर्पण कर दिया। इस तरह गठबंधन की जीत के साथ युद्ध का अंत हुआ। युद्ध चार साल और तीन महीने तक जारी रहा था। इस युद्ध में यूरोप, अमरीका, एशिया तथा अफ्रीका के तीस देश सम्मिलित हुए थे। युद्ध में चार राजतंत्र मिट गये तथा सात नये राज्यों का जन्म हुआ। युद्ध में 1.8 करोड़ से ज्यादा लोग मारे गये थे तथा 333 खरब डालर का खर्च आया था।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिये स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर का मिलान कीजिए।
1) युद्ध के यूरोपीय चरण में घटित होने वाली महत्त्वपूर्ण घटनाओं तथा प्रगतियों का उल्लेख कीजिए।
2) युद्ध में अमरीका के शामिल होने के क्या कारण थे ?
3) रूस ने युद्ध से अलग होने का फैसला क्यों किया ?

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1. केन्द्रीय ताकतों की आरंभिक विजयों,जर्मन रणनीति की विफलता, रूस की पराजय । अबाधित अंतः समुद्री युद्ध । रूस का युद्ध से बाहर आ जाना, अमरीका द्वारा युद्ध में हस्तक्षेप करना, हताहतों की भारी संख्या आदि ।
2. जर्मनी का अबाधित, पनडुब्बी युद्ध, यूरोप में संयुक्त राज्य अमरीका का निवेश, अमरीका की सैन्य तैयारी आदि।
3. रूसी क्रांति एवं जार का पतन।

युद्ध के परिणाम
इस युद्ध के दौरान जानमाल की अभूतपूर्व क्षति हुई । दुनिया में यूरोप के वर्चस्व का पतन होने लगा तथा संयुक्त राज्य अमरीका महाशक्ति के रूप में उभरा। पूर्व में जापान ने अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। युद्ध का अंत गठबंधन और केन्द्रीय शक्ति के विभिन्न देशों के बीच हुए पाँच अलग-अलग समझौतोंध्संधियों की वजह से हुआ। ये संधियां थी,-जर्मनी के साथ बर्साम की संधि, आस्ट्रिया के साथ सेंट जर्मन की संधि, बुलगारिया के साथ नेडली की संधि, हंगरी के साथ ट्रायनन की संधि,टर्की के साथ ऐवर्स की । संधि । इनमें से चार संधियों पर हस्ताक्षर 1919 में किए गए जबकि अंतिम संधि पर हस्ताक्षर 1920 में हुआ। इन संधियों में अन्य विशेषताओं के अलावा निम्नांकित महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ शामिल थी-राष्ट्रकुल की स्थापना, केवल यूरोप में स्वनिर्णय के अधिकार का अनुपालन तथा इस सिद्धांत का एशिया और अफ्रीका के यूरोपीय उपनिवेशों में लागू न किया जाना।

 पेरिस शांति सम्मेलन
सामान्यता युद्ध की समाप्ति तथा शांति की बहाली संधियों के जरिये संभव हो पाती है। प्रथम विश्वयुद्ध भी शांति समझौतों के जरिये ही समाप्त हुआ था। जब युद्ध निर्णायक दौर में पहुंचा तब गठबंधन ताकतें विभिन्न खेमों द्वारा सुझाई जा रही योजनाओं और प्रस्तावों पर विचार करने लगी ताकि विश्व में शांति की स्थापना हो सके। जर्मनी के समर्पण तथा पदेजतनउमदजे व िंतउपेजपम पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद, गठबंधन ताकतों ने शांति सम्मेलन आयोजित करने की पहल की। यह सम्मेलन अंततः 1919 में पेरिस में बुलाया गया। यह करीब छह महीने तक चलता रहा। इस सम्मेलन में 32 देशों जिनमें अधिकांश गठबंधन के देश थे, ने भाग लिया। यह सम्मेलन काफी प्रभावी था क्योंकि इसमें दुनिया के सभी बड़े नेता शरीक हुए थे। किसी ऐसे सम्मेलन में पहली दफा गैर यूरोपीय देश संयुक्त राज्य अमरीका, जापान आदि शामिल हो सके। रूस इसमें शामिल नहीं हुआ, क्योंकि वह युद्ध से पहले ही अलग हो गया था। केन्द्रीय शक्तियों ने किसी भी देश को सम्मेलन की कार्यवाइयों में आमंत्रित नहीं किया था। सम्मेलन क संचालन यूँ तो मुख्य रूप से तीन बड़ी ताकतों-अमरीका, ब्रिटेन तथा फ्रांस ने किया था तथापि दूसरों की उपेक्षा भी नहीं की गयी थी। फिर भी परस्पर विरोधी एवं संकुचित राष्ट्रीय हितों क्षुद्र एवं अनुचित दावों तथा उपनिवेशों के ही लोग सम्मेलन की कार्यवाहियों में छाये रहे । नतीजतन राष्ट्रपति विल्सन के चैदह सूत्री कार्यक्रम में शामिल आदर्शवाद, धरा का धरा रह गया। सम्मेलन को कई जटिल मुद्दों के अलावा सम्मेलन को जिन मुद्दों को सुलझाना था, वे थे-यूरोप के गुलाम देशों की बढ़ती राष्ट्रीय आकांक्षाओं का ख्याल रखना, युद्ध के दौरान हुई गुप्त संधियों की समीक्षा करना, यूरोप के गठबंधन – ताकतों को हुई क्षति की भरपाई की मांग करना और युद्ध के दौरान जर्मनी द्वारा की गई गलतियों को दुरूस्त करना और युद्ध के दौरान जर्मनी के द्वारा की गई गलतियों को दुरुस्त करना आदि था । युद्ध की घोषणा के लिए जर्मनी को दोषी करार दिया गया। जानमाल की भारी क्षति के लिए भी इसी को दोषी माना गया।

औपचारिक शुभारंभ के बाद पेरिस शांति सम्मेलन ने विभिन्न समस्याओं और मसलों का बारीकी से अध्ययन करने तथा उनके निदान के उचित सुझाव देने के लिए विशेषज्ञों और राजनयिकों की समितियाँ गठित की। सम्मेलन में शरीक हुए देशों की परस्पर विरोधी माँगों, लक्ष्यों एवं उद्देश्यों को देखते हुए यह आसान नहीं था कि सम्मेलन किसी ठोस युक्तिसंगत नतीजे पर पहुँच जाये। राष्ट्रपति विल्सन को यूरोपीय देशों के दबाव में झुकना पड़ा। यूरोपीय देश जर्मनी से बदला लेने के लिए अडिग थे। काफी जद्दोजहद के बाद सम्मेलन शांति संधि का प्रस्ताव पास करा सका। इस संधि की शर्ते काफी कठोर थी। फिर यह संधि प्रस्ताव जर्मनी के पास यह कहकर भेजा गया कि उसे यह प्रस्ताव पूर्णरूपेण स्वीकार करना होगा। जर्मनी ने संधि यह कहते हुए अस्वीकार कर दी कि समर्पण के समय उसे भरोसा दिया गया था कि उसके साथ राष्ट्रपति विल्सन के चैदह सूत्री कार्यक्रमों में निहित सिद्धान्तों के अनुसार व्यवहार किया जायेगा। उसका आरोप था कि शांति संधि में चैदह सूत्री कार्यक्रम में निहित सिद्धान्तों का अनुपालन नहीं किया गया है। जर्मनी की आपत्तियाँ दरकिनार कर दी गयी तथा उससे कहा गया कि या तो वह चुपचाप संधि पर हस्ताक्षर कर दे या नतीजे भुगतने के लिए तैयार हो जाये । जर्मनी को अपमान का चूंट पीना पड़ा। बाद में वह इस अपमान का बदला लेने के लिए उतारू हो गया। इस तरह इस संधि में ही दूसरे युद्ध के बीज छुपे हुए थे।

वर्सा की संधि
वर्सा संधि गठबंधन ताकतों और जर्मनी के बीच हुई थी। पाँच संधियों की श्रृंखला में यह सबसे महत्वपूर्ण संधि थी। संधि में 440 धाराएँ शामिल की गयी थी। इसमें केन्द्रीय ताकतों की सीमाई,सैन्य और युद्ध जनित दोषों तथा शांति स्थापना के आर्थिक, राजनीतिक तथा अन्य संबंध जिसे युद्ध की शुरुआत करने का दोषी करार दिया गया था, के साथ काफी सख्त सलूक किया गया। उसे तकरीबन 40,000 वर्ग किलोमीटर का भूभाग छोड़ना पड़ा। इस भूभाग पर करीब 7,00,000 लोग निवास करते थे। इस भूभाग के खो देने से जर्मनी प्राकृतिक संसाधनों से वंचित हो गया। कहने की जरूरत नहीं की प्राकृतिक संसाधन ही आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं। इसके अलावा जर्मनी को भारी हर्जाना देने के लिए भी कहा गया। काफी खींचतान के बाद हर्जाने की रकम 33 खरब डालर तय की गयी। जर्मनी के उपनिवेशों को उससे छिपकर उसे राष्ट्रकुल का आवेश क्षेत्र घोषित कर दिया गया और उसे फ्रांस ब्रिटेन और जापान के बीच आबंटित कर दिया गया। सेना और नौसेना के आकार को घटाकर जर्मनी की सैनिक ताकत को भी काफी कमजोर कर दिया गया। उसे वायु सेना गठित करने अथवा आधुनिक व्यापारिक नौसेना रखने की इजाजत नहीं दी गयी। 50 किलोमीटर पूर्व तक राइन नदी को सैन्य मुक्त कर दिया। गया ।निरस्त्रीकरण के प्रावधानों के देखरेख की जिम्मेवारी एलायड आयोग को सौंप दी गयी। इतना ही नहीं, जर्मनी और आस्ट्रिया को एकीकरण की इजाजत नहीं दी गयी। सारांश यह कि संधि में जर्मनी को अंग भंग कर उसे सदा के लिए गठबंधन ताकतों की अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया गया। बेल्जियम, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी आदि को स्वतंत्र देशों के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गयी। रूस एवं जर्मनी के बीच हस्ताक्षरित ब्रेस्ट लिटवोस्क संधि खुद ब खुद अप्रासंगिक हो गयी। वर्सा की संधि ने दुनिया में पहली दफा विश्व शांति कायम करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन राष्ट्रकुल को जन्म दिया। इस संधि ने एक और नये अंतर्राष्ट्रीय संगठन को जन्म दिया। दुनिया में पहली दफा श्रमिकों के कल्याण के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का निर्माण संभव हो सका। संधि में आवेशित भूभाग के प्रशासन के लिए भी प्रावधान बनाये गये थे।

लघु संधियाँ
वर्सा संधि के पश्चात् चार लघु संधियाँ अस्तित्व में आई। गठबंधन और आस्ट्रिया के बीच सेंट जरमेन संधि हुई । इसने हंगरी, चेकोस्लोवाकिया (अब यह चेक व स्लोवाक नामक दो स्वतंत्र देशों में विभाजित हो चुका है।) पोलैंड और यूगोसलावाकिया को स्वतंत्र देशों के रूप में मान्यता प्रदान की। आस्ट्रिया को भी विशाल भूभाग छोड़ना पड़ा।उसका साम्राज्य विखंडित हो गया था तथा आबादी भी काफी कम हो गयी थी। अब वह विशाल बहुभाषी साम्राज्य की जगह जर्मन भाषी लोगों का छोटा सा देश रह गया था। गठबंधन और बुल्गारिया के बीच नेडली की संधि हुई थी। बुल्गारिया को फिर से अपना तट पुर्तगाल को तथा देश के पश्चिमी हिस्से में मौजूद रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र को यूगोस्लावाकिया को सुपुर्द करना पड़ा । बुल्गारिया की सेना घटा दी गयी तथा उसे गठबंधन ताकतों को हर्जाने के रूप में 500 लाख डालर देना पड़ा।

ट्रायनन संधि में गठबंधन एवं हंगरी भागीदार थे। संधि की शर्तों के अनुसार हंगरी को भूभाग और आबादी की क्षति बर्दाश्त करनी पड़ी। उसे रोमानिया को ट्रांससिनवेनिया, यूगोस्लोवाकिया को क्रोशिया, तथा चेकोस्लोवाकिया को स्लोवाक जिसे सौंपने पड़े।

सेवर्स संधि गठबंधन और टर्की के बीच अगस्त 1920 में संपन्न हुई थी। संधि की वजह से टर्की को अपना साम्राज्य खोना पड़ा। 1923 में संधि में संशोधन किया गया तथा टर्की गणतंत्र बन गया। नई सरकार ने लुसाने में संशोधित संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। यह लुसाने संधि के रूप में जानी गयी। टर्की ने अरब भू भाग पर अपना दावा छोड़ दिया। टर्की को न तो युद्ध का हर्जाना देने पर विवश होना पड़ा न ही इसे अपनी मर्जी की सेना रखने से वंचित किया गया।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तर का मिलान कीजिए।
1) वर्सा संधि की मुख्य शर्ते क्या थी।
2) पेरिस शांति सम्मेलन में सम्पन्न हुई लघु संधियों के नाम बताएँ।

बोध प्रश्न 3 उत्तर
1. पेरिस शांति सम्मेलन में संधियों की शर्ते तय की गयी जिनसे प्रथम विश्वयुद्ध का अंत हुआ। इस सम्मेलन में केवल गठबंधन देशों ने भाग लिया था। यह सम्मेलन जनवरी 1918 से जून 1918 तक जारी रहा था। इसने दो अंतर्राष्ट्रीय निकायों की स्थापना की बुनियाद तैयार की-
पण् राष्ट्रकुल और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन- इसने जर्मनी को अपमानजनक संधि स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। दूसरे युद्ध का बीजारोपण भी इन्हीं संधियों में कर दिया गया था।
पपण् इसका मकसद जर्मनी को लंगड़ा-लूला बनाकर उसे गठबंधन के अधीन बनाये रखा था। संधि ने विश्वनिकायों की स्थापना भी की।
2. चार लघु संधियाँ सम्पन्न हुई- सेंट जरमेन संधि, नेडली संधि, ट्रायनन संधि और सेवर्स संधि- इन्हीं संधियों का नतीजा था कि गठबंधन और आस्ट्रिया, हंगरी,बुल्गारिया तथा टर्की के बीच युद्ध खत्म हुआ।

युद्ध के प्रभाव
इस युद्ध में यूरोप इतना कमजोर हो गया कि फिर कभी आर्थिक एवं राजनीतिक ताकत के रूप में उभर न सका। इसकी जगह संयुक्त राज्य अमरीका ने ले ली। यरोप का आर्थिक पतन हआ, उसे एक के बाद एक राजनीतिक संकटों का सामना करना पड़ा और उपनिवेशों की जनता की नजर में उसकी इज्जत घटती गयी। यूरोप दुनिया में आर्थिक सत्ता केन्द्र के रूप में स्थापित था तो इसीलिए कि उपनिवेशों के संसाधनों पर उसका कब्जा था। उसे अपने निवेश से होने वाली आय का काफी भरोसा था और वह उसी पर निर्भर था। युद्ध ने आय के इस स्रोत को बंद कर दिया। ब्रिटेन को अपने युद्ध पूर्व निवेश में 25प्रतिशत की कटौती करनी पड़ी। जबकि फ्रांस को 34प्रतिशत । जर्मनी का निवेश तो पूरी तरह बंद हो गया। यूरोप की जगह संयुक्त राज्य अमरीका ने ले ली। अब यूरोप एवं अमरीका का आर्थिक संबंध भी उलट गया। अब यूरोप साहूकार न रहकर कर्जदार हो गया था। यूरोप अब दुनिया का बैंकर और कार्यशाला नहीं रह गया।

 यूरोप पर प्रभाव
यूरोप पर युद्ध के राजनीतिक परिणाम भी दूरगामी साबित हुए। राष्ट्रपति विल्सन के चैदह सूत्र व रूसी क्रांति के सफल निस्पादन से क्रांतिकारी विचारों का सूत्रपात हुआ।नतीजतन, महादेश के हर भाग में पुरानी व्यवस्था के खिलाफ सख्त विरोध शुरू हो गया। यूरोप की जानी मानी लोकतंत्र प्रणालियों में भी सीमित मताधिकार को ही मान्यता प्राप्त थी। युद्ध के परिदृश्य को बदल डाला। अनेक यूरोपीय देशों में जहाँ औरतों को मताधिकार प्राप्त नहीं था, अब प्राप्त हो गया। युद्ध ने नारी मुक्ति की प्रक्रिया का भी सूत्रपात किया। यूरोप के मानचित्र से निरंकुश राजतंत्रों का सफाया हो गया। अनेक देशों की वैधानिक किताबों में श्रमिक वर्ग के बुनियादी अधिकारों को शामिल किया जाने लगा। सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि उपनिवेशों में यूरोप की प्रतिष्ठा खत्म हो गयी। अतः यूरोपीय अंतर्विरोध और मतभेद खुलकर सतह पर आ गये। एक दूसरे से लड़कर दोनों खोमों ने अपनी इज्जत गँवा दी। इसे वह फिर कभी न पा सके।

 विश्व पर प्रभाव
युद्ध का विश्व पर सर्वतोमुखी प्रभाव पड़ा। एक महत्वपूर्ण प्रभाव संयुक्त राज्य अमरीका का महाशक्ति के रूप में उभरना था। यूरोप तो युद्ध में मिट गया किन्तु संयुक्त राज्य अमरीका समृद्ध होकर सामने आया। युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमरीका दुनिया का बैंकर एवं कार्यशाला के रूप में स्थापित हो गया। कल-कारखाने कुकुरमुत्ते की तरह हर जगह स्थापित होने लगे क्योंकि युद्ध के दौरान उत्पादित वस्तुओं की माँग काफी बढ़ गयी थी। अमरीका जो एक समय कर्जदार देश था तथा जिस पर यूरोपीय देशों का 4 खरब डालर का कर्ज लदा था, अब एक साहूकार देश बन गया। 1919 के आते आते पर अमरीका के 3.7 खरब डालर का कर्जदार बन चुका था। 1930 में यह कर्ज बढ़कर 8.8 खरब डालर हो गया। युद्ध में गठबंधन के समर्थन में शामिल होने के पीछे अमरीका की नीयत ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों पर कब्जा करने की थी। शीघ्र ही जापान ने प्रशांत महासागर के जर्मन द्वीपों पर अपना कब्जा बना लिया। सान्तुंग प्रायः द्वीप पर उसने अधिकार कर लिया। वर्सा की संधि में जापानी माँग का बहुत हद तक अनुमोदन कर दिया। सान्तृग में जर्मनी ने किनोचाऊ का क्षेत्र पट्टे पर लिया था। संधि के इस क्षेत्र को जापान के हवाले कर दिया। जर्मनी के उत्तर प्रशांत क्षेत्रों का शासन भी जापान को सौंप दिया गया। इससे जापान दुस्साहसी होकर साम्राज्यवादी देश बन गया। चीन 1917 में युद्ध में शामिल हुआ। वह आशा कर रहा था कि वह अपना खोया क्षेत्र वापस पा सकेगा। किंतु शांतिदूतों ने चीन की माँग को अनसुना कर दिया। चीन ने संधि पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। पूरे चीन में हिंस्त्र प्रदर्शन आयोजित किए गए, खासकर जापान के खिलाफ। वैसे तो ये प्रदर्शन सभी विदेशियों के खिलाफ आयोजित किये गये थे किंतु जापान के प्रति चीनियों की घृणा तो जगजाहिर थी ही। इन आंदोलनों से चीन का राष्ट्रीय आंदोलन क्रांतिकारी विचारों से लैश होने लगा। भारत में भी युद्ध के दूरगामी प्रभाव देखने को मिले। युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने वादा किया था कि युद्धोपरांत वह उन्नत किस्म के प्रशासनिक सुधारों को प्रस्तावित करेगा, बशर्ते भारत ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों का समर्थन करे। किंतु ब्रिटेन अपने वादे पर खरा नहीं उतरा। नतीजन भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप पूरी तरह बदल गए तथा अततः ब्रिटेन को पूरे उपमहाद्वीप को आजादी देनी पड़ी।
बोध प्रश्न 4
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तर का मिलान कीजिए।
1) युद्ध ने विश्व (यूरोप को छोड़कर) को कैसे प्रभावित किया।

 बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 4
1) प) यूरोप कमजोर हुआ। यूरोप में निरंकुश शासन का अंत हुआ यूरोप और अधिक प्रणाली की दिशा में बढ़ चला।
पप) संयुक्त राज्य अमरीका दुनिया की महाशक्ति के रूप में उभरा । पूर्व में जापान के प्रभाविता ईजाफा हुआ । टर्की का आधुनिकीकरण हुआ। रूस में क्रांति तेज हुई । औपनिवेशिक राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम और दमदार हुआ।

 सारांश
प्रथम विश्व युद्ध 1914 में भड़का और 1918 तक जारी रहा। यूरोपीय देशों की आर्थिक प्रतिस्पर्धा, उपनिवेशों पर अपना अधिकार को लेकर उनके बीच चलने वाले विवादों तथा विरोधी गठबंधन व्यवस्थाओं ने दुनिया को विस्फोटक स्थिति में पहुंचा दिया था। गुलाम राष्ट्रों की बढ़ती राष्ट्रीय आकांक्षाएँ तथा बड़ी शक्तियों की बेजोड़ सैन्य तैयारी ने आग में घी का काम किया। इस आग की चपेट में पूरी दनिया आ गयी। आस्ट्रियाई राजसिंहासन के संभावित उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फडनिंड की हत्या इस माहोल में की गयी । युद्ध तभी समाप्त हुआ जब लड़ने वाले देशों ने अपना सबकुछ खो दिया। शांति संधियाँ स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया गया। संधि की शर्ते अपमानजनक थी, इसमें भावी युद्ध के बीज छुपे पड़े थे। संयुक्त राज्य अमरीका महाशक्ति के रूप में उभरा । जापान एक बड़ी शक्ति बन गया। टर्की का आधुनिकीकरण हुआ और वह गणतंत्र देश बन गयो । यूरोप के निरंकुश राजतंत्रों को लोकतंत्र के लिए जगह खाली करनी पड़ी। भारत सहित अनेक औपनिवेशिक देश तथा यूरोप के दूसरे पराश्रित देश युद्ध के प्रति काफी उत्साहित थे क्योंकि युद्ध ने क्रांतिकारी विचारों का सूत्रपात किया था। अब वे और दमखम के साथ राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम को आगे बढ़ाने का प्रयास करने लगे।

शब्दावली
टैरिफफ ः एक देश से दूसरे देश में निर्यातितध्आयातित वस्तुओं पर लगाया जाने वाला कर।
फ्रांस जर्मन युद्ध ः यह युद्ध फ्रांस और जर्मनी के बीच 1870-71 में लड़ा गया था। फ्रांस पराजित हुआ तथा जर्मनी का एकीकरण संभव हो सका। इस युद्ध ने प्रथम विश्व युद्ध का बीजारोपण किया।
रूसी क्रांति ः 1917 में रूस अनेक क्रांतियों का गवाह बना । इन क्रांतियों की अंतिम परिणति बी आई लेनिन की अगुआई में समाजवादी राज्य की स्थापना के रूप में हुई। यह नया राज्य यू एस एस आर के नाम से जाना गया।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
डेविड थामसन, 1974, यूरोप सिन्स नेपोलियन, मिडिलसेक्स, इग्लैंड।
एल. एस. स्टावेरियेनोस,1983, ए ग्लोबल हिस्ट्री / दि यूपन हिरेटेज, न्यू जरेसी।
एम डब्ल्यू वाल्डविन,1962, प्रथम विश्वयुद्ध रू एन आडरलाइन हिस्ट्री, ऑक्सफार्ड।
विलियम वुडरॉक, 1981 दि स्ट्रगल फार वर्ड पावर 1500 – 1900: लंदन।