फासीवाद क्या है | Fascism in hindi फासीवाद की परिभाषा किसे कहते है , विचारधारा , अर्थ कारण , सिद्धांत जनक

By   September 29, 2020

फासीवाद की परिभाषा किसे कहते है , विचारधारा , अर्थ कारण , सिद्धांत जनक फासीवाद क्या है निबन्ध लिखिए | Fascism in hindi in italy |

फासीवाद
फासीवाद, जैसा कि प्रस्तावना में कहा गया है, कोई विचारधारा नहीं है। मुसोलिनी की अगुआई में इटली की फासीवादी पार्टी ने जो कार्य योजना शुरू की थी, बाद में फासीवाद के नाम से जाना जाने लगा। उसके बाद जर्मनी में हिटलर की नाजी पार्टी ने भी इसे अंगीकार कर लिया। फासीवाद लेटिन शब्द फासियो से बना है जिसका अर्थ होता है ष्लाठियों का गट्ठरष्। पुराने रोम में ‘‘लाठियों और कुल्हाडियों के गट्ठरष् का राज्य सत्ता का प्रतीक माना जाता था। ष्लाठियों का गट्ठर‘‘ वास्तव में अनुशासन एवं एकता का द्योतक था जबकि कुल्हाड़ी शक्ति का। इस तरह फासीवाद का स्पष्ट लक्ष्य सैन्य शक्ति एवं क्षमता का इस्तेमाल कर राष्ट्र की खोई हई गरिमा और मर्यादा को पुनः स्थापित करना था। राष्ट्रीय मर्यादा को हासिल करने में बड़े पैमाने पर सैन्य संगठन अत्यंत महत्वपूर्ण हो उठा। आइये, फासीवाद की प्रमुख विशेषताओं को सूत्रबद्ध करें।

 फासीवाद की प्रमुख विशेषताएँ

फासीवादी अपने चरित्र में दृढ़ राष्ट्रवादी थे। वे इटली को फिर से पुराने रोमन साम्राज्य की तरह शक्तिशाली बनाना चाहते थे, किन्तु उनका राष्ट्रवाद छिछला था। वे ताकतवर राज्य के लिए युद्ध और साम्राज्यवादी विस्तार की नीति को आवश्यक मानते थे। फासीवादियों की नजर में राज्य और राष्ट्र की नैतिकता के अंतिम मानदंड है। इस तरह स्पष्ट है कि आक्रामक राष्ट्रवाद फासीवाद का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत था।

फासीवाद संसदीय लोकतंत्र के विरोधस्वरूप पैदा हुआ था। वह मानता था कि लोकतंत्र एक कमजोर सरकार होता है जो क्लिष्ट आर्थिक व राजनीतिक समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती। फासीवादी किसी भी तरह के विरोध को बर्दाशत नहीं करते थे। वे पार्टी और नेता के प्रति पूर्ण आस्था चाहते थे। मुसोलिनी उनका द्वितीय ड्यूक यानी नेता के रूप में स्थापित हुआ। उसके अथवा उसकी इच्छा के विरूद्ध कुछ भी नहीं किया जा सका। दूसरे शब्दों में फासीवाद एकल पार्टी के सर्वाधिकार में विश्वास करता है।

फासीवादी किसी भी तरह के समाजवाद के कट्टर विरोधी थे। वे कम्युनिस्टों से घृणा करते थे और दुनिया को साम्यवादी संकट से छुटकारा दिलाना चाहते थे। वे स्वतंत्र उद्यमिता के पक्षधर थे, अतः पूँजीवादी उनके साथ थे। फासीवादी व्यक्तिवाद का समर्थन नहीं करते थे, न ही खुली व्यापार प्रथा (लोसेज फेयर) चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि कोई व्यक्ति ताकतवर होकर राज्य के लिए चुनौती बन जाये। वे शक्तिहीन राज्य के हिमायती नहीं थे और यही कारण है कि फासीवादी राज्य निरंकुश सर्वशक्तिमान तथा व्यापक था।

फासीवादी अंतर्राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के भी खिलाफ थे। वे धुर राष्ट्रवाद में यकीन करते थे। यही कारण था कि राष्ट्रकुल को फासीवादियों का समर्थन हासिल नहीं हुआ। फिर भी मुसोलिनी राष्ट्रकुल में अपने विश्वास का मुखौटा लगाये रहा। 1935-36 में आकर उसका यह मखौटा भी बेनकाब हो गया। उसने इथोपिया पर आक्रमण कर दिया।

फासीवादी युद्ध का समर्थन करते थे। निरस्त्रीकरण में उनका रंचमात्र भी विश्वास नहीं था। इस तरह फासीवादियों ने युद्ध को महिमामंडित किया। मुसोलिनी ने लिखा. ‘‘केवल युद्ध ही मानवीय ऊर्जा को उच्चतम शिखर तक ले जा सकता है और वही जोखिम उठाने का साहस रखनेवालो को श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र भी दे सकता है। इस तरह मुसोलिनी और उसके जर्मन साथी हिटलर ने युद्ध के जरिये अपने-अपने साम्राज्यों का विस्तार किया। इस तरह स्पष्ट है कि फासीवाद के पास कोई सुविचारित विचारधारा नहीं है। एक सिद्धांत के रूप में फासीवाद ने उग्र राष्ट्रवाद को जन्म दिया। यह शक्ति के प्रयोग तथा साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का विस्तार करने में विश्वास करता था। उसने लोकतंत्र को अस्वीकृत किया तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण निपटारे का मखौल उड़ाया। फासीवाद समाजवाद की बढ़ती धारा के खिलाफ एक दकियानूसी प्रतिक्रिया थी। फासीवाद सर्वाधिकारवाद का एक रूप था जिसे मुसोलिनी ने यों परिभाषित किया था, ष्सब कुछ राज्य में समाहित है, न तो उसके बाहर कुछ है न उसके खिलाफ ।‘‘

इटली, जर्मनी और स्पेन में फासीवाद
फासीवाद की उत्पत्ति सबसे पहले इटली में हुई जब मुसोलिनी ने फासीवादी पार्टी का गठन कर उसे सत्ता पर काबिज करवाया। इटली के लोग प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बनी सरकारों के प्रदर्शन से क्षुब्ध थे क्योंकि न तो वे राष्ट्रीय मर्यादा प्राप्त कर सकी थी और न ही राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा दे सकी थी। दूसरी तरफ पुरा देश वामपंथियों के आंदोलनों से जर्जर था। इस स्थिति में मुसोलिनी ने स्वयंसेवकों की भारी फौज तैयार की, उन्हें सैन्य प्रशिक्षण दिया तथा लोगों की राष्ट्रीय भावनाओं को उभारा फासीवादियों की आंतरिक शांति और बाह्य महिमा की अपीलों से लोग प्रभावित हुए। वे मुसोलिनी के पक्षधर बन गये और वह सत्ता के करीब पहुंच गया। इसी माहौल में इटली के राज विक्टर डमैन्यूल 3 ने मुसोलिनी को मंत्रिमंडल गठित करने का आमंत्रण दिया और मुसोलिनी ने 31 अक्टूबर, 1922 को अपने मंत्रिमंडल का गठन कर लिया। उसने शीध्र ही तमाम पदों को खारिज कर दिया और खुद ही तानाशाह बन बैठा। इटली की राजनीति में फासीवाद का दबदबा 1943 तक बना रहा।

जब हम फासीवाद के विकास की बात करते हैं तो हमारा ध्यान सामान्यतौर पर इटली के सत्ता परिवर्तन तक ही सीमित रहता है। किन्तु जर्मनी व स्पेन में भी ऐसे ही विचार वाले सत्ता पर । काबिज हो गये थे। तीसरे दशक की शुरूआत में एडोल्फ हिटलर की अगुआई में नेशनल सोशलिस्ट पार्टी (अथवा नाजी पार्टी) सत्ता में आयी। नाजीवाद जर्मनी के उस अपमान की प्रतिक्रिया में पैदा हुआ था जो उसे पेरिस शांति सम्मेलन में इंगलैंड, फ्रांस और उनके मित्र राष्ट्रों की ओर से मिला था। इटालियन फासीवादियों की तरह हिटलर की नाजी पार्टी ने भी सैन्यकरण, युद्ध और शांति समझौतों की समीक्षा की वकालत की। फासीवादियों की तरह नाजी भी संसदीय लोकतंत्र समाजवाद, राष्ट्रकुल और विवादों के शांतिपूर्ण निपटारे के खिलाफ थे।

जर्मनी में हिटलर की तानाशाही कायम होने के तुरंत के बाद ही अन्य यूरोपीय देशों में भी फासीवादी प्रवृत्तियाँ दिखने लगी। 1935-36 में फ्रांस की हालत भी वैसी हो गयी थी जैसी इटली की मुसोलिनी के आने से पहले थी। वामपंथियों और दक्षिणपंथियों की आपसी रंजिश इतनी तेज थी कि तानाशाही के उदय की संभावना साफ तौर पर दिखने लगी थी। सभी लोकतंत्रवादियों, वामपंथी समूहों, समाजवादियों और साम्यवादियों ने मिलकर संकट पर काबू पा लिया। उनका फ्रंट पोपुल्येर के नाम से साझा मंच बना और लियोन ब्लूम के प्रधानमंत्रित्व में साझी सरकार का गठन कर लिया गया।

इसी समय पड़ोसी राज्य बेल्जियम में डिजरैली की अगुआई में एक फासीवादी समूह उभरा द्य इसने सार्वजनिक जीवन में हिंसा और अश्लीलता को अंगीकार किया। इसने फ्रांस और बेल्जियम के गठबंधन को अस्वीकार कर दिया क्योंकि फ्रांस कम्युनिस्ट सोवियत संघ के साथ भी दोस्ती बनाये हुए था। फासीवादियों के दबाव में आकर बेल्जियम ने घोषणा कर दी थी कि वह फिर से तटस्थ की भूमिका अपनायेगा। बेल्जियम के इस कदम को लोकानों संधि के खिलाफ विद्रोह माना गया। हालांकि बेल्जियम में फासीवादी सत्ता पर काबिज नहीं हो सके, किन्तु इसकी भरपूर कोशिश जरूर की गई।

रोमानिया में कोर्नेलियो कोद्रेनु की अगुआई में आयरन गार्ड नामक फासीवादी पार्टी का गठन हुआ। यह पार्टी रोमानिया के तत्कालीन आर्थिक संकट और सरकार के कुप्रबंधन के खिलाफ प्रतिक्रिया का प्रतिफल था। इटली के ग्लैक्शर्टस तथा जर्मनी के स्टॉम दुपर्स की तरह रोमानिया के आयरन गार्ड के सदस्यों ने संसदीय नेताओं, यहूदियों एवं मजदूरों को अपने आक्रमण का निशाना बनाया। रोमानिया का राजा कार्लोस फासीवादियों को कुचलने में नाकामयाब रहा तो खुद ही तानाशाह बन बैठा!

उधर पोलैण्ड में भी फासीवाद के स्पष्ट संकेत उभर रहे थे। 1937 में पोलैण्ड में फासीवादी तर्ज पर तथा राष्ट्रीय एकता शिविर के रूप में सरकार का गठन किया गया। सरकार तथा किसानों और मजदूरों के बीच खुला युद्ध शुरू हो गया। अलबत्ता, गृहयुद्ध का आसन्न संकट सरकार की इस घोषणा से कि वह चुनाव सुधार पर अमल करेगी, टल गया। जर्मनी के बढ़ते खतरों के मद्देनजर स्थिति विस्फोटक मोड़ तक नहीं पहुँच सकी और प्रतिद्वंद्वी पार्टियों में किसी तरह समझौता हो गया।

किन्तु स्पेन, फासीवाद तूफान से नहीं बच सका। 1923 में वहां जनरल प्राइमों दि रिवेरा की अगुआई में तानाशाही स्थापित हो गई। किन्तु स्पेने में तब अराजकता का ऐसा माहौल था कि 1930 में रिवेरा ने हताशा में आकर इस्तीफा दे दिया। दूसरे वर्ष राजा अल्फांसो ग्प्प्प् को पदच्युत कर दिया गया और गणतंत्र स्थापित हो गया। किन्तु चुनी हुई सरकार भी देश में व्यवस्था बहाल नहीं कर सकी । फ्रांस की तरह स्पेन ने भी 1935 में पोपुलर फ्रंट (वामपंथी) की सरकार को सत्ता पर काबिज कर दिया। इससे देश का संकट और अधिक गंभीर हो गया। अनेक सैन्य अधिकारी खुली धमकी देने लगे कि यदि राष्ट्रपति अजाना की सरकार देश में अराजकता पर काबू करने में विफल होती है तो वे सत्ता अपने हाथ में ले लेंगे। संकट को भांपते हुए अजाना ने अनेक अधिकारियों को सेवामुक्त कर दिया तथा अनेकों का सुदूर स्थानों पर तबादला कर दिया। जनरल फ्रेंको उन्हीं अधिकारियों में से एक था। उसका दबादला केनरी द्वीप पर कर दिया गया था।

इसी बीच स्पेन के फासीवादियों ने 12 जुलाई, 1936 को एक पुलिसकर्मी की हत्या कर दी। बदले में पुलिसकर्मियों ने फासिवादियों के शीर्ष नेता काल्वो सोटेलो की हत्या कर दी। यह स्पेन में गृहयुद्ध के सूत्रपात का संकेत था। कुछ दिनों बाद जनरल फ्रेंको स्पेनिश मोरक्को में आ धमका और स्पेन में विप्लव की घोषणा कर दी।

फासीवादी इटली और नाजी जर्मन ने जनरल फ्रैंको की अगुआई में लड़ने वाले विद्रोहियों को भारी वित्तीय और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई जबकि सोवियत संघ सरकार की मदद कर रहा था। तीन साल तक चलने वाला यह गृहयुद्ध अंततः 1939 में खत्म हुआ। इस युद्ध में फासीवादी नेता फ्रैंको को निर्णायक जीत हासिल हुई। इस प्रकार स्पेन भी इटली व जर्मनी के फासीवादी खेमे में शामिल हो गया।

 मुसोलिनी, समाजवादी से फासीवादी
बेमितो मुसोलिनी 1893 में पैदा हुआ था। शुरू में वह अपने पिता के समाजवादी विचारों से प्रभावित था। वह पहले स्विटजरलैंड गया फिर बाद में आस्ट्रिया। किन्तु अपनी क्रांतिकारी गतिविधि गयों की वजह से उसे इन देशों से भागना पड़ा।

आस्ट्रिया से लौटने के बाद कुछ दिनों तक मुसोलिनी समाजवाद का प्रसार करता रहा। जब 1914 में युद्ध का सूत्रपात हुआ तो मुसोलिनी ने स्पेन के लिए तटस्थता की नीति की वकालत की। 1915 के आते-आते उसने अपने समाजवादी विचारों को तिलांजली दे दी और इटली को युद्ध में शामिल होने की मांग का समर्थन करने लगा।

मुसोलिनी शांति समझौता का कट्टर विरोधी बन गया। उसने अपने मित्रों, अवकाशप्राप्त अधिकारियों तथा वैसे लोगों जिन्होंने युद्ध के दौरान इटली से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था, की एक सभा बुलाई। फिर उसने उनको फासिस्ट पार्टी के बैनर तले लामबंद किया तथा इटली को न्याय दिलाने तथा समाजवादियों, कम्युनिस्टों व कमजोर सरकार से छुटकारा पाने की अपील की।

फासीवादियों में अधिकांश समृद्ध व संपत्तिशाली वर्गों से आए हुए थे जिनमें व्यापारियों के जवान बेटे भी थे। इसके अतिरिक्त बेरोजगार भूतपूर्व सैनिक, असंतुष्ट पेशेवर तथा भारी संख्या में छात्र भी मुसोलिनी के अनुयायी बन गये थे। फासीवादी पूरी तरह कम्युनिस्टों के खिलाफ थे। अधिक से अधिक पूँजीपति ही उन्हें धन देते थे। 1920-21 में इटली में गृहयुद्ध का सा माहौल बना हुआ था। सरकार मूक दर्शक बनी बैठी थी और मुसोलिनी जनता को यह विश्वास दिलाने में कामयाब होता जा रहा था कि उनका भविष्य केवल उसकी पार्टी के हाथ में सुरक्षित है। प्रधानमंत्री जिमोलिती को 1921 में बाध्य होकर इस्तीफा देना पड़ा। उसकी जगह ल्युगी फैकना इटली का प्रधानमंत्री बना। पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री की तरह वह भी निकम्मा और कमजोर साबित हुआ।

इटली में फासीवाद के उदय के कारण
अब तक आप फासीवाद के अर्थ से वाकिफ हो चुके हैं। आप फासीवादी जर्मनी व इटली की कार्ययोजना से भी परिचित हो चुके हैं। हमने बताया था कि फासीवाद के पास कोई विचारधारा नहीं थी। वह तो महज किन्हीं खास परिस्थितियों की प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट हुआ था। हमने संक्षेप में यह बताने की कोशिश की है कि इटली और जर्मनी ने फासीवाद को कैसे और क्यों अंगीकार किया। इस उपभाग में हम इटली में फासीवाद के विकास के संबंध में विस्तृत चर्चा करेंगे, साथ ही उसकी घरेलू और विदेशी नीतियों पर भी प्रकाश डालेंगे।

इटली, जर्मनी तथा आस्ट्रिया-हंगरी के द्वैत गठबंधन में 1882 में सम्मिलित हुआ था। नतीजतन, द्वैत गठबंधन त्रिकोणीय गठबंधन में तब्दील हो गया। यह गठबंधन रूस और फ्रांस का मुकाबला करने के लिए बना था। लेकिन इटली इस गठबंधन का स्थायी स्दस्य बने रहना नहीं चाहता था। क्योंकि आस्ट्रिया-हंगरी के साथ कहीं कहीं इसका सीमा विवाद भी चल रहा था। इटली उत्तरी अफ्रीका के लीबिया को अपने साम्राज्य का अंग बनाना चाहता था। जब फ्रांस ने इटली को आश्वासन दिया कि वह उसके लीबिया अभियान में बाधा नहीं डालेगा तब इटली ने भी बदले में फ्रांस को यह आश्वासन दे डाला कि वह फ्रांस जर्मनी युद्ध में हिस्सा नहीं लेगा। किन्तु इटली । त्रि-गठबंधन से औपचारिक रूप से अलग नहीं हुआ। प्रथम विश्वयुद्ध के आरंभ होने पर इटली ने तटस्थता की घोषणा कर दी। तथापि इतालवियों के मन में युद्ध में हस्तक्षेप करने के सवाल पर घोर संशय बना रहा। समाजवादी जो इटली की संसद में 80 सदस्य थे, अगर सरकार की तटस्थता की नीति का समर्थन कर रहे थे तो अन्य दूसरे पूंजीपति, हथियारों के निर्माता व दक्षिणपंथी राजनीतिक समूह युद्ध में हस्तक्षेप करने के पक्षधर थे। अंततः इटली केन्द्रीय शक्तियों के खिलाफ गठबंधन के साथ युद्ध में शामिल हो गया। गठबंधन ने इटली से वादा किया कि अगर युद्ध में उसे विजय मिलती है तो वह जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी के कुछ हिस्से इटली को सौप देगा। जो क्षेत्र इटली को सौंपे जाने थे वे थे टायरोल से लेकर ब्रेनर पास तक क्षेत्र ट्राइस्टे, फियूम, गार्सिया तथा डालमातियन क्षेत्र के कई द्वीप। इस तरह अपने साम्राज्य के विस्तार की प्रत्याशा में इटली त्रिपक्षीय संधी से अलग हो गया। वह अंततः 23 मई, 1915 को युद्ध में शामिल हो गया।

युद्ध में इटली की जीत हुई। युद्ध के अंतिम दिनों में इटली ने गठबंधन की ओर से युद्ध में बहुमूल्य योगदान किया था। किन्तु युद्ध खत्म होने के तुरन्त बाद उसे अहसास होने लगा कि युद्ध में उसे आशा से बहुत ज्यादा खर्च करना पड़ गया है। अनुमानतः युद्ध में 7000000 इटालियन सैनिक मारे गये थे तथा 1000000 घायल हुए थे। आर्थिक क्षति तो चिंता का कारण थी ही। इस स्थिति में इटली के पेरिस शांति सम्मेलन का ही भरोसा रह गया था। वे आशा कर रहे थे कि उन्हें वो तमाम क्षेत्र मिल जायेंगे जिनके बारे में वादा किया गया था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विल्सन का। आदर्शवाद इटली के मार्ग में रोड़े बन कर खड़ा हो गया। इस वादा खिलाफी के लिए इटली ने इंगलैंड व फ्रांस को दोषी ठहराया। उन्हें पता चला कि फियूम भी उन्हें नहीं मिलेगा। अभी पेरिस शांति सम्मेलन चल ही रहा था कि इटली के कवि गैब्रियल डि अनुन्जियों ने तख्तापलट की योजना लेकर फियूम पर कब्जा कर लिया। पेरिस शांति सम्मेलन में इसकी तीखी भर्त्सना की गयी। प्रधानमंत्री और लैण्डों, जो पेरिस शांति सम्मेलन में इटली को न्याय दिलाने में विफल रहा था, को हटाकर 1920 में जियोलिती को प्रधानमंत्री बना दिया। नये प्रधानमंत्री ने कवि के उग्र-राष्ट्रवाद की अवधारणा से असहमति जतायी। मियोलिती ने रिवेलो नामक स्थान पर 1920 में युगोस्लाविया के एक समझौता किया जिसके फलस्वरूप फियूम युगोस्लोवाकिया को लौटा दिया जायेगा। मियोलिनी के इस कदम से सरकार अत्यंत अलोकप्रिय हो गयी और प्रकारान्तर से यही इटली में फासीवाद के बढ़ने का महत्वपूर्ण कारण भी बना।

अल्बनियाई समस्या भी गियोलिनी की सरकार की अलोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण कारण थी। एड्रियेटिक सागर के दूसरे तट पर बसा अल्बानिया एक छोटा सा देश है। पुर्तगाल व युगोस्लाविया इसके निकटतम पड़ोसी हैं। युद्ध के दौरान अल्बानिया पर गठबंधन का कब्जा हो गया था। युद्ध के बाद इटली अल्बानिया को मैडेटेड क्षेत्र के रूप में घोषणा करवा कर अपना आसन कायम करना चाहता था। किन्तु पेरिस शांति सम्मेलन ने इटली की यह मांग ठुकरा दी। इतना ही नहीं, अल्बानिया को पुर्तगाल, युगोस्लाविया तथा इटली के बीच बांट देने का प्रस्ताव भी अस्वीकृत हो गया। फिर भी इटली के सैनिक अल्बानिया पर अपना कब्जा बनाये रहे। उन्नीसवी सदी के दूसरे दशक के मध्य तक इटली में अनेक आंतरिक समस्याएं पैदा हो गई जिसके चलते प्रधानमंत्री को मजबूरन अपनी सैन्य टुकड़ियों को अल्बानिया से हटाना पड़ा। प्रधानमंत्री के इस कदम से इटली की जनता क्रुद्ध हो उठी।

इसके अलावा फ्रांस और इंगलैंड ने 1915 में निकट पूर्व के जिन क्षेत्रों को इटली के हवाले कर देने का वादा किया था, वह भी इटली को हासिल नहीं हुआ। वे क्षेत्र या तो पुर्तगाल को दे दिए गये या फिर उन्हें तुर्की के अधीन ही रहने दिया गया। अफ्रीका में इंगलैंड, फ्रांस एवं बेल्जियम ने जर्मनी के कितने ही उपनिवेशों को मैडेट में बदल दिया था, लेकिन इटली को कोई भी उपनिवेश नहीं मिला। उसे सिर्फ लीबिया और सोमालीलैंड के अपने उपनिवेशों में विस्तार करने का मौका मिला। इटली के लोग विदेशी मामलों के ऐसे कुप्रबंधन से काफी नराज थे। इटली के मिजाज की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति उस वाक्यांश में हुई थी जिसमें इटली की जीत को अपंग जीत की सजा दी गयी थी।

इटली की आर्थिक स्थिति भी अराजक थी। लाखों की संख्या में लोग सेवा से निकाल दिए गए थे। बेरोजगारी, बजटीय घाटा और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही थी। यह स्थिति समाजवादी ताकतों के बढ़ने के लिए अनुकूल थी। 1919 के संसदीय चुनाव में समाजवादियों को 156 सीटें मिली थी। किन्तु वे सदैव सरकारी कदमों का विरोध करते रहे और इस तरह संसद को पंगु बना के छोड़ दिया। इसकी तरफ कम्युनिस्ट और उसके सहयोगी विरोध व प्रदर्शनों का आयोजन कर रहे थे। 1919 से 1920 में हड़ताल, तालाबंदी एवं विरोध के कारण 35,00,000 कार्य दिवसों की क्षति हुई थी।

सरकार इस संकट से जूझने में असमर्थ थी। अगर संसद समस्याओं का समाधान नहीं कर पायी तो कम्युनिस्ट भी कोई पूर्ण विकल्प नहीं सुझा सके। उल्टे, इटली के समाज और अर्थतंत्र को भी झकझोरते रहे। इन परिस्थितियों में फासीवादी नेतृत्व जनता को यह समझने में सफल हो गया कि इटली को एक मजबूत कारगर, राष्ट्रवादी और गैर तथा मार्क्सवादी सरकार की सख्त जरूरत है। इसी पृष्ठभूमि में बेनितो मुसोलिनी सत्ता पर काबिज हुआ तथा इटली में फासीवाद की स्थापना हुई।

यूरोप में नव-फासीवाद
शीतयुद्ध जब समाप्त होने लगा तो फासीवादी तथा नाजी शक्तियों ने फिर से सर उठाना शुरू कर दिया। इस दफा वे उतने जिद्दी एवं दकियानूस नहीं थे जितना कि वे दो विश्वयुद्धों के बीच की अवधि में थे। फासीवाद शुरू से ही राष्ट्र और उसके गुर्गों का अतिवादी व हताश प्रयास रहा था . . . . . वह एक तरफ तो सर्वाधिकारवादी प्रशासन थोपता था तो दूसरी तरफ राष्ट्रवाद का महिमामंडन करता था।‘‘ 1994 में संघवादियों ने इस जुमले को उछालकर इटली में नवफासीवाद के खतरों से सावधान करने का प्रयास किया। फासीवाद एक अनगढ़ व आदिमजातीय विचारधारा है। नवफासीवाद धुर दक्षिणपंथी पार्टी के रूप में संगठित होने की कोशिश कर रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत के बाद यह पहली बार 1994 में हुआ कि इटली की सरकार में नवफासीवादी पार्टी के कुछ सदस्यों को मजबूरन शामिल करना पड़ा। इस पार्टी का नाम नेशनल अलायंस था। यों तो यह पार्टी इंकार करती है कि वह नवफासीवादी पार्टी है, तथापि उसका मुख्य एजेंडा । ‘‘इटालियन सोशल मूवमेंट है। मालूम हो इसका गठन युद्ध के बाद के दिनों में शुद्ध फासीवादी नीतियों के आलोक में हुआ था। लेकिन इसके अंदर भी फर्क है – कठोर एवं सम्माननीय खंड (हार्डलाइन व रेस्पेक्टेबुल विंग)। सरकार में शामिल होने के बाद नव फासीवादियों ने अपने उदारवादी चरित्र को भुनाने का भरसक प्रयास किया। शीतयुद्ध के अंत के असर से एकीकृत जर्मनी अस्तित्व में आया तो वहां भी नव नाजीवादी समूह पनप आये। लेकिन जर्मनी में वे सरकार में शामिल नहीं है। फासीवाद मूलतः नकारात्मक मूल्य बोधों पर आधारित है। उसकी नजर में आदमी का आदमी द्वारा शोषण, राष्ट्रीय घृणा व असहिष्णुता, सब कुछ जायज है। फासीवाद का अगुआ एक करिश्माई व्यक्ति था। 1920 की वर्साय की संधि में इटली के साथ जो अन्याय हुआ था उसकी याद दिलाते हुए वह जनता में राष्ट्रभक्ति का उन्माद खड़ा करने में सफल हो सका था। यह दूसरे दशक की बात है। शीत युद्ध के बाद के दिनों में न तो इटली में और न ही जर्मनी ने धुर दक्षिणपंथी पार्टी में कोई करिश्माई नेता मौजूद है। फिर नवफासीवाद को न्यायसंगत ठहराने का कोई कारण भी नहीं है। लेकिन मतलब यह नहीं कि हम नवफासीवाद को आसानी से खारिज कर सकते हैं। वह अपना खौफनाक सिर फिर से उठा सकता है।

इस तरह स्पष्ट है कि फासीवाद (1922) इटली की पतनशील राजनीतिक संस्थाओं की प्रतिक्रिया में हुआ था और इसीलिए वह कार्ययोजना ज्यादा और विचारधारा कम है। फिर भी यहाँ यह जान लेना उपयोगी होगा कि लगभग प्रत्येक यूरोपीय राज्य में कोई न कोई फासीवाद पार्टी अथवा आंदोलन सक्रिय रूप से प्रकट हुई/हुआ। यह कल के लिए भी सच था और आज के लिए भी सच है। लेकिन इससे इतना ही साबित होता है कि फासीवाद भले ही कोई सामान्य प्रवृत्ति न हो, फिर भी हम ‘‘फासीवादी शैली के प्रशासन की बात तो कर ही सकते हैं। सही है कि जर्मनी की नाजी पार्टी इटली की फासीवादी पार्टी की तर्ज पर प्रकट हुई थी, तथापि बहुत से लोग दोनों को एक ही कोटि में रखना पसंद नहीं करेंगे। इन दो फासीवादी पार्टियों के बीच कितनी थोथी समानता थी यह इसी से साफ हो जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उनका गठबंधन टूटने में कोई देर नहीं लगी थी। फिर भी फासीवाद का नाजीवादी रूप नये अथवा पुराने, विविध फासीवादी प्रयोगों को विचारधारात्मक खुराक (नस्लवाद, हिंसा, क्रूरता) देता रहा है। इस तरह स्पष्ट है कि फासीवाद प्रकृति से प्रयोगधर्मा होता है और इसीलिए वह दृढ़ता से किसी दी हुई विचारधारा का अनुकरण नहीं करता है, भले ही कोई इटली, जर्मनी, स्पेन, रोमानिया और दूसरे देशों में हुए ऐसे प्रयोगों में सामान्य विशेषताओं को रेखांकित कर ले।

बोध प्रश्न 4
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर को मिलाइए।
(1) फासीवाद की तीन अनिवार्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
(2) इटली में फासीवाद के उदय के क्या कारण थे?

बोध प्रश्न 4 उत्तर
1. फासीवाद की तीन विशेषताएं: पराराष्ट्रवादी, सर्वाधिकारवादी, समाजवाद विरोधी, युद्धपोषक, व्यक्तिवाद विरोधी। फासीवाद एक राष्ट्र, एक पार्टी एवं एक नेता के सिद्धांत में विश्वास करता है।

2. इटली के लोगों का मानना है कि पेरिस शांति सम्मेलन में उनके साथ अन्याय हुआ है। इटली में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बनी सरकारें कमजोर थी, नतीजतन वे राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं कर सकी। कम्युनिस्टों की गतिविधियों ने आर्थिक प्रगति को ठप कर दिया था किन्तु सरकार अराजकता पर काबू नहीं पा रही थी।