समुद्र कृषि (mariculture meaning in hindi) , जल कृषि क्या होती है (aquaculture in hindi)

By   July 2, 2020

(mariculture meaning in hindi) समुद्र कृषि किसे कहते है ? जल कृषि क्या होती है (aquaculture in hindi) परिभाषा क्या है ?

अनवीकरणीय या अपुनर्विकास योग्य संसाधन (non renewable resources meaning in hindi) :

जल : पृथ्वी पर जल की बहुलता प्रतीत हो सकती है। लगभग पृथ्वी की सतह का तीन चौथाई हिस्सा जलमग्न माना जाता है। लेकिन यह सम्पूर्ण जल हमारे उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं है। सम्पूर्ण जल का लगभग 97% महासागरों में उपस्थित है और यह महासागरों में उपस्थित जल खारा होने के कारण हमारे उपयोग का नहीं है। अन्य लगभग 2% हिमानियों तथा पर्वत शिखरों को अच्छादित करने वाली बर्फ के रूप में है। 1% से भी कम मात्रा हमारे उपयोग के लायक है तथा नदियों , झीलों एवं तालाबों में या भू-जल के रूप में है। इन्ही स्रोतों पर अधिकांश स्थल जीवियों को निर्भर रहना पड़ा है। इस तथ्य को ध्यान में रखने से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि पानी कितनी दिर्लभ वस्तु है तथा पानी को संरक्षित करना कितना आवश्यक है।

भारत में जल का सबसे अधिक उपयोग कृषि के लिए होता है। सम्पूर्ण भारत में होने वाली जल की खपत लगभग 90% कृषि के लिए होती है। एक किलोग्राम गेहूं उत्पन्न करने के लिए 500 किलोग्राम जल चाहिए। अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए अनुकूल मौसम , उन्नत बीज , कीटनाशक उर्वरक , उपजाऊ मिट्टी आदि महत्वपूर्ण होते है लेकिन ये सब जल के बिना कुछ भी लाभ नहीं कर सकते।

उद्योगों के लिए भी जल परम आवश्यक साधन है। उद्योगों में लगने वाले जल का 60% बिजली निर्माण तथा 40% विभिन्न औद्योगिक प्रक्रमों के लिए होता है। ऐसी बहुत कम औद्योगिक प्रक्रियाएं है जिनमे जल बिल्कुल नहीं लगता। उद्योगों में जल का विभिन्न प्रकार का उपयोग होता है जैसे –

घुलाने वाले तरल के रूप में , ऊष्मा को स्थानांतरित करने वाले माध्यम के रूप में , प्रक्षालन करने वाले साधन के रूप में तथा शीतलक के रूप में।

हम में से कम ही लोगों को पता होगा कि रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुओं के बनाने में कितने जल की आवश्यकता हुई होगी। उदाहरण के लिए एक टन इस्पात अथवा कागज बनाने के लिए 100 टन जल चाहिए। तथा एक टन प्लास्टिक बनाने के लिए 30 टन जल चाहिए।

एक लीटर पेट्रोल को परिशुद्ध करने के लिए 70 लीटर जल की आवश्यकता होती है।

उद्योग जल का उपयोग तो करते है , अवांछित पदार्थों को जल स्रोतों में बहाकर उपलब्ध जल को परिसीमित भी करते है। औद्योगिक कचरे नदी झीलों आदि सतही जल स्रोतों को ही प्रभावित नहीं करते , वरन जमीन में रिसकर भू जल को भी प्रदूषित कर डालते है। भारत का दो तिहाई से अधिक भू जल इस प्रकार दूषित है।

इन उपयोगों के अलावा मलिन पदार्थों की निकासी के लिए परिवहन के लिए भी जल आवश्यक है।

जल संरक्षण : हमारे देश के अधिकांश भागों में जल एक दुर्लभ वस्तु है। अनेक गाँवों में कोसों चलकर घरेलु उपयोग के लिए जल लाना पड़ता है।

जहाँ जल आसानी से उपलब्ध नहीं होता वहां लोग उसे समझदारी से उपयोग करते है तथा जल का अपव्यय नहीं करते है। लेकिन बहुधा घरों में रोज नए सिरे से जल भरते है तथा पिछले दिन के जल को यों ही फेंक देते है। रिसते नलों की तुरंत मरम्मत नहीं करवाते है। घर में नलों को यों ही खुला छोड़ देते है। कपडे धोते अथवा बर्तन माँजते समय नल भी खुला रखा जाता है। तथा जल व्यर्थ खर्च होता रहता है। नल से जल पीते व्यक्त उंगुलियो के मध्य से आधा जल निचे चला जाता है। लौटे से पीते व्यक्त हम बचे हुए जल को फेंक देते है।

जल के संरक्षण के लिए हम बहुत कुछ कर सकते है। एक तो रिसते नलों को ठीक करना चाहिए। एक उदाहरण ले – यदि किसी घर में रोजाना 150 लीटर जल व्यर्थ उपयोग किया जाता है , यदि किसी शहर में 10 लाख घर हो और प्रत्येक घर से 5 – 5 लीटर जल रोज बेकार जाता हो तो साल भर में उस शहर के लोग 18250 लाख लीटर जल को यों ही गंवाते है .इतने जल से तो एक छोटा तालाब भर सकता है।

यह मात्र घरेलु जल उपयोग से सम्बन्धित तथ्य है , विश्व और पृथ्वी के सन्दर्भ में जल की उपयोगिता तथा उसका प्रबंधिकरण अन्य तरीके से होता है।

जल कृषि और समुद्र कृषि (aquaculture and mariculture)

विश्व के समस्त जल भंडार मानव के लिए जीवन का वरदान है। इन जलीय संसाधनों के माध्यम से अनेकों उपयोगी खाद्य पदार्थों का उत्पादन किया जाता है। आज मानव के लिए सबसे अधिक आवश्यक पदार्थ प्रोटीन की आपूर्ति का प्रमुख संसाधन जल कृषि तथा समुद्री कृषि ही है। स्वच्छ जल तथा समुद्र के जल में अनेकों प्रकार की मछलियों जैसे झींगा मछली , लोबस्टर तथा केंकड़ा आदि अनेकों जलीय जंतुओं का उत्पादन किया जाता है। इन आर्थिक महत्व के जलीय जन्तुओ के उत्पादन को ही जल कृषि कहते है।

आदिकाल से ही मानव के लिए जल कृषि का अत्यधिक महत्व है। लाखों लोगो के लिए सर्वोत्तम तथा सरलता से पाचन योग्य प्रोटीन्स के अतिरिक्त अनेकों प्रकार के औषधि तेल , विटामिन ए तथा विटामिन डी , अनेकों प्रोटिओलाइटिक एंजाइम , खनिज तथा इन्सुलिन आदि की नियमित आपूर्ति जल कृषि उत्पादन (मछलियों) से ही संभव है। आर्थिक महत्व के अनेकों अन्य आवश्यक पदार्थ , जैसे अग्निशमनकारी झाग उत्पादक , मदिरा को स्वच्छ करने वाले आइसिनग्लास प्राकृतिक तथा कृत्रिम मोती , चमडा , गोंद तथा अनेकों प्रकार के एमिनो अम्ल भी जल कृषि उत्पादन से प्राप्त होते है। वास्तव में जापान , इंडोनेशिया इत्यादि अनेक देशों ने जल कृषि के उचित प्रबंधिकरण तथा संरक्षण से अपने देश की स्वास्थ्य एवं आर्थिक समस्याओं का समाधान कर लिया है। अत: समस्त जल भण्डारो का संरक्षण तथा विकास अति आवश्यक है।

जल कृषि को निम्नलिखित दो मुख्य समूहों में विभाजित किया गया है –

(1) स्वच्छ जल कृषि (freshwater or inland fisheries) : समस्त स्वच्छ जल स्रोत जैसे नदियाँ , झरने , पोखर , झीले , तालाब आदि स्वच्छ जल कृषि संसाधन है।

(2) समुद्री जल कृषि : विभिन्न समुद्र महासागरों को इस समूह में रखा गया है।

(1) स्वच्छ जल कृषि : विश्वभर में लगभग सभी देशो में अनेकों स्वच्छ जल स्रोत है लेकिन हमारे देश में स्वच्छ जल संसाधन विशेष रूप से प्रचुरता दर्शाते है। गंगा विश्व की बड़ी नदियों में से एक है , जो लगभग 3129 किलोमीटर लम्बे क्षेत्र में बहती हुई अनेकों सहायक नदियों जैसे यमुना , रामगंगा , गोमती , घाघरा , कोसी , बेतवा , गण्डक , चम्बल , केन , टोन्स और सोन आदि का निर्माण भी करती है , जिनकी संयुक्त लम्बाई 8000 किलोमीटर है। इसी प्रकार हिमालय से ही ब्रह्मपुत्र , चिनाव , झेलम , रावी , सिंध आदि विशाल नदियाँ तथा उनकी सहायक नदियाँ निकलती है। नदियों के अतिरिक्त पूरे देश में अनेकों झील , सागर , प्राकृतिक बाँध तथा पोखर आदि भी जलीय कृषि के अच्छे संसाधन है , जिनका अनुमानित क्षेत्रफल 96 लाख हैक्टेयर है तथा उत्पादन लगभग 67 लाख टन मछली प्रतिवर्ष होता है। यह अनुमान लगाया गया है कि 75 लाख से अधिक लोग जल कृषि उत्पादन से अपनी रोजी रोटी कमा रहे है एवं 23 हजार से अधिक लोग परोक्ष रूप से मछलियों के जाल , दलिया , बर्फ आदि सामान रोजगार प्राप्त करते है। लेकिन स्वच्छ जलीय संसाधनों की विशालता के अनुरूप उत्पादन तथा रोजगार के अवसर अति अल्प है। यदि इन संसाधनों का उचित विकास एवं संरक्षण किया जाए तो अनेकों आर्थिक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

स्वच्छ जल कृषि उत्पादन में गिरावट तथा विनाश का खतरा बढ़ रहा है। स्वच्छ जल कृषि को सर्वाधिक हानि पहुँचाने वाले प्रमुख कारण निम्नलिखित है –

(i) बाँध और जलाशय निर्माण : अनेकों जल कृषि विशेषज्ञों ने पाया कि बाँध एवं जलाशय निर्माण से मछली उत्पादन की ओर गंभीर विपरीत प्रभाव पड़ता जा रहा है। मत्स्य विज्ञानियों ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि बाँध तथा जलाशय मछली के उत्पादन में बाधक है।

(ii) जल प्रदुषण : स्वच्छ जल कृषि के लिए सबसे अधिक गंभीर संकट जल प्रदूषण ने उत्पन्न कर दिया है। आधुनिकीकरण की दौड़ में अनेकों उद्योगों का रासायनिक बहाव तथा कचरा जल स्रोतों में मिला दिया जाता है। अनेकों कारखाने एवं विद्युत गृह मशीनों को ठंडा गर्म करके वापस नदियों और झीलों में डालकर जलीय प्राणियों का जीवन असंभव बना रहे है। अनेकों प्रकार के जल प्रदूषण से जल कृषि को गंभीर खतरा बढ़ता जा रहा है। उपाय करके हमें जल कृषि को संरक्षित करना होगा। हालाँकि जल प्रदूषण को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर गंभीर प्रयास किये जा रहे है। एवं प्रभावी कानून भी बनाये गए है। फिर भी अभी बहुत कुछ करना शेष है। जल प्रदुषण रोकने के लिए जन-चेतना जागृत करना अधिक आवश्यक है। जल कृषि के संरक्षण के लिए नदियों पर बाँध एवं जलाशय निर्माण से पड़ने वाले विपरीत प्रभावों पर अभी आवश्यक ध्यान नहीं दिया गया है , अत: इस समस्या को भी पूर्ण गंभीरता से लेकर ही जल कृषि को संरक्षण प्रदान नही किया जा सकता , इस दिशा में जीव वैज्ञानिकों तथा जल प्रबंधिकरण अभियंताओं का समन्वित प्रयास आवश्यक हो गया है।

(iii) जल स्रोतों को कभी कभी अतिवृष्टि अथवा बाढ़ से भारी हानि उठानी पड़ती है।

2. समुद्री जल कृषि (mariculture)

स्वच्छ जल कृषि की भांति जल कृषि भी अति महत्वपूर्ण है। भारतवर्ष के तीन ओर लगभग 4667 किलोमीटर लम्बी समुद्री सीमा है , जिसको प्रमुख रूप से बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर ने बनाया है। इतना विशाल समुद्री क्षेत्र वास्तव में समुद्री जल कृषि उत्पादन का असिमित संसाधन है।

लेकिन जापान , इंडोनेशिया , ऑस्ट्रेलिया तथा यूनाइटेड किंगडम (यू.के.) की तुलना में हमारा उत्पादन बहुत कम है। विश्व कृषि और खाद्य संगठन की 1967 की रिपोर्ट के अनुसार अभी हमारा उत्पादन बहुत कम है। इसकी रिपोर्ट के अनुसार विश्व समुद्री कृषि उत्पादन लगभग 550 लाख टन का हमारे देश में मात्र 21 लाख टन उत्पादन किया था। हालाँकि भारत सरकार उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रही है , लेकिन समुद्र तट पर समुद्री जल की मूल स्वच्छता बनाये रखने की दिशा में गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है।

पिछले कुछ वर्षो में संयुक्त राष्ट्र संगठन सहित विभिन्न संस्थाओं ने समुद्री जल एवं समुद्री जन्तुओं के संरक्षण के लिए अनेकों उपाय किये है , लेकिन समस्या की गंभीरता के अनुरूप अभी और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है।

समुद्र और महासागर : जैसा कि पहले भी स्पष्ट किया गया है कि इनका संरक्षण किसी अकेली देश के बस की बात नहीं है लेकिन अन्तराष्ट्रीय स्तर पर किये जा रहे प्रयासों में सभी को निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना होगा –

  • तटीय क्षेत्रों पर खुलने वाली नदियों के कचरे तथा रेत , बालू आदि का बहाव कम किया जाए , जिससे तटीय मूल क्षेत्र की प्राकृतिक रचना सुरक्षित रह सके।
  • समुद्र एवं महासागरों में चलने वाले जलपोतों से खनिज तेलों के बहाव तथा बिखराव पर नियंत्रण किया जाए , जिससे जलीय प्राणियों की जीवन रक्षा के साथ साथ भविष्य में भी इन प्राकृतिक विशाल जल भण्डारों का सुरक्षित उपाय किया जा सके।
  • महासागरीय और समुद्री जल में परमाणु परीक्षणों पर तुरंत रोक लगाई जाये अन्यथा जल की भौतिक , रासायनिक तथा कार्यिकी रासायनिक संरचना नष्ट हो जाएगी और रेडियोधर्मिता के सभी संभावित दुष्परिणाम विकसित हो जायेंगे।
  • विश्व के समुद्र तथा महासागरों को मात्र असिमित विशाल कचरा ढलाव घर अथवा कूडादान मान लेना महान भूल है। इनकी क्षमता भी सिमित है जिसको सुरक्षित रखना मानव जीवन के लिए अति आवश्यक है। समुद्री तट के आसपास अंधाधुंध औद्योगिक तथा अन्य आधुनिकीकरण की गतिविधियों की अधिकता से जल चक्र , वर्षा चक्र तथा ऋतू चक्रो पर विपरीत प्रभाव पड़ता है , अत: समन्वित विकास करना होगा।

बाढ़ नियन्त्रण : अधिकतर जगहों पर जल एक मुख्य अपरदनकारी बल है। अपरदन नियंत्रण में जल छप्पर बचाव और नदी नियंत्रण सम्मिलित होना चाहिए। अगर पहाडियों और घाटियों से पानी तेजी से बहता है तो मृदा अपरद होती है। तथा सतही मृदा को वर्षा से कोई लाभ नहीं होता , इसके अतिरिक्त इस प्रकार तेजी से पानी बहने से बरसात के मौसम में बाढ़ आती है और दुसरे समय सुखा पड़ता है।

जल छप्पर नियन्त्रण के साथ साथ कई संरक्षणवेत्ताओं का सुझाव छोटे छोटे झरनों पर बाँध बनाने का है। वास्तव में बाँध और मृदा संरक्षण प्रयोगों को ही आवश्यकता है , जिससे की हमारी जल और मृदा संरक्षण समस्या हल हो सकती है। अगर मृदा संरक्षण प्रयोग नहीं अपनाएँ जाते तो बाँध तेजी से कट जाते है। दूसरी तरफ अकेले भूमि संरक्षण प्रयोग सभी प्रकार की बाढ़े नहीं रोक सकते और जलविद्युत शक्ति और दुसरे उपयोग , जो अधिक जल से प्राप्त होते है , प्रदान नहीं कर सकते।