भूमिधारी किसे कहते है | भूमिधर का अर्थ जमीन क्या होता है | landowner in hindi meaning definition

By   October 14, 2020

landowner in hindi भूमिधारी किसे कहते है | भूमिधर का अर्थ जमीन क्या होता है ? what is meaning and definition ?

भूमिधारी
दक्षिण और दक्षिण-मध्य भारत में जहाँ रैयतबाड़ी व्यवस्था शुरू की गई, भूमिधारियों के एक वर्ग का उगमन हुआ। इन इलाकों में खेतिहर भू-राजस्व के अपने भुगतान के बदले में अपने भू-खण्डों के स्वामियों के रूप में पहचाने जाते थे। इस वर्ग की आम स्थिति मुख्यतः अत्यधिक भूमि-कर, जोत के अपूर्ण आकार और भारी ऋणग्रस्तता की वजह से बिगड़ी । कुछ भूमिधारियों की हालत सुधरी और वे धनी खेतिहरों की श्रेणी में आ गए लेकिन उनमें से अधिकांश दयनीय रूप से सफल हुए और दरिद्र खेतिहरों और दूरवासी भू-स्वामियों के काश्तकारों की श्रेणी में आ गए। उनमें से कुछ तो भूमि-श्रमिकों के वर्ग में ही आ गए। ये भूमिधारी काश्तकारों से आगे निकलकर राजनीतिक रूप से सचेत हो गए। ऐसा इसलिए था क्योंकि वे विदेशी शासन से सीधे सम्पर्क में थे जबकि जमींदारी वाले क्षेत्रों में जमींदार सरकार और काश्तकारों के बीच मध्यस्थता करते थे। इन भूमिधारियों को अपने शत्रु, अंग्रेजी शासन, की पहचान करने में मुश्किल नहीं आयी। ये काश्तकार जमींदारों को शत्रु मानते थे न कि अंग्रेजी शासन को। इन काश्तकारों की यह सचेतता वर्ग-सामंजस्य की गाँधीवादी विचारधार के कारण कुण्ठित भी थी। गाँधीजी स्वराज-प्राप्ति के लिए जमींदारों और काश्तकारों के बीच एकता की आवश्यकता पर बल देते थे। किसान सभा के एन.जी. रंगा व सहजानन्द जैसे नेताओं ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर काश्तकारों के लिए माँगों का एक कार्यक्रम निरूपित करने हेतु दवाब डाला। उनका यह भी कहना था कि कांग्रेस कुछ क्षेत्रों में काश्तकारों के हितों के विरुद्ध जमींदारों के साथ मिली हुई है।

बोध प्रश्न 1
नोटः क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें।
1) उन कारकों को पहचानें जिनसे नए वर्गों का उदय हुआ।
2) अंग्रेजों ने जमींदार-वर्ग का निर्माण क्यों किया?
3) जमींदारों द्वारा काश्तकारों का किस प्रकार शोषण होता था?

बोध प्रश्न 1 उत्तर
1) पूँजीपति व्यवस्था, नया प्रशासनिक ढाँचा और एक आधुनिक शिक्षा-प्रणाली का आविर्भाव ।
2) एक वफादार वर्ग के निर्माण द्वारा अपने हितों की रक्षा करना, जो उन्हें भारत पर शासन
करने के लिए राजस्व व अन्य प्रकार का समर्थन दिला सके ।
3) लगान बढ़ाकर, भूमि के बेदखली और शारीरिक उत्पीड़न ।

 किसान आंदोलन, मुख्य महत्त्वपूर्ण घटनाएँ
फरवरी 1918 में उत्तर प्रदेश किसान सभा के संघटन में भारत में किसान आंदोलनों के इतिहास में एक जल-संभर विकास का संकेत दिया। इस काल के आस-पास किसानों ने राजनीतिक सचेतता दर्शानी शुरू कर दी। वे अब राष्ट्रवादी संघर्षों में भाग लेने लगे। उनके संगठन अपने कार्यक्रमों और उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अपने ही नेतृत्व में उद्गमित हुए। इसका मतलब यह नहीं है कि 1918 से पूर्व कोई किसान आंदोलन हुए ही नहीं थे। वास्तव में कई हुए थे। लेकिन ये आंदोलन संकीर्ण और स्थानीय उद्देश्य रखते थे तथा उपनिवेशवाद की किसी प्रकार की उचित समझ अथवा एक वैकल्पिक समाज की किसी भी संकल्पना से रहित थे। एक ऐसी अवधारणा जो अखिल भारतीय स्तर पर एक आम संघर्ष में लोगों को संगठित कर सकती और कोई दीर्घावधि राजनीतिक आंदोलन जारी रख सकती, का अभाव था।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रमुख किसान आंदोलनों में एक था 1859-60 की नील क्रांति । नील इंग्लैण्ड में कारखानों द्वारा उत्पादित सूती वस्त्रों के लिए एक अभिरंजक के रूप में प्रयोग की जाती थी। लगभग सभी नील-बागान मालिक यूरोपियन थे और वे किसानों पर अपनी भूमि के सर्वोत्तम भाग पर नील उगाने के लिए दवाब डालते थे। अधिकांश न्यायाधीश भी यूरोपियन थे और किसी विवाद की स्थिति में वे इन बागान मालिकों का ही पक्ष लिया करते थे। यह नील क्रांति 1860 तक बंगाल के सभी नील-उत्पादक जिलों पर छा गई। किसान अपने विरुद्ध दायर न्यायालिक केसों को लड़ने हेतु धन उगाहने के लिए संगठित हो गए। ये बागान मालिक संयुक्त दवाब के आगे झुक गए और अपने कारखाने बंद कर दिए। नील क्रांति में बुद्धिजीवी-वर्ग की भूमिका राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों पर दूरगामी प्रभाव डालने की थी। दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नील दर्पण‘ इन बागान मालिकों द्वारा शोषण की अपनी विशद व्याख्या के लिए विख्यात हो गया।

1870 से 1880 के दौरान पूर्वी बंगाल के एक बड़े हिस्से में जमींदारों के वैध सीमाओं से परे लगान बढाने के प्रयासों से उत्पन्न हुई कृषिक हलचल को देखा गया। ऐसा वे काश्तकारों को 1859 के अधिनियम-ग् के तहत कब्जा लेने के अधिकारों से रोकने के लिए कर रहे थे। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने जबरन बेदखली और फसल अभिग्रहण जैसे अवपीड़क तरीके अपनाए। मई 1873 में जमींदारों की माँगों का विरोध करने के लिए पबना जिले में एक कृषक संघ बनाया गया। काश्तकारों ने बढ़ाए गए लगान को चुकाने से इंकार कर दिया और न्यायालयों में जमींदारों को चनौती देने के लिए धन उगाहया। अधिकांश विवाद अंशतः सरकारी दवाब के कारण और अंशतः जमींदारों को संगठित कृषिवर्ग द्वारा लम्बी खिंचती कानूनी लड़ाई में घसीटे जाने के भय से निबटा दिए गए। 1885 का बंगाल कृषिवर्ग अधिनियम जमींदारी व्यवस्था के निकृष्टतम पहलुओं को सम्बोधित करने का एक प्रयास था।

1875 में महाराष्ट्र के पूना और अहमदनगर जिले प्रमुख कृषिक उपद्रवों की रंगशालाएँ बन गए। अमेरिकन गृह-युद्ध के कारण 1860 के दशक में इन क्षेत्रों में कपास के भाव चढ़ गए। गृह-युद्ध समाप्त होते ही कपास के भाव सहसा गिरे। सरकार द्वारा लगान में पचास प्रतिशत की वृद्धि और लगातार खराब फसलों के सिलसिले ने कृषकों की मुसीबतों को और बढ़ा दिया। किसानों के पास साहूकारों की शरण में जाने के सिवा कोई चारा न रहा । साहूकारों ने इस मौके का लाभ किसानों और उनकी भूमियों पर अपनी पकड़ मजबूत करने में उठाया। किसानों ने साहूकारों को एक सम्पूर्ण सामाजिक बहिष्कार आयोजित किया। उन्होंने साहूकारों के घरों पर हमला किया और ऋण-लेखे भी जला दिए। इस उपद्रव के जवाब में, 1879 में सरकार दक्कन कृषक राहत अधिनियम‘ ले आयी। उन्नीसवीं शताब्दी में देश के दूसरे भागों में अन्य महत्त्वपूर्ण कृषक आंदोलनों में थे – मालाबार क्षेत्र में मापिला विद्रोह और पंजाब की कूका क्रांति ।

बीसवीं शताब्दी में कृषक आंदोलन उन्नीसवीं शताब्दी के आंदोलनों से भिन्न थे। अब कृषक आंदोलन और स्वतंत्रता संघर्ष एक-दूसरे को प्रभावित करने लगे। बीसवीं शताब्दी के दूसरे व तीसरे दशकों में तीन प्रमुख आंदोलन उद्गमित हुए: उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में किसान सभा और एका आंदोलन, मालाबार क्षेत्र में मापिला विद्रोह और गुजरात में मशहूर बारदोली सत्याग्रह । उत्तर प्रदेश में किसानों के सामने थीं बेहिसाब लगान, अवैध उदग्रहण, बेगार (बिन-भुगतान श्रम), बेदखली (निष्कासन) की समस्याएँ। युद्धोपरांत आवश्यक उपभोक्त्ता-वस्तुओं के दामों में भारी वृद्धि ने उनकी समस्याओं को और बढ़ा दिया था। उत्तर प्रदेश किसान सभा 1918 में बनी और जून 1919 तक यह इस प्रांत में 450 शाखाएँ खोल चुकी थीं। 1920 में एक वैकल्पिक अवध किसान सभा बनायी गई, जो अवध की सभी तण-मूल किसान सभाओं को एकीकृत करने में सफल हुई। इस अवध किसान सभा ने सभी किसानों से बेदखली जमीन को जोतने से इंकार करने और बेगार न करने की अपील की। 1921 के अवध लगान अधिनियम ने इन माँगों में से कुछ को सम्बोधित करने का प्रयास किया। 1921 के अंत तक अवधः के कुछ हिस्सों में एका (एकता) आंदोलन के नाम से एक दूसरा आंदोलन जन्मा। असंतोष का मुख्य कारण था कि अवध के इन क्षेत्रों में लगान अंकित, लगान से पचास प्रतिशत अधिक था। सरकार द्वारा कठोर दमन से यह आंदोलन समाप्त हो गया। केरल का मालाबार क्षेत्र, जो उन्नीसवीं शताब्दी में भी गड़बड़ झेल चुका था, ने अगस्त 1921 में मापिला (मुस्लिम) कृषकों द्वारा किया गया विद्रोह देखा। नम्बूदरी ब्राह्मण भू-स्वामी मापिला किसानों का शोषण करते थे। यह विद्रोह एक सरकार-विरोधी भू-स्वामी-विरोधी कार्यवाही के रूप में शुरू हुआ लेकिन इसने साम्प्रदायिक रंग ले लिया। इसे सरकार द्वारा निर्ममतापूर्वक कुचल दिया गया। 1928-29 में कृषिवर्ग का एक अन्य महत्त्वपूर्ण संघर्ष छिड़ गया। 1926 में सूरत जिले के बारदोली तालुका में लगान में कोई तीस प्रतिशत वृद्धि की सिफारिश की गई। कृषिवर्ग सरदार पटेल के कुशल नेतृत्व में लड़ा। कृषकों में संघर्ष किया और लगान-वृद्धि वापस लेने के लिए सरकार पर दवाब डाला।

1930 के दशक ने भारतीय किसानों की एक देशव्यापी जागरूकता देखी। 1920-30 की आर्थिक मंदी और तत्पश्चात् कृषि उपभोक्ता-वस्तुओं के दामों में सहसा गिरावट ने किसानों की आय को बुरी तरह प्रभावित किया। लेकिन सरकार और जमीदारों ने कर और लगान घटाने से इंकार कर दिया। उत्तर प्रदेश, आंध्र और बिहार में किसान आंदोलनों की एक लहर-सी चल पड़ी। जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस और कम्यूनिस्टों द्वारा प्रचारित वाम विचारधारा प्रभावमय होती जा रही थी। वामपंथियों ने किसानों के एक स्वतंत्र वर्ग संगठन की आवश्यकता पर बल दिया। 1936 में, अध्यक्ष के साथ में बिहार किसान सभा के संस्थापक सहजानन्द और सचिव के रूप में आंध्र किसान सभा के संस्थापक एन.जी. रंगा को लेकर अखिल भारतीय किसान सभा बनाई गई। सम्पूर्ण देश से किसानों की आकांक्षाओं और आम माँगों का प्रतिनिधित्व करते एक अखिल भारतीय संगठन का जन्म एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण घटना थी।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कृषकों, विशेष रूप से जमींदारी क्षेत्रों में रहने वाले काश्तकारों से संबंधित मामलों को उठाने से संकोच करती थी। विपिनचन्द्र के अनुसार कांग्रेस हमारी जनता को विभिन्न आर्थिक हितों पर आधारित राजनीतिक समूहों में बाँटकर भारतीय राष्ट्रवाद को कमजोर नहीं करना चाहती थी। 1930 में गाँधीजी द्वारा ब्रिटिश सरकार को पेश किए गए ‘ग्यारह-सूत्र‘ में लगानों को घटाने व कृषिक ऋणग्रस्तता के प्रतिदान जैसी कृषकों की मुख्य माँगें शामिल नहीं थीं। अधिकांश प्रांतों में कांग्रेसी मंत्रिमण्डलों के निर्माण के कृषकों की उम्मीदों को बढ़ाया। ये मंत्रिमण्डल कृषकों के लिए ऋण-राहत, मंदी के दौरान खोई भूमि का पुनर्ग्रहण और काश्तों की सुरक्षा पर अभिलक्षित अनेक विधि-विधान लेकर आए। इन कदमों ने निम्न स्तर से तादीयत्व वाले कृषकों की स्थिति को प्रभावित नहीं किया। अनेक किसान नेता गिरफ्तार किए गए और उनकी सभाओं पर प्रतिबंध लगाए गए। कांग्रेस पर कृषक-विरोधी होने का आरोप था। किसान सभा के साथ जुड़े उग्र उन्मूलनवादी तत्त्वों ने कांग्रेस पर पूँजीपतियों व जमींदारों के साथ चलने का आरोप लगाया।

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जब स्वतंत्रता मिलती प्रतीत हुई तो किसानों ने अपने अधिकारों का दावा करना शुरू कर दिया। जमींदारी उन्मूलन की माँग एक अत्यावश्यकता के भाव साथ उठायी गई। तेलंगाना में कृषकों ने भू-स्वामियों के दमन का विरोध करने के लिए स्वयं को संगठित किया और निजाम-विरोधी संघर्ष में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। 1946 में बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने उन बटाई काश्तकारों के आंदोलन का नेतृत्व किया जो जोतदारों को अब अपनी फसल का केवल एक-तिहाई देना चाहते थे न कि आधा भाग। इस आंदोलन को श्तिभागा आंदोलनश् के रूप में जाना जाने लगा।