जमीदार क्या होता है | जमीदार वर्ग किसे कहते है भारत में जमींदारी प्रथा किसने शुरू की zamindar in hindi

By   October 14, 2020

zamindar in hindi जमीदार क्या होता है | जमीदार वर्ग किसे कहते है भारत में जमींदारी प्रथा किसने शुरू की किसने चलाई ? who started zamindari system in india in hindi ?

जमीदार
बंगाल और बिहार में लॉर्ड कॉर्नवैलिस द्वारा किए गए 1793 के स्थायी बन्दोबस्त ने कृषक पदान के शीर्ष पर जमींदार वर्ग, एक वैभवशाली वर्ग, को जन्म दिया। इस वर्ग को बनाकर अंग्रेजों का उद्देश्य भारत में अपने शासन हेतु समर्थनाधार तैयार करना था। यह अंग्रेजी शासन की स्थिरता के लिए एक राजनीतिक आवश्यकता थी। चूँकि जमींदार अपने अस्तित्व मात्र के लिए अंग्रेजी शासन के आभारी थे, वे उनके वफादार समर्थक बन गए। बदले में अंग्रेजों ने उन्हें सरकार द्वारा आरम्भ की गई अनेक संवैधानिक योजनाओं में प्रतिनिधित्व व अन्य अनुग्रह प्रदान किए। इस वर्ग की रचना के पीछे एक अन्य मन्तव्य था आय की स्थिरता । कम्पनी के सामने निरन्तर वित्तीय संकट रहता था। बंगाल से उगाहे गए भूमि-राजस्व से कम्पनी के विस्तारवादी युद्धों का वित्त-प्रबंध करना पड़ता था इससे बंगाल, मद्रास और बम्बई में कम्पनी की प्रतिष्ठान-लागतों का भुगतान होता था। इस धन से कम्पनी को निर्यात हेतु खरीदी गई भारतीय उपभोक्ता वस्तुओं के लिए भी भुगतान करना पड़ता था। कम्पनी के सामने समस्या यह थी कि राजस्व वसूली अनियमित थी और उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। 1793 के स्थायी बंदोबस्त में इन दोनों ही समस्याओं का हल था। इससे स्थायी आय की गारण्टी मिल गई और भूमि-राजस्व से कम्पनी की आय भी बढ़ गई। स्थायी बन्दोबस्त ने राजस्व वसूली के काम को आसान भी कर दिया। इससे पहले कम्पनी को लाखों खेतिहरों से सीधे जूझना पड़ता था। अब वे जमींदारों से ही वास्ता रखने लगे जो सरकार और खेतिहरों के बीच बिचैलिये बन गए थे।

ये जमींदार अंग्रेजों के एजेण्ट थे। सरकार को एक निश्चित राजस्व-राशि का भुगतान करने के उनके वायदे के बदले में उन्हें लाचार, आर्थिक रूप से दुर्बल किसानों से चाहे जितना लगान वसूलने का अधिकार मिल गया। अगर ये खेतिहर समय पर राजस्व नहीं चुका पाते थे उन्हें उनकी भूमि से बेदखल कर दिया जाता था। किसी विवाद की स्थिति में जमींदारों के पास उनके पक्ष में अदालतें और सरकारी तंत्र थे। परिणामस्वरूप खेतिहरों की स्थिति जमींदारी वाले क्षेत्रों में बेहद खराब हों गई। कृषि पर भी दुष्प्रभाव पड़ा क्योंकि इन किसानों के पास बीज अथवा खाद पर खर्च करने को मुश्किल से ही कुछ बचता था। ये जमींदार कृषि सुधार के लिए कुछ भी नहीं करते थे। इन्होंने अपना राजनीतिक संगठन बना लिया, यानी, ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन । यह एक अनुदार निकाय था। यह वर्ग हमेशा लोकतंत्र-विरोधी रहा। जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लोकतांत्रिक अधिकारों, प्रशासनिक सुधारों अथवा स्वराज के लिए लड़ रही थी और इन चीजों के लिए उसने संघर्षों को आयोजित किया, ये जमींदार हमेशा सरकार के पक्ष में रहे। इन वर्ग को लोकतांत्रिक संघर्षों का भय था क्योंकि ऐसे संघर्षों की सफलता से न सिर्फ उनके हितों को बल्कि उनके अस्तित्व मात्र को भी खतरा था। अंग्रेजों ने जमींदारों को राष्ट्रवाद की उठती लहर के विरुद्ध एक प्रतितोलक भार के रूप में इस्तेमाल किया।

नए-वर्गों के उदय के कारण
नए भूमि संबंध के पदार्पण की भाँति आर्थिक व्यवस्था का परिवर्तन होना, पूँजीपति जगत् द्वारा वाणिज्यिक दोहन हेतु भारतीय समाज का विवृत्तन, एक नई प्रशासनिक व्यवस्था और एक आधुनिक शिक्षा-प्रणाली का प्रवेशय तथा आधुनिक उद्योगों की स्थापना ही नए सामाजिक वर्गों के उद्गमन हेतु व हद्तः उत्तरदायी कारक थे। स्थायी और रैयतवाड़ी व्यवस्थाओं द्वारा भूमि में निजी सम्पत्ति के सृजन ने वृहद् सम्पदा-स्वामियों, जमींदारों और भूमिधारियों के रूप में नए वर्गों को जन्म दिया। काश्तकारों और सह-काश्तकारों का वर्ग भूमि-पट्टाधृति अधिकार दिए जाने के साथ ही जन्मा। भूमि में निजी सम्पत्ति का अधिकार और भूमि पर काम करने हेतु श्रमिक रखने का अधिकार के फलस्वरूप अन्यत्रवासी भूमि-स्वामी और कृषि-श्रमिक जैसे वर्गों का जन्म हुआ। यहाँ एक वर्ग साहूकारों का भी उद्गमित हुआ। विपणन शक्तियों के लिए नई अर्थव्यवस्था के विवर्तन ने भी नए वर्गों को जन्म दिया। ब्रिटिश शासन के तहत उत्पादन, औद्योगिक और कृषीय दोनों बाजार के लिए होने लगा। इससे उन लोगों के लिए अवसर पैदा हुआ जिनकी भूमिका भारत के भीतर-बाहर माल को आयात व निर्यात करने की थी। इन लोगों को व्यापारियों के रूप में जाना जाने लगा। ब्रिटिश-पूर्व भारत में भी व्यापारियों का यह वर्ग विद्यमान था क्योंकि अंतः और बाह्य दोनों प्रकार का व्यापार अस्तित्व में तो था परन्तु यह स्तर और आकार में बहुत छोटा था। इस वर्ग का समाज में पर्याप्त प्रभाव नहीं था। व्यापारिक वर्ग. जमींदार और व्यावसायिक वर्गों के बीच अपेक्षाकृत धनवान का एक प्रवर्ग के हाथों में लाभ-संचय ने भारतीयों के स्वामित्व वाले वस्त्रादि, खनन व अन्य उद्योगों के उदय हेतु पूँजी-निर्माण किया। इससे देशज पूँजीपति वर्ग का उद्गमन हुआ। इस प्रकार पूरी तरह से नए वर्ग दृष्टिगोचर हुएय एक, औद्योगिक पूँजीपति जो मिलों, खानों व अन्य पूँजीपति उद्यमों के स्वामी थेय दो, वे कर्मचारी जो कारखानों, मिलों, रेलों में व बागानों में काम करते थे।

अंग्रेजों द्वारा लायी गई नई सामाजिक, आर्थिक व राज्य व्यवस्था को भारतीयों के एक ऐसे वर्ग की आवश्यकता थी जो विधि, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, अर्थ आदि व्यावसायिक क्षेत्रों में आधुनिक शिक्षा प्राप्त हो। परे देश में आधुनिक शिक्षा-प्रणाली का समावेश इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया। व्यवसायिकों का यह सदा-प्रसरणशील वर्ग इस नई सामाजिक-आर्थिक व प्रशासनिक व्यवस्था की ही रचना था। यह व्यवसायी-वर्ग ब्रिटिश-पूर्व भारत में था ही नहीं । इन व्यवसायी-वर्गों ने विज्ञान व कला के क्षेत्रों में आधुनिक ज्ञान अर्जित किया था। अंग्रेजों द्वारा लाई गई विधि-व्यवस्था ने उनको अवसर प्रदान किए जिन्होंने कानून की पढ़ाई की। वे जिन्होंने चिकित्सा-शास्त्र पढ़ा सरकारी अस्पतालों और चिकित्सा-कॉलेजों में लगा दिए गए।

 एक नए वातावरण में पुराने वर्ग
भारत ब्रिटिश शासन के अंतर्गत पूँजीवादी दिशा में एक रूपांतरण से गुजरा था किन्तु यह रूपांतरण वैसा सम्पूर्ण नहीं था जैसा कि फ्रांस, इंग्लैण्ड अथवा संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ था। इसका मतलब था औद्योगिक विकास का अवरुद्धन। परिणामतः पुराने वर्गों में से कुछ कायम रहे। ग्राम्य शिल्पकारों और शहरी दस्तकारों के वर्ग ऐसे ही वर्ग थे। लेकिन वह प्रसंग जिसमें वे कार्य कर रहे थे पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की वजह से बदल चुका था। ग्राम्य शिल्पकार अब पहले की तरह ग्राम-समुदाय के सेवक नहीं रहे थे। उन्होंने अपने तैयार माल को बाजार में भेजना शुरू कर दिया। शहरी दस्तकार जो पहले अभिजात्यों, राजाओं व धनी व्यापारियों के लिए काम करते थे, अब अपने उत्पाद बाजार में बेचने लगे। ब्रिटिश-पूर्व काल से एक अन्य महत्त्वपूर्ण वर्ग, जो कायम रहने में सफल हुआ, उन राजाओं का था जो भारतीय राज्यक्षेत्र के लगभग एक-तिहाई पर शासन करते थे। वे इसलिए कायम रहे क्योंकि 1857 के पश्चात् अंग्रेज अधिनहन की नीति छोड़ चुके थे क्योंकि इस वर्ष की क्रांति के दौरान राजागण सामान्यतः अंग्रेजों के प्रति वफादार रहे थे। परन्तु कायम रहने के लिए उन्हें अंग्रेजों की परमोच्चसत्ता स्वीकार करनी पड़ी। इन राज्यों की सभी प्राणाधार शक्तियों सर्वोच्च ब्रिटिश शक्ति के अभिभूत थीं। रेजीडेन्ट्स के माध्यम से अंग्रेजों ने इन राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। इन राजसी राज्यों में आम आदमी की स्थिति दयनीय थी। लोकतांत्रिक स्वतंत्रता समाप्तप्राय थी। भूमि-राजस्व और कराधान बहुत ऊँचे थे और उगाहया गया अधिकांश राजस्व राजाओं की विलासमय जीवन-शैलियों पर खर्च किया जाता था। नई अर्थव्यवस्था के आविर्भाव ने इन राजाओं को कभी-कभी अपने राज्य-क्षेत्र से बाहर भी वाणिज्यिक, औद्योगिक व वित्तीय साहसिक कार्यों में निवेश करने का अवसर प्रदान किया। मध्यकालीन कुलीनों से रूपान्तरित हो वे अब राष्ट्रीय पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से जुड़े पूँजीपति बन गए थे।