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isostasy theory in hindi भू-संतुलन के सिद्धांत की विवेचना करें , भू सन्तुलन की संकल्पना का वर्णन कीजिए ?

भसन्तुलन की संकल्पना का सैद्धान्तिक रूप में विकास (Theoritical Development of Isoi Concept) –
भसन्तुलन की संकल्पना का सैद्धान्तिक रूप में विकास निम्न सिद्धातों व मान्यताओं द्वारा किया जा सकता है
(1) एवरेस्ट का मत :- भू-सन्तुलन को सैद्धान्तिक स्वरूप सर्वप्रथम भारत में मिला। जब 1859 में गंगा-सिन्धु के मैदान में अक्षाशों के निर्धारण के लिए भू-गणितीय सर्वेक्षण हो रहा था यह कार्य भारतीय भूसर्वेक्षण के मुख्य निर्देशक सर जर्ज एवरेस्ट के निर्देशन में त्रिभुजीकरण विधि द्वारा हो रहा था। इस कार्य हेतु देश के कुछ क्षेत्रों को आधार बिन्दु बनाया गया था जिनके अक्षांश एवं देशान्तर सावधानीपूर्वक निर्धारित करने थे ताकि बाद में अन्य क्षेत्रों के सर्वेक्षण में त्रुटि से बचा जा सके। इन क्षेत्रों में अक्षांश का निर्धारण खगोलीय निरीक्षण तथा त्रिभुजीकरण विधियों द्वारा किया गया। गणितीय आधार पर दोनों विधियों का एक ही मान आने पर गणना सही मानी जाती है, लेकिन यहा चयनित दोनों क्षेत्रों, कल्याण तथा कल्याणपुर के अक्षांशीय अन्तर दोनों विधियों में समान नहीं मिले तथा दोनों विधियों में 5.236‘‘ का अन्तर आया कल्याण हिमालय से मात्र 96 किलोमीटर दूर स्थित था। अतः दोनों मापों में अन्तर का कारण स्पष्ट करते हुए सर जर्ज एयरी महोदय ने बताया कि यह क्षेत्र हिमालय के समीप स्थित है जिस कारण पेण्डलम हिमालय की आकर्षण शक्ति से प्रभावित होता है। इस प्रकार इस सन्दर्भ में प्रथम तथ्य का सूत्रपात हुआ तथा यह माना गया कि हिमालय की आकर्षण शक्ति के कारण माप में अन्तर आया था।

(4) डट्टन की धारणा
(Dutton’s Concept)
1889 में अमेरिकी भवैज्ञानिक सी.एफ.डट्टन ने सर्वप्रथम भू सन्तुलन (Isostacy) शब्द का किया। उन्होंने प्राट के मत का समर्थन किया। डट्टन के अनुसार ऊँचे उठे भाग कम घनत्व की शैलों और निचले भाग अधिक घनत्व की शैलों से निर्मित है। डट्टन यह मानते थे कि पृथ्वी के अन्तराल में एक ऐसा तल है जहाँ समस्त ऊँचे-नीचे भू भागों का एक समान दबाव पड़ता है। इस तल को समान दाब तल (स्मअमस वनिदपवितउ चतमेेनतम) या समस्थितिक तल (प्ेवेजंजपब समअमस)कहा जाता है। इस तल के ऊपर सभी भूखण्डों का दाब समान होगा चाहे वो पर्वत हो, पठार हो या मैदान। अतः जो भाग जितना ऊँचा होगा उसका घनत्व कम और जो नीचा होगा उसका घनत्व अधिक होगा।
डॉ. डट्टन के अनुसार भूपटल पर अपरदन निक्षेप या भूसंचलन के कारण जब दाब घट-बढ़ जाता है तो मेग्मा के स्थानान्तरण से भूगर्भ में दाब की पूर्ति होती है। इस क्रिया को समस्थितिक सन्तुलन (प्ेवेजंजपब बवउचमदेंजपवद) कहा जाता है।
(5) हैफोर्ड व बोवी की धारणा
(Hayford and Bowie’s Concept)
1910 में हैफोर्ड एवं 1917 में बोवी द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका में भू-मापन किया गया। अपने सर्वेक्षण कार्यों के आधार पर हैफोर्ड एवं बोवी ने तैरने के सिद्धान्त में संशोधन किया। इनके अनुसार महाद्वीपी के धरातल का घनत्व धरातलीय ऊँचाई के अनुसार भिन्न-भिन्न हुआ करता है। पर्वतों के शैल हल्के हैं और समुद्र तली के भारी हैं। दूसरे शब्दों में समान क्षैतिज क्षेत्रफल वाले दो प्रदेशों के नीचे द्रव्यमान भी समान होगा। (There is equal mass beneath equal horçontal areas) यद्यपि उन प्रदेशों की ऊँचाइयाँ भिन्न हो सकती हैं। धरातल के नीचे कुछ गहराई पर एक तल होगा, जहाँ पूर्ण क्षति पूर्ति होगी। पृथ्वी में यह क्षतिपूर्ति तल (level of compensation) वहाँ होगा जहां गुरुत्व विसंगति बिल्कुल न होगी। क्षतिपूर्ति तल से नीचे समान धनत्व की शैलें होंगी। गुरुत्व विसंगति वह अन्तर है, जो किसी स्थान के साहुल सूत्र से ज्ञात अक्षांश तथा दूसरी विधि भूगणितीय एवं गुरुत्व की शक्ति का प्रयोग कर अक्षांश ज्ञात किया जा सकता है, तब पाया जाता है। गुरुत्व विसंगति से किसी एक स्थान पर उपस्थित समस्थिति में अन्तर को ज्ञात किया जा सकता है। इसी आधार पर बोवी का मत है कि क्षतिपूर्ति तल पर गुरुत्व विसंगति नही पायी जायेगी। यह तल 112 कि.मी. की गहराई में होगा।
हैफोर्ड और बोवी में विभिन्न घनत्व किन्तु समान द्रव्यमान एवं भार वाले धातुओं के टुकड़ों को पारे में इस प्रकार उतारा कि सभी पारे पर समान दाब डालें तो सभी टुकड़े समान गहराई तक ड्बै। प्रत्येक टकड़ा समान क्षैतिज क्षेत्रफल घेरेगा किन्तु ऊँचाई में भिन्न-भिन्न होगा। इस धारणा के विरुद्ध प्रबल आपत्ति यह की गयी कि 100 कि.मी. की गहराई पर ताप इतना अधिक होगा कि शैल पिघल जायेगी।
(6) जोली की धारणा
(Joly’s Concept)
1925 में जोली ने पृथ्वी के सन्तुलन पर अपना मत प्रस्तुत किया। उसने तैरने के सिद्धान्त (Law of floatation) पर आधारित अपने विचार प्रस्तुत किये। वह एअरी के मत का समर्थन करता था। जोली क अनुसार भूपटल हल्के पदार्थ सिआल का बना है जिसका घनत्व 2.67 है व अवः स्तर (सीमा) बेसाल्ट से निमित है जिसका घनत्व 3.6 है। भपटल की सभी आकृतियाँ हल्के पदार्थों से निर्मित हैं। अपने को स्थिर रखन के लिये वे भारी पदार्थ में डबी रहती हैं। जोली के अनसार समस्थिति स्थानीय रूप से संभव नहीं । हो जालो के अनुसार ऊपरी कठोर पपडी के नीचे 16 कि.मी. मोटी जोन है जहाँ क्षतिपूर्ति होती है। In other words he did not believed in a line or level of compensation rather he believed in a zone of compensation.” उन्होंने हैफोर्ड व बोवी के इस मत से इन्कार किया कि क्षतिपूर्ति तल के ऊपर घनत्व अन्तर होता है व क्षतिपूर्ति तल के नीचे घनत्व में अन्तर नहीं होता। उनका यह भी मानना था कि धरातलीय। आकार के आधार पर अधःस्तर में नीचे धंसना पड़ता है।
(7) हिस्कानेन का सिद्धान्त
(Heiskanen’s Theory)
सन् 1933 में भू-सन्तुलन के सम्बन्ध में हिस्कानेन ने एयरी तथा प्राट के विचारों को संगठित में प्रस्तुत किया। उनके मतानुसार सागर तली की चट्टानें उच्च भागों की अपेक्षा घनत्व वाली है हिस्कानेने ने अनुमान स्पष्ट किया कि यह परिवर्तन निम्नवर्ती भागों की ओर चलता रहता है, जिसके फलस्वरूप पृथ्वी की भूपर्पटी में अनेक स्थानों पर शैलें गहराई के अनुसार अधिक घनत्व वाली होती है। उन्होंने यह माना है कि विभिन्न स्तम्भो की लम्बाई एवं घनत्व भिन्न-भिन्न होता है। घन्तव का इसी भिन्नता के आधार पर हिस्कानेन ने बताया कि उच्च घनत्व छोटे स्तम्भों द्वारा प्रदर्शित किया जायेगा. जिसके अन्तर्गत घनत्व निम्नवर्ती भागों की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार इस सिद्धान्त द्वारा पर्वतों के मूल तथा पर्पटी के विभिन्न भागों में घनत्व की भिन्नता का हल भी तलाश किया जा सकता है।
(8) आर्थर होम्स की संकल्पना
(Concept of A- Holmes)
आर्थर होम्स द्वारा प्रस्तुत भू-सन्तुलन सम्बन्धी विचार सर जार्ज एयरी से समरूपता रखते हैं। उनके अनुसार ऊंचे उठे भू भाग हल्के पदार्थों से निर्मित हैं। इनका अधिकांश भाग गहराई तक डूबा रहता है जिससे उनमें सन्तुलन बना रहता है। भूकम्पीय तरंगों तथा भूकम्प विज्ञान से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर आर्थर होम्स ने भूपटल के अन्दर विभिन्न घनत्व वाली परतों की कल्पना की है। उन्होंने सियाल का विस्तार पर्वतो के नीचे 80 किमी तथा सागरीय मैदान के नीचे 10 से 12 किलोमीटर मानी है। होम्स ने बताया कि भूसतह पर स्थित ऊंचे भागों के नीचे अधिक गहराई तक कम घनत्व होने के कारण ये स्थिर हैं। इनके नीचे अधिक घनत्व पाया जाता है। जबकि उन्होंने यह भी माना है कि व्यावहारिक रूप में पृथ्वी पर पूर्णरूपेण सन्तुलन की दशा नहीं पायी जाती है तथापि भू-सन्तुलन की दशा आवश्यक रूप में परिलक्षित होती है।