औद्योगीकरण और घरेलू व्यापार क्या है ? उद्योग और घरेलू व्यापार में सम्बन्ध अंतर industrial and domestic trade relation between in hindi

By   December 30, 2020

industrial and domestic trade relation between in hindi औद्योगीकरण और घरेलू व्यापार क्या है ? उद्योग और घरेलू व्यापार में सम्बन्ध अंतर ?

 औद्योगिकरण और अर्थव्यवस्था का संरचनात्मक परिवर्तन
औद्योगिकरण की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन होता जाता है। संरचनात्मक परिवर्तन के विश्लेषण के उद्देश्य से हम एक अर्थव्यवस्था को तीन क्षेत्रों अर्थात् (एक) प्राथमिक क्षेत्र (दो) द्वितीयक क्षेत्र और (तीन) सेवा क्षेत्र में बाँटते हैं
ऽ अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र की परिभाषा में कृषि, पशुपालन, सभी प्रकार की खेती, शिकार (आखेट), मत्स्यन और वानिकी को सम्मिलित करते हैं।
ऽ द्वितीयक क्षेत्र में विनिर्माण, निर्माण, खनन और विद्युत का उत्पादन शामिल है। कतिपय देशों में खनन और विद्युत उत्पादन को इस आधार पर प्राथमिक उत्पादन में सम्मिलित किया गया है कि इनमें प्राकृतिक संसाधनों का दोहन होता है। यह सत्य है, किंतु इन उद्योगों का प्रचालन कई तरह से विनिर्माण उद्योग के सदृश है और इनकी कृषि से समानता अत्यन्त कम है।
ऽ सेवा क्षेत्र में, व्यापार और वाणिज्य, परिवहन, लोक प्रशासन, घरेलू, व्यक्तिगत और व्यावसायिक सेवाएँ सम्मिलित हैं।

औद्योगिकरण के साथ अर्थव्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों के सापेक्षिक महत्त्व में परिवर्तन होता है। इस संबंध में साइमन कजनेत्स ने 15 देशों के अपने दीर्घकालीन नमूनों (निदर्शों) के अध्ययन के आधार पर निम्नलिखित निष्कर्षों को प्रस्तुत किया था:
ऽ सभी 15 देशों में निरपवाद रूप से श्रम बल और राष्ट्रीय उत्पादन में कृषि क्षेत्र के हिस्सों में गिरावट आई है। अधिकांश देशों में श्रम बल और राष्ट्रीय उत्पादन में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा बढ़ा। तथापि, श्रम बल में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा उतना नहीं बढ़ा, जितने की अपेक्षा की गई थी। अंततः, सभी देशों में श्रम बल में सेवा क्षेत्र के हिस्सों में वृद्धि हुई किंतु राष्ट्रीय उत्पादन में इसके हिस्से की तद्नुरूप वृद्धि नहीं दिखाई पड़ती है।
ऽ गैर कृषि क्षेत्रों में प्रति-मजदूर-उत्पाद में वृद्धि हुई है किंतु कृषि क्षेत्र में प्रति-मजदूर-उत्पाद में वृद्धि उससे भी ज्यादा रही है। अध्ययन किए गए अधिकांश देशों में अर्थव्यवस्था के गैर कृषि क्षेत्र एवं विनिर्माण क्षेत्र में प्रति-मजदूर-उत्पाद में वृद्धि सेवा क्षेत्र में प्रति-मजदूर-उत्पाद में वृद्धि से कहीं ज्यादा रही। कृषि क्षेत्र में प्रति-मजदूर-उत्पाद में वृद्धि, विनिर्माण अथवा सेवा दोनों क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक धीमी थी।

इस प्रकार, कजनेत्स अनुभव सिद्ध साक्ष्य के आधार पर यह व्याख्या करते हैं, कि आर्थिक विकास किस प्रकार अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के सापेक्षिक महत्त्व में परिवर्तन से संबद्ध है। इन निष्कर्षों का महत्त्व यह है कि ऐतिहासिक रूप से आर्थिक विकास की प्रक्रिया के दौरान स्पष्ट रूप से कृषि क्षेत्र से दूरी बढ़ती है तथा साथ ही प्रति व्यक्ति आय में भी वृद्धि होती है, और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि औद्योगिकरण, शहरीकरण और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं का परिणाम माना जाता है।

 औद्योगिकरण, घरेलू व्यापार और परिवहन
पिछले भाग में हमने औद्योगिकरण और विदेश व्यापार के बीच सहलग्नताओं की प्रकृति का परीक्षण किया। औद्योगिकरण का घरेलू व्यापार और परिवहन के साथ भी समान रूप से सुदृढ़ सहलग्नता है।

 औद्योगिकरण, और घरेलू व्यापार
किसी अर्थव्यवस्था के औद्योगिकरण का घरेलू व्यापार की स्थिति पर तत्काल प्रभाव पड़ता है। विनिर्मित वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि से व्यापारिक माल के कारोबार में वृद्धि होती है। इन बढ़े हुए कारोबार का क्रमिक प्रभाव घरेलू व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों तक होता है।

इसी प्रकार, यदि घरेलू व्यापार को तीव्रगति से औद्योगिकरण करने वाली अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिए सक्षम नहीं बनाया जाता है तो यह कमी एक गंभीर बाधा बन सकती है।

अपर्याप्त व्यापार प्रबन्धों के परिणामस्वरूप उत्पादकों के पास बड़े पैमाने पर माल का संचय हो सकता है। यह उत्पादकों को उत्पादन कम करने तथा और निवेश नहीं करने के लिए बाध्य कर सकता है।

इसी प्रकार, गैर जिम्मेदाराना व्यापार निविष्ट वस्तुओं (आदानों) की आपूर्ति लाइन को भी बाधित कर सकता है। कच्चे मालों और अर्ध निर्मित वस्तुओं के सुगम प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

दोनों ही अवस्थाओं में औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होगा तथा दीर्घकाल में यह औद्योगिक निवेश को बुरी तरह से प्रभावित कर सकता है।

 औद्योगिकरण और परिवहन
यहाँ, पुनः दोनों के बीच सहलग्नता स्पष्ट है। अच्छी परिवहन प्रणाली से तीव्र औद्योगिकरण को गति मिलता है और तीव्र औद्योगिकरण से अच्छी परिवहन प्रणाली को बढ़ावा मिलता है।

एक अच्छी और तत्पर परिवहन प्रणाली कई प्रकार से तीव्र औद्योगिकरण को सुगम बनाती है।

सबसे पहले, परिवहन उत्पादन का एक हिस्सा है; परिवहन प्रणाली में सुधार से उत्पादक मालों की लागत में कमी आती है और परिणामस्वरूप उनके मूल्य में कमी होती है। सस्ते परिवहन का उत्पादन के लागत पर प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही प्रभाव पड़ते हैं।

परिवहन की दरों में कमी का सीधा प्रभाव यह होता है कि संयोजक (असेम्बलिंग) कच्चे मालों और तैयार उत्पादों के नौवहन के लिए खर्च में कमी करके अथवा व्यावसायिक यात्रा के खर्च को कम करने से कुल उत्पादन लागत में कमी आती है।

परोक्ष रूप से सस्ता परिवहन श्रम विभाजन और बड़े पैमाने पर उत्पादन के माध्यम से कुशल निष्कासन और विनिर्माण को अधिक संभव बना कर उत्पादन लागत को कम करता है।

दूसरा, परिवहन से श्रम विभाजन संभव हो जाता है क्योंकि इससे सुदूरवर्ती स्थानों से उत्पादों को लाना संभव हो जाता है और इस प्रकार समझ में आने वाली जरूरत की सभी वस्तुओं का स्थानीय स्तर पर उत्पादन करने की आवश्यकता से बचा जा सकता है। इस प्रकार प्रत्येक आर्थिक क्षेत्र उन वस्तुओं अथवा सेवाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित कर सकता है जो या तो प्रदत्त प्राकृतिक संसाधनों अथवा ऐतिहासिक विकास के परिणामस्वरूप उनके सबसे अनुकूल हो। इस प्रकार, इससे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर आर्थिक उपयोग संभव होता है।

तीसरा, परिवहन से बाजार के आकार के विस्तार में सहायता मिलती है। कोई भी आधुनिक बड़ा उत्पादक केवल स्थानीय बाजार पर ही निर्भर रहकर काम नहीं कर सकता है। स्पष्ट है, बड़े पैमाने पर उत्पादन तभी संभव है जब बाजार का विस्तार देशव्यापी अथवा कुछ मामलों में विश्व व्यापी हो।

चैथा, परिवहन सम्पदा के उपयोग से भी संबंधित है। इससे उपभोक्ता वस्तुओं की गुणवत्ता और विविधता बढ़ती है और इसके परिणामस्वरूप भी आवश्यकताएँ और बढ़ती हैं । सस्ते परिवहन के कारण उत्पादन लागत में कमी आती है और उत्पादन बढ़ता है। अधिक विविधतापूर्ण वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं क्योंकि परिवहन से ये वस्तुएँ उन समुदायों तक भी पहुँचती हैं जो उत्पादन स्थल के समीप नहीं रहते हैं।

संक्षेप में, परिवहन तीव्र औद्योगिकरण का एक महत्त्वपूर्ण तत्व है; और परिवहन की पर्याप्त व्यवस्था के बिना औद्योगिकरण की कल्पना नहीं की जा सकती है।

वहीं, तीव्र औद्योगिकरण से परिवहन प्रणाली के विकास में भी सहायता मिलती है । तीव्र औद्योगिकरण कई प्रकार से परिवहन प्रणाली को प्रभावित करता है।

सर्वप्रथम, तीव्र औद्योगिकरण की प्रक्रिया में कच्चे माल, अर्धनिर्मित मालों, निर्मित उत्पादों और श्रम शक्ति का बड़े पैमाने पर परिवहन अन्तर्निहित है। ये परिवहन क्षेत्र के लिए माँग पैदा करते हैं। परिवहन क्षेत्र में अधिक निवेश और इसके विस्तार की संभावना बढ़ जाती है और यह क्षेत्र लाभप्रद बन जाता है।

दूसरे, औद्योगिकरण के परिणामस्वरूप द्रुत और अधिक सक्षम तथा तत्पर परिवहन के साधनों का विकास होता है । औद्योगिक क्षेत्र में तकनीकी खोजों से सभी प्रकार के परिवहन साधनों यथा सड़क, रेलमार्ग, हवाई मार्ग, नौवहन इत्यादि को लाभ पहुँचता है। इससे परिवहन की गति बढ़ती है और परिणामस्वरूप प्रति इकाई लागत घटती है। लागत में गिरावट के एक अंश का लाभ अंतिम उपयोगकर्ता तक पहुँचता है जिससे माँग बढ़ती है और इसके साथ ही परिवहन के लिए भी माँग की वृद्धि होती है।

संक्षेप में, तीव्र औद्योगिकरण का परिवहन के साथ पश्चानुबंध और अग्रानुबंध दोनों सहलग्नता हैं। दोनों एक-दूसरे के लिए पूरक की भाँति कार्य करते हैं।

औद्योगिकरण और आधारभूत संरचना
यह स्वयं सिद्ध है कि तीवं औद्योगिकरण के लिए पर्याप्त आधारभूत संरचना की आवश्यकता होती है। वहीं यह भी सामान्यतया स्वीकार किया जाता है कि एक देश विशेष में विकास के दिए गए स्तर पर निर्दिष्ट मात्रा में परिवहन क्षमता विद्यमान होती है।

तथापि, इन क्षमताओं के निर्धारण और निवेश के निहित दर पर सर्वसम्मति नहीं है।

औद्योगिक विकास में आधारभूत संरचना की भूमिका पर समकालीन मत मुख्य रूप से विचार के दो अलग-अलग सम्प्रदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
क) पहले सम्प्रदाय का मानना है कि आधारभूत संरचना का विकास अन्य आर्थिक कार्यकलापों के विकास से पहले होना चाहिए। इसलिए आधारभूत संरचना में निवेश क्षमता में कमी पर नहीं अपितु भावी माँग के पूर्वानुमान पर आधारित होना चाहिए। इस तर्क के पीछे यह युक्ति है कि जैसे ही एक बार आधारभूत संरचना क्षमताओं का सृजन हो जाता है, उससे कई प्रकार की बाह्य मितव्ययिता का सृजन होता है, जिससे अन्य आर्थिक कार्यकलापों में उपयोग किए जाने वाले आदानों के लागत में कमी आ जाती है। इससे उपयोग में नहीं लाए गए और आंशिक तौर पर उपयोग में लाए गए संसाधनों के दोहन के लिए जबर्दस्त प्रेरणा मिलती है जो अन्यथा आधारभूत संरचना सुविधाओं की कमी के कारण बेकार पड़े रहते।
आधारभूत संरचना क्षमताओं का भावी माँगों के पूर्वानुमान पर सृजन दो सुदृढ़ युक्तियुक्त कारणों पर आधारित है:

प) आधारभूत संरचना अविक्रेय वस्तु है अर्थात् इसकी सेवाओं का आयात नहीं किया जा सकता है।
पपद्ध आधारभूत संरचना में निवेश एकमुश्त और अधिक मात्रा में होता है। इसलिए, आधारभूत संरचना में व्यावसायिक लाभ के आधार पर निवेश करने का औचित्य नहीं होने पर भी इसके लिए निधियां आवंटित करना आवश्यक है। निवेश की भारी राशि से भी यह अनिवार्य हो जाता है कि यदि हम आधारभूत संरचना से सम्बद्ध बड़े पैमाने की मितव्ययिता का लाभ उठाना चाहते हैं तो तात्कालिक माँग की अपेक्षा कहीं अधिक बड़े क्षमता का सृजन करना होगा।

ख) दूसरे सम्प्रदाय के लोगों का विचार इसके ठीक विपरीत है तथा उनका तर्क है कि आधारभूत संरचना सुविधाओं का निर्माण जहाँ अवरोध हो वहाँ और क्षमता की कमी की स्थिति में किया जाना चाहिए न कि उस माँग की प्रत्याशा में जो भविष्य में कभी उत्पन्न ही नहीं होगा। इस विचार का औचित्य दो तरह से है रू दीर्घकालीन निवेश में अन्तर्निहित जोखिम एवं अनिश्चितता तथा यह धारणा कि आधारभूत संरचना के विकास के लिए सामान्यतया जिस बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होती है उसके लिए योजना बनाना सरल नहीं है।

किसी देश में एक निश्चित समय में नीति निर्माताओं द्वारा उपर्युक्त दो विकल्पों में से चाहे जिस भी विकल्प का चयन किया जाए औद्योगिकरण और आधारभूत संरचना एक-दूसरे के पूरक हैं यह बिल्कुल साफ है। दोनों एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं।

 औद्योगिकरण की अन्य सहलग्नताएँ
औद्योगिक क्षेत्र का अनेक व्यापक और अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण सहलग्नता प्रभाव होता है जिनका किसी देश के आर्थिक विकास पर गत्यात्मक (कलदंउपब) प्रभाव पड़ता है। इसे एक उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है।

एक पिछड़ी हुई कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में यदि किसान उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाना चाहता है तो उसका शिक्षित होना महत्त्वपूर्ण है। इसी प्रकार, शहरी लोगों की शिक्षा और जन साक्षरता को बढ़ावा देने का कार्यक्रम भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। आवासों में प्रकाश की व्यवस्था और पम्पसेटों को ऊर्जीकृत करने के लिए ग्रामीण विद्युतीकरण आवश्यक है। औद्योगिक क्षेत्र से इन दोनों में सहायता मिल सकती है। विद्युत उत्पादन सरकार को श्रव्य-दृश्य (आडियो-विजुअल) तकनीकों का उपयोग करने में सहायता कर सकती है जो किसानों तथा शहरी क्षेत्रों में निरक्षरों को शिक्षा देने में सहायक हो सकता है। इस कार्यक्रम में औद्योगिक आदानों की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए, विद्युत उत्पादन संयंत्र जिस पर भारी निवेश की जरूरत होती है, का शुरू में आयात किया जा सकता है। किंतु बिजली के स्विचों तथा फिटिंगों, तार और केबुल, बल्बों इत्यादि का विनिर्माण स्थानीय स्तर पर ही किया जा सकता है। इलैक्ट्रॉनिक उद्योग की स्थापना से उस सीमा तक जन शिक्षा कार्यक्रम में सहायता मिल सकती है जहाँ तक कि इस उद्देश्य के लिए विभिन्न मीडिया का उपयोग किया जा सके।

उद्योग न सिर्फ आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के आरम्भ के लिए अपेक्षित आदानों का ही उत्पादन करता है अपितु उद्यमियों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तकनीशियनों, लेखाकारों, अर्थशास्त्रियों इत्यादि जैसे तकनीकी रूप से दक्ष व्यक्तियों की सेना खड़ी करने में भी मदद करता है जो आर्थिक विकास के लिए इन आदानों का सक्रिय उपयोग करते हैं।

इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि आर्थिक विकास को उत्प्रेरित करने वाले कारकों पर औद्योगिकरण का व्यापक सहलग्नता प्रभाव है।

बोध प्रश्न 3
1) औद्योगिकरण और घरेलू व्यापार के बीच संबंध की जाँच कीजिए।
2) उद्योग और अर्थव्यवस्था के परिवहन क्षेत्र के बीच सहलग्नता की प्रकृति की जाँच करें।
3) आधारभूत संरचना में निवेश औद्योगिक विकास से पहले होना चाहिए या बाद में?

 सारांश
सामान्यतया आर्थिक विकास का अभिप्राय औद्योगिकरण ही है। तथापि, औद्योगिक क्षेत्र में विकास कार्यक्रमों को पृथक् रूप से नहीं देखा जा सकता। अर्थव्यवस्था के सभी अन्य क्षेत्रों अर्थात् कृषि, व्यापार, परिवहन, आधारभूत संरचना इत्यादि के साथ उद्योग की निकट सहलग्नता है । उद्योग और इन क्षेत्रों में से प्रत्येक के बीच इस प्रकार की सहलग्नता है कि उनमें से सभी एक दूसरे के पूरक हैं। अर्थव्यवस्था में एक क्षेत्र के विकास को अन्य क्षेत्रों के विकास से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। इसलिए, किसी भी सतत् आर्थिक विकास कार्यक्रम में अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों के संतुलित विकास की योजना तैयार करना महत्त्वपूर्ण है।

 शब्दावली
संरचनात्मक परिवर्तन ः एक अर्थव्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों के सापेक्षिक महत्त्व में परिवर्तन ।
आधारभूत संरचना ः उत्पादन क्षेत्र के लिए अपेक्षितश् सहायक सेवाओं की संरचना।
अधिशेष ः कुल उत्पादन और कुल उपभोग के स्तर में अंतर।
श्रम का सीमान्त उत्पादन ः श्रम की एक अतिरिक्त इकाई के नियोजन से कुल उत्पादन में हुई वृद्धि।
जीवन-निर्वाह मजदूरी ः जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक मजदूरी का न्यूनतम दर।
पश्चानुबंध ः उद्योग और इसके आदानों की आपूर्तिकर्ताओं के बीच संबंध।
अग्रानुबंध ः एक उद्योग और अन्य उद्योगों जो इसके उत्पादन का आदान के रूप में उपयोग करते हैं; के बीच संबंध ।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें एवं संदर्भ
दीपक नैय्यर, (1997). ट्रेड एण्ड इण्डस्ट्रियलाइजेशन, ऑक्सफोर्ड, नई दिल्ली.
श्रीनिवास वाई ठाकुर, (1985). इण्डस्ट्रियलाइजेशन एण्ड इकोनॉमिक डेवलपमेंट, पॉपुलर बॉम्बे, अध्याय 9,6
जेराल्ड एम मायर, (2000). लीडिंग इश्यूज इन इकनॉमिक डेवलपमेंट, ऑक्सफोर्ड, नई दिल्ली.
डोनाल्ड ए. हे एण्ड डेरेक जे मॉरिसय (1984). इण्डस्ट्रियल इकोनॉमिक्स, थ्योरी एण्ड एविडेन्स, ऑक्सफोर्ड, लंदन, अध्याय 1
आई.सी. धींगराय (2001). दि इंडियन इकोनॉमी, एनवायरन्मेंट एण्ड पॉलिसी, सुल्तान, नई दिल्ली.

उद्देश्य
आर्थिक विकास के स्रोत के रूप में औद्योगिकरण को अलग से न तो देखा जा सकता है और न ही देखे जाने की आवश्यकता है। आर्थिक विकास की प्रक्रिया में अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र और अन्य क्षेत्रों के बीच मजबूत पश्चानुबंध (बैकवर्ड लिंकेज) और अग्रानुबंध (फॉरवर्ड लिंकेज) (सहलग्नता) स्थापित हो जाते हैं। इस इकाई को पढ़ने के बाद आप:

अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की प्रकृति और उसका महत्त्व समझ सकेंगे;
ऽ कृषि क्षेत्र और औद्योगिक क्षेत्र के बीच सहलग्न्ता (अनुबंध) की प्रकृति को समझ सकेंगे;
ऽ यह समझ सकेंगे कि व्यापार और उद्योग कैसे एक दूसरे के पूरक और परस्पर निर्भर हैं; तथा
ऽ अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र और आधारभूत संरचना के बीच सहलग्नता (लिंकेज) के बारे में बता सकेंगे।

प्रस्तावना
प्रथम इकाई में हमने औद्योगिकरण की परिभाषा एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में की जिसमें सकल घरेलू उत्पाद और श्रम बल में उद्योग क्षेत्र का हिस्सा तेजी से बढ़ता है। अर्थव्यवस्था का गुरुत्व केन्द्र कृषि से हटकर उद्योग हो जाता है। तथापि, औद्योगिक क्षेत्र जो अग्रणी हो जाता है, को एकदम पृथक रूप से देखे जाने की जरूरत नहीं है। सार्थक और प्रभावी औद्योगिक विकास का पोषण अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में विकास पर निर्भर करता है, साथ ही यह अन्य क्षेत्रों में विकास को भी बढ़ावा देता है। उदाहरण के लिए, औद्योगिकरण का सतत् कार्यक्रम तब तक लाभप्रद नहीं हो सकता है, जब तक कि इसे कृषि क्षेत्र का मजबूत सहारा न मिले; इसी प्रकार औद्योगिक विकास से उत्पन्न अवसरों तथा परिस्थितियों के परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता में सुधार होता है जो तीव्र औद्योगिकरण को और बढ़ावा देता है । इसी प्रकार की सहलग्नता अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र और सेवा क्षेत्र के विकास के बीच भी देखी जा सकती है। उद्योगों के तीव्र विकास के लिए आधारभूत संरचना की आवश्यकता होती है और पुनः तीव्र औद्योगिकरण से आधारभूत संरचना को बढ़ावा मिलता है। हमें औद्योगिक क्षेत्र और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों के बीच सहलग्नता का विस्तार पूर्वक पता लगाना चाहिए।