औद्योगीकरण की विशेषताएं बताइए | फायदे नुकसान या समस्याएँ industrialization properties in hindi

By   December 24, 2020

industrialization properties in hindi औद्योगीकरण की विशेषताएं बताइए | फायदे नुकसान या समस्याएँ ?

औद्योगिकरण और रोजगार का सृजन
विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए उत्पादकता में वृद्धि का एक और महत्त्वपूर्ण लाभ है। कृषि क्षेत्र में पहले से ही अत्यधिक भीड़ है, वहीं बढ़ती हुई जनसंख्या से श्रमबल की आयु में वृद्धि होती है जो कृषि को प्रभावित करता है तथा जिससे इस क्षेत्र में और गिरावट आती है। औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादकता में वृद्धि के साथ अधिक रोजगार के अवसरों का सृजन संभव होगा, इस प्रकार यह कम उत्पादक व्यवसायों से श्रम को अपनी ओर आकर्षित करेगा। इस प्रक्रिया से राष्ट्रीय उत्पादन एवं क्रयशक्ति में भी वृद्धि होगी और इस प्रकार कुल व्यय से कुल माँग में वृद्धि होगी जिसके परिणामस्वरूप रोजगार के ज्यादा अवसर प्रदान होंगे।

लेविस ने श्रम की असीमित आपूर्ति मानकर आर्थिक विकास का एक मॉडल तैयार किया था। लेविस मॉडल की मान्यता है कि विकास की प्रक्रिया के आरम्भिक चरणों में आधुनिक क्षेत्र (उद्योग) के लिए श्रम की आपूर्ति पूर्णतः लोचदार रहती है। जीवन-निर्वाह आय स्तर से ऊपर मजदूरी देकर आधुनिक क्षेत्र असीमित मात्रा में श्रम आकर्षित कर सकता है । आधुनिक क्षेत्र में श्रम की माँग सीमान्त उत्पादन पर निर्भर करता है, जब तक श्रम का सीमान्त उत्पादन मजदूरी की दर से अधिक होगा, पूँजीपति और अधिक श्रमिक नियोजित करेगा क्योंकि इससे उसके लाभ में वृद्धि होती है।

सीमान्त उत्पादन वक्र दिए गए प्रौद्योगिकी की स्थिति और पूँजी की गुणवत्ता द्वारा निर्धारित होता है । पूँजी स्टॉक का निर्धारण पहले की अवधियों, पूँजी स्टॉक और शुद्ध निवेश, जो पूँजीपतियों द्वारा उनके लाभ को पुनः निवेश करने के परिणामस्वरूप आता है, से होता है।

यह रेखा चित्र 1.1 में प्रदर्शित किया गया है।

रेखाचित्र 1.1 विकास की प्रक्रिया में एक बिंदु पर आधुनिक क्षेत्र को प्रदर्शित करता है। श्श्रश् बिंदु पर आधुनिक क्षेत्र श्ॅश् मजदूरी दर देकर श्व्डश् मजदूरों को नियोजित करता है व्ड के ऊपर श्रम के सीमान्त उत्पादन वक्र (डच्स्) के अंदर का क्षेत्र आधुनिक क्षेत्र के कुल उत्पादन को मापता है जिसमें से श्व्ॅश्रडश् कुल मजदूरी बिल तथा श्छॅश्रश् कुल लाभ है।

चूँकि लाभ का पुनः निवेश कर दिया जाता है, डच्स् वक्र दाहिनी ओर घिसक जाता है, आधुनिक क्षेत्र में अधिक श्रमिकों को मजदूरी पर रखा जाता है तथा इसके उत्पादन में वृद्धि होती है।

यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है, जब तक कि आधुनिक सेक्टर में निवेश के अवसर उपलब्ध रहते हैं, अथवा जब तक श्रम की आपूर्ति पूर्णतः लोचनीय रहती है।

औद्योगिकरण और खाद्य उत्पादों की न्यून माँग-लोच
इस विषय को स्पष्ट करने के लिए आरम्भ में हम एक बंद अर्थव्यवस्था (आंतरिक अर्थव्यवस्था प्रणाली) में रह रहे लघु कृषकों के समाज की कल्पना करते हैं अर्थात् ऐसा समाज जहाँ आयात-निर्यात बिल्कुल नहीं किया जाता है। कम से कम आरम्भ में किसान अपने उपयोग के लिए उत्पादन करेंगे किंतु शीघ्र ही वे अपने उपभोग के स्वरूप में कुछ विविधता लाने के लिए आपस में व्यापार करना शुरू कर देंगे।

जैसे-जैसे यह प्रक्रिया बढ़ती है, किसान कुछ निश्चित फसल पैदा करने में विशेषज्ञता प्राप्त करने लगेंगे और चूँकि वे ऐसा करने में अधिक कुशल हो जाते हैं, जिससे वे अपनी उत्पादकता बढ़ा लेते हैं। इस प्रकार प्रत्येक विशेषज्ञ किसान अधिक खाद्यान्न का उत्पादन करने में समर्थ है और इसलिए वह अपने साथी किसान के साथ अधिशेष खाद्यान्न का विनिमय करता है।

इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्तिगत और कुल आय दोनों में वृद्धि होती है। तथापि, इस बिंदु पर यह प्रक्रिया निश्चित सीमा पर पहुँच जाती है क्योंकि मानव की खाद्य आवश्यकता सीमित है और कुछ समय के बाद किसानों (उपभोक्ताओं के रूप में) की खाद्य की आवश्यकता उतनी तेजी से नहीं बढ़ेगी जितनी तेजी से उनका उत्पादन और आय बढ़ रहा है। इसे ही ‘कृषि उत्पादनों के लिए न्यून आय माँग लोच‘ कहा जाता है।

तब, इस स्थिति में किसान अपने अधिशेष खाद्य उत्पादन का विनिमय दूसरे किसानों के खाद्य उत्पादन से न करके कपड़ों, आवास और ऐसी ही दूसरी आवश्यकताओं के लिए करना चाहेगा। तथापि, ऐसी स्थिति में पहले से ही मान लिया जाता है कि औद्योगिक उत्पादन विद्यमान है।

किंतु वास्तविकता यह है कि विश्व में कोई भी अर्थव्यवस्था बंद नहीं होती है और वे एक वैश्विक प्रणाली (ग्लोबल सिस्टम) के अंग होते हैं जिसमें राष्ट्र-राज्य एक-दूसरे के साथ व्यापार करते हैं। इसलिए, क्या यह संभव नहीं है कि कुछ कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था अपने खाद्य अधिशेष का व्यापार औद्योगिक देशों के उत्पादों के साथ करें?

इस परिदृश्य में, कुछ देशों को औद्योगिकरण करने की आवश्यकता होती है और वे उद्योग में अपनी उत्पादकता बढ़ाकर उत्पादन और आय में वृद्धि कर सकते हैं। तुलनात्मक लाभ के सिद्धान्त का आधार यही है जिसमें यह माना जाता है कि देशों को उन वस्तुओं के उत्पादन में विशेषज्ञता हासिल करनी चाहिए जिसमें वे दक्ष हैं तथा प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।

तथापि, कृषि उत्पादों के लिए न्यून आय माँग लोच इस काल्पनिक बंद अर्थव्यवस्था के बाहर भी सक्रिय रहता है तथा पूरे विश्व में यह विद्यमान होता है। इसका संभावित प्रभाव यह होता है कि खाद्य उत्पादनों की माँग औद्योगिक उत्पादनों की माँग की तुलना में धीमी गति से बढ़ती है और इसलिए औद्योगिक उत्पादकों की तुलना में कृषि उत्पादकों की व्यापार की स्थिति में ह्यस हो सकता है।

इस हास के परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकों को अपने निर्यात से जो राशि प्राप्त होती है उससे कहीं अधिक अपने औद्योगिक आयात पर खर्च करना पड़ता है। इसलिए कृषि अर्थव्यवस्थाओं को, जीवन स्तर में थोड़े सुधार के लिए भी अत्यधिक प्रयास करना पड़ेगा। वास्तव में संसार में, जहाँ सस्ते अनाज का विपुल भण्डार पड़ा है, राष्ट्रों के लिए सिर्फ कृषि उत्पादन के आधार पर विकास करने का प्रयास करना लाभप्रद नहीं है।

 औद्योगिकरण और अधिशेष का संग्रह

एक विकासशील अर्थव्यवस्था के विकास में सबसे बड़ी बाधा अपेक्षित आवश्यकताओं के वित्तपोषण के लिए पर्याप्त संसाधनों का अभाव होना है। यह अपर्याप्तता दो परस्पर सम्बद्ध कारकों का परिणाम है:
ऽ विकासशील अर्थव्यवस्था में संसाधनों, राष्ट्रीय उत्पादन और बचत का संपूर्ण आकार
यद्यपि अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में संसाधनों की कमी की समस्या सामान्य है, वहीं कृषि क्षेत्र में, जहाँ राष्ट्रीय आय का बड़ा भाग उत्पन्न होता है, संसाधनों को जुटाने की समस्या विशेष है।

इस क्षेत्र में अधिशेष बचत के संग्रह का कार्य इस कारण भी कठिन हो जाता है क्योंकि इस प्रयोजन के लिए कोई उपयुक्त संगठनात्मक ढाँचा नहीं है। इस तरह का संगठनात्मक ढाँचा क्यों नहीं हैं तथा इस तरह का ढाँचा आसानी से क्यों नहीं तैयार किया जा सकता है, का विश्लेषण किए जाने की आवश्यकता है। इस तरह के ढाँचों का निर्माण अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र में अधिक आसानी से किया जा सकता है। इस प्रकार, संसाधनों को पूरी तरह से औद्योगिकरण में लगाकर आर्थिक विकास की गति को तीव्र किया जा सकता है।

औद्योगिकरण और बड़े पैमाने की मितव्ययिता
बृहद् स्तर पर औद्योगिकरण की घटना भी बड़े पैमाने की मितव्ययिता पर आधारित है। यह मितव्ययिता वृहद् पूँजी-प्रधान प्रौद्योगिकियों में निवेश करने से आती है जिसका यह प्रभाव होता है कि उत्पादन के परिमाण में वृद्धि के साथ प्रति इकाई उत्पादन लागत घटती जाती है। इस प्रकार, एक देश में जहाँ प्रतिवर्ष 1000 इकाइयों का उत्पादन होता है, उत्पादन लागत 100 प्रति इकाई हो सकता है। तथापि, प्रौद्योगिकी उन्नयन से उत्पादन प्रतिवर्ष बढ़कर 2000 इकाई तक हो सकता है किंतु प्रति इकाई उत्पादन लागत घटकर मान लीजिए 75 हो जाता है। प्रति इकाई लागत में कमी का मुख्य कारण यह है कि प्रौद्योगिकीय उन्नयन के साथ ही श्रमिक की उत्पादकता भी बढ़ जाती है।

बाह्य मितव्ययिताओं जैसे बेहतर आधारभूत संरचना सुविधाओं, आपूर्तिकर्ताओं और स्थापित बाजारों, जो साधारणतया शहरों में अवस्थित होते हैं की सहज उपलब्धता से इस तरह की आंतरिक बड़े पैमाने की मितव्ययिता को बल मिलता है और इस तरह कतिपय स्थानों पर ‘‘समूह‘‘ में उद्योगों की स्थापना की ऐतिहासिक प्रवृत्ति को बल मिलता है।

औद्योगिकरण और भुगतान-संतुलन
किसी राष्ट्र के भुगतान संतुलन पर औद्योगिकरण का प्रभाव निर्यात पक्ष अथवा आय पक्ष में से किसी एक के संदर्भ में देखा जा सकता है।

अधिकांश विकासशील देशों के लिए कृषिगत कच्चे मालों के निर्यात की संभावना (अधिक औद्योगिकृत देशों के साथ प्रतिस्पर्धा की समस्याओं और वैसे व्यापार पर उनके प्रतिबंधों के परिणामस्वरूप) ह्रासोन्मुख होती है। हालांकि, स्पष्टतः उन देशों को जो सिर्फ कृषि उत्पादों का ही उत्पादन कर सकते हैं, उन्हें इसकी संभाव्य माँग के सीमित रहने के कारण बाजार के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।

अधिकांश विकासशील देश अपने उपभोग के लिए कृषि उत्पादों की तुलना में अधिक अनुपात में औद्योगिक उत्पादों का आयात करते हैं। इतना ही नहीं, विकासशील देशों में बहुधा खाद्यान्न का आयात इतना ज्यादा होता है जो उनकी कृषि क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए अनौचित्यपूर्ण प्रतीत होता है; और यह भी संभव है कि कुछ मामलों में विकासशील देशों के लिए औद्योगिक आयात स्थानापन्नों की तुलना में कृषि आयात स्थानापन्न का उत्पादन करना ज्यादा सरल होगा। किसी भी स्थिति में आयात के स्थानापन्न के रूप में औद्योगिक उत्पादन का विस्तार, कम से कम अल्प काल में, भुगतान संतुलन की समस्या को हल करने में अत्यन्त ही सीमित स्तर पर सहायक होता है क्योंकि इससे पूँजीगत माल के आयात की आवश्यकता उत्पन्न हो जाती है।

कुल मिलाकर जहाँ अल्प काल और दीर्घ काल के बीच अंतर महत्त्वपूर्ण है वहाँ यह तर्क दिया जा सकता है। कृषि उत्पादों के विपरीत औद्योगिक उत्पादों के लिए उच्चतर आय माँग लोच होने के कारण, यह तर्क दिया जा सकता है कि औद्योगिक क्षेत्र के निर्माण का कार्य शुरू करने में विफलता मिलने से चालू खाता में भुगतान संतुलन की समस्या बढ़ सकती है क्योंकि आय में वृद्धि होती है तथा औद्योगिक वस्तुओं की माँग बढ़ती है। किंतु संभवतः किये जा रहे औद्योगिकरण की प्रकृति अर्थात् विशेष रूप से पूँजीगत मालों और उपभोक्ता सामग्रियों के बीच जो संतुलन है, अधिक महत्त्वपूर्ण है।

औद्योगिकरण और बचत
औद्योगिक निवेश से बचत बढ़ती है। इस प्रस्थापना को दो तरह से समझाया जा सकता हैः सर्वप्रथम, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में कृषि क्षेत्र में विकास से परम्परागत कृषि अथवा लघु खेतीहर कृषि में सुधार होता है। पूँजीवादी कृषि, जिससे अधिक बचत होने की उम्मीद की जाती है का अल्प अथवा नहीं के बराबर विकास होता है। इसके विपरीत पूँजी आधारित उद्योग में पूँजी के सृजन की अधिक संभावना होती है। निःसंदेह यह कल्पना की जाती है कि मजदूरी की अपेक्षाकृत लाभ से अधिक अनुपात में बचत होती है।

दूसरी तरफ, एक अर्थव्यवस्था आर्थिक विकास के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने के उपाय के रूप में बचत की अपेक्षा कराधान को अधिक महत्त्व दे सकती है। कृषि कार्यकलापों की तुलना में औद्योगिक कार्यकलापों से प्राप्त आय पर कर लगाना प्रशासनिक कारणों (अधिक साक्षरता, जनसंख्या का केन्द्रित होना इत्यादि-इत्यादि) और आर्थिक कारणों (उच्च जीवन-स्तर, अधिक जागरूकता इत्यादि-इत्यादि) दोनों से अधिक आसान होता है।

औद्योगिकरण, स्थायित्व और लोच
औद्योगिक विकास से अस्थिरता समाप्त होती है और यह आय, कर प्राप्ति इत्यादि के स्थायित्व को प्रोत्साहित करता है। निर्यात बाजारों के लिए प्राथमिक उत्पादों के परम्परागत उत्पादन जिसमें मूल्यों और कुल निर्यात प्राप्तियों में भारी परिवर्तन होते रहते हैं की तुलना में औद्योगिकरण के संवर्द्धन के लिए बहुधा यह दलील दिया जाता है।

इसी प्रकार, सीमित प्रकार की उपभोक्ता वस्तुओं, विशेषकर अपरिष्कृत कच्चा माल अथवा तैयार उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करने वाली अर्थव्यवस्था अभिरुचि में परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है, सिवाए इसके कि इससे जुड़े उद्योग-धंधे शीध्र अपना उत्पादन न बदल लें। अंतिम माँग वाले उद्योगों में कुछ कच्चे माल, पूँजीगत उपस्कर और अन्य संसाधन बिल्कुल विशिष्ट होते हैं और सामान्यतः इनका रूपान्तर आसान नहीं होता है। अतएव, वे कतिपय रणनीतिक पूँजीगत और अर्धनिर्मित मालों के उद्योग जो अधिक बहुमुखी होते हैं और अपने उत्पादों में रूपान्तर कर सकते हैं की तुलना में कम ‘‘कार्य कुशल‘‘ होते हैं।

औद्योगिकरण और सहलग्नता (लिंकेज) प्रभाव
औद्योगिक क्षेत्र सहलग्नता प्रभाव के माध्यम से नए कार्यकलापों को शुरू करने में प्रत्यक्ष उत्प्रेरक का कार्य करता है। जैसा कि हर्शमैन ने लिखा है, ‘‘कृषि निश्चित तौर पर इसके लिए दोषी है कि इसने सहलग्नता प्रभाव के माध्यम से नए कार्यकलापों को शुरू करने में प्रत्यक्ष उत्प्रेरक का काम नहीं किया -इस मामले में विनिर्माण की श्रेष्ठता अभिभूत करने वाली है,‘‘ (आप आगे इकाई 2ः उद्योग और क्षेत्रगत सहलग्नता में इसके बारे में और अधिक पढ़ेंगे)

औद्योगिकरण की आलोचना
तीव्र औद्योगिक विकास की आलोचना कई दृष्टियों से की गई है। यह तर्क दिया गया है कि कुछ अमूर्त सूचकांकों की वृद्धि जिसमें औद्योगिक विकास का अत्यधिक योगदान रहता है की तुलना में सामाजिक उद्देश्य जैसे आय का वितरण और रोजगार अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

के लिए यह तर्क कि औद्योगिकरण से विकास होता है कम से कम आंशिक तौर पर पुनरूक्ति कहा जा सकता है: क्योंकि यदि विकास की परिभाषा सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि के रूप में की जाए, तो इसमें आश्चर्य नहीं कि अधिक औद्योगिकृत राष्ट्र ही सबसे ज्यादा विकसित राष्ट्र भी हैं। ऐसा इसलिए भी कि सकल राष्ट्रीय उत्पाद के आंकड़ों में कृषिगत उत्पादन की अपेक्षा औद्योगिक उत्पादन की गणना करने की अधिक संभावना रहती है, क्योंकि औद्योगिक उत्पाद के कृषि उत्पाद की तुलना में सरकारी तंत्र से गुजरने की संभावना अधिक रहती है। इसका कारण है कि संभवतः कृषिगत वस्तुओं का विनिमय नहीं किया जाए अपितु इन्हें सीधे ही उपभोग कर लिया जाए, अथवा गैर सरकारी बाजारों के माध्यम से उनका विनिमय किया जाए। इतना ही नहीं, सकल राष्ट्रीय उत्पाद सामाजिक विकास के व्यापक मापों जैसे आय के वितरण, साक्षरता दर, जीवन प्रत्याशा अथवा पर्यावरण के विनाश (वस्तुत, इनमें से अंतिम वास्तव में सकल राष्ट्रीय उत्पाद ऑकड़ों को बढ़ा सकता है) को हिसाब में नहीं लेता है।

यह कहा गया है कि औद्योगिक विकास के अभियान ने पर्यावरण का विनाश कर दिया है तथा समाप्त हो जाने वाले प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर ऊर्जा की खपत कर लिया है। ओजोन परत की पूरे विश्व में जो क्षति हुई है उस पर हमारी वर्तमान चिन्ता इस तथ्य को बार-बार स्मरण कराती है कि औद्योगिक विश्व में प्रदूषण काफी बढ़ गया है, जबकि एक प्रश्न यह भी है कि यदि सभी राष्ट्र तीव्र औद्योगिकरण का मार्ग चुनते हैं (अथवा चुनने में समर्थ होते हैं) तो किस सीमा तक संसाधनों का नवीकरण किया जा सकता है।

यह भी दावा किया गया है कि उद्योग द्वारा उत्प्रेरित तीव्र विकास से असमानता बढ़ती है तथा यह उनकी परवाह किए बिना उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है जिन्हें औद्योगिकरण से क्षति पहुँचती है।

संभवतः यह तर्क सबसे दृढ़तापूर्वक दिया गया है कि उन देशों में जहाँ कृषि योग्य भूमि और पूँजी दुर्लभ हैं और जहाँ श्रम बल में तेजी से वृद्धि होती हैं एवं बड़े पैमाने पर उत्प्रवास की संभावना नहीं होती है, विकास का लक्ष्य भूमि की पैदावार बढ़ाना होना चाहिए, कि खाद्यान्न उत्पादन तभी बढ़ सकता है यदि ऐसा बाजार सुलभ हो जिसमें खाद्यान्न बेचा जा सके और कि निर्यात के अलावा इन बाजारों को गांवों में, ग्रामीण जनसंख्या में खोजा जाना चाहिए। आगे यह तर्क दिया गया है कि आर्थिक विकास के लिए ग्रामीण विकास और आय का पुनर्वितरण महत्त्वपूर्ण शर्त है।

औद्योगिकरण पर लगाए गए इन आरोपों और आलोचनाओं के मद्देनजर इस पर बल दिया जाना चाहिए कि सम्यक् रूप से प्रस्तुत सामाजिक उद्देश्यों को प्राप्त करने तथा पर्यावरण के दुष्प्रभावों, कच्चे मालों का समय से पूर्व समाप्त हो जाना, बेरोजगारी, असमानता और बाजार की सीमाओं आदि का सामना करने के लिए मंद गति से औद्योगिक विकास की बजाए तीव्र औद्योगिक विकास अत्यन्त जरूरी है। निःसंदेह, ऐसा विकास होना चाहिए जिससे उपयुक्त समूहों को लाभ होता हो। इसे ठीक से व्यवस्थित करना चाहिए और इसका माप भी सही होना चाहिए ताकि सामाजिक लागत का पूरा हिसाब रखा जा सके और कार्य दशाओं एवं मानवीय संबंधों जिसमें उत्पादन किया जा रहा है के विभिन्न घटकों को समुचित सापेक्षिक महत्त्व दिया जाए।

 औद्योगिकरण से संबंधित समस्याएँ
एक बार जब विकासशील अर्थव्यवस्था औद्योगिकरण के मार्ग पर चलने लगती है, तब इसके सम्मुख कई समस्याएँ इनमें आती हैं। इनमें से कुछ की पहचान निम्नलिखित के रूप में की जा सकती हैं:

औद्योगिकरण का विस्तार और गति
विकासशील अर्थव्यवस्था में औद्योगिकरण का विस्तार और गति, घरेलू और विदेशी दोनों तरह की संसाधनों की मात्रा जो वह अर्थव्यवस्था जुटा सकती हैं से निर्धारित होता है।

उद्योगों की प्रकृति
यहाँ विकासशील अर्थव्यस्था को उद्योगों की प्रकृति के बारे में विभिन्न विकल्पों जैसे (क) निर्यातोन्मुखी और घरलू उद्योगों में एक और (ख) उपभोक्ता वस्तु और पूंजीगत माल उद्योग में एक को चुनने की समस्या रहती है। निर्यातोन्मुखी उद्योगों के लिए आयात संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। निर्यातोन्मुखी उद्योगों और घरेलू बाजार के लिए उत्पादन करने वाले उद्योगों के बीच संसाधनों को बाँटना होगा। इसी प्रकार, पूँजीगत माल के उद्योगों में निवेश से अर्थव्यवस्था की उत्पादक संभावनाओं को बढ़ाने में सहायता मिलती है।

प्राथमिकता क्रम
निजी क्षेत्र में उद्योगों के विकास की प्राथमिकता का क्रम निर्धारित करने में तुरन्त लाभ की सभावना प्रकट रूप से एक महत्त्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न होता है। यह सच है कि पूँजी निवेश में संसाधनों को लगाने से कुछ समय के लिए उपभोक्ता सामग्रियों के उत्पादन में कमी आ जाती है, किंतु निवेश की प्रकृति में भिन्नता के अनुरूप यह अवधि भी अलग-अलग होती है। यह आयोजना प्राधिकारियों को निर्णय करना है कि प्रत्येक चरण में किस प्रकार का निवेश किया जाएगा।

 उद्योगों की अवस्थिति
आर्थिक विकास के कार्यक्रम में नए उद्योगों की अवस्थिति एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है । प्राकृतिक उपज पर आधारित उद्योगों के मामले में, अवस्थिति का निर्धारण अपरिवर्तनीय प्राकृतिक दशाओं से प्रभावित होता है। अन्य सभी उद्योगों के मामले में सामान्यतः देश के विकास में क्षेत्रीय संतुलन बनाने का प्रयास किया जाता है।

 बृहत् और लघु उद्योग
बृहत् उद्योग सामान्यतः पूँजी-प्रधान होते हैं जबकि लघु उद्योग श्रम प्रधान होते हैं। श्रम अधिशेष वाली अर्थव्यवस्था श्रम-प्रधान लघु उद्योगों को प्राथमिकता देगी। किंतु लघु स्तर पर कोई महत्त्वपूर्ण और बुनियादी उद्योग विकसित करना संभव नहीं है। अतएव, इन उद्योगों की पूरक भूमिका का लाभ उठाने का निर्णय किया जा सकता है।

विकासशील देशों में औद्योगिकरण में बाधक कारक
यह सच है कि यदि एक निर्धन पिछड़ी अर्थव्यवस्था विकास करना चाहती है तो इसे अनिवार्य रूप से औद्योगिकरण करना होगा। तथापि, विकासशील अर्थव्यवस्था में औद्योगिकरण न तो आसान है और न ही सुगम। विकासशील अर्थव्यवस्था में औद्योगिकरण की प्रक्रिया में कई बाधाएँ आती हैं जिनका सामना और निराकरण व्यवस्थित ढंग से करना होगा।

आर्थिक कारक
विकासशील देशों में औद्योगिकरण में बाधा पहुँचाने वाले महत्त्वपूर्ण आर्थिक कारकों में से निम्नलिखित कुछ को चिन्हित किया जा सकता है।
पद्ध विकासशील देशों में पूँजी की कमी होती है। पूँजी की कमी प्रति व्यक्ति निम्न आय स्तर और निम्न उत्पादकता का परिणाम होता है। पूँजी की कमी का उद्योग में निवेश और आधारभूत संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पप) विकासशील देशों में स्वाभाविक तौर पर, पर्याप्त आधारभूत संरचना जैसे परिवहन और संचार, पानी, विद्युत इत्यादि का अभाव होता है
पपप) विद्यमान उद्योगों के गौण उत्पाद के उपयोग के लिए उद्योगों के नहीं रहने से गौण उत्पाद बेकार हो जाता है और अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचती है।
पअ) विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में पहले से ऐसी संस्थाएँ मौजूद नहीं होती हैं जो श्रमिकों की दक्षता में सुधार के लिए शिक्षा और प्रशिक्षण दे सके।
अ) मशीनों के समुचित उपयोग में मरम्मत की सुविधा का नहीं होना एक अन्य बाधा है।
अप) उपयुक्त ऋण सुविधा मुहैय्या कराने के लिए विशेषीकृत संस्थाओं, सुदृढ़ बैंकिंग प्रणाली, बीमा सुरक्षा इत्यादि की कमी औद्योगिक निवेश और कार्यकलाप में विध्न है।
अपप) औद्योगिकरण उपयुक्त प्रौद्योगिकी के अभाव में भी अवरुद्ध हो सकता है। अधिकांश विकासशील अर्थव्यवस्था की प्रवृत्ति विकसित देशों की प्रौद्योगिकी का अनुकरण करने की होती है। इस तरह की प्रौद्योगिकी, पूँजी से श्रम के प्रतिस्थापन को प्रोत्साहित करती हैं। इस तरह की अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी इस आधार पर ‘उपयुक्त‘ मानी जाती हैं कि इनकी उत्पादकता इतनी अधिक होती है कि अन्य की तुलना में प्रति इकाई उत्पादन लागत संभाव्य रूप से कम है। तथापि, वह संभाव्य लाभ कभी भी प्राप्त नहीं होता है क्योंकि अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के लिए जरूरी उच्च स्तरीय तकनीकी और प्रबन्धकीय दक्षता का अभाव होता है।
अपपप) कभी-कभी, विकासशील देश में उद्योग को अत्यन्त ही छोटे बाजार का सामना करना पड़ सकता है जो आर्थिक रूप से लाभप्रद स्तर पर किये गये उत्पादन की खपत करने की क्षमता नहीं रखता है। यह मुख्यतः निम्न उत्पादकता और निम्न आय स्तर के फलस्वरूप पर्याप्त क्रयशक्ति के अभाव का परिणाम होता है।

 सामाजिक-जनसांख्यिकीय कारक
औद्योगिकरण के मार्ग को अवरुद्ध करने वाले जनसांख्यिकीय कारकों में एक जनसंख्या की तीव्र वृद्धि है। यह दो प्रकार से कार्य करता है:
प) तीव्र जनसंख्या वृद्धि का अभिप्राय अर्थव्यवस्था में उपभोग के स्तर में तेजी से वृद्धि होना है। इस तथ्य के मद्देनजर कि इन अर्थव्यवस्थाओं में उत्पादकता कम है और इसमें वृद्धि भी अत्यन्त धीमी गति से होता है, बढ़ते हुए उपभोग स्तर के कारण बचत के रूप में नहीं के बराबर अधिशेष बचता है। अपर्याप्त बचत के कारण निवेश असंभव हो जाता है।
पप) जनसंख्या में वृद्धि के साथ श्रम बल का आकार भी बढ़ जाता है। वैकल्पिक रोजगार के अवसर के अभाव में, बढ़े हुए श्रम बल का बड़ा भाग पहले से ही भीड़-भाड़ वाले कृषि क्षेत्र में अपने लिए रोजगार पाता है और इससे इस क्षेत्र की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है। कृषि क्षेत्र में कम उत्पादकता से उद्योग के लिए दो प्रकार की समस्या पैदा होती है।

एक, चूंकि कुल जनसंख्या का बड़ा अनुपात ग्रामीण क्षेत्र में खप जाता है, बचत का बड़ा हिस्सा इसी स्रोत से उत्पन्न हो सकता है। किंतु जब कृषि क्षेत्र में उत्पादकता का स्तर निम्न होता है तब ऐसा नहीं होता है।

दो, उद्योग कृषि पर, जो औद्योगिक उत्पादों के लिए माँग का एक बृहत् स्रोत होता है, निर्भर करता है। किंतु इस क्षेत्र में निम्न उत्पादकता और परिणामी निम्न क्रय-शक्ति, औद्योगिकरण के और आगे संभावित विकास को निरुत्साहित करता है, क्योंकि घरेलू बाजार लाभप्रद औद्योगिक कार्यकलाप के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

सामाजिक कारक के संबंध में, विकासशील देशों में सामाजिक संगठन और सामाजिक मनोवृत्ति ऐसी होती है जो औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि को अवरूद्ध करता है। ये विभिन्न उत्पादक कारकों जैसे श्रम, पूँजी और उद्यम योग्यता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

प्रशासनिक कारक
विकासशील अर्थव्यवस्था में औद्योगिकरण को अवरुद्ध करने वाले महत्त्वपूर्ण कारकों को निम्नवत् चिन्हित किया जा सकता है:
प) प्रशासनिक कार्यकुशलता की कमी से सामान्यतया सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम कुप्रबंधन के शिकार हो जाते हैं और उन्हें हानि भी उठाना पड़ता है।
पप) कर नीति, विदेशी मुद्रा विनिमय दरों, सीमा-शुल्कों और उत्पाद शुल्कों में बारम्बार परिवर्तन व्यापार नियंत्रण और लाइसेन्सिंग नीतियाँ इत्यादि निवेशकों के दिमाग में अनिश्चितता पैदा करते हैं जिससे निवेशक निवेश करने से विमुख हो सकता है।
पपप) खराब लोक प्रशासन का एक तत्व अनुपयुक्त और त्रुटिपूर्ण विधायन है जो इन देशों में तनाव उत्पन्न करता है।

 अन्तरराष्ट्रीय कारक
विकासशील देशों में औद्योगिकरण में विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय कारकों, जैसे आयातित माल से प्रतिस्पर्धा, विकसित देशों द्वारा सीमा शुल्क संबंधी बाधाएँ खड़ी करना, दुर्लभ कच्चे मालों के आयात की अधिक कीमत, प्रौद्योगिकीय जानकारी, मशीनरी और उपस्कर इत्यादि द्वारा भी अड़चनें पैदा की जाती हैं। ऊपर जिन विभिन्न कारकों की चर्चा की गई है उसका सार यह है कि विकासशील अर्थव्यवस्था का औद्योगिकरण न तो एक आसान कार्य है और न ही उसकी प्रक्रिया सुगम है, तथापि, जैसा कि बाद की इकाइयों से पता चलेगा, विकासशील देशों में औद्योगिकरण को अवरुद्ध करने वाली विभिन्न कठिनाइयाँ ऐसी नहीं होती हैं कि उनका समाधान न किया जा सके। कभी-कभी इनका समाधान अत्यन्त ही सरल होता है जबकि कभी राज्य द्वारा नियोजित प्रयास किए जाने की जरूरत हो सकती है। विकासशील देशों में औद्योगिकरण राज्य की सक्रिय भागीदारी के बिना सफलतापूर्वक जल्दी पूरा करना संभव नहीं है।

बोध प्रश्न 3
1) तीव्र औद्योगिकरण के विरुद्ध तीन आलोचनाओं का उल्लेख कीजिए।
2) औद्योगिकरण की प्रक्रिया से जुड़ी तीन समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
3) एक विकासशील अर्थव्यवस्था में औद्योगिकरण को अवरुद्ध करने वाले कुछ महत्त्वपूर्ण कारकों का उल्लेख कीजिए।