वियतनाम देश के बारे में जानकारी vietnam country information in hindi वियतनाम का इतिहास

By   September 16, 2020

वियतनाम को स्वतंत्रता कब प्राप्त हुई , का प्राचीन नाम क्या है वियतनाम देश के बारे में जानकारी vietnam country information in hindi वियतनाम का इतिहास वियतनाम में राष्ट्रवाद के उदय के कारणों का उल्लेख करें , वियतनामी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना किसने और कब की ?

वियतनाम
संरचना
उद्देश्य
प्रस्तावना
आरंभिक इतिहास
मध्यकालीन इतिहास
18वीं सदी के अन्तिम 25 वर्षों के दौरान हुए विद्रोह
फ्रान्स के साथ अन्योन्य-क्रिया की शुरुआत
औपनिवेशिक शासन
धर्म प्रचारकों का दमन और फ्रांसीसी हस्तक्षेप
टू डक की संधि
राष्ट्रीय आन्दोलन
वियतनाम का इतिहास तथा चीनी शासन का अंत
फ्रांसीसी शासन का विरोध
वियतमिन्ह एवं अमरीकी हस्तक्षेप
नया गणतन्त्र तथा उपस्थित समस्याएं
फ्रांसीसी महत्वाकांक्षाएं एवं मंसूबे
वियतनाम तथा शीत युद्ध की छाया
गो दिन्ह डिएम को अमरीकी समर्थन
1966 की टौंगकिंग घटना
अर्थव्यवस्था
आर्थिक नियोजन की उत्पत्ति
युद्धोत्तर काल में आर्थिक नियोजन एवं विकास
विशेष समस्याएं
जल्दबाजी में किये गये एकीकरण से पैदा समस्याएं
आन्तरिक समस्याएं
वियतनाम में पेरिस्त्रोइका
संविधान एवं सरकार
नया संविधान
विदेश नीति
सारांश
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई में वियतनाम के बारे में अध्ययन किया गया है, जो कि दक्षिणपूर्व एशिया में स्थित एक साम्यवादी देश है। वियतनाम औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध इसके द्वारा लड़े गये संभवतः सबसे अधिक रक्तपात वाले स्वाधीनता संग्राम तथा आगे चलकर अमरीका द्वारा किये गये प्रत्यक्ष सैनिक हस्तक्षेप के खिलाफ चलाये गये अपने संघर्ष की वजह से प्रसिद्ध हआ है। वियतनाम को समझने के लिये उसके इतिहास तथा कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में इसके द्वारा चलाये गये सशस्त्र संघर्ष को समझना मूलतः जरूरी है। जहां तक इस इकाई के उद्देश्यों का प्रश्न है, इसका अध्ययन करने के उपरान्त आपको निम्नलिखित मुद्दों में सक्षम होना चाहियेः
ऽ स्वाधीनता संघर्ष समेत इस देश के इतिहास के बारे में चर्चा करने
ऽ वियतनाम के एकीकरण की समस्याओं तथा आर्थिक विकास पर पड़े इनके प्रभावों पर चर्चा करने, और

 प्रस्तावना
वियतनाम दक्षिण-पूर्वी एशिया में हिन्द-चीन के तीन देशों में से एक है। विदेशी ताकतों द्वारा लंबे समय तक इसे दास बनाये रखने के इसके प्रभावी इतिहास के अलावा इसे एक ऐसे राष्ट्रीय आन्दोलन का गौरव हासिल है, जिसका उदाहरण इतिहास में नहीं मिल सकता। वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी तथा हो ची-मिन्ह के नेतृत्व में, दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापानी कब्जे के खिलाफ तथा बाद में फ्रांसिसियों (जिन्हें जापान ने खदेड़ कर बाहर कर दिया था) के खिलाफ, जोकि दोबारा से अपने पूर्व शासित देशों पर कब्जा करना चाहते थे, वियतनाम ने शानदार संघर्ष चलाया था। जनरल जियाप की गुरिल्ला सेनाओं के नेतृत्व में दिएन विएन फू में फ्रांसिसी फौजों को 1954 में शिकस्त देने के बाद, वियतनाम जिनेवा समझौते के तहत दो देशों में विभाजित कर दिया गया। जनता की राय लेने के लिये वायदे के मुताबिक चुनाव नहीं कराया गया और अमरीका ने वियतनामी कम्युनिस्टों के खिलाफ युद्ध के लिये भारी मात्रा में अपनी सेनाएँ भेज दी। यह सब साम्यवाद को समाप्त कर देने की विश्व-व्यापी रणनीती का ही एक हिस्सा था। किन्तु यह शायद अमरीकियों के लिए अब तक की सबसे बड़ी दुर्घटना सिद्ध हुई। यद्यपि, वियतनाम को विश्व की सबसे शक्तिशाली ताकत अमरीका द्वारा सर्वाधिक घिनौने ढंग के सैन्य आक्रमण का निशाना बनाया गया था किन्तु वियतनामी राष्ट्रीय भावना को दबाया नहीं जा सका। लगभग बीस वर्षों तक चले युद्ध के बाद वियतनाम के विरुद्ध युद्ध में लगभग 55000 अमरीकी सैनिक मारे गये और अंततः 1975 में उसे शर्मनाक ढंग से देश छोड़कर भागना पड़ा।

इस जबर्दस्त विजय के बाद, हालांकि वियतनाम को एकीकरण तथा युद्ध से तबाह हुए देश के पुनर्निर्माण से संबधित गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसके अलावा वियतनाम के भूतपूर्व समर्थक सोवियत संघ तथा चीन के बीच विचारधारात्मक शत्रुता के फलस्वरूप भी वियतनाम को सोवियत संघ के पक्ष में खड़ा होना पड़ा जिसने उदारता के साथ आर्थिक मदद प्रदान की। साम्यवादी सोवियत संघ के ढह जाने तथा अर्थव्यवस्था के असंतोषजनक निष्पादन के कारण, हाल ही में वियतनाम को विकास के कुछ पूंजीवादी उपाय अपनाने पड़े। आज वियतनाम लगभग सभी क्षेत्रों में एक तीव्र रूपान्तरण के दौर से गुजर रहा है। अब वह कम्युनिस्ट-विरोधी आसियान (एसोशिएशन आफ साउथ-ईस्ट एशियन नेशन्स), अपने पूर्व शत्रु चीन तथा अमरीका, के साथ घनिष्ठ संबंध बना रहा है। अब उसने एक उदारीकृत, बाजार-उन्मुख अर्थ-नीति को अपनाना शुरू कर दिया है।

आरंभिक इतिहास
वियतनाम के आरंभिक इतिहास में चीनी शासन के अधीन स्वतंत्रता की मांग करते हुए छिटपुट हिंसक विद्रोहों के अलावा खास कुछ भी नहीं है। 207 ई.पू. में चीन में चिन वंश के पतन के बाद एक चीनी सेनानायक ट्रियूडा ने, जोकि क्वाटुंग एवं क्वांगसी प्रांतों की बागडोर संभाले हुए था, रेड खिर डेल्टा को भी अपने अधिपत्य में ले लिया और इस तरह नान-अह अथवा नाम-वियत नामक स्वतंत्र सल्तनत की स्थापना कर दी। ई.पू. में नाम सल्तनत के खात्मे के बाद नाम-वियत चीनी प्रान्त में बदल गया और अगले एक हजार वर्षों के लिये उसके अधिराजत्व में रख दिया गया। बड़ी संख्या में चीनी लोग रेड खिर डेल्टा में आकर बस गये और उन्होंने बौद्ध धर्म कन्फूशियस के मूल्यों तथा चीनी. संस्कृति की वियतनाम में शुरुआत की।

मध्यकालीन इतिहास
वियतनाम के मध्यकालीन इतिहास में दो परिवारों का बोलबाला बना रहा, ट्रिन्ह तथा ग्वेन, जोकि एक दूसरे के रिश्तेदार थे किन्तु राजनैतिक प्रतिद्वन्दी भी थे। 15वीं शताब्दी तक, डेको-वियत की रियासत टोगकिंग डेल्टा तक ही लगभग सीमित थी। 1471 में चम्पा की जबर्दस्त पराजय के बाद वियतनामी राज्य अन्ना रेन्ज के थोड़ा दक्षिण तक विस्तार कर गया। वियतनाम का विभाजन पहली बार 1540 में हुआ। यह उस समय हुआ जबकि एक दरबारी मंत्री गुएन द्वारा समर्थित वियतनाम के शासक ली परिवार को एक सेनानायक भेक डैक ढंग के हाथों गंभीर आघात झेलना पड़ा जिसने टौडिंग में सत्ता हथिया ली। चीन ने मध्यस्थता करते हुए वियतनाम के विभाजन का समर्थन किया। हाँलाकि 1592 तक एक अन्य दरबारी कुलीन दिन्ह ने टौंगकिंग में मैंक निजाम को उखाड़ फेंका और ली वंश के नाम से सत्ता पर काबिज हो गया। दिन्ह नाममात्र के भी शासक को चुपचाप हू से हनोई ले आने में सफल हो गया। अधिराजत्व सत्ता के रूप में चीन के पिछले विभाजन को निरस्त कर दिया और ली वंश को वियतनाम के एकमात्र वैध शासक की मान्यता प्रदान कर दी। किन्तु खेनों को मिटाया नहीं जा सका। अन्नम पहाड़ों से लेकर डौंग होई के पास के समुद्र तक खिंची हुई एक दीवार ट्रिन्ह तथा ग्बुने परिवारों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों को पृथक करती है।

खेनों की शक्ति ट्रिन्ह खतरे को दूर कर देने के बाद तेजी के साथ बढ़ी। चम्पा रियासत के अवशेषों का अंतिम रूप से सफाया 1720 में हुआ जबकि इसका अंतिम राजा अपने अधिकांश आदमियों के साथ वर्तमान कम्बोडिया भाग कर आ गया। वियतनामियों ने अपने नियंत्रण का विस्तार कोचीन-चीन के मैकांग डेल्टा तक कर दिया जोकि उस समय तक कम्बोडिया की खेमर रियासत का हिस्सा था। अठारवी सदी के मध्य तक, वर्तमान दक्षिण वियतनाम के लगभग सभी खेमर क्षेत्र खेन रियासत का हिस्सा बन गये।

 18वीं सदी के अंतिम 25 वर्षों के दौरान हुए विद्रोह
18वीं सदी के अंतिम 25 वर्षों के दौरान वियतनाम में जबर्दस्त सामाजिक एवं राजनैतिक क्रांतियां हुई। उत्तर तथा दक्षिण दोनों ही में पुराने प्रतिष्ठित निजामों को उखाड़ फेंका गया। मध्य वियतनाम के ग्वेन वान ह, खेन वान लू तथा ग्वेन वान हू नामक तीन भाइयों ने (जिन्होंने दक्षिणी शासक परिवार ग्वेन का नाम अपना लिया था) क्रांति का झण्डा बुलंद कियाय साथ ही ट्रिन्ह निजाम के खिलाफ जोकि भ्रष्ट और पक्षपातपूर्ण था, जनता में उपजे असंतोष ने भी योगदान किया। 1788 तक उन्होंने समूचे वियतनाम को अपने नियंत्रण में ले लिया। हक को अन्न का राजा घोषित किया गया जबकि हू तथा लू क्रमशः टौगकिंग एवं मैकोंण के शासक बने। यद्यपि इन तीनों भाइयों ने वियतनाम का एकीकरण कर दिया, किन्तु दक्षिण में उन्हें अधिक सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था. जहां लोग उन्हें बेईमान मानते थे क्योंकि उन्होंने मल खेन राजा के बिना कोई वयस्क वारिस छोड़े, मर जाने का फायदा उठाया था। अवयस्क राजकुमार खेन अन्ह के साथ लोगों को सहानुभूति थी और उन्होंने चुपचाप उसकी सहायता की।

फ्रांस के साथ अन्योन्य-क्रिया की शुरुआत
एक फ्रांसीसी धर्मप्रचारक, पिगनौ व बेहैन ने फ्रांस के साथ अन्योन्य-क्रिया का सूत्रपात किया। गवान अन्ह का एक समर्थक अन्ह के पुत्र को, गवान अन्ह को सत्ता में बहाल करने के लिये सैन्य सहायता मांगने के लिये फ्रांस के लुईस के दरबार में ले गया। राजनैतिक हलचल के बावजूद जोकि 1789 को फ्रांसिसी क्रांति से ठीक पहले सम्राट को भुगतनी पड़ रही थी, फ्रांस-वियतनाम संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत विदेशी व्यापार में इजारेदारी तथा पुओलो कोन्डोइ प्रायद्वीप तथा पोर्ट आफ डा नांग को अलग किए जाने के बदले में फ्रांसीसी सैन्य सहायता प्राप्त किए जाने का प्रावधान किया गया था। फ्रांसीसी सरकार ने पाण्डेचेरी (मद्रास के निकट) के अपने औपनिवेशिक गवर्नर को सैन्य सहायता प्रदान करने के निर्देश जारी किये, किन्तु इस आदेश पर कोई अमल नहीं हो सका। डी बीहेनी ने, हालांकि पांडेचरी में 300 स्वयंसेवक तथा काफी सारा फण्ड जमा कर लिया जोकि हथियारों से भरे अनेक जहाजों को खरीदने के लिये पर्याप्त था। वह जून 1789 में, बैस्टली के पतन से ठीक एक माह पहले, जोकि फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत का प्रतीक है, वियतनाम पहुंचा था।

फ्रांसीसी सहायता के पहुंचने से पूर्व ही, गवान अन्ह ने साइगौन पर 1788 में ही कब्जा कर लिया था। जब तक 1801 में उसने ह्यू पर विजय हासिल की और एक साल बाद हनोई को जीता, तब तक उसकी सेना में केवल चार फ्रांसीसी ही मौजूद थे। हालांकि, फ्रांस ने वाउबन जैसे किले तैयार करने, बेहतर और बड़ी तोपों के निर्माण तथा एक जल सेना स्थापित करने में मदद की थी। गवेन अन्ह को 1892 में अन्नम का सम्राट घोषित किया गया और उसे जिया लौंज की उपाधि दी गई, जोकि टौगकिंग तथा मैकोंग डेल्टाओं के एकीकरण का प्रतीक थी। आगामी वर्षों में उसने चीनी दरबार को सौगात भेजी और पहली बार चीन ने ग्वेन वंश को मान्यता प्रदान की। इसका श्रेय जिया लौंग को दिया जाना चाहिये, जिसने युद्ध से तबाह हुए देश का सफलता पूर्वक नवनिर्माण किया, जिसमें सैंगोन, हु तथा हनोई को जोड़ने वाली 1300 मील लम्बी सड़क का निर्माण भी शामिल है। वह निस्संदेह वियतनाम को एक सूत्र में बांधने वाला ही नहीं बल्कि वह ही अब तक हुआ सबसे महान सम्राट था।

औपनिवेशिक शासन
यद्यपि वियतनाम के साथ फ्रांसीसी संपर्क सत्रहवीं शताब्दी के सुदूर अतीत तक में देखा जा सकता है, फिर भी बाकायदा औपनिवेशिक राज उन्नीसवी सदी के उत्तरार्द्ध तक स्थापित नहीं हुआ था। 18वीं सदी के अंत में निरंतर धर्मान्तरण में रुचि दिखाई पड़ी जबकि लगभग एक चैथाई मिलीयन वियतनामियों ने धर्मपरिवर्तन कर लिया, जोकि अधिकांशतः तटीय प्रांतों के रहने वाले थे। मिन मांग के अधीन 1920 में बड़े पैमाने पर धर्मान्तरित लोगों व धर्मप्रचारकों का दमन किया गया तथा वह थिऊ दी (1841-1847) तथा टू डक शासन (1847-1883) के आरंभिक चरण तक जारी रहा। कैथेलिकों के प्रति शत्रुता, धर्मप्रचारकों की लगातार दरबारी राजनीति में भागीदारी के फलस्वरूप और अधिक बढ़ती गई। कोचीन-चीन के अर्ध स्वतंत्र विद्रोही गवर्नर के साथ धर्मप्रचारकों के घनिष्ठ रिश्ते के फलस्वरूप भी सम्राट उनसे बुरी तरह नाराज था। इस गवर्नर ने 1820 में जिया लोंग की मृत्यु के बाद मिन्ह मांग को सत्ता में आने से रोकने की कोशिश की थी। मिन्ह मांग ने 1825 में नये धर्मप्रचारकों के प्रवेश पर रोक लगा दी। आठ साल बाद एक अत्यंत कठोर डिक्री ने चर्चों को ढहा दिये जाने का आदेश दिया और कैथेलिक विश्वास के पेशे को एक ऐसा दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया जिस पर मौत की सजा दी जा सकती थी। यह 1836 में हुआ और यही वह समय था जबकि जहाजों के आवागमन पर चीन ने सख पाबंदियां लगा दी थी। वियतनामी सम्राट ने अपने बंदरगाहों को यूरोपीय जहाजों के लिये बंद कर दिया।

धर्मप्रचारकों का दमन और फ्रांसीसी हस्तक्षेप
धर्मप्रचारकों का दमन फ्रांस के लिये वियतनाम में सीधा हस्तक्षेप करने का उत्कृष्ट बहाना बन गया। 1846 में फ्रांसीसी जहाजों ने दो सप्ताह तक डा नांग को घेरे रखा और फिर बंदरगाह पर गोलाबारी की, माथ ही डोमिनीक लैफेनर की रिहाई की मांग की, जिसे वियतनामी सरकार ने मौत की सजा सुना दी थी। नेपोलियन थर्ड की फ्रांस सरकार इस मौके का इस्तेमाल कोचीन-चीन में सफलता हासिल करके अपनी घरेलू गड़बड़ियों से उबरने के लिये भी करना चाहती थी। नया फ्रांसीसी साम्राज्यवाद उस समय चर्च, व्यापारियों तथा नये बाजारों की तलाश करते उद्यमियों के व्यापक हितों के गठजोड़ पर आधारित था तथा उसे राष्ट्रीय शक्ति एवं वैभव को बढ़ाने का सपना देखने वाले और उपनिवेश कायम करने में लगे एक अहंकारी सम्राट का समर्थन हासिल था। व्यापारिक हित वियतनाम में उन्हें प्राप्त विशिष्ट भौगोलिक फायदों से वाकिफ थे, खासतौर पर आंतरिक चीन के लाभकारी बाजारों में प्रवेश लेने के संदर्भो में। विदेशी बाजारों में रुचि रखने वाले फ्रांसीसी व्यापारी कोचीन-चीन की सरकार का समर्थन इस उम्मीद पर कर रहे थे कि दक्षिण-चीन व्यापार के प्रवाह के लिये प्रतिस्पर्धा कर रहे सिंगापुर तथा हौंगकौंग के खिलाफ सैंगोन में एक आधार की स्थापना की जा सके।

टू डक की संधि
आगामी दस वर्षों के लिये युद्ध संधि के बाद, फ्रांसिसियों ने 1862 में टू डक से एक और संधि की जिसके तहत वियतनामी सम्राट ने सैंगोन समेत कोचीन-चीन में तीन प्रांत फ्रांस के हवाले कर दिये और यह आश्वासन दिया कि उसकी रियासत का कोई भी हिस्सा फ्रांस के अलावा किसी अन्य शक्ति से गठजोड़ नहीं करेगा। वह दस वार्षिक किश्तों में चार मिलीयन पियासाने का हर्जाना देने के लिये भी राजी हो गया और साथ ही फ्रांसीसी व्यापार के लिये अन्नम में तीन बंदरगाह खोलने के लिये भी राजी हो गया। भविष्य में ईसाई धर्म को बर्दाश्त किया जाना था तथा मैकौंग का धर्मान्तारित करने का अधिकार था। पांच साल बाद, फ्रांसिसियों ने कोचीन-चीन के बाकी प्रांतों को भी हासिल कर लिया ताकि मैकोंग डेल्टा पर उनका पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो जाय। 1873 की संधि ने फ्रांस को और अधिक रियायतों के लिये वियतनामी सम्राट पर दबाव डालने का बहाना प्रदान कर दिया, क्योंकि फ्रांस ने आरोप लगाया कि फ्रांस के संरक्षण में रहने के बावजूद चीन को सौगात भेज कर वियतनाम ने संधि का उल्लंघन किया है। अन्नम के सम्राट की भारी विवशता ने अन्नम को फ्रांस का औपचारिक तौर पर संरक्षित राज्य बनने, टौंगकिंग प्रांत की प्रशासनिक जिम्मेदारी फ्रांस के सुपुर्द कर देने तथा हनोई एवं हयू में फ्रांसीसी रेजीडेन्ट को स्वीकार करने पर विवश कर दिया। एक लम्बी लड़ाई और अन्ततः पराजय के बाद चीन की मध्य सल्तनत ने 1885 में एक संधि पर हस्ताक्षर कर दिये जिसमें अन्नम तथा टौंगकिंग पर फ्रांसिसी संरक्षण को मान्यता दे दी गई, फ्रांसीसी व्यापारियों को उत्तरी चीन में व्यापार की इजाजत मिल गई, चुन्नान में फ्रांस को अन्य सभी युरोपीय ताकतों पर वरीयता देना स्वीकार कर लिया गया और फ्रांस को हनोई से कुर्मिग तक रैड रिवर घाटी के सामानान्तर रेल लाइन बिछाने की मंजूरी दे दी गई। इस संधि से वियतनाम एवं चीन के बीच अधीनस्थता के दो हजार साल पुराने सबन्धों का अंत हो गया और समूचे वियतनाम पर फ्रांस का अधिपत्य स्थापित हो गया।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणियाँः क) अपने उत्तरों के लिये नीचे दिये रिक्त स्थान का प्रयोग कीजिये।
ख) अपने उत्तरों की जांच इकाई के अंत में दिये गये उत्तरों से कीजिये।
1) किन कारकों के फलस्वरूप वियतनाम में फ्रांस द्वारा हस्तक्षेप किये जाने का रास्ता तैयार हुआ?
2) वियतनाम में फ्रांसीसी औपनिवेशिक शासन के प्रमुख पहलू क्या हैं?

राष्ट्रीय आन्दोलन
दक्षिण-पूर्वी एशिया इस मामले में अनोखा है क्योंकि शायद यह विश्व का एकमात्र ऐसा भाग है जिसमें लगभग सभी औपनिवेशिक ताकतें एक समय पर मौजूद रही हैंय हिन्द-चीन (वियतनाम, कम्बोडिया, लाऔस) में फ्रांसीसी, मलाया, सिंगापुर, बूनी व बर्मा में ब्रिटिश, इण्डोनेशिया में डच, फिलीपीन्स में अमरीकी तथा पूर्वी तीमोर में पुर्तगाली। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान समूचा क्षेत्र । जापानी शासन के अधीन रह चुका है। समूचे क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलनों का ज्वार भी उतना ही महत्वपूर्ण है जोकि वियतनाम के सबसे ज्यादा रक्तरंजित आन्दोलन से लेकर बूनी के सबसे ज्यादा शान्तिपूर्ण आन्दोलन तक की श्रृंखलाओं में रहे।

वियतनाम का इतिहास तथा चीनी शासन का अंत
वियतनाम का इतिहास विभिन्न समयों के दौरान चीनी शासन को उखाड़ फेंकने के लिये किये गए व्यापक स्तर के आन्दोलनों से भरा पड़ा है। वियतनाम में भी, शेष दक्षिण-पूर्व एशिया की तरह शिक्षा ने राष्ट्रवादी चेतना के विकास में अहम् भूमिका अदा की। कुलीनों में से अनेक लोग जिन्होंने पश्चिम में शिक्षा प्राप्त की थी, वे विभिन्न विचारधाराओं, खासकर मार्क्सवाद के प्रभाव में आये और उन्होंने स्वदेश वापस लौट कर राष्ट्रवादी आन्दोलनों का नेतृत्व किया, जोकि कई बार लड़ाकू तेवरों के साथ लड़े गये थे। अन्य घटनाएं जिन्होंने राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारा, वे भी रू 1899 में चीन में पाश्चात्य देशों की मौजूदगी तथा वर्चस्व के खिलाफ बॉक्सर विद्रोह, रूस पर की जबर्दस्त सैन्य विजय जिसने पश्चिमी शक्ति की अपराजेयता के मिथक को चकनाचूर कर दिया थाय चीन में वतनशील मान्यू वंश को सफलतापूर्वक सत्ता से उखाड़ा फेंका जाना और 1911 में चीनी गणतंत्र की उद्धघोषणा, 1917 में हुई रूसी क्रांति जिसने पहली बार सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में एक सर्वहारा राज्य की स्थापना की थी, तथा भारत में हुआ राष्ट्रीय आन्दोलन। किन्तु सबसे अधिक महत्वपूर्ण भी दक्षिण-पूर्व एशिया में मौजूद तमाम महानगरीय-शक्तियों पर जापान की विजय तथा समूचे क्षेत्र पर उसका कब्जा, जिसने न सिर्फ एक उत्प्रेरक का काम किया बल्कि राष्ट्रवादी आन्दोलनों को आवश्यक प्रेरणा भी प्रदान की।

 फ्रांसीसी शासन का विरोध
यद्यपि फ्रांसिसियों द्वारा वियतनाम पर कब्जा किए जाने के तुरन्त बाद से ही फ्रांसीसी शासन का विरोध होना शुरू हो गया था, किन्तु आरंभिक 20वीं शताब्दी के दौरान ही स्वाधीनता संघर्ष नई बुलंदियों पर पहुंच गया था। खाते-पीते परिवारों के अनेक नौजवान जिन्हें फ्रांस में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला था. और जो 1911 में चीनी क्रांति के बाद चीन पहुंच गये थे, उन्होंने अनेक छोटे विद्रोहों को उकसाया, खासकर टौंगकिंग तथा कोचीन-चीन में और 1916 में उन्होंने काफी गंभीर विद्रोह पैदा कर दिया, इन सभी को फ्रांसीसी शासकों द्वारा सख्ती से कुचल दिया गया। 1920 में अनेक भूमिगत गुप्त संगठन बनाए गए जिनमें मार्क्सवादी व गैर-मार्क्सवादी दोनों तरह के संगठन थे। किन्तु वियतनाम के हाल के इतिहास में सबसे अधिक महत्वपूर्ण घटना राष्ट्रीय आन्दोलन में महान मार्क्सवादी नेता हो.ची. मिन्ह का प्रवेश था। वह एक केबिन बौय के रूप में यूरोप गये थे और शीघ्र ही मार्क्सवादी एवं अन्य समाजवादी रचनाओं से उन्हें प्रेरणा मिली। कुछ समय मॉस्को में बिताने के बाद वे राष्ट्रीय आन्दोलन को कम्युनिस्ट आधारों पर संगठित करने के उद्देश्य से 1924 में चीन गए। 1925 में उन्होंने एसोसिएशन आफ वियतनामी रिवोल्यूशनरी यूथ की स्थापना की और सैंकड़ों लोगों को मार्क्सवाद का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। 1930 में उन्होंने वियतनाम के तीन प्रभावशाली कम्युनिस्ट गुटों को एक करके एक पार्टी में शामिल कर लिया और उसे । इण्डो-चाइना कम्युनिस्ट पार्टी का नाम दिया। यह इस दृष्टि से किया गया कि हिन्द-चीन के तीनों देशों में एक संयुक्त राष्ट्रवादी आन्दोलन का निर्माण किया जा सकता था।

वियतनामी नेशनलिस्ट पार्टी (1927 में स्थापित) नामक प्रमुख गैर-मार्क्सवादी संगठन के नेतृत्व में 1930 के आरंभ में किये गये एक अपरिपक्व एवं गलत ढंग से नियोजित विद्रोह को फ्रांस नेता से कुचल दिया था। इण्डो-चाइना कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा हडतालों व असहयोग आन्दोलनों के माध्यम से किसान जनता के असंतोष को संगठित करने के प्रयासों को भी कुचल दिया गया। हालांकि इण्डो-चाइना कम्युनिस्ट पार्टी ने स्वयं को शीघ्र ही पुनर्संगठित कर लिया क्योंकि इसके पास बेहतरीन संगठन और पार्टी अनुशासन मौजूद था। आई.सी.पी. ने फ्रांस के भीतर की उदार राजनैतिक परिस्थिति का फायदा, फाम वान डौंग तथा वो ग्वेन लियाप के नेतृत्व में एक व्यापक जनवादी राष्ट्रीय मोर्चा गठित करने में उठाया जिसका उद्देश्य सभी सामाजिक वर्गों तथा राजनैतिक समूहों को संगठित करना था। युद्ध भड़क उठने के साथ ही पोपुलर फ्रंट सरकार फ्रांस में गिरा दी गई और उसके फलस्वरूप इंडो-चाइना कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

वियतमिन्ह तथा अमरीकी हस्तक्षेप
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस तथा जापान की सेनाओं के बीच एक मामूली झड़प के बाद जापान तथा फ्रांस को विची सरकार के बीच एक समझौता हो गया जिसमें यह प्रावधान किया गया कि हिन्द-चीन में फ्रांस की प्रभुसत्ता एवं प्रशासन बरकरार रहेगा और इसके बदले में हिन्द-चीन की सैन्य-सुविधाएं तथा आर्थिक संसाधन जापान की इच्छा पर छोड़ दिये जायेंगे। हो ची मिन्ह च्यांग काई शेक के आदेश पर चीन की जेल से रिहा कर दिये गये ताकि वे जापानी प्रभुत्व वाली विची सरकार के खिलाफ वियतनाम में प्रतिरोध आन्दोलन का नेतृत्व कर सकें। उन्हें सैन्य तथा अन्य सामानों की आपूर्ति की गई। आई.सी.पी. की मई 1941 में चीन में हुई बैठक में एक खेतिहर आन्दोलन शुरू करने का फैसला किया गया। वियतमिन्ह अथवा वियतनाम इंडिपेण्डैन्स लोग नामक एक नया संगठन खड़ा किया गया जिसमें उग्र दौलत, लिंग, धर्म अथवा राजनैतिक दृष्टिकोण का भेद किये बिना सभी लोगों को शामिल किया जाना था और इसका एकमात्र उद्देश्य देश को स्वाधीन बनाना था। वो युएन जियाप के नेतृत्व में 5000 लोगों की एक सेना तैयार की गई। जापान द्वारा आत्मसमर्पण किये जाने से तीन माह पूर्व ही फ्रांस से वियतनाम का प्रशासन अपने हाथ में लेने के बाद, वियतमिन्ह ने छः प्रान्तों में गुरिल्ला अड्डे तथा प्रशासन कायम कर लिया था। जापान के रवाना होने से ठीक पहले वियतमिन्ह ने हनोई पर कब्जा कर लिया और हो ची मिन्ह ने डैमोक्रेटिक रिपब्लिक आफ वियतनाम (डी.आर.वी.) की स्वाधीनता का ऐलान कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि उस अवसर पर अपनाया गया संपूर्ण कार्यक्रम राष्ट्रवादी था न कि कम्युनिस्ट। इस कार्यक्रम में पूर्ण करों के उन्मूलन, स्वतंत्रता हासिल करने, एक सैन्यबल का विकास करने, जनतांत्रिक अधिकारों की घोषणा, सामुदायिक भूमि के पुनर्वितरण तथा मित्र देशों से मित्रता, आदि जैसे लक्षणों में देखा जा सकता है। दरअसल, जब हो ची मिन्ह ने 50 हजार की एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए वियतनामी जनतांत्रिक गणतन्त्र की स्थापना की घोषणा की थी तो वे 1776 के अमरीकी स्वतंत्रता घोषणापत्र से ही अधिकांश उदाहरण दे रहे थे।

नया गणतंत्र तथा उपस्थित समस्याएं
नये गणतंत्र को किसी भी देश ने मान्यता प्रदान नहीं की और पोस्टडेम में मित्र देशों की बैठक में वियतनाम के उत्तरी हिस्से को राष्ट्रवादी चीन के अधीन रखे जाने तथा दक्षिणी हिस्से को ब्रिटेन के अधीन रखे जाने का निर्णय लिया गया। ब्रिटिशों ने फ्रांसीसी बंदियों को रिहा कर देने के बाद, दक्षिण का प्रशासन फ्रांस के हवाले कर दिया। फ्रांसिसियों ने हिन्द-चीन में अपने औपनिवेशिक अधिकारों को पुनः प्राप्त करने की कोशिश की।

फ्रांसीसी महत्वाकांक्षाएं एवं मंसूबे
चीनी सेनाओं से पीछा छुड़ाने के लिये हो ची मिन्ह ने आई.सी.पी. के विघटन की घोषणा की और 1945 के अंत में अन्य स्वतंत्र संगठनों के साथ सत्ता में साझीदारी की पेशकश की, मुख्यतः फ्रांस से मान्यता प्राप्त करने के लिये। हालांकि फ्रांस भी इस बात का निर्धारण करने के लिये एक जनमत-संग्रह कराने पर सहमत हो गया कि क्या चीन-चीन को संघ में शामिल हो जाना चाहिये और समूचे वियतनाम से धीरे-धीरे अपनी सेनाएं वापस बुला लेनी चाहिये। किन्तु उसने सत्ता छोड़ने की कोई इच्छा नहीं दिखाई। इसके विपरीत, फ्रांस ने अपनी सैन्य एवं राजनैतिक स्थिति को दृढ़ करना शुरू कर दिया। जनमत संग्रह को टालते हुए उसने चीन-चीन को स्वायत्त गणतंत्र की स्थापना किये जाने की घोषणा की। अंततः 23 नवम्बर को फ्रांसीसी युद्धपोत सफरेन ने हाइफौंग के । वियतनामी क्षेत्र पर बमबारी की और कुछ ही घंटों में 6 हजार से भी अधिक वियतनामियों को मौत के घाट उतार दिया। इसने फ्रांस और वियतनाम के बीच शत्रुता पैदा कर दी। उत्तरी व दक्षिणी वियतनामों में पहला हिन्द-चीन युद्ध भड़क उठा जो कि 1946 से 1954 तक चलता रहा। लोगों को जिस बात ने आकर्षित किया वह कम्युनिस्ट विचारधारा नहीं बल्कि वियतमिन्ह का लड़ाकू चरित्र ही था।

सारे वियतनाम में चले इस युद्ध ने दोनों पक्षों के अनगिनत लोगों की जाने ली। फ्रांस में वियतनाम युद्ध के कारण अनेक मंत्रिमंडलों का पतन हुआ। फ्रांसीसी फौजों का मनोबल बुरी तरह टूट गया, खासतौर पर फ्रांस के भीतर घरेल जनमत के चलते, जिसने व्यापक तौर पर इस घिनौने युद्धष् को समाप्त करने के लिये दबाव डाला। लाभकारी रबड़ तथा चावल की आपूर्ति से हाथ धो बैठने के अलावा, फ्रांसीसी वियतनामी स्वतंत्रता के अन्य फ्रांसीसी उपनिवेशों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी चिन्तित थे, खासतौर पर अफ्रीका में स्थित उपनिवेशों पर 7 मई, 1954 को डी एन बि एन फू में फ्रांस को अपमानजनक पराजय का मुंह देखना पड़ा। जनरल लियाप जो कि कभी एक प्राथमिक स्कूल शिक्षक थे और एक महानतम गुरिल्ला लड़ाकू बन गये थे, उनके नेतृत्व में वियतमिन्ह के हाथों फ्रांस की करारी हार हुई थी। फ्रांस के इस सफाये का परिणाम 1054 के जिनेवा समझौते के रूप में सामने आया जिसमें सत्रहवीं समानान्तर रेखा के द्वार खतना का उतर एवं दक्षिण वियतनाम में विभाजन कर दिया गया। पुनः एकीकरण के प्रश्न पर 1 के देश व्यापी चुनाव द्वारा निर्णय किया जाना था।

वियतनाम तथा शीत युद्ध की छाया
वियतनामियों को जो अकथनीय दुख झेलने पड़े उनमे शायद बचा जा सकता था यां, गीत मुद्र को वियतनाम में न लाया गया होता और महाशक्तियों ने शक्ति का खेल न खेला होता। चुनावों का पर्यवेक्षण एक अंतर्राष्ट्रीय कन्ट्रोल कमीशन को करना था जिसकी अध्यक्षता भारत कर रहा था और कनाडा व पोलैण्ड इसके सदस्य थे। इस कमीशन को जिनेवा सम्मेलन के संयुक्त अध्यक्ष देश सोवियत संघ तथा ब्रिटेन को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी। अमेरिका जोकि साम्यवाद को दबाने को नीति के प्रति प्रतिबद्ध था, उसने सितम्बर में एक क्षेत्रीय संगठन साउथ-ईस्ट एशिया डीटी आर्गनाइजेशन् (सीएटो) बना कर खड़ा कर दिया जिसमें अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, आम्ट्रेलिया, फिलिपीन्स, थाईलैण्ड तथा पाकिस्तान सदस्य देश थे। मिएटो की धारा 4 ने हिन्द-चीन के देशो को एसे प्रोटोकौल देशों के रूप में शामिल कर लिया जिनकी सुरक्षा जानी थी, और इस तरह आगे आने वाले समय में अमरीकी हस्तक्षेप को वैधता प्रदान कर दी।

गो दिन्ह डिएम को अमरीकी समर्थन
अमरीका के सक्रियः समर्थन से गो दिन्ह डिएम ने, जिसे फ्रांसिसियों ने उस समय प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया था जबकि जिनेवा सम्मेलन चल रहा था, अक्टूबर 1955 में हुए जनमतसंग्रह में धांधली करने के बाद स्वयं को राज्य का प्रमुख घोषित कर दिया। शीघ्र ही उसने दक्षिण वियतनाम को । एक गणतंत्र तथा स्वयं को उसका राष्ट्रपति घोषित कर दिया। डिएम ने मार्च 1956 में राष्ट्रीय असेम्बली के एकतरफा चुनाव की योजना का भी ऐलान किया जोकि जिनेवा समझौते के किसी भी दायित्व को निभाने का ढोंग भर था। इस गणतंत्र को अमरीका व उसके सहयोगियों ने मान्यता दे दी और हर तरह से इसे एक स्वतंत्र देश मान लिया। दरअसल डिएम को न तो जनता द्वारा चु गया था और न ही उसका जनता से कोई संपर्क ही था।

अमरीकी समर्थन के नशे में चूर, डिएम ने अपने नजदीकी रिश्वेदारों को पदवियां बांटते हुए एक तानाशाह की तरह शासन किया। एक कैथोलिक होने के नाते उसने एक बौद्ध-बाहुल्य देश में, कैथोलिकों का नाजायज रूप से पक्षपात किया। उसने स्वयं को आम जनता से और भी अधिक काट लिया। उसने कम्यनिस्टों व गैर-कम्यनिस्टों का बेरहमी से दमन किया। यहां तक कि जब भी उन्होंने थोड़ा-सा भी विरोध किया, वह उन पर टूट पड़ा। अपनी गलत कृषि नीतियों के कारण, वह किसानों के बढ़ते असंतोष को नहीं रोक सका। दिसम्बर 1960 में कम्युनिस्टों ने देश को स्वाधीनता दिलाने और उसका एकीकरण करने के उद्देश्य से नेशनल लिब्रेशन फ्रंट (एन.एल.एफ.) की स्थापना दक्षिण वियतनाम में की। अमरीकियों ने सामाजिक व आर्थिक समस्याओं को अनदेखी करते हुए डिएम को पूरा समर्थन देना जारी रखा। जब तक उन्हें डिएम की अलोकप्रियता का अहसास हुआ, तब तक साठ के दशक की शुरुआत में एक बौद्ध प्रतिरोध ने उभर कर प्रमुख संकट का रूप ले लिया था। जब सेना के जनरलों ने राष्ट्रपति डिएम का तखा-पलट कर उसका कत्ल कर दिया, तब भी उन्होंने उन्हें निरुत्साहित नहीं किया। उन्होंने दक्षिण वियतनाम की मूल समस्याओं का समाधान नहीं किया। दूसरी तरफ, जनरलों के बीच सत्ता के लिये सेना के भीतर. संघर्ष ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया, जोकि सहायता व समर्थन के लिये पूरी तरह से अमरीका पर निर्भर थे।

 1966 की टोगकिंग घटना
1966 की टौंगकिंग घटना, जबकि उत्तरी वियतनाम द्वारा इसके तट के समीप खुफियागिरी करते एक अमरीकी जहाज पर हमला कर दिया गया था, अमरीका के लिये असीमित युद्ध छेड़ देने का मुँहमांगा बहाना साबित हुआ। 1968 तक, अमरीका ने आधे मिलियन से भी अधिक सैनिक वहां भेज दिये थे। अमरीकियों ने, जिनका पाला वियतनाम में उभार पर आ गये राष्ट्रवाद से पड़ा था, इस देश में जिस स्तर की विनाशलीला की, उसकी मिसाल इतिहास में कहीं नहीं मिलती। अमरीका ने हिन्द-चीन पर 70 लाख टन से भी अधिक की बमबारी की जोकि दूसरे विश्व युद्ध तथा । कोरियाई युद्ध दोनों को मिलाकर की गई कुल बमबारी के परिणाम से तीन गुना अधिक थी, इसके अलावा 1 लाख टन रासायनिक एवं अन्य जहरीले पदार्थों को उस भूमि पर छोड़ा था। लगभग 8000 अमरीकी हवाई जहाज एवं हैलीकोप्टर नष्ट हो गये। वियतनाम युद्ध में अमरीका का खर्च 150 मिलीयन अमरीकी डालर से भी अधिक का रहा। अमरीकियों ने हर तरह के प्रयोगात्मक हथियारों जैसे-रसायन, गैस, नापौंग, फॉस्फोरस के अवयवी अस्त्र तथा जीवाणु शस्त्रों का प्रयोग किया। विनाश के नये तरीकों के तौर पर “एजेण्ट ओरैन्ज‘‘, ‘‘कारपेट बॉम्बिग‘‘, ‘‘लेजी डॉग‘‘, तथा अन्य विभिन्न तरह के हथकण्डों की ईजाद की गई और वियतनाम में उनका भरपूर इस्तेमाल किया गया। खेतों, पुलों और नहरों पर बमबारी की गई और उन्हें नष्ट कर दिया गया ताकि लोग शहरी इलाकों की तरफ जंगलों पर जहरीली दवाएं छिड़क दी गईं ताकि गुरिल्ला लोगों को भोजन और आवास न मिल सके तथा गांव के गांव तबाह करके नष्ट कर देने के लिये ‘‘कारपेट बॉम्बिग‘‘ की गई।

जब तक अमरीकियों को इस बात का अहसास हुआ कि वियतनाम युद्ध को जीता नहीं जा सकता, तब तक उनके 58,000 सैनिक मारे जा चुके थे। किन्तु साथ ही उन्होंने 40 लाख से भी अधिक अमरीकीयों की जाने ले ली थीं। पराजय के अपमान से भी अधिक अमरीका आज तक उस मनोवैज्ञानिक सदमें से नहीं उबर पाया है, जिसे ‘‘वियतनाम संलक्षण‘‘ कहा जाता है। वियतनाम से
सूचना दी गई थी कि 5 लाख की अमरीकी अभियान सेना “एक नशेबाज, विद्रोही एवं टूटे मनोबल वाली भीड़’’ बनकर रह गई है। 1973 में, पेरिस वार्ताएँ की गई और वियतनाम से अमरीका की वापसी का रास्ता निकालने का यत्न किया गया। 1975 के बसंत में, कम्युनिस्टों की न केवल उत्तरी वियतनाम में विजय हुई बल्कि साथ ही लाऔस और कम्बोडिया में भी वे विजयी हए। 2 जनवरी, 1976 को दक्षिण वियतनाम का औपचारिक तौर पर उत्तरी वियतनाम के साथ एकीकरण हो गया और वह पुनः एक देश बन गया।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणियाँः क) अपने उत्तर के लिये नीचे दिये रिक्त स्थान का प्रयोग कीजिये।
ख) अपने उत्तरों की जांच इकाई के अंत में दिये गये उत्तरों के साथ कीजिये।
1) वियतनाम में राष्ट्रीय आन्दोलन की उत्पत्ति का संक्षिप्त वर्णन कीजिये।
2) स्वाधीनता संघर्ष में वियतमिन्ह की भूमिका का, खासतौर से अमरीका विरोधी संघर्ष में, मूल्यांकन
कीजिये।
3) वियतनाम में अमरीकी सेना की भूमिका की व्याख्या कीजिये।

 अर्थव्यवस्था
वियतनाम का आर्थिक नियोजन एवं विकास अस्सी के दशक के अंत तक काफी हद तक विकासशील समाजवादी देशों से मिलता जुलता रहा है। इसका प्रमुख उद्देश्य एक खेतिहर पितृतंत्रात्क-सामंती व्यवस्था को धीरे-धीरे एक समाजवादी अर्थव्यवस्था में रूपान्तरित कर देना रहा है।

आर्थिक नियोजन की उत्पत्ति
आर्थिक नियोजन की शुरुआत उत्तरी वियतनाम में 1955 के आखिर में एक राष्ट्रीय नियोजन बोर्ड तथा एक केन्द्रीय सांख्यिकीय कार्यालय की स्थापना के साथ हुई थी। अर्थव्यवस्था की बहाली तथा संस्कृति के विकास के लिये एक तीन वर्षीय योजना शुरू की गई जिसमें औद्योगिक क्षेत्र के लिये खासी राशि का आवंटन किया गया। दो-तीन वर्षीय योजनाओं के सफलतापूर्वक संपन्न हो जाने के बाद 1960 में पहली पंचवर्षीय योजना शुरू की गई। तीसरी योजना की अवधि (1965) के अंत तक यद्यपि अधिकांश निर्धारित लक्ष्यों को हासिल कर लिया गया था, किन्तु कृषि के सामूहिकीकरण से वांछित परिणाम देखने को नहीं मिले, जिसके फलस्वरूप खाद्यान्न की कमी पड़ गई। प्रत्यक्ष अमरीकी सैन्य हस्तक्षेप तथा समर्पित युद्ध के उत्तरी वियतनाम में भड़क उठने के साथ ही, 196573 की अवधि के लिये कोई योजना तैयार नहीं की जा सकी। समूची अर्थव्यवस्था को युद्ध प्रयासों में ही लगाया गया।

 युद्धोत्तर काल में आर्थिक नियोजन एवं विकास
अमरीका पर विजय हासिल कर लेने के बाद ही वियतनाम अपने नियोजित आर्थिक विकास को पुनः शुरू कर सका। दूसरी पंचवर्षीय योजना (1976-80) में कृषि, उद्योग, व्यापार, संस्कृति तथा जन-स्वास्थ्य, तथा जनता के आम जीवन-स्तर में सुधार किये जाने को प्राथमिकता के क्षेत्रों के रूप में सूचीबद्ध किया गया। यह योजना, मूलतः 1974 में तैयार की गई थी, और अब इसे 1975 में आशा से पहले अमरीका पर प्राप्त विजय तथा उत्तरी व दक्षिणी वियतनाम के एकीकरण के बाद की पृष्ठभूमि में समूचे वियतनाम में संशोधित करके लागू किया जाना था। हालांकि इन घटनाओं ने अनुमान से अधिक गंभीर समस्याएँ पैदा कर दी थी। आर्थिक विकास का समाजवादी पैटर्न आसानी से उत्तर से दक्षिण वियतनाम में विस्तारित नहीं किया जा सका। दक्षिण वियतनाम, अमरीकी संरक्षण में एक बाजार-उन्मुख मुक्त उद्यमशीलता की व्यवस्था के तौर पर उदित हो गया था, और मूलतः उसे अमरीकी युद्ध मशीन की सेवा करने के हिसाब से चलाया गया था। एक बार फिर, व्यापक स्तर के युद्ध के चलते, ग्रामीण क्षेत्रों में वियतमिन्ह को अपना प्रभाव-क्षेत्र विस्तृत बनाने से रोकने के लिय मानवीय आवासों को बुरी तरह से नष्ट कर दिया गया था। लोगों को शहरी इलाकों, खामकर साइगौन की तरफ जाने के लिये प्रोत्साहित किया गया था और इस तरह वियतनाम की पारंपरिक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था नष्ट हो गई थी।

विशेष समस्याएं
इसके अलावा, कम्युनिस्ट नेतृत्व को उन अपराजेय सामाजिक समस्याओं का सामना करना था जोकि अमरीकी सैन्य उपस्थिति की अवशेष थी। उन्हें तुरन्त दक्षिण वियतनामी निजाम के दस लाख सैनिकों के बारे में निर्णय करना था। इन सैनिकों को बिखराव की स्थिति में छोड़ दिया गया था और वे प्रायः विजेताओं के प्रति शत्रुता का भाव रखते थे। इसके अलावा करीब दस लाख नागरिकों की समस्याएं थीं जोकि विभिन्न हैसियतों पर पराने निजाम की सेवा करते रहे थे। वहां लगभग बीम लाख बेरोजगार किसान मौजूद थे जोकि युद्ध के दौरान बलपूर्वक शहरीकरण के कार्यक्रम के तहत शहरी केन्द्रों में धकेल दिये गये थे। जब तक अमरीकी देश छोड़ कर गये, तब तक वहां 30 लाख लोग ऐसे थे जोकि यौन रोगों से पीड़ित हो गये थे, दस लाख लोगों को क्षयरोग लग गया था और अन्य 50 लाख लोग वेश्यावृत्ति के धंधे को अपनाने के लिये विवश कर दिये गये थे। हालांकि ऊपर से 50 लाख लोग नशीली दवाओं का सेवन करने वाले, 40 लाख यतीम तथा 20 लाख भिखारी भी मौजूद थे। चूंकि समूची अर्थव्यवस्था पूरी तौर पर अमरीकी महायता पर टिकी रही थी, अतः ज्यों ही अमरीकियों ने देश छोड़ा, यह धराशायी हो गई।

जल्दबाजी में किये गये एकीकरण से पैदा समस्याएं
दो भिन्न अंगों का जल्दबाजी में किया गया एकीकरण, जो कि दो भिन्न व विरोधी मॉडलों पर प्रभावित किया। कम्युनिस्टों के अति उत्साह ने उद्यमशीलन सौदागर वर्ग को, खासतौर से जातीय चीनीयों को लगभग उखाड़ कर फेंक दिया, जो कि या तो ग्रामीण इलाकों में पुनर्वास के लिये मजबूर कर दिये गये अथवा नावों में सवार होकर देश से भाग निकले, जिन्हें “बोट-पीपुल्स’’ कहा जाता था। दक्षिण वियतनाम में सबसे बड़ी दुर्घटना सामूहिकीकरण पर केन्द्रित थी।

 आन्तरिक समस्याएं
सत्तर के दशक के मध्य तक अमरीकी हस्तक्षेप खत्म हो गया। किन्तु वियतनाम की समस्याएं समाप्त नहीं हुई। 1977 तक कंबोडियों में शासन कर रहे बदनाम पोल-पोट तथा उसके गिरोह के साथ सीमाओं को लेकर झड़पें शुरू हो गई और उसके परिणामस्वरूप लगभग चार दशकों तक इसके शुरू रहे कम्युनिस्ट चीन के साथ गंभीर मतभेद पैदा हो गये। अनेक कारणों से, वियतनाम को विचारधारात्मक रूप से सोवियत संघ के नजदीक आना पड़ा। मॉस्को तथा पूर्वी यूरोप के कम्युनिस्ट देशों पर यह निर्भरता वियतनाम की अर्थव्यवस्था में खास सहायक सिद्ध नहीं हुई। दरअसल इसका उल्टा असर ही पड़ा।

 वियतनाम में पेरिस्त्रोइका
गोर्बाचोव द्वारा भूतपूर्व सोवियत संघ में पेरिस्त्रोइका शुरू किए जाने के बाद, जिसके फलस्वरूप सहायता में कटौती हुई, तथा आंशिक तौर पर असंतोषजनक आर्थिक निष्पादन की वजह से, वियतनाम को अपनी आर्थिक रणनीति बदलनी पड़ी। सामूहिकीकरण के कारण, कृषि पैदावार में ठहराव आ गया और उद्योगों का निष्पादन निराशाजनक था। अति-केन्द्रीकत तथा आदेशों पर चलने वाली अर्थव्यवस्था, ऊपर से 1978 के आखिर में कम्बोडिया में इसके सैन्य हस्तक्षेप के कारण सहायता पर पश्चिमी प्रतिबंध तथा व्यापार पर रोक, तथा सोवियत संघ के धराशाही हो जाने के फलस्वरूप वियतनाम के पास पेरिस्त्रोइका से स्वयं अपने तरीके पर पूरी ताकत से अमल करने के सिवा कोई विकल्प भी नहीं बचा था। 1987 से सुधारों के शुरू किये जाने से लेकर आज तक, विदेशी निवेश धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं जिससे उद्योगों को गति मिल रही है, जिसकी उन्हें काफी आवश्यकता है। कृषि में किये गये सुधारों के चलते वियतनाम नब्बे के दशक की शुरुआत के समय ही विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यात करने वाला देश बनकर उभरा है। अभी भी पूर्ण बहाली में सबसे बड़ा रोड़ा राहत व व्यापार पर अमरीकी प्रतिबंध ही है। हाल में हुए राजनैतिक घटनाविकास के फलस्वरूप वियतनाम तथा अमरीका के बीच राजनयिक संबंध बहाल होने की संभावनाएं हैं।

अपने पड़ोसी आसियान देशों की तुलना में वियतनाम आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है। किन्तु गरीबी के बावजूद शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में इसकी प्रगति प्रशंसनीय रही है। एक ऐसे राष्ट्रीय संघर्ष को छेड़ने के बाद जिसकी इतिहास में मिसाल नहीं मिल सकती, और अंततः विश्व की स अधिक ताकतवर सत्ता को पराजित करने की पृष्ठभूमि में, युद्ध की तीव्रता और तबाही को नजरअंदाज करते हुए, मात्र वियतनाम को “पिछड़ा’’ कह देना अनुचित है। पुनः अतीत के कारण, किसी भी अन्य विकासशील देशों की तुलना में इसकी बहाली तथा प्रगति की रफ्तार धीमी होना आवश्यक है। हाल में किए गए उपाय शायद शीघ्र ही अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक सकेगें।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणियाँः क) अपने उत्तर के लिये नीचे दिये रिक्त स्थान का प्रयोग कीजिये।
ख) अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिये गये उत्तर के साथ कीजिये।
1) वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा अपनाए गए आर्थिक विकास की प्रमुख विशेषताएं क्या थी?
2) वियतनाम में हाल के वर्षों में आर्थिक विकास के लिये अपनाई गई नई रणनीति क्या है?

संविधान एवं सरकार
अन्य कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं की तरह ही वियतनाम का शासन भी मूलतः वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा किया जाता है, जोकि सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक एजेण्डा निर्धारित करती है और प्रमुख नीतिगत निर्णय लेती है। पोलिटब्यूरो नामक एक छोटा गुट सबसे अधिक शक्तिशाली निकाय है, जोकि पार्टी नेतृत्व के सबसे अधिक प्रभावशाली संस्था से मिलकर बनता है। पोलिटब्यूरो आम दिशा-निर्देश प्रदान करती रहती है। कम्युनिस्ट-पार्टी की कांग्रेस जोकि प्रायः तीन या चार वर्षों में एक बार आयोजित की जाती है, और जिसमें देश भर से पार्टी के प्रतिनिधि भाग लेते हैं, सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। पार्टी कांग्रेस में पोलिटब्युरो और केन्द्रीय कमेटी समेत, पार्टी नेतत्व में कोई भी परिवर्तन किया जा सकता है और साथ ही साथ पार्टी तथा सरकार के कामों की समीक्षा के माध्यम से पार्टी कांग्रेस ही अगली कांग्रेस आयोजित किये जाने तक के समय के लिये दिशा-निर्देश प्रदान करती है।

कांग्रेस केन्द्रीय कमेटी का भी चुनाव करती है और केन्द्रीय कमेटी पोलिटब्यूरो का तथा पोलिटब्यूरो कम्युनिस्ट पार्टी के लिये एक महासचिव का चुनाव करता है। यद्यपि पार्टी की शक्तियाँ तथा प्राधिकार अधिक प्रभुत्वशाली होते हैं फिर भी यह सरकार से भिन्न है।

 नया संविधान
तीसरी बार एक नया संविधान, 1980 में अपनाया गया, जोकि अभी भी प्रयोग में लाया जा रहा है, किन्तु शीघ्र ही इसे जरूरी संशोधनों के साथ परिवर्तित किया जाना है। राष्ट्रीय असेम्बली एक निर्वाचित निकाय है किन्तु इसे विधायी शक्तियां प्राप्त नहीं हैं। राष्ट्रीय समिति की एक शक्तिशाली स्टियरिंग कमेटी मौजूद है, जिसे काउन्सिल ऑफ स्टेट कहा जाता है। कार्यपालिका शक्तियां मंत्रिपरिषद् में निहित है जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करता है। इसके अलावा हां राष्ट्रीय सुरक्षा काउन्सिल, द सुप्रीम-मिलिटरी ऑथरिटी तथा सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट, जिसका मुख्य चीफ जस्टिस है, मौजूद

 विदेश-नीति
चूंकि वियतनाम ने कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में स्वाधीनता प्राप्त की थी, अतः इसने आसियान देशों के साथ संबन्धों के मामले में अपनी विदेश नीति में उग्र तेवर अपनाये, क्योंकि आसियान के देश अमरीका अनुयायी और पूंजीवाद के समर्थक थे। राजनैतिक दिशा तथा आर्थिक सहायता के लिये वियतनाम बुरी तरह से सोवियत संघ और चीन पर निर्भर रहा है। हालांकि वियतनाम ने सोवियत संघ तथा चीन के साथ बराबर की दूरी बनाये रखने की कोशिश की, जोकि विचारधारा के प्रश्न पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे थे, किन्तु इसमें किसी को सफलता नहीं मिल सकी थी। अनेक कारकों के चलते, खासतौर पर कम्बोडिया में पोल-पोट के नरसंहारी निजाम से जुड़े कारकों, जिसने चीन के पक्ष में खड़ा होना पसन्द किया था, वियतनाम सोवियत शिविर के नजदीक आ गया 1978 के आखिर में कंबोडिया में इसके सैन्य-हस्तक्षेप के बाद, कम्युनिस्ट-विरोधी आसियान देशों को वियतनाम को अलग-थलग कर देने का एक अच्छा बहाना मिल गया। सोवियतों के साथ घनिष्ठ मैत्री के फलस्वरूप वियतनाम ने डानाँग तथा कैम रान्ह खाड़ियों में उन्हें सैनिक अड्डे भी उपलब्ध कराये। चूंकि वियतनाम कम्बोडिया में पोल-पोट के शासन का तखा-पलट करने का साधन बना था, अतः 1979 के शुरू में चीन ने इसे सबक सिखाने के लिये वियतनाम पर आक्रमण कर अपनी विदेश नीति में संशोधन करने के लिये विवश कर दिया। वियतनाम ने कम्बोडिया से अपनी सारी सेनाएं वापस बुला ली है और वह अपनी अर्थव्यवस्था को उदार बनाने की प्रक्रिया में है। निकट अतीत में आसियान देशों के साथ संबन्धों में काफी सुधार हुआ है और ऐसा ही चीन के साथ सबन्धों में भी हुआ है। इस बात की संभावना है कि शीघ्र ही अमरीका के साथ भी राजनयिक संबन्ध पुनः स्थापित हो जायेंगे। वियतनाम आज क्रांतिकारी लक्ष्यों को लेकर चलने की बजाय, अपने आर्थिक पिछड़ेपन को समाप्त करने में अधिक रुचि ले रहा है।

बांध प्रश्न 4
टिप्पणियाँः क) अपने उत्तर के लिये नीचे दिये रिक्त स्थान का प्रयोग कीजिये।
ख) अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिये गये उत्तर से कीजिये।
1) सरकार में वियतनामी कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका पर संक्षिप्त व्याख्या प्रस्तुत कीजिये।
2) वियतनाम के विदेश नीति संबन्धी उद्देश्यों का मूल्यांकन कीजिये।

 सारांश
निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि न सिर्फ दक्षिण-पूर्व एशिया बल्कि विश्व के हाल के इतिहास में वियतनाम का एक विशिष्ट स्थान है। इसकी विशिष्टता इसके स्वाधीनता संघर्ष में निहित हैः पहले चीनीयों के खिलाफ जिन्होंने देश पर एक हजार से भी अधिक वर्षों तक कब्जा किये रखाय फिर फ्रांसीसी उपनिवेशवाद के खिलाफय तीसरी बार, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के खिलाफय चैथी बार पुनः फ्रांस के खिलाफ जब उसने देश पर दोबारा से कब्जा करने की कोशिश कीय और अंततः अमरीका के खिलाफ जिसने कम्युनिस्टों के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलन को परास्त करने के लिये जबरदस्त सैन्य-हस्तक्षेप किया था।

वियतनामियों को इस बात का गौरव प्राप्त है कि उन्होंने उन सभी ताकतों को पराजित कर दिखाया जो उन्हें गुलाम बनाने की कोशिश कर रही थी। खासतौर पर उनके लिये गौरवपूर्ण था विश्व की सबसे शक्तिशाली ताकत अमरीका को परास्त करना जिसे वियतनाम ने गुरिल्ला युद्ध के जरिये हासिल किया। निश्चय ही, युद्ध के परिणाम भयावह रहे जिनसे उभर पाना आसान नहीं है। वियतनाम द्वारा कम्बोडिया में किये गये सैन्य-हस्तक्षेप ने इसे राजनयिक तौर पर अलग-थलग डाल दिया और इसका प्रमुख समर्थक, भूतपूर्व सोवियत संघ बिखर गया। वर्तमान में वियतनाम अपने भूतपूर्व दुश्मनों से मैत्रीपूर्ण संबन्ध बनाने की कोशिश कर रहा है और अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी दिशाओं पर चला रहा है, हालांकि कम्युनिस्ट पार्टी की राजनैतिक भूमिका का उसने परित्याग नहीं किया।

 कुछ उपयोगी पुस्तके
चैस्टर ए. बाइन, वियतनाम: द रूटस ऑफ द कान्फ्लिक्ट (न्यू जर्सी रू प्रैन्टिस हॉल, 1966) डी.जी.ई. हॉल, ए हिस्ट्री ऑफ ईस्ट एशिया (लंदन, मैकमिलन, 1981)
जॉर्ज मैक टी. काहिन, गवर्नमैण्ट एण्ड पॉलिटिक्स इन साउथईस्ट एशिया (न्यूयॉर्क: कार्नेल यूनिवर्सिटी प्रेस, 1967)
नोआम चोम्सकी, ऐट वार विद एशिया: ऐसेज ऑन इण्डोचाइना (न्यूयॉर्क: पैन्थौन बुक्स, 1970)
स्टैनली कार्नो, वियतनाम: ए हिस्ट्री (लंदन: सैन्यूरी पब्लिशिंग हाउस, 1983)