गुरूकुल किसे कहते है | गुरुकुल की परिभाषा क्या है विद्यालय कहाँ स्थित है gurukul in hindi meaning

By   February 2, 2021

gurukul in hindi meaning and definition गुरूकुल किसे कहते है | गुरुकुल की परिभाषा क्या है विद्यालय कहाँ स्थित है ?

गुरूकुल (Gurukul) ः आर्य समाज के सिद्धान्तों पर आधारित एक शैक्षिक संस्था।

शब्दावली
आर्य समाज (Arya Samaj) ः मूलार्थक रूप से ‘‘आर्यों का समाज‘‘, स्वामी दयानन्द के संरक्षण में इसका अस्तित्व सन 1875 में हुआ।
प्रक्षेप (Interpolation) ः एक धार्मिक ग्रंथ की व्याख्या एवं विस्तृत रूप से वर्णन
करना। इस संदर्भ में (वेद)।
मंत्र (Mantras) ः धार्मिक शब्दों का उच्चारण एवं उनकी व्याख्या ।
एकेश्वरीय (Monotheistic) ः केवल एक ईश्वर में आस्था रखना।
नियमास (Nyamas) ः नियम एवं विनियम ।
नियोग (Niyoga) ः जिसमें एक विधवा स्त्री को अपने मृत पति के भाई से संतान प्राप्त करने की अनुमति प्रदान की जाती है।
मुक्ति (Mukti) ः आत्मिक रूप से मोक्ष ।
परम्परागत (Orthodox) ः प्रायः बिना किसी ठोस आधार के परम्परागत विचारधारा।
पंचांग (Panchang) ः शुभ एवं अशुभ समयों का तिथि पत्र।
साम्प्रदायिक (Parochial) ः संकीर्ण एवं अंधमत विचारधारा ।
शुद्धि (Suddhi) ः किसी अन्य धर्म में परिणित हुए हिन्दुओं का हिन्दू धर्म में वापसी के समय किये जाने वाला धार्मिक अनुष्ठान ।

उद्देश्य
इस इकाई के अध्ययन के बाद, आपः
ऽ सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्थाओं, जिनमें सुधार की आवश्यकता थी, को जान सकेंगे,
ऽ आर्य समाज की संस्थापना, संगठन एवं उसके नियमों को समझ सकेंगे,
ऽ आर्य समाज की प्रमुख शिक्षाओं को समझ सकेंगे, और
ऽ आर्य समाज का आन्दोलन तथा आधुनिक भारत के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

प्रस्तावना
इस इकाई में हमने भारतीय समाज में सुधार किये जाने की उस जरूरत को रेखांकित किया है जिसे आर्य समाज ने पहचाना था और जिसके लिए उसने काम किया था। हम आर्य समाज की स्थापना के नियम, तथा सबसे पहले आर्य समाज की सदस्यता ग्रहण करने वाले लोगों पर विचार करते हुए शुरुआत करते हैं। उसके बाद हम सुधारों के संदर्भ में आर्य समाज के आन्दोलन पर चर्चा करेंगे। यह हिन्दू धर्म को दी गई चुनौतियों, महिलाओं के उत्थान तथा राजनीति में आर्य समाज की भूमिका के संदर्भ में है। इस इकाई के लिए सामग्री उन पुस्तकों से जुटाई गई है, जिनका विवरण इकाई के अंतिम भाग में कुछ उपयोगी पुस्तकें शीर्षक के तहत दिया गया है।

 राजनीति और आर्य समाज (Politics and the Arya Samaj)
दयानन्द केवल एक सामाजिक तथा धार्मिक सुधारक ही नहीं थे। वे भारत के राष्ट्रीय एवं राजनीतिक जागरण के अग्रदूत भी थे। आर्य समाज की स्थापना 1875 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से एक दशक पहले हुई थी। दयानन्द ने पृष्ठभूमि का निर्माण किया और यह घोषणा की, कि विदेशी सरकार स्व-शासन का स्थान नहीं ले सकती। लाला लाजपत राय ने उल्लेख किया था कि अंग्रेज हमेशा आर्य समाज को शक की नजर से देखते थे। इसके चलते अक्सर इसके सदस्यों पर निर्वासन के मुकदमे आदि चलाए गए। आर्य समाज को राजद्रोही निकाय माना गया। इसके सदस्यों को केवल इस आधार पर नागरिक एवं सैन्य सेवाओं से मुअत्तिल कर दिया गया कि वे आर्य समाज के सदस्य हैं। एक ऐसे समय पर राजनीतिक स्वाधीनता की इच्छा की खुलेआम घोषणा करना, जबकि ऐसा कहने पर जेल में बंद कर दिया जाना आम बात थी। इसके सदस्यों के नैतिक साहस का परिचय दिया है। हालांकि आर्य समाज ने हमेशा यह कहा है, कि वह एक धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन है।

महात्मा गांधी द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वफादारी वाले चरित्र से उसके एक जन राजनीतिक आन्दोलन (उदार से उग्र दृष्टिकोण) में संक्रमण किये जाने में आर्य समाज के आन्दोलन ने एक उल्लेखनीय भूमिका अदा की थी, जैसा कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भी स्वीकार किया था। कांग्रेस द्वारा भी, आर्य समाज के अधिकांश समाज सुधार के मुद्दों को राष्ट्रीय आन्दोलन के हिस्से के तौर पर उठाया गया। आर्य समाज राजनीतिक स्वतंत्रता का पक्षधर था तथा उस समय सामाजिक, सांस्कृतिक परिवर्तन दिखाई दिया, जबकि कांग्रेस ने छुआछूत मिटाने, महिलाओं के उत्थान तथा अन्य सुधारों को अपनाया था। आर्य समाज के सदस्यों की एक विशाल संख्या, महात्मा गांधी के सक्रिय समर्थक बन गई थी। किन्तु आर्य समाज सत्ता की राजनीति से परे समाज सुधार आन्दोलन ही बना रहा। यह गैर राजनीतिक संगठन है।

डी. वेबेल के अनुसार: स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद के परिदृश्य में सत्ता की राजनीति आर्य समाज में भी प्रवेश करती दिखाई दी। यद्यपि 1915 में इसे उभरते हुए देखा गया, किन्तु 1920 के बाद से ज्यों ही गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लोकप्रिय होने लगी इसका प्रभाव घटने लगा। स्वतंत्रता से पूर्व के दिनों में राजनीतिक पुररूत्थान का प्रभाव बहुत कम हो गया। इसके अलावा हिन्दू धर्म के प्रभाव ने भी इसके अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर दिया। मौजूदा समय में लाला लाजपत राय की चेतावनी के लगभग 65 वर्ष बाद भी आर्य समाज के सामने हिन्दुत्व द्वारा मिटा डालने की चुनौती मौजूद है जिसे एक समय पर इसने बचाने की कोशिश की थी। दरअसल आर्य समाज हिन्दुत्व को बचाने की बजाय, यदि स्वयं अपने अस्तित्व के बारे में विचार करे, तो यह बेहतर ढंग से काम कर सकता है।

स्वामी दयानन्द एवं आर्य समाज ने राष्ट्रीय आन्दोलन में निम्नलिखित रूप में योगदान किया थाः
1) हिन्दी भाषा को बढ़ावा
2) स्वदेशी एवं खादी का समर्थनय और
3) नमक-कर के विरोध को सहमति प्रदान करके नमक आन्दोलन को समर्थन ।
स्वामी दयानन्द के. ‘‘वेदों में पुनः आस्था‘‘ के नारे के कारण कुछ आलोचकों ने दयानन्द को प्रतिक्रियावादी की संज्ञा प्रदान की है, जबकि स्वामी दयानन्द ने भारत के आधुनिकरण का संचालन उसी रूप में किया था, जैसा आधी सदी के बाद गांधी जी ने किया था।

सारांश
इस इकाई में, हमने आर्य समाज की व्याख्या एक सामाजिक आन्दोलन के रूप में की है। हमने 19वीं शताब्दी में सुधार की आवश्यकता से शुरुआत की तथा फिर आर्य समाज की स्थापना, इसके संगठन, सिद्धान्तों, नियमों, प्रारंभिक सदस्यों तथा वेदभाष्य के प्रकाशन आदि पर विचार किया। अगले भाग में हमने आर्य समाज के आन्दोलन व सुधारों पर चर्चा की। इसके अंतर्गत हिन्दू धर्म को चुनौती के प्रति समाज की प्रतिक्रिया, महिलाओं का उत्थान तथा राजनीति में इसकी भूमिका शामिल हैं। इस तरह हमने एक आधुनिक धार्मिक आन्दोलन के रूप में आर्य समाज की एक स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत की है।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
आर्य, के.एम.आर., 1987, स्वामी दयानन्द सरस्वती: ए स्टडी ऑफ हिज लाइफ एंड वर्क, मनोहर, दिल्ली।
बहादुरमल, 1962, दयानन्द: ए स्टडी ऑफ हिन्दुइज्म, वी.वी.के. इंस्टीट्यूट, होशियारपुर ।
दयानन्द स्वामी, 1972, सत्यार्थ प्रकाश, कपूर ट्रस्टय बहालगढ़, हरियाणा।
डी. वेबल, 1983, द आर्य समाज: हिन्दू विदाउट हिन्दुइज्म, विकास, दिल्ली।
जॉर्डनस, जे.टी.एफ., 1978, दयानन्द सरस्वती हिज लाइफ एंड आइडियाज, ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस, बम्बई।
राय, लाला लाजपत, 1915, द आर्य समाज, लॉगमैन ग्रीन एंड कम्पनी, लंदन ।
शिव दयाल, 1966, दयानन्द वर्सिस आर्थोडोक्सी, आर्य प्रतिनिधि सभा, लखनऊ, उत्तर प्रदेश।