आदिम समाज या प्राचीन समाज की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब किसे कहते है विशेषताएं archaic societies in hindi

By   November 27, 2020

archaic societies in hindi meaning and definition आदिम समाज या प्राचीन समाज की परिभाषा क्या है अर्थ मतलब किसे कहते है विशेषताएं बताइए ?

आदिम अथवा प्राचीन समाज
सामाजिक संगठन की दृष्टि से ये समाज सर्वाधिक प्राथमिक है। सामाजिक विकास (social evolution) की प्रक्रिया ऊपर बताए गए पांच अभिलक्षणों के विकास की तरफ सामूहिक गतिशीलता द्वारा आगे बढ़ सकती है या इन प्राथमिक सामाजिक संस्थाओं में से किसी एक से प्रारंभ हो सकती है। उदाहरण के लिए, यह संभव है कि किसी एक आदिम समाज में तकनीकी में नवीनता के कारण समाज की अर्थव्यवस्था अथवा खाद्य उत्पादन की क्षमता में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाए। इस प्रकार, वह समाज अधिक लोगों का भरण-पोषण करने में सक्षम हो जाएगा। जनसंख्या वृद्धि से सामाजिक विभेदीकरण की प्रक्रिया का प्रारंभ होने लगता है, जो अनुकूलन और एकता के लिए नए दबावों तथा तनावों को जन्म देती है। एक अन्य समाज में परिवर्तन की मूल इच्छा किसी विश्वास प्रणाली से पैदा हो सकती है। जैसे कि, मायावी अथवा धार्मिक दृष्टिकोण लोगों को आर्थिक और तकनीकी प्रगति के नए अवसरों की खोज करने को प्रेरित कर सकते हैं। पार्सन्स ने सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को मानव समाजों में मौजूद अनुकूलन तनावों के दो मुख्य स्रोतों के साथ संबद्ध बताया है। इनमें से पहला है अस्तित्वपरक अथवा भौतिक तथा दूसरा है प्रतीकात्मक अथवा सांस्कृतिक । समाज में प्रतीकात्मक (symbolic) या सांस्कृतिक संस्थानों की मूल कार्य-कारण संबंधी प्रवृत्ति को पार्सन्स ने महत्व दिया। पार्सन्स का यह मत वेबर के उन विचारों से मेल खाता है जिनमें उसने पूंजीवाद के उदय में प्रोटेस्टेंट नैतिकता के योगदान की व्याख्या की है। परंतु साधारणतया अस्तित्वपरक (existential) और प्रतीकात्मक ये दोनों तत्व सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहे अधिकतर समाजों में एक-दूसरे को मजबूत करते है।

आदिम अथवा प्राचीन समाज सामान्यतया वह समाज होता है जिसमें वर्गों तथा जातियों के बीच कोई विभाजन नहीं होता। इन समाजों में मुखियाओं को कुछ विशेषाधिकार अवश्य प्राप्त होते हैं, किंतु वे मुख्यतया सम्मानपरक ही होते हैं अर्थात् नेता को सम्मान प्राप्त होता है। उनकी – ‘जीवन-शैली में अन्य लोगों से कोई विशेष भिन्नता नहीं होती है।

आदिमकालीन समाजों में इस अनुकूलन परिवर्तन के उदाहरण कई विशिष्ट स्थितियों में देखे जा सकते हैं। परिवर्तन की प्रक्रिया के प्रतीकात्मक अथवा सांस्कृतिक माध्यमों को बिहार की मुंडा और बिरहोर जैसे जनजातीय समाजों में देखा जा सकता है, जहां ईसाई आंदोलन या देवी आंदोलन के माध्यम से यह प्रक्रिया प्रारंभ हुई है। जनजाति के किसी नेता या नेताओं के स्वरूप में देवी प्रकट होती है, जो लोगों के आचरण में अनेक सामाजिक सुधार लाने का आदेश देती हैं। जनजातीय समुदाय के हितों के लिए खतरा पैदा करने वाली ताकतों का मुकाबला करने के लिए प्रायः इस प्रकार के सुधार पहले से ही आवश्यक होते हैं। हो सकता है कि इन सुधारों का उदय विरोधी स्वभाव अथवा विरोधी बाहरी समुदायों अथवा वर्गों से हुआ हो। अनेक सरल समाजों में समाज की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए नई तकनीक लागू करने के बहुत से उदाहरण मौजूद हैं। हजारों साल पहले, प्रारंभ में बीज बोने और हल चलाने की तकनीक भी इसी तरह प्रयोग में लाई गई थी।

सारांश
इस इकाई में आपने टालकट पार्सन्स की प्रकार्यवाद की अवधारणा के बारे में पढ़ा। प्रकार्यवाद तथा सामाजिक परिवर्तन के बीच संबंध का भी कुछ विस्तार से विवेचन किया गया है। इसके पश्चात् आपने पार्सन्स द्वारा बताए गए सामाजिक परिवर्तनों के दो प्रकारों की जानकारी प्राप्त की। पहला प्रकार है सामाजिक प्रणालियों के भीतर परिवर्तन और दूसरा है सामाजिक प्रणालियों में आमूल परिवर्तन । दूसरी तरह के परिवर्तन को पार्सन्स ने विकासात्मक सार्विकीय तत्वों की अपनी अवधारणा के माध्यम से स्पष्ट किया है। उसने समाज के विकास को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। पहली श्रेणी है आदिम अथवा प्राचीन समाज, दूसरी है मध्यर्ती समाज और तीसरी श्रेणी है आधुनिक समाज।

. शब्दावली
प्राचीन (archaic) वह समाज, जो प्राचीन है या पुराने ढंग का है। .
प्रसार (dffiusion) सांस्कृतिक बातों, विचारों तथा वस्तुओं का विभिन्न संस्कृतियों के बीच संपर्क के माध्यम से प्रसार।
विकासात्मक सार्विकीय तत्व जब सामाजिक प्रणालियों पर लंबे समय के संदर्भ में विचार किया जाता है तो विकास के कुछ
(evolutionary universals) सामान्य निर्देश दिखाई देते हैं। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया के स्वरूप को विकासात्मक सार्विकीय तत्व कहा जाता है।
होमोस्टेसिस मानव शरीर को जीवित रखने और उसके अनुरक्षण के लिए श्वास-तंत्र, जैसे विभिन्न अंगों द्वारा महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं। शरीर की इस आत्म-नियामक प्रक्रिया को होमियोस्टेसिस कहते हैं।
तर्कसंगतिकरण (rationalisation) यह वो प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कार्य, व्यक्तिगत कर्त्तव्यों तथा सामाजिक संस्थाओं के प्रति तर्कसंगत, व्यक्तिवादी और अभिनव दृष्टिकोण पनपता है।
टीलियोलॉजी इसका अभिप्राय उस दृष्किोण से है कि विकास उन्हीं उद्देश्यों के कारण होते हैं जिनकी वे सिद्धि करते हैं।
परम्परागत होने की प्रक्रिया यह वो प्रक्रिया है, जिससे मूल्यों, विश्वासों, विचारों, दृष्टिकोणों आदि को समाजों में संस्थागत
(traditionalsiation) बनाया जाता है और उन मूल्यों को बनाए रखने के लिए निहित स्वार्थों का उदय होता है।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
हैम्लिटन, पीटर 1983. टालकट पार्सन्स रूटलेजः लंदन और न्यूयॉर्क
पार्सन्स, टालकट 1966 सोसायटीजः एवल्यूशनरी एंड कम्पेरेटिव पपिक्टिव पेंटिस हालः इंगलवुड क्लिफ एन. जे.
पार्सन्स, टालकट 1977 द एवोल्यूशन ऑफ सोसायटीजः (प्रस्तावना संपा. द्वारा जैक्सन टॉबी) पेंटिस हालः इंगलवुड क्लिफ

प्रकार्यवाद और सामाजिक परिवर्तन – पार्सन्स
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
पार्सन्स की प्रकार्यवाद की अवधारणा
प्रकार्यवाद और सामाजिक परिवर्तन
सामाजिक प्रणालियों के भीतर परिवर्तन
परिवर्तन के लिए दबाव पैदा करने वाले कारक
सामाजिक आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन
सामाजिक प्रणालियों में आमूल परिवर्तनः विकासात्मक सार्विकीय तत्व
आदिम अथवा प्राचीन समाज
मध्यवर्ती समाज
आधुनिक समाज
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई का अध्ययन करने के बाद आपके लिए संभव होगा
ऽ पार्सन्स की प्रकार्यवाद की अवधारणा की व्याख्या करना
ऽ प्रकार्यवाद एवं सामाजिक परिवर्तन के संबंधों का विवेचन करना
ऽ सामाजिक प्रणालियों के भीतर होने वाले परिवर्तनों पर प्रकाश डालना
ऽ पार्सन्स द्वारा दिए गए विकासात्मक सार्विकीय तत्वों अथवा सामाजिक प्रणालियों में, आमूल परिवर्तनों का विवरण देना।

प्रस्तावना
पिछली इकाई (इकाई 27) में आपको टालकट पार्सन्स द्वारा प्रतिपादित सामाजिक प्रणाली की अवधारणा की जानकारी दी गई थी। इस इकाई में प्रकार्यवाद एवं सामाजिक परिवर्तन की उसकी अवधारणा की व्याख्या की जा रही है। पार्सन्स ने सामाजिक परिवर्तन के दो प्रकारों को उल्लेख किया है। एक है सामाजिक प्रणाली के भीतर होने वाला परिवर्तन और दूसरा है सामाजिक प्रणालियों का परिवर्तन । हमने दन दोनों प्रकार के सामाजिक परिवर्तनों की व्याख्या की है। भाग 28.2 में पार्सन्स की प्रकार्यवाद की अवधारणा तथा भाग 28.3 में प्रकार्यवाद और सामाजिक परिवर्तन के संबंधों का विवेचन किया गया है। भाग 28.4 में सामाजिक प्रणालियों के भीतर होने वाले परिवर्तन के बारे में तथा भाग 28.5 में पार्सन्स द्वारा प्रतिपादित विकासात्मक सार्विकीय तत्वों के माध्यम से सामाजिक प्रणालियों में आमूल परिवर्तनों के बारे में बताया गया है।

बोध प्रश्न 2
प) जनसंख्या सामाजिक प्रणाली के भीतर परिवर्तन लाने का प्रमुख पहलू है।। लगभग दस पंक्तियों में विवेचन कीजिए।
पप) उन कारकों का विवेचन कीजिए, जो सामाजिक प्रणालियों पर उस दबाव का सृजन करते है, जिससे नया संतुलन उभरता है। अपना उत्तर बारह पंक्तियों में दीजिए।
पपप) निम्नलिखित कथनों में सही कथन पर () का चिन्ह लगाइए।
क) तर्कसंगतिकरण वह प्रक्रिया है, जिसमें नए मूल्य, विश्वास, दृष्टिकोण आदि संस्थागत होते हैं ( )
ख) तर्कसंगतिकरण कार्य, व्यक्तिगत कर्तव्यों तथा सामाजिक संस्थाओं के प्रति तर्कपूर्ण, व्यक्तिवादी और नवीन दृष्टिकोण के क्रमिक विकास की प्रक्रिया है ( )
ग) तर्कसंगतिकरण वह प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने समाज के मूल्यों, विश्वासों और रीतियों को आत्मसात् करते हैं। ( )

बोध प्रश्न 2 उत्तर
प) सामाजिक प्रणाली के भीतर परिवर्तन लाने में जनसंख्या का प्रमुख कारक है क्योंकि जनसंख्या में वृद्धि से सामाजिक विभेदीकरण अर्थात् श्रम विभाजन होता है। अधिक उत्पादन प्रौद्योगिकी पर दबाव बढ़ने से सामाजिक प्रणालियों की जटिलता बढ़ती है। यह तथ्य भारत में जाति व्यवस्था तथा यूरोप में गिल्ड प्रणाली के विकास के रूप में ऐतिहासिक तौर पर सिद्ध हो चुका है।
पप) सामाजिक प्रणाली में तनाव बढ़ाने वाले कारक इस प्रकार हैः
क) जब लोगों के एक स्थान से दूसरे स्थान पर सामूहिक रूप से चले जाने, सामाजिक अंतर्मिश्रण आदि के माध्यम से जनसंख्या के जनसांख्यिकीय गठन में परिवर्तन होता है।
ख) जब प्राकृतिक पर्यावरण जैसे कि मृदा, जल, मौसम आदि के स्तर में गिरावट या बदलाव आता है। ग) जब किसी सामाजिक प्रणाली में खाद्य उत्पादन की वृद्धि होती है और लोगों को अधिक संसाधन उपलब्ध होते हैं।
घ) जब किसी समाज में इस्तेमाल हो रही प्रौद्योगिकी में बदलाव आता है और समाज की प्रगति के लिए वैज्ञानिक जानकारी काम में लाई जाती है।
ड) जब “सांस्कृतिक सविन्यास‘‘ में परिवर्तन होता है, जिसमें नए धार्मिक मूल्य, विचारधाराएं, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदि शामिल होते हैं।
पप) ख)