सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक (universal gravitational constant in hindi)

(universal gravitational constant in hindi) सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक : यह एक समानुपाती नियतांक होता है जो न्यूटन के नियम में प्रयोग होता है।  हमने न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम हमने पढ़ा वह हमने देखा की  समानुपाती का चिन्ह हटाने के लिए न्यूटन ने एक नियतांक का प्रयोग किया था उस नियतांक को ही सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहते है।  इसे सामान्यतया G द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम के अनुसार दो पिंडो के मध्य लगने वाला आकर्षण बल का मान निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है –

यहाँ F = दोनों पिण्डो के मध्य कार्यरत आकर्षण बल का मान
m1 तथा m2 दोनों पिंडो का द्रव्यमान का परिमाण
r = दोनों पिंडो के मध्य की दूरी का मान
तथा
G = यह एक समानुपाती नियतांक है जिसे सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहा जाता है। इसका मान G = 6.673×10-11 N m2 kg-2 होता है।
माना m1 = m2 = 1kg
तथा r = 1 मीटर
अर्थात माना दोनों पिंडो का भार एक किलोग्राम है तथा दोनों पिंड एक दुसरे से एक मीटर की दूरी पर स्थित है तो इस स्थिति में
F = G
अत: सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –
परिभाषा : एकांक दूरी पर रखे दो एकांक द्रव्यमान वाले पिण्डो के मध्य लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक के बराबर होता है।
G के मान की गणना प्रयोगों द्वारा सबसे पहले केवेन्डिश (cavendish) ने की थी और इसका मान बताया था।
इसे सार्वत्रिक क्यों कहा जाता है ? 
चूँकि G का मान पिण्डो के आकार , उनकी प्रकृति तथा दोनों पिण्डो के मध्य उपस्थित माध्यम पर निर्भर नहीं करता है इसलिए इस नियतांक को सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहते है।

न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम (newton’s law of gravitation in hindi) , गुरुत्वाकर्षण बल का सदिश निरूपण 

(newton’s law of gravitation in hindi) न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम : इसे न्यूटन का सार्वत्रिक (सार्वभौमिक) गुरुत्व आकर्षण बल भी कहा जाता है।

इस नियम के अनुसार “ब्रम्हांड में उपस्थित सभी दो वस्तुएँ आपस में एक दुसरे को आकर्षित करती है , दो पिण्डो के मध्य लगने वाले इस आकर्षण बल को गुरुत्वाकर्षण कहते है। ” और चूँकि इस आकर्षण बल के बारे में सबसे पहले न्यूटन ने बताया था और इसका मान ज्ञात करने के लिए एक नियम या सूत्र दिया जिसे न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम कहते है , आइये इस नियम अथवा इस सूत्र की स्थापना करते है और इसे विस्तार से पढ़ते है।

न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम (newton’s law of gravitation)

न्यूटन के बताया की दो पिण्डो के मध्य लगने वाला आकर्षण बल का मान दोनों पिंडो के द्रव्यमान और इनके मध्य की दूरी पर भी निर्भर करता है , अब प्रश्न आता कि किस प्रकार निर्भर करता है और इसके लिए सूत्र क्या होता है जिससे इस आकर्षण बल की गणना की जा सके।
दो पिण्डों के मध्य लगने वाला आकर्षण बल का मान दोनों पिंडो के द्रव्यमान के गुणनफल के समानुपाती होता है तथा दोनों पिण्डो के मध्य की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
माना दो पिण्ड है जिनका द्रव्यमान क्रमशः m1 तथा m2 है। दोनों पिण्ड बीच की दूरी r है। ये दोनों पिण्ड एक दुसरे को F बल द्वारा अपनी ओर आकर्षित करेंगे जैसा चित्र में दिखाया गया है।
न्यूटन के नियम के अनुसार यह आकर्षण बल F का मान दोनों पिंडो के द्रव्यमान के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती होता है।
अर्थात
यह गुरुत्वाकर्षण बल का मान इन दोनों पिंडों के मध्य की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
अर्थात
दोनों समीकरणों को साथ में रखने पर
समानुपाती का चिन्ह हटाने पर , यहाँ एक G नियतांक आ जायेगा –
यहाँ G समानुपाती नियतांक है , G को न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहते है और गुरुत्वाकर्षण नियतांक का मान निम्न होता है।
G = 6.67 x 10– 11 N m 2 /kg 2
यहाँ ध्यान रखे की दोनों पिण्ड m1 तथा m2 बिन्दु द्रव्यमान होने चाहिए।

गुरुत्वाकर्षण बल का सदिश निरूपण

चित्रानुसार दो पिंड आपस में एक दुसरे पर आकर्षण बल आरोपित कर रहे है इसका सदिश रूप चित्र में दिखाया गया है।
 mद्रव्यमान का पिंड m2 पर एक आकर्षण बल लगा रहा है जिसे F12 सदिश द्वारा प्रदर्शित किया गया है।
 mद्रव्यमान का पिण्ड mपर एक आकर्षण बल लगा रहा है जिसे F21 सदिश द्वारा दर्शाया गया है।
न्यूटन के नियम के अनुसार ये दोनों आकर्षण बल परिमाण में समान होते है लेकिन इनकी दिशा एक दुसरे से विपरीत होती है अत: इसे निम्न प्रकार लिखा जा सकता है –
इस आकर्षण बल अर्थात गुरुत्वाकर्षण बल का परिमाण निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है –

केन्टीलीवर (cantilever beam in hindi) , नमन दृढ़ता (FLEXURAL RIGIDITY IN HINDI)

(cantilever beam in hindi) केन्टीलीवर : ऐसा बीम या दण्ड जिसका एक सिरा स्थिर रहता है तथा इसका दूसरा सिरा भारित रहता है ऐसे दण्ड को केन्टीलीवर कहते है।

केन्टीलीवर की सहायता से ही हम बिना किसी बाह्य ब्रेसिंग के ओवर हैंगिंग संचरना बना सकते है।
जब इस पर वजन रखा जाता है तो केन्टीलीवर को भेज देता है ताकि इस पर कोई लोड न पड़े और यह सुरक्षित रहे जिससे केन्टीलीवर अपरूपण तनाव तथा मूमेंट ऑफ़ फाॅर्स से बचा रहता है अर्थात सुरक्षित रहता है।
यहाँ moment of force किसी भी वस्तु को मोड़ने के लिए कार्य करता है लेकिन केन्टीलीवर में यह बल भी इसके स्थिर सिरे द्वारा प्रबंधित हो जाता है जिससे केन्टीलीवर को एक स्थिर सिरे के अलावा अन्य किसी पिलर की आवश्यकता नही होती है।

नमन दृढ़ता (flexural rigidity in hindi)

यदि किसी छड का अनुप्रस्थ काट के ज्यामितीय जडत्व आघूर्ण का मान I और उस छड के पदार्थ के यंग प्रत्यास्थता गुणांक Y के गुणनफल के मान को नमन दृढता कहते है अर्थात YI के मान को नमन दृढ़ता कहा जाता है।

दण्ड का बंकन या मोड़ या झुकाव मोड़न (bending of beam in hindi) , उदासीन परत , बंकन तल , आघूर्ण

(bending of beam in hindi) दण्ड का बंकन या मोड़ या झुकाव मोड़न : जब किसी दंड (बीम) को मोड़ा जाता है तो इसका आकार बदल जाता है और साथ ही इसके अन्दर आंतरिक बल उत्पन्न हो जाते है। यहाँ हम एक दंड लेते है और फिर इसके द्वारा इससे सम्बंधित विभिन्न प्रकार की परिभाषाओं तथा सूत्रों का अध्ययन करते है। सिविल वैज्ञानिको तथा इंजिनियर को इसका पूर्ण ज्ञात होना आवश्यक है की कोई भी दंड कितना झुक सकता है और कितने झुकाव पर कितना बल लगेगा या झुकाव से सम्बन्धित किस चीज को क्या बोला जाता है और इसे किस प्रकार से परिभाषित किया जाता है , आइये हम कुछ परिभाषाओं का अध्ययन करते है।

उदासीन परत (neutral surface) : जब किसी दण्ड अथवा छड को मोड़ा जाता है तो मोड़ने से उस दंड की बाहरी सतहों में वृद्धि होती है तथा दंड की अन्दर की सतह संकुचित हो जाती है लेकिन दण्ड के भीतर एक परत ऐसी होती है जिसमे न तो वृद्धि होती है और न ही संकुचित होती है अर्थात इस परत की लम्बाई अपरिवर्तित रहती है , दण्ड की इस परत को जो बंकन से अपरिवर्तित रहती है उस सतह को उदासीन परत कहते है।
बंकन तल (plane of bending) : दण्ड का वह तल जो उदासीन पृष्ठ या परत के लम्बवत होता है और जिसमे दंड में बंकन उत्पन्न होता है अर्थात दण्ड मुड़ता है उस तल को बंकन तल कहते है।
उदासीन कक्ष (neutral axis) : उदासीन परत व बंकन तल को काटने वाली रेखा अर्थात परिच्छेद रेखा को उस दण्ड का उदासीन कक्ष कहा जाता है।
बंकन आघूर्ण (bending moment) : किसी दण्ड को मोड़ने के लिए आवश्यक बल आघूर्ण के मान को उस दंड का बंकन आघूर्ण कहते है , इसे G से प्रदर्शित किया जाता है।
बंकन आघूर्ण का सूत्र –
G = Y.I/R
यहाँ Y = दण्ड जिस पदार्थ की बनी है उस पदार्थ का यंग गुणांक
I = दंड के अनुप्रस्थ काट का ज्यामितीय जडत्व आघूर्ण
R = बंकित दण्ड की वक्रता त्रिज्या का मान

प्रत्यास्थता शैथिल्य (elastic hysteresis in hindi) , शैथिल्य लूप (HYSTERESIS LOOP in hindi)

(elastic hysteresis in hindi) प्रत्यास्थता शैथिल्य : जब किसी वस्तु पर विरुपक बल आरोपित किया जाता है तो इस बल के कारण उत्पन्न विकृति व प्रतिबल में परिवर्तन एक साथ नहीं होता है बल्कि उत्पन्न विकृति प्रतिबल के पश्चगामी होती है। विकृति का प्रतिबल से पश्चगमन को ही प्रत्यास्थता शैथिल्य कहते है।
कुछ प्रत्यास्थ वस्तुओं को जब खिंचा जाता है तो वे एक पथ का अनुसरण करती है तथा जब इन्हें छोड़ा जाता है तो ये अपनी मूल अवस्था में आने के लिए अलग पथ का अनुसरण करते है , प्रत्यास्थ वस्तु के इस व्यवहार को प्रत्यास्थता शैथिल्य कहते है।
वस्तु को अपनी मूल अवस्था में आने के लिए किया गया कार्य , उसको विकृत करने के लिए किये गए कार्य से कम होता है।
चूँकि वस्तु में उत्पन्न विकृति , उस पर आरोपित प्रतिबल के पश्चगामी होती है इसलिए समान प्रतिबल से किसी तार को जब भारित किया जाता है और उसके बाद अभारित (भार हटाना) किया जाता है तो दोनों स्थितियों में उत्पन्न विकृति का मान अलग अलग होता है।

शैथिल्य लूप (hysteresis loop)

जब किसी वस्तु या तार को भारित करके तथा बाद में अभारित करके , प्रतिबल व उत्पन्न विकृति के मध्य ग्राफ खिंचा जाए तो यह एक बंद लूप के रूप में प्राप्त होता है , इस बन्द लूप को ही शैथिल्य लूप कहा जाता है।
जब किसी तार को भारित या अभारित किया जाता तो इसका तात्पर्य है की तार पर कार्य किया जा रहा है , यह ग्राफ या वक्र (लूप) भी भारित या अभारित अवस्था में तार पर किये गए तार को व्यक्त करता है।
माना हमारे पास दो रबर है और इनका पदार्थ भिन्न भिन्न है , जब इन दोनों रबर को समान भार से भारित व अभारित किया जाता है तो दोनों रबरों के लिए शैथिल्य लूप निम्न प्रकार प्राप्त होता है , हमने एक रबर को A नाम दिया है तथा दुसरे रबर को B नाम दिया है।  दोनों के लिए भारित व अभारित अवस्था में प्रतिबल व विकृति के मध्य शैथिल्य लूप निम्न प्रकार प्राप्त होता है।
जब शैथिल्य लूप का क्षेत्रफल का मान कम हो तो इसका तात्पर्य है कि किया गया कार्य का मान भी कम है , चूँकि दुसरे लूप का क्षेत्रफल का मान कम है इसका मतलब यह है कि इस रबर द्वारा किया गया कार्य कम है जिसके कारण इस रबर का प्रयोग गाडी के टायर बनाने के लिए किया जायेगा ताकि यह जल्दी से गर्म न हो।
पहले लूप का क्षेत्रफल अधिक है अत: किये गए कार्य का मान भी अधिक होगा चूँकि यह ज्यादा कार्य करता है इसलिए इसकी ऊर्जा अधिक खर्च होगी , यदि इसको मशीन में कम्पन्न सोखने के लिए लगा दिया जाए तो यह अधिक ऊर्जा को सोख लेगा क्यूंकि यह खर्च बहुत अधिक ऊर्जा करता है तो स्वभाविक है कि यह ऊर्जा का सोखन भी अधिक करेगा।

अपने ही भार के कारण टूटने के लिए आवश्यक तार की न्यूनतम लम्बाई (minimum length of wire for breaking)

(minimum length of wire for breaking due to its own weight) अपने ही भार के कारण टूटने के लिए आवश्यक तार की न्यूनतम लम्बाई : इस प्रकार के प्रश्न अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं में पूंछे जाते है जैसे IIT-JEE या NEET इत्यादि।

एक वैज्ञानिक एक बहुत बड़ा तार लेता है और इस तार को खड़ा लटका देता है और इसकी लम्बाई को बढाता जाता है , तार की एक लम्बाई ऐसी आती है जब यह तार खुद ही टूट जाता है।  यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यहाँ कोई बाह्य कोई बल आरोपित नही किया जा रहा है फिर भी तार कैसे टूट गया ?

उत्तर है कि तार अपने खुद के भार के कारण टूट गया।

हम यहाँ तार की उस न्यूनतम लम्बाई का मान ज्ञात करते है तो टूटने के लिए आवश्यक है और इसके लिए सूत्र की स्थापना करते है –

माना तार का भंजक प्रतिबल का मान P है।

तार की L लम्बाई होने पर यह टूट जाता है और इस तार का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A है।

तार का घनत्व का मान d है।

तब तार टूटने की स्थिति में तार का भार = ALdg होगा , यहाँ g = गुरुत्वीय त्वरण है।

तार के भंजक बल का मान = P X A होगा।

जब तार अपने खुद के भार के कारण टूटता है तो इसका अभिप्राय यह है कि उस स्थिति में तार का भार , तार के भंजक बल के बराबर होगा।

P x A = ALdg

अत: तार की न्यूनतम लम्बाई जिस पर वह स्वयं के भार के कारण टूट जायेगा

L = P/dg

अपने ही भार के कारण तार की लम्बाई में वृद्धि (increase in length of a wire due to its own weight)

अब बात करते है जब किसी तार को खड़ा लटकाया जाता है तो इसके खुद के वजन या भार के कारण उसकी लम्बाई में कुछ वृद्धि हो जाती है , लम्बाई में उस वृद्धि के मान को हम यहाँ ज्ञात करने वाले है।
जब एक तार को खड़ा लटकाया जाता है तो स्वयं के भार के कारण इस तार की लम्बाई बढ़ जाती है , हम यहाँ इसकी लम्बाई में वृद्धि का मान ज्ञात करने के लिए सूत्र की स्थापना करेंगे।
माना तार का द्रव्यमान M है तथा लम्बाई L है।
तार का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A तथा तार के पदार्थ का यंग प्रत्यास्थता गुणांक का मान Y है।
तार को लटकाने पर इसके भार का मान F = Mg होगा जहाँ g = गुरुत्वीय त्वरण है। तार का भार उसके केंद्र पर क्रियाशील होगा अत: तार की वह लम्बाई का मान जिसमे वृद्धि होगी L/2 है।
तार की लम्बाई में स्वयं के कारण वृद्धि l = Mg(L/2)/2AY

भंगुर पदार्थ , तन्य पदार्थ व प्रत्यास्थ बहुलक पदार्थ (brittle , ductile and elastomers material in hindi)

(brittle , ductile and elastomers material in hindi) भंगुर पदार्थ , तन्य पदार्थ व प्रत्यास्थ बहुलक पदार्थ : यहाँ हम इन तीनों प्रकार के पदार्थो के बारे में अध्ययन करते है की इनकी परिभाषा क्या है , इनके उदाहरण , ग्राफ वक्र इत्यादि कैसे बनते है आदि।

भंगुर पदार्थ (Brittle material) : इस प्रकार के पदार्थों को थोडा सा मोड़ने पर भी वे टूट जाते है क्यूंकि इनको खीचने से ये किसी प्रकार की कोई ऊर्जा ग्रहण नहीं करते है या बहुत कम उर्जा ग्रहण करते है।
इन पदार्थो के लिए प्लास्टिक क्षेत्र बहुत कम होता है , इस प्रकार के पदार्थ प्रत्यास्थता सीमा को पार करते ही टूट जाते है।
ये पदार्थ हल्के से मोड़ का भी विरोध करते है यदि पदार्थ को मोड़ा जाता है तो ये आसानी से टूट जाते है जब इन पदार्थो पर बल आरोपित किया जाता है तो ये कम बल होने पर पदार्थ परिवर्तित होकर , बल हटाने पर पुनः अपनी मूल अवस्था में लौट आता है लेकिन यदि वस्तु पर बल अधिक लगाया जाता है तो वस्तु अपनी मूल अवस्था में लौट नही पाती है टूट भी सकती है क्यूंकि अधिक बल लगाने से वस्तु प्रत्यास्थता क्षेत्र को छोड़कर प्लास्टिक क्षेत्र में प्रवेश कर जाती है जिससे टूट जाती है।
प्रत्येक पदार्थ के लिए इस बल का मान निश्चित होता है जिस पर वस्तु टूट जाती है।
उदाहरण : कांच और आयनिक क्रिस्टल , ढलवा लोहा आदि।
तन्य पदार्थ (Ductile material) : ये वे पदार्थ होते है जिनमे प्लास्टिक क्षेत्र अधिक होता है और इन पदार्थो को मोड़ने पर भी ये नहीं टूटते है। ये पदार्थ बल के कारण उत्पन्न विकृति को सहन करने की क्षमता रखते है।  जब इन पदार्थो को पकड़कर खीचा जाता है तो ये तार की आकृति में परिवर्तित हो जाती है और जब दबाया जाता है तो शीट के रूप भी सिकुड़ जाती है।
ये पदार्थ आसानी से एक रूप से दूसरा रूप ग्रहण कर लेते है और जब इनको अधिक खिंचा जाता है तो ये पतले तार में परिवर्तित हो जाते है।
उदाहरण : तांबे, एल्यूमीनियम, और स्टील
प्रत्यास्थ बहुलक पदार्थ (elastomers material) : वे पदार्थ जो पॉलिमर से मिलकर बने होते है तथा जिनमे रासायनिक बन्ध पाए जाते है।  इनमे आरोपित प्रतिबल की तुलना में उत्पन्न विकृति बहुत अधिक होती है अर्थात कम प्रतिबल लगाने पर भी अधिक विकृति उत्पन्न हो जाती है।  इन पदार्थो में प्लास्टिक क्षेत्र शून्य होता है तथा प्रत्यास्थता सीमा के पास भंजन बिंदु पाया जाता है।
इन पदार्थों को बहुत अधिक खींचने के बाद भी ये आसानी से अपनी मूल अवस्था में आ जाते है और चूँकि ये बहुलकों से मिलकर बने होते है यही कारण है कि इनको प्रत्यास्थ बहुलक पदार्थ कहा जाता है।
उदाहरण : रबर

भंजक प्रतिबल और भंजक बल क्या है , परिभाषा , उदाहरण , अंतर (breaking stress and force in hindi)

(breaking stress and force in hindi) भंजक प्रतिबल और भंजक बल क्या है , परिभाषा , उदाहरण , अंतर : जब किसी वस्तु या तार पर प्रत्यास्थता सीमा से बाहर भार लटकाया जाता है तो तार में विकृति बहुत ही तेजी से उत्पन्न होती है। तार पर कार्यरत प्रतिबल का वह अधिकतम मान जिस पर वह वस्तु या तार बहना शुरू कर देता है और अंत में टूट जाता है , प्रतिबल के इस मान को भंजक प्रतिबल कहते है इसे तार या वस्तु की तनन शक्ति भी कहते है।

तथा इस भंजक प्रतिबल के संगत बल जिसके कारण तार टूट जाता है उस बल के मान को भंजक बल कहते है।

किसी तार के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल का मान जितना अधिक होता है उस तार के लिए भंजक बल का मान उतना ही अधिक होता है दुसरे शब्दों में कहे तो भंजक बल का मान तार के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के समानुपाती होता है।

यदि किसी तार का अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A हो तो इसे निम्न प्रकार लिखा जा सकता है –

भंजक बल ∝ A

भंजक बल = P x A

यहाँ P एक समानुपाती नियतांक है जिसको भंजक प्रतिबल कहा जाता है।

P का मान किसी भी पदार्थ के लिए नियत होता है और इसका मान तार की मोटाई व लम्बाई से अप्रभावित रहता है अर्थात यह पदार्थ पर निर्भर करता है उसकी मोटाई या लम्बाई पर नही।

भंजक प्रतिबल : वह अधिकतम बल का मान जिसको कोई पदार्थ किसी वस्तु पर लगाने से वह उसे सहन न कर पाए और टूट जाये और प्रतिबल को भंजक प्रतिबल कहते है और उस अधिकतम बल के मान को भंजक बल कहा जाता है जिस पर वस्तु या तार टूट जाता है।

माना किसी वस्तु का अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A है तथा इस पर F बल लगाया जाता है तो इसके लिए भंजक प्रतिबल का मान निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है।

भंजक प्रतिबल = F/A

किसी वस्तु या तार के लिए भंजक प्रतिबल का मान इसलिए ज्ञात किया जाता है ताकि हमें यह पता रहे की वह तार या वस्तु कितना बल सहन कर सकती है और यदि हमने इससे ज्यादा बल इस पर आरोपित किया तो यह तार टूट जायेगा। अत: यह सुरक्षा की दृष्टि से बहुत जरुरी है।

भार बढाने पर तार का व्यवहार (प्रतिबल विकृति वक्र) (behavior of wire under increasing load)

(behavior of wire under increasing load) भार बढाने पर तार का व्यवहार (प्रतिबल विकृति वक्र) : जब किसी स्टील या धातु के तार के एक सिरे को दृढ़ सिरे से बाँध कर दुसरे सिरे को मुक्त रख कर , मुक्त सिरे के कुछ भार लटकाते है और जब धीरे धीरे इस भार का मान बढ़ाते है तो तार में इस प्रतिबल के कारण किस प्रकार विकृति उत्पन्न होती है और यह आपस में किस प्रकार सम्बंधित रहते है इसके अध्ययन के लिए अनुदैर्ध्य प्रतिबल व अनुदैर्ध्य विकृति के मध्य एक ग्राफ खिंचा जाता है तो हमें चित्रानुसार प्राप्त होता है –

ग्राफ की व्याख्या

बिंदु O से A तक तार को प्रत्यास्थता सीमा के अन्दर माना जाता है जिससे यहाँ हुक का नियम अनुसरण होता है जिसके अनुसार प्रतिबल का मान विकृति के समानुपाती होता है और हमें बिंदु O से A तक सरल रेखा प्राप्त होती है। यहाँ बिंदु A को प्रत्यास्थता सीमा बिंदु कहा जाता है क्यूंकि इसके बाद वस्तु पर यदि और अधिक बल आरोपित किया जाए तो वस्तु अपनी मूल अवस्था में लौटकर नही आती है।
बिंदु A से A1 तक के बल को भंजक प्रतिबल कहा जाता है जिसके अनुसार यदि वस्तु को प्रत्यास्थता सीमा से परे भारित किया जाए तो विकृति तेजी से उत्पन्न होती है।
अत: बिंदु A से A1 तक तार की लम्बाई में परिवर्तन , आरोपित भार के समानुपाती नहीं होता है बल्कि उससे भी अधिक होता है यही कारण है कि यहाँ ग्राफ तेजी से परिवर्तित हो रहा है।
यहाँ ऐसा माना जाता है की A1 बिंदु कुछ प्रत्यास्थ है और कुछ सुघट्य है अर्थात यहाँ प्रतिबल हटा लेने पर वस्तु अपनी मूल अवस्था ग्रहण करने की कोशिश करती है और कुछ ग्रहण कर भी लेती है लेकिन पूर्ण रूप से अपनी मूल अवस्था में नहीं जा पाती।
बिंदु A1 से B तक आगे भी तार पर भार बढ़ाने से वस्तु प्लास्टिक क्षेत्र में चली जाती है जहाँ वस्तु से भार हटा लेने पर यह उसी अवस्था में बनी रहती है अर्थात वस्तु अपनी मूल अवस्था ग्रहण करने की कोशिश नहीं करता है अर्थात तार में स्थायी विकृति उत्पन्न हो जाती है।
बिंदु B से C तक के ग्राफ में – जब भार का मान और अधिक बढाया जाता है तो B से C में मध्य ऐसी स्थिति आती है जब यदि भार का मान कम भी किया जाए तो भी तार की लम्बाई में वृद्धि होती जाती है।
अब यदि बिंदु C के बाद भी भार का मान बढाया जाए तो तार टूट जाता है , प्रतिबल के जिस मान पर तार टूट जाता है उसे भंजक प्रतिबल कहा जाता है।

पॉयसन अनुपात अथवा पाइंसा निष्पत्ति (poisson’s ratio in hindi)

(poisson’s ratio in hindi) पॉयसन अनुपात अथवा पाइंसा निष्पत्ति : जब किसी तार पर बल आरोपित किया जाता है तो इस बाह्य बल के कारण इसकी लम्बाई में तो परिवर्तन आता ही है साथ ही लम्बाई में परिवर्तन के कारण इसकी व्यास भी परिवर्तित हो जाती है , अर्थात इस बाह्य बल के कारण तार में दो प्रकार का परिवर्तन आ जाता है पहला लम्बाई में तथा दूसरा व्यास में।
परिभाषा : किसी तार या वस्तु पर प्रत्यास्थता सीमा के अन्दर अनुप्रस्थ विकृति तथा अनुदैर्ध्य विकृति के अनुपात को उस वस्तु के पदार्थ का पॉयसन अनुपात अथवा पाइंसा निष्पत्ति कहलाता है।
जब किसी वस्तु या तार को खिंचा जाता है अर्थात इसकी लम्बाई को बढाया जाता है तो इसका व्यास कम हो जाता है तथा जब किसी वस्तु का तार को दबाकर इसकी लम्बाई को कम किया जाता है तो इसका व्यास बढ़ जाता है , लेकिन यदि आयतन को नियत रखा जाए तो वस्तु की अनुप्रस्थ विकृति तथा अनुदैर्ध्य विकृति में एक सम्बन्ध पाया जाता है इस सम्बन्ध या अनुपात को पॉयसन ने खोजा था इसलिए इसे पॉयसन अनुपात कहते है।

पॉयसन अनुपात की कोई विमा नहीं होती है अर्थात यह एक विमाहीन राशि है तथा इसे σ द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
माना किसी तार की लम्बाई L है तथा इस पर बल आरोपित किया जाता है जिससे इसकी लम्बाई में △L परिवर्तन हो जाता है , और जैसा हमने पढ़ा की इसकी त्रिज्या में भी परिवर्तन होगा , माना पहले तार की त्रिजा r थी जो तार की लम्बाई में परिवर्तन के कारण △r परिवर्तित हो गयी अत:
इसके लिए सूत्र निम्न प्रकार लिखा जाता है –
पॉयसन अनुपात = अनुप्रस्थ विकृति / अनुदैर्ध्य विकृति
σ = (△r/r) /△L/L
पॉयसन अनुपात का मान -1 से ०.5 तक कुछ भी हो सकता है लेकिन इसके वास्तविक मान की बात करे तो यह 0 से 0.5 तक होता है।