बहते तरल या द्रव की ऊर्जा , दाब ऊर्जा , स्थितिज , गतिज उर्जा (energy of flowing fluid or liquid in hindi)

(energy of flowing fluid or liquid in hindi) बहते तरल या द्रव की ऊर्जा : जब कोई तरल पदार्थ गति कर रहा हो अर्थात बह रहा हो तो बहते हुए तरल या द्रव में तीन प्रकार की ऊर्जायें होती है जो निम्न है –

1 दाब ऊर्जा (pressure energy)

2. स्थितिज ऊर्जा (potential energy)

3. गतिज उर्जा (kinetic energy)

अब हम यहाँ इन तीनों प्रकार की तरल ऊर्जाओं के बारे में विस्तार से अध्ययन करते है और इनके लिए सूत्र ज्ञात करते है।

1 दाब ऊर्जा (pressure energy) : यह ऊर्जा तरल में संग्रहीत होती है और यह तरल के इकाई क्षेत्रफल पर कार्यरत बल बल के कारण होती है।

जब किसी तरल या द्रव में दाब के कारण जो ऊर्जा संग्रहीत रहती है उसे दाब ऊर्जा कहते है , इस ऊर्जा का मापन तरल को इसके दाब के विरुद्ध किये गए कार्य के रूप में होता है , द्रव के दाब के विरुद्ध कार्य करते समय द्रव के वेग में परिवर्तन नहीं होना चाहिए अर्थात वेग को नियत रखते हुए किसी द्रव के दाब के विरुद्ध किये गए कार्य को उस तरल की दाब ऊर्जा कहते है।

किसी द्रव की दाब ऊर्जा का सूत्र = pV

यहाँ p = दाब तथा V = आयतन

2. स्थितिज ऊर्जा (potential energy) : किसी द्रव में इसकी स्थिति के कारण निहित ऊर्जा को उस द्रव या तरल की स्थितिज ऊर्जा कहते है , जैसे कोई द्रव या तरल किसी निर्देश बिंदु (निर्देश तंत्र ) से ऊंचाई पर स्थित हो या किसी अन्य स्थिति पर हो तो इस द्रव में जो ऊर्जा निहित होती है वह इसकी स्थिति के कारण होती है और इसे ही स्थितिज उर्जा कहते है।

द्रव की स्थितिज ऊर्जा का सूत्र = mgH

यहाँ m = द्रव का द्रव्यमान

g = गुरुत्वीय त्वरण

H = निर्देश बिंदु से ऊँचाई

3. गतिज उर्जा (kinetic energy)

किसी तरल या द्रव की गतिशील अवस्था के कारण इसमें निहित ऊर्जा को गतिज ऊर्जा कहते है , जब कोई द्रव गति करता है , चाहे यह गति किसी भी प्रकार की हो (रेखीय गति , घूर्णन गति , कम्पन्न गति ) , द्रव में इस गति के कारण एक ऊर्जा संग्रहित होती है इसे गतिज ऊर्जा कहते है।
द्रव या तरल की गतिज ऊर्जा = mv2/2

यहाँ m = द्रव या तरल का द्रव्यमान , v = द्रव का वेग

अविरतता का सिद्धांत (सांतत्यता समीकरण) (equation of continuity in hindi)

(equation of continuity in hindi) अविरतता का सिद्धांत (सांतत्यता समीकरण) : इस सिद्धांत के अनुसार “जब किसी नली में तरल का प्रवाह नियत हो तो एक निश्चित समयान्तराल में नली में प्रवेश करने वाले तरल का द्रव्यमान , उसी समयान्तराल में नली से निकलने वाले तरल के द्रव्यमान के बराबर होता है ”
यह नियम तरल गतिकी में द्रव्यमान संरक्षण नियम पर आधारित होता है।
अत: किसी तरल का प्रवाह इस प्रकार होना चाहिए कि इसमें द्रव्यमान संरक्षित रहे , यहाँ द्रव्यमान संरक्षण का नियम यह बताता है कि द्रव्यमान को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है।
इसलिए जब तरल का प्रवाह नियत हो तो नली में जितना द्रव्यमान का तरल प्रवेश करता है उतना ही तरल द्रव्यमान बाहर निकलता है , इसमें द्रव्यमान संरक्षण रहता है।

उदाहरण और सूत्र : माना चित्रानुसार कोई नली है जिसका प्रवेश द्वार का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A1 है और निकास द्वार का क्षेत्रफल A2 है। प्रवेश द्वार पर द्रव का वेग V1 है तथा द्रव V2 से से बाहर निकलता है , द्रव का घनत्व p है और इसे t समयांतराल तक प्रवाह किया जाता है अत:
नली में t समय में प्रवेश करने वाले द्रव का द्रव्यमान = p tV1A1
नली में t समय में बाहर निकलने वाले द्रव का द्रव्यमान =p t V2 A2
चूँकि द्रव्यमान संरक्षण के नियम से या अविरतता का सिद्धांत के अनुसार नली में प्रवेश करने वाले द्रव का द्रव्यमान , बाहर निकलने वाले द्रव के द्रव्यमान के बराबर है अत:
p tV1A= p t V2 A2
अत:
V1A= V2 A2
अत: यही कारण होता है कि किसी नली या पाइप के चौड़े भाग से द्रव का वेग कम होता है और संकरे भाग से द्रव का वेग अधिक होता है , यही कारण है कि जब नली का मुंह थोडा दबा लिया जाता है तो इसका पानी अधिक वेग से और अधिक दूरी तक जाता है।

क्रांतिक वेग और रेनाल्ड संख्या (critical velocity and Reynolds Number in hindi)

तरल  पदार्थ का क्रांतिक वेग (critical velocity of fluid in hindi) : किसी द्रव या तरल का वह वेग निश्चित वेग जिससे कम वेग पर तरल का प्रवाह धारा रेखीय प्रवाह होता है और इससे अधिक वेग पर तरल का प्रवाह विक्षुब्ध प्रवाह हो जाता है , तरल के उस निश्चित वेग को ही तरल का क्रान्तिक वेग कहते है।
किसी तरल पदार्थ का क्रांतिक वेग कई चीजो पर निर्भर करता है और इन विभिन्न प्रकार के कारको पर निर्भर करता है और इन सब कारकों में से रेनाल्ड संख्या होता है , अब हम रेनाल्ड संख्या के बारे में विस्तार से अध्ययन करते है और देखते है कि इसकी सहायता से क्रांतिक वेग इत्यादि कैसे ज्ञात किया जाता है।

रेनाल्ड संख्या (Reynolds Number)

किसी भी द्रव या तरल की प्रकृति को रेनाल्ड संख्या के आधार पर बताया जाता है अर्थात किसी पाइप से होने वाले द्रव का प्रवाह धारा रेखीय है या विक्षुब्ध प्रवाह है , इस प्रकृति को रेनाल्ड संख्या द्वारा बताया जाता है।
रेनाल्ड संख्या एक विमाहीन और मात्रकहीन राशि होती है।
परिभाषा : प्रति एकांक क्षेत्रफल जडत्वीय बल और प्रति एकांक क्षेत्रफल श्यान बल के अनुपात को उस तरल का रेनाल्ड संख्या कहते है। इसे NR से प्रदर्शित किया जाता है।
NR = प्रति एकांक क्षेत्रफल जडत्वीय बल / प्रति एकांक क्षेत्रफल श्यान बल
माना किसी पाइप की त्रिज्या r है तथा इसका अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A है , इस पाइप से p घनत्व वाला कोई तरल प्रवाहित हो रहा है तो उस तरल के लिए रेनाल्ड संख्या निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किये जाते है।
यहाँ v = तरल का वेग , p = घनत्व , r = पाइप की त्रिज्या , n = द्रव की चिपचिपापन
रेनाल्ड संख्या के आधार पर निम्न प्रकार तरल की प्रकृति को बताया जाता है –
1. यदि रेनाल्ड की संख्या 0 से 2000 के मध्य है तो तरल का प्रवाह धारा रेखीय प्रवाह होगा।
2. 2000 से 3000 के मध्य NR का होने पर द्रव का प्रवाह धारा रेखीय प्रवाह से विक्षुब्द में परिवर्तित हो जाता है।
3. 3000 से अधिक NR का मान होने पर द्रव का प्रवाह विक्षुब्द प्रकृति का होता है।

तरल का प्रवाह (flow of fluids in hindi) , धारा रेखीय , पटलित , विक्षुब्ध द्रव प्रवाह

(flow of fluids in hindi) तरल (द्रव) का प्रवाह : किसी भी तरल का प्रवाह द्रव गतिकी का एक हिस्सा है।  कोई भी तरल जैसे द्रव या कोई गैस जब गति करता है तो इसे तरल का प्रवाह कहते है। जब कोई तरल गति कर रहा है इसका तात्पर्य है कि तरल पर लगने वाले बल संतुलित अवस्था में है अर्थात सभी बल आपस में संतुलित नहीं है , कुछ न कुछ परिणामी बल कार्यरत है और जब तक तरल पर कोई परिणामी बल कार्यरत रहेगा तरल की यह गति बनी रहेगी।
उदाहरण : जब किसी जग में भरे पानी को थोडा टेढ़ा किया जाता है तो पानी निचे गिरने लगता है और जग के किनारे पर पानी का वेग बहुत अधिक होता है और जग के तल में पानी की गति बहुत ही कम होती है , यहाँ गुरुत्वीय बल कार्य करता है जिसके कारण पानी गति करता है।

तरल के प्रवाह के प्रकार (Types of Fluid Flow)

मुख्य रूप से तरलों के प्रवाह को तीन भागों में बांटा गया है –
1. धारा रेखीय प्रवाह (stream lined flow)
2. पट्लित प्रवाह (laminar flow)
3. विक्षुब्ध प्रवाह (turbulant flow)
अब हम तीनों प्रकार के तरल प्रवाह को विस्तार से अध्ययन करते है –
1. धारा रेखीय प्रवाह (stream lined flow) : जब तरल के प्रवाह में किसी एक बिंदु पर तरल के सभी कणों का वेग समान हो और एक ही मार्ग से होकर गुजरते है तो इस प्रकार के प्रवाह को धारा रेखीय प्रवाह कहते है।
इस प्रवाह में द्रव के कण जिस एक बिंदु से गुजरते है और ये कण जिस रेखीय पथ पर गति करते है उस पथ को धारा रेखा कहते है और इस धारा रेखा के किसी बिंदु पर यदि स्पर्श रेखा खिंची जाए तो यह रेखा उस बिंदु पर द्रव के प्रवाह की दिशा को प्रदर्शित करती है।
2. पट्लित प्रवाह (laminar flow) : जब कोई तरल अलग अलग परतों के रूप में अलग अलग वेगों से धारा रेखीय प्रवाह करता है तो इसे पटलित प्रवाह कहते है।
3. विक्षुब्ध प्रवाह (turbulant flow) : जब कोई द्रव किसी एक बिंदु से होकर अलग अलग वेगों से और अलग अलग मार्गों से होकर गुजरता है तो इसे द्रव का विक्षुब्ध प्रवाह कहते है।

उत्प्लावन बल की परिभाषा क्या है , उदाहरण , मात्रक , सूत्र (buoyancy force in hindi)

(buoyancy force in hindi) उत्प्लावन बल की परिभाषा क्या है , उदाहरण , मात्रक , सूत्र : जब किसी वस्तु को पानी में डुबोया जाता है तो एक बल इस वस्तु को बाहर की तरफ धकेलने का प्रयास करता है , इसी बल को उत्प्लावन बल कहते है।

उत्प्लावन बल को परिभाषित कीजिये

किसी वस्तु को तरल में आंशिक या पूर्ण रूप से डूबोने पर , तरल द्वारा वस्तु पर एक बल ऊपर की तरफ लगाया जाता है , तरल द्वारा वस्तु पर लगाया गया यह बल ही उत्प्लावन बल या उत्पेक्ष बल कहलाता है।
किसी द्रव की सहत की तुलना में तल में दाब का मान अधिक होता है।
इस बल का मान वस्तु द्वारा हटाये गये तरल के भार या मान पर निर्भर करता है अर्थात कोई वस्तु जितना अधिक तरल को हटाती है उस वस्तु पर लगने वाले उत्प्लावन बल का मान उतना ही अधिक होता है। यही कारण है कि एक छोटे गुब्बारे को आप अपने हाथो से बल लगाकर डूबा सकते है लेकिन बड़े गुब्बारे पर बैठकर आप कितनी भी दूर तैर सकते हो लेकिन यह डूबता नहीं है और आपका वजन आसानी से वहन कर लेता है और आपको डूबने नहीं देता है।
वस्तु के जिस बिंदु पर उत्प्लावन बल कार्य करता है उसे उसे उत्प्लावन केंद्र (Center of Buoyancy) कहते है।

 

उत्प्लावन बल का उदाहरण

1. जब किसी गहरे जल में आपका कोई सामान गिर जाता है और आप उसे लेने के लिए निचे की तरफ जाते है तो आप अनुभव करते है कि आपको ऊपर की तरफ धकेला जाता है अर्थात आपको द्रव की सतह पर लाने के लिए आपके ऊपर द्रव द्वारा एक बल कार्य करता है इसी बल को उत्प्लावन बल कहते है , जो द्रव में डुबोने पर उसके ऊपर की तरफ लगता है।
2. जब आप किसी गुब्बारे को पानी में डुबाने का प्रयास करते है तो आप देखते है कि आपको इसे पानी में डुबोने के लिए बहुत अधिक बल लगाना पड़ता है क्यूंकि आप अनुभव करते है की द्रव एक बल लगाता है जो इसे ऊपर की तरफ धकेलता है , इसी बल को उत्प्लावन बल कहते है।

उत्प्लावन बल का सूत्र

माना किसी m द्रव्यमान की वस्तु को द्रव में डुबाया जाता है तो इस वस्तु पर लगने वाला उत्प्लावन बल निम्न होगा अर्थात इसे निम्न सूत्र की सहायता से ज्ञात किया जाता है –
Fb = ρgV = ρghA
यहाँ Fb उत्प्लावन बल
p = द्रव का घनत्व
g = गुरुत्वीय त्वरण
V = वस्तु द्वारा हटाये गये द्रव का आयतन
h = वस्तु द्वारा हटाये गये द्रव की ऊंचाई
A = वस्तु की सतह का क्षेत्रफल

मैनोमीटर क्या है , खोज , मैनोमीटर से क्या मापा जाता है (manometer meaning in hindi)

(manometer meaning in hindi) मैनोमीटर क्या है , खोज , मैनोमीटर से क्या मापा जाता है : यह एक ऐसा यन्त्र है जिसकी सहायता से दाब का मापन किया जाता है। यह यन्त्र एक U आकार की नली से बनाया जाता है , इस नली में कुछ द्रव भरा होता है , अधिकतर इस द्रव के रूप में मर्करी का उपयोग किया जाता है क्यूंकि मर्करी का उच्च घनत्व होता है।
यह यन्त्र बनाने के लिए एक कांच के समान एक पारदर्शी प्लास्टिक की नली लेते है और इस नली में किसी रंग का कुछ तरल भर देते है , ताकि हमें मापन में कोई परेशानी न हो।
अब इस नली को U आकार में मोड़ लेते है
इस नली के दोनों सिरे पहले खुले होते है अब इन दो सिरों में से एक सिरा उस पात्र से जोड़ देते है जिसका दाब का मापन हमें करना है और इस नली का दूसरा सिरा खुला छोड़ दिया जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है –

दाब की गणना

चूँकि हमें उस पात्र का दाब का मान ज्ञात करना है जिससे यह नली जुडी हुई है।
अर्थात हमें बिंदु B पर दाब का मान ज्ञात करना है।
चित्र से हम देख सकते है कि बिंदु B तथा C पर दाब का मान समान होगा।
दाब B = दाब C
बिंदु B पर दाब का मान = PB = PA + pgh1
बिंदु C पर दाब का मान = PC = PD + pgh2
PB PC
PB PD + pgh2

बैरोमीटर की परिभाषा , कार्य का चित्र ,संकेत उपयोग , आविष्कार खोज (barometers meaning in hindi)

(barometers meaning in hindi) बैरोमीटर की परिभाषा , कार्य का चित्र ,संकेत उपयोग , आविष्कार खोज : बैरोमीटर एक ऐसा यन्त्र है जिसकी सहायता से वायु दाब का मापन किया जाता है , इसकी सहायता से वायुमण्डलीय दाब को भी मापा जाता है , चूँकि वायुमण्डलीय दाब अलग अलग जगह पर भिन्न होता है क्यूंकि अलग अलग जगह की समुद्र स्तर से ऊंचाई अलग अलग होती है।
बैरोमीटर की खोज टोरोसेली ने वायुदाब को मापने के लिए किया था।
यह दो प्रकार का होता है मर्करी और निर्द्रव (aneroid)

मर्करी बैरोमीटर का कार्य व चित्र

यह बैरोमीटर सबसे सिंपल यन्त्र है जो किसी भी जगह पर वायुमण्डलीय दाब के मापन के लिए उपयोग किया जाता है। मर्करी बैरोमीटर को Torricellian बैरोमीटर भी कहते है।
जैसा की चित्र में दिखाया गया है , इसमें एक कांच की नली होती है जो एक सिरे से खुली होती है और इस नली का दूसरा सिरा बंद होता है।
इस काँच की नली में मरकरी भरते है और एक दुसरे पात्र में मरकरी भरते है , इस मर्करी से भरे पात्र में , भरी हुई नली को इस प्रकार डुबोते है कि नली का खुला मुंह मर्करी वाले पात्र में डूबा रहे जैसा चित्र में दर्शाया गया है।
इसे इस प्रकार रखने पर मर्करी का स्तर कुछ निचे आता है और बिंदु A पर आकर रुक जाता है , चूँकि नली के ऊपर कोई वायु उपस्थित नहीं है इसका अभिप्राय है कि बिंदु A के ऊपर नली में निर्वात उत्पन्न हो गया है अत: यहाँ किसी प्रकार का कोई वायु दाब नही है अत: बिंदु A पर दाब का मान शून्य होगा अर्थातPA  = 0
चूँकि बिंदु B और मर्करी तल पर दाब का मान समान है अत: जो दाब B का होगा वही दाब का मान पात्र में रखे मर्करी की सतह पर भी होगा।
अत: जो वायुदाब उस जगह का होगा वही वायु दाब बिंदु B का होगा , B बिंदु पर दाब का मानPB = PA + pgH होगा।
यहाँ H = बिंदु A तथा B के मध्य की दूरी है।
चूँकि बिंदु A पर वायुदाब का मान शून्य है (हमने ऊपर ज्ञात किया है )
अत: B बिंदु पर वायुदाब का मानPB = pgH होगा।
चूँकि बिंदु B का और सतह का वायुदाब समान है अत: उस जगह का वायु दाब का मान भी B बिंदु के समान ही होगा अत: उस जगह का वायुदाब =  pgH होगा।

दाब मापन यन्त्र , दाब का मापन किस मशीन से किया जाता है (pressure measuring instrument in hindi)

(pressure measuring instrument in hindi) दाब मापन यन्त्र , दाब का मापन किस मशीन से किया जाता है : किसी पृष्ठ पर तरल द्वारा गये बल का मापन दाब मापन कहलाता है क्यूंकि इकाई पृष्ठ पर लगने वाले बल का मापन ही तो दाब मापन कहलाता है।

दाब मापन के इन यंत्रों को यांत्रिक (दबाव गेज), इलेक्ट्रॉनिक और मेक्ट्रोनिक दबाव मापने के उपकरण के रूप में विभक्त किया जाता है , यहाँ हम बात करते है की ये विभिन्न प्रकार के यन्त्र किस प्रकार कार्य करते है –

इलेक्ट्रॉनिक दाब मापन यन्त्र

इन यंत्रो में दाब सेंसर लगा होता है , यह सेंसर दाब को इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल के रूप में बदल देता है और ये इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल हमें इसके पैमाने पर दीखते है जो दाब का मापन बताता है। इस प्रकार के यन्त्र आकार में बहुत छोटे उपलब्ध है और ये बहुत ही अल्प दाब का मापन भी आसानी से और शुद्धता से कर सकते है।

मेक्ट्रोनिक दबाव मापन यन्त्र

ये वो यन्त्र होते है जो इलेक्ट्रॉनिक और यांत्रिक यंत्रो के संयोजन से बनाये जाते है , इसमें मेकनिकल यन्त्र पर इलेक्ट्रॉनिक अवयवों को लगाया जाता है और दोनों के इस प्रकार संयोजन से दाब मापन के लिए यन्त्र बनाया जाता है जिसे मेकाट्रोनिक (Mechatronic) दाब मापन यन्त्र कहते है।
इस यन्त्र में विद्युत सिग्नल का या स्विच का प्रयोग किया जाता है , जब पॉवर सप्लाई या सिग्नल न मिले तो भी इस यन्त्र की सहायता से आसानी से और शुद्ध दाब का मापन किया जा सकता है।

यान्त्रिक दाब मापन यन्त्र

ये यन्त्र बहुत ही मजबूत होते है और इनको आसानी से कोई भी इस्तेमाल कर सकता है , इनके द्वारा दाब मापन के लिए किसी भी प्रकार की कोई स्किल की आवश्कता नही पड़ती है इसलिए ही इन्हें बहुत ही अधिक इस्तेमाल किया जाता है।
दाब मापन के लिए यांत्रिक दाब यन्त्र को डायाफ्राम तत्व या बोर्डन ट्यूब आदि का प्रयोग करके बनाया जाता है |

हाइड्रोलिक लिफ्ट क्या है ,हाइड्रॉलिक सिद्धांत , परिभाषा , कार्यविधि , मशीन सिस्टम (hydraulic lift working principle in hindi)

(hydraulic lift working principle in hindi) हाइड्रोलिक लिफ्ट क्या है , सिद्धांत , परिभाषा , कार्यविधि , मशीन सिस्टम : यह एक ऐसी युक्ति है जिसकी सहायता से किसी भारी वजन को उठाने या नीचे लाने का कार्य किया जाता है।
सिद्धांत (principle): हमने पास्कल का नियम पढ़ा है जिसमें हमने पढ़ा कि पात्र में रखे द्रव के किसी भी बिंदु पर लगाया गया दाब , समान रूप से सभी जगह लगता है।
हाइड्रॉलिक लिफ्ट मशीन भी पास्कल के नियम पर आधारित है।

हाइड्रोलिक लिफ्ट की कार्यविधि (hydraulic lift working)

चित्रानुसार इसमें एक क्षैतिज नलिका होती है जिसके दो सिरे होते है , इन दोनों सिरों पर गतिशील पिस्टन लगे रहते है।  इस नलिका में असंपीड्य और अश्यान तरल या द्रव पदार्थ भरा हुआ रहता है , चित्र में इस द्रव को पीले रंग से दर्शाया गया है।
यहाँ एक पिस्टन का क्षेत्रफल कम रखा जाता है और दुसरे पिस्टन का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल का मान अधिक रखा जाता है क्यूंकि हमने पास्कल के नियम में पढ़ा था कि यदि बड़े पिस्टन का क्षेत्रफल 10 गुना अधिक बड़ा है तो उस पर लगने वाले बल का मान भी 10 गुना अधिक होगा।
जब कम अनुप्रस्थ वाले क्षेत्रफल पर बल लगाया जाता है तो तो इस बल के कारण सिस्टम में भरे द्रव पर एक बल लगता है और पास्कल के नियम के अनुसार यह दाब बिना किसी हानि के संचरित होता है अत: यह बल बड़े अनुप्रस्थ वाले पिस्टन पर लगता है और चूँकि इस पिस्टन का क्षेत्रफल का अधिक है अत: इस पिस्टन द्वारा ऊपर की तरफ अधिक बल लगाया जाता है और कार या कोई बड़ा वजन आसानी से उठाया जा सकता है।
यदि बड़ा पिस्टन , छोटे पिस्टन की तुलना में 10 गुना अधिक बड़ा है तो छोटे पिस्टन पर जितना बल लगाया जाता है उसका 10 गुना बल पिस्टन दो पर मिलता है या प्राप्त होता है जिससे यह आसानी से वाहन को भी उठा सकता है।
सूत्र
माना छोटे पिस्टन पर लगने वाला दाब का मान P1 है तथा बड़े पिस्टन पर लगने वाला Pदाब है , जैसा कि हम जानते है कि दोनों दाब का मान समान होगा अत:


P1 = P2

माना छोटे पिस्टन पर हमने F1 बल लगाया है और इसका अनुप्रस्थ क्षेत्रफल का मान A1 है तथा बड़े पिस्टन पर F2 बल मिलता है और इसका क्षेत्रफल F2 है तो P1 और P2 का मान निम्न होगा –
अत: हम कह सकते है कि इसमें बल का मान बढ़ा हुआ प्राप्त होता है और इसका मान इस सूत्र के द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। 

पास्कल का नियम (pascal’s law in hindi) , paskal ka niyam

(pascal’s law in hindi) पास्कल का नियम : फ्रांस वैज्ञानिक ब्लेस पास्कल ने तरलों (गैस और द्रव ) के लिए एक सिद्धांत दिया जिसे पास्कल का नियम भी कहते है।

पास्कल के अनुसार “जब गुरुत्व नगण्य हो तब पात्र में रखे तरल के किसी एक बिंदु पर यदि दाब में परिवर्तन किया जाए तो यह परिवर्तन द्रव के सभी बिन्दुओं पर तथा पात्र की दीवारों पर समान रूप से संचरित होता है बिना किसी हानि के ”

यहाँ तरल को स्थिर माना गया है और गुरुत्व को नगण्य माना गया है।

पास्कल के नियम के अनुप्रयोग या उदाहरण : हाइड्रोलिक लिफ्ट , हाईड्रोलिक ब्रेक और हाइड्रोलिक प्रेस आदि। जैसा कि हम जानते है कि दाब का मान (बल/क्षेत्रफल) होता है।

दाब = F/A

पास्कल के नियम के अनुसार एक हाइड्रोलिक सिस्टम में किसी एक पिस्टन पर लगाया गया दाब , इस दाब के कारण प्रथम पिस्टन में जितना परिवर्तन या बढ़ता है उतना ही परिवर्तन इस दाब के कारण दुसरे पिस्टन में देखने को मिलता है।

अर्थात जब एक पिस्टन पर दाब लगाया जाता है तो यह दोनों पिस्टन में समान रूप से परिवर्तन करता है बशर्ते दोनों पिस्टन का क्षेत्रफल समान होना चाहिए।

यदि दुसरे पिस्टन का क्षेत्रफल पहले पिस्टन की तुलना में 10 गुना अधिक हो तो उसी दाब के कारण इस 10 गुना अधिक क्षेत्रफल वाले पिस्टन पर , प्रथम पिस्टन की तुलना में लगने वाला बल 10 गुना अधिक होता है।

इसी सिद्धांत पर तो हाइड्रोलिक सिस्टम कार्य करते है।

पास्कल ने यह भी बताया “किसी स्थिर अवस्था में तरल के किसी बिंदु पर लगाया गया दाब का मान सभी दिशाओं में समान होता है , इसे पास्कल का सिद्धांत या नियम कहते है।