जाइलम / दारू , क्या है , परिभाषा , वाहिनिकाएं , वाहिकाएं , प्रोटोजाइलम , मेटाजाइलम , मध्यादिदारुका

(xylem and phloem in hindi) जाइलम / दारू : यह मूल से पानी व खनिज लवणों को पत्तियों तक पहुँचाता है तथा यांत्रिक सहारा प्रदान करता है।

यह चार प्रकार की कोशिकाओं से बना होता है।

(1) वाहिनिकाएं :

ये कोशिकाएं लम्बी व नलिकाकार होती है , इनकी कोशिका भित्ति मोटी व लिग्निन युक्त होती है।

इनके सिरे नुकीले होते हैं , ये कोशिकाएँ मृत व जीवद्रव्य विहीन होती है।

(2) वाहिकाएं:

ये कोशिकाएँ लम्बी , नलिकाकार होती है , इनकी कोशिका भित्ति लिग्निन की बनी होती हैं।

इनमें एक चौड़ी केन्द्रीय गुहिका पायी जाती है , ये कोशिकाएं मृत व जीवद्रव्यविहीन होती है।  ये एजियोस्पर्म पादपों में प्रमुखता से पायी जाती है।

(c) जाइलम पेरेन्काइम : ये कोशिकाएं मृदु ऊत्तक प्रकार की होती है , ये जीवित व जीवद्रव्य युक्त होती है , ये भोजन संचय व जल संवहन का कार्य करते है।

(d) जाइलम तन्तु : ये कोशिकायें लम्बी नुकीले सिरों वाली होती है , इनकी कोशिका भित्ति मोटी व गर्त युक्त होती है , इनमें केंद्रीय गुहिका नाम मात्र की होती है।

जाइलम दो प्रकार का होता है –

  • प्राथमिक जाइलम : द्वितीयक वृद्धि से पहले उपस्थित जाइलम को प्राथमिक जाइलम कहते है।
  • द्वितीयक जाइलम – द्वितीयक वृद्धि के बाद बनने वाले जाइलम को द्वितीयक जाइलम कहते है।
प्राथमिक जाइलम दो प्रकार का होता है –
  • प्रोटोजाइलम : सबसे पहले बनने वाले जाइलम को प्रोटोजाइलम कहते है।
  • मेटाजाइलम : बाद में बनने वाले जाइलम को मेटाजाइलम कहते हैं।

प्रोटो जाइलम व मेटा जाइलम की स्थिति के आधार पर यह दो प्रकार का होता है –

  • मध्यादिदारुका : जब प्रोटोजाईलाम केन्द्रक की ओर तथा मेटाजाइलम परिधि की ओर हो तो इसे मध्यादिदारुका कहते है।
  • बाह्यदिदारुक : जब मेटाजाइलम केन्द्रक की ओर तथा प्रोटोजाइलम परिधि की ओर हो तो इसे बाह्यदिदारुक कहते है।

(3) फ्लोएम : यह पत्तियों में बने भोजन को पौधे के अन्य भागो में पहुँचाने का कार्य करता है , यह चार प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बना होता है।

  • चालनी नलिकाएँ : चालनी नलिकाएं लम्बी व नलिका के समान होती है , इन कोशिकाओं की अन्तः भित्ति में अनेक छिद्र पाये जाते है।  परिपक्कव अवस्था में जीवद्रव्य परिधि की ओर तथा मध्य में बढ़ी रित्तिका बन जाती है। चालनी नलिकाओं में केन्द्रक का अभाव होता है।  सहकोशिकाएं इनका नियंत्रण करती है।
  • सहचर / सहकोशिकाएँ : ये मृदुत्तकी जीवित व जीव द्रव्य युक्त कोशिकाएं होती है , ये चालनी नलिकाओं से सटी रहती है।  ये कोशिकाएँ चालनी नलिकाओं का नियंत्रण करती है।  जिम्नोस्पर्म पादपों में इनके स्थान पर एमबुमिनस कोशिकाएं होती है।
  • फ्लोएम पेरेन्काइम : ये लम्बी , बेलनाकार , जिवित कोशिकाएं होती है , इनकी कोशिका भित्ति सेलुलोस की तथा गतियुक्त होती है।  ये प्लास्मोडिस्मेटा द्वारा कोशिकाओं को जोड़ती है।  ये खाद्य पदार्थ , रेजीन , म्यूसिलेज , लेटेक्स आदि का संचय करती है।  एक बीजपत्री पादपों में इनका अभाव होता है।
  • फ्लोएम तन्तु : ये मृत व जीवद्रव्य विहीन कोशिकाएं होती है , ये द्वितीयक फ्लोएम में उपस्थित व प्राथमिक फ्लोएम में अनुपस्थित होती है।  ये लम्बी , अशाखित व नुकीली होती है। कोशिका भित्ति लिग्निन की मोटी व गतियुक्त होती है।  कुछ पादपों जैसे – पटसन ,सन , भांग में फ्लोएम तन्तु आर्थिक महत्व के होते है।  इनसे रस्सियाँ बनाई जाती है।

फ्लोएम दो प्रकार का होता है –

  • प्रोटोफ्लोएम : सकरी चालनी नलिका वाले पहले बने फ्लोएम को प्रोटोफ्लोएम कहते है।
  • मेटाफ्लोएम : बड़ी चालनी नलिका वाले बाद में बने फ्लोएम को मेटा फ्लोएम कहते है।

उत्तक क्या है , परिभाषा , प्रकार , पुष्पी पादपों का शरीर Tissue in hindi

पुष्पी पादपों का शरीर :

उत्तक (Tissue in hindi ) : कोशिकाओं का ऐसा समूह जो उद्भव व कार्य की दृष्टि  से समान होता है , ऊत्तक कहलाता है।  पादपों में ऊत्तक मुख्य रूप से दो प्रकार का होता हैं।

(A) विभज्योत्तकी : यह उत्तक पौधे के वृद्धिशील भागों में पाया जाता है , इस ऊत्तक की कोशिकाएँ निरन्तर विभाजन कर नयी कोशिकाएं बनाती रहती है।  यह उत्तक पौधे में स्थिति के आधार पर तीन प्रकार का होता है।

  • शीर्षस्थ मेरेस्टेमी : यह मेरेस्टेमी ऊत्तक पौधे के शीर्षस्थ भागों जैसे – जड़ के शीर्ष , प्ररोह के शीर्ष पर पाया जाता है।  इस ऊत्तक द्वारा बनी नयी कोशिकाओं से पौधे की लम्बाई में वृद्धि होती है , इस उत्तक के कारण पौधे जीवन भर वृद्धि करते है।
  • अंतर्वेशी मेरेस्टेमी : यह उत्तक पौधों के पत्तियों की आधार पर्ण व पर्णसंधियों में पाया जाता है , यह स्थायी उत्तक के मध्य होता है।  इस उत्तक के कारण पौधे के मध्य भागो में लम्बाई बढती है।
  • पाशर्व मेरेस्टेमी : यह उत्तक पौधों के पाशर्व भागों में स्थित होता है।  इस उत्तक से बनी कोशिका से पौधों की मोटाई में वृद्धि होती है।

(B) स्थायी उत्तक : ऐसा उत्तक जिसकी कोशिकाएँ स्थायी या अस्थायी रूप से विभाजन की क्षमता खो देती है , स्थायी उत्तक कहलाता है।

इस उत्तक की कोशिकाएँ जीवित या मृत प्रकार की होती है।

यह उत्तक पुन: दो प्रकार का होता है।

(1) सरल स्थायी उत्तक : यह स्थायी उत्तक समान संरचना वाली कोशिकाओं से मिलकर बना होता है , यह तीन प्रकार का होता है।

  • मृदु उत्तक (पैरेन्काइमा) : इस उत्तक की कोशिकाएँ जीवित व जीव द्रव्य युक्त होती है।  ये अण्डाकार , गोल आयताकार या बहुभुजी प्रकार की होती है।  इन कोशिकाओं के मध्य अन्तरा कोशिकीय अवकाश पाये जाते है।  इन कोशिकाओ की कोशिका भित्ति पतली व सेलुलोस की बनी होती है।  यह उत्तक प्रकाश संश्लेषण भोजन संचय व स्त्राव का कार्य करती है।
  • स्केरेलेंकइमा / दृढ उत्तक : इस उत्तक की कोशिकाएँ परिपक्वव दृढ कठोर जीव द्रव्य विहीन व मृत होती है।  इस उत्तक की कोशिकाएँ लम्बी , सक्रीय , सिरों पर नुकीली होती है।  इनकी कोशिका भित्ति समान रूप से मोटी व लिग्निन युक्त होती है।  कोशिका भित्ति में गर्त पाये जाते है।  यह उत्तक पौधों को यांत्रिक शक्ति प्रदान करता है।  यह उत्तक फलो की भित्ति बीजो के आवरण , चाय की पत्ती आदि में पाया जाता है।
  • कोलेन्काइमा / स्थुलकोण उत्तक :  इस उत्तक की कोशिकाएँ जीवित व क्लोरोप्लास्ट युक्त होती है , कोशिका भित्ति पतली परन्तु कोनो पर मोटी होती है , कोशिका भित्ति हेमीसेलुलोस सेलुलोस तथा पेक्टिन की बनी होती है।  कोशिकाएँ अण्डाकार गोल या बहुकोणीय होती है।  यह पौधों को यांत्रिक शक्ति व मजबूती प्रदान करता है।  एकबीजपत्री पादपों में यह अनुपस्थित होता है।
(2) जटिल उत्तक : एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने उत्तक को जटिल उत्तक कहते है।
यह दो प्रकार का होता है।

सूर्य का सूर्योदय तथा सूर्योस्त के समय लाल दिखाई देना , लाल संकेत , श्वेत बादल white clouds in hindi

(The Red appearance of sun at the sunset and at the sunrise) सूर्य का सूर्योदय तथा सूर्योस्त के समय लाल दिखाई देना  :

प्रकाश के प्रकीर्णन के सन्दर्भ में रैले का नियम कार्य करता है जिसमें उन्होंने बताया था की प्रकिर्णित प्रकाश की तीव्रता का मान तरंग दैर्ध्य के चार घात के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
अर्थात जिस रंग की तरंग दैर्ध्य कम होती है उस रंग का प्रकीर्णन बहुत अधिक होता है तथा जिस रंग की तरंग दैर्ध्य अधिक होती है उस रंग का प्रकीर्णन बहुत कम होता है।
हम जानते है की सूर्य का प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना होता है , उन सातो रंगों में से लाल रंग की तरंग दैर्ध्य सबसे अधिक होती है अत: लाल रंग का प्रकीर्णन सबसे कम होगा।
चूँकि सूर्य पृथ्वी से बहुत अधिक दूरी पर स्थित है अत: पृथ्वी तक पहुंचने के लिए सूर्य के प्रकाश को बहुत अधिक दूरी तय करना पड़ता है।
इस लम्बी दूरी के दरम्यान सब रंग का प्रकीर्णन पहले ही हो जाता है लेकिन लाल रंग का प्रकीर्णन सबसे कम होता है अत: यह पृथ्वी तक पहुच पाता है।
दुसरे शब्दों में कहे तो रैले के नियम के अनुसार लाल रंग की तरंग दैर्ध्य सबसे अधिक होती है अत: इसका प्रकीर्णन सबसे कम होता है और यह सूर्य से चलकर पृथ्वी तक पहुच पाता है अर्थात सिर्फ लाल रंग ही हमारे तक पहुच पाता है बाकी अन्य सभी रंग रास्ते में ही प्रकिर्णित हो जाते है।
जिससे हमें उगता हुआ सूरज और छिपता हुआ सूरज लाल दिखाई देता है।

लाल संकेत (Red signals)

हम देखते है की खतरे का संकेत दिखाने के लिए लाल रंग के संकेत का उपयोग किया जाता है , इतना ही नहीं रेलवे ट्रेक पर लगी बत्ती में भी लाल रंग का प्रयोग किया जाता है तथा ट्रैफिक लाईट में भी लाल रंग का संकेत का उपयोग होता है ऐसा क्यों ?
लाल रंग के संकेत उपयोग करने का कारण प्रकाश के प्रकीर्णन से स्पष्ट किया जा सकता है।
क्योंकि लाल रंग के संकेतो की तरंग दैर्ध्य सबसे अधिक होती है अत: लाल रंग के संकेतों का प्रकीर्णन सबसे कम होता है और लाल रंग अधिक दूरी तक स्पष्ट दिखाई दे जाते है इसलिए लाल रंग का उपयोग संकेत के रूप में किया जाता है ताकि लोगो को यह अधिक दूरी से ही दिखाई दे जाये।

श्वेत बादल (white clouds)

क्या आप जानते है की बादलों का रंग सफेद क्यों दिखाई देता है ?
हम जानते है की सूर्य का प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना होता है , जब यह प्रकाश किसी बादल से होकर गुजरता है तो इसमें पानी की बंदें होती है जिनकी तरंग दैर्ध्य प्रकाश की तरंग दैर्ध्य से अधिक होती है।
जिससे सभी रंगों का प्रकीर्णन होता है , कुछ रंगों का प्रकीर्णन अधिक होता है और कुछ रंगों का प्रकीर्णन कम होता है और यह प्रकीर्णन अव्यवस्थित रूप से होता है जिससे हमारी आँखे किसी एक रंग को प्रधान नहीं मानती है और हमारी आँखों को बादल सफेद (स्वेत) दिखाई देते है।

पादप जीवन चक्र या पीढ़ी एकान्तरण , अगुणित जीवन चक्र , द्विगुणित , मिश्रित जीवन चक्र Life Cycle

Life Cycle of a Plant in hindi पादप जीवन चक्र या पीढ़ी एकान्तरण : प्रत्येक सजीव के जीवन चक्र में डो प्रकार की पीढियाँ होती है।
अगुणित – युग्मकोद्भिद व द्विगुणित – बीजाणुदभिद।
ये दोनों पीढियाँ एकान्तरण क्रम में पादप के जीवन में आती है , इस प्रक्रिया को पीढी एकान्तरण कहते है , विभिन्न पादप जातियों में निम्न जीवन चक्र पैटर्न पाये जाते है।
1. अगुणित जीवन चक्र : इस प्रकार के जीवन चक्र में मुख्य पादप युग्मकोद्भिद पिढी को निरुपित करता है , जिससे समसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित युग्मको का निर्माण होता है।  युग्मकों के संलयन से द्विगुणित युग्मनज बनता है , जो बीजाणुदभिद पीढ़ी को दर्शाते है।
युग्मनज में अर्द्धसूत्री विभाजन से अगुणित बीजाणु बनते है जो अंकुरित होकर नया पादप बनाते है।
उदाहरण – वोल्वोक्स , स्पाईरोगाइयरा , क्लोमाइडोमानास
2. द्विगुणित जीवन चक्र :
इस प्रकार के जीवन चक्र में मुख्य पादप बीजाणुद्भिद पीढ़ी को निरुपित करता है ,  बीजाणुद्भिद में अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा युग्मको का निर्माण होता है , जो युग्मकोद्भिद पिढी को निरुपित करता है , युग्मको के संलयन से द्विगुणित युग्मनज बनता है जो नए पादप को जन्म देता है।
उदाहरण – जिम्नोस्पर्म , एन्योस्पिर्म
3. अगुणित – द्विगुणित / मिश्रित जीवन चक्र :
इस प्रकार के जीवन चक्र में मुख्य पादप युग्मकोद्भिद पिढी को निरुपित करता है , जिसमें समसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित युग्मक बनते है।  युग्मको के संलयन से द्विगुणित युग्मनज विकसित होता है।  युग्मनज से बीजाणुदभिद का विकास होता है , जो प्रभावी , प्रकाश संश्लेषी संरचना होती है।
इसके तीन भाग पाद , सिटा व केप्सूल होते है , बीजाणुदभिद में अर्द्धसूत्री विभाजन से अगुणित बीजाणु बनते है , बीजाणु अंकुरित होकर नया पादप बनाते है।
उदाहरण – ब्रायोफाइटा , टेरिडोफाइटा

जिम्नोस्पर्म (Gymnosperm) / अनावृत्त बीजी पादप , एंजियो स्पर्श / आवृतबीजी पादप (Gymnosperm) 

जिम्नोस्पर्म (Gymnosperm) / अनावृत्त बीजी पादप :
लैंगिक संरचना :
(a) लघु बीजाणुधानी : पादपों की विशेष पत्तियों पर बीजाणु धानियाँ विकसित होती है , जिन्हें बीजाणुपर्ण कहते है।  बीजाणु पर्ण समूहों में व्यवस्थित होकर शंकु बनाती है।  जिन शंकुओ पर लघु बीजाणु धानी बनती है उन्हें नर शंकु कहते है।
लघु बीजाणु धानियों में परागकण (लघुबीजाणु) उत्पन्न होते है।
सामान्य लक्षण :
1. यह ऐसे पादपों का वर्ग है जिसमें बीज तो बनते है , लेकिन बीज फल भित्ति में बंद नही होते है , इसलिए इन्हें नग्नबीजी या अनावृत्त बीजी पादप कहते है।
2. इनकी लगभग 700 प्रजातियाँ विश्व के सभी स्थानों पर पायी जाती है।
3. पादप शरीर जड़ , तना , पत्ती में विभक्त होता है।
4. जड़ मूसलाधार होती है , ये कवकमूल (पाइनस ) व प्रवाल मूल (साइकस) के रूप में भी होती हैं।
5. इनमे तना अशाखित (साइकस) या शाखित (पाइनस) हो सकता है।
6. पत्तियाँ सरल एवं संयुक्त होती है , पत्तियां ताप , नमी व वायु को सहन कर सकती है।
7. इन पर मोटी क्यूटिकल व गर्तिरन्ध्र होते है।

(b) गुरु बीजाणु धानी

जिस शंकु पर गुरुबीजाणुधानी विकसित होती है , उसे मादा शंकु कहते है। गुरु बीजाणु धानी में बीजाण्ड विकसित होता है , जिसमे मादा युग्कोद्भिद पायी जाती है।
जनन : परिपक्व अवस्था में लघु बीजाणु धानी में परागकण मुक्त होते है तथा वायु परागकण द्वारा बीजाण्ड के छिद्र तक पहुचते है।  परागकण परागनली द्वारा नर युग्मक को अण्डकोशिका तक पहुंचाता है।
जिसे नर युग्मक व अण्डकोशिका का संलयन होता है , परिणामस्वरूप युग्मनज बनता है , युग्मनज विकसित होकर भ्रूण बनाता है , भ्रूण के चारो ओर स्थित बीजांड बीज में बदल जाता है परन्तु यह बीज आवरण रहित होता है।
उदाहरण – साइकस , पाइनस आदि।

एंजियो स्पर्श / आवृतबीजी पादप (Gymnosperm)

सामान्य लक्षण :
1. आवृत बीजी पादप सबसे विकसित व विश्वव्यापी होते है।
2. यह पादपों का सबसे बड़ा वर्ग है , इन्हें पुष्पीपादप भी कहते है।
3. ये छोटे विल्फिया से लेकर 100 मीटर ऊँचे युकेल्पियन तक होते है।
4. इनमें संवहन उत्तक जाइलम व फ्लोएम पाये जाते है।
5. इनका शरीर जड़ , तना , पत्ती में विभेदित होता है।
6. इनमें जड़े मूसलाधार या झकडा होता है।
7. इनका तना शाखित , अशाखित , खोखला या काष्ठीय होता है।
8. पत्तियाँ सरल या संयुक्त प्रकार की होती है।
9. इनमें बीज फलों में स्थित होते है , आवृत होते है।
बीज में स्थित बीजपत्रों की संख्या के आधार पर ये दो प्रकार के होते है।
उदाहरण
  • गेहूँ , बाजरा , मक्का , ज्वार आदि।
  • द्विबीजपत्री पादप : इनके बीज में दो बीज पत्र होते है। उदाहरण – मटर , सेम , चना , मूँग आदि।
लैंगिक लक्षण : आवृतबीजी पादपो में लैंगिक अंग पुष्प होता है , जिसमें नर लैंगिक अंग पुंकेसर व मादा लैंगिक अंग स्त्रीकेसर पाये जाते है।  लैंगिक अंगो की उपस्थिति के आधार पर ये पादप दो प्रकार के होते है।
1. एकलिंगी पादप : इनके पुष्प में एक ही प्रकार का लैंगिक अंग (नर या मादा ) होता है।
2. उभयलिंगी : इनके पुष्प में दोनों लिंग (नर व मादा ) उपस्थित होते है।
स्त्रकेसर के अंडाशय में अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा अण्ड को द्वितीयक केन्द्रक का निर्माण होता है।
पुंकेसर के परागकोश में अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा परागकणों का निर्माण होता है।
जनन : परिपक्कव परागकोष के स्फुटन से परागकण मुक्त होते है जो स्वपरागण या परपरागकण द्वारा जायांग के वतिकाग्र पर पहुचते है।  परागकण अंकुरित होकर पराग नलिका बनाते है , जिसमें डो नर युग्मक होते है , परागनलिका बीजाण्ड में प्रवेश कर फट जाती है जिससे नरयुग्मक मुक्त हो जाते है , एक नर युग्मक अण्डकोशिका से संलयन कर भ्रूण बनाता है , दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केन्द्रक से संलयन कर भ्रूणपोष बनाता है।  बीजाण्ड बीज विकसित होता है तथा अंडाशय फल में बदल जाता है।
उदाहरण – आम , नीम , घास आदि।

लिवरवर्ट क्या है , परिभाषा , टेरिडोफाइटा Liverworts in hindi , Pteridophytes , उदाहरण

लिवरवर्ट (Liverworts in hindi ) :

ये प्राय नम , छायादार , दलदल , गिली मिट्टी व पेड़ो की छाल में पाये जाते है।
पादप शरीर थैलस के रूप में होता है।
इनमें पत्ती समान संरचनाएँ पायी जाती है , जो तने समान संरचना पर कतारों में लगी रहती है।
कायिक जनन विखंडन द्वारा होता है।
अलैंगिक जनन बहुकोशिकीय विशिष्ट संरचना जेमा कप द्वारा होता है।
लैंगिक जनन युग्मको के संलयन द्वारा होता है।  लैंगिक अंग एक या अलग अलग पादपों पर विकसित होते है।  नर लैंगिक अंग पुधानी में पुमंग तथा मादा लैंगिक अंग स्त्रीधानी में अण्डकोशिका बनती है।
पुमंग व अंड कोशिका के संलयन से  बीजाणुद्भिद विकसित होता है जो पाद , सिटा व केप्सूल में विभेदित होता है।  बीजाणुद्भिद में अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा बीजाणु बनते है , जो अंकुरित होकर नया पादप बनाते है।
उदाहरण – मार्केन्शिया।
इसकी युग्मकोद्भिद अवस्था प्रभावी होती है , जिसकी 2 संरचनात्मक अवस्थाएँ होती है।
प्रथम अवस्था विसर्पी , हरी , शाखित तथा तन्तुमय होती है।
दूसरी अवस्था पत्ती के समान होती है इसमें एक सीधा पतला , तने के समान संरचना होती है जिस पर सर्पिल रूप में पत्तियाँ लगी रहती है।
मूलाय बहुकोशिकीय व शाखित होते है।
कायिक जनन विखंडन या मुकुलन द्वारा होता है।
लैंगिक जनन लीवरवर्ट के समान होता है।
उदाहरण – प्युनेरिया , पॉलीट्राइकम , स्फेगमन आदि।

टेरिडोफाइटा (Pteridophytes in hindi )

1. ये प्रथम संवहनी अपुष्पी , स्थलीय पादपों का समूह है।
2. 350 मिलियन वर्ष पूर्व ये प्रभावी वनस्पति के रूप में उपस्थित थे।
3. इन्हें हॉर्टटेल या फर्न भी कहते है।
4. ये ठण्डे , गीले , नम व छायादार स्थानों पर पाये जाते है।
5. मुख्य पादप बीजाणुदभिद होता है , पादप शरीर जड़ , तना , पर्ण , पत्ती में विभक्त होता है।
6. इनमे संवहन उत्तक (जाइलम , फ्लोएम ) पाये जाते है परन्तु जाइलम में वाहिकाएं व फ्लोएम में सहकोशिकाएं अनुपस्थित होती है।
7. इन पादपों में पुष्प व बीज नहीं बनते है अत: इन्हें बीजरहित पादप कहते है।
8. बीजाणु , बीजाणुधानियो में विकसित होते है , बिजाणुधानियाँ विशेष प्रकार की पत्तियों पर बनती है जिन्हें बिजाणुपर्ण कहते है।
9. बीजाणुपर्ण सघन व समूह में होती है जिन्हें शंकु कहते है।
10. इनमें समबिजाणुता या विषमबीजाणुता पायी जाती है।
11. युग्मकोद्भिद अवस्था हरी स्वपोषीत तथा बहुकोशिकीय संरचना होती है।
12. युग्मकोद्भिद पर नर जननांग पुधानी व स्त्री जननांग स्त्रीधानी उत्पन्न होते है।
13. पुधानी में पुमंग व स्त्रीधानी में अंड कोशिकीय का विकास होता है।
जनन :  1. कायिक जनन – प्रकन्द शाखाओं के अलग अलग होने से नया पादप बनता है।
2. अलैंगिक जनन – बीजाणु द्वारा।
3. लैंगिक जनन – पुधानी में बने पुन्मणु व स्त्रीधानी में बने अण्डकोशिका के संलयन से युग्मनज बनता है।
युग्मनज से एक नया शैशव भ्रूण विकसित होता है , यह घटना टेरिडोफाइटा को बीजी प्रकृति की ओर ले जाती है।
टेरिडोफाइटा को चार वर्गों में बांटा गया है –
1. साइलोपसीडा : इनमें पत्तियाँ अनुपस्थित होती है ये जीवाश्म के रूप में पाये जाते है।
2. लाइकोपसीडा : इनमें पत्तियाँ उपस्थित व छोटी होती है।
उदाहरण – लाइकोपोडियम , सिलेजिनेला
3. स्फिनापसिडा : इनमें पत्तियाँ छोटी व तना खोखला होता है।
उदाहरण – इक्वीसीटम
4. टीरोपसिडा : इनकी पत्तियाँ बड़ी तथा ये फर्न कहलाते है।
उदाहरण – टेरिडियम , डायोप्टेरिस , टेरिस।
आर्थिक महत्व : सजावटी पौधे के रूप में उगाया जाता है।

ब्रायोफाइटा क्या है , परिभाषा , उदाहरण , गुण , लक्षण bryophytes in hindi

ब्रायोफाइटा (bryophytes in hindi) : ब्रायोफाइट्स प्रथम स्थलीय पादप है।

ब्रायोफाइटा को पादप जगत के उभयचर भी कहा जाता है क्योंकि ये भूमि पर जीवित रहते है , परन्तु लैंगिक जनन के लिए जल पर निर्भर होते है।

ये नम , छायादार पहाड़ियों पर पुरानी व नम दीवारों पर पाये जाते है।

इनका शरीर थैलस के रूप में होता है , इनमें जड़ के समान मुलाभास , तनासम तने के समान , पत्ती के समान पत्तीसम संरचनाएँ पायी जाती है।

इनमें वास्तविक संवहन उत्तको का अभाव होता है।

मुख्य पादप युग्मको दृभिद पीढ़ी पर आश्रित होती है।

कायिक जनन विखंडन द्वारा होता है।

लैंगिक जनन : अगुणित युग्मकोद्भिद पादप में नर लैंगिक अंग को पुंधानी कहते है।  जिसमे समसूत्री विभाजन द्वारा पुमंग बनते है , जो अगुणित होते है।  मादा लैंगिक अंग स्त्रीधानी कहलाते है।  जिनमे अगुणित अण्ड बनता है।  पुमंग व अण्ड के संलयन से युग्मनज बनता है।

युग्मनज से एक बहुकोशिकीय बिजानुभिद विकसित होता है जो द्विगुणित होता है तथा पाद , सिटा व कैप्सूल में विभक्त होता है।  बीजाणुभिद में अर्द्धसूत्री विभाजन से अगुणित बीजाणु बनते है जो अंकुरित होकर अगुणित नया पादप बनाते है।

ब्रायोफाइटा का आर्थिक महत्व

1. कुछ मांस को साह्कारी स्तनधारी भोजन के रूप में ग्रहण करते है।
2. स्फेगमन व अन्य जाति के ब्रायोफाइटा को ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
3. इनमें पानी रोकने की क्षमता होती है इसलिए पैकिंग व सजीवो के स्थानान्तरण में उपयोग किया जाता है।
4. ये अनुक्रमण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।
5. ये मृदा अपरक्षण को रोकते है।

वनस्पति जगत क्या है , परिभाषा , शैवाल (Algae in hindi ) , क्लोरोफाइसी , फियोफाइसी , रोडोफाइसी

वनस्पति जगत (plant kingdom in hindi  )
1. कृत्रिम वर्गीकरण : थ्रियोफ्रेस्ट्स , सिसलपिनो व केरोल्स लिनियस का वर्गीकरण कृत्रिम वर्गीकरण पर आधारित है।  इस वर्गीकरण में कृत्रिम गुणों को ध्यान में रखा गया है।  इस वर्गीकरण में कई पादप समानताएँ रखते हुए भी दूर के वर्गों में रख दिए जाते है तथा कई जीव असमानताएं रखते हुए भी पास पास रख दिए जाते है। 2. प्राकृतिक वर्गीकरण –  यह वर्गीकरण जीवों के प्राकृतिक गुणों के साथ साथ आंतरिक गुणों जैसे शरीर संरचना , भ्रूण विकास , पादप संरचना व रसायन को भी ध्यान में रखा जाता है।  बैथम व हुकर द्वारा प्रस्तुत वर्गीकरण पूर्णतया प्राकृतिक वर्गीकरण है।
3. जातिवृतीय वर्गीकरण – यह वर्गीकरण पादपों के विकासात्मक तथा आनुवांशिक सम्बन्धो पर आधारित है।  इस वर्गीकरण में कोशिका विज्ञान , सीरम विज्ञान भ्रूण विज्ञान , शारीरिकी की सहायता ली जाती है।  ओसवोल्ड रिप्पो , आइकलर , तख्ताजन आदि वैज्ञानिको का वर्गीकरण जाति वृतीय वर्गीकरण माना जाता है।

शैवाल (Algae in hindi )

शैवाल पर्णहरित युक्त सरल , संवहन उत्तक रहित थैलोफाइट्स है।  जिनमे वास्तविक जड़ , तना , पत्तियों का अभाव होता है।
आवास : ये लवणीय व अलवणीय जल में , नमीयुक्त दीवारों , गीली मिटटी , लकड़ी व कीचड़ युक्त तालाबों में पाये जाते है।  कुल शैवाल कवको (लाइकेन) तथा प्राणियों (स्लॉथ रीछ) में सहजीवन के रूप में भी पाये जाते है।
संरचना : इनका शरीर थैलस (सुकाय ) के रूप में होता है।
ये एक कोशिकीय (क्लेमाइडोमोनास ) , या बहुकोशिकीय (वोल्वोक्स ) , तन्तुमय (यूलोथ्तिक्स , स्पाइरोगाइरा  ) प्रकार का होता है।
अधिकांश शैवाल यूकेरियोटिक होते है परन्तु नील – हरित शैवाल प्रोकेरियोटिक होता है।
इनकी कोशिका भित्ति सेलुलोस व पेक्टिन की बनी होती है।
शैवालो में सामान्यतया क्लोरोफिल , केरोटिन , जेंथोफिल , फाइकोसायनिन , फाइकोइरिब्तिन आदि वर्णक होते है।
पोषण : शैवाल स्वपोषी होते है ,भोजन का संचय स्टार्च के रूप में करते है।
जनन : कायिक जनन विखण्डन द्वारा , अलैंगिक जनन चल बीजाणुओ (जुस्पोर ) द्वारा तथा लैंगिक युग्मको के संलयन से होता है।
शैवालों में युग्मक समयुग्मकी (कलेमाइडोमोनास ) व असमयुग्मकी (वोल्वोक्स ) प्रकार के होते है।
आर्थिक महत्व :
1. कार्बन डाई ऑक्साइड का आधा भाग प्रकाश संश्लेषण द्वारा शैवाल स्थिर करते है तथा ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाते है।
2. एनाबिना , नॉस्टॉक आदि शैवाल नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर नाइट्रेट व नाइट्राइड बनाकर भूमि की उर्वरक क्षमता बढ़ाते है।
3. पोरफायरा , ग्रेसीलेरिया , लैमीनेरिया , सरगासम आदि शैवालों का उपयोग भोजन के रूप में किया जाता है , जेलिडियम , ग्रेसिलेरिया नामक शैवालों से प्राप्त अगर अगर का उपयोग जैली व आइसक्रीम बनाने में किया जाता है।
4. क्लोरेला में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन व विटामिन होते है , जिसका उपयोग अन्तरिक्ष यात्री भोजन के रूप में करते है।
शैवालों को तीन भागो में बांटा गया है।

1. क्लोरोफाइसी (Chlorophyceae)

सामान्य लक्षण :
  • ये हरे शैवाल होते है , इन्हें समुद्री घास पात भी कहते है।
  • आवास : ये लवणीय व अलवणीय जल में , गीली मिट्टी में पाये जाते है।
  • संरचना : ये एककोशिकीय अथवा तन्तुमय बहुकोशिकीय हो सकते है।
  • इनकी कोशिका भित्ति सेलुलोस व पेक्टोज की बनी होती है।
  • इनमें क्लोरोफिल a व b दोनों पाये जाते है।
  • क्लोरोप्लास्ट , प्लेट , सर्पिल , अण्डाकार डिस्क या रिबन के आकार के हो सकते है।
  • क्लोरोप्लास्ट में एक या अधिक पाइरीनॉइड होते है जो स्टार्च के कण है।
  • कायिक जनन विखंडन द्वारा होता है।
  • अलैंगिक जनन चल बीजाणुओं (जुस्पोर) द्वारा होता है।
  • अलैंगिक जनन युग्मको के संलयन द्वारा होता है।
उदाहरण – क्लेमाइडोमोनास , यूलोथीक्रस , स्पाइरोगायरा , वोल्वोक्स

2. फियोफाइसी (phaeophyceae)

सामान्य लक्षण :
  • इन्हें भूरे शैवाल भी कहते है।
  • ये मुख्यतः समुद्री आवास में पाये जाते है।
  • इनका शरीर सरल , शाखित , तन्तुमय व थेल्स के रूप में होता है।
  • इनमें क्लोरोफिल A व C के रेटिनॉइड , प्यूफोजेन्थीज व जेंथोफिल होते है।
  • इनकी कोशिका भित्ति सेलुलोस की बनी होती है जिसका जिलेटिन स्तर एल्जिन का बना होता है।
  • इनमें एक तन्तु तथा पत्ती के समान प्रकाश संश्लेषी प्रपर्ण पाये जाते है।
  • ये स्वपोषी होते है , कार्बोहाइड्रेट को मेथियेल या लेमिनेरियन के रूप में संचित करते है।
  • जनन , कायिक जनन – विखंडन द्वारा
अलैंगिक जनन – चल बीजाणुओं द्वारा
लैंगिक जनन – युग्मको के संलयन द्वारा
उदाहरण – एक्टोकोप्सि , डिक्टयोटा , लेमिनेरिया , सर्गासम , प्युकस आदि।

3. रोडोफाइसी (Rhodophyceae)

सामान्य लक्षण :
  • इन्हें लाल शैवाल भी कहते है क्योंकि लाल रंग आर फाइकोइरिथ्रिन वर्णक के कारण होता है।
  • ये समुद्र के गर्म व अँधेरे (कम प्रकाश वाले स्थानों पर पाये जाते है )
  • शरीर थैलस व बहुकोशिकीय होता है।
  • कोशिका भित्ति पोलीसेकेराइड की बनी होती है।
  • ये स्वपोषी होते है तथा भोजन का संचय प्लोरिडीयन स्टार्च के रूप में करते है।

जनन :  कायिक जनन – विखंडन द्वारा

अलैंगिक जनन – चल या अचल बीजाणुओं द्वारा
लैंगिक जनन – युग्मको के संलयन द्वारा
उदाहरण – पोलीसाइफोनिया , पोरफायरा , जिलेडियम आदि।

उभयचर (Amphibians) क्या है , परिभाषा , उदाहरण , लक्षण , रेप्टीलिया (Reptile) / सरीसृप ,  वर्ग – एवीज (ebiz)

वर्ग – उभयचर (Amphibians in hindi)

सामान्य लक्षण :
1. ये जल व थल दोनों आवासों में रह सकते है इसलिए ये उभरचर (Amphibians) कहलाते है।
2. इनका शरीर सिर ,धड व पूंछ में विभेदित होता है।
3. इनमें गमन हेतु दो जोड़ी पैर पाये जाते है।
4. इनकी त्वचा नम व लसलसी होती है।
5. नेत्र पलक युक्त , बाह्य कर्ण अनुपस्थित , निमेषक पटल व कर्ण पट्ट उपस्थित होते है।
6. इनकी आहार नाल , मूत्राशय व जनन मार्ग एक ही कोष्ठ में खुलते है।
7. इनमें श्वसन त्वचा , क्लोम व फेफड़ो द्वारा होता है।
8. इनका ह्रदय तीन कोष्ठीय (2 आलिन्द , 1 निलय ) होता है।
9. ये असमतापी , एकलिंगी प्राणी है।
10. इनमें बाह्य निषेचन , परिवर्धन अप्रत्यक्ष तथा कुछ में प्रत्यक्ष प्रकार का होता है।
11. इनके लार्वा को रेडपोल कहते है।
उदाहरण – बूफो (टोड) , रानाट्रिगिना (भारतीय मेंढक ) , हायला (वृक्ष मेंडक ), सेलामेण्डर , इक्थियोफिस (पाद रहित उभय चर )

वर्ग – रेप्टीलिया (Reptile) / सरीसृप

 सामान्य लक्षण
1. अधिकांश सदस्य स्थलीय , कुछ जलीय होते है।
2. शरीर , सिर , धड़ , पूछ व गर्दन में विभेदित होता है।
3. शरीर पर शल्क उपस्थित होते है जो  केरेटिन के बने होते है।
4. बाह्य कर्ण अनुपस्थित कर्ण परह उपस्थित होते है।
5. दो जोड़ी पैर उपस्थित होते है , कुछ में पैर अनुपस्थित होते है।
6. इनका अंत: कंकाल अस्थियो का बना होता है।
7. कुछ सदस्यों में रंग बदलने की क्षमता पायी जाती है।
8. इनमें सुविकसित दांत व शक्तिशाली जबड़े होते है।
9. इनका हृदय 3 कोष्ठीय होता है परन्तु मगरमच्छ में 4 कोष्ठीय हृदय होता है।
10. सर्प व छिपकली में केंचुएल के रूप शल्क छोड़ने की क्षमता होती है।
11. ये असमतापी व एकलिंगी प्राणी होते है।
12. इनमें निषेचन आंतरिक , परिवर्धन प्रत्यक्ष तथा अण्डज होते है।
उदाहरण – किलोन (टर्टल ) , हेमीडेक्तायलस (घरेलू छिपकली) , नाजा (कोबरा ) , वाइपर , क्रोकोडाइलस (घड़ियाल ) , केमिलीयोन (वृक्ष छिपकली )

 वर्ग – एवीज (ebiz)

सामान्य लक्षण –
1. इस वर्ग के सदस्य सभी प्रकार के आवास में पाये जाते है।
2. इनका शरीर वायवीय वातावरण के अनुकूल होता है।
3. इनका शरीर सिर , गर्दन , धड व पूंछ में विभेदित होता है।
4. इनकी त्वचा पर पिच्छ (फर) पाये जाते है।
5. इनमें 2 जोड़ी पैर होते है , आगे के पैर पंखो में रूपान्तरित है जो उड़ने में सहायक है।
6. पश्च पैरो पर शल्क पाये जाते है।
7. इनकी त्वचा शुष्क होती है क्योंकि ग्रंथियों का अभाव होता है परन्तु पूंछ के आधार पर तेल ग्रन्थियां पायी जाती है।
8. इनका अन्त: कंकाल अस्थियों का बना होता है जिनमें वायु भरी रहती है जो उड़ने में सहायक है।
9. श्वसन हेतु एक जोड़ी फेफडे पाये जाते है।
10. इनमें बाह्य कर्ण उपस्थित परन्तु कर्ण पल्लव अनुपस्थित होते है।
11. इनमे ह्रदय 4 कोष्ठीय (दो आलिन्द , 2 निलय ) होता है।
12. इनके नेत्रों में निमेषक झिल्ली उपस्थित होती है।
13. ये समतापी व एकलिंगी प्राणी है।
14. इनमें लैंगिक द्विरूपता पायी जाती है।
15. इनमें दांत अनुपस्थित , चोच उपस्थित तथा पाचन हेतु पेषणी पायी जाती है।
16. ये सभी अण्डज तथा परिवर्धन प्रत्यक्ष प्रकार का होता है।
17. इनमे पैतृक रक्षक पाया जाता है।
18. इनमे ध्वनी उत्पादक यन्त्र (स्विरिंक्स ) उपस्थित होता है।
उदाहरण – कार्वस (कौआ ) , पैवो (मोर ) , सिटीकुला (तोता ) , कोलुम्बा (कबूतर ) , स्टुयिओ (ओस्ट्रीच)

वर्ग – स्तनधारी :

1. इस वर्ग के सदस्य सभी प्रकार के आवास में रहते है।

2. इनका शरीर , सिर , गर्दन , धड व पूछ में विभेदित होता है।

3. इनकी त्वचा में कई ग्रंथियाँ जैसे वेल व स्वेद गंथियाँ पायी जाती है।

4. इनकी त्वचा पर रोम पाये जाते है।

5. इन जन्तुओं में एक या अधिक जोड़ी स्तन पाये जाते है , जिनके द्वारा अपने शिशुओं को स्तन पान करवाते है।

6. इनमें गमन हेतु दो जोड़ी पैर उपस्थित होते है।

7. इनमे उत्सर्जन हेतु वृक्क पाये जाते है।

8. ये एकलिंगी व समतापी प्राणी है।

9 . ये जरायूज तथा परिवर्धन प्रत्यक्ष प्रकार का होता है।

10. इनमें पैतृक रक्षण पाया जता है।

उदाहरण – होमोसेपियन्स (मानव ) , केनिस (कुत्ता ) , फेनिस (बिल्ली ) , मकाका (बन्दर ) , लिओ (शेर ) , रैटून्थ (चूहा ) , केमिल (ऊंट ) , बाघ , गाय , भैंस , हिरन

 

यूरोकॉड्रेटा / ट्युनिकेटा , सैफेलोकॉड्रेटा , वर्ग – साइक्लोस्टेमिटा , वर्रीब्रेटा महावर्ग – पिसीज  वर्ग – कोंड्रीक्थिंज

संघ – यूरोकॉड्रेटा / ट्युनिकेटा :
1. इन्हे सामान्यत: प्रोटोकॉड्रेटा कहते है।
2. ये समुद्रवासी होते है।
3. इन जन्तुओं में पृष्ठ रज्जु केवल लार्वा की पुंछ में पायी जाती है।  इसलिए इन्हे यूरोकॉड्रेटा कहते है।
उदाहरण – एनसीडिया , सैल्फा।

सैफेलोकॉड्रेटा

1. इन्हें भी सामान्यत: प्रोटोकॉड्रेटा कहते है।
2. ये समुद्रवासी होते है।
3. इन जन्तुओं में पृष्ठ रज्जु सिर से पूँछ तक आजीवन रहती है।
उदाहरण – एम्फीऑक्सस (Amphioxus)
वर्रीब्रेटा :-

वर्ग – साइक्लोस्टेमिटा

सामान्य लक्षण :
1. इस वर्ग के सदस्य समुद्री होते है , परन्तु जनन के लिए जल वर्णीय जल में प्रवास करते है।
2. कुछ सदस्य मछलियों के परजीवी होते है।
3. शरीर लम्बा तथा बिना जबड़ो का चुम्बक रूपी गोल मुख होता है।
4. इनमे श्वसन हेतु 6-15 जोड़ी क्लोम दरारें होती है।
5. शरीर पर शल्क व पंख अनुपस्थित होते है।
6. इनमे कपाल व मेरुदण्ड उपस्थित होती है।
7. परिसंचरण तन्त्र बंद प्रकार का होता है।
8. ये एकलिंगी , बाह्य निषेचन तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन करने वाले प्राणी है।
9. लार्वा कायान्तरण के बाद समुद्र में लौट जाते है।
उदाहरण – पैट्रोमाइजॉन (लैम्प्रे) , मिक्सिन (हैग फिश)
वर्रीब्रेटा :-
महावर्ग – पिसीज 
वर्ग – कोंड्रीक्थिंज
सामान्य लक्षण –
1. ये समुद्रवासी मछलियाँ है।
2. इनका अंत: कंकाल उपास्थि का बना होता है।
3. इनका मुख अधर सतह पर होता है।
4. इनमें श्वसन हेतु पांच से सात जोड़ी क्लोम दरारे पायी जाती है , जो ऑपर कुलम से ढकी हुई नही होती है।
5. इनकी त्वचा दृढ व पट्टाम शल्क युक्त होती होती है।
6. इनके जबड़े शक्तिशाली व दांत पीछे की और मुड़े होते है।
7. इनमें वायुकोष अनुपस्थित होते है , अत: लगातार तैरती रहती है।
8. इनमे ह्रदय द्विकोष्ठीय होता है।
9. इनके कुछ सदस्यों में विद्युत अंग पाये जाते है , जैसे – टोरपिड़ो तथा कुछ सदस्यों में विषदंत पाये जाते है जैसे ट्राईयगोन
10. ये असमतापी , एकलिंगी प्राणी होते है।
11. इनमे निषेचन आंतरिक तथा जरायुज मछलियाँ होती है।
उदाहरण – स्कॉलियोडोन , प्रिस्टिस (आरा मछली ) , ट्रायगोन , टॉरपिडो (विद्युत मछली) , कारकेरोडॉन (सफ़ेद सार्क )

वर्ग – ऑस्टि कथींज

1. ये मछलियाँ दोनों प्रकार के जल (लवणीय व अलवणीय) में पायी जाती है।
2. इनका अंत: कंकाल अस्थियों का बना होता है।
3. इनका मुख अग्र शिरे पर स्थित होता है।
4. इनमे श्वसन हेतु चार जोड़ी क्लोम दरारे पायी जाती है , जो ऑपर कुलम से ढकी होती है।
5. इनमें वायुकोष उपस्थित होते है जो तैरने में सहायक होते है।
6. इनकी त्वचा पर साइक्लोइड प्रकार के शल्क पाये जाते है।
7. इनमें ह्रदय द्विकोष्ठीय होता है।
8. ये असमतापी , एकलिंगी , अंडज प्राणी है।
9. इनमे बाह्य निषेचन व प्रत्यक्ष परिवर्धन होता है।
उदाहरण – एक्सोसिट्स (उडन मछली )
हिपोकेम्पस (समुद्री छोड़ा )
लेम्बियो (रोहू ) , कतला आदि।