उभयचर (Amphibians) क्या है , परिभाषा , उदाहरण , लक्षण , रेप्टीलिया (Reptile) / सरीसृप ,  वर्ग – एवीज (ebiz)

वर्ग – उभयचर (Amphibians in hindi)

सामान्य लक्षण :
1. ये जल व थल दोनों आवासों में रह सकते है इसलिए ये उभरचर (Amphibians) कहलाते है।
2. इनका शरीर सिर ,धड व पूंछ में विभेदित होता है।
3. इनमें गमन हेतु दो जोड़ी पैर पाये जाते है।
4. इनकी त्वचा नम व लसलसी होती है।
5. नेत्र पलक युक्त , बाह्य कर्ण अनुपस्थित , निमेषक पटल व कर्ण पट्ट उपस्थित होते है।
6. इनकी आहार नाल , मूत्राशय व जनन मार्ग एक ही कोष्ठ में खुलते है।
7. इनमें श्वसन त्वचा , क्लोम व फेफड़ो द्वारा होता है।
8. इनका ह्रदय तीन कोष्ठीय (2 आलिन्द , 1 निलय ) होता है।
9. ये असमतापी , एकलिंगी प्राणी है।
10. इनमें बाह्य निषेचन , परिवर्धन अप्रत्यक्ष तथा कुछ में प्रत्यक्ष प्रकार का होता है।
11. इनके लार्वा को रेडपोल कहते है।
उदाहरण – बूफो (टोड) , रानाट्रिगिना (भारतीय मेंढक ) , हायला (वृक्ष मेंडक ), सेलामेण्डर , इक्थियोफिस (पाद रहित उभय चर )

वर्ग – रेप्टीलिया (Reptile) / सरीसृप

 सामान्य लक्षण
1. अधिकांश सदस्य स्थलीय , कुछ जलीय होते है।
2. शरीर , सिर , धड़ , पूछ व गर्दन में विभेदित होता है।
3. शरीर पर शल्क उपस्थित होते है जो  केरेटिन के बने होते है।
4. बाह्य कर्ण अनुपस्थित कर्ण परह उपस्थित होते है।
5. दो जोड़ी पैर उपस्थित होते है , कुछ में पैर अनुपस्थित होते है।
6. इनका अंत: कंकाल अस्थियो का बना होता है।
7. कुछ सदस्यों में रंग बदलने की क्षमता पायी जाती है।
8. इनमें सुविकसित दांत व शक्तिशाली जबड़े होते है।
9. इनका हृदय 3 कोष्ठीय होता है परन्तु मगरमच्छ में 4 कोष्ठीय हृदय होता है।
10. सर्प व छिपकली में केंचुएल के रूप शल्क छोड़ने की क्षमता होती है।
11. ये असमतापी व एकलिंगी प्राणी होते है।
12. इनमें निषेचन आंतरिक , परिवर्धन प्रत्यक्ष तथा अण्डज होते है।
उदाहरण – किलोन (टर्टल ) , हेमीडेक्तायलस (घरेलू छिपकली) , नाजा (कोबरा ) , वाइपर , क्रोकोडाइलस (घड़ियाल ) , केमिलीयोन (वृक्ष छिपकली )

 वर्ग – एवीज (ebiz)

सामान्य लक्षण –
1. इस वर्ग के सदस्य सभी प्रकार के आवास में पाये जाते है।
2. इनका शरीर वायवीय वातावरण के अनुकूल होता है।
3. इनका शरीर सिर , गर्दन , धड व पूंछ में विभेदित होता है।
4. इनकी त्वचा पर पिच्छ (फर) पाये जाते है।
5. इनमें 2 जोड़ी पैर होते है , आगे के पैर पंखो में रूपान्तरित है जो उड़ने में सहायक है।
6. पश्च पैरो पर शल्क पाये जाते है।
7. इनकी त्वचा शुष्क होती है क्योंकि ग्रंथियों का अभाव होता है परन्तु पूंछ के आधार पर तेल ग्रन्थियां पायी जाती है।
8. इनका अन्त: कंकाल अस्थियों का बना होता है जिनमें वायु भरी रहती है जो उड़ने में सहायक है।
9. श्वसन हेतु एक जोड़ी फेफडे पाये जाते है।
10. इनमें बाह्य कर्ण उपस्थित परन्तु कर्ण पल्लव अनुपस्थित होते है।
11. इनमे ह्रदय 4 कोष्ठीय (दो आलिन्द , 2 निलय ) होता है।
12. इनके नेत्रों में निमेषक झिल्ली उपस्थित होती है।
13. ये समतापी व एकलिंगी प्राणी है।
14. इनमें लैंगिक द्विरूपता पायी जाती है।
15. इनमें दांत अनुपस्थित , चोच उपस्थित तथा पाचन हेतु पेषणी पायी जाती है।
16. ये सभी अण्डज तथा परिवर्धन प्रत्यक्ष प्रकार का होता है।
17. इनमे पैतृक रक्षक पाया जाता है।
18. इनमे ध्वनी उत्पादक यन्त्र (स्विरिंक्स ) उपस्थित होता है।
उदाहरण – कार्वस (कौआ ) , पैवो (मोर ) , सिटीकुला (तोता ) , कोलुम्बा (कबूतर ) , स्टुयिओ (ओस्ट्रीच)

वर्ग – स्तनधारी :

1. इस वर्ग के सदस्य सभी प्रकार के आवास में रहते है।

2. इनका शरीर , सिर , गर्दन , धड व पूछ में विभेदित होता है।

3. इनकी त्वचा में कई ग्रंथियाँ जैसे वेल व स्वेद गंथियाँ पायी जाती है।

4. इनकी त्वचा पर रोम पाये जाते है।

5. इन जन्तुओं में एक या अधिक जोड़ी स्तन पाये जाते है , जिनके द्वारा अपने शिशुओं को स्तन पान करवाते है।

6. इनमें गमन हेतु दो जोड़ी पैर उपस्थित होते है।

7. इनमे उत्सर्जन हेतु वृक्क पाये जाते है।

8. ये एकलिंगी व समतापी प्राणी है।

9 . ये जरायूज तथा परिवर्धन प्रत्यक्ष प्रकार का होता है।

10. इनमें पैतृक रक्षण पाया जता है।

उदाहरण – होमोसेपियन्स (मानव ) , केनिस (कुत्ता ) , फेनिस (बिल्ली ) , मकाका (बन्दर ) , लिओ (शेर ) , रैटून्थ (चूहा ) , केमिल (ऊंट ) , बाघ , गाय , भैंस , हिरन

 

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