वीर तेजाजी का जन्म कब हुआ था | लोक देवता वीर तेजाजी का जन्म कहाँ हुआ veer tejaji in hindi

By   March 1, 2021

veer tejaji in hindi वीर तेजाजी का जन्म कब हुआ था | लोक देवता वीर तेजाजी का जन्म कहाँ हुआ ?

प्रश्न: वीर तेजाजी

उत्तर: 11वीं सदी के नागौर में जन्में (खरनाल) के तेजाजी जाट ने गौरक्षार्थ अपने प्राण न्यौछावर कर राजस्थान के लोकदेव मण्डल में अपना स्थान बनाया। ये गायों के मुक्तिदाता व सपों के देवता के रूप में पूजनीय हैं। इनमें लोगों का इतना विश्वास है कि सांप या कत्तों का काटा हुआ पशु या नर-नारी इनकी मनौती लेने पर जीवित हो जाता है। कषकों द्वारा तेजाजी के गीतों के साथ बुवाई करना, परबतसर सहित अनेक स्थानों पर मेले भरना एवं इनकी पूजा करना इनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।

प्रश्न: संत जसनाथ जी
उत्तर: 15वीं सदी के कतरियासर (बीकानेर) के जसनाथजी जाट ने शैव धर्म के सिद्ध सम्प्रदाय की 36 नियमों पर आधारित ज्ञानमागी निर्गुण जसनाथी सम्प्रदाय की स्थापना की। इनके उपदेश ‘सिंभूधडा‘ एवं ‘कोंडा ग्रंथों‘ में संग्रहित हैं। उन्होंने अपनी वाणी में निर्गुण निरंकार ब्रह्म की उपासना, कर्म फल की मान्यता, बाह्म आडम्बरों, पशुबलि, मांस-मदिरा सेवन आदि का विरोध और भक्ति आंदोलन को सुदृढ़ आधार दिया। जसनाथी सिद्धों का अग्नि नृत्य, अद्वितीय है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी मुख्यतया जाट हैं। बीकानेर अचंल में इस संप्रदाय का प्रभाव अधिक है।
प्रश्न: संत जाम्भोजी 
उत्तर: 15वीं सदी के पीपासर (नागौर) के जाम्भोजी पंवार ने निर्गुण भक्ति परम्परा की एक शाखा स्थापित कर बीस़नौ (291 नियमों का प्रतिपादन किया जिनके अनुसरण करने वाले बिश्नोई कहलाये। उनके उपदेश ‘सबद वाणी‘, ‘जम्भसागर‘ आदि ग्रंथों में संग्रहित हैं। उन्होंने उस युग की साम्प्रदायिक संकीर्णता, प्रथाओं, कुरीतियों, अंधविश्वासों, नैतिक पतन के वातावरण से सामाजिक दशा सुधारने एवं आत्मबोध द्वारा कल्याण के मार्ग को अपनाया। पशु एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए यह सम्प्रदाय विशेष रूप से जाना जाता है। पश्चिमी राजस्थान में जाट समुदाय में इसका प्रभाव अधिक है।
प्रश्न: संत मावजी, डूंगरपुर
उत्तर: वागड़ प्रदेश के संत मावजी का जन्म साबला ग्राम (डूंगरपुर) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। सन् 1727 में इन्हें बैणेश्वर स्थान पर ज्ञान प्राप्त हुआ। बैणेश्वर धाम की स्थापना संत मावजी ने ही करवाई। इनका प्रमुख मंदिर एवं पीठ माही तट पर साबला गाँव में है। ये वहाँ श्री कृष्ण के निष्कलंकी अवतार के रूप में प्रतिष्ठापित हैं। इन्होंने वागड़ी भाषा में कृष्ण लीलाओं की रचना की। इनकी वाणी श्चोपड़ाश् कहलाती है। संत मावजी भारतीय संत परम्परा के उन संतों में आते हैं, जिन्होंने निर्गुण एवं सगुण का समन्वय कर सहज भक्ति के सर्वग्राह्य मार्ग की प्रतिष्ठा की।
प्रश्न: संत सुन्दरदास जी के उपदेशों का वर्णन कीजिए 
दादू पंथ के सर्वप्रथम संत एवं नागा शाखा के प्रवर्तक संत सुन्दरदास जी का जन्म दौसा में हुआ। इन्होंने निर्गुण भक्ति पर 42 ग्रंथों की रचना की जिनमें ज्ञान समुद्र, बावनी, बारह अष्टक, सवैया आदि श्रेष्ठ रचनाएं हैं। संत कवियों में एकमात्र सुशिक्षित व काव्य मर्मज्ञ रचनाकार थे। इनकी कृतियों में धर्मोपदेश व निर्गुण भक्ति काव्यत्व का सुन्दर सामंजस्य है। इन्होंने प्रेम व नैतिकता, जाति-पाति की निस्सारता एवं सत्य व संयमित जीवन पर जोर दिया।
प्रश्न: संत राना बाई 
उत्तर: इनका जन्म मारवाड़ के हरनावा (मकराना के पास) गांव में वैशाख शुक्ल तृतीया को 1504 में हुआ। इनके दादा का नाम जालम जाट था तथा पिता रामगोपाल थे। माता का नाम गंगाबाई था। खोजीजी महाराज से शिक्षा-दीक्षा ग्रहण करके भक्ति ज्ञान में लीन रहने लगी। पालड़ी गांव में गुरु संत चतुरदास के साथ सत्संग किया करती थी तथा बाद में मथरा वन्दावन आदि की यात्रा की। चुटकी आटा भिक्षा नियम रखा था। वृन्दावन से राधा सहित भगवान गोपीनाथ को हरनावा में स्थापित कर नित्य पूजा पाठ किया। 66 वर्ष की उम्र में हरनावां गांव में फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी को 1570 ई. में जीवित समाधि ली। इसके बाद भाई भुवान जी ने रानीबाई की कच्ची (जीवन्त) समाधि बनवायी। यहाँ प्रतिवर्ष भाटपद शक्ल 13 को एक विशाल मेला आयोजित किया जाता है।
प्रश्न: नन्हीं बाई
उत्तर: खेतडी दरबार की राजगायिका। स्वामी विवेकानन्द जब खेतड़ी पधारे थे तब स्वामीजी ने राजगायिका नन्हीं बाई के गायन को सनने से इनकार कर दिया था तब इस गायिका ने स्वामीजी से कहा कि आप योगी होकर संगीत ब्रह्म के नाद स्वरमय मेरे भक्तिगीत को सुनने की कृपा तो करें। स्वामीजी मान गए और उसने मीरा का पद गाया गया। वह सुना, सुनते हा महाराणा माँ-माँ चिल्ला उठे और उनके मन के अन्दर समाहित ऊँच-नीच का भाव दूर हो चला। खेतड़ी की यह सुप्रसिद्ध गायिका दिल्ली घराने से सम्बन्धित तानरस खाँ की शिष्या बनीं।
प्रश्न: संत मीरा बाई (जन्म 1498 ई.)
उत्तर: कृष्ण भक्त कवयित्री व गायिका मीरा बाई सोलहवीं सदी के भारत के महान संतों में थी। अपनी अगाध एवं माधुर्यभाव कृष्ण भक्ति के कारण यह काफी प्रसिद्ध हुई। इसलिए मीरा को ‘राजस्थान की राधा‘ का सर मेड़ता के राठौड़ राव दूदा के पुत्र रतनसिंह के घर में कडकी (पाली) नामक ग्राम में सालए मीरा को ‘राजस्थान की राधा‘ की संज्ञा दी जाती है। इनका जन्म विवाह सन् 1516 ई. (संवत् 1573). में राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र युवराज भोजराज के साथ हुआ था पर विवाह के कुछ वर्ष (सात वष) पश्चात् ही भोजराज की मृत्यु हो जाने से यह तरुण अवस्था में ही विधवा हो गई। यह बचपन से ही कृष्ण भक्त थी और उनका अधिकांश समय भजन संध्या में बीतता था। मीरा जी की ‘पदावलियाँ प्रसिद्ध है। मीरा की रचनाओं में टीका राग गोविन्द‘, ‘नरसी मेहता की हंडी‘, रुक्मिणी मंगल, गीत गोविन्द अािद प्रमुख है। मीरा की निर्देशन में रतना खाती ने ‘नरसी जी रो मायरो‘ की रचना ब्रज भाषा में की।
लोक देवता
प्रश्न: गोगाजी
उत्तर: मारवाड के पचपीरों में ददेरवा (चूरू) के गोगाजी चैहान (11वीं सदी) राजस्थान के प्रसिद्ध लोक देवता हैं जिन्होंने गोरक्षार्थ एवं मुस्लिम आक्रांताओं से देश रक्षार्थ प्राण न्यौछावर कर देवत्व प्राप्त किया। ये योगी और सिद्ध थे। सांप काटने पर उनके नाम का डोरा बांधना, उनके नाम की राखी विसर्जित करना. भादवा नवमी को पूजा करना तथा गोगामेड़ी व अन्य स्थाना पर उनके नाम पर मेले भरना उनके लोक देवत्व के प्रमाण हैं। अपने त्याग, बलिदान आदि के फलस्वरूप आज भी लोगों के आराध्य देव के रूप में स्वीकार्य है।
प्रश्न: पाबूजी राठौड़
उत्तर: मारवाड़ के पंचपीरों में प्रमुख, जोधपुर के पाबूजी राठौड़ गौरक्षार्थ अपने प्राण न्यौछावर कर लोक देवता के रूप में मान्य हुए। अपने शौर्यकृत्यों, क्रान्तिकारी समाज सुधारक एवं बाहरी आडम्बरों का खन्डन का साथ ही प्लेग रक्षक एवं ऊँटों के रक्षक देवता के रूप में विशेष मान्यता प्राप्त की। आज भी इनके गाथा गीत (पवाड़े) एवं जीवन चरित्र व चमत्कारों का मारवाड क्षेत्र में भाटों द्वारा रावण हत्था वाद्य यंत्र के साथ गायन – वाचन किया जाता है। कोलूमण्ड एवं अन्य स्थानों पर इनके नाम पर विशाल मेले लगते हैं।
प्रश्न: बाबा रामदेव/रामसापीर

उत्तर: मारवाड़ के पंचपीरों में सर्वप्रमुख, बाड़मेर के रामदेवजी तंवर राजस्थान के प्रमुख लोकदेवता हैं। ये अपने अलौकिक कृत्यों से पीर की तरह पूजे जाने लगे। ये एक वीर योद्धा, सिद्ध पुरुष, कर्तव्यपरायण, जनसामान्य एवं गौ के रक्षक के रूप में प्रसिद्ध हुये। रामदेवजी ने सामाजिक समरसता, साम्प्रदायिक सौहार्द, गुरु महिमा एवं अहिंसा को प्रमुखता दी। उन्होंने जाति – पांति, छुआछुत, ऊँच-नीच के भेदभाव का विरोध कर निम्न जातियों को गले लगाया। धर्मान्तरण को रोककर इन्होंने इन निम्न जातियों को हिन्दु धर्म एवं समाज में बांधे रखने का क्रान्तिकारी कार्य किया। रामदेवरा (रूणेचा) में इनका विशाल मंदिर है जहाँ भादवा में इनका विशाल मेला लगता है। यह साम्प्रायिक सौहार्द्र का प्रतीक है।
प्रश्न:. देवनारायणजी/देवजी 
उत्तर: राजस्थान के प्रमुख लोकदेवता देवनारायण जी का जन्म 13वीं सदी में ‘नागवंशीय गुर्जर बगड़ावत‘ परिवार में सवाई भोज के घर में हुआ। इन्हें अपने शौर्यपूर्ण एवं चमत्कारिक कृत्यों के कारण विष्णु का अवतार स्वीकार किया गया। ये आयुर्वेद के ज्ञाता थे। भादवा चतुर्थी को इनकी जगह – जगह पूजा की जाती है। देवमाली, आसींद सहित अनेक स्थलों पर इनके नाम का मेला भरना इस लोक देवता का लोकप्रियता का प्रमाण है जहाँ लाखों की संख्या में नर-नारी एकत्रित होकर अपने अपने दुरूखों से सन्ताप पाते हैं।