मूल्य मतैक्य किसे कहते हैं | समाज में मूल्य सर्वसम्मति की परिभाषा क्या है what do sociologists mean by value consensus in society

By   December 2, 2020

what do sociologists mean by value consensus in society in hindi मूल्य मतैक्य किसे कहते हैं | समाज में मूल्य सर्वसम्मति की परिभाषा क्या है ?

मूल्य मतैक्य और स्तरीकरण
किसी समाज की मूल्य व्यवस्था किस तरह उभरती है? इस प्रश्न के उत्तर में पारसंस जोर देकर कहते हैं कि मूल्य किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से जन्म नहीं लेते (जैसा कि आरंभिक काल में राजा या पुजारी के बारे में माना जाता था)। मूल्य साझे विश्वास हैं। इसका यही मतलब है कि समाज के सभी सदस्य यह मान कर चलते हैं कि ये प्रदत्त मल्य ही सबसे उत्तम यक्ति हैं जिसके जरिए उनके समाज में स्थिरता कायम रखी जा सकती है। इस तरह मूल्य सिर्फ साझे विश्वास ही नहीं हैं, बल्कि वे समाज के सदस्यों की सहमति से उत्पन्न होते हैं। यह सहमति या मतैक्य इसलिए उत्पन्न होता है कि समाज के सदस्य अपने रोजाना के जीवन में व्यवस्था और स्थिरता चाहते हैं। इसलिए व्यवस्था, स्थिरता और सहयोग इस मूल्य मतैक्य पर निर्भर करते हैं। समाज के सदस्यों में यह सहमति होती है कि सभी के लिए क्या अच्छा है।

बॉक्स 6.01
पारसंस तर्क देते हैं कि मूल्यों की उपस्थिति से यही निष्कर्ष निकलता है कि व्यक्तियों का मूल्यांकन होता है और फिर उन्हें एक तरह के श्रेणी क्रम में रखा जाता है। इसलिए समाज में विभिन्न स्तर क्रम परंपरा पर आधारित होते हैं जो वास्तव में उसकी स्तरीकरण प्रणाली ही होती है। पारसंस कहते हैं कि “स्तरीकरण सामाजिक प्रणाली में साझी मूल्य व्यवस्था के अनुसार इकाइयों का श्रेणीकरण है।‘‘ मूल्य व्यवस्था ही समाज में स्तरीकरण को जन्म देती है। स्तरों में भेदों को भी मूल्य व्यवस्था ही सही ठहराती है।

किसी भी समाज में जो लोग सामाजिक मूल्यों के अनुसार कार्यों को अंजाम देते हैं या आचरण करते हैं, उन्हें बेहतर पारितोषिक दिया जाता है। पारसंस के अनुसार इन पारितोषिकों का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि समाज के मूल्य किसे सर्वश्रेष्ठ ठहराते हैं। उदाहरण के लिए, राजपूतों में साहस और वीरता को अधिक महत्व देने की परंपरा रही है। इसलिए जो भी व्यक्ति इन गुणों में खरा उतरता था उसे बेहतर पुरस्कार और ऊंचा दर्जा दिया जाता था। अन्य समुदायों में व्यापार में प्रवीणता और व्यापार में मुनाफा कमाने की क्षमता को अधिक महत्व दिया जा सकता है। इसलिए इन क्षेत्रों में अपने को सिद्ध करने वाले लोगों को ऊंचा दर्जा दिया जा सकता है। इसी प्रकार सभी सामाजिक प्रणालियों में मूल्य व्यवस्था कुछ गुणों पर ऊंचे पारितोषिक तो अन्य गुणों पर कम पारितोषिक देती है। मगर कोई व्यक्ति अगर इन सामाजिक मूल्यों की अवहेलना करता है तो उसे दंड दिया जाता है। इसलिए जिस समाज में वीरता को अधिक महत्व दिया जाता है, उसमें कायरता के लक्षण दिखाने वाला व्यक्ति श्रेणीक्रम में अपना स्थान खो बैठता है।

पारसंस के अनुसार आधुनिक औद्योगिक समाज में व्यक्ति की निजी उपलब्धियों को उच्च मान दिया जाता है। इस तरह के समाज में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन पर अधिक जोर दिया जाता है। इसलिए पारसंस कहते हैं कि इन समाजों, विशेषकर अमेरिका, में मूल्य व्यवस्था “अर्थव्यवस्था के भीतर उत्पादक क्रियाकलापों को प्रमुखता‘‘ देती है। इसलिए जो लोग इनमें प्रवीण होते हैं उन्हें बेहतर पारितोषिक दिया जाता है। ऐसे समाज में एक श्रमिक में अगर आवश्यक गुण विद्यमान हैं तो वह भी एक सफल उद्योगपति बन सकता है। एक बार वह अपनी मेधा, अपनी योग्यता का सिक्का जमा लेता है तो सामाजिक प्रणाली में उसका रुतबा ऊंचा हो जाता है और उसे प्रतिष्ठा भी खूब मिलती है। इसी प्रकार कंपनियों में जो अधिकारी ओजस्वी और सफल होते हैं उन्हें वेतन और अन्य लाभों के रूप में अधिक पारितोषिक मिलते हैं। इससे स्तरीकरण प्रणाली में उनका स्थान ऊंचा हो जाता है।

बोध प्रश्न 1
1) प्रकार्यवादी सिद्धांत के बारे में पांच पंक्तियां लिखिए।
2) मूल्य मतैक्य किसे कहते हैं और सामाजिक स्तरीकरण में इसकी क्या भूमिका है? पांच पंक्तियों में उत्तर दीजिए।

 बोध प्रश्नों के उत्तर

बोध प्रश्न 1
1) प्रकार्यात्मक सिद्धांत यह बताता है कि समाज किस तरह से जीवित रह पाता है। प्रकार्यवादी समाज को एक जीव के रूप में देखते हैं। इस जीव के अनेक अंग हैं। इनमें हर अंग अलग होता है मगर सभी एक समेकित इकाई के रूप में काम करते हैं और उसे स्थिरता प्रदान करते हैं।
2) मूल्य असल में साझे विश्वास हैं। मूल्य मतैक्य इसलिए उभरता है क्योंकि समाज के सभी सदस्य अपने दैनिक जीवन में स्थिरता और व्यवस्था चाहते हैं। मूल्य मतैक्य समाज में व्यवस्था, स्थिरता और सहकार/सहयोग का आधार होता है। यही मूल्य व्यवस्था समाज में श्रेणीकरण और स्तरीकरण को जन्म देती है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सामाजिक स्तरीकरण की व्याख्या करते हुए पारसंस ने लोगों में मौजूद भेदों, विषमताओं को महत्ता दी। उनका कहना था कि ये विषमताएं समाज की मूल्य व्यवस्था के संगत होती हैं और इसलिए ये समाज की स्थिरता के लिए अनिवार्य होती हैं। अब चूंकि समाज की मूल्य व्यवस्था । असमानताओं को सही ठहराती है इसलिए व्यवहार में निम्न श्रेणी क्रम में विद्यमान लोगों समेत सभी लोग इन्हें स्वीकार कर लेते हैं। उदाहरण के लिए, औद्योगिक संगठनों में विस्तृत स्तरीकरण प्रणालियां विद्यमान होती हैं। प्रवीणताओं और अनुभव के आधार पर श्रमिकों में भी भेद पाए जाते हैं । जो श्रमिक अपने कार्य में प्रवीण होते हैं और जिनमें नेतृत्व के गुण मौजूद होते हैं, उन्हें पदोन्नति, वेतन में वृद्धि इत्यादि देकर पुरस्कृत किया जाता है। इसी प्रकार श्रम और प्रबंध दोनों किसी औद्योगिक संगठन को चलाने के लिए हालांकि जरूरी हैं लेकिन प्रबंधक का दर्जा उसमें हमेशा श्रमिकों से ऊंचा रहता है। इन विषमताओं के कारण दोनों में संघर्ष भी होता है मगर चूंकि इन विषमताओं के मूल में मूल्य व्यवस्था का हाथ होता है इसलिए इन मुद्दों पर गहरे संघर्ष के उदाहरण बहुत कम मिलते हैं। एक कट्टरपंथी मजदूर संघ भी यह बात स्वीकार करता है कि प्रबंधन का दर्जा ऊंचा होता है। ऐसा इस कारण होता है मूल्य व्यवस्था इन विषमताओं को स्वीकार करती है। इसलिए पारसंस तर्क देते हैं कि लोग अमूमन इन विषमताओं को स्वीकार करते हैं और इस तरह बड़ा संघर्ष होने से रुक जाता है। सभी लोग चाहे वे श्रमिक हों या प्रबंधन में हों, मानते हैं कि यह व्यवस्था सबसे उत्तम है। अगर इन मूल्यों को चुनौती दी गई तो समाज में स्थिरता उत्पन्न हो जाएगी।

पारसंस के सिद्धांत का सार हम इस प्रकार दे सकते हैं:
ऽ मूल्य मतैक्य सभी समाजों का अनिवार्य अंग है।
ऽ सामाजिक स्तरीकरण सभी समाजों में अपरिहार्य है।
ऽ समाज में व्यवस्था और स्थिरता बनाए रखने के लिए स्तरीकरण प्रणाली को न्यायोचित, सही और उचित माना जाता है। इससे भिन्न-भिन्न लोगों को भिन्न-भिन्न पारितोषिक मिलता है।
ऽ जिन लोगों को पुरस्कृत किया जाता है और जिन्हें पुरस्कृत नहीं किया जाता है, उनके बीच संघर्ष हो सकता है। मगर इससे मौजूद प्रणाली को कोई बड़ा खतरा पैदा नहीं होता क्योंकि मूल्य व्यवस्था इस द्वंद्व को रोके रखती है।

सारांश
सामाजिक स्तरीकरण सभी समाजों में है। हर समाज की अपनी एक क्रम परंपरा है जिसमें सभी व्यक्तियों का अपना-अपना स्थान नियत है। टैलकॉट पारसंस, किंग्सले डेविस और विल्बर्ट मूर जैसे सामाजिक संरचना प्रकार्यात्मकतावादी सिद्धांतकारों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह जानने की थी कि सामाजिक क्रम परंपरा में व्यक्ति किस तरह अलग-अलग स्थान पाते हैं और हमें इन भेदों को आखिर क्यों जरूरत पड़ती है। इन सिद्धांतकारों का यह निष्कर्ष था कि सभी समाजों में स्तरीकरण सिर्फ अपरिहार्य ही नहीं है। बल्कि यह उनके लिए अनिवार्य इसलिए भी है कि यह समाज में स्थायित्व और व्यवस्था बनाए रखता है। टैलकॉट पारसंस ने स्पष्ट किया है कि समाज के सभी सदस्य इन असमानताओं को स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि वे यह समझते हैं कि समाज में व्यवस्था और स्थिरता को कायम रखने का यही एकमात्र तरीका है। इसीलिए सामाजिक स्तरीकरण के पैटर्न और सामाजिक असमानता समाज के मूल्यों का हिस्सा बने । इसलिए उन्होंने सामाजिक प्रणाली में स्तरीकरण के स्वरूप को तय करने में मूल्य मतैक्य की भूमिका पर विशेष बल दिया।

डेविस और मूर ने पारसंस के तर्क को आगे बढ़ाया और यह जानने का प्रयत्न किया कि कुछ स्थानों की सामाजिक प्रतिष्ठा अलग-अलग क्यों होती है। उन्होंने यह पाया कि समाज के लिए जो स्थान अधिक महत्वपूर्ण हैं उन्हें उच्च पारितोषिक और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। उन्होंने इसके कारण बताए।

मेल्विन ट्यूमिन ने डेविस और मूर की प्रस्थापनाओं की जो समालोचना की उससे स्पष्ट होता है कि प्रकार्यात्मक महत्ता ही यह निर्धारित करने की एकमात्र कसौटी नहीं है कि कौन-सा दर्जा उच्च पारितोषिक देगा।

इसके अलावा अन्य कारक भी हैं जैसे सत्ताधिकार और जन्म पर आधारित हैसियतध्स्थिति (‘स्टैटस‘)। यहां तक कि खुले समाज भी इन प्रतिमानों से प्रभावित होते हैं । ट्यूमिन इस सिद्धांत के सभी तर्कों को चुनौती देते हैं और उनका मानना है कि स्तरीकरण समाज के सदस्यों के लिए वैमनष्यकारी हो सकता है।

शब्दावली
मूल्य मतैक्य: सामाजिक प्रणाली के सभी सदस्यों में यह सहमति कि सबके लिए क्या स्वीकार्य होगा।
प्रकार्यात्मक: ऐसे मूल्य जो समाज में व्यवस्था और स्थिरता बनाए रखने और पूर्वाक्षेपाएं इस प्रकार समाज के अस्तित्व के लिए जरूरी हैं।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
आर. बेंडिक्स और एस.एम. लिप्सेट (संपा.) क्लास, स्टै टस ऐंड पावर, रुटलेज ऐंड केगन पॉल, 1967

पारसंस और डेविस
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
सामाजिक स्तरीकरण का प्रकार्यात्मक सिद्धांत
टैलकॉट पारसंस का नजरिया
मूल्य मतैक्य और स्तरीकरण
डेविस-मूर का सिद्धांत
समाज की प्रकार्यात्मक पूपिक्षाएं
स्तरीकरण के प्रकार्य
डेविस और मूर का बुनियादी प्रस्थापनाएं
डेविस-मूर के सिद्धांत की समालोचना
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई में आपको अमेरिका के दो प्रसिद्ध समाज विज्ञानियों के सामाजिक स्तरीकरण सिद्धांत के बारे में बताएंगे। ये समाजशास्त्री हैं डेविस और विलबर्ट मूर जिनके सिद्धांत को सामाजिक स्तरीकरण का प्रकार्यात्मक सिद्धांत कहा जाता है। सामाजिक स्तरीकरण के विश्लेषण के लिए इस सिद्धांत को हालांकि समाजशास्त्रियों ने मोटे तौर पर स्वीकार कर लिया है लेकिन इसकी आलोचना भी खूब होती है। यहां हम इस सिद्धांत के सभी पहलुओं पर दृष्टि डालेंगे। इस इकाई को पढ़ लेने के बाद आपः
ऽ इस सिद्धांत की पृष्ठभूमि को समझ जाएंगे,
ऽ यह सिद्धांत क्या कहता है, इसे समझ पाएंगे
ऽ उन समस्याओं को समझ सकेंगे जिनसे इस सिद्धांत के प्रवर्तक को भी खुद जूझना पड़ा था, और
ऽ समाज को समझने में इस सिद्धांत के महत्व को जान सकेंगे।

प्रस्तावना
प्रकार्यात्मक सिद्धांत यह बताने का प्रयास करता है कि समाज क्यों जीवित रह पाता है। इस सिद्धांत के मूल में यह धारणा है कि सभी समाज स्थिरता और शांति चाहते हैं। समाज में लोग अराजकता और भ्रम नहीं चाहते क्योंकि इससे उनके दैनिक क्रियाकलापों में विघ्न पड़ता है। इसीलिए समाज चाहते हैं कि उनमें व्यवस्था और अनुशासन हो। ये समाज में स्थिरता लाने के उपाय हैं।

प्रकार्यवादी समाज को एक जीव के रूप में देखते हैं। इस जीव के अलग-अलग अंग होते हैं। ये अंग एक समग्र इकाई में समेकित होते हैं और ये परस्पर सहयोग से काम करते हैं। मानव शरीर एक जटिल जीव है जिसके शरीर में विभिन्न अंग-प्रत्यंग होते हैं। इसका प्रत्येक अंग एक-दूसरे से अलग होता है मगर वे सभी मिलकर एक समेकित इकाई की रचना करते हैं। इसी प्रकार समाज में भी अलग-अलग अंग होते हैं जो अलग-अलग भूमिका अदा करते हैं। अगर हम समाज की पूरी तस्वीर पर नजर डालें तो हम देखेंगे कि ये अंग जो भूमिकाएं अदा करते हैं वे समूचे समाज में स्थिरता लाती हैं, दूसरी तरह से कहें तो ये सारी भूमिकाएं समाज को एकता के सूत्र में बांधती हैं। उदाहरण के लिए, हम पाते हैं कि लोग तरह-तरह के पेशों और क्रियाकलापों में लगे हुए हैं। जैसे डॉक्टर, वकील, शिक्षक, छात्र, श्रमिक, उद्योमपति, किसान, जुलाहे इत्यादि। इन लोगों के क्रियाकलाप हालांकि एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं, पर समाज सुचारु रूप से चलने के लिए सबकी जरूरत होती है। इन्हें पृथक अंग माना जा सकता है जो समाज के एकीकरण के लिए मिल-जुलकर काम करते हैं।

इस तरह हम देखते हैं कि प्रकार्यवादी सिद्धांत के मुताबिक सामाजिक ढांचे का हर घटक विशिष्ट कार्यों को पूरा करता है जो समाज में स्थिरता को कायम रखने के लिए जरूरी हैं। ये कार्य समाज को जीवित रखने के लिए जरूरी हैं। इसलिए समाज की अखंडता और स्थिरता के लिए उसमें स्तरीकरण प्रणाली का होना भी जरूरी है।

सामाजिक स्तरीकरण का प्रकार्यवादी सिद्धांत
प्रकार्यवादी सिद्धांतकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि सभी समाज स्तरों में बंटे होते हैं या वे स्तरित रहते हैं। दूसरे शब्दों में, समाज के विभिन्न सदस्य जो कार्य करते हैं वे असल में इसको जीवित रखने के लिए किए जाते हैं। मगर सभी कार्यों को समान दर्जा नहीं दिया जाता। कुछ कार्य अन्य कार्यों से श्रेष्ठ होते हैं। इसलिए उन्हें ऊंचा दर्जा दिया जाता है। जो लोग इन कार्यों को अंजाम देते हैं उन्हें अन्य लोगों से श्रेष्ठ समझा जाता है। सामाजिक स्तरीकरण का प्रकार्यवादी सिद्धांत यह समझाने का प्रयत्न करता है कि सामाजिक असमानताएं किस तरह उत्पन्न होती हैं और समाज के लिए वे क्यों जरूरी हैं।

प्रकार्यवादी यह मानकर चलते हैं कि समाज की अपनी कुछ मूलभूत जरूरतें होती हैं। इन जरूरतों की पूर्ति हर हाल में होनी चाहिए। अन्यथा समाज में अस्थिरता उत्पन्न हो जाएगी। इन जरूरतों को प्रकार्यात्मक पूपिक्षा कहा गया है। दूसरा, ये प्रकार्यात्मक पूपिक्षाएं हालांकि महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका स्थान उन्हें समाज में मिलने वाले महत्व के अनुसार तय होता है उदाहरण के लिए, एक कारखाना चलाने के लिए हमें मजदूर और प्रबंधक दोनों की जरूरत पड़ती है। कोई भी कारखाना सिर्फ मजदूरों की बदौलत या सिर्फ प्रबंधकों की बदौलत नहीं चल सकता है। इसलिए मजदूर और प्रबंधक दोनों उसके अभिन्न, अनिवार्य अंग हैं। मगर यहां यह मानना सरासर गलत होगा कि चूंकि दोनों जरूरी हैं इसलिए दोनों की हैसियत भी बराबर होनी चाहिए। वास्तव में ऐसा नहीं होता। प्रबंधकों को श्रमिकों से ऊंचा दर्जा हासिल होता है इसलिए इस अभिन्न्ता या अखंडता का मतलब समानता नहीं है। इसका यह मतलब है कि सभी अलग-अलग समूह मिल जुलकर स्थिरता की दिशा में काम करते हैं। मगर वे इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि वे एक क्रम परंपरा में स्तरित रहते हैं। इस क्रम परंपरा का आधार क्या है और आखिर क्यों लोग इसे स्वीकार कर लेते हैं? प्रकार्यवादी सिद्धांतकारों ने इन प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास किया है। अब हम प्रकार्यवादी सिद्धांतकारों में सबसे ख्यातनाम टैलकॉट पारसंस के विचारों को जानेंगे।

 टैलकॉट पारसंस का नजरिया
पारसंस के सामाजिक प्रणालियों के विश्लेषण का केन्द्र बिन्दु व्यवस्था का प्रश्न है। उनका मानना था कि सभी सामाजिक प्रणालियां इसलिए उत्पन्न हुईं कि इन प्रणालियों में विद्यमान लोग व्यवस्था और स्थिरता चाहते थे। पारसंस के अनुसार सामाजिक प्रणाली तब उत्पन्न होती है जब दो या अधिक लोग बंधन की स्थिति में परस्पर व्यवहार करते हैं और उनके कार्य दूसरों को प्रभावित करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि सामाजिक प्रणाली में सबसे पहले लोगों का समूह होना चाहिए। यह समूह दो व्यक्तियों का या देश भी हो सकता है। इसका दूसरा अर्थ यह है कि ये लोग एक साझी सीमा के भीतर विद्यमान रहते हैं। तीसरा, वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से करते हैं। अंततः उनके कार्य एक-दूसरे के आचरण को प्रभावित करते हैं।

इस तरह की क्रिया को हम अपने दैनिक जीवन में देख सकते हैं। अपने दैनिक जीवन में हम कई लोगों से मिलते-जुलते हैं। ऐसा करते समय हम उस व्यक्ति से प्रभावित होते हैं जिससे हम व्यवहार करते हैं। उदाहरण के लिए, आप जब अपने पिता या किसी बुजुर्ग से बात कर रहे हों तो उस समय आप एक खास तरह से आचरण करते हैं। जब आप अपने दोस्तों और साथियों से बातचीत करते हैं तो आपका आचरण भिन्न होता है। आप ऐसा क्यों करते हैं? सभी लोगों के साथ पारस्परिक व्यवहार करते समय आपको आचरण एक समान क्यों नहीं होता? पारसंस के अनसार ऐसा इसलिए होता हैं कि आप जब किसी व्यक्ति के साथ परस्पर व्यवहार करते हैं तो आपका कार्य (आचरण) इस व्यक्ति के कार्यों से प्रभावित होता है।

यह आपको भिन्न-भिन्न स्थितियों में अपना व्यवहार बदलने या उनके अनुकूल ढालने के लिए बाध्य करता है।

अभ्यास
अपने अध्ययन केन्द्र के अन्य छात्रों के साथ समाज में व्यवस्था के प्रश्न पर चर्चा कीजिए। अपनी जानकारी को नोटबुक में लिख लीजिए।

विभिन्न स्थितियों में आपके आचरण का नियमन मुख्यतः इसलिए होता है कि एक व्यक्ति के रूप में आप एक निश्चित तरीके से आचरण करते हैं क्योंकि इस स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति उसी तरह से व्यवहार करता है। फिर आप यह भी जानते हैं कि यदि आप निर्दिष्ट तरीके या तहजीब से व्यवहार नहीं करते तो इससे अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उदाहरणतः अगर आप अपने किसी मित्र से रुखे और अशिष्ट ढंग से पेश आते हैं जैसे कि वह आपका दुश्मन हो, तो आपके इस व्यवहार से वैमनष्य की स्थिति पैदा हो जाएगी और हो सकता है आप उसकी मित्रता से हाथ धो बैठें। इसीलिए आप उससे वैसा ही बर्ताव करेंगे जिसकी आप से अपेक्षा की जाती है।

इसलिए हम यह मान सकते हैं कि किसी भी व्यक्ति का कार्य इससे निर्धारित होता है कि वह किससे पारस्परिक-व्यवहार कर रहा है। बदले में यह समाज या सामाजिक प्रणाली विशेष के आचरण नियमों से तय होता है। आचरण के नियम लोगों की आम सहमति पर आधारित होते हैं। और यही वजह है कि इन्हें सही और शिष्ट माना जाता है। इसी आम सहमति को पारसंस मूल्य कहते हैं। इसलिए सामाजिक मूल्य एक समाज के साझे विश्वास हैं। इन मूल्यों को जिस तरह से व्यवहार में लाया जाता है (इन मूल्यों के फलस्वरूप किए जाने वाले कार्य), जिन्हें आदर्श या प्रतिमान कहा जाता है। इस प्रकार सामाजिक प्रतिमान व्यवहार के नियम हैं।

पारसंस कहते हैं कि सामाजिक मूल्य और प्रतिमान प्रत्येक समाज की व्यवस्था और स्थिरता को बनाए रखने की आवश्यकता से उत्पन्न होते हैं। मूल्य और प्रतिमान हर समाज में अलग होते हैं क्योंकि प्रत्येक समाज की जरूरतें अलग होती हैं। मगर हर समाज की मूल्य व्यवस्था में उभय कारक स्थिरता की आवश्यकता है। इसलिए प्रत्येक समाज अपने मूल्यों को ईजाद करता है जो उसके इस उद्देश्य की पूर्ति अच्छी तरह से करते हैं।