संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था का पुनर्गठन क्या है | संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की उपलब्धियां | उद्देश्य कार्य सुधार United Nations in hindi

By   October 2, 2020

United Nations in hindi संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था का पुनर्गठन क्या है | संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की उपलब्धियां | उद्देश्य कार्य सुधार ? संघ में भारत की भूमिका ?

संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था का पुनर्गठन
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था का संगठन, संरचना और कार्य
संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र: उददेश्य और सिद्धांत
संयुक्त राष्ट्र के मुख्य निकाय एवं कार्य
संयुक्त राष्ट्र की बदलती भूमिका
शीतयुद्ध काल
शीतयुद्धोत्तर काल
कुछ उपलब्धियां और कमियाँ
उपलब्धियाँ
कमियाँ / असफलताएँ
संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था का पुनर्गठन-मुख्य सुझाव और भारत का दृष्टिकोण
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
यह खंड सबसे महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय सरकारी संगठन, संयुक्त राष्ट्र तथा अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बहाल करने में जन्म से अब तक उसकी बदलती भूमिका क्या रही है, इन सभी का सर्वेक्षण प्रस्तुत करता है। यह सामाजिक आर्थिक विकास में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का भी संक्षेप में आकलन करता है। तथापि इसका मुख्य जोर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के पुनर्गठन को लेकर जारी बहस का सार प्रस्तुत करना है। पुनर्गठन को लेकर यह बहस इसलिए जारी है ताकि संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था को सामाजिक विश्व समस्याओं के संदर्भ में और अधिक लोकतांत्रिक, कारगर और प्रासंगिक बनाया जा सके। इस इकाई के अध्ययन के पश्चात् आपः
ऽ संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था का संगठन क्या है,उसकी संरचना क्या है तथा उसके कार्य क्या है समझ सकेंगे,
ऽ शीतयुद्ध के पूर्व और पश्चात् संयुक्त राष्ट्र की बदलती भूमिका जान सकेंगे,
ऽ संयुक्त राष्ट्र की कुछ उपलब्धियों और असफलताओं का विश्लेषण कर सकेंगे, और
ऽ संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन और उसमें सुधार के लिए कौन-कौन से मुख्य प्रस्ताव है समीक्षा कर सकेंगे।

प्रस्तावना
इकाई 16 के अंतर्गत खाड़ी युद्ध, सोवियत संघ और समाजवादी खेमे का विखंडन तथा विश्व व्यवस्था की अवधारणा से संबंधित विविध दृष्टिकोणों का ब्यौरा प्रस्तुत किया गया है। इन असाधारण बदलावों से संयुक्त राष्ट्र की बदलती भूमिका अत्यधिक प्रभावित हुई है।

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को हुई थी। उसी दिन से संयुक्त राष्ट्र का घोषणा पत्र (संविधान) भी प्रभावी हुआ। प्रतिवर्ष यह दिन संयुक्त राष्ट्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र का अध्ययन कई कारणों से महत्त्वपूर्ण है। किन्तु इनमें से दो अति महत्त्वपूर्ण है। पहला, 1945 के बाद अस्तित्व में आया। 390 अंतर्सरकारी अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में संयुक्त राष्ट्र सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि विश्व राजनीति को इसने अत्यधिक प्रभावित किया है। इसने अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए सांस्थानिक ढांचा तैयार किया है। मानव इतिहास में इतना बड़ा पैमाना कभी नहीं बनाया गया है। इसने अनेक अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक, आर्थिक और मानवीय समस्याओं के निष्पादन का प्रयास किया है। यह पिछले 50 वर्षों से न केवल कायम है, बल्कि भावी चुनौतियों का सामना करने के लिए इसने अपने आप में सुधार भी किया है। इसका पूर्ववर्ती राष्ट्रकुल विश्व शांति और सुरक्षा के उद्देश्य से गठित पहला अंतर्राष्ट्रीय संगठन था, किन्तु 20 सालों से अधिक जीवित नहीं रह सका । वास्तव में संयुक्त राष्ट्र के जन्म के साथ ही राष्ट्र कुल की समाप्ति की आधिकारिक घोषणा कर दी गयी थी।

 संयुक्त राष्ट व्यवस्था का संगठन, संरचना और कार्य
इस इकाई में विभिन्न उपशीर्षकों यथा संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्रः उद्देश्य व सिद्धान्त तथा संयुक्त राष्ट्र के मुख्य निकाय व उनके कार्य के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र के सांगठनिक ढांचे का विवरण प्रस्तुत किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र: उद्देश्य और सिद्धांत
संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र का अनुमोदन शुरू में 51 देशों ने किया था। जिनमें भारत भी शामिल था, ये राज्य संयुक्त राष्ट्र के जनक सदस्य के रूप में जाने जाते हैं। प्रथम 50 वर्षों में इसकी सदस्यता बढ़कर 185 हो गयी। इस तरह, संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र सार्वभौम रूप से अनुमोदित अंतर्राष्ट्रीय संधि-पत्र बन गया है।

संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र की धारा 1 के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य चतुर्तरीय हैः क) अंतर्राष्ट्रीय शांति
और सुरक्षा बहाल करना, ख) समान अधिकारों एवं जनता के स्वनिर्धारण के सिद्वान्तों के आधार पर देशों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध विकसित करना, ग) अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं के निराकरण तथा मानवाधिकारों व मौलिक स्वतंत्रताओं के प्रति निष्ठा के संवर्द्धन के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग करना, तथा घ) इन सामूहिक लक्षणों की प्राप्ति में राष्ट्रों के क्रियाकलापों में संगति बैठाने वाले केन्द्र के रूप में अपनी पहचान बनाना।

संयुक्त राष्ट्र जिन बुनियादी उसूलों के अनुसार कार्य करता है, वे इस तथ्य की स्वीकृति पर आधारित हैं कि इसके सभी सदस्यों को संप्रभु और समानता का अधिकार हासिल है और उनसे घोषणा पत्र की शर्तों के अनुपालन की अपेक्षा की जाती है। उनसे यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे अपने अंतर्राष्ट्रीय विवादों का निपटारा शांति, सुरक्षा एवं न्याय को कोई क्षति पहुँचाए बगैर शांतिपूर्ण तरीके से करेंगे, और अपने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में किसी भी राज्य के खिलाफ बल प्रयोग की धमकी अथवा उसके इस्तेमाल से बाज आयेंगे, वे संयुक्त राष्ट्र की हर उस कार्रवाई के साथ सहयोग करेंगे जो वह अपने घोषणा पत्र के प्रावधानों के अनुरूप शुरू करेगा। मालूम हो, संयुक्त राष्ट्र किसी भी राज्य के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी नहीं करता।

संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र की प्रस्तावना में चार सरोकारों एवं उद्देश्यों का जिक्र है तथा उनकी सिद्धि के लिए चार तरह के तरीकों और व्यावहारिक प्राथमिकताओं का सुझाव दिया गया है। ये सरोकार हैं-क) अनुवर्ती पीढ़ियों को युद्ध से बचाना (स्मरणीय है कि इस सदी के दो महायुद्धों में मानवता को अकथ दुख
और बर्बादी का सामना करना पड़ा था। इन दो महायुद्धों में मृतकों की संख्या क्रमशः 4.5 करोड़ तथा 6 करोड़ थी।),
ख) बुनियादी मानवाधिकारों और मनुष्य मात्र की गरिमा एवं महत्ता के प्रति अपनी आस्था को दृढ़ करना तथा सभी राष्ट्रों, चाहे वे छोटे हों या बड़े, सभी के लिए समान अधिकार के सिद्धांत में आस्था रखना,
ग) न्याय के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करना तथा संधि की शर्तों के अनुपालन के प्रति सम्मान रखना तथा
घ) व्यापक आजादी के साथ सामाजिक विकास और बेहतर जीवन स्तर का संवर्धन करना। और इन लक्षणों की प्राप्ति के लिए प) सहिष्णुतापूर्ण आचरण करना, पप) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए एकजुट होना, पपप)यह सुनिश्चित करना कि सामान्य हित के तथा पअ) राष्ट्रों के आर्थिक व सामाजिक बेहतरी के संवर्द्धन में अंतर्राष्ट्रीय तंत्र का इस्तेमाल करना ।

संयुक्त राष्ट्र के मुख्य निकाय एवं कार्य
उल्लिखित लक्षणों और उद्देश्यों को हासिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत छह मुख्य निकायों की स्थापना की गयी है।

आम सभा, जो संभवतः विश्व पसंद की अवधारणा के सबसे निकट है, संयुक्त राष्ट्र का मुख्य विचार विमर्श निकाय है। यह निकाय मुक्त और उदार बातचीत के जरिये समस्याओं का समाधान ढूंढने की कोशिश करता है क्योंकि यह तकनीक समय की कसौटी पर खरी उतरी है। यह विश्व का स्थायी मंच एवं बैठक कक्ष है। इसका गठन इस मान्यता पर आधारित था कि शब्दों से लड़ा जाने वाला युद्ध तलवारों और बमों से लड़े जाने वाले युद्ध से श्रेयस्कर होता है। इसमें सभी सदस्य राज्यों को प्रतिनिधित्व हासिल हैं। इसमें सभी संप्रभु समानता के सिद्धान्त के आधार पर एकमत देने का अधिकार प्राप्त है। सामान्य मुद्दों पर फैसला लेने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है।

सभा को संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र की परिधि में आने वाले तमाम मुद्दों पर बहस एवं अनुशंसा करने का अधिकार प्राप्त है। हालांकि इसके फैसले को मानना सदस्य राज्यों के लिए अनिवार्य नहीं है, तथापि उन फैसलों में विश्व जनमत की अभिव्यक्ति होती है। स्पष्ट है, आम सभा राष्ट्रीय संसद की तरह कानून का निर्माण नहीं करती है तो भी संयुक्त राष्ट्र के सभाकक्षों व उसके गलियारों में तकरीबन सभी छोटे बड़े, धनी निर्धन और विभिन्न राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था वाले देशों के प्रतिनिधियों को अपनी बात कहने तथा वोट देने का अधिकार प्राप्त होता है। कहना न होगा कि इन्हीं बातों से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नीतियों के स्वरूप का निर्धारण होता है।

संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र के अनुसार शांति और सुरक्षा बहाल करने की प्राथमिक जिम्मेवारी सुरक्षा परिषद की होती है। यह कभी भी, यहाँ तक की अर्द्धरात्रि में भी, अगर शांति के लिए कोई खतरा पैदा हो गया है। तो बुलाई जा सकती है। इसके फैसलों का अनुपालन करना सदस्य राज्यों के लिए अनिवार्य है। इसके 15 सदस्य होते हैं। इनमें पाँच चीन, फ्रांस, सोवियत संघ, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमरीका स्थायी सदस्य है। शेष दस सदस्यों का चुनाव आम सभा द्वारा किया जाता है। इनका कार्यकाल दो वर्षों का होता है। कार्यप्रणाली से संबंधित सवालों को छोड़कर प्रत्येक फैसले के लिए मतों की जरूरत होती है। ठोस बुनियादी सवालों पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता। अगर कोई भी स्थायी सदस्य उस पर अपना मत देना अस्वीकार कर देता है तब इसे वीटो के नाम से जाना जाता है।

परिषद के सामने जब कभी शांति के खिलाफ खतरे का सवाल लाया जाता है, तो अक्सर वह पहले विविध पक्षों से शांतिपूर्ण हल ढूँढने के लिए कहती है । परिषद मध्यस्थता भी कर सकती है। वह स्थिति की छानबीन कर उस पर रपट भेजने के लिए महासचिव से भी आग्रह कर सकती है। लड़ाई छिड़ जाने की स्थिति में परिषद युद्ध विराम की कोशिश करती है। संबद्ध पक्षों की राय से वह अशांत क्षेत्रों में तनाव कम करने एवं विरोधी सैनिक बलों को दूर रखने के लिए शांति सैनिकों की टुकड़ियाँ (पर्यवेक्षक अथवा दल) भी भेज सकती है। आम सभा के प्रस्तावों के विपरीत, इसके फैसले बाध्यकारी होते हैं। आर्थिक प्रतिबंध लगाकर अथवा सामूहिक सैनिक कार्रवाई का आदेश देकर अपने फैसले को लागू करवाने का हक भी है, जैसा कि वह कोरियाई संकट (1950) तथा ईराक-कुवैत संकट (1990-91) के दौरान कर चुकी है।

युद्ध का अभाव, उसकी रोकथाम स्वतः शांतिपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था सुनिश्चित नहीं कर देते। भावी संघर्ष जिनमें शांति को खतरा हो अथवा शांतिभंग की संभावना हो, उनके बुनियादी कारणों को कम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक जन्मदाताओं ने आर्थिक और सामाजिक उन्नति और विकास तथा जीवन स्तर में बेहतरी के लिए कुछ ठोस साधनोंध्उपायों का भी प्रावधान किया था। अब यह काम आर्थिक और सामाजिक परिषद एवं इसकी विशेषज्ञ एजेंसियों के हवाले कर दिया गया है।

आर्थिक और सामाजिक परिषद के 54 सदस्य हैं । सामान्य तौर पर इसकी प्रतिवर्ष दो बैठके – एक- एक महीने के सत्रों के रूप में होती है। यह संयुक्त राज्य और उसकी विशेषज्ञ एजेंसियों के कार्यों का समंजन करता है। ये सभी एक साथ मिलकर “संगठन परिवार” का निर्माण करते हैं या सीधे कहें कि यह संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था है। अन्य बातों के अलावा परिषद जिन बातों को तरजीह देती है तथा जिन गतिविधियों की अनुशंसा अथवा निर्देश करती है वे हैं-विकासशील देशों में आर्थिक विकास का संवर्धन करना, विकास और मानवीय सरोकार की सहायता प्राप्त परियोजनाओं का प्रबंधन करना, मानवाधिकारों के अनुपालन को मजबूत करना, अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करना, विज्ञान और प्रोद्योगिकी के लाभों का विस्तार करना, तथा बेहतर आवास, परिवार नियोजन तथा अपराध निस्तारण के क्षेत्र में विश्व सहयोग को बहाल करना।

ट्रस्टीशिप परिषद के गठन का उद्देश्य 11 ट्रस्ट क्षेत्रों के प्रशासन की देखभाल करना था। परिषद यह भी सुनिश्चित करती है कि इन क्षेत्रों के प्रशासन के लिए जिम्मेवार सरकारें प्रशासन और स्वतंत्रता की दिशा में उपयुक्त कदम उठाये । यह संतोष की बात है कि वर्ष 1994 तक ये सभी क्षेत्र स्वतंत्र हो चुके हैं और अब इस निकाय के पास कोई काम नहीं रह गया है। सच तो यह है कि महासचिव इसे समाप्त करने की अनुशंसा भी कर चुके हैं।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में 15 न्यायाधीश होते हैं। इनका चयन आमसभा और सुरक्षा परिषद द्वारा एक ही साथ किया जाता है। यह संयुक्त राष्ट्र का मुख्य न्यायिक निकाय है। यह कानूनी मुद्दों का निपटारा और अंतर्राष्ट्रीय संधियों की व्याख्या करता है।

सचिवालय संयुक्त राष्ट्र की मुख्य निकाय है। महासचिव और उनके अधिनस्थ कर्मचारी संयुक्त राष्ट्र प्रशासन की देखभाल करते हैं। सचिवालय संयुक्त राष्ट्र के दैनिक कार्यों को भी अंजाम देता है। अधीनस्थ कर्मचारियों में 160 देशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय नौकरशाह के रूप में ये कर्मचारी संयुक्त राष्ट्र की पूरी व्यवस्था के लिए कार्य करते हैं। उन्हें शपथ लेनी पड़ती है कि वे किसी सरकार अथवा बाह्य प्राधिकरण से कोई निर्देश प्राप्त नहीं करेंगे। सचिवालय के अंतर्गत 25000 कर्मचारी काम करते हैं जबकि विशेषज्ञ एजेंसियों के कर्मचारियों की संख्या 30000 होती है। अब तक महासचिव पद पर सात व्यक्ति विराजमान हो चुके हैंः त्रिग्वे ली (नार्वे) डाग हमार्सजोल्ड (स्वीडेन), उथांत (म्यानमार), कुर्त वाल्दाइम (आस्ट्रिया), जेवियर पेरेज दि क्यूआर (पेरू), बुतरस घाली (मिश्र), तथा कफी अन (धाना)।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना क्यों की गई?
2) आम सभा और सुरक्षा परिषद के फैसलों में मुख्य अंतर क्या होता है?
3) वीटो पावर से आप क्या समझते हैं? संयुक्त राष्ट्र में यह पावर किसे हासिल है?

बोध प्रश्न 1 उत्तर
1) संयुक्त राष्ट्र का जन्म अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बहाल करने, राष्ट्रों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध विकसित करने, अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं मानवीय समस्याओं का हल ढूँढने तथा मानवाधिकारों का संवर्द्धन करने के लिए हुआ था।
2) आम सभा केवल अनुशंसा कर सकती है जबकि सुरक्षा परिषद फैसले करती है और उस पर अमल भी करती है। अनुशंसाएँ सदस्य राज्यों के लिए बाध्यकारी नहीं होती, किन्तु फैसले बाध्यकारी होते हैं। किसी प्रस्ताव पर सहमति इंकार कर देने की ताकत अर्थात् खिलाफ में मतदान करने की ताकत ‘‘वीटो पावर” कहलाता है। ये अधिकार संयुक्त राष्ट्र के पांच स्थायी सदस्यों को उपलब्ध है। ये सदस्य हैं – चीन, फ्रांस, रूसी संघ, यूनाइटेड किंग्डम तथा संयुक्त राज्य अमरीका ।

संयुक्त राष्ट्र की बदलती भूमिका
संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का अध्ययन दो शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है-शीतयुद्ध काल और शीतयुद्धोत्तर काल।

 शीतयुद्ध काल
खंड 7 के अध्ययन से हमें पता चलता है कि शीतयुद्ध की दुर्घटनाओं में से सबसे बड़ी दुर्घटना संयुक्त राष्ट्र को ही झेलनी पड़ी है। शीतयुद्ध का जोर इतना भयानक था कि संयुक्त राष्ट्र दुनिया में शांति और सरक्षा बहाल करने का अपना बनियादी कार्य भी नहीं कर सका। सुरक्षा परिषद भी स्थायी सदस्यों द्वारा वोटो के इस्तेमालध्गलत इस्तेमाल किये जाने की वजह से निष्क्रिय बनी रही। इन महाशक्तियों की टकराहट के कारण दुनिया में बड़े संघर्षों की कुल 100 वारदातें हुई हैं जिनमें 2 करोड़ लोगों की मौतें हुई है। सुरक्षा परिषद इनमें से केवल दो अवसरों पर अपनी कार्रवाई से शांति बहाल करने में कामयाब हुई है-1950 में कोरियाई संकट के अवसर पर तथा 1990-91 में ईराक कुवैत संकट के अवसर पर। अन्य किसी भी मामले में यह कोई भी कार्रवाई नहीं कर सकी क्योंकि किसी न किसी स्थायी सदस्य के द्वारा वीटो लगा दिया गया। संयुक्त राष्ट्र में अब तक 280 बार वीटो का प्रयोग किया गया है। इनमें से आधे का प्रयोग तो शीतयुद्ध के प्रथम 10 वर्षों में ही कर दिया गया था। परिषद के सभी स्थायी सदस्यों ने वीटो का प्रयोग कभी न कभी अवश्य किया है किन्तु रूस और अमरीका इन दो महाशक्तियों ने अंधाधुंध प्रयोग किया जिसमें केवल सोवियत संघ ने 117 बार वीटो का प्रयोग किया। वीटो के बार बार प्रयोग कुप्रयोग की वजह से सुरक्षा परिषद कई गंभीर मसलों पर कोई प्रस्ताव पास नहीं कर सकी । नतीजतन, सुरक्षा परिषद की भूमिका का ह्रास हुआ है।

शीतयुद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र को कई संकटपूर्ण स्थितियों का सामना करना पड़ा जैसे कोरियाई संकट (1950), फिलीस्तीन का मुद्दा, कश्मीर के सवाल पर भारत-पाक विवाद, स्वेज संकट, (1956) हंगरी में सोवियत दखलंदाजी (1956), कांगों संकट (1960-64), अफगानिस्तान का सोवियत अधिग्रहण (1979-88), कम्पुचियाई संकट (1978), तथा ईरान-ईराक युद्ध, (1980-88), इनमें से अधिकांश मामलों में वीटो की वजह से सुरक्षा परिषद तय नहीं कर पायी कि संकट के समाधान के लिए वह कौन सी कार्रवाई करे। इन्हीं परिस्थितियों में आम सभा को 1950 में पारित मशहूर शांति के लिए एकता प्रस्ताव के अंतर्गत कार्रवाई करनी पड़ी। इस प्रस्ताव में आम सभा को प्राधिकृत किया गया था कि वह सूचना देकर 24 घंटे के अन्दर बैठक का आयोजन कर सकती है तथा अशांत क्षेत्र में शांति और सुरक्षा की बहाली के लिए उचित कार्रवाई की अनुशंसा कर सकती है। आमसभा इस प्रस्ताव का सहारा तभी ले सकती है जब सुरक्षा परिषद वीटो की वजह से पंगु बन गयी हो। ऐसी परिस्थितियों में आम सभा उन अधिकारों का प्रयोग करने लगी है जो घोषणा पत्र द्वारा केवल सुरक्षा परिषद को प्रदान किये गये थे।

शांति के लिए एकता प्रस्ताव के अंतर्गत आमसभा ने कई आपातकालीन सत्र आयोजित किये हैं जैसे स्वेज, हंगरी, कांगो, अफगानिस्तान, नामीबिया आदि संकटों के दौरान । स्वेज संकट के दौरान आमसभा ने शांति बहाल करने के लिए एक सर्वथा नवीन तरीका अपनाया था। इसने स्वेज में शांति सेना को रवाना किया। यह एक ऐसी सेना थी जो शांति बहाल करने के लिए युद्ध नहीं करती थी, अपितु संघर्षी पक्षों के बीच और उनकी राय से युद्ध विराम रेखा पर तैनात होकर, अवरोधक का काम करती थी। ऐसी ही सैन्य टुकड़ियाँ कांगों और अन्य स्थानों में भी भेजी गयी थी।

1970 में दोनों शीत लड़ाकों, रूस और अमरीका के बीच तनाव शैथिल्य का सूत्रपात होते ही सुरक्षा परिषद को अपनी पुरानी महत्ता मिल गयी। नतीजतन शीतयुद्ध सचमुच ही ठंडा पड़ गया और वीटो का भी पहले की तरह बारंबार प्रयोग नहीं किया गया।

शीतयुद्धोत्तर काल
उल्लेखनीय है कि 1945 से 1987 के बीच संयुक्त राष्ट्र ने शांति स्थापना की तेरह कार्रवाईयों को अंजाम दिया। ऐसी शांति कार्रवाइयाँ बेहद सफल रही तो इसीलिए कि इन सेनाओं में गुटनिरपेक्ष देशों के सैनिक शामिल थे। महाशक्तियों को अपने सैनिक भेजने से रोक दिया गया था। इस क्षेत्र में महा उपलब्धियों के लिए संयुक्त राष्ट्र की शांति सैन्य टुकड़ियों को 1988 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। किन्तु शीत युद्ध के उपरांत प्रथम पांच वर्षों में संयुक्त राष्ट्र को जितनी संकटपूर्ण स्थितियों का सामना करना पड़ा, उतनी संकटपूर्ण स्थितियाँ शीतयुद्ध के दौरान किसी भी पाँच सालों की अवधि में पैदा हुई थीं। ईराक-कुवैत संकट सहित संयुक्त राष्ट्र को कई अन्य अंतर्राज्य संघर्षों अथवा गृहयुद्धों का सामना करना पड़ा। शीतयुद्ध के बाद 20 से ज्यादा शांतिपरक कार्रवाइयाँ की गयी है। इन शांति कार्रवाइयों में पिछले 50 वर्षों में करीब 6,50,000 लोगों ने भाग लिया तथा कर्तव्य निर्वहन के दौरान इनमें से 1,145 लोगों की मौत हुई । इन कार्रवाइयों में संयुक्त राष्ट्र को 11 खरब डालर खर्च करने पड़े। 1995 के जुलाई महीने के अंत तक करीब 70,000 शांति सैनिक संयुक्त राष्ट्र की 16 कार्रवाइयों में शामिल थे। इनका कुल वार्षिक बजट 3.6 खरब डालर था। इस तरह हम देखते हैं कि शीतयुद्धोत्तर परिदृश्य में सदस्य राज्यों को संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता का फिर से अहसास हुआ है। वे मानने लगे हैं कि शांति और सुरक्षा के लिए जो विश्व समस्याएँ पैदा हो गई हैं, उनका निदान संयुक्त राष्ट्र ही कर सकता है।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) शांति के लिए एकता प्रस्ताव का क्या महत्त्व है?
2) शांति सेना पद की व्याख्या करें।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) शांति के लिए एकता प्रस्ताव आम सभा को संकटपूर्ण हालात पर चर्चा करने व तदनुरूप कार्रवाई करने का अधिकार प्रदान करता है खासकर वैसी स्थिति में जब सुरक्षा परिषद वीटो की समस्या की वजह से कोई फैसला नहीं कर पाती।
2) शांति अनुरक्षण बल का मतलब है सैनिक टुकड़ी एक ऐसी टुकड़ी जिसे अशांत क्षेत्र में, झगड़े में शामिल दोनों पक्षों की अनुमति से, भेजा जाता है। यह टुकड़ी वास्तविक लड़ाई में हिस्सा नहीं लेती है, बल्कि युद्ध विराम रेखा पर तैनात होती है और दोनों के बीच अवरोधक का काम करती हैं। आत्म रक्षा को छोड़कर यह टुकड़ी कभी भी गोलीबारी में शामिल नहीं होती है।

 कछ उपलब्धियाँ और कमियाँ
किसी भी अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की तरह, संयुक्त राष्ट्र की अगर अनेक उपलब्धियाँ रही हैं तो अनेक कमियाँ भी रही है। सदस्यों के सहयोग के चलते कई क्षेत्रों में इसे कामयाबी मिली। फिर जिन प्रतिबंधों और शर्तों के साथ इसे काम करना पड़ता है, उनमें यह कई संदर्भो में असफल भी रहा। स्थानाभाव के कारण, यहाँ संयुक्त राष्ट्र की केवल खास उपलब्धियों और कमियों का विवरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

उपलब्धियाँ
1) संयुक्त राष्ट्र की महान उपलब्धियों में से एक उपलब्धि वि-उपनिवेशीकरण के क्षेत्र में रही है। औपनिवेशिक शासन में रहने वाले एशिया और अफ्रिका के लाखों लोगों को इसने स्वतंत्रता और स्वनिर्धारण के अधिकारों के प्रति सजग बनाया। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय इसके वर्तमान सदस्यों में 80 सदस्य औपनिवेशक शासन के अंतर्गत थे। संयुक्त राष्ट्र इनमें से कइयों की मुक्ति में सहायक रहा।
2) मानवाधिकारों के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की उल्लेखनीय भूमिका रही है। इसने मानवाधिकारों से संबंधित एक व्यापक सूची बनाई है। इस सूची में उचित आचार संहिता और मानकों का समावेश है। इन मानकों ने संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलनों, उसकी उद्घोषणाओं और उसके संयोजनों के 88 तरीकों की खोज कर ली है।
3) संयुक्त राष्ट्र के अस्तित्व में आने के बाद प्रथम 50 वर्षों में जितने अंतर्राष्ट्रीय कानून बने उतने पूर्ववर्ती मानव इतिहास के कुल काल-खंड में भी नहीं बने। अंतर्राष्ट्रीय कानून को औपचारिक स्वरूप प्रदान कर राष्ट्रों के बीच कानून के शासन की महत्ता कायम करने की दिशा में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
4) 1980 में संयुक्त राष्ट्र की विशेषज्ञ एजेंसी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पूरी दुनिया से चेचक को समाप्त कर देने का दावा किया। यह उसके 13 वर्षीय विश्व कार्यक्रम का नतीजा था।
5) 1991 में विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के मुखियाओं ने सत्यापित किया कि दुनिया के 80 प्रतिशत बच्चों को छह जानलेवा बीमारियों पोलियो, टिटनेस, खसरा, काली खाँसी, डिप्थिरिया तथा टी. बी. से निजात दिलाने के लिए प्रतिरोधी टीके लगाये जा चुके हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा यूनिसेफ के संयुक्त कार्यक्रमों से प्रतिवर्ष दुनिया के 35 लाख से ज्यादा बच्चों की जान बचा ली जाती है।
6) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू एन डी पी) द्वारा पूरी दुनिया में सामाजिक और आर्थिक विकास के सराहनीय कार्य किए गए हैं। यू एन डी पी विकासशील देशों की सरकारों के साथ मिलकर विविध क्षेत्रों जैसे कृषि, उद्योग और शिक्षा के क्षेत्र में, विविध परियोजनाओं को अंजाम देने का कार्य करता है। यह दुनिया का सबसे बड़ा बहुआयामी अनुदान संगठन है। 1.3 खरब डालर के वार्षिक बजट के साथ यह तकरीबन 150 विकासशील देशों और क्षेत्रों में 6100 परियोजनाओं की सहायता करता है। इसके अलावा यू एन डी पी से वित्तीय सहायता प्राप्त गतिविधियों में निजी और सार्वजनिक स्रोतों से करीब 14 खरब डालर निवेश किए जाते हैं। यू एन डी पी कोष का 50 प्रतिशत से अधिक भाग दुनिया के 45 निर्धनतम देशों की परियोजनाओं पर ही खर्च हो जाता है।
7) फिलहाल संयुक्त राष्ट्र दुनिया के करीब 2.4 करोड़ शरणार्थियों को संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी महामुक्त के जरिये मानवीय सहायता (रोटी, आवास, चिकित्सा व शिक्षा) मुहैया करा रहा है। 1995 के आकलन के अनुसार इन मदों पर 1 खरब डालर से ज्यादा का खर्चा आया था। अपनी भूमिका के लिए यू एन एच सी आर को दो- दो बार सन 1954 व 1981 में, नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
कमियाँ/ असफलताएँ
संयुक्त राष्ट्र की असफलताओं के मुख्य दो कारण रहे हैं:
1) जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली को सबसे बड़ी समस्या सदस्यों द्वारा वीटो का इस्तेमाल करना रहा है।
2) आज संयुक्त राष्ट्र की दूसरी सबसे बड़ी समस्या उसका विटीय संकट है। पहले भी छठे दशक में इसे इस समस्या से जझना पडा था क्योंकि फ्रांस और सोवियत संघ ने शांति बहाली की इसकी कार्रवाइयों के लिए अंशदान करना अस्वीकार कर दिया था। अन्य राज्यों के साथ इन दोनों राज्यों ने संयुक्त राष्ट्र की आपातकालीन सेना (स्वेज में तैनात) तथा का कारवाई के अंशदान करना अस्वीकार कर दिया था। उनकी दलील थी कि आम मेरमान गठन केवल सुरक्षा परिषद के फैसले के आधार पर हो कि छहे दा य समस्या का समाधान अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के सहयोग से लिया था। जापानि स आग्रह किया गया कि वह अपने परामर्शकारी विचार के हवाले से यह बताये कि क्या शांति बहाली के निमित होने वाले खर्च को संयुक्त राष्ट्र का खर्च माना जा सकता है। न्यायालय ने बहुमत के आधार पर लिए गये अपने फैसले में कहा कि घोषणा पत्र के प्रावधानों के अंतर्गत शांति बहाली का खर्च वस्तुतः संगठन का खर्च होता है।
8वें दशक से जो वित्तीय संकट शुरू हुआ है, वह पिछले संकटों से भिन्न है। इसके लिए संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति का फैसला जिम्मेदार है जिसके तहत उसने अपना स्वीकृत अंशदान यह कहकर रोक लिया था कि संयुक्त राज्य अमरीका की सरकार संयुक्त राष्ट्र के कुछ खास कार्यक्रमों को स्वीकार नहीं करती। राष्ट्रपतियों जिनमें बिल क्लिंटन भी शामिल है, उनहोंने भी ऐसा किया। परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र दिवालियापन की कगार पर आ खड़ा हुआ है। आम सभा द्वारा तय किए गए फार्मूले के अनुसार, अमरीका को संयुक्त राष्ट्र के कुल बजट में 25 प्रतिशत का अंशदान करना होता है। कुछ अन्य राज्यों ने भी अपने बकाया राशि का भुगतान समय पर नहीं किया है। चाहे नियमित बजट का मामला हो अथवा शांति बहाली की कार्रवाइयों का। आमसभा में महासचिव द्वारा वर्ष 95 के लिए प्रस्तुत वार्षिक रपट के अनुसार, 10 अगस्त 1995 तक नियमित बजट में न चुकाए गए अंशदान की राशि 85.82 करोड़ डालर थी (इनमें से 45.61 करोड़ डालर वर्ष 1995 के लिए तथा 40.21 करोड़ डालर वर्ष पिछले वर्ष के लिए है।) तथा शांति प्रयास की कार्रवाइयों के मद में यह राशि 3 खरब डालर थी। इनमें 70 प्रतिशत बकाया 5 बड़े अंशदाताओं (संयुक्त राज्य अमरीका इनमें सबसे बड़ा है) के नाम है। मालूम हो कि ये सभी दुनिया के धनी देशों में से एक है।

वर्तमान वित्तीय संकट के हल के लिए ही नहीं, अपितु संयुक्त राष्ट्र के लिए स्वायत्त धन स्रोत सुनिश्चित करने के लिए भी कई दिलचस्प सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं ताकि संयुक्त राष्ट्र की सदस्य राज्यों पर निर्भरता कम हो सके । इनमें प्रमुख सुझाव निम्नांकित हैं-
प) खास हथियारों की बिक्री पर अंतर्राष्ट्रीय कर।
पप) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कर।
पपप) अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों के इस्तेमाल पर शुल्क लेने की व्यवस्था।
पअ) अंतर्राष्ट्रीय डाक और दूर संचार पर कर।
अ) अंतर्राष्ट्रीय यात्रा पर कर अथवा अंतर्राष्ट्रीय पासपोर्ट शुल्क ।
अप) अंतरिक्ष के इस्तेमाल पर लाइसेंसिंग शुल्क ।
अपप) गहरे समुद्र में मछली मारने का अधिकार अथवा खनिज संपदा के खनन का अधिकार प्राप्त करने के लिए शुल्क लेने की व्यवस्था क्योंकि यह मानवता की सामूहिक विरासत है।
हालांकि किसी भी सदस्य राज्य ने इन सुझावों को स्वीकार नहीं किया है।

संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था का पुनर्गठन-मुख्य सुझाव और भारत का दृष्टिकोण
31 जनवरी, 1992 को सुरक्षा परिषद में शामिल देशों के अध्यक्षों की बैठक हुई थी, तभी से संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन को लेकर विश्व स्तरीय बहस भी जारी है। इस संदर्भ में अनेक सुझाव दिए गए हैं। इन सुधारवादी प्रस्तावों का मुख्य मकसद विश्व संस्था खासकर सुरक्षा परिषद को और अधिक लोकतांत्रिक, सक्षम तथा बदलते अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के अनुकूल बनाना है। चूंकि संयुक्त राष्ट्र की जिम्मेवारियाँ एवं उसके सरोकार विश्वव्यापी है तथा उसका विस्तार आज मानवीय गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र में हो चुका है, इसलिए संयुक्त राष्ट्र का पुनर्गठन अनिवार्य हो गया है । तभी वह 21वीं सदी की चुनौतियाँ का सामना कर सकेगा।
अनेक अध्ययनों के आधार पर संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के पुनर्गठन के लिए अनेक सुझाव दिए गए हैं। ये निम्नांकित हैं-
1) सुरक्षा परिषद की सदस्यता 15 से बढ़ाकर 23 या 25 कर दी जानी चाहिए । इनमें से 5 परिषद के अतिरिक्त स्थायी सदस्य होंगे-2 औद्योगिक देश (जर्मनी एवं जापान) तथा तीन बड़े विकासशील देश (ब्राजील, भारत और नाइजीरिया)। कहा जाता है कि पूर्व महासचिव बुतरस घाली ने इन देशों के। नाम 14 अगस्त 1992 को सुझाए थे। वस्तुतः 25 सितम्बर, 1992 को बुलाई गई आमसभा के सत्र में भारत ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए अपना औपचारिक दावा पेश किया। चूंकि भारत उन तमाम शतों को पूरा करता था जो स्थायी सदस्यता प्राप्त करने के लिए जरूरी माने गये थे। अतः यह आशा की जा रही थी कि सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी स्थान प्राप्त हो जाएगा। शर्त थी कि पद की आकांक्षा रखने वाले राज्य के पास शांति बहाली की कार्रवाइयों में अंशदान करने की क्षमता एवं चाहत दोनों हो । जब से संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई है, तभी से भारत ऐसी कार्रवाईयों में अग्रणी रहा है चाहे वह कोरियाई संकट की हो या फिर हिन्द-चीन, स्वेज, कांगो एवं गाजा आदि के संकट हों।
एक और भी प्रस्ताव है। इसके अनुसार जो देश उपर्युक्त शर्त को पूरा करते हैं, उन्हें सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता तो दी जाएगी किन्तु उन्हें वीटो का अधिकार नहीं होगा। अन्य सुझावों में एक सुझाव यह था कि जिन पाँच देशों के पास आज वीये का अधिकार है, वे स्वेच्छा से अपने अधिकार का परित्याग तब तक के लिए कर दें जब तक कि घोषणा पत्र में संशोधन कर वीटो के अधिकार को औपचारिक रूप से समाप्त नहीं कर दिया जाता है। भारत इस प्रस्ताव का समर्थन करता है किन्तु वह किसी भी ऐसी चाल का विरोध करता है जो नये सदस्यों को वीटो के अधिकार से वंचित करती है। इनमें से कुछ प्रस्तावों पर आम सभा के 49वें सत्र में खुले रूप में कार्य समूह के बीच चर्चा की गयी थी। कार्यसमूह सुरक्षा परिषद के विस्तार की जरूरत से सहमत था, किन्तु इसने इस सवाल पर विचार नहीं किया कि किन देशों को स्थायी सदस्यता दी जानी चाहिए। अमरीका ने । जर्मनी एवं जापान की सदस्यता का तो खुले रूप से समर्थन किया है, किन्तु भारत की उम्मीदवारी पर अभी भी संकोच कर रहा है। फिर मिश्र, इरान तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देश भी तो होड़ में शामिल हैं।
2) एक सुझाव यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण आयोग को भंग कर उसके स्थान पर संयुक्त कार्य समूह का गठन किया जाये। यह आम सभा एवं सुरक्षा परिषद के अलावा होगा।
3) चूँकि आर्थिक और सामाजिक परिषद अपने निर्धारित कार्यों को अंजाम देने में नाकामयाब रही है, अतः सुझाव है कि इसकी वजह आर्थिक सुरक्षा परिषद के नाम से एक नये निकाय का गठन किया जाये। प्रस्तावित आर्थिक सुरक्षा के परिषद के कामों में, अन्य कामों के अलावा, आर्थिक आपात स्थितियों से निपटना तो शामिल है ही, कुछ असैनिक खतरों जैसे पर्यावरणीय अपक्षरण, आहार सुरक्षा, नशीली वस्तुओं का पारगमन, आव्रजन आदि पर भी विचार करना इसी का काम होगा। प्रस्ताव के अनुसार इस परिषद में सदस्यता सीमित होनी चाहिए और किसी भी स्थिति में सदस्यों की संख्या 25 से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और निर्णय सर्वानुमति से लिए जाएंगे।
कइयों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका कहना है कि आर्थिक एवं सामाजिक परिषद और प्रस्ताविक आर्थिक सुरक्षा परिषद में वस्तुतः कोई अंतर नहीं है, सिवाय नाम को छोड़कर। फिर वर्तमान संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र के अंतर्गत आर्थिक और सामाजिक परिषद को व्यापक अधिदेश (मंडेट) भी प्राप्त है जिससे वह आर्थिक, सामाजिक एवं मानवीय सरोकार के मसलों का सामना कर सकती है। सच तो यह है कि हाल के दिनों में आर्थिक और सामाजिक परिषद उच्च सरकारी स्तर पर पर्यावरण, मानवाधिकार, सामाजिक विकास, अनुरक्षित आर्थिक विकास, आदि से जुड़े मसलों को सुलझाने की कोशिश करती रही है और यही कारण है कि वे आर्थिक और सामाजिक परिषद के पुनर्गठन का कोई औचित्य नहीं देख पाते ।
4) आर्थिक और सामाजिक परिषद के बदले आर्थिक परिषद तथा सामाजिक परिषद का गठन हो। इन नयी परिषदों में 23 सदस्य होंगे।
5) संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास कांफ्रेस, संयुक्त राज्य औद्योगिक विकास संगठन (यूनिडो) तथा ट्रस्टीशिप परिषद को भंग किया जाये। यूनिडो को भंग करने के सवाल पर जहाँ सामान्य सहमति है, वहीं शेष दो के बारे में यह कहा गया है कि वे बहत ही उत्कृष्ट काम कर रहे हैं और उन्हें भंग करने करने की कोई जरूरत नहीं है।
6) अंतर्राष्ट्रीय पुनर्गठन और विकास बैंक (आई बी आर डी) तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को संयुक्त राष्ट के अधीन लाया जाना चाहिए। अभी तो केवल नाम के लिए ये विशेषज्ञ एजेंसियाँ हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ उनकी सहमति काफी सीमित है और स्वतंत्र संगठन के रूप में कार्य भी करते हैं। नतीजतन, उन पर संयुक्त राष्ट्र का कोई जोर नहीं चलता, न ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर (यानी आर्थिक और सामाजिक परिषद) और न ही सचिवालयीय स्तर पर। वे संयुक्त राष्ट्र को तमाम जानकारियाँ नहीं मुहैया कराती, भले ही संयुक्त राष्ट्र को उनकी जरूरत हो। अपनी बैठकों में भी उनकी संयुक्त राष्ट्र तक पहुंच नहीं होती,उनके प्रमुख आथिक और सामाजिक परिषद को प्रतिवर्ष संबोधित करते हैं, किन्तु वे अपनी वार्षिक सभाओं में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को आमंत्रित नहीं करते। अपने बजट के निर्माण में भी वे संयुक्त राष्ट्र के किसी फैसले को बाध्यकारी मानते हैं। यह स्थिति धनी और
औद्योगिक राज्यों की नीतियों से पैदा हुई है। इन संस्थाओं पर इन्हीं राज्यों का आधिपत्य कायम है।इनमें से कुछ प्रस्तावों पर दुनिया की 185 राजधानियों और संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में गंभीर बहस चल रही है। जब तक इन रचनात्मक प्रस्तावों के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र का पुनर्गठन नहीं हो जाता तब तक इसकी कार्यप्रणाली में कोई सुधार नहीं होगा।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) किन संगठनों को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित गया था?
2) किस देश पर संयुक्त राष्ट्र की देय राशि सबसे ज्यादा है ?

 बोध प्रश्नों के उत्तर
बोय प्रश्न 3
1) शांति संरक्षक बल को 1988 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
यू एन एच सी आर को यह पुरस्कार दो बार सन 1954 व 1981 में मिला ।
2) संयुक्त राज्य अमरीका सबसे बड़ा कर्जदार है। इस पर संयुक्त राष्ट्र का 52.7 करोड़ डालर का एक कर्ज (नियमित बजट का) और 55.3 करोड़ डालर का दूसरा कर्ज शांति संरक्षण देय है।

सारांश
इस इकाई में संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों, उनके मुख्य अंगों व विशेषज्ञ एजेंसियों की संरचना और कार्यो, शीतयुद्ध के पहले और उनके उपरांत इसकी बदलती भूमिका, इसकी कतिपय मुख्य उपलब्धियों तथा असफलताओं, उसकी समस्याओं और संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के पुनर्गठन के लिए सुझाए गए प्रस्तावों का सर्वेक्षण किया गया है। इसमें संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में सुधार की महती आवश्यकता को भी रेखांकित किया गया है।

 शब्दावली
संघर्ष ः एक ऐसी स्थिति जहाँ एक या अधिक देशों द्वारा परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से सैन्य बल का प्रयोग किया जाता है।
वीटो ः घोषणा पत्र द्वारा सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों को प्रदत्त वे विशेषाधिकार जिनके तहत वे किसी ठोस प्रस्ताव पर नकारात्मक वोटिंग कर सकते हैं अथवा उसे पारित होने से रोक सकते हैं।
तनाव शैथिल्य ः इसका अर्थ है दो देशों के तनाव पूर्ण रिश्तों में शिथिलता।
प्रस्ताव ः किसी दिए गए सवाल पर सोच विचार कर व्यक्त किए गए औपचारिक कथन का स्वीकृत व प्रमाणिक दस्तावेज ।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
चिल्डर्नस, अर्सकीन व अर्कहार्ट, ब्रायन, 1994, रिनिविंग दि यूनाइटेड नेशन्स सिस्टम (उपासला: डैगू हैमर्सजोल्ड फाउंडेशन)
फासेट, एरिक व न्यूकम, हाना, (संपादित), यूनाइटेड नेशन्स रिफार्मः लूकिंग अहेड फिफ्टी इयर्स, 1995 टोरंटो साइंस फार पीस।
राजन, एम एस (संपा) 1996, यूनाइटेड नेशन्स एट फिफ्टी एण्ड बियोन्ड, नई दिल्ली, लैन्सर्स बुक ।
रोबर्ट्स, एडम एण्ड कंग्सबरी, बेनेडिक्ट, ( संपा.) 1993 यूनाइटेड नेशन्स, डिवाइडेड वर्ल्ड: दि यूएन्स रोल इन इंटरनेशनल रिलेशन्स, द्वितीय प्रकाशन ऑक्सफोर्डः ऑक्सपोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ।
यूनाइटेड नेशन्स, बेसिक फैक्ट्स, अपडेट दि यूनाइटेड नेशन्स, न्यूयार्क, डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक इन्फॉर्मेशन 1975