खाड़ी युद्ध क्या था | खाड़ी युद्ध के कारण और परिणाम का वर्णन करें | प्रभाव क्या हुए khadi war in hindi

By   October 2, 2020

khadi war in hindi खाड़ी युद्ध क्या था | खाड़ी युद्ध के कारण और परिणाम का वर्णन करें | प्रभाव क्या हुए ? पहला और दूसरा खाडी युद्ध , प्रथम तथा द्वितीय |

खाड़ी युद्ध
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
खाड़ी युद्ध के कारण
संघर्ष की जड़ें
खाड़ी युद्ध के समय अंतर्राष्ट्रीय स्थिति
कुवैत के खिलाफ इराकी कार्रवाई
कुवैत पर विजय एवं कब्जा
कुवैत की मुक्ति
संयुक्त राज्य की अगुआई में 28 देशों का गठबंधन
इराक के खिलाफ प्रतिबंध और कुवैत की संप्रभुता की बहाली
खाड़ी युद्ध का प्रभाव
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई में शीतयुद्ध के अंत के बाद पश्चिम एशिया में भड़के पहले मुख्य संकट की चर्चा की गयी है। इराक द्वारा कुवैत पर कब्जा करने के साथ जिस खाड़ी युद्ध का आरंभ हुआ था, वह अंततः इराक की हार के साथ समाप्त हो गया। इस खंड के अध्ययन के पश्चात् आपः
ऽ प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति से लेकर कुवैत के खिलाफ इराकी कार्रवाई करने के बीच घटनाक्रमों का पता लगा सकेंगे,
ऽ कुवैत के खिलाफ कार्रवाई करने तथा अंततः उस पर कब्जा करने के इराकी फैसले का विश्लेषण कर सकेंगे,
ऽ संयुक्त राज्य अमेरीका, सोवियत संघ व पश्चिमी एशियाई देशों की प्रतिक्रियाओं की व्याख्या कर सकेंगे,
ऽ संक्षेप में खाड़ी युद्ध के घटनाक्रमों का पुनःस्मरण कर सकेंगे,और
ऽ इराक के खिलाफ अमरीकी अगुआई में की गयी कार्रवाई के नतीजों का विवेचन कर सकेंगे।

प्रस्तावना
शीत युद्ध करीब 45 वर्षों तक चला। यह द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ यानी 1945 में ही शुरू हो गया था। कोई भी नहीं जानता कि शीतयुद्ध की शुरुआत किस नियत तिथि से हुई थी। खंड 7 में आपको शीतयुद्ध के अर्थ, उसके ढाँचे तथा विविध आयामों के बारे में जानकारी दी गयी थी। वह राजनीतिक युद्ध दोनों खेमों के नेताओं के मानसिक स्तर पर लड़ा गया था। शीतयुद्ध में शामिल महाशक्तियों ने अपने राजनीतिक संबंध नहीं तोड़े न ही सैन्य शक्ति का इस्तेमाल किया। यह अलग बात है कि दोनों के बीच तीव्र तनाव तो कभी तनाव शैथिल्य की स्थितियाँ आती रहीं। शीतयुद्ध अंततः 1989 के उत्तरार्द्ध में समाप्त हुआ जब अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव ने मिलकर दुनिया को शांति व विकास के पथ पर नेतृत्व देने का संकल्प लिया। तथापि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में तनाव अपरिहार्य रूप से मौजूद रहते हैं। संघर्ष अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। इसे रोका नहीं जा सकता।

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, 1990-91 में पश्चिम एशिया में पहला अंतर्राष्ट्रीय संकट उभरा। तेलसमूह पड़ोसी राज्य कुवैत पर इराक का आक्रमण अंततः उस पर जीत के साथ इराक द्वारा उसे अपना उन्नीसवां राज्य घोषित करना इस संकट का प्रथम चरण था। कुवैत से इराक को हटाने के सभा प्रयास जब विफल हो गये तथा संकट का शांतिपूर्णहल असंभव प्रतीत होने लगा तब सुरक्षा परिषद् द्वारा प्राधिकृत संयुक्त राज्य अमरीका की अगुआई में 28 देशों के गठबंधन ने इराक पर चढ़ाई कर कुवैत के मुक्त करा दिया। यह खाड़ी युद्ध का द्वितीय चरण था इसे खाड़ी युद्ध प्प् की संज्ञा भी दी जा सकती है। 1980-88 के बीच हुए इराक-ईरान युद्ध को प्रथम खाड़ी युद्ध के नाम से जाना जाता है । वह दीर्घकालिक युद्ध बहुत हद तक अनिर्णित समाप्त हुआ था, यद्यपि इराक अंततः लाभ पाने का दावा करता रहा। चूंकि ईरान पहले ही अयातुल्ला खुमेनी के कठमुल्लावादी प्रशासन को अंगीकार कर चुका था, अंतः इस युद्ध में अमरीकियों ने मोटे तौर पर इराक का ही समर्थन किया था। हाँ, वह सीधे रूप में इस युद्ध में शामिल नहीं था। इस इकाई में इराक-इरान युद्ध की चर्चा करना मकसद नहीं है । वह 1990-91 का खाड़ी युद्ध ही था जिसने अंतर्राष्ट्रीय शांति के लिए खतरा पैदा कर दिया था। पूरे युद्ध को विचारधारात्मक रंग देने के लिए इराक ने इसे अरब-इजराइल युद्ध में तबदील करने का भी प्रयास किया था। इराक द्वारा उकसाये जाने के बावजूद इजराइल जवाबी कार्रवाई करने में संयम का सहारा लेता रहा। खाड़ी युद्ध के दौरान पूरब-पश्चिम के बीच अभूतपूर्व सहयोग देखा गया, यद्यपि सोवियत संघ ने इराक के खिलाफ अपनी सैन्य टुकड़ियाँ नहीं भेजी थी। इस खंड में 1990-91 के द्वितीय खाड़ी युद्ध की चर्चा की गई है।

खाड़ी युद्ध के कारण
पश्चिम एशिया (मध्यपूर्व) के फारस की खाड़ी क्षेत्र में कई तेलसमृद्ध राज्य हैं। इसमें अरब के अनेक देश जैसे, इराक, कुवैत, सीरिया, जोर्डन, साउदी अरबिया तथा संयुक्त अरब अमीरात शामिल है। कुछ गैर अरब देश भी हैं जिनमें ईरान, नवयहूदी राज्य इजरायल प्रमुख हैं। ईरान को छोड़कर इनमें से अधिकांश राज्य ऑटोमेन साम्राज्य के भाग थे। यह साम्राज्य प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान टकी की पराजय के बाद ढह गया था। पश्चिम एशिया के अनेक गैरटर्की क्षेत्र टर्की से बाहर आ गये थे, किन्तु उन्हें आजादी नहीं दी गई थी। राष्ट्रकुल की मेडेट व्यवस्था के अंतर्गत वे या तो फ्रांस या ब्रिटेन के अधीन मेडेटड क्षेत्र घोषित कर दिए गए थे। ईराक उनमें से एक था जिसे ऑटोमेन साम्राज्य से अलग कर ब्रिटिश मेडेट घोषित कर दिया गाया था।

संघर्ष की जड़ें
संघर्ष की जड़ें प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ऑटोमेन साम्राज्य के पतन, 1920 में इराक के निर्माण (शुरू में ब्रिटिश मेडेट के रूप में) तथा ब्रिटिश प्रोटेक्टोरेट के रूप में कुवैत के गठन में ढूँढी जा सकती है। 1961 में कुवैत को आजादी दी गयी तथा अलसवा परिवार को सत्ता सौप दी गयी। 1990 में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को लगा कि वे अपने राज्य की सीमा का विस्तार कुवैत जैसे छोटे किन्तु अत्यंत समृद्द व सैन्य दृष्टि से कमजोर राज्य पर कब्जा जमाकर कर सकते हैं । जैसा कि माइकेल ब्रेचर ने टिप्पणी की थी, “यह राष्ट्रपति सद्दाम हुसेन के आकलन का नतीजा था। उन्हें लगा कि 1990 में यह अवसर उन्हें हासिल हो गया है जिससे वे अत्यंत धनी किन्तु सैन्य दृष्टि से कमजोर पड़ोसी को हड़पकर इराक के सपनों को पूरा कर सकते हैं। इराक के फैसले से शुरू में तो द्विपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय संकट पैदा हुआ था, किन्तु बाद में वह वैश्विक संकट में तबदील हो गया। 1961 में ही इराक ने कुवैत को राज्य का दर्जा दिए जाने पर आपत्ति की थी और तभी से वह कुवैत को इराक में शामिल करने की कोशिश करता रहा था। इरान-इराक युद्ध के बाद, सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में इराक ने हथियारों का बड़ा जखीरा जमा कर लिया था जिसमें 10 लाख सेना, उन्नत किस्म के सोवियत टैंक व लड़ाकू विमान तथा रासायनिक और जैविक हथियारों का जखीरा शामिल था। साथ ही, इराक ने युद्ध के लिए अरब देशों से भारी मात्रा में कर्ज भी लिए थे। उसके अर्थतंत्र का बुरा हाल था। अगर कुवैत उसके कब्जे में आ जाता, तो इराक की अर्थव्यवस्था को काफी सहारा मिल जाता। इराक और कुवैत के बीच सीमा विवाद काफी पुराना था, खासकर सामाजिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बुबियान व वार्बा क्षेत्रों तथा बहुमूल्य रूमैला तेल क्षेत्र को लेकर।

राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने हुसैन को अपना मुख्य निशाना बनाया। 17 जुलाई 1990 को राष्ट्रपति हुसैन ने आरोप लगाया कि कुवैत एवं संयुक्त अरब अमीरात ओपेक द्वारा निर्धारित कोटे से ज्यादा तेल का उत्पादन कर रहे हैं। इससे तेल की कीमतें घटी है तथा इराक को तेल राजस्व का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इराक का कहना था कि उसे 14 खरब डालर का नुकसान हुआ है। अतः इराक ने कुवैत और संयुक्त अमीरात को तेल उत्पादन में कटौती करने के लिए कहा। फिर धमकी भी दी अगर वे ऐसा नहीं कर पाते तो उनके खिलाफ बल प्रयोग किया जाएगा। इराक ने कहा, “अगर शब्दों से हमें सुरक्षा नहीं मिलती तो हमारे पास सब कुछ ठीक करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रहेगा।‘‘ यह धमकी संकट पूर्व दी गयी थी जिसकी वजह से “बीसवीं सदी के सबसे अधिक नाटकीय और तीव्र सैन्यसुरक्षा संकटों में से एक का सामना करना पड़ा।” कुवैत एक विवश कमजोर पड़ोसी था। अगर अलसबा राज्य का विलयन सद्दाम हुसैन के इराक में हो जाता तो इसकी विपुल तेल संपदा इराक की संपत्ति हो सकती थी।

खाड़ी युद्ध के समय अंतर्राष्ट्रीय स्थिति
अंतर्राष्ट्रीय स्थिति इराक के अनुकूल प्रतीत हो रही थी। इराक की अधिकांश सेन्य जरूरतों को पूर्ती करने वाला सोवियत संघ खुद ही संकट में फंसा था। अंततः यह संकट इसके विघटन का कारण भी बना। इरान युद्ध के समय संयुक्त राज्य अमरीका का हमदर्द रहा था। सद्दाम हुसैन सोच रहे थे कि राष्ट्रपति बुश उनके मित्र बने रहेंगे। हालांकि 1990 के मई में सद्दाम हसैन ने आशंका जाहिर की थी कि सोवियत संघ के पतन के बाद अमरीका मध्यपूर्व में अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश कर सकता है। उन्होंने कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात पर आरोप लगाया था कि वे तेल की निर्धारित कोटे से ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं जिससे तेल के अंतर्राष्ट्रीय मूल्य में कमी आयी है । वे इसे इराक के खिलाफ युद्ध की संज्ञा से अभिहीत कर रहे थे।

इराक और इरान के बीच हुए लंबे युद्ध की समाप्ति पर यह माना जा रहा था कि इराक विजयी रहा है, हालांकि प्रत्यक्षतः यह युद्ध हार-जीत के निर्णय के बगैर खत्म हुआ था। इराक पूरे खाड़ी क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम करने में विफल रहा, तथापि वह क्षेत्र भी दो महाशक्तियों में स्पष्ट रूप से एक था। इराक के पास 10 लाख सैनिकों की सेना थी, उन्नत किस्म के सोवियत टैंक व लड़ाकू विमान थे और रासायनिक व जैविक हथियारों का भारी जखीरा था। उसके पास भयानक सैन्य शस्त्रागार था। तथापि इराक को अरब देशों को भारी मात्रा में कर्ज लौटाना था। ये कर्ज उसने प्रथम खाड़ी युद्ध ईरान-इराक युद्ध 1980-88 के लिए, लिए थे। इराकी अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए भारी पूंजी का निवेश जरूरी था। इसके अलावा, जैसा कि बैचर का मत था, ‘‘इराक को उन्नत हथियारों की अदम्य लालसा थी। इसमें परमाणु क्षमता का विकास भी शामिल था।” शीत युद्ध अभी खत्म ही हुआ था। इराक का प्रमुख आश्रयदाता सोवियत संघ खुद आंतरिक संघर्षों व संकट के दौर से गुजर रहा था। वह विघटन के कगार पर था। राष्ट्रपति सद्दाम को अमरीका से किसी भी तरह की इराक विरोधी कार्रवाई की उम्मीद नहीं थी। 1990 के उत्तरार्द्ध में स्थिति ऐसी थी कि इराक-कुवैत से आर्थिक व सीमा संबंधी फायदे उठा सकता था। जरूरत पड़ने पर वह कुवैत पर कब्जा कायम कर अपने चिरप्रतीक्षित सपने यानी कुवैत को इराक का उन्नीसवां राज्य बनाने को साकार भी सकता था। खाड़ी युद्ध के घटनाक्रम का विश्लेषण करते हुए ब्रेचर का मानना है कि इस बात के काफी प्रमाण हैं कि इराक ने ही संकट लाने की पहल की थी और उसकी कार्रवाई कुवैत के खिलाफ थी। कुवैत पर वास्तविक आक्रमण करने से कई महीने पहले ही संकट की शुरुआत हो गयी थी। अरब सहयोग समिति की पहली सालगिरह 24 फरवरी, 1990 को मनाई गई थी। इसमें मिस्र, इराक, जोर्डन व यमन ने हिस्सेदारी की थी। अमन में आयोजित इस बैठक में राष्ट्रपति सद्दाम ने चेतावनी दी थी कि सोवियत संघ के अवश्यंभावी विघटन को देखते हुए अरबों को पश्चिम एशियाई क्षेत्र में अमरीकी वर्चस्व कायम करने की कोशिशों के प्रति सावधान रहना होगा। जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, सद्दाम ने कुवैत व संयुक्त अरब अमीरात पर ओपेक के निर्धारित कोटे से ज्यादा तेल उत्पादित करने का आरोप लगाया था। 30 मई 1990 को उन्होंने कहा कि यह एक तरह से इराक के खिलाफ युद्ध है। इस तरह, 1990 के मई के अंत तक राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन कुवैत को हड़प लेने और तेल लाभ के लिए बेहतर मोल तोल करने का मन बना चुके थे।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणी: 1) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
2) इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) इराक ने कुवैत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का निर्णय क्यों लिया?
2) खाड़ी युद्ध के समय अंतर्राष्ट्रीय स्थिति कैसी थी?

बोध प्रश्न 1 उत्तर
1) इराक ने कुवैत पर कब्जा जमाने का निर्णय लिया क्योंकिः
क) वह कुवैत को सदैव इराक के एक भाग के रूप में स्वीकार करता रहा था।
ख) इराक युद्ध के बाद इराक की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गयी थी, और
ग) कुवैत उसका तेल समृद्ध छोटा पड़ोसी था।
कुवैत को इराक का हिस्सा बना लेने से इराक को तेल से होने वाली आय के रूप में बहुत बड़ा धन प्राप्त हो जाता जिससे वह अपनी आर्थिक विपत्तियों से छुटकारा पा सकता था।
2) शीत युद्ध समाप्त हो चुका था । इराक का प्रमुख सैन्य आपूर्तिकर्ता सोवियत संघ कठिन दौर से गुजर रहा था। ईरान इराक युद्ध के समय कुवैत और संयुक्त राज्य दोनों ने इराक का समर्थन किया था। इस प्रकार से इराक को कहीं से भी विरोध की उम्मीद नहीं थी और वह अपनी सीमा विस्तार करने की ठान चुका था।

कुवैत के खिलाफ इराकी कार्रवाई
1990 के जुलाई के उत्तरार्द्ध में बड़े पैमाने पर कुवैत पर आक्रमण करने की तैयारियाँ होने लगीं। इराक ने अपनी सेना के तीन विशेष डिविजनों को तैनात कर दिया जिसमें 35000 सैनिक, टैंक और रॉकेट शामिल थे। 18 जुलाई को इराक के विदेश मंत्री तारिक अजीज ने कुवैत पर विवादित रूपैला क्षेत्र से 24 खरब डालर मूल्य के तेल की चोरी करने का आरोप लगाया। कुछ दिनों बाद अमरीका ने संयुक्त अरब अमीरात के साथ साझे सैन्य अभ्यास की घोषणा की ओर दो अतिरिक्त युद्धपोतों को भेज दिया मानो सद्दाम हुसैन के लिए सीमा संकेत खींच दिया गया हो। दूसरे दिन इराक ने कुवैत को 2.4 खरब डालर की भरपाई करने की मांग कर दी। इराक के दबाव में तेल निर्यातक देशों के संघ ने 27 जुलाई को तेल की कीमत 18 डालर प्रति बैरल से बढ़ाकर 21 डालर प्रति बैरल कर दी। 1 अगस्त, 1990 को इराक और कुवैत के बीच दो दिवसीय वार्ता विफल हो गयी। अब इराक आक्रमण के लिए तैयार था किंतु कुवैत को संकट की गंभीरता का अहसास नहीं था। 27 जुलाई तक कुवैत ने अपनी सेना को सीमा पर नहीं भेजा था। कुवैत की सेना पूरी तरह मुस्तैद होकर दो कमांडरों के नेतृत्व में कुवैत सिटी के उत्तरी भाग में तैनात कर दी गयी थी। किन्तु कुवैत के अमीर को आक्रमण की आशा नहीं थी, नतीजतन उन्होंने सेना को छावनी में वापस जाने का निर्देश दे दिया। 1 अगस्त तक, संयुक्त राज्य अमरीका में कुवैत के राजनयिक ऐसी किसी भी संभावना से इंकार करते रहे । वास्तव में, कुवैती सेना की खुफियागिरी बहुत घटिया थी।

कुवैत पर विजय एवं कब्जा
2 अगस्त, 1990 को स्थानीय समय के अनुसार 2 बजे इराक ने कुवैत पर आक्रमण किया। इराकी टैंक इतनी तेजी से राजधानी में घुसे कि कुवैती सेना कोई प्रतिरोध न कर सकी। मात्र छह घंटों में इराक ने कुवैत अमीरात पर कब्जा कर लिया।

अमरीका का दोस्त सउदी अरबिया भी सकते में आ गया । इराकी आक्रमण की सूचना दिये जाने पर, सउदी अरबिया के शाह ने पूछा, “क्या आप सच कह रहे हो? आक्रमण से कुछ घंटों पहले तक अधिकांश अमरीकी अधिकारी आक्रमण की बहुत क्षीण संभावना देख रहे थे। इसके कारण भी थे। प्रथम तो यही कि कुवैत के अस्तित्व को खारिज करना कोई नई बात नहीं थी। ऐसा तो वह 1857 से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति तक करता रहा था। कुवैत बसरा प्रांत का अंग था जबकि बसरा 1920 से ही इराक के कब्जे में बना रहा था। इराक द्वारा कुवैत की स्वतंत्रता को मान्यता दिए जाने के बावजूद दोनों के बीच दीर्घकालिक सीमा विवाद चलते रहे थे। लेकिन सैन्य कार्रवाई की आशंका कभी पैदा नहीं हुई। 1989 के फरवरी तक कई दौर में वार्ताएं हो चुकी थीं। दूसरे इराक-इरान युद्ध के वक्त कुवैत ने इराक का खुला समर्थन किया था और उसे 15 खरब डालर का ब्याज मुक्त कर्ज भी मुहैया कराया था । ऐसे में कुवैत आक्रमण की आशा कैसे कर सकता था? तीसरे, दोषकारी बयान जारी करना आंतरिक अरब राजनीति की राजनीतिक संस्कृति का बुनियादी तत्व भी रहा था।

आक्रमण के छह घंटों के अंदर ही संयुक्त राज्य अमरीका ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। व्हाइट हाउस ने इराक के आक्रमण की भर्त्सना की और इराक से शीघ्र और बिना शर्त कुवैत खाली करने की मांग की। फिर भी अमरीका ने तय नहीं किया था कि उसे कौन सी कार्रवाई करनी चाहिए। दूसरे दिन (3 अगस्त) (अमरीकी समय के अनुसार 2 अगस्त) राष्ट्रपति बुश ने कहा, “हम कोई विकल्प बंद नहीं कर रहे हैं, न ही कोई विकल्प तय कर रहे हैं। बुश ने बल प्रयोग की बाबत कुछ भी नहीं कहा तो इसीलिए कि वे नहीं जानते थे कि उन्हें बल प्रयोग करना ही पड़ेगा। अमरीकी राष्ट्रपति ने घोषणा की “इराक पर फतह करना हमारा मकसद नहीं है। किन्तु एक महीने बाद बुश ने अपनी घोषणा को व्यक्तिगत आयाम देते हुए कहा, कि सद्दाम को हटाना ही उनका लक्ष्य है। उन्होंने यह भी कहा, ‘‘खून खराबा रोकने का एक और तरीका है, और वह यह है कि इराकी जनता मामले को खुद अपने हाथों में ले ले तथा तानाशाह सद्दाम हुसैन को पदमुक्त होने तथा सयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का अनुपालन करने के लिए मजबूर करे…।‘‘

यहाँ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के व्यक्तिगत चरित्र की चर्चा जरूर की जानी चाहिए। माइकेल ब्रेचर के अनुसार, “वह खालिस डर के आधार पर शासन करता था.. उसकी महत्वाकांक्षा खाड़ी क्षेत्र में आधिपत्य स्थापित कर अंततः पूरी अरब दुनिया में अपनी महत्ता स्थापित करने की थी।” किसी तरह उसने मान लिया था कि प्रथम खाड़ी युद्ध में उसकी सफलता के बाद अमरीका और इजरायल की अगुआई में इराक के खिलाफ कोई साजिश चल रही है। इस साजिश में सउदी अरबिया और कुछ अन्य खाड़ी देश भी शामिल थे। सोवियत राष्ट्रपति गोर्बाचोव के विशेष दूत को इस आशंका से अवगत कराया गया था और उसने कहा था, “इनमें से कुछ बातें सत्य हो सकती हैं।‘‘

संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् ने इराकी हमले तथा कुवैत के कब्जे पर विचार विमर्श किया था। इसी बीच जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, इराक की रिवोल्युशनरी कमांड काउंसिल ने 8 अगस्त, 1990 को कुवैत के कब्जे पर अपना फरमान जारी करते हुए कहा, “इराक के साथ कुवैत का विलयन व्यापक शाश्वत व अविच्छा है।” कुवैत को इराक का उन्नीसवां प्रांत घोषित कर दिया गया।

इराक के लिहाज से कुवैत पर कब्जा उसके लिए काफी फायदेमंद साबित हो सका। इसमें दुनिया भर में फैली कुवैत की परिसंपत्तियां और बहुमूल्य तेल भंडार शामिल थे। इस लाभ से इराक को अपनी गंभीर आर्थिक परिस्थितियों से निजात पाने में सुविधा होती। इरान के साथ लंबे समय तक जारी युद्ध ने इराक की अर्थव्यवस्था को जर्जर बना दिया था। इसके अलावा कुवैत का 310 मील लम्बा समुद्र तट इराक को समुद्र तक पहुंचने में मददगार हो सकता था। इस तरह कुवैत पर कब्जा करने से इराक का खाड़ी क्षेत्र में वर्चस्ववादी सत्ता के रूप में स्थापित होने का स्वप्न पूरा हो सकता था। इससे अरब में इराक की सर्वोत्तम महत्ता भी कायम हो सकती थी। अमरीका की भर्त्सना सद्दाम हुसैन के लिए अचरज की बात थी क्योंकि 1982 से ही अमरीकियों ने “कठमुल्लावादी ईरान” के खिलाफ इराक की खुली पैरोकारी की थी।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणी: 1) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
2) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) द्वितीय खाड़ी युद्ध के प्रथम चरण के दौरान कुवैत के खिलाफ इराकी हमले के परिणाम का वर्णन कीजिए।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) कुवैत पर इराक का आक्रमण कुवैत के लिए बिल्कुल ही अप्रत्याशित था । इराक की विशाल और ताकतवर सेना को अलसबा के पूरे साम्राज्य को रौंद डालने में कुल छह घंटों का समय लगा। अमरीकी चेतावनी को धता बताते हुए इराक ने कुवैत पर कब्जा कर उसे अपना उन्नीसवां राज्य घोषित कर दिया।

 कुवैत की मुक्ति
जब से इराक ने कुवैत पर कब्जा किया तभी से इराक पर दबाव डालकर कुवैत से हटने के लिए ताबड़तोड़ राजनयिक और दूसरी कार्रवाइयों की पहल की जाती रही थी। सउदी अरबिया इराक का कटु और प्रधान आलोचक था। नतीजन इराक ने 3 अगस्त, 1990 को 60,000 की सैन्य टुकड़ी सउदी अरबिया की सीमा पर तैनात कर दी। दो दिनों बाद उसने इसमें 11 और डिवीजनों को जोड़ दिया। इसके जबाव में संयुक्त राज्य ने सउदी अरबिया में 6,000 से 15,000 की सैन्य टुकड़ी व चार लड़ाकू स्क्वैडूनों को तैनात कर दिया। तय किया गया कि 11 अगस्त तक सउदी अरबिया में अमरीकी सेना की संख्या 2,00,000 कर दी जाएगी। 16 अगस्त को इराक ने हजारों विदेशियों को जिनमें ब्रिटिश, फ्रांसीसी, अमरीकी और जापानी शामिल थे बंधक बना लिया, 21 अगस्त, 1990 को इराकी रिवोल्युशनरी कमांड काउंसिल ने इराक की जनता की आह्वान किया कि वह “सभी युद्धों की जननी के लिए तैयार हो जाए। उस समय तक दक्षिण और कुवैत में इराक के 1,30,000 सैनिक थे। जब संयुक्त राष्ट्र ने आर्थिक प्रतिबंध लगाने का फैसला किया तो इराक ने सउदी अरबिया, गैरमित्र अरब देशों व इजरायल के तेल क्षेत्रों को हड़प लेने की धमकी दे दी। इराक पर लगा प्रतिबंध आज भी यानी 1997 में भी लागू है। इराक के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्राधिकृत युद्ध के स्पष्ट संकेत 1990 के नवम्बर के मध्य में मिल गये थे। इसी दौरान सद्दाम हुसैन ने बंधकों को रिहा करने का प्रस्ताव किया बशर्ते संयुक्त राष्ट्र अमरीका की अगुआई में लड़ रही मित्रराष्ट्रों की तमाम सेनाओं को क्षेत्र से हटा लेने की गारंटी दे या फिर बुश लिखित रूप से मित्र-राष्ट्रों की सेनाओं को क्षेत्र से हटा लेने तथा साथ ही ‘‘इराक पर लगी संयुक्त राष्ट्र की नाकेबंदी” को उठा लेने की ‘स्पष्ट व असंदिग्ध प्रतिबद्धता‘‘ व्यक्त करे। संयुक्त राज्य अमरीका ने इन मांगों को तुरंत ही खारिज कर दिया और धमकी दी की जब तक इराक सुरक्षा परिषद् द्वारा पारित प्रस्ताव जिसमें कुवैत के अमीर के शासन की पुनर्बहाली की बात की गयी थी, मान नहीं लेता तथा सभी बंधकों को रिहा नहीं कर देता तब तक उस पर ये प्रतिबंध जारी रहेंगे। शुरू में इगक ने कुवैत संकट को अरब इजरायल संघर्ष में तबदील करने की कोशिश की थी। इराक ने इजरायल के कब्जे वाले वेस्टबैंक व गाजा, गोलन पहाड़ियों व दक्षिणी लेबनान के क्षेत्रों को मुक्त करने की मांग की। राष्ट्रपति बुश ने आमसभा को बताया अगर इराक कुवैत से बिना किसी शर्त के लौट जाता है, तो शीघ्र ही ऐसे अवसर पैदा होंगे जिनमें अरब व इजराइल को बाँटने वाले मुद्दों का समाधान ढूंढा जा सकता है।

संयुक्त राज्य की अगुआई में 28 देशों का गठबंधन
चूंकि ऐसे संकेत नहीं दिख रहे थे कि इराक सुरक्षा परिषद् के प्रस्तावों का अनुपालन करेगा, अतः अमरीका ऋऋऋ उन राष्ट्रों की गठबंधन बनाने का प्रयास करने लगा जो इरान द्वारा कुवैत के कब्जे के खिलाफ थे।

हालांकि यह आसान काम नहीं था तथापि संयुक्त राज्य की अगुआई में 28 राष्ट्रों का गठबंधन बना लिया गया। उसमें कुछ नाटो के सदस्य थे जो ज्यादा पश्चिम एशियाई क्षेत्र के ही देश थे। तथापि इन 28 देशों में से अधिकांश देशों ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के समर्थन में इराक के खिलाफ सैन्य निर्माण में योगदान किया था. फिर भी इनमें से केवल छह देस ही असल में यद्ध में भाग ले सके। ये देश थे संयक्त राज्य, सउदी अरब, ब्रिटेन, फ्रांस, मिस्र और सीरिया । इसके अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, मोरक्को, नाइजीरिया और अमीरात के गैर लड़ाकू सैनिकों ने भी इस युद्ध में हिस्सा लिया था। 17 फरवरी से लेकर 28 फरवरी तक दो युद्ध लड़ा गया, वह वास्तव में इराक और संयुक्त राज्य के बीच जोर आजमाइश था। दूसरी तरफ जोर्डन, यमन व पी. एल. ओ. इराक का राजनयिक, राजनीतिक व आर्थिक समर्थन कर रहे थे किन्तु इराक की ओर से युद्ध में लड़ने कोई नहीं आया। इस तरह यह संयुक्त राज्य अमरीका की अगुआई में गठित 28 राष्ट्रों के गठबंधन व इराक के बीच एक गैरबराबरी का युद्ध था ।

अमरीकी अगुआई वाले गठबंधन में 7,00,000 से ज्यादा सैनिक थे। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा निश्चित ही संयुक्त राज्य का था। अमरीकी सेना में 5,27,000 सैनिक थे। उन्हें सहयोग देने के लिए 1500 लड़ाकू विमानों और 91 शक्तिशाली नौ सैनिक बेड़ों का दस्ता भी था।

अपने ही घर में परेशान सोवियत संघ भी गठबंदन में शामिल हुआ ता। उसने पूरे तौर पर संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का समर्थन किया। उसने कुवैत से इराक को निकाल बाहर करने के अमरीकी संकल्प को भी सराहा था। लेकिन वह खाड़ी क्षेत्र में न तो सेन्य तैयारी में शामिल हुआ था न ही इराक के खिलाफ युद्ध में। उसनें दोनों पक्षों में समझौता कराने का भी प्रयास किया था। सोवियत संघ बखूबी जानता था कि अगर उसने युद्ध में हिस्सा लिया तो उसके मुस्लिम गणंतत्रों में भयंकर प्रतिक्रिया होगी। इसके अलावा, वह पिछले दो दशकों से ईरान को भारी मदद दे रहा था। खाड़ी क्षेत्र तब के सोवियत संग के सीमा क्षेत्र से इतना निकट है कि वह उसकी उपेक्षा नहीं कर सकता था।

अधिकांश अरब राष्ट्रों के लिए सद्दाम ने अपनी कार्रवाई से दुविधा की स्थिति पैदा कर दी थी। दुविधा यह थी कि वे किस तरह अरब लीग के एक राष्ट्र की राष्ट्रीय संप्रभुता को दूसरे राष्ट्र द्वारा बर्बाद होते देखने का गवाह बनें। अगर वे इराक की निंदा करते हैं तो इससे यह समझा जाएगा कि वे अमरीकी गठबंधन के साथ हैं। अरब देश अमरीका को साम्राज्यवादी ताकत मानते आए हैं, अतः ऐसा करना राजनीतिक दृष्टि से भी सही नहीं था और अगर इराक का समर्थन करते हैं तो यह माना जाएगा कि वे सीमा की अखंडता और राष्ट्रीय संप्रभुता के सिद्धांतों की परवाह नहीं करते । यही कारण था कि अधिकांश अरब देश तटस्थ बने रहे या फिर इराक अथवा गठबंधन की मौखिक सहानुभूति व्यक्त करते रहे।

इसी बीच संकट के राजनयिक समाधान ढूँढने तथा कुवैत की मुक्ति के लिए सोवियत संघ के तमाम प्रयास विफल हो गये। वह सुरक्षा परिषद् के प्रस्ताव संख्या 678 का समर्थन करने पर राजी हो गया जिसमें इराक से 30 नवम्बर 1991 तक कुवैत से जाने के लिए कहा गया था। ऐसा नहीं करने पर इराक को धमकी दी गयी कि उसके खिलाफ फिर से सैनिक कार्रवाई शरू कर दी जाएगी। संयुक्त राज्य इराक के खिलाफ सैनिक कार्रवाई की शुरुआत 1 जनवरी 1991 के दिन करना चाहता था। लेकिन सोवियत संघ ने एक संधि प्रस्ताव लाकर युद्द की तिथि को 15 जनवरी तक टाल दिया। इस संधि प्रस्ताव में गोर्बाचोव का मशहूर ‘‘पॉज ऑफ गुडविल‘‘ भी शामिल था। सुरक्षा परिषद् का प्रस्ताव संख्या 678 के मुकाबले 12 मतों से पारित हुआ। क्यूबा व अमन ने प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया था जबकि चीन ने अनुपस्थित रहने कता फैसला किया था। मालूम हो, अनुपस्थित रहना वीटो नहीं होता । प्रस्ताव ने संयुक्त राष्ट्र के तमाम सदस्यों को प्राधिकृत किया कि वे‘‘– क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा बहाल करने के लिए – हर संभव उपाय का सहारा ले सकते हैं।‘‘

कुवैत की मुक्ति के लिए अमरीकी अगुआई में गठबंधन ने 17 जनवरी 1991 को सैनिक कार्रवाई की शुरुआत की। खाड़ी क्षेत्रों के समयानुसार उस समय अपराह्न में दो बजकर 40 मिनट हुए थे। द्वितीय खाड़ी युद्ध दो चरणों में लड़ा गया था। 1 जनवरी से 23 फरवरी तक यह युद्ध इराक व अधिकृत कुवैत के महत्त्वपूर्ण सामरिक ठिकानों पर हवाई बमबारी करने तक सीमित थी। हवाई हमले को सहायता धार देने के लिए नौसैनिक बेड़ों का दस्ता अलग से था। जमीनी कार्रवाई 24 फरवरी को शुरू हुई और 28 फरवरी तक इराक पूरी तरह पराजित हो गया तथा कुवैत को भी छुड़ा लिया गया।

नौसैनिक दस्ते के सहयोग से जो हवाई युद्ध खाड़ी और लाल सागर में छेड़ा गया था, उसका मकसद इराक के विविध लक्ष्यों पर लगातार बमबारी कर उन्हें तहस नहस करना था। सड़कों, रेलों, विमानपत्तनों ऊर्जा स्रोतों, शस्त्रागारों व तेल संयंत्रों को लक्ष्य करके बमबारी की गयी। ये कार्रवाईयाँ इराकी सेना के खिलाफ की गई बमबारियों, स्कड मिसाइलों के प्रक्षेपण स्थलों और परमाणु रिएक्टरों पर किए गए हमलों के अलावा थी। इराक के 700 युद्ध विमान गठबंधन की वायु शक्ति का मुकाबला नहीं कर सकते थे। क्योंकि गठबंधन के पास लड़ाक् विमानों की संख्या तकरीबन दुगनी थी। फिर कुछ इराकी विमान बचाव की आशा में इरान में उतार दिए गए और वे युद्ध में भाग नहीं ले सके थे।

 इराक के खिलाफ प्रतिबंध और कुवैत की संप्रभुता की बहाली
राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने बदहवास होकर खाड़ी युद्ध को अरब इजराइल युद्ध में तब्दील करने की कोशिश की, किन्तु वे इसमें पूरी तरह नाकामयाब रहे। हफ्तों तक इराक इजराइल पर स्कड मिसाइलों का हमला करता रहा। सोचा यह गया था कि अगर इजराइल बदले की कार्रवाई करता है तो सभी अरब देशों को यहूदी राज्य के खिलाफ युद्ध में लामबंद होने का आह्वान किया जाएगा। इस कार्रवाई से मिस्र और सउदी अरबिया की स्थिति अत्यंत मुश्किल हो जाती । लेकिन काफी उकसाने के बाद भी इजराइल ने बदले की कार्रवाई नहीं की। संयुक्त राज्य इजराइल से युद्ध में शामिल होने का बारबार आग्रह करता रहा
था।

इस बीच गोर्बाचोव सुलह की नाकामयाब कोशिशें करते रहे । सद्दाम हुसैन ने कहा था कि जमीनी युद्ध के शुरू होते ही अमरीकी अपने ही खून में तैरते नजर आएंगे। इस युद्ध के सामने वियतनाम युद्ध भी पिकनिक की तरह लगेगा। किंतु युद्ध शुरू होने के चार दिनों के अंदर ही कुवैत को मुक्त करा लिया गया। तथा अमीर अलसबा का शासन फिर से कायम हो गया । इस तरह कुवैत की संप्रभुता बहाल हुई तथा इराक को स्पष्ट पराजय मिली।

हालांकि युद्ध तो 1991 के शुरू में ही समाप्त हो गया, किन्तु इराक के खिलाफ लगाये गये संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध 1997 में भी जारी है। चूंकि इराक अपने परमाणु प्रतिष्ठानों को खत्म करने में विफल साबित हुआ था अतः संयुक्त राज्य अमरीका इराक को किसी तरह की ढील देने के पक्ष में नहीं था। इस बीच 1995 में सद्दाम को एक और चुनौती का सामना करना पड़ा जब उनकी दो बेटियाँ अपने पतियों के साथ लेकर जॉर्डन में राजनीतिक शरण लेने के लिए चली गई। सद्दाम हुसैन के ये दोनों दामाद इराक में महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन रहे थे । खुफिया सूत्रों को धता बताते हुए उनका गुपचुप तरीके से पलायन कर जाना सद्दाम के लिए गहरा आघात था। जॉर्डन के शाह इराक के प्रबल समर्थक थे और इसीलिए जब उन्होंने सद्दाम के दामादों को जॉर्डन में शरण दी तब राष्ट्रपति सद्दाम को गहरा आघात पहुंचा।

कुछ महीनों (1996 की शुरुआत में) बाद सद्दाम की बेटियों व उनके दामादों को इराक लौटने की अनुमति दे दी गयी । सद्दाम की पहली बीवी ने उनसे वचन लिया कि उनके दामादों को वापस आने पर माफी दे दी जाएगी। तथापि आने के तुरंत बाद ही दामादों की हत्या कर दी गयी। 1991 में समाप्त हुआ द्वितीय खाड़ी युद्ध वास्तव में एक गहरा संकट था। यों तो सोवियत संघ का आस्तित्व अब भी कायम था किन्तु वह इराक का समर्थन नहीं कर सका। चूंकि इराक को समझा बुझाकर कुवैत से हटाने के संयुक्त राष्ट्र के तमाम प्रयास विफल हो गए थे, अतः अमरीकी अगुआई में सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी। इस कार्रवाई को साझी सुरक्षा व्यवस्था का उदाहरण माना जा सकता है। इसने कुवैत को मुक्त कराने में अपनी उपयोगिता साबित कर दी थी। साझी सुरक्षा (यानी संयुक्त राष्ट्र पीड़ित राष्ट्र की सुरक्षा की गुहार सभी सदस्ट राष्ट्रों से करता है) के अर्थ के विपरीत, इस मामले में अमरीकी गठबंदन को आक्रांता के खदेड़ बाहर करने तथा कुवैत की आजादी और संप्रभुता को बहाल करनो के लिए प्राधिकृत कर दिया गया था।
बोध प्रश्न 3
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) कुवैत की मुक्ति में 28 राष्ट्रों के गठबंदन की भूमिका का वर्णन कीजिए।
2) खाड़ी संकट के दौरान सोवियत संघ और विभिन्न अरब देशों की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
3) उन घटनाक्रमों की व्याख्या कीजिए जिनसे कुवैत की संप्रभुता फिर से बहाल की जा सकी थी।

बोध प्रश्न 3 उत्तर
1) संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्राधिकृत किये जाने के बाद 28 राष्ट्रों का गठबंधन अमरीका की अगुआई में एकजुट हुआ । प्रमुख रूप से संयुक्त राज्य,सउदी अरबिया, ब्रिटेन, फ्रांस, मिस्र तथा सीरिया ने सशस्त्र सैनिक मुहैया कराए थे। 30 दिनों का हवाई हमला इराक को कुवैत खाली करने के लिए विवश नहीं कर सका। तत्पश्चात् चार दिनों की जमीनी लड़ाई में गठबंधन ने इराक को बिना शर्त आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया। कुवैत भी मुक्त करा लिया गया।
2) सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव का पूरे तौर पर समर्थन करते हुए इराक को कुवैत छोड़ने के लिए राजी करने का प्रयास किया था। लेकिन जब गठबंधन ने कार्रवाई शुरू की तो उसने न तो अपनी सेना भेजी,न ही हथियार दिए । इराक के खिलाफ सैनिक कार्रवाई में मिस्र और सउदी अरबिया ने सक्रिय हिस्सेदारी की थी। जॉर्डन जैसे अन्य देश न तो इराक के खिलाफ सैनिक कार्रवाई में शामिल हुए थे न ही उन्होंने कोई सैन्य समर्थन दिया था।
3) इराक के कब्जे से कुवैत को मुक्त कराने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 28 राष्ट्रों के गठबंधन को बल प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया। इराक को समझाने का सोवियत संघ का अंतिम प्रयास विफल हो गया। इससे और कुछ तो नहीं हुआ किन्तु गठबंधन की कार्रवाई में विलंब अवश्य हुआ। इजराइल पर लगातार स्कड मिसाइलों से हमला कर इराक ने खाड़ी संकट को इजराइल अरब युद्ध में तब्दील करने की कोशिश की। लेकिन इजराइल उत्तेजित नहीं हुआ । हवाई हमले और उसके बाद चार दिनों की जमीनी लड़ाई में कुवैत मुक्त करा दिया गया। संयुक्त राष्ट्र ने इराक के खिलाफ प्रतिबंध लगाया जो वर्षों तक हटाया नहीं गया।

 खाड़ी युद्ध का प्रभाव
इस अध्याय में खाड़ी युद्ध में शामिल होने वाले देशों पर पड़े उसके प्रभाव की चर्चा की कोशिश की जाएगी। इराक द्वारा कुवैत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से यह संकट पैदा हुआ था। इराक ने कुवैत पर कब्जा कर उसे अपना उन्नीसवां प्रदेश घोषित कर दिया था। अतः युद्ध का सीधा प्रभाव भी कुवैत पर पड़ा जिसे अपनी संप्रभुता से हाथ धोना पड़ा। अमरीकी हस्तक्षेप के बाद ही उसकी संप्रभुता फिर से कायम हो सकी। कुवैत करीब 7 महीनों तक इराक के कब्जे में रहा। अनुमान किया जाता है कि इस दौरान 2000से लेकर 5000 कुवैती नागरिक मारे गए थे, हजारों का अपहरण हुआ था। अन्य इतनी ही संख्या में लोग अंग भंग हुए थे और उनका घर बार उजड़ा था। बड़ी तादाद में लोग कुवैत छोड़कर भाग गये थे और कुवैत की अर्थव्यवस्था बुरी तरह तहसनहस हो गयी थी,खासकर तब जब इराक ने कुवैत के अधिकांश तेल भंडारों में आग लगा दी थी। कुवैत की संप्रभुता बहाल कर दिए जाने के बहुत दिनों बाद तक कुवैत के तकरीबन 100 तेल कुँओ में आग लगी रही। कुवैत के लोगों को इससे गहरा सदमा पहुँचा था और यही कारण था कि वे शक्तिशाली इराक के खिलाफ गुससे और कटुता से भर गए थे। युद्ध के बाद लोकतंत्रीकरण की मांग फिर जोर पकड़ने लगी। लोग 1962 के संविधान की बहाली की मांग करने लगे। इस संविधान में सीमित अधिकार प्राप्त चुनी हुई विधायिका तथा अलसबा परिवार की। अधिनायकवादी शक्तियों पर अंकुश लगाने का प्रावधान शामिल था। 1986 में इस संविधान को दरकिनार कर दिया गया था। अमरीकी दबाव में कुवैत की सरकार ने 50 सदस्यीय राष्ट्रीय असेम्बली के गठन की घोषणा की। 1992 में हुए चुनाव में 312 सीटों पर लोकतंत्र समर्थकों ने जीत हासिल की थी।

सउदी अरब, युद्ध में शामिल दोनों प्रधान पक्षों का निकटवर्ती पड़ोसी देश है। सउदी अरब खाड़ी क्षेत्र का विशाल राजतंत्र है। यह कुवैत को मुक्त कराने के लिए 28 राष्ट्रों के गठबंधन के साथ शामिल हुआ था। इराकी आक्रमण ने सउदी अरब की सरकार व जनता को 6 हफ्तों तक भय के माहौल में रखा (मध्य जनवरी से लेकर मध्य फरवरी तक)। इराक ने सउदी अरबिया की सीमा पर भारी तादाद में सैनिकों को तो तैनात किया ही था, वह इजराइल पर भी लगातार स्कड मिसाइलों से हमला बोल रहा था। वह चाहता था कि किसी तरह उकताकर यहूदी राज्य अरब पर आक्रमण करें। फरवरी के शुरुआती दिनों में इराकी सेना सउदी अरबिया की सीमा में घुसने में कामयाब भी हो गई, किन्तु यह कामयाबी क्षणिक रही। काफ्जी नामक जगह पर गठबंधन और इराकी सेना के बीच भारी युद्ध हुआ। सउदी अरब इराक की सैन्य शक्ति और खाड़ी क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम करने के उसके इरादों से परिचित तो था किंतु उसे ऐसे । आक्रमण की कतई आशा नहीं थी। ब्रेचर के अनुसार, “इराक ने सउदी अरबिया के प्रति ऐसी शत्रुता कभी नहीं दिखाई थी, अरब सीमाक्षेत्रों का ऐसा अपमान भी पहले कबी नहीं किया था… अरब राज्यों के खिलाफ ऐसा खुल्लमखुल्ला बल प्रयोग, ऐसा जोखिम भरा व्यवहार जिसमें अरब राज्य व्यवस्था के स्थापित नियमों की कोई परवाह नहीं की थी, पहली बार देखने को मिला।” नतीजन इराक से सउदी अरबिया के रिश्ते बुरी तरह बर्बाद हुए।

सउदी अरबिया ने उस अमरीकी नीति का पूरे तौर पर समर्थन किया कि जब तक सद्दाम हट नहीं जाते तब तक इराक के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध जारी रखे जाएं, फिर भी सउदी अरबिया अपनी छोटी आबादी और लघु किन्तु सुसज्जित सैन्य शक्ति से परिचित था। खाड़ी युद्ध में सउदी अरबिया को 16 खरब डालर मूल्य के संसाधनों के हाथ धोना पड़ा था, किन्तु उसके तेल कुएं सुरक्षित बचे रह गए थे।

इजराइल ने बहादुरी के साथ स्कड मिसाइलों का सामना किया। वह इराक के उकसाने के बावजूद युद्ध में शामिल नहीं हुआ। वह अमरीकी सलाह मानकर इराक पर आक्रमण करने से बचता रहा था ।

कुवैत की मुक्ति का कार्य, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, संयुक्त राज्य अमरीका की अगुआई में सम्पन्न हुआ। फिर भी युद्ध में मारे गए अमरीकी सैनिकों की संख्या 10,000 से लेकर 20,000 तक आँकी गई थी। सेनानायकों के इस आकलन से अमरीकी नेतृत्व मुख्य रूप से संतुष्ट था । राष्ट्रपति सद्दाम ने कहा था कि अमरीकी सैनिक अपने ही रक्त में तैरते रहेंगे, किन्तु विजयी अमरीका ही हुआ। अमरीकी खेमे को कोई भौतिक क्षति नहीं हुई, न ही उसके शहरों पर स्कड मिसाइलों का कोई हमला हुआ। कुवैतियों की तरह उन्हें किसी सदमे का भी सामना नहीं करना पड़ा। न ही सउदी अरबिया की तरह वे किसी दीर्घकालिक खतरे के भंवर में फंसे। यही नहीं, गंठबंधन राष्ट्रों का वित्तीय अनुदान अमरीका द्वारा युद्ध में किए गए खर्चों से कही अधिक ही था। अमरीकी युद्ध का लुत्फ दूरदर्शन के पर्दे पर उठाते रहे। ‘‘ऑपरेशन डेजर्ट स्ट्रोम‘‘ उनके लिए किसी फिल्म थ्रिलर की तरह रोमांचकारी था। इसके अतिरिक्त द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह अमरीका की पहली भारी जीत थी। मालूम हो, कोरियाई युद्ध बिना हार जीत के फैसले के समाप्त हो गया था और वियतनाम युद्ध में अमरीका को मुँह की खानी पड़ी थी। सच तो यह है कि वियतनाम में अमरीका की कलंकपूर्ण हार हुई थी।

29 फरवरी 1991 को संयुक्त राज्य अमरीका ने एक तरफ युद्ध विराम का आदेश दिया। उसका मानना था कि ऐसा करने से इराकी जनता सद्दाम को सत्ता से बाहर कर देगी। यहाँ अमरीका गलत साबित हआ। संयुक्त राज्य ने सुरक्षा परिषद के जरिये कार्रवाई की, इराक पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए जिन्हें वर्षों तक उठाया नहीं गया था। इराक के भारी नुकसान पहुँचने वाले हथियारों को नष्ट करने की पूरी कोशिश की गई। गठबंधन की जीत संयुक्त राष्ट्र की भी जीत. थी।

युद्ध के बाद भी इराक खाड़ी क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण ताकत बना रहा, क्योंकि उसके विशाल शस्त्रागार 38 दिनों के हवाई हमले में भी पूरी तरह नष्ट नहीं हुए थे। फिर भी खाड़ी क्षेत्र में इराक अपनी श्रेष्ठता नहीं बचा सका। आज इरान के पास यह श्रेष्ठता है तथा सउदी अरबिया क्षेत्रिय सैन्य ताकत के रूप में उभरा है। पूरी अरब दुनिया की बात करें तो युद्ध से मिस्र और सीरिया की ताकत में वृद्धि हुई है। संकट के पूरे दौर में इजराइल खामोश बना रहा तथा इजराइल फिलीस्तीन शांति प्रक्रिया तेज हुई। इराक को कुर्दो और शियाओं के विद्रोह से जूझना पड़ा।

बोध प्रश्न 4

टिप्पणीः 1) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
2) इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) सउदी अरबिया पर खाड़ी संकट का क्या प्रभाव पड़ा?

 बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 4
1) सउदी अरबिया कुवैत और इराक का पड़ोसी है। सउदी अरबिया पूरी तरह कुवैत पर इराकी हमले के खिलाफ था। चूंकि सउदी अरबिया ने इराक के शिलाफ की जाने वाली कार्रवाई का पूरा समर्थन किया था, अतः इराक ने उसकी सीमा पर भारी मात्रा में सैनिक तैनात कर दिए । सउदी अरबिया के लोग छह सप्ताहों तक इराकी हमले की आशंका में भयभीत रहे । इराक थोड़ी देर के लिए सउदी अरबिया की सीमा के अंदर घुसने में सफल भी हो गया जिसके चलते काफ्जी में युद्ध शुरू हुआ। इस युद्ध से सउदी अरबिया को 16 खरब डालर मूल्य के संसाधनों की बर्बादी उठानी पड़ी।

सारांश
शीत युद्ध के अंत के बाद खाड़ी युद्ध सबसे बड़े संकट के रूप में प्रकट हुआ था। दीर्घकालिक ईरान इराक (1980-88 प्रथम खाड़ी युद्ध) युद्ध के समय कुवैत और संयुक्त राज्य ने इराक का पुरजोर समर्थन किया था। इसीलिए कुवेत को आशा नहीं थी कि इराक उस पर आक्रमण करेगा और उसे अपने कब्जे में लेगा। लेकिन इराक की मंशा अलग थी। वह इस छोटे किन्तु तेल समृद्ध राज्य राज्य को अपना उन्नीसवां प्रदेश बनाने की ठान चुका था। इरान की नयी सत्ता के प्रति संयुक्त राज्य की नापसंदी को देखते हुए इराक को इस बात की कतई आशा नहीं थी कि अमरीका कुवैत के खिलाफ उसके इस अभियान का विरोध करेगा।

1990 के अगस्त में जब इराक ने कुवैत के खिलाफ भारी हमला बोल दिया था तब कुवैत इसके लिए बिल्कुल ही तैयार नहीं था और यही कारण था कि वह मात्र छह घंटों में जीत लिया गया। बाद में कुवैत इराक का उन्नीसवां प्रदेश घोषित कर दिया गया। यह द्वितीय खाड़ी युद्ध का प्रथम दौर था। संयुक्त राज्य की पहल पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् ने कुवैत के हितों की पैरोकारी की तथा इराक को कुवैत से हटने के लिए समझाया । सोवियत संघ खुद भी एक कठिन दौर से गुजर रहा था। अंततः उसका विघटन भी हुआ। शीत युद्ध समाप्त हो चुका था और इराक को सोवियत संघ से कोई मदद नहीं मिली।

सच तो यह है कि सोवियत संघ ने भी संयुक्त राज्य के दृष्टिकोण और संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का समर्थन किया। चीन सुरक्षा परिषद द्वारा विभिन्न प्रस्तावों को पारित होने के समय मतदान से अलग तो हो गया था, किन्तु इसका मतलब यह नहीं था कि वह इराक का समर्थन कर रहा था।

जब इराक संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुपालन में विफल हो गया तथा संयुक्त राष्ट्र ने 28 राष्ट्रों के गठबंधन के गठन को मंजूरी दे दी तब अमरीका इसका अगुआ बना। यह गठबंधन कुवैत की मुक्ति के लिए युद्ध में शामिल हुआ था। इराक को भरोसा था कि उसे कुवैत से बाहर नहीं खदेड़ा जा सकता। किन्तु 38 दिनों के हवाई हमले और चार दिनों के जमीनी युद्ध के बाद इराक बुरी तरह पराजित हो गया मौजूदा संकट को इजराइल अरब युद्ध में तबदील करने का इराकी प्रयास भी विफल साबित हुआ और मिस्र, सीरिया और सउदी अरबिया जैसे अनेक अरब देश संयुक्त राज्य के साथ हो गये। अंततः इराक पराजित और कुवैत मुक्त हुआ। कुवैत की संप्रभुता बहाल हुई और अलसबा सत्ता में लौट आए। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद खाड़ी युद्ध संयुक्त राज्य की पहली बड़ी उपलब्धि साबित हुआ। इस युद्ध से इराकी महत्वाकांक्षा को गहरा झटका लगा तथा संयुक्त राष्ट्र को विजय हासिल हुई। तथापि इस युद्ध मे कुवैत पूरी तरह सदमें में आ गया था सउदी अरबिया के मन में भी भारी भय व्याप्त हो गया था।

शब्दावली
मेडेट व्यवस्था: किसी सदस्य राज्य में सीमा प्रशासन की देखरेख करने वाला राष्ट्र कुल का आयोग। खाड़ी: समुद्र का ऐसा विस्तार जिसमें अंतः क्षेत्र तो काफी बड़ा होता है किन्तु निकास अत्यंत छोटा होता है।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
जेम्स ली रे: 1992, ग्लोबल पोलिटिक्स, न्यू जरसी रमएस. माल्कोटे तथा ए. नरसिंहराव: 1993, इंटरनेशनल रिलेशन्स
एल. ए. स्टावरियनस: 1983, ए ग्लोबल हिस्ट्री: दि ह्यूमन हेरिटेज, न्यू जरसी।