टर्नर का सिद्धांत क्या है ? टर्नर की अभिधारणा (Turner’s Thesis theory in hindi) वर्गीकरण तीर्थ यात्रा प्रकार

By   December 18, 2020

(Turner’s Thesis theory in hindi) टर्नर का सिद्धांत क्या है ? टर्नर की अभिधारणा वर्गीकरण तीर्थ यात्रा प्रकार ?

टर्नर की अभिधारणा (Turner’s Thesis)
विक्टर डब्ल्यू, टर्नर सामाजिक प्रक्रिया के रूप में तीर्थयात्रियों पर अपनी अभिधारणा का प्रारंभ इस विचार के साथ करता है कि एक पारगमन संबंधी संस्कार के रूप में तीर्थयात्रा का एक त्रि चरणीय स्वरूप है (जैसा कि वान गेनेप ने विवरण दिया है-)
प) विच्छेद
पप) सांक्रांतिक चरण (जिस में स्वयं यात्रा, पवित्र स्थल में ठहरना, और पवित्र सत्ता के साथ संपर्क होता है) और
पप) पुनः एकत्रीकरण (घर वापसी)
इस संदर्भ में टर्नर ने सामाजिक अनुभव की दो विशेषताओं पर ध्यान देने का आग्रह किया है
प) संरचना की विशेषता, और
पप) बिरादरी की विशेषता

कार्यकलाप 2
क्या आपने कभी तीर्थयात्रा की है या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिसने तीर्थयात्रा की हो? क्या ऐसे व्यक्ति के अनुभव टर्नर के बताए पारगमन के संस्कार के त्रि चरणीय स्वरूप से मेल खाते हैं? इस अनुभव को टर्नर के दिए त्रि चरणीय प्रारूप में रखकर प्रस्तुत करने का प्रयास कीजिए। इन अनुभवों को एक कागज पर लिखिए और संभव हो तो अध्ययन केन्द्र के अपने सहपाठियों के साथ इस पर चर्चा कीजिए।

संरचना में लोगों में सामाजिक भूमिका और स्थिति के आधार पर भेद किया जाता है और अक्सर श्रेणीबद्ध राजनीति व्यवस्था में उन्हें जोड़ा जाता है। इसके विपरीत बिरादरी समान के विभेद रहित समुदाय के रूप में स्वयं की प्रस्तुति करती है, ये समान लोग एक दूसरे को तुरंत और संपूर्णता में मान्यता देते हैं। बिरादरी को लगभग हर कहीं पवित्र माना जाता है और ऐसा शायद इसलिए है कि यह उन मान्यताओं को नकारती और तोड़ती है जो संरचनाबद्ध और संस्थाबद्ध संबंधों को नियंत्रित करती है, और यह अभूतपूर्व शक्ति के अनुभवों के साथ चलती है, टर्नर (1974 ए: 203) के अनुसार बिरादरी वहाँ बनती है जहाँ सामाजिक संरचना नहीं होती और वह आधारभूत एकता के उन बंधनों को पुष्ट करती है जिस पर सामाजिक व्यवस्था अंततः आधारित होती है । आत्मचेतन तीर्थयात्राओं को (प) बिरादरी का अनुभव देने वाले अक्सर और (पप) बिरादरी के एक पवित्र स्रोत की यात्राएँ भी मानते हैं जिन्हें चंगाई और नवीकरण का स्रोत भी माना जाता है। तीर्थस्थल के लिए घर से प्रस्थान करने और वहाँ से घर लौटने के बीच की अवधि की विशेषताएँ हैं: सांक्रांतिकता, बिरादराना संबंधों की इष्टतम व्यवस्था और बिरादरी और समानीकृत और व्यक्तिगत स्थिति वाले मनुष्यों के बीच सहज से बने संबंध (टर्नर 1974 एः 202)

सांक्रांतिकता और बिरादरी मिल कर प्रति संरचना का निर्माण करते हैं। प्रति संरचना पूर्ण रूप से संरचना का उलटना नहीं है बल्कि समस्त रचनाओं का स्रोत और मूल है। इसमें नई संभावनाओं का संकेत मिलता है। तीर्थ की स्थिति में बिरादरी की नीति तीर्थयात्रियों के बीच विकसित होने वाले और उन्हें एक समूह के रूप में जोड़ने वाले सामाजिक बंधन को अभिव्यक्त करती है। तीर्थयात्रियों के समूह के सदस्यों के बीच बनने वाले संबंध के रूप में ये उन सामाजिक विभाजनों से परे होते हैं जो घरेलू परिवेश में सामाजिक व्यवस्था का विशिष्ट और आवश्यक गुण होता है। तीर्थयात्री कुछ समय के लिए सामाजिक संरचना के जालों से मुक्त हो जाते हैं। जहाँ से वे तीर्थ स्थल की यात्रा करते हैं। इससे उन्हें केवल अस्थाई मुक्ति मिलती है, इसलिए तीर्थ को व्यक्ति के निवास स्थान की अत्यधिक व्यवस्थित और संरचनाबद्ध जिंदगी की तुलना में प्रति संरचना का एक रूप कहा जाता है तीर्थयात्रा में तीर्थयात्रियों के बीच भ्रातृत्व और बंधुत्व का एक अस्थाई बंधन बनता है।

टर्नर द्वारा तीर्थयात्राओं का वर्गीकरण (Turners’k~ Typology of Pilgrimages in History)
विक्टर और एडिथ टर्नर ने तीर्थों का वर्गीकरण करने का प्रयास किया और उन्होंने अपने वर्गीकरण में मुख्य रूप से यूरोपीय इतिहास और ईसाई तीर्थों के इतिहास को आधार बनाया है (टर्नर और टर्नर, 1978)।

प) पुराकालीन तीर्थ (Archaic Pilgrimage)ः पुराकलीन तीर्थ परंपराएँ बहुत पुराने समय से चली आ रही हैं, और उनके उद्भव के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। पुराकालीन तीर्थ वे तीर्थ हैं जिनमें पुराने धार्मिक विश्वासों और प्रतीकों वाले समन्वयवाद की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है। टर्नर और टर्नर मेक्सिकों में ग्लैस्टनबरी, चलमा, आयरलैंड में क्रोपेट्रिक और भारत में पंढारपुर का उदाहरण देते हैं। पंढारपुर को इस वर्ग में इसलिए शामिल कर लिया गया है क्योंकि “इसकी दैवीय सत्ता विनोबा भावे के विषय में यह मानती है कि उसकी संगत द्रविड़, पूर्व-. भारतीय यूरोपीय रही होगीष् (टर्नर और टर्नर, 1978 रू 18)।
पप) आदिप्ररूपीय तीर्थ (Prototypical Pilgrimage)ः किसी धर्म के संस्थापक या उसके पहले शिष्यों या उसके पंथ के महत्वपूर्ण प्रचारकों के शुरू किए गए तीर्थों को आदिप्ररूपीय कहा जा सकता है। इसके उदाहरण हैं: यरूशलम और रोम (ईसाई धर्म), मक्का (इस्लाम), बनारस और कैलाश पर्वत (हिंदू धर्म), बोध/ गया और सारनाथ (बौद्ध धर्म)।
पपप) स्वर्णकालीन तीर्थ (High&period Filgrimage)ः तीर्थ परम्पराओं के स्वर्ण युग में प्रतीकों से लैस उत्कृष्ट तीर्थस्थलों को सृजित किया जाता था। मध्ययुग में जब भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में बढ़ती मुस्लिम ताकत ने पुण्य भूमि (होली लैंड) के लिए ईसाई तीर्थों को अस्त व्यस्त किया तो समूचे यूरोप में तीर्थ स्थलों के निर्माण से इस क्षति की भरपाई की गई। कृत्रि, केंटरबरी, कम्पोस्टेला, लोरेटो कैमित्री चकोचांवा आदि ऐसे महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। अन्ततः बहुत से यूरोपीय केंद्रों पर चहल पहल और इसके साथ-साथ पतन होना शुरू हो गया और प्रतीकात्मक वस्तुओं और रस्मों की भरमार में असली अर्थ लुप्त हो गया।
पअ) आधुनिक तीर्थ (Modern Pilgrimage)ः पिछली दो शताब्दियों में पूरी दुनिया में एक प्रकार के तीर्थ का विकास हुआ है जिसकी विशेषता ‘‘उनके तीर्थयात्रियों की व्यक्तिगत पवित्रता और एक अत्यधिक भक्तिमय भाव‘‘ है। इस आधुनिक तीर्थ में ‘‘सामहिक प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक संस्कृति का गहन समावेश‘‘ है। तीर्थयात्री मोटर वाहनों और विमानों से यात्रा करते हैं। तीर्थस्थलों से समाचार पत्र और परचे प्रकाशित होते हैं। आधुनिक तीर्थो के आवाह-क्षेत्र बड़े और समृद्ध औद्योगिक शहर होते हैं। फिर भी, देव भवन का संदेश “अब भी पारंपरिक, आज के मूल्यों के विरुद्ध‘‘ है। यूरोप में और आधुनिक विश्व के जापान या इजरायल जैसे देशों में संत-केंद्रित और दैवीय दर्शन वाले तीर्थ बहुतायत में पाए जाते हैं।

भारत में तीर्थयात्राएँ: निरंतरता और परिवर्तन
(Pilgrimages in India : Continuity and Change)
भारत अपनी तीर्थयात्रा की संस्था की प्राचीनता और निरंतरता के लिए विख्यात है। सभी वर्गों के भारतीय इस संस्था को महत्व देते हैं। उदाहरण के लिए कुरान में तीर्थयात्रा के नाम पर केवल ष्हज की अनुमति है। भारत और पाकिस्तान के मुस्लिम कई तीर्थस्थलों में जाते हैं। मकबरों या मजारों की पूजा इस्लाम के नियम या “उलेमा‘‘ के विरुद्ध है और वहाबी ऐसी किसी भी यात्रा की मनाही करते हैं। भारती ने सही कहा है कि भारत और पाकिस्तान के मुश्किल से 5 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम इन निषेधों पर ध्यान देते हैं। ‘‘मुस्लिमों में यह प्रथा स्पष्ट रूप से हिंदुओं की नकल है, और उनका पालन हिंदू तीर्थयात्राओं से अधिक भिन्न नहीं होता ……..‘‘ (भारती 1963: 142)। आर्य समाज जैसे कुछ आधुनिक हिंदू पंथ समाधियों और मजारों की पूजा और यात्रा का विरोध करते हैं। इससे पहले मैसूर के एक ईश्वरवादी लिंगायत पंथ और भक्ति पर आश्रित बंगाली सहजीय वैष्णवों ने भी तीर्थयात्राओं के प्रति ऐसा ही नकारात्मक रुख अपनाया था। हिंदुओं में संस्कृत के तीर्थयात्रा शब्द की प्रकृति को अपनाया गया है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘‘नदी के घाट की यात्रा करना‘‘।

साहित्य में जो तीर्थ और तीर्थयात्रा को महिमा दी गई है उसका कारण पुरोहितों का व्यावहारिक लाभ है। पवित्र स्थानों पर चढ़ाई गई भेटें वहाँ के पुरोहितों की आजीविका का स्रोत होती हैं। इसलिए, ये पुरोहित अत्यंत उत्साह के साथ पवित्र स्थानों की महिमा का, विशेष कर अपनी पुरोहिती वाले पवित्र स्थानों की महिमा का, बढ़ा चढ़ा कर गुणगान करते हैं। इस प्रकार अनेक स्थलपुराण और महात्म्य बीसियों तीर्थों के आकर्षण के बखान के लिए लिखे गए हैं। पुरोहितों के निहित स्वार्थ गया के गयावालों की संस्था में व्यक्त होते हैं। गयावाल जिस तीर्थयात्री और उसके वंशज से संपर्क कर सकता है वह उनके लिए अनुष्ठान करने का एकाधिकार अपने पास होने का दावा करता है। वह इस धार्मिक सेवा के लिए शुल्क लेता है। इस तरह से गयावाल गद्दी आर्थिक लाभ का स्रोत होती है। इसी गद्दी पर तीर्थयात्री और उसके वंशजों का हिसाब रखा जाता है। गद्दी विरासत में या उपहार के रूप में प्राप्त हो सकती है। कई बार तो गददी के अधिकार के लिए मुकदमेबाजी भी हुई है।
पवित्र स्थान या तीर्थ निम्नलिखित इन दोनों रूपों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:
प) पारंपरिक हिंदुत्व के भंडार के रूप में, और
पप) पुनर्व्याख्यायित मूल्यों और विश्वासों के प्रचारक के रूप में।

इस भूमिका को सहारा देने वाले प्रमुख कारक ये हैं कि विभिन्न क्षेत्रों के हिंदू इन स्थानों की यात्रा करते हैं और इस प्रकार ऐसी संस्थाओं के विकास के लिए अवसर और सुविधा प्रदान करते हैं। प्रमुख मेलों के समय में पवित्र स्थान नए विचारों के प्रचार के लिए प्रत्यक्ष केंद्र बन जाते हैं। इस प्रकार धर्म के अलावा व्यापक सांस्कृतिक परिणामों वाली जानकारी के प्रसार को जोरदार प्रोत्साहन मिलता है। इसका मुख्य कारण यह है कि संचार, यातायात और सेवाओं से संबंधित आधुनिक साधनों ने अब और अधिक लोगों के लिए पहले दुरूस्त समझी जाने वाली तीर्थयात्राओं को सुगम बना दिया है। प्रतिवर्ष लाखों की तादात में तीर्थयात्री हिंदुओं के विख्यात तीर्थों की यात्रा जैसे विशेष अवसरों पर अनगिनत संख्या में इकट्ठे होते हैं। ये भक्त वहाँ पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और धार्मिक उत्सवों में भाग लेते हैं।

फिर भी पवित्र स्थानों में तीर्थयात्राओं की बढ़ती संख्या से यह बताना कठिन है कि हिंदू आधुनिक समय में अधिक धार्मिक हो गए हैं या कम । लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि हाल ही में जीवित और मृत संतों के गिर्द बने नए पंथ अस्तित्व में आए हैं और उन्होंने तीर्थ और भविष्य में उसकी संभावना को अत्यधिक बल दिया है। अगेहानंद भारती ने ‘‘कभी विद्यमान रहे किसी संत के कारण तीव्र तीर्थाकरण के दो लगभग समकालीन उदाहरणों का उल्लेख किया है (भारती 1963: 150) । इनमें से एक कलकत्ता के निकट दक्षिणेश्वर का काली मंदिर है। इस मंदिर में पूरे बंगाल, शेष भारत और हाल ही में अमेरिका और यूरोप से भी अधिकाधिक संख्या में तीर्थयात्री आए। तीर्थयात्रियों के लिए दक्षिणेश्वर का महत्व इस तथ्य में है कि विश्व प्रसिद्ध संत रामकृष्ण परमहंस दक्षिणेश्वर के काली मंदिर परिसर में रहते थे। भारती ने जिस दूसरे तीर्थ का उल्लेख किया है वह है मद्रास में रामना महर्षि का आश्रम । श्रीनिवास ने आधुनिक भारत के एक संत साई बाबा की चर्चा की है। महाराष्ट्र के शिरडी नामक स्थान में साई बाबा की समाधि एक प्रिय तीर्थ स्थल बन गई है। रामना महर्षि के तिरुवन्नामताई स्थित आश्रम में भी लोग जाते हैं लेकिन उनका पंथ साई बाबा के पंथ जितना लोकप्रिय नहीं हुआ है (श्रीनिवास 1970: 132)।

भारत में केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों की समझ में अधिकाधिक यह आने लगा है कि तीर्थस्थानों में इकट्ठा होने वाली भारी भीड़ का इस्तेमाल भारत के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास को प्रभावित करने वाले विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए किया जा सकता है। हरिद्वार के अर्ध कुंभ का उदाहरण ले, जहाँ स्वास्थ्य विभाग ने एक विशाल (अस्थाई) परिवार नियोजन प्रदर्शनी और चिकित्सा केंद्र खोला था । वहाँ हजारों तीर्थयात्रियों को परिवार नियोजन के उपायों की जानकारी दी गई। वहाँ अनेक व्यक्तियों को व्यक्तिगत सलाह भी दी गई है। इसी प्रकार, कृषि और उद्योग मंत्रालयों ने भी प्रदर्शनियाँ लगाई। तीर्थस्थानों पर जमा होने वाले अनगिनत तीर्थयात्रियों पर सरकार को बहुत कम खर्च करना पड़ता है और उनके माध्यम से वह देश के दूर-दराज के क्षेत्रों तक नए विचारों का प्रचार-प्रसार कर सकती है।