पूर्वोत्तर में जनजातीय आंदोलन क्या है | tribal movement in northeast india in hindi पूर्व उत्तर में

By   December 5, 2020

tribal movement in northeast india in hindi पूर्वोत्तर में जनजातीय आंदोलन क्या है पूर्व उत्तर में ?

पूर्वोत्तर में जनजातीय आंदोलन
पूर्वोत्तर के जनजातिय आंदोलनों की विशिष्टता और अन्य क्षेत्रों के जनजातीय आंदोलनों से भिन्न इसके चरित्र को समझने के लिए पहले हमें यह ध्यान में रखकर चलना होगा कि पूर्वोत्तर की जनजातियों की एक विशिष्ट अनूठी भू-राजनीतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। इस पृष्ठभूमि के कारक इस प्रकार हैंः

प) अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर बसे होने के कारण इनमें से कई जनजातियों ने सेतु और मध्यवर्ती समुदायों की भूमिका निभाई और इसी कारण सीमा पार के कुछ विशेष जन समूहों से उनके संबंध बन गए।
पप) ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने इन जनजातियों को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से शेष देश से पृथक रखने की नीति अपनायी। उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों को अपवर्जित और अंशतरू अपवर्जित क्षेत्रों में बांटा और इन क्षेत्रों में बाहरी व्यक्तियों के आवागमन को बड़ी कड़ाई से नियमित किया । खासकर अपवर्जित क्षेत्रों में तो कोई बाहरी व्यक्ति परमिट के बगैर प्रवेश कर ही नहीं सकता था। यही कारण है कि ये क्षेत्र भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभाव से कमोबेश अछूते रहे । बल्कि स्वतंत्र भारत में ये अपनी अलग पहचान और राजनीतिक स्वायत्तता को बनाए रख पाएंगे या नहीं इसको लेकर भी उनमें आंशकाएं घर कर गईं।
पपप) मध्य भारत की जनजातियों के विपरीत त्रिपुरा को छोड़ बाकी समूचे पूर्वोत्तर में जनजातियां बहुसंख्यक हैं। पड़ोसियों के साथ आर्थिक और सामाजिक शोषणात्मक चंगुल से मुक्त होने के कारण उन्हें अपनी जमीन और जंगलों से बेदखली जैसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। इसलिए इन्हें देश के अन्य भागों की जनजातियों की तरह किसान आंदोलनों की आवश्यकता नहीं पड़ी।
पअ) ईसाई धर्म और मिशनरी शिक्षा के प्रसार ने यहां की जनजातियों को अपनी विशिष्ट पहचान का बोध दिया और स्वतंत्र भारत में अपने भविष्य को लेकर उन्हें शंकालु बनाया।
अ) द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रभाव जैसा कि युद्ध भूमि, पूर्वोत्तर में इन जनजातियों की वासभूमि के समीप ही थी।
अप) भारत के स्वतंत्र होने के बढ़ते आसार और उसके फलस्वरूप राजनीतिक चेतना और संघर्ष में वृद्धि।
अपप) स्वतंत्रता के पश्चात यहां की जनजातियों और बाहरी लोगों में असीमित संपर्क । अनेक व्यापारी, शरणार्थी और अन्य प्रवासी लोग पूर्वोत्तर में आ बसे और उन्होंने भूमि और संसाधनों को हासिल कर लिया। इससे जनजतियों में यह भय उत्पन्न हो गया कि बाहरी लोग उन पर हावी हो जाएंगे और ये लोग उनसे उनके जंगल और जमीन छीन लेंगे और उन्हें अन्य संसाधनों से भी वंचित कर देंगे।
अपपप) जनजातीय जीवन और सामाजिक संस्थाओं पर आधुनिकीकरण के प्रभाव फलस्वरूप विशेषकर उभरते मध्यम वर्ग के सदस्यों और पारंपरिक सरदारों के बीच संघर्ष बढ़ा और भूमि नियंत्रण और भूमि संबंध के पारंपरिक स्वरूप भी बदल गए।

अलग-अलग आंदोलनों की खास परिस्थितियों और उद्देश्य के अनुसार इनमें से कई कारकों ने अलग-अलग मिश्रण में विभिन्न जनजातीय आंदोलनों के उद्भव और विकास को प्रभावित किया। इन आंदोलनों की विशिष्ट परिस्थितियों के कारण इनका आवेग मुख्यतः राजनीतिक रहा है और ये मुख्यतः ‘पहचान और सुरक्षा‘ के मुद्दों पर केन्द्रित रहे हैं। इन आंदोलनों के लक्ष्य स्वायत्तता से लेकर स्वतंत्रता और साधन संवैधानिक से लेकर सशस्त्र विद्रोह रहे हैं। हांलाकि अधिकांश आंदोलन भाषा, लिपि और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के मुद्दों पर केन्द्रित रहे हैं, लेकिन इन आंदोलनों में भी वही राजनीतिक संघर्ष प्रतिबिंबित होता दिखाई देता है। आइए, अब हम कुछ आंदोलनों पर विस्तार से दृष्टि डालकर उनकी विशिष्टता को समझने का प्रयास करेंगे।
उत्तर-पूर्व की एक आदिवासी महिला
साभार: कपिल कुमार

 त्रिपुरा में जनजातीय नीति
त्रिपुरा एक ऐसे राज्य का उदाहरण है जिसके शासन की बागडोर एक जनजातीय शासक के हाथों में थी पर उसने ऐसी नीतियां अपनायी जिनके चलते इसके मूल जनजातीय वासी ही यहां अल्पसंख्यक बन गए। इस राज्य में मुख्यत 19 जनजातियां थीं जिनमें सबसे प्रभावी त्रिपुर जनजाति थी। राज्य का राजा इसी जनजाति का था। अनेक ऐतिहासिक कारणों से यहां के अधिकांश जनजातीय लोग हिन्दू धर्म खासकर वैष्णव पंथ के प्रभाव में आए। त्रिपुरा के महाराजा ने आर्थिक कारणों से बंगाली किसानों को त्रिपुरा में झूम खेती की जगह नियमित खेती का विकास करने के लिए बुलाया। बगल के कोमिला, नोआखाली और चिटगांव जिलों में खुद राजा की जमींदारी थी। इन बंगाली किसानों को जिरातिया काश्तकार कहा जाता था। इन्होंने कृषि को विकसित करने के साथ-साथ राज्य के लिए बेहद जरूरी राजस्व भी जुटाया। राजा ने मानवीय दृष्टिकोण से भी बंगाली शरणार्थियों को अपने राज्य में बसने और वनभूमि को कृषि योग्य बनाने की अनुमति दी। इसी प्रकार अनेक उद्यमियों को राज्य में चाय के बागान लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया । राज्य में प्रशासन के काम-काज की भाषा बंगाली होने के कारण बंगाली व्यवसायी और सफेदपोश कामगार, अध्यापक और अन्य लोग भी बड़ी संख्या में आ बसे ।

अभ्यास 2
अध्ययन केन्द्र के सहपाठियों से त्रिपुरा में जनजातीय नीति पर चर्चा कीजिए। इस चर्चा से आपको जो जानकारी मिलेगी उसे अपनी नोटबुक में लिख लीजिए।

इस प्रक्रिया ने त्रिपुरा के जनसांख्यिक स्वरूप को ही बदल डाला। जिस राज्य में जनजातियों की संख्या 1874 में 64 प्रतिशत थी, वहीं 1911 में उनकी संख्या 36 प्रतिशत रह गई। वर्ष 1931 तक आसाम और बंगाल से आ बसने वाले लोगों की संख्या 1.14,383 हो गई। त्रिपुरा के महाराजा ने 1931 और 1943 की राजकीय घोषणा में 5050 वर्ग कि.मी. का क्षेत्र त्रिपुरा की त्रिपुरी, रेंग, जमाती, नाओती, और हलाम जनजातियों के लिए नियमित खेती के लिए आरक्षित कर दी थी।

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स्वतंत्रता से पहले ही त्रिपुरा भारतीय संघ में 13 अगस्त 1947 में शामिल हो गया। मगर सिर्फ एक दिशा को छोड़ बाकी सभी दिशाओं से पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांगलादेश) से घिरा होने कारण सीमा पार होने वाली सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं, खासकर साम्प्रदायिक दंगों ने त्रिपुरा पर भारी प्रभाव डाला जिसके फलस्वरूप इसमें शरणार्थियों की बाढ़ आ गई। इसका वहां की जनजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि राज्य में उनकी जनसंख्या जहां एक ओर बढ़ी मगर वहीं बाहरी लोगों के अनुपात में वह 1971 में कुल 28.44 प्रतिशत ही रह गई।

प) इस जनसांख्यिक बदलाव का सीधा सा परिणाम यह रहा कि अप्रवासियों का जनजीवन के विभिन्न पहलुओं खासकर बाजार और ऋण व्यवस्था के साथ-साथ व्यावसायिक और सेवा क्षेत्रों में वर्चस्व और नियंत्रण बढ़ता गया। इसके फलस्वरूप मूल आदिवासियों को भारी संख्या में भीतर की ओर धकेल दिया गया, भूमि पर दबाव भी बढ़ गया, गिरवियों और कर्ज में भारी वृद्धि हो गई, झूमखेती जिसमें जंगल को काटकर खेती योग्य बनाया जाता था, उस पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया, जनजातीय लोगों से जमीन गैर-जनजातीय लोगों के हाथों में चली गई। इस प्रकार, बदलते जनसांख्यिक संतुलन बाहर से आने वाले लोगों की संख्या में आकस्मिक वृद्धि से उत्पन्न दबाव और शिक्षा के प्रसार, इन सबने मिलकर नए आवेगों, अपेक्षाओं और असंतोष की भावनाओं के मिश्रण को जन्म दिया।

इस असंतोष का पहला परिणाम यह रहा कि 1947 में सेंग क्राक के नाम से एक उग्रपंथी जनजातीय संगठन का गठन कर लिया गया, इसके कुछ समय बाद आदिवासी समिति और त्रिपुरा राज्य आदिमवासी संघ का गठन हुआ। इन दोनों संगठनों ने 1954 में मिलकर आदिवासी संसद बना ली। इधर ईस्टर्न इंडिया ट्राइबल यूनियन (पूर्वी भारत जनजातीय संगठन) ने भी त्रिपुरा में अपनी शाखा खोल ली और 1957 और 1962 में चुनाव लड़े। इसी प्रकार साम्यवादियों ने भी 1947 में राज्य मुक्ति परिषद का गठन किया और जनजातियों के हितों की पैरवी करके त्रिपुरा में अपनी उपस्थिति मजबूत बना ली थी। मगी कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन और उसके पतन के साथ-साथ बदलते समीकरणों में कांग्रेस पार्टी को भी अपने पैर पसारने का भरपूर मौका मिला। इन सबके चलते नई पीढ़ी के लोगों में भारी मोहभंग और असंतोष पैदा हो गया और उन्होंने समाचारण त्रिपुरा के तहत त्रिपुरा उपजाति जूबा समिति (टीयूजेएस) का 10 जून 1967 को गठन कर लिया। इस संगठन के एजेंडे में मुख्य चार मांगे थीः क) भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत जनजातियों के लिए एक स्वायत्त जिला परिषद का गठन, ख) गैर जनजातीय लोगों द्वारा अवैध रूप से हथियाई गई जमीन को जनजातियों को बहाल कर लौटना, ग) केक बारक भाषा को मान्यता, घ) रोमन लिपि को स्वीकृति।

पप) टीयूजेएस ने अपनी मांगों की पूर्ति के लिए जबर्दस्त अभियान छेड़ दिया। आंदोलन, प्रचार, याचिकाओं, धरनों, विरोध प्रदर्शनों के जरिए तमाम उतार-चढ़ावों से गुजरते हुए इसने अपनी पकड़ बनाए रखी और जब 1972 में त्रिपुरा को स्वतत्र राज्य का दर्जा मिला तो यह जनजातियों के उत्थान के लिए कार्य करती रही। मगर 1977 के चुनावों में साम्यवादियों की स्थिति सुधर गई और उन्होंने सरकार बना ली जिससे टीयूजेएस और कांग्रेस दोनों हाशिए में चले गए।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) की सरकार ने राज्य में जनजातियों की स्थिति को बहाल और उसे मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए। जैसे, केक-बारक भाषा को मान्यता दी, अवैध रूप से हथियाई गई जमीन को मूल जनजातीय लोगों को लौटाने के लिए कृषि कानून लागू किया, और स्वायत्त पर्वतीय परिषद् के गठन की प्रक्रिया आरंभ की। इन कदमों का जनजातियों और टीयूजेएस के मध्यमार्गियों ने स्वागत तो किया मगर इसके घटते प्रभाव से चिंतित चरमपंथी नेताओं ने इन्हें स्वीकार नहीं किया। बल्कि उनके नेतृत्व की कमान ईसाई मिशनरी विजय कुमार रैखेल ने अपने हाथ में ले ली। रैखेल ने ईसाइयत के धार्मिक बंधन को जनजातियों में एकता लाने और उसे प्रबलता से व्यक्त करने की माध्यम बनाया। उन्होंने टीयूजेएस के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने के लिए मिजो नेशनल फ्रंट की सहायता ली। वह त्रिपुरा ट्राइबल नेशनल फ्रंट और त्रिपुरा सेना के स्वयंभू नेता बन गए। त्रिपुरा का भारत से अलगाव और स्वतंत्रता उनका मुख्य ध्येय बन गया । त्रिपुरा अलगावादी आंदोलन में दुबारा उफान मणिपुर, मेघालय और असम में बाहरी लोगों के विरुद्ध चल रहे आंदोलनों के दौर के साथ आया। टीयूजेएस ने मार्च 1980 में एक सम्मेलन किया जिसमें उन तमाम विदेशियों को राज्य से बाहर निकालने की मांग उठाई गई जो 15 अक्तूबर 1949 के बाद वहां बसे थे। आंदोलन का हिंसक दौर विदेशियों विशेषकर व्यापारियों के बहिष्कार और उनके विरुद्ध सरकारी दफ्तर के सामने विरोध प्रदर्शनों के आह्वान के साथ शुरू हुआ। बंगालियों और अन्य प्रवासियों पर हिंसक हमले हुए जिन्होंने इस आंदोलन का विरोध अरमा बंगाली से किया। एक महीने के अंदर हिंसा में नरसंहार का वीभत्स रूप ले लिया। यह हिंसा लेंबुचेरा कांड से भड़की।
पपप) केन्द्र सरकार ने त्रिपुरा पर दिनेश सिंह समिति बैठाई। इस समिति की राय थी कि त्रिपुरा की समस्या का वास्तविक समाधान क्षेत्र के आर्थिक विकास में है। मूल आदिवासी समाज में व्यापारियों, जमीन हथियाने वालों, शरणार्थियों और ईसाई मिशनरियों की जनजातीय समाज में घुसपैठ के फलस्वरूप राज्य में जो परिवर्तन आया था उसकी ओर समिति ने ध्यान दिया । समिति ने अपनी सिफारिशों में समस्या के समाधान के लिए तात्कालिक और दूरगामी उपायों की एक लंबी-चैड़ी फेहरिसत दी। इनमें मुख्य था विषमताओं को दूर करना, मूल जनजातीय लोगों को उनकी जमीन बहाल करना और उनका पुनर्वास करना। टीयूजेएस ने रैखेल के नेतृत्व वाले उग्रपंथी त्रिपुरा नेशनल वॉलटियर्स से नाता तोड़ लिया और उसने दिनेश सिंह समिति की सिफारिशों को लागू करने, जून में हुई हिंसा की न्यायिक जांच कराने और एक जनजातीय अंचल स्वायत्त परिषद् (ट्राइबल एरिया ऑटोनॉमस कांउसिल) के गठन के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन का अहान किया। विदेशी विरोधी आंदोलन को रोक दिया। कुछ समय तक कठोर संघर्ष करने के बाद त्रिपुरा नेशनल वॉलटियर्स (टीएनवी) के उग्रपंथियों ने भी आखिरकार 12 अगस्त 1988 को भारत सरकार से समझौता कर लिया। इस समझौते के तहत हथियाई गई जमीनों को उनके मूल स्वामियों को लौटाने के लिए शीघ्र कार्रवाई, सीमा पार से घुसपैठ को रोकने के लिए कड़े उपाय, इत्यादि निर्णय लिए गए।

पअ) मगर टीएनवी के सभी गुट इस समझौते से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने आंदोलन को जारी रखने के लिए अलग-अलग गुट बना लिए। जैसे ऑल त्रिपुरा ट्राइबल फोर्स, द नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा, त्रिपुरा राज्य रक्षा वाहिनी, त्रिपुरा स्टेट वॉलंटीयर्स, त्रिपुरा नेशनल डेमोक्रेटिक ट्राइबल फोर्स। इनमें से भी ऑल त्रिपुरा ट्राइबल फोर्स ने 1993 में सरकार से समझौता कर लिया। यूं तो इस बीच आंदोलन की तीव्रता, आस्था और समर्पण में कमी तो आई है लेकिन इसके विभिन्न गुट अभी तक जीवित हैं। दरअसल, इन्हें एक ओर विभिन्न राजनीतिक दलों से संरक्षण और समर्थन मिल रहा है तो दूसरी ओर इन्हें सीमा पार के भूमिगत संगठनों से संसाधन और हथियार मिलते हैं।

मिजो प्रशासन प्रणाली
मिजो लोगों की अपने सरदारों के तहत एक सु-स्थापित शासन प्रणाली थी। गांव के जीवन के सभी कार्य-कलाप सरदार और उसके घर के इर्दगिर्द होते थे, जो उसका शासक होता था। सरदार के बेटे का विवाह होने पर सरदार उसे कुछ घर सौंप देता था जिससे कि वह अपना गांव खुद बसाए और स्वतंत्र होकर उस पर राज करे । साधारणतया कुल के अनुसार सरदार का बड़ा या छोटा बेटा उसी के पास रहता था जो सरदार की मृत्यु होने पर उसकी गद्दी और संपत्ति का उत्तराधिकारी होता था।

साइलो लोगों में आनुवंशिक उत्तराधिकार सबसे छोटे जबकि पैइट कबीले में सबसे बड़े बेटे को मिलता था। प्रशासन का काम-काज चलाने के लिए सरदार को सयाने लोग सभी मदद देते हैं जिन्हें उपा कहते हैं। इसी तरह युवा लोगों के लिए सहप्रांगण होता था जिसे जौलबुक कहा जाता था। उपा के सदस्यों को झूम के लिए खेतों के चुनाव में वरीयता दी जाती थी और सरदार द्वारा आयोजित किए जाने वाले भोजों या समारोहों में उन्हें महत्व दिया जाता था। गांव के महत्वपूर्ण अधिकारियों या कर्मियों में मुख्य लांगाऊ (गांव की रुदाली), थिरदेंदिंग (लोहार) और पुईथियाम (पुरोहित) होते थे। प्रत्येक कर्मी को गांव के सदस्यों के लिए किए जाने वाले काम के एवज में एक टोकरा धान दिया जाता था। इसी तरह जौलबुक भी एक महत्वपूर्ण संस्था थी।

मिजो सरदारों को कुछ अधिकार और विशेषाधिकार प्राप्त थे, जैसे वह (प) फथंग (धान पर कर), (पप) स्छिया (मांस कर), (पपप) सलाम (जुर्माने के रूप में भेंट) लेता था और (पअ) उसके घर का निर्माण और मरम्मत उसके कहने पर की जाती थी। इसके अलावा वह रमहुआल और सलेन कहे जाने वाले किसानों के एक विशेष वर्ग को विशेषाधिकार भी प्रदान करता था, जिन्हें झूम खेतों को चुनने का सबसे पहले मौका दिया जाता था।

मगर स्वतंत्रता के बाद आंतरिक संघर्ष, जागरुकता, नगरीकरण में वृद्धि और अपेक्षाओं-आकांक्षाओं से भरे मध्यम वर्ग के उदय के फलस्वरूप सरदारशाही संस्था समाप्त हो गई और उसकी जगह वर्ग और अन्य उभरते हितों पर आधारित सामाजिक स्तरीकरण ने ले ली।

 नागाओं में सत्ताधिकार और प्रतिष्ठा
इस तरह की असमानता नागाओं में भी सत्ताधिकार, प्रतिष्ठा और संपदा के असमान वितरण के रूप में विद्यमान थी। इन्हें योग्यता भोज के जरिए अर्जित किया जाता था, जिसमें नष्ट हो जाने वाले भोज्य पदार्थों को कबीले के सदस्यों में बांट दिया जाता था। इसका एक सामाजिक प्रकार्य यह था कि यह युद्ध और शांति दोनों के दौरान सांकेतिक प्रतिष्ठा अर्जित करने और सम्मानित गठबंधन स्थापित करने का अवसर देता था। उदाहरण के लिए, नागा लोग (प) केकामी (सरदार), (पप) चोकोभी (छोटे सरदार), (पपप) मुघामी (अनाथ या जनसाधारण), अकाहेमी (सरदार के आश्रित या परिजन) और (अ) अनुकेशिमी (सरदार के खेत जोतने वाले किसान)। हैमेनडॉर्फ बताते हैं कि सरदारशाही क्नोयक कबीले में रक्त पवित्रता के सिद्धांत पर जीवित रही है।

अभ्यास 1
नागाओं में सत्ताधिकार और प्रतिष्ठा पूर्वोत्तर के अन्य जनजातीय समूहों से किस तरह से भिन्न या समान हैं? अध्ययन केन्द्र में अपने सहपाठियों के साथ इस विषय पर विचार-विमर्श करें और आपको जो भी जानकारी मिलती है उसे अपनी नोटबुक में लिख लीजिए।

हैमनडॉर्फ ने अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों का गहराई से जो अध्ययन किया है उससे इनमें भी इसी तरह के रुझानों का पता चलता है। इस राज्य की सबसे महत्वपूर्ण जनजाति अपटानी है, जो सात गांवों में बसी है। प्रत्येक गांव में 160 से 1000 घर हैं। अपटानी किसान हैं और उनका समाज बड़ी कठोरता से स्तरित है। इनमें मुख्यतः दो वर्ग हैं जो स्थिति या हैसियत में एक दूसरे से भिन्न हैं। इनमें एक उच्च वर्ग है जिसके सदस्य जमीन के बड़े हिस्से के स्वामी हैं और अपने वर्ग और गांवों में राजनीतिक शक्ति रखते हैं। दूसरा निम्न वर्ग है जिसमें कुछ व्यक्ति जमीन के स्वामी हैं तो शेष घर-दास है। यानी ये मुख्यतः माटे, मिटे-गुथ (कुलीन वर्ग) और मुरा, कुची (दास/जनसाधारण) में बंटे हैं।

जैंतिया कबीले में भी एक विस्तृत स्तरीकरण प्रणाली प्रचलित थी। इसके लोग इन वर्गों में विभाजित थेः
प) राजा
पप) डोलोई (गवर्नर)
पपप) वाहेन चनोंग (गांव का प्रधान)
पअ) माइंतिए, पाटस, लस्कर, संगत, माजी (य जनसाधारण हैं और इनमें सभी शामिल हैं)।

तिलपुत नोंगब्री ने जनजातियों में स्तरीकरण प्रणाली के एक रोचक पहलू पर जेंडर (सामाजिक लिंग) की रोशनी में दृष्टिपात किया है। वह कहती हैं कि पारंपरिक जनजातीय नियम भी गैर जनजातीय समाजों की तरह महिलाओं को संपत्ति पर बराबरी का अधिकार नहीं देते हैं। उनके साथ यह भेदभाव विशेषकर उत्तराधिकार के नियमों में किया जाता है, जिनमें उन्हें सिर्फ भरण-पोषण और खर्च का अधिकार प्राप्त है। मातृवंशीय समाज में भी जमीन को लेकर ‘स्वामित्व‘ और ‘नियंत्रण‘ के बीच भारी भेद है। इसलिए जमीन का स्वामित्व तो महिला को मिलता है लेकिन उसका नियंत्रण और संचालन पुरुषों के हाथ में रहता है। खासी, बैंतिया, गारो, राभा इत्यादि जनजातियों में ये नियम प्रचलित हैं। इसी प्रकार जिन पितृसत्तात्मक समाजों में महिलाओं को भोगाधिकारी का अधिकार प्राप्त है वहां भी उन पर कई शर्ते थोप दी जाती हैं। जैसे, उन्हें अविवाहित रहना पड़ता है, या उनके कोई भाई न हो, या वे विधवा हों और उन्हें उनकी इच्छा विरुद्ध ऐसे व्यक्ति से विवाह करने के लिए बाध्य कर दिया जाता है जिसे लोग चुनते हैं। इसी प्रकार सामुदायिक संपत्ति संसाधनों के आबंटन और संचालन को लेकर भी महिलाओं को पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है। उन्हें विवाह और तलाक के मामले में भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। वधू-मोल की प्रथा ने उन्हें खरीद की वस्तु जैसा बना दिया है जो उनके लिए अपमानजनक है। महिलाएं विशेषकर जब कबीले से बाहर गैर-जनजातीय व्यक्तियों से ब्याह रचाती हैं तो उन्हें वंश समूह और जातीय पहचान के लिए खतरा समझ लिया जाता है क्योंकि इससे उनके समाज पर अप्रत्यक्ष जनसांख्यकीय प्रभाव पड़ते हैं। इसके कारण कई पुरुष चाहते हैं कि उनके समाज में प्रचलित उत्तराधिकार की मातृवंशीय व्यवस्था को पितृवंशीय व्यवस्था में बदल दिया जाए। मगर इससे मातृवंशीय व्यवस्था का आधार कमजोर हो जाएगा।

 पारंपरिक श्रेणीकरण प्रणाली
इन सब उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न जनजातियों की सामाजिक श्रेणीकरण की सुव्यवस्थित और अलग-अलग पारंपरिक प्रणालियां हैं जिन्हें उनकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और ऐतिहासिक परिस्थितियां तय करती हैं। औपनिवेशिक शासन का आरंभ और देश के स्वतंत्र होने पर इसकी समाप्ति से अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन आए जिन्होंने पूर्वोत्तर भारत की जनजातियों की दुनिया को हिला दिया, जिसे अभी तक बड़ी ही सावधानी से सुरक्षित और अपेक्षतया पृथक रखा गया था। जैसे, जनजातियों को औपनिवेशिक प्रशासनिक प्रणाली से जोड़ना, जिसके फलस्वरूप इनका बाहरी विश्व से संपर्क बढ़ा, ईसाई मिशनरियों का आगमन, बाजार व्यवस्था का चलन, प्रशासनिक और राजनीतिक सुविधा के लिए अंग्रेजों का जनजातियों में प्रचलित स्थिति क्रम परंपरा को औपचारिक रूप देना और उसे सुदृढ़ बनाना, जनजातियों के हित में रक्षात्मक भेदभाव की नीति और पिछड़े इलाकों में विकास योजनाएं लागू करना और आखिर में स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहभागिता। इन सबके फलस्वरूप कई स्तरों पर परिवर्तन आए हैं।

बोध प्रश्न 1
1) मिजो प्रशासनिक प्रणाली पर पांच पंक्तियों में एक नोट लिखिए।
2) पूर्वोत्तर में सैंतिया और खासी जनजातियों में सामाजिक स्तरीकरण के बारे में बताइए। अपना उत्तर पांच पंक्तियों में दीजिए।

इन सबके फलस्वरूप सामाजिक स्तरीकरण की पारंपरिक प्रणाली कमजोर हुई, नए सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक हित उभरे और उनसे जुड़ी विषमताएं भी उत्पन्न हुई जिनके साथ-साथ समाज में वर्ग स्थान का महत्व बढ़ता गया। इस प्रकार प्रदत्त स्थिति के सह-अस्तित्व में अर्जित स्थिति ने उसे मजबूत बनाने और उसे बदलने दोनों का काम किया है और वह एक महत्वपूर्ण कारक बन गया है।

 बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 1
1) मुखियों की संख्या के माध्यम से मिजो लोगों के पास एक स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था थी। मुखिया और उसका घर उनके क्रियाकलापों का केन्द्र थे। विवाह होने पर मुखिया के बेटे को कुछ घर सौंप दिए जाते थे जिससे वह अपना गांव बसाकर स्वतंत्र हो जाता था। मगर उसका दूसरा बेटा मुखिया के साथ रुक कर उसका उत्तराधिकारी बनता था। गांव का राजकाज चलाने के लिए बुजुर्गों का एक सभा मुखिया का हाथ बंटाती थी।
2) जैंतिया समाज राजा, प्रशासक (गवर्नर), ग्राम प्रधान और जनसाधारण (इसमें अधिकारी वर्ग भी शामिल था) में बंटा था। संपत्ति का स्वामित्व महिलाओं को प्राप्त तो होता था, मगर उसका नियंत्रण और संचालन पुरुषों के हाथ में था। भोगाधिकारी बनाने का अधिकार मिलने पर महिलाओं का अविवाहित रहना पड़ता था, उनका कोई भाई नहीं होना चाहिए। महिलाओं के साथ विवाह और तलाक के मामलों में भी भेदभाव बरता जाता था। वधू के मोल की प्रथा भी उनके लिए अपमानजनक थी।

बॉक्स 10.02
एक नए मध्यम वर्ग, ठेकेदारों, बिचैलियों व्यापारियों और राजनीतिज्ञों का उदय हुआ, जो स्थानीय, जनपदीय, राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर काम करते हैं। इन सबने मिलकर जनजातीय समाज को वर्ग के आधार पर बांटा। लेकिन परंपरागत रूप से जिन वर्गों को आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से प्रभावी दर्जा हासिल था उन्होंने नए परिवेश में ऊंचा दर्जा हासिल करने के लिए अपनी आरंभिक स्थिति का भरपूर लाभ उठाया। इन सब परस्पर प्रभावी क्रियाओं ने एक ऐसे समाज की रचना की है जो स्तरित और प्रदेश, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तमाम राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक रुझानों से जुड़ा हुआ है।

मगर वहीं इन सब कारकों ने ही एक विशिष्ट पहचान को बचाए रखने और उसे जोरदार ढंग से अभिव्यक्ति देने की जरूरत भी इन जनजातियों में पैदा की।