translog index total factor productivity in hindi ट्रासंलॉग सूचकांक (पूर्ण उपादान उत्पादकता (टोटल फैक्टर प्रोडक्टिविटी) की माप)

By   January 16, 2021

ट्रासंलॉग सूचकांक (पूर्ण उपादान उत्पादकता (टोटल फैक्टर प्रोडक्टिविटी) की माप) translog index total factor productivity in hindi ?

पूर्ण उपादान उत्पादकता (टोटल फैक्टर प्रोडक्टिविटी) की माप
हमने ऊपर पूर्ण उपादान उत्पादकता की अवधारणा और यह उत्पाद फलन से किस तरह से संबंधित है, विषय पर विचार किया है। अब हम पूर्ण उपादान उत्पादकता की माप की प्रणालियों का अध्ययन करते हैं। पूर्ण उपादान उत्पादकता (टी एफ पी) की माप के दो उपागम हैं: वृद्धि लेखा उपागम और अर्थमिति उपागम । आगे हम उन पर विचार करेंगे।

 वृद्धि लेखा उपागम
वृद्धि लेखा उपागम में, (पूर्ण उपादान उत्पादकता) टी एफ पी की माप के लिए टी एफ पी सूचकांकों का उपयोग किया जाता है। कुल आदान में वृद्धि की गणना के लिए भार के रूप में उत्पादन के कारकों के आय अंश का उपयोग किया जाता है। टी एफ पी सूचकांकों की निम्नलिखित मान्यताएँ हैं। (1) बड़े पैमाने की मितव्ययिता अथवा अपमितव्ययिता नहीं है, और (2) पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति है और उत्पादन के कारकों का महत्त्व उनके सीमांत उत्पाद के अनुरूप दिया जाता है।

विभिन्न उपलब्ध टी एफ पी सूचकांकों में से, सोलो सूचकांक और आजकल ट्रांसलॉग सूचकांक का उपयोग अत्यधिक प्रचलित रहा है। हम इन दोनों सूचकांकों का वर्णन इस प्रकार कर सकते हैं:

सोलो सूचकांक
यहाँ Y उत्पादन (योजित मूल्य), L श्रम आदान और ज्ञ पूँजी आदान का सूचक है। मान लीजिए  योजित मूल्य में पूँजी का आय अंश है। फिर, टी एफ पी का सोलो सूचकांक निम्नलिखित समीकरण द्वारा व्यक्त किया जाता है:
……………..(4)
उपरोक्त समीकरण में, ∆Y/Y उत्पादन की वृद्धि-दर है, ∆L/L श्रम आदान की वृद्धि-दर है और ∆ज्ञध्ज्ञ पूँजी आदान की वृद्धि-दर है। ∆A/A पूर्ण उपादान उत्पादकता की वृद्धि-दर है।

सोलो सूचकांक की सबसे बड़ी सीमा इसकी यह मान्यता है कि श्रम और पूँजी के बीच प्रतिस्थापन्न लोच एक-दूसरे के बराबर है। दूसरे शब्दों में, मान्यता यह है कि यदि मजदूरी दर में 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो नियोजन में 10 प्रतिशत की कमी आएगी। समानुपातिक प्रस्थिापन्न लोच की मान्यता का अभिप्राय यह है कि श्रम और पूँजी का आय अंश स्थिर रहता है।

ट्रासंलॉग सूचकांक
टी एफ पी का ट्रांसलॉग सूचकांक सोलो सूचकांक की अपेक्षा अच्छा है क्योंकि यह उत्पादन के कारकों के बीच प्रतिस्थापन्न लोच के संबंध में कठोर मान्यता नहीं रखता है। इसमें परिवर्ती प्रतिस्थापन्न लोच की गुंजाइश है। ट्रांसलॉग सूचकांक का दूसरा लाभ यह है कि इसमें प्रौद्योगिकीय प्रगति के हिक्स तटस्थ होने की आवश्यकता नहीं है। प्रौद्योगिकीय प्रगति को तब हिक्स तटस्थ कहा जाता है यदि इससे श्रम और पूंजी की सीमान्त उत्पादकता में समानुपातिक वृद्धि होती है। ट्रांसलॉग सूचकांक प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के तटस्थ नहीं होने पर भी अर्थात् श्रम-बचत या पूँजी-बचत करने की इसकी विशेषता होने के बावजूद भी उत्पाद फलन में परिवर्तन का अनुमान लगा लेता है। टी एफ पी वृद्धि के ट्रांसलॉग सूचकांक को निम्नलिखित समीकरण द्वारा अभिवयक्त किया जा सकता

……………(5)
उपर्युक्त समीकरण में Y उत्पादन, L श्रम और ज्ञ पूँजी है। SL श्रम का आय अंश है तथा SK पूँजी का आय अंश है। ∆ln TFP प्रौद्योगिकीय परिवर्तन की दर अथवा पूर्ण उपादान उत्पादकता की वृद्धि-दर है।

इसे और स्पष्ट करने के लिए, प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के ट्रांसलॉग सूचकांक की गणना के निम्नलिखित चरण है:
ऽ पिछले वर्ष की तुलना में चालू वर्ष का उत्पादन अनुपात लीजिए, अर्थात् ल्;जद्धध्ल्;ज.सद्ध
ऽ इस अनुपात का लॉगरिथ्म (मूल) लीजिए अर्थात् In [Y] ;t)/Y;t -1), A यह उत्पादन में वृद्धि
को दर्शाता है।
ऽ इसी तरह से क्रमशः In [l~ ;t)/L;t-1)] vkSj In [K ;t)/K;t-1), की गणना करें। यह श्रम और पूँजी आदान में वृद्धि-दर हैं।
ऽ चालू वर्ष और पिछले वर्ष में श्रम का अंश लीजिए और औसत निकालिए, अर्थात् [Sl~ ;t)़SL;t-1)]/2
ऽ इसी रीति से, पूँजी के औसत अंश की गणना करें, अर्थात् [SK ;t)़SK;t-1)]/2
ऽ टी एफ पी में परिवर्तन की दर निकालने के लिए उपर्युक्त समीकरण 5 का उपयोग करें।

 अर्थमिति उपागम
अर्थमिति उपागम में, हम अवरोही विश्लेषण करके उत्पाद फलन का अनुमान लगाते हैं तथा अनुमानित उत्पाद फलन से प्रौद्योगिकीय प्रगति की दर निकालते हैं।

उत्पादकता अध्ययनों में सामान्यतया कॉब-डगलस उत्पाद फलन का उपयोग किया गया है। लॉगरिथ्म में, कॉब-डगलस उत्पाद फलन को इस प्रकार लिखा जा सकता है:
In y~ = InA ़ α In l~ ़ β In K़λ  …………(6)
जिसमें ल् उत्पादन, स् श्रम, ज्ञ पूँजी और । समय (वर्ष) है। इस समीकरण में,। कार्यक्षमता पैमाना है, 
और  श्रम और पूँजी (उत्पादन लोचों) का गुणांक और  प्रौद्योगिकीय प्रगति की दर है।

कॉब-डगलस उत्पाद फलन की सहायता से ही टी एफ पी वृद्धि का अनुमान लगाने के निम्नलिखित चरण हैंः
ऽ उत्पादन (ल्), श्रम (स्) और पूँजी (ज्ञ) संबंधी समय श्रृंखला (टाइम सीरीज) आँकड़ा लें।
ऽ समय प्रवृत्ति (टाइम ट्रेंड) चर लें (पहले वर्ष के लिए एक, दूसरे वर्ष के लिए दो और इसी तरह से आगे)
ऽ प्द (ल्) प्राप्त करने के लिए उत्पादन शृंखला का लॉगरिथ्म लें।
ऽ इसी प्रकार In (L) और In (K) निकालिए।
ऽ तीन स्पष्टीकरण योग्य चरों In (L), In (K) और 1 पर In (Y) अवरोह करें।
ऽ समय प्रवृत्ति (टाइम ट्रेंड) चर का गुणांक प्रौद्योगिकीय प्रगति की दर है।

पूर्ण उपादान उत्पादकता (टी एफ पी) माप की सीमाएँ

हमने ऊपर देखा कि टी एफ पी माप की वृद्धि लेखा उपागम कतिपय अत्यधिक प्रतिबंधात्मक मान्यताओं पर आधारित हैं जैसे कि समानुपातिक लाभ, पूर्ण प्रतियोगिता, और उत्पादन के कारकों को उनके सीमान्त उत्पाद के अनुरूप चुकाना। ये मान्यताएँ विशेष रूप से विकासशील देशों में यथार्थवादी नहीं है। विकासशील देशों में बाजार अपूर्ण होते हैं और उत्पादन के कारकों द्वारा प्राप्त आयों को उनके सीमान्त उत्पाद के बराबर होने की संभावना नहीं रहती है। चूंकि ये मान्यताएँ यथार्थवादी नहीं हैं; वृद्धि लेखा उपागम द्वारा निकाले गये टी एफ पी वृद्धि-दर के अनुमानों में त्रुटि हो सकती है।

अर्थमिति उपागम (उत्पाद फलन के अनुमान पर आधारित) में इन प्रतिबन्धात्मक मान्यताओं की आवश्यकता नहीं है। इसलिए, इस अर्थ में अर्थमिति उपागम बेहतर है। तथापि, इस उपागम की भी कुछ सीमाएँ हैं। एक, इसमें यह मानना होगा कि प्रौद्योगिकी प्रगति सभी वर्षों में एक समान हैं। दो, प्रौद्योगिकी परिवर्तन की दर का अनुमान बहुधा बहु-समरेखा की समस्या से गंभीर तौर पर ग्रस्त रहता है। बहु समरेखा अवरोह विश्लेषण में अनुमान लगाने की समस्या है जिसका कारण विवरणात्मक चरों के बीच अत्यधिक अन्तरसंबंध है। उत्पाद फलन के अनुमान में यह समस्या आती है क्योंकि सामान्यतया पूँजी संबंधी (श्रम भी) समय श्रृंखला (टाइम सीरीज) और समय प्रवृत्ति चरों के बीच अत्यधिक अन्तर्संबंध होता है।

इन दोनों उपागमों की एक उभयनिष्ठ सीमा अथवा मान्यता यह है कि प्रौद्योगिकीय परिवर्तन को अलग किया जा सकता है। यह मान लिया जाता है कि तकनीकी ज्ञान में वृद्धि होने से नई और पुरानी दोनों प्रकार की मशीनों को बराबर-बराबर फायदा होता है। यह मान्यता यथार्थवादी नहीं है। अधिकांश मामलों में, यदि प्रौद्योगिकी में प्रगति होती है तो फर्मों को नई मशीनें खरीदनी पड़ेगी और नई प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने के लिए पुरानी मशीनों को बदलना पड़ेगा।

बोध प्रश्न 3
1) टी एफ पी माप के वृद्धि लेखा उपागम की बुनियादी महत्त्वपूर्ण मान्यताएँ कौन-सी हैं।
2) टी एफ पी माप की अर्थमिति उपागम की दो सीमाएँ बताइए।
3) सही के लिए (हाँ) गलत के लिए (नहीं) लिखिए:
प) सोलो सूचकांक की मान्यता है कि प्रतिस्थापन्न लोच शून्य के बराबर होना चाहिए।
पप) ट्रांसलॉग सूचकांक प्रतिस्थापन्न लोच के संबंध में कठोर मान्यताएँ नहीं रखता है।
पपप) ट्रांसलॉग सूचकांक की मान्यता है कि प्रौद्योगिकीय परिवर्तन हिक्स-तटस्थ होना चाहिए।
पअ) टी एफ पी माप की वृद्धि लेखा और उत्पाद फलन दोनों उपागम की
यह मान्यता है कि प्रौद्योगिकीय प्रगति को अलग किया जा सकता है।

 तकनीकी दक्षता-अवधारणा और पूर्ण उपादान उत्पादकता के साथ संबंध

हम उत्पाद फलन की परिभाषा, आदानों के दिए गए समूह से उत्पादित किए जा सकने योग्य निर्गत की अधिकतम मात्रा दर्शाने वाले समीकरण या ग्राफ के रूप में कर सकते हैं। वास्तव में, ऐसी संभावना बहुत कम है कि फर्म उपयोग की गई आदानों से की जा सकने वाली उत्पादन की अधिकतम मात्रा के बराबर उत्पादन अपने यहाँ कर सकें। वास्तविक निर्गत सामान्यतया प्रबन्धकीय लापरवाहियों, कर्मचारियों में प्रतिबद्धता की कमी, विद्युत आपूर्ति में बाधाओं और अन्य आवश्यक आदानों की कमी इत्यादि के कारण संभाव्य उत्पादन से कम रह जाता है। इस प्रकार, कुछ ही फर्म पूरा-पूरा उत्पादन कर रहे होंगे जबकि अधिकांश संभाव्य निर्गत क्षमता से कम पर कार्य कर रहे होंगे।

एक फर्म की तकनीकी दक्षता की परिभाषा संभाव्य निर्गत की तुलना में वास्तविक निर्गत के अनुपात के रूप में किया जा सकता है। संभाव्य निर्गत प्रदत्त उत्पादन प्रौद्योगिकी की सहायता से फर्म द्वारा उपयोग की गई आदानों से उत्पादित हो सकने योग्य अधिकतम निर्गत है। यदि अनुपात एक एक के बराबर है तो फर्म की तकनीकी दक्षता शत-प्रतिशत है। यदि अनुपात एक से कम है तो तकनीकी दक्षता में कुछ कमी है। अनुपात जितना कम होगा, तकनीकी दक्षता की कमी भी उतनी ही ज्यादा होगी।

हमने ऊपर देखा कि पूर्ण उपादान उत्पादकता वृद्धि तकनीकी ज्ञान में प्रगति और कार्यकुशलता में सुधार जिसके साथ ज्ञात प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाता है के सम्मिलित प्रभाव की माप करता है। दूसरा घटक तकनीकी कार्यकुशलता है। मशीनों की बेहतर देखभाल, प्रशिक्षण, अनुभव, उत्पादन के बेहतर संगठन, अच्छे श्रमिक-प्रबन्धन संबंधों, इत्यादि के कारण तकनीकी कार्यकुशलता में सुधार हो सकता है। इस प्रकार, पूर्ण उपादान उत्पादकता वृद्धि, प्रौद्योगिकीय प्रगति और तकनीकी कार्यकुशलता के बीच संबंध को निम्नवत् लिखा जा सकता है:
पूर्ण उपादान उत्पादकता = प्रोद्योगिकीय प्रगति  तकनीकी
कार्यकुशलता में वृद्धि (उत्पाद फलन में परिवर्तन)

हाल के कुछ अध्ययनों में, उत्पाद फलन में बदलाव और तकनीकी कार्यकुशलता में परिवर्तन के अलग-अलग अनुमान के लिए पद्धतियाँ विकसित की गई हैं। पूर्ण उपादान उत्पादकता वृद्धि की दर निकालने के लिए इन दोनों को जोड़ दिया जाता है।

 योजित मूल्य फलन बनाम सकल निर्गत फलन
उपर्युक्त चर्चा में, हमने दो-आदान ढाँचों पर विचार किया है। इन ढाँचों में, योजित मूल्य को फर्म के निर्गत के रूप में लिया गया है और श्रम तथा पूँजी को दो आदानों के रूप में लिया गया है। इस ढाँचे के लिए उत्पाद फलन को योजित मूल्य फलन कहा जाता है।

उत्पादकता के विश्लेषण के लिए योजित मूल्य फलन का प्रयोग काफी प्रचलित रहा है। भारतीय उद्योगों के लिए किए गए अधिकांश अध्ययन में योजित मूल्य फलन का प्रयोग किया गया है।

इस तथ्य को अधिक से अधिक स्वीकार किया जाने लगा है कि उद्योग स्तर पर उत्पादकता विश्लेषण करने के लिए योजित मूल्य फलन का प्रयोग उपयुक्त नहीं है। इसके बदले में, सकल निर्गत फलन का उपयोग करना चाहिए। सकल निर्गत फलन में उत्पादन के सकल मूल्य को निर्गत के रूप में लिया जाता है और श्रम, पूँजी तथा अर्द्धनिर्मित आदानों (सामग्रियों, ऊर्जा) को आदान के रूप में लिया जाता है।

सकल निर्गत फलन के निम्नलिखित लाभ हैं:
प) यह श्रम और पूँजी के साथ सामग्रियों को भी समरूप महत्त्व देता है। यहाँ यह तर्क देना उपयुक्त होगा कि फर्म श्रम और पूँजी के साथ संयुक्त रूप से सामग्री आदान का चयन करते हैं तथा इन तीनों आदानों में प्रतिस्थापन्न संभावनाओं का भी ध्यान रखा जाता है। इस प्रकार, समरूप महत्त्व अधिक युक्तिसंगत है।
पप) योजित मूल्य फलन में सामग्रियों, श्रम और पूंजी के बीच प्रतिस्थापन्न संभावनाओं के बारे में अत्यधिक प्रतिबन्धात्मक मान्यताएँ अन्तर्निहित हैं। यदि सकल निर्गत फलन का प्रयोग किया जाता है तो इन मान्यताओं की आवश्यकता नहीं है।

भारत में औद्योगिक उत्पादकता संबंधी नवीनतम अध्ययनों में योजित-मूल्य फलन की जगह सकल निर्गत फलन का प्रयोग किया है। ऊपर उप-भाग 19.4.1 में दिखाए गए ट्रांसलॉग सूचकांक का दो
सम्मिलित करने के लिए विस्तार कर दिया गया है।

बोध प्रश्न 4
1) रिक्त स्थानों की पूर्ति करें:
एक फर्म की तकनीकी दक्षता की परिभाषा………………..निर्गत की तुलना में वास्तविक निर्गत के अनुपात के रूप में की जा सकती है जिसमें संभाव्य निर्गत प्रदत्त उत्पादन प्रौद्योगिकी की सहायता से फर्म द्वारा उपयोग की गई आदानों से उत्पादित हो सकने……………..निर्गत है। तकनीकी अक्षमता का अभिप्राय है कि फर्म संभाव्य उत्पादन क्षमता से…………..कार्य कर रहा है।
2) पूर्ण उपादान उत्पादकता, प्रौद्योगिकीय प्रगति और तकनीकी दक्षता के बीच संबंध एक वाक्य में बताएँ।
3) उत्पादकता विश्लेषण के लिए योजित मूल्य फलन की तुलना में सकल निर्गत फलन को अधिक प्राथमिकता दी जाती है, क्यों?

शब्दावली
योजित मूल्य ः उत्पादन मूल्य जिसमें से उत्पादन में प्रयुक्त अर्धनिर्मित आदानों (सामग्रियों, ईंधन, विद्युत इत्यादि) का मूल्य घटा दिया जाता है।

योजित मूल्य फलन ः उत्पाद फलन जिसमें योजित मूल्य को निर्गत और श्रम तथा पूँजी को उत्पादन में प्रयुक्त दो आदान माना जाता है।
सकल निर्गत फलन ः उत्पाद फलन जिसमें उत्पादन के सकल मूल्य को निर्गत और श्रम, पूँजी तथा सामग्रियों (ऊर्जा सहित) को आदान के रूप में लिया जाता है।
प्रतिस्थापन्न लोच ः यह आदानों में प्रतिस्थापन्न की संभावना की सीमा प्रदर्शित करता है। इसकी परिभाषा मजदूरी-किराया अनुपात में एक प्रतिशत वृद्धि के लिए पूँजी-श्रम अनुपात में प्रतिशत वृद्धि के रूप में किया गया है।
अवरोह विश्लेषण ः चरों के बीच रैखिक सम्बन्धों का अनुमान लगाने के लिए सांख्यिकीय पद्धति।
सीमान्त उत्पाद ः एक आदान (अन्य आदानों के समान रहने पर भी) की उपयोग की गई मात्रा में प्रति इकाई परिवर्तन से पूर्ण उत्पादन में परिवर्तन।
उत्पादन लोच ः एक आदान (अन्य आदानों के समान रहने पर भी) में एक प्रतिशत वृद्धि से उत्पादन में होने वाली वृद्धि का प्रतिशत।
पूर्ण उपादान उत्पादकता ः कुल आदान की तुलना में निर्गत का अनुपात ।

 बोध प्रश्नों के उत्तर अथवा संकेत

बोध प्रश्न 3
1) उपभाग 19.4.1 देखें।
2) उपभाग 19.4.3 देखें।
3) (प) गलत; (पप) सही; (पपप) गलत; (पअ) सही

बोध प्रश्न 4
1) क्रमशः संभावित, अधिकतम; से नीचे
2) भाग 19.5 देखें।
3) सामग्रियों, श्रम और पूँजी को समरूप महत्त्व; सामग्रियों, श्रम और पूँजी के बीच प्रतिस्थापन्न संभावनाओं के संबंध में प्रतिबन्धात्मक मान्यताएँ स्थापित करने की कोई आवश्यकता नहीं।