HSAB का सैद्धान्तिक आधार , सिद्धांत , अनुप्रयोग , सीमाएं The theoretical basis of HSAB

(The theoretical basis of HSAB) HSAB का सैद्धान्तिक आधार : कठोर एवं मृदु अम्ल तथा क्षार अवधारणा को सैद्धान्तिक आधार देने के लिए अनेक स्पष्टीकरण दिए गये जो निम्न है –

1. आयनिक एवं सह्संयोजी बंध सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार कठोर कठोर परस्पर क्रिया द्वारा आयनिक बंध बनता है।
इस अवधारणा के अनुसार छोटे आकार और अधिक आवेशित धनात्मक धातु आयन कठोर क्षारों के साथ आयनिक बंध बनाते है।
इसके अनुसार मृदु मृदु की पारस्परिक क्रिया द्वारा सहसंयोजक बंध बनता है।
कठोर एवं मृदु स्पीशीज की अन्त: क्रिया से बना संकुल अस्थायी होता है।

2. π-बंधन सिद्धान्त (π bonding theory)

इस सिद्धांत के अनुसार मृदु मृदु की पारस्परिक क्रिया सेπ बंध बनते है , इस सिद्धांत से स्पष्ट होता है की मृदु अम्ल की निम्न ऑक्सीकरण अवस्था होती है अर्थात इनमे अधिक संख्या में d electron होते है।

3. पीटजर का सिद्धान्त

इस सिद्धांत के अनुसार मृदु मृदु पारस्परिक क्रिया करने वाले समूहों की प्रकृति इन समूहों के ध्रुवण शीलता के गुणनफल पर निर्भर करती है।
मृदु अम्ल और मृदु क्षार के ध्रुवणीयता के मान अत्यधिक होते है।

4. विद्युत ऋणता , कठोरता एवं मृदुता

इस सिद्धांत के अनुसार सामान्यत अधिक विद्युत ऋणता वाले स्पीशीज कठोर होते है एवं निम्न विद्युत ऋणता वाले स्पीशीज मृदु होते है जैसे –
CF3 प्रयाप्त कठोर है , CH3 प्रयाप्त मृदु होता है।
CF3 में कठोर केंद्र f की उपस्थिति के कारण यह अधिक कठोर होता है एवं मृदु केंद्र (CH3) में H की उपस्थिति के कारण यह अत्यधिक मृदु होता है।

HSAB अवधारणा के अनुप्रयोग

1. संकुलो का स्थायित्व
2. HSAB अवधारणा के अनुसार एल्किल हैलाइडो के हैलोजन विनिमय अभिक्रिया का स्पष्टीकरण दिया जा सकता है।

HSAB अवधारणा की सीमाएं

1. यह सिद्धांत अम्ल एवं क्षार के सामर्थ्य का मात्रात्मक स्केल नहीं देता।
2. इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी प्रक्रम को समझाने के लिए यौगिको को अम्ल एवं क्षार इकाइयों में बांटना आवश्यक होता है और यह तभी संभव है जब R-x ज्ञात हो।

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