थाईलैंड का इतिहास | thailand country information in hindi |  थाई विदेश नीति थाईलैण्ड का कानून

By   September 18, 2020

थाईलैण्ड देश का कानून क्या है ? थाईलैंड का इतिहास | thailand country information in hindi |  थाई विदेश नीति के बारे में जानकारी दीजिये ?

थाईलैण्ड
संरचना
उद्देश्य
प्रस्तावना
थाईलैण्ड: भूगोल और लोग
थाईलैण्ड औपनिवेश शासन से कैसे बचा
राजतंत्र
संवैधानिक राजतंत्र
सैन्य नेतृत्व
जनतांत्रिक प्रयोग
धर्म और राजनीति
आर्थिक नीति
थाई विदेश नीति
सारांश
प्रमुख शब्द
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
थाईलैण्ड में जनतांत्रिक प्रक्रिया की स्थापना एक गंभीर समस्या रही है। यद्यपि जनता ने जनतांत्रिक व्यवस्था में अपना विश्वास व्यक्त किया है। इस इकाई के अध्ययन से आप यह समझने में समर्थ होंगे –
ऽ थाई जनतंत्र के इतिहास की खोज और उसके विभिन्न राजनैतिक विकास,
ऽ इसके सैन्य नेतृत्व की विवेचना,
ऽ इसके विभिन्न राजनैतिक प्रयोगों की समझ,
ऽ थाईलैण्ड के आर्थिक विकास की समझ, तथा
ऽ इसकी विदेश नीति का मूल्यांकन ।

थाईलैण्ड औपनिवेशिक शासन से कैसे बचा
थाईलैण्ड दक्षिण पूर्व एशिया में एक मात्र देश है जो औपनिवेशिक शासन से बचा है। थाईलैण्ड का प्रबुद्ध राजतंत्र देश की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए पूर्णतया जिम्मेदार है। राजा मोंगकुट (1851-68) तथा चुलालों गकोर्न (1868-1910) के राजनयिक व्यवहार और विदेशी संबंध अति यथार्थवादी थे। इस क्षेत्र की सुरक्षा वातावरण के बारे में थाई राजाओं की समझ बहुत ही स्पष्ट थी तथा वे थाईलैण्ड में फ्रांसीसी व अंग्रेजी औपनिवेशिक महत्वाकांक्षाओं को आपस में भिड़ाने में समर्थ थे। वे शालीन थे व समाधान के लिए आवश्यक अंग्रेजी भाषा पर अच्छा अधिकार रखते थे। पश्चिमी दूतों से उनका व्यवहार नम्रतापूर्ण होता था और वे उनको काफी इज्जत भी देते थे और यथासंभव उनकी मांगों के सुविधाजनक ढंग से समन्वयन का प्रयास भी करते थे। ब्रितानी दूत सर जान बावरिंग थाई राजा मोंगकुट के व्यवहार तथा सत्कार से बहुत ही खुश थे। उन्होंने तो 1855 के अभियान के वर्णन में द किंगडम एण्ड पीपुल आफ सिआम पर तो एक प्रसिद्ध स्मृति ही लिख डाली। वह ब्रिटेन में थाईलैण्ड के हितों के महान वकील थे।

थाईलैण्ड ने विदेश नीति संचालन का एक प्रभावशाली तरीका अपनाया । इसने पश्चिमी शक्तियों के लिए सुविधाजनक नीतियों को बनाने के लिए पश्चिमी सलाहकारों को नियुक्त किया। इस प्रकार ब्रिटेन से संबंधित नीति के लिए एक ब्रितानी सलाहकार, फ्रांस के लिए फ्रांसीसी सलाहकार तथा हालैंड से वार्तालाप के लिए डच था। थाई राजा चुलालोंगकोर्न ने चतुराई से कुछ पश्चिमी राजाओं के साथ आत्मीय संबंध बनाए ताकि वे पश्चिमी शक्तियों की राजनीति व समाज को भलीभांति समझ सकें तथा उनके साथ सहयोग के क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान कर सकें। उन्होंने अपने कुछ पुत्रों को उस समय के कुछ प्रसिद्ध यूरोप के राजाओं के संरक्षण में शिक्षा के लिए भेजा। इसने भी, राजा की एक स्वदेशी टीम, जो कि राजनयिक संबंधों को कुशलता व शालीनता से बना सकें, बनाने में सहायता की । वास्तव में राजा चुलालोंगकोर्न ने पूरा प्रयास किया कि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मान्यता या पहचान मिल सके।

थाई विदेशनीति के उचित आचरण से, फ्रांस व ब्रिटेन के बीच में एक ऐसी समझ विकसित हुई जिसके परिणामस्वरूप ब्रितानी बर्मा और फ्रांसीसी इंडो-चीन के बीच थाईलैण्ड एक तटस्थ राज्य के रूप में रखा गया । ऐतिहासिक तथ्य इस बात की सत्यता को प्रमाणित करते हैं कि 1979 में लन्दन में फ्रांसीसी राजदूत एम. वाडिंगटन ने तत्कालीन ब्रितानी प्रधानमंत्री से इस सुझाव के साथ मुलाकात की कि यह दोनों साम्राज्यों के लिए लाभदायक होगा कि थाईलैण्ड को मध्यवर्ती राज्य के रूप में सम्मानित किया जाए। इसके लिए ब्रितानी प्रधानमंत्री का दृष्टिकोण सकारात्मक था। जिसके परिणामस्वरूप दोनों ने अपनी रणनीति थाईलैण्ड को एक तटस्थ राज्य मानकर बनानी शुरू की।

इससे इस बात का आशय कदापि नहीं निकालना चाहिए कि दोनों देशों ने थाईलैण्ड की संप्रभुता के लिए कोई कठिनाई नहीं पैदा की। 1893 में फ्रांस ने जबर्दस्ती मेनाम चाओ फाया आकर लाओस के ऊपर अपना दावा प्रस्तुत किया। फ्रांस थाईलैण्ड और गणराज्य इण्डोचाइना के बीच एक प्राकृतिक सीमा रेखा चाहता था। इसके लिए उसने मेकांग नदी के बायें के क्षेत्र पर अपना दावा प्रस्तुत किया। थाई शासकों ने कुछ आरक्षण के साथ फ्रांसीसी दबाव मान लिया तथा उस क्षेत्र को उनके लिए खाली कर दिया जिसे आज हम लाओस के नाम से जानते हैं। तत्पश्चात् फ्रांस ने थाई-कम्बोडिया सीमा पर भी प्राकृतिक सीमा की बात की । इसके लिए उसने कार्डामोन पहाड़ी श्रृंखला का चयन किया। इस प्रकार फ्रांस थाईलैण्ड पर क्रमशः दबाव डालता रहा कि वह उसके दावे को बट्टाभबंग, सीमरिप और सिसोफेन क्षेत्र में मान ले। थाईलैण्ड फ्रांस से अपनी युद्ध नीति की कमजोरियों को जानता था इसलिए बिना किसी विवाद के उसने 1907 में इन क्षेत्रों को फ्रांस को दे दिया। इस तरह के घटनाक्रम से ब्रितानी दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आया । उसने भी अपना उपनिवेश क्षेत्र मलाया की सीमा तक बढ़ाने की इच्छा दिखायी। 1909 में ब्रितानियों ने भी अपना दावा केदाह, पेर्लिस, केलांटन और लेंगानू पेश किया जिसको थाईलैण्ड ने मान भी लिया । पश्चिमी शक्तियों के उत्तेजनात्मक रुख के बाद भी थाईलैण्ड अपना संतुलन बनाए रखा।

राजतंत्र
जब थाइयों ने खमेर गवर्नर को सुखोथाई में पराजित किया और राजा इन्द्रदित्य (1253 ई.) के नेतृत्व में उन्होंने थाई, साम्राज्य की नींव डाली। इन्द्रदित्य का उत्तराधिकारी रामखम्भेग महान (1270-1327) एक महान योद्धा और शासक था। उसने विभिन्न छोटी-छोटी रियासतों के एकत्र करने के लिए कई लडाइयां लडी। उसका अधिकार क्षेत्र विस्तत हआ उत्तरी मेंकंग नदी दक्षिणी मेलायन पनेंसुला तक। पश्चिम में बर्मा से पूर्व में कम्बोडिया तक । उसने चीन में हान सम्राट के साथ कर देने वाले संबंध स्थापित किये और उससे समर्थन प्राप्त किया। ऐसा खामेट और अनिर्मित शासकों को इस क्षेत्र में नीचा दिखाने के लिए किया। थाईलैण्ड रामखम्भेग के कुशल नेतृत्व में दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में सबसे सशक्त साम्राज्य के रूप में उभरा। इसके उत्तराधिकारी भी शक्तिशाली थे जिन्होंने विभिन्न लड़ाइयां वर्गीस, खमेर, वियतनामी शासकों से लड़ी।

19वीं शताब्दी में दक्षिण, पूर्वी एशिया क्षेत्र की सुरक्षा और जैविक, राजनीतिक वातावरण असंतुलित हआ। उस समय यूरोपीय देशों में साम्राज्य विस्तार की होड़ लगी थी और विभिन्न पूर्वी एशियाई राज्य इन उपनिवेशवादी शासकों के आगे झकने लगे थे। फ्रांसीसी साम्राज्य इण्डोचाइना में घुसपैठ कर चुका था। ग्रेट ब्रिटेन बर्मा में अपना आधिपत्य बनाकर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर रहा था। ये उपनिवेशवादी ताकतें अपना ध्यान थाईलैण्ड पर लगाये थीं। इस दशा में थाई शासकों ने एक अत्यधिक समझदारी दर्शायी और ऐसे अवसरों की तलाश करते रहे जिससे कि उपनिवेशवादी ताकतों से दूर रह सकें।

थाईलैण्ड के राजा ने पश्चिमी शक्तियों को अपने विरुद्ध गनवोट कूटनीति से रोकने में एक महत्वपूर्ण नेतृत्व प्रदान किया। राजा माउंगकुट ने सुधार गृह नीतियां प्रस्तावित की । पश्चिमी दुनिया के लिए एक उदारवादी दृष्टिकोण अपनाया, उन्होंने चीन को उपहार देना बंद किया और ग्रेट ब्रिटेन को 1851 के बाद के कई वर्षों तक विशेष महत्व देना शुरू किया। 1855 में उन्होंने एक मैत्री संधि और व्यापार संधि पर हस्ताक्षर किया और कुछ व्यापारिक लाभ भी ग्रेट ब्रिटेन को सौंपा।

उन्होंने थाईलैण्ड में निवासी ब्रितानी लोगों को कुछ अतिरिक्त सीमावर्ती अधिकार उपहारस्वरूप दिया। ऐसी नीति ब्रितानियों को पसंद आयी क्योंकि उनकी प्रमुख रुचि व्यापार में ही थी। इस प्रकार से ब्रिटेन ने थाईलैण्ड के साथ मैत्री बनायी और कभी भी इसकी संप्रभुता को चुनौती नहीं दी। यद्यपि ब्रिटेन इस स्थिति में था कि वह थाईलैण्ड के लिए मुसीबतें पैदा कर सकता था। प्रथम यह कि उसका मलाया, बर्मा और भारतीय प्रायद्वीपों पर नियंत्रण था और द्वितीय इस क्षेत्र में इसकी जैविक राजनैतिक बाध्यता थी फ्रांसीसी विस्तार रोकने की। यद्यपि इसने अपने को ऐसा करने से दूर रखा। ब्रिटेन और थाईलैण्ड की मित्रता का अभ्युदय एक तरफ था। दूसरी तरफ फ्रांस का इण्डोचाइना राज्यों का नियंत्रण था। मंगकुट का उत्तराधिकारी दुलालांग कोर्न महान था। जो कि अपनी प्रजा में बहुत ही प्रिय था। अपने पूर्वजों की तुलना में वह बहुत ही उदार और चतुर था । उसने यूरोपीय राजाओं के साथ (प्रायद्वीपों के) व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने के अवसरों की तलाश इस दृष्टिकोण से की कि थाईलैण्ड का राष्ट्रीय हित बढ़ सके। छुलालांगकोर्न के उत्तराधिकारी घरेलू परिस्थितियों से निपटने में उतने सक्षम और दृढ़ नहीं थे। राजा बजीरालोंगकोर्न (1910-1925) राजा प्रजाधिपोक (1925-1935) ग्रेट ब्रिटेन में शिक्षित और दक्ष हुए थे। जिसके कारण सकदीना वर्ग का एक अभिजात्य वर्ग नाराज था। राजा प्रजाधिपोक के चरित्र के प्रति भी गलतफहमियां थी । ऐसी स्थिति में सेना और नागरिकों के एक समूह ने शीघ्रता से एक सैन्य विद्रोह किया जिसका नेतृत्व प्रीदीफनोमियोग और सेनाध्यक्ष फिबून सोनग्रोम ने किया और कहा गया कि पीपुल्स पार्टी ने संपूर्ण राजतंत्र को उखाड़ फेंका। सैन्य विद्रोह के संचालकों ने 24 जून, 1932 को राजधानी को चारों ओर से घेर लिया और राजा प्रजाधिपोक को चेतावनी दी। सैन्य विद्रोह का नेतृत्व करने वालों ने यह मांग की कि राजा या तो संवैधानिक प्रमुख की स्थिति स्वीकार करे, त्यागपत्र दे या खूनखराबा देखे। इस प्रकार राजा को संगीन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उसने खूनखराबा टालना चाहा और संवैधानिक राजतंत्र पर सहमति व्यक्त की।

संवैधानिक राजतंत्र
थाईलैण्ड में 1932 से संवैधानिक राजतंत्र है। थाई नेताओं का प्रयास था कि वे बितानी पद्धति पर अपना राजनैतिक ढांचा तैयार करें। लेकिन थाई राजनीति ब्रितानी पद्धति से एकदम भिन्न है । यद्यपि संवैधानिक राजतंत्र की व्यवस्था उसी प्रकार से है किन्तु थाईलैण्ड में संसद की संप्रभुता नहीं है।

कई संविधानों का 1932 के बाद से निर्माण किया गया इस मंशा से कि यह बदलते हुए राजनैतिक आवश्यकता की पूर्ति कर सके। किंतु क्रमशः एक के बाद दूसरे को निरस्त किया जाता रहा। किंतु एक बात सबसे सामान्य है कि संविधानों में राजतंत्र को एक आदरणीय संस्था माना है। राजा राज्य का एक औपचारिक प्रमुख है और सेनापति सैन्य बलों का। तकनीकी रूप से संप्रभुता जनता में निहित है। राजा अपनी शक्तियों का प्रयोग संविधान के नियमों के अनुरूप ही कर सकता है । राजा आदरणीय है और उसका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता उन्हें दोषी या सजा नहीं दी जा सकती है। राजा देश का नेतृत्व औपचारिक अवसर पर ही करता है। वह थाई राष्ट्रवाद का प्रतीक है और थाई जनता अब भी उसकी भक्त है।

वर्तमान राजा भूमिबोल आदुल देन बहुत ही प्रभावी है । उन्होंने दलों के नेताओं की सहायता, उचित सलाह देकर संकट और तनाव दूर करके की है। राजा ने 1973 के अक्टूबर में छात्र क्रांति के समय फील्ड मार्शल थानोंम किट्टी कार्बोन को त्यागपत्र का सुझाव दिया जिससे तनाव दूर हुआ और जनतांत्रिक प्रयोगों का द्वार खुला । राजा ने एक बार पुनः 1992 में अपने महान राजनयिक क्षमता का परिचय दिया जब उन्होंने सेनानायक सुचिन्द्रा क्राप्रेचुन को यह सलाह दी कि वे सत्ता को अपने उत्तराधिकारी को सौंप दें। क्योंकि उनके नेतृत्व में जन आंदोलन उभर रहा था।

बोध प्रश्न 1
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए रिक्त स्थान का प्रयोग करें। .
ख) अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से करें।
1. थाई स्वतंत्रता को कायम रखने वाली शासक वर्ग की विशिष्ट राजनयिक चालों की विस्तार से व्याख्या करें।
2. थाईलैण्ड में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना की जिम्मेदार राजनीतिक परिस्थितियों का स्पष्ट उल्लेख करें।

बोध प्रश्न 1 उत्तर
1. क) पश्चिमी शक्तियों के समक्ष सुविधाजनक नीतियों के लिए पश्चिमी सलाहकारों की नियुक्तियां ।
ख) पश्चिमी समाज और राजनीति को समझने के लिए राजा ने सद्भावना पूर्ण इच्छा से पश्चिमी राजाओं से व्यक्तिगत संबंध स्थापित किया।
ग) थाईलैण्ड, बर्मा में अंग्रेजी तथा इण्डोचाइना में फ्रांसीसी शक्तियों के बीच एक प्रतिरोधन बन गया।
ग) थाईलैण्ड ने पश्चिमी शक्तियों की मांग को पूरा करके टकराव की स्थिति को बचाया।

2. क) 20वीं शताब्दी के उत्तराधिकार पाने वाले राजाओं ने जिनको कि पश्चिमी शिक्षा मिली थी उदारवादी विचारों के संस्थापक थे।
ख) 1932 का सैन्य व नागरिक विप्लव ।
3. क) संसद सर्वोच्च नहीं है।
ख) राजतंत्र की हमेशा पदावनति की गयी।
ग) सामान्यतया राजा संविधान का उल्लंघन नहीं करता है।
घ) राजा थाई राष्ट्रवाद का प्रतीक है।
ड़) राजा राजनीतिकों के लिए मित्र, दार्शनिक व पथप्रदर्शक की भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वाह करता है।

सैन्य नेतृत्व
सैन्य नेतृत्व की थाईलैण्ड की परंपरा रही है और थाई राजनीति में संप्रभु राजतंत्र की समाप्ति के बाद सेना ने अपना वर्चस्व स्थापित किया है। 1932 के सैन्य विद्रोह के बाद इसने बहुत से महत्वपूर्ण सरकारी संस्थाओं पर अपने प्रभाव का विस्तार किया है। अपनी उपस्थिति बनाए रखने में न्यायोचित ढंग से बल दिया है। नागरिक नेता प्रीदीफानोमियांग को एक कम्युनिस्ट के रूप में प्रस्तुत किया जिनको कुछ जनसमर्थन प्राप्त था । यद्यपि प्रीदी देश के प्रधानमंत्री हुए किंतु नागरिक प्रशासन की आधारशिला रखने में असफल रहे। जब उन्होंने एक आदर्शवादी प्रस्ताव देश की सामाजिक, आर्थिक संरचना में क्रांतिकारी परिवर्तन का सुझाव रखा । तो इसे बहुत से राजनैतिक प्रबुद्धों ने नापसंद किया और विरोध भी किया । उनका प्रस्ताव था संपूर्ण कृषियोग्य भूमि के राष्ट्रीयकरण का जिससे कि उत्पादन का बेहतर वितरण हो सके। जबकि राष्ट्रीयकरण के समय तुरंत क्षतिपूर्ति का कोई प्रस्ताव नहीं रखा। भूमि अधिग्रहण बांड के जरिए होना था न कि नकद के जरिए । उन्होंने एक जन वितरण प्रणाली की वकालत की, जो कि चावल और अन्य वस्तुओं के लिए थी इसका उद्देश्य व्यापार में दलाली को रोकने का था जिसके कारण दोस्तों की तुलना में शत्रु अधिक बने । उनको उस समय व्याप्त राजनैतिक व्यवस्था के शत्रु के रूप में प्रस्तुत किया गया । वास्तव में उनके राजनैतिक जीवन का पतन 1946 में हुआ, जब राजा आनन्द महिडोल की संदेहास्पद परिस्थितियों में हत्या की गयी। प्रीदी को इस घटना से जोड़ा गया। परिस्थितियां इतनी खराब हो गयी कि प्रीदी को देश छोड़ना पड़ा और फ्रांस में देश निष्कासित जीवन जीना पड़ा । इस प्रकार से 1932 सैन्य क्रांति का जननेता हटा दिया गया। अन्य जननेता आवश्यक करिश्मा नहीं रखते थे जिसके परिणामस्वरूप सेना ने थाई राजनीति में प्रवेश किया। पिछले 60 वर्षों से थाईलैण्ड में सैनिक शासकों की श्रृंखला लग गयी है। सेनानायक ‘‘फ्राया पाहोल‘‘ थाईलैण्ड पर 1933-38 तक, फील्ड मार्शल फीबोन ने 1938-44 तक, और पुनः 1947-57 तक फील्ड मार्शल सरित थानरट, 1957-63 तक, फील्ड मार्शल थानम किकिकार्थोन ने 1963 से 1973 तक, जल सेनाध्यक्ष एडमिरल संगद कोलोरियू 1976-77 तक, सेनाध्यक्ष क्रींगसा चोमनन 1977-80 तक, सेनाध्यक्ष प्रेमतिलसुआन-द 1980-88 तक, और सेनाध्यक्ष जनरल चाटचाई चुनहवान ने 1988-91 तक शासन किया। अंतिम दो सैन्य नेतृत्व जनतांत्रिक चुनाव माध्यम से शासन में आये लेकिन वर्तमान प्रधानमंत्री जनरल सुनथोर्न कोंगसोमपोंग ने 1991 में एक सैनिक विद्रोह के बाद सत्ता ग्रहण की।

यहां इस बात का उल्लेख अतिआवश्यक होगा कि फीबुन सोनगाम की भूमिका ने यह सुनिश्चित कर दिया कि युद्ध परक नीति को ध्यान में रखते हुए, थाईलैण्ड में विकास और स्थिरता लाने के लिए सैन्य नेतृत्व अतिआवश्यक है। फीबून सोनग्राम ने थाई राजनीति में 1932-57 तक एक अतिप्रभावी भूमिका निभाई और थाई राजनीतिक प्रणाली में सेना की प्रमुखता का एक दृढ़ आधार रखा। इसके अतिरिक्त प्रीदी 1932 के सैन्य विद्रोह का प्रमुख नेता था। शासन में आने से पहले वह अपने देश में जनतंत्र का समर्थक था किंतु जब वह प्रधानमंत्री बना तो उसने इसके कुछ अंश को ही समर्थन दिया। वहां पर एक सदन वाली कार्य पालिका थी और उसके पूर्ण शासनकाल में चुने हए प्रतिनिधियों का प्रावधान था किंतु सरका की सारी शक्तियां केन्द्र के हाथों में केन्द्रित थी, उसकी विदेश नीति लचीली थी। दूसरे विश्वयुद्ध के समय फीबून जापान का एक घनिष्ठ सहयोगी था किंतु जब वह पुनः 1947 में सत्ता में आया तो उसने अमेरिका के साथ सहयोग की नीति अपनायी और जापान से मित्रता का कारण 1907 में फ्रांस से तथा 1909 में ब्रिटेन से खोयी हुई सीमा वापसी का था। इन सब चीजों के कारण जनता बहुत ही प्रसन्न थी तथा उसको जनसमर्थन प्राप्त हुआ।

फीबून ने इस बात का प्रचार किया कि एशिया एशियाइयों के लिए है और वास्तव में उसने पश्चिमी उपनिवेशवादी ताकतों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। उसने स्वतंत्र आंदोलनों को समर्थन दिया तथा अन्य लोगों के अलावा सुभाषचन्द्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी को आधार दिया। किंतु 1947 के बाद उसकी प्राथमिकताएं बदलीं। उसे चीन से खतरे का और वियतनाम में कम्युनिस्ट मूवमेंट के अभ्युदय का आभास हुआ। इस प्रकार से इस विषय में कम्युनिस्टों के विरोध के दमन के लिए अमेरिका का सहयोगी बने फीबून ने गृह स्तर पर सामाजिक-आर्थिक सुधारों का प्रयास किया जिससे कि समुद्र पार के विदेशियों तथा चीन का थाई आर्थिक प्रणाली पर नियंत्रण कम हो सके । उसने सरकार के अंदर वस्त्र उद्योगों, पेपर, चीनी तम्बाकू, डिस्टलरी उद्योगों को चलाने का प्रयास किया जो कि सेना द्वारा चलाये जाते थे और इससे सकी आर्थिक शक्ति सुदृढ़ हुई। उसने बड़ी बुद्धिमानी से व्यापार और उद्योगों में सेना की रुचि को प्रोत्साहन दिया। उसने हर आवश्यक सुविधाओं को बढ़ावा दिया तथा वहां सड़क निर्माण किया और संचार माध्यमों को विस्तृत किया। इस प्रकार सैन्य नेतृत्व के लिए जनता का समर्थन प्राप्त करने में समर्थ रहा। फीबून के उत्तराधिकारियों ने अपना आधार सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया, और वे प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक आर्थिक संरचना में अपनी उपस्थिति स्थापित करने में सक्षम रहे। जिसके परिणामस्वरूप सेना का अभ्युदय एक प्रमुख सामाजिक परिवर्तन के कारक और थाईलैण्ड की राजनीति के संचालक का रहा। वे प्रमुख राजनैतिक दलों के नेता थे जिनको कि जनतांत्रिक प्रयोग में भी किनारे नहीं किया जा सकता था। थाई राजनीति का एक मूल्यांकन इस बात को सुझाता है कि थाईलैण्ड में कोई भी स्थिर सरकार सैन्य अभिजात्य वर्ग के समर्थन और भागीदारी के बिना संभव नहीं है। थाई सेना का एक सिपाही यह सोचता है कि यह उसका पवित्र कर्तव्य है कि वह रक्षा ही न करे बल्कि नेतृत्व भी करे । उनका सामान्य जनता में सम्मान है और योग्य लोग थाईलैण्ड की सेना के लिए आकर्षित होते हैं क्योंकि यह पद लाभदायक और प्रतिष्ठित है। इधर जब से देश की राजनीति में ‘‘चुनाव लीक पाई’’ को शासन में आने का मौका मिला थाईलैण्ड की सेना की भूमिका में कुछ पराभव हुआ है।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणी: 1. कृपया अपने उत्तर के लिए नीचे के स्थान का प्रयोग करें।
2. अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिए उत्तर से करें।
1. थाई राजनीतिक प्रणाली में फीबून सेनाग्राम के नेतृत्व की भूमिका की व्याख्या करें।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1. क) थाई राजनीति में सेना की प्रमुखता की आधारशिला रखी।
ख) केन्द्र एक मजबूत केन्द्र में शक्तियों का केन्द्रीकरण किया।
ग) शक्तिशाली राज्यों-जापान, अमेरिका आदि के पक्ष की नीति का अनुसरण किया।
घ) साम्यवादियों के विरुद्ध।
ड़) थाई अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण।

जनतांत्रिक प्रयोग
1932 के बाद समय-समय पर नागरिक सरकार की स्थापना तथा जनतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ बनाने के प्रयास किये गये। जनप्रिय मशहूर नागरिक नेता जैसे ‘‘प्रीदी कनोमियांग‘‘ (1930) सेनी प्रमोज (1940) कुकृत प्रमोज (1970) ने सैन्य तत्वों को दूर रखने का और जनतंत्र की स्थापना का प्रयास किया लेकिन वे असफल रहे। या तो वे खुद उस सैन्य विद्रोह द्वारा हटा दिये गये या राजनैतिक दावपेंच द्वारा वे राजा की प्रतिष्ठा बनाये रखने तथा धर्म और राष्ट्र की प्रतिष्ठा को बचाये रखने में असमर्थ रहे हैं। क्योंकि ये तीनों थाई राजनीति के भावनात्मक पहलू रहे हैं। 1973 अक्टूबर की छात्र क्रांति ने सेना की तानाशाही हटाई तथा नागरिक शासन स्थापित किया। डॉ. सन्याथम्माक प्रधानमंत्री बने जो कि बहुत जनप्रिय थे। उनके कुशल नेतृत्व में एक नया संविधान स्वीकारां गया और चुनाव हुए किंतु सरकार जो कि उसके बाद बनी स्थिर नहीं थी। जिसके परिणामस्वरूप अक्टूबर 1976 में सैन्य विद्रोह हआ। सेना एक बार फिर शक्तिशाली रूप में उभरी पुनः नया संविधान 1978 में लागू किया गया किंतु फरवरी 1991 में नये सेना विद्रोहियों ने जिन्होंने सत्ता संभाली इसे रद्द किया। इस प्रकार से कुछ महत्वपूर्ण उल्लेखनीय प्रगति हई। थाई राजनीति 1991-92 के दौरान जिसने सेना शक्ति को थाई राजनीति में कमजोर किया। जनतंत्र की संभावना की उचित समझ के लिए आवश्यक है कि वर्तमान में चल रहे विकास की प्रक्रियाओं का एक व्यवस्थित मूल्यांकन किया जाय। एक सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व सत्ता के लिए जनरल सुनर्थन और जनरल सुचिन्दा कार्यायून द्वारा 23 फरवरी, 1991 में जनता द्वारा चुनी जनरल चटीचाई यूनवान की सरकार को हटाने में किया। जिससे थाईलैण्ड में सेना की तानाशाही का पुनः उदय हुआ। सेना ने सैन्य विद्रोह के लिए वैधानिकता चाही यह बताते हुए कि चटीचाई चूनह्वान सरकार भ्रष्ट थी। और वे जनतंत्र को बहाल रखने की और एक स्वच्छ सरकार देने की पूरी मंशा रखते हैं। उन्होंने एक जननेता को प्रेषित किया। आनन्द फन्यारचून इस बीच प्रधानमंत्री हुए और उन्होंने यह आश्वासन दिया कि जितना जल्दी हो सकेगा चुनाव होंगे।

इस प्रकार प्रसिद्ध सेनाध्यक्ष चटीचाई को सत्ताच्युत किया गया क्योंकि उनके संबंध सेना के नेतृत्व से तनावपूर्ण थे। चटीचाई ने भूतपूर्व सेनाध्यक्ष जनरल अर्थित कमलाएक को रक्षा मंत्रालय में शामिल करने का प्रयास किया था। इसका उद्देश्य सेना के प्रभाव को राजनीति में निषभावी करने का था। जिस दिन जनरल आर्थित को शपथ ग्रहण करनी थी उसी संध्या सेना ने प्रवेश किया इस प्रकार रक्त रहित सैन्य विद्रोह द्वारा सत्ता हथिया ली। तत्पश्चात सेना ने चटीचाई और उसके सहयोगियों का प्रभाव समाप्त करने का प्रयास किया। इसने ए वी सी का गठन किया ताकि चटीचाई और उसके कबीना के सहयोगियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध किये जा सके। ए वी सी ने जांच शुरू की तथा चटीचाई मंत्रिमंडल के कुछ मंत्रियों को विशेष रूप से संपन्न घोषित किया। किंतु 1991 के अंत तक एक विचित्र स्थिति ने जन्म लिया जिसके परिणामस्वरूप चटींचाई और उनके थाई दल को सेना की पक्षधर सरकार में भागीदारी दी गई। जब 22 मार्च, 1991 को चुनाव हुए तो इस सेना समर्थक संयुक्त सरकार को बहुमत मिला। इस चुनाव में बहुत से चटीचाई के तथाकथित भ्रष्ट मंत्रियों को विजय मिली। सेना के सहयोगी मंच पर जनरल चुचि-दात्रापयून जो कि एक अंचयनित प्रधानमंत्री के रूप में उभरे, उसने ऐसे मंत्रियों का चयन किया जिनको किए वीसी ने भ्रष्ट घोषित किया था। इस घटना को जनता ने नापसंद किया इसने इस बात को उजागर किया कि भ्रष्टाचार के जो मूल आरोप जनरल चटीचाई पर थे वो निराधार थे। इस प्रकार से जनता द्वारा चयनित वैधता जिसको सेना ने उपलब्ध किया था 1991 के विद्रोह के दौरान वह अस्तित्वहीन हो गयी इससे असंतोष की भावना जाग गयी और एक जन-आंदोलन सरकार के विरुद्ध छिड़ गया।

दूसरा प्रमुख कारण इस आंदोलन के पीछे था अचयनित प्रधानमंत्री के चुनाव का सबसे बड़ा भागीदार सेना समर्थक संयक्त सरकार में समाखीथाम दल था जिसका नेतृत्व कर रहे थे नारोंगवोंगवान उनका नाम जैसे ही प्रधानमंत्री के लिए। प्रस्तावित किया गया वे तुरंत ही विवादस्पद हो गये। जनसंत्र समर्थक दलों ने यह तर्क दिया कि वे भ्रष्ट हैं। 25 मार्च 1992 को ‘‘न्यू एसपोरेशन पार्टी’’, ‘‘पलंगधर्मी’’, एक्कापर्ण और डेमोक्रट्स’’ ने एक संयुक्त प्रेस वक्तव्य दिया और नारोंग सरकार की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी कि अमेरिकन स्टेट डिपार्टमेंट के इस अभियोग पर उनको “वीसा’’ 1991 के मध्य नहीं दिया गया था क्योंकि उन पर नशीले पदार्थों की तस्करी का संदेह था। इसको लेकर सरकार की वैधता को चुनौती दी उन्हीं दिनों अमेरिकन स्टेट डिपार्टमेंट की प्रवक्ता कु. मानग्रेट ट्रट विलर ने यह स्पष्ट किया कि उन्होंने जुलाई 1991 में नारोंग को वीसा नहीं दिया था क्योंकि उसके ऊपर अफीम की तस्करी का संदेह था । इस तरह के तथ्यों के परिणाम गंभीर रहे। इस कारण से सेना ने नारोंग से समर्थन वापस ले लिया। दूसरे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे वायु सेनाध्यक्ष ‘‘सोनहून राहून’’ उनकी भी छवि स्वच्छ नहीं थी और विवादास्पद करमुक्त व्यापार समझौते के दोषी थे। वह जनता के आरोपों से भयभीत थे। उन्होंने अपने नाम के विचार के लिए मना किया । इन परिस्थितियों में जनरल सुचिन्दा, जिन्होंने, इस आधार पर चुनाव में भाग नहीं लिया था कि उनकी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा नहीं है, का नाम प्रस्तावित किया गया। सेना समर्थक संयुक्त दल ने उनके नाम को सहमति दी और राजा ने उनकी नियुक्ति को अनुमोदित किया। सुचिन्दा ने प्रधानमंत्री पद को स्वीकार करते हुए कहा कि ‘‘मैं शपथ लेता हूं कि मैं राजा का वफादार रहूंगा और उनके व उनके परिवार को पूरी सुरक्षा प्रदान करूंगा।’’ अपने जीवन के रहते अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह ईमानदारी से राष्ट्र और जनहित में बिना किसी लाभ के (चाहे वह व्यक्तिगत हो या सामूहिक) करने का शपथ भी लिया था।

किंतु उसके बाद के घटनाक्रम सुचिन्दा के लिए घातक रहे। 20 अप्रैल, 1992 को सदन और सर्वोच्च सैन्य मुख्यालय के समक्ष जैसे ही उन्होंने पदभार संभाला वह प्रदर्शनकारियों का निशाना बन गये। प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ती गयी और विरोध ने गति पकड़ ली। जब 23 अप्रैल को संसद बुलाई गयी तो विपक्ष के सदस्यों ने जनतंत्र के पतन पर काला पट्टा पहना। बाहर पलंग धर्मा दल के नेता भूख हड़ताल पर बैठ गये बाद में 40 और लोग सम्मिलित हुए । चमलांग श्री मुआंग ने प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व जोश तथा उत्साह के साथ किया। अप्रैल के अंत तक परिस्थिति खराब होनी शुरू हो गयी। मई 1992 के प्रारंभ में हजारों प्रदर्शनकारी मध्य बैंकांक में बैठ गये जिनको कि दंगा पुलिस ने घेर लिया। 9 मई को एक लाख पचास हजार से भी ऊपर लोग गलियों में कूद पड़े। इस मांग के साथ कि सुचिन्दा को जबरन त्यागपत्र के लिए बाध्य किया जाए। वे एक मैदान में एकत्र हुए और आसपास की गलियों में फैल गए । यह सुचिन्दा के विरोध में हुए आंदोलन की पराकाष्ठा थी। अक्टूबर 1973 के प्रदर्शनकारियों का जिस तरह से जोश और उत्साह देखा गया वह अब भी बना था जबकि थानोम परदास की चैकड़ी को इस्तीफा के लिए बाध्य होना पड़ा था, जनतांत्रिक प्रयोगों के लिए प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि अनिर्वाचित प्रधानमंत्री त्यागपत्र दे और संविधान में आवश्यक संशोधन किये जायें जिससे कि अनिर्वाचित प्रधानमंत्री का पुनर्चयन थाईलैण्ड में बंद किया जाये। वे बिना मांग पूर्ण हए हटने के लिए तैयार नहीं थे। यद्यपि जनतंत्र आंदोलन के नेताओं ने यह आश्वासन दिया कि आवश्यक संशोधन होंगे पर वे सफल नहीं हुए। प्रदर्शनकारियों ने अपना प्रदर्शन जारी रखा और सैनिक नेतृत्व ने धैर्य खो दिया। उन्होंने यह फैसला किया कि शक्ति से निपटेंगे। 17 मई को सेना द्वारा दमन शुरू हुआ आपात स्थिति घोषित की गयी करीब 50 लोगों की मृत्यु हुई व सैकड़ों घायल हुए। विद्रोह आंदोलन के नेता मेजर जनरल चुमलोंग सिरमुआंग को हथकड़ी पहना कर गिरफ्तार किया गया और गलियां खाली करायी गयी। इस पुलिस कार्रवाई के परिणाम भयानक रहे। प्रधानमंत्री सुचिन्दा और उनके सर्वोच्च सेनानायक इशारापोंग नूनपाकडी को इस खूनखराबे के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। ऐसा सैन्य समर्थक साझा सरकार के समर्थकों द्वारा भी महसूस किया गया। यह अफवाह फैली कि एक नया सैन्य विद्रोह किसी समय भी हो सकता है ऐसे अवसर पर राजा भूमिबोल अटुलवेज ने संवैधानिक संकट को दूर करने के लिए हस्तक्षेप किया। उन्होंने जनरल सुचिन्दा को त्यागपत्र देने की सलाह दी। इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर कि जनता का और सेना का बहुत बड़ा समूह दबाव डाल रहा है । इसलिए 24 मई 1992 को सुचिन्दा ने त्यागपत्र दिया। उनके उत्तराधिकारी प्रधानमंत्री आनन्द पानीयचुन हुए । इस समय आनन्द ने आवश्यक संवैधानिक सुधार लागू करने का बीड़ा उठाया जिससे कि प्रणाली को जनतांत्रिक बनाया जा सके और अग्रिम चुनाव कराया जा सके।

उन लोगों के लिए जो अपना जीवन खो चुके थे व घायल हुए थे मई के खून खराबे में आनन्द ने सत्ता संभालने में एक मरहम लगाने का काम किया। उसने सुचिन्दा के प्रति जो दुर्भावना थी उसे भी निष्प्रभावी किया। आनन्द की सरकार ने यह प्रयास किया कि लोग इस बात को समझ जाएं कि यह उनके प्रति न्याय करेगा व उन दोषियों को दंडित करेगा जो मई खूनखराबे के दोषी है। जनता के प्रतिनिधि सदन ने एक समिति बनायी जो मई के खूनखराबे की जिम्मेदारी को निश्चित करे। सुचिन्दा ने भी संविधान संशोधन को समर्थन दिया जो कि और भी जनतांत्रिक थे। सदन ने इसमें चार प्रमुख संशोधन की अनुमति दी। 10 जून 1992 के संशोधन संविधान में सम्मिलित किये गये । इनका थाई राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा ये संशोधन निम्नलिखित हैं:
1. प्रधानमंत्री सदन का एक चुना हुआ सदस्य अवश्य होना चाहिए।
2. परीक्षण और नियम को पास करने में सेनेट की शक्तियां सीमित होगी।
3. दूसरे राष्ट्रीय संसद के सेशन में खुली बहस की इजाजत होगी।
4. सदन के स्पीकर को सदन का अध्यक्ष बनाया जाय।

इन संशोधन के पश्चात दूसरी बार 13 सितंबर 1992 में थाईलैण्ड में आम चुनाव हुए। दो महत्वपूर्ण संयुक्त ताकतें शक्ति के लिए प्रतिस्पर्धा में थीं। जनतांत्रिक संयुक्त दलों को एक देवता के रूप में प्रतिपादित किया गया। तथा सेना समर्थकों को एक राक्षसी ताकत के रूप में संचार माध्यमों द्वारा बताया गया जनतंत्र समर्थक दल विजयी रहे। चुवान लिवापाई के नेतृत्व में नयी सरकार की स्थापना हुई। सेना समर्थक दल निराश हुए जब कि नयी सरकार अपनी रुचि जनतांत्रिक संरचना को सुदृढ़ बनाने में दिखा रही है।

धर्म और राजनीति
थाई समाज में धर्म एक बहुत ही महत्वपूर्ण भावनात्मक मुद्दा है। बौद्ध धर्म थाईलैण्ड का राष्ट्रीय धर्म है । राजनैतिक रूप से प्रबुद्ध वर्ग और बौद्ध धर्म का बहुत सालों से चला आ रहा मेलजोल थाईलैण्ड की राजनैतिक प्रणाली को गहराई से प्रभावित करता रहा है। विभिन्न सामाजिक, जातीय समूह संघ का समर्थन प्राप्त करने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। क्योंकि वे उसके बिना अपनी वैधानिकता का दावा नहीं सकते हैं। धार्मिक और राजनैतिक तत्वों का एक बड़ा तबका बौद्ध और आधुनिक राजनैतिक विचारधाराओं के मेलजोल का हिमायती है। राजनीति में धर्म का प्रयोग, चाहे जनतंत्र हो या तानाशाही, थाई राजनीति का अभिन्न हिस्सा है । धार्मिक सुधारों के प्रचार में कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं के प्रयास और कम्युनिस्टों और अलगाववादी ताकतों से लड़ने में बौद्ध धर्म का प्रयोग, सरकार व राज्य में धर्म के महत्व को बताती हैं।

यह एक ऐतिहासिक वास्तविकता है कि थाई राजाओं, राजा रामखम्भेन ने 13वीं शताब्दी में, राजा मोंगकुट ने 19वीं शताब्दी में तथा उनके उत्तराधिकारियों ने 20वीं शताब्दी में बौद्ध धर्म को एक महत्वपूर्ण साधन समझा। थाई राष्ट्रवाद के कारकों को विकसित करके अपने उद्देश्य की प्राप्ति की। राजा ने प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व बौद्ध प्रार्थनाओं को विभिन्न जन संस्थाओं में, सरकारी स्कूलों, पुलिस बल और सेना में प्रस्तावित किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय प्रधानमंत्री फील्ड मार्शल फीबून सोनग्राम ने धार्मिक तत्वों को इस दृष्टिकोण से विशेष महत्व प्रदान किया कि इससे राष्ट्रवादी ताकतों को बढ़ावा मिलेगा।

अपने प्रतिद्वंद्वी इस्लाम धर्म से बौद्ध संघों की कार्यकलाप की भूमिका भिन्न रही है। यह नयी खोजों में निरंतर लगे रहने में नैतिक गुणों के उत्थान में विश्वास करता है। इसने विभिन्न सामाजिक एवं जातीय समुदायों में समझौते का प्रयास किया है और यह राष्ट्रीय अखंडता और मेलजोल का मार्ग प्रशस्त करता है।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणी: 1. अपने उत्तर के लिए नीचे के स्थान का प्रयोग करें।
2. अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से करें।
1. थाईलैण्ड में जनतंत्र की सफलता और असफलता की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
2. थाई राजनीति और समाज में धर्म के महत्व की संक्षिा व्याख्या कीजिए।

बोध प्रश्न 3 उत्तर
1. क) राजनैतिक दलों में कमजोरियों को।
ख) राजनीति में सेना के दबदबे को।
2. क) बौद्ध धर्म ने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने में एक माध्यम के रूप में काम आया।
ख) राजनीतिक पार्टियां धर्म का प्रयोग अपने समर्थन का आधार बढ़ाने के लिए करती हैं।
ग) धर्म का प्रयोग साम्यवाद से लड़ने के लिए किया गया है।
घ) धर्म ने विभिन्न सामाजिक और एकजातीय समूहों के समन्वयन में सहायता की।

आर्थिक नीति
थाईलैण्ड ने एक उदार नीति का अनुसरण किया है। इसी कारण से वह इस क्षेत्र में “स्वतंत्र उधम’’ का अधिनायक माना जाता है। यद्यपि फील्ड मार्शल फीबुन सोंग्राम ने कुछ उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में लिया क्योंकि यह मूलतः समयोचित था। किंतु उसके उत्तराधिकारियों ने हमेशा निजी क्षेत्र के विकास को ही प्राथमिकता दी, प्रधानमंत्री प्रेम तिल्सूलानन्द (1980-1988) के प्रबंधकाल में निजी क्षेत्रों को प्रोत्साहन और आवश्यक सुविधाएं प्रदान की गयीं। इससे कृषि और औद्योगिक उत्पादनों में काफी वृद्धि हुई और प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय उत्पादन 1418 डालर हो गया।

जनरल प्रेम ने देश के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिए नये क्षेत्र तलाश किए । मत्स्य उद्योग, हीरा उद्योग, कपड़ा उद्योग और पर्यटन में आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया। ये प्रयास सफल भी रहे। पिछले कुछ वर्षों में इन क्षेत्रों के विकास ने थाईलैण्ड की आर्थिक स्थिति सुधारने व उन्नत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि वर्तमान विकास की गति इसी प्रकार रही तो थाईलैण्ड, एन आई सी उदाहरणार्थ सिंगापुर, कोरिया, ताइवान, हांगकांग के बराबर हो जाएगा।

यहां पर इस बात का उल्लेख प्रासंगिक है कि थाईलैण्ड अमेरिका का सहयोगी था। 1975 में वियतनाम युद्ध के अंत के साथ आर्थिक सहयोग की सहमति के हस्ताक्षर हए । तब से अमेरिका थाईलैण्ड के अर्थप्रबंध को प्रभावित कर रहा है। एक बड़ी संख्या में थाईलैण्ड में अमेरिकी सलाहकारों की नियुक्तियां हुईं । युद्ध नीति को लक्ष्य मानकर अमेरिका ने थाईलैण्ड की वित्तीय अवस्थापना में बहुत बड़ी मात्रा में ऋण अनुदान तथा प्रत्यक्ष पूंजी निवेश किया । अमेरिका ने बहुत बड़ी मात्रा में थाईलैण्ड को वित्तीय व सैनिक सहायता प्रदान की इसका उद्देश्य था कि थाईलैण्ड इस क्षेत्र में साम्यवाद को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस तरह 1963 से 1978 तक बहुत (थाई मुद्रा) अमेरिकी डालर से जुड़ी रही।

अमेरिका के लिए थाईलैण्ड का युद्ध नीति संबंधी महत्व 1975 में वियतनाम युद्ध के अंत के साथ कम हुआ। 1973 से 1978 तक थाईलैण्ड एक दयनीय आर्थिक दशा तथा अस्थिर शासनों का सामना कर रहा था। राजनैतिक व्यवस्था कायम होने पर शासकों ने आर्थिक प्रबंध को विकसित करने का प्रयास किया। उन्होंने ऐसा महसूस किया कि साम्यवाद के विस्तार को केवल आर्थिक विकास की प्रक्रिया को तीव्रता प्रदान करके ही रोका जा सकता है। इसलिए वे आर्थिक नीति के विभिन्न पहलुओं व कार्य पद्धति की समीक्षा में लग गए । परिणामस्वरूप आर्थिक योजना के सर्वोच्च निकाय-राष्ट्रीय आर्थिक विकास परिषद का गठन किया गया। राष्ट्रीय आर्थिक विकास परिषद ने विकास की प्रक्रिया को तीव्रता देने के लिए नये विचारों को नियंत्रित किया। इस परिषद ने, जिसकी स्थापना 1959 में हुई थी, विकास को प्रोत्साहन देने तथा समन्वयन का कार्य किया। इसने आर्थिक सुधार तथा पंचवर्षीय योजनाओं के बनाने की जिम्मेदारी ली।

राष्ट्रीय आर्थिक विकास परिषद ने छठी पंचवर्षीय योजना (1986-1991) के प्रस्तुतीकरण में नये विचार दिए। 1986 के पूर्व तक की प्राथमिकताएं ग्राम्य विकास और संचार योजनाओं के लिए थीं । इसने किसानों की उत्पादकता तथा आय बढ़ाने के लिए कदम उठाए थे। इस प्रकार सड़कों, बांधों सिंचाई के लिए नहरों तथा स्वास्थ्य योजनाओं आदि के निर्माण पर विशेष बल दिया गया। किंतु छठी योजना के कार्यकाल के दौरान निजी क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दी गयी। निजी क्षेत्रों को एक ऐसा संयंत्र समझा गया जो कि विकास की गाड़ी को खींच सकता है। परिणामस्वरूप, सरकार, सार्वजनिक क्षेत्रों की भूमिका में जो संचालन व नियंत्रण का काम करती थी अब व्यक्तिगत व्यापार के समर्थन व बढाने का कार्य करने लगी । राष्ट्रीय आर्थिक विकास परिषद ने उदारवादी नीतियां अपनायीं ताकि विदेशी उद्योग आकर्षित हों। इसके अतिरिक्त उनको थाईलैण्ड में पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहन भी दिया। इस प्रक्रिया में विदेशी उद्योगों को लाभ और पूंजी को अपने देश में भेजने की मनाही, विदेशी भूमि स्वामित्व, आयात-कर तथा उपकरणों के ऊपर लगे कर पर छूट दी गयी।

थाई सरकार ने इनके राष्ट्रीयकरण व सरकारी उद्योगों से प्रतिस्पर्धा न होने देने के प्रति अपनी वचनबद्धता व्यक्त की। जिसके परिणामस्वरूप 1987-90 के मध्य लगभग 1037 कंपनियों ने अपना कार्य प्रारंभ किया। सबसे अधिक पूंजीनिवेश करने वालों में जापान (21.4प्रतिशत), ताइवान (11.2प्रतिशत) और अमेरिका (10.9प्रतिशत) थे। निर्यात की प्राथमिकता के लिए उन्नति के कार्यक्रम उद्योगों जैसे कि जैवतकनीक, कंप्यूटर साफ्टवेयर, सौर्य बैटरी तथा सूक्ष्मतरंग पृथक्कारी आदि को विशेष महत्व दिया। सरकार की नीति में निजी क्षेत्रों के प्रति गुणात्मक परिवर्तन के कारण सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों की एक बड़ी संयुक्त सलाहकार समिति गठित की गयी। इसका प्रमुख उद्देश्य सार्वजनिक व निजी उद्योगों में समन्वय कराना था, ने एक ऐसे विचार स्त्रोत की भूमिका निभायी जिसने व्यापारिक रुचि को बढ़ावा दिया तथा 1986 तक निजी व्यापार के लिए गोष्ठियों का आयोजन किया।

इसको विशेष महत्व इसलिए भी मिला कि इसने निर्यात की पक्षधर नीति बनाने के नीति निर्धारकों के निर्णयों को प्रभावित किया । व्यापार के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रीय सलाहकार समिति में उत्पादन तथा विभिन्न सामानों के बाजारीकरण में आने वाली बाधाओं को स्पष्ट किया। पर्यटन व हीरा उद्योगों को, जो कि विदेशी मुद्रा अर्जन के प्रमुख स्रोत थे हाल के.वर्षों में काफी प्रोत्साहन मिला । इसका श्रेय इस समिति की लगन व निरंतर प्रयास को जाता है । इसके पूर्व जनता व सरकार दोनों की यह धारणा थी कि पर्यटन व हीरा उद्योग कुछ मुट्ठी भर संपन्न लोगों की सुविधा के लिए थे। किंतु अब इस धारणा में परिवर्तन आया है। पहले इन क्षेत्रों पर भारी कर लगता था। किंतु अब इनके निर्यात मूल्य को लोग समझने लगे हैं। सरकार ने इनके निर्यात कर को कम किया है। होटलों पर बिक्रीकर में कमी हुई है तथा कीमती हीरों के निर्यात । के लिए सुविधाएं प्रदान की गयी है। जिसके परिणामस्वरूप सीमाशुल्क में कमी हई। इसने थाईलैण्ड के हीरे के व्यापारियों को दक्षिणपूर्व एशिया के प्रमुख निर्यातक बनाने में सहायता की । दूसरी तरफ होटलों के प्रबंध बेहतर हुए, आवागमन के साधनों का विकास हुआ, जिससे विदेशी यात्री थाईलैण्ड की ओर आकर्षित हुए। वर्तमान में थाईलैण्ड आने वाले विदेशी यात्रियों की संख्या लगभग 240 लाख प्रति वर्ष है। इस प्रकार पर्यटन विदेशी मद्रा अर्जन का प्रमख स्रोत बन गया है।

थाईलैण्ड अमेरिका के बाद दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है। यहां प्रति वर्ष चावल की पैदावार लगभग 2060 लाख टन है। यहां लगभग 500 लाख टन मक्का, 1930 लाख टन कसावारूट्रस और 2030 लाख टन मछली पैदा होती है। तहां पर लकड़ी, चीनी, रबर, टीक आदि भी पर्याप्त मात्रा में है। यह व्यापारिक स्तर पर सीमेण्ट (लगभग 7090 लाख टन) तैयार करता है जिसका आधा मलेशिया ही खरीदता है। यह आटोमोबाइल असेम्बली व अन्य इस प्रकार की चीजें निर्यात के लिए तैयार करता है।

बोध प्रश्न 4
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से करें।
1. थाईलैण्ड के आर्थिक विकास के कुछ प्रमुख लक्षणों की पहचान करें।

बोध प्रश्न 4 उत्तर
1. क) स्वतंत्र उद्यम।
ख) निजी क्षेत्रों की प्रबलता।
ग) कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था ।
घ) ग्राम्य विकास पर बल दिया।
ड़) प्रतिस्थापक विकास के ऊंचा आवंटन।
च) थाईलैण्ड में पूंजी निवेश के लिए विदेशी कंपनियों को बहुत से प्रोत्साहन दिए गए।

 थाई विदेश नीति
थाईलैण्ड की विदेश नीति के निर्माता बहुत से मुद्दों पर विशेष ध्यान रखते हुए, उपागम में बहुत ही लचीले रहे हैं ताकि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की बदलती हई आवश्यकताओं की पर्ति की जा सके । थाईलैण्ड ने 13वीं शताब्दी में अपनी उत्पत्ति से लेकर 19वीं शताब्दी के “अफीम युद्ध’’ तक हान साम्राज्य से अपनी प्रगाढ़ मित्रता बनाए रखा । इसके बदले में चीनी शासकों ने भी थाई शासकों को अपने नियंत्रण में शक्ति सुदृढ़ बनाने तथा उत्तर-पूर्व एशिया के एक बड़े भाग पर नियंत्रण करने में सहायता की । जब ब्रितानी शक्ति दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ गयी तो थाईलैण्ड ने अपनी प्राथमिकता भी बदल दी और ब्रिटेन से अपने संबंध प्रगाढ़ बनाना शुरू कर दिया। इसने ब्रिटेन को व्यापारिक सुविधाएं तथा अतिरिक्त सीमाधिकार दिया। इस प्रकार ब्रिटेन थाई अदालतों की सीमा से परे का विषय बना। इसके बदले में ब्रिटेन ने थाई संप्रभुता का सम्मान किया और फ्रांस को थाईलैण्ड में समस्या पैदा करने से रोकता रहा। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान थाईलैण्ड ने जापान का साथ दिया। इसके बदले में जापान ने थाईलैण्ड की उन सीमाओं को जो कि वह उपनिवेशकाल में खो चुका था पुनः प्राप्त करने में सहायता की। लेकिन युद्धोपरांत इस क्षेत्र में अमेरिका के सबसे प्रभावशाली देश के रूप में उभरने के साथ थाईलैण्ड अपनी पुरानी परंपरा के अनुरूप अमेरिका से घनिष्ठ संबंध बनाने के लिए अग्रसर हुआ । थाईलैण्ड अमेरिका से साम्यवाद को रोकने तथा चीन व वियतनाम विरोधी नीति से सहयोग करने के लिए सहमत हुआ, थाईलैण्ड 1954 में सीटो सैन्य संधि में सम्मिलित हुआ । इसने साम्यवाद विरोधी शक्तियों को साम्यवाद के विरुद्ध एक आधार देने का निमंत्रण दिया। थाईलैण्ड वास्तव में सीटो का मुख्यालय था । वियतनाम युद्ध के दौरान यह अमेरिकी सेनाओं के लिए एक आधार था। इसके बदले में इसे अमेरिका से खूब आर्थिक व सैनिक सहायता मिली। जिससे सड़क, बांध व पुलों का निर्माण किया गया। इसने पड़ोसियों के विरुद्ध थाईलैण्ड की सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया।

1975 में वियतनाम युद्ध के अंत के साथ दक्षिण पूर्व एशिया में, युद्धनीति संबंधी वातावरण में परिवर्तन आया। चीन आसिआन देशों के साथ अपने संबंध सुदृढ़ बनाने को उत्सुक था। थाईलैण्ड ने चीन से अपने घनिष्ठ संबंध बनाने की पहल की। इसके लिए प्रधानमंत्री कुकृत प्रमोज ने 1975 में चीन की यात्रा की। इस कार्य को शुरू करने में वे सफल भी रहे। थाईलैण्ड को चीन से मैत्री संबंधों के कारण तेल भी मिला। चीन ने थाई अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए चावल की ऊंची कीमत दी। इस प्रकार से थाईलैण्ड व चीन के संबंधों में तेजी से सुधार हुआ। यह 1978 दिसंबर में वियतनाम के कम्बोडिया में सैनिक हस्तक्षेप के साथ और प्रगाढ़ हुआ। थाईलैण्ड, चीनी हथियारों को कम्बोडिया के विद्रोहियों में वितरित करने का माध्यम बना। खामेर रूज को जिनको कि चीन का समर्थन प्राप्त था, थाईलैण्ड में शरण मिली। इसने खामेर रूज और फन्सिन्पेक गोरिल्ला बलों को आश्रय प्रदान किया। कम्बोडिया के विद्रोहियों ने अपनी शक्ति यहां बढ़ायी क्योंकि थाईलैण्ड के माध्यम से इन्हें चीन, अमेरिका व अन्य स्रोतों से अस्त्र-शस्त्र प्राप्त होते थे। चीन, थाईलैण्ड के इस सहयोग से जिससे कि वियतनाम अलग-थलग पड़ गया था, बहुत खुश था।

इस प्रकार से थाईलैण्ड का उपयोग इस क्षेत्र में वियतनाम के विस्तार से रोकने के लिए एक सीमावर्ती राज्य के रूप में किया गया। किंतु अक्टूबर 1991 में कम्बोडिया शांति समझौता जो पेरिस में हुआ तथा साम्यवादी गुट के विघटन के साथ परिस्थितियों में काफी महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।

थाई शासकों ने वर्तमान में ऐसी नीति अपनाई है जिससे कि युद्ध स्थल को बाजार क्षेत्र में परिवर्तित किया जा सके। थाईलैण्ड अन्य इण्डोचीन देशों में बड़ी मात्रा में पूंजी निवेश की योजना तैयार कर रहा है। यह एक तरफ मीकांग नदी विकास परियोजना में निवेश के लिए तथा दूसरी तरफ नाम पेन्ह होकर जाने वाली बैंकाक से हो ची मिन्ह तक की रेल सिवा को फिर से शुरू करने को उत्सुक है।

इस क्षेत्र में क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने का थाईलैण्ड एक प्रमुख प्रचारक है। इसने एसियान के बनाने में सक्रिय रुचि ली है जिनमें ब्रूनी, इण्डोनेशिया, मलेशिया, फिलीपिन्स और थाईलैण्ड सम्मिलित हैं।

रसियान देशों में उद्योग, व्यापार, पर्यटन, वित्त, खाद्य सामग्री उत्पादन और वितरण, मछली, जहाजरानी, संचार, वायुयान सेवा, पर्यावरण, यातायात सेवा, दूर संचार, विज्ञान व तकनीक आदि क्षेत्रों में सहयोग है । एसियान के सदस्य देश एक दूसरे को सामरिक व राजनैतिक मामले में भी सहयोग देते हैं। वर्तमान में इनकी बातचीत के साथ सहयोगी हिस्सेदार हैं:- जापान, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय आर्थिक समुदाय । थाईलैण्ड ने दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ उलझे हुए मामलों को सुलझाने में सफल मध्यस्थता निभाई है। 1966 में मलेशिया व इण्डोनेशिया के विदेशमंत्रियों के बीच ‘‘क्रश मलेशिया प्लान’’ को समाप्त करने की वार्ता का स्थान थाईलैण्ड बना । थाईलैण्ड ने सलाह के लिए चले आ रहे विवाद के लिए फिलीपिन्स और मलेशिया का अधिवेशन बुलाया। थाईलैण्ड, ने पुनः एसियान के माध्यम से कम्बोडिया में चले आ रहे वियतनामी हस्तक्षेप को रोका।

आज थाईलैण्ड कुछ ऐसे देशों में से एक है जो बर्मा की सैनिक सरकार से अच्छे संबंध बनाए हैं। इसने कभी भी बर्मा के शरणार्थियों को थाईलैण्ड आने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। थाई व्यापारियों ने शान व करान क्षेत्रों में टीक की लकड़ी काटने के ठेके लिए हैं। इस प्रकार दोनों देशों के बीच घनिष्ठ व्यापारिक संबंध हैं।

अंत में यह कहा जा सकता है कि थाई विदेश नीति अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल रही है। थाई विदेश नीति के चार दशकों के विकास को संक्षेप में इस प्रकार भी कह सकते हैं कि पहले यह सामरिक नीति को ध्यान में रख कर बनाई गयी थी किंतु अब उसके साथ-साथ आर्थिक नीति भी प्राथमिकता पा रही है। थाई सरकार फैसले के हर स्तर पर व्यापारिक सहयोग को प्राथमिकता देती है। विदेश नीति निर्धारण में इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। इस प्रकार से यह अपने व्यापारिक हितों को बढ़ाती है।

बोध प्रश्न 5
टिप्पणी: क) उत्तर के लिए नीचे के रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तर की जांच इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से करें।
1. थाई विदेश नीति की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख करें?

बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 5
1. क) उपागम में लचीले।
ख) सामान्य रूप से पश्चिमी गुट पर और विशेष रूप से अमेरिका पर विश्वास ।
ग) क्षेत्रीय सहयोग पर विशेष बल दिया।
घ) पूर्व में सामरिक नीति से संबद्ध विचारों ने इसकी नीतियों का निर्देशन किया किंतु अब इसके साथ-साथ व्यापारिक रुचि को भी प्राथमिकता मिलने लगी।

 सारांश
संक्षिप्त में यह कहा जा सकता है कि राष्ट्र, राजा, धर्म और सेना थाईलैण्ड की राजनैतिक प्रणाली चार प्रमुख स्तम्भ हैं। इनके उचित महत्व के बिना, नई राजनैतिक व्यवस्था के लिए कोई भी उपक्रम सफल नहीं हो सकता है । किसी भी नेता को अस्तित्व बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि वह इन स्तंभों के बीच संतुलन बनाए रखे।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में गतिशीलता व लचीलेपन का विशिष्ट स्थान है। थाईयों का कहना है कि ‘‘वे एक बांस की भांति हवा के साथ झुक जाते हैं’’ । यह उनके व्यवहार व प्रवृत्ति की जो उनकी विदेश नीति व राजनय को निर्धारित करती है कि स्पष्ट व्याख्या करती है।

प्रमुख शब्द
सकदिमा वर्ग: अभिजात तंत्र ।
उपनिवेश: देश या सीमा जो. स्वतंत्रता से वंचित हो तथा किसी विदेशी राज्य द्वारा शासित हो।
साम्यवाद: पूंजीवाद को हटा कर आयी हुई ऐसी सामाजिक व आर्थिक संरचना (सामाजिक प्रणाली) जिसका आधार – उत्पादन के साधनों पर जन स्वामित्व का है।
प्रजातंत्र: जनता द्वारा सरकार, एक राजनैतिक प्रणाली जिसमें प्रजातंत्र की विधि व स्वरूप नागरिक स्वतंत्रता व साम्य सुरक्षित हों तथा जिसका क्रियान्वयन कानून द्वारा गारण्टी दिया गया हो।
बहत: थाई-मुद्रा।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
इलियट, डेविड: 1978 थाईलैण्ड: ओरिजिन्स आफ मिलिटिरी रूल, जेड प्रेस, 1978
गिरलिंग, जे एल एस, 1981 थाईलैण्ड: सोसाइटी एण्ड पोलिटिक्स इथाका, एन वाई, कार्नेल युनिवर्सिटी प्रेस, 1981
झा, गंगानाथ, 1979, फारेन पोलिसी आफ थाईलैण्ड, नई दिल्ली, रेडिएण्ड पब्लिशर्स, 1979
मारेल, डी एण्ड समुदाविनिजा, सी, 1981 पोलिटिकल कांफ्लिक्ट इन थाईलैण्ड, कैम्ब्रिज, मास, 1981
नेहेर, सी डी, 1979, माडर्न थाई मालिटिक्स: फ्राम विलेज टू नेशन कैम्ब्रिज, मास, स्केन्कामान
व्याट, डी के, 1984, थाईलैण्ड: एक शार्ट हिस्ट्री, न्यू हैवेन कान, पेल यूनिवर्सिटी प्रेस, 1984
इक्यूटो, सोम्सकदी, एङ, 1987 गवर्नमेण्ट एण्ड पालिटिक्स आफ थाईलैण्ड, हांग कांग,
आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1987