कार्यपालिका किसे कहते हैं | कार्यपालिका की परिभाषा क्या है , के प्रमुख कार्य बताइये karyapalika kya hoti hai

By   October 8, 2020

karyapalika kya hoti hai कार्यपालिका किसे कहते हैं | कार्यपालिका की परिभाषा क्या है , के प्रमुख कार्य बताइये ?

शासन के अंगः कार्यपालिका, विधायिका और
न्यायपालिका
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
शासन के अंग
कार्यपालिका
कार्यपालिका का अर्थ और उसके प्रकार
कार्यपालिका की संरचना
कार्यपालिका के कार्य
कार्यपालिका की बढ़ती भूमिका
विधायिका
जनता का प्रतिनिधित्व
विधायिका का गठनः एकसदनीय और दोसदनीय
विधायिका के कार्य
विधायिका का ह््रास
न्यायपालिका
न्यायपालिका के कार्य
न्यायिक समीक्षा और न्यायिक सक्रियता :
न्यायपालिका की स्वतंत्रता
सारांश
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर
उद्देश्य
इस इकाई में हम आधुनिक सरकारों के तीन प्रमुख कार्यों अर्थात् विधि-निर्माण, प्रशासन और न्याय की विवेचना करेंगे। इस इकाई का अध्ययन करने के पश्चात्, आप
ऽ आधुनिक सरकारों के तीन प्रमुख अंगों को स्पष्ट कर सकेंगे,
ऽ कार्यपालिका की संरचना और उसके प्रकारों का वर्णन कर सकेंगे,
ऽ विधायिका के गठन को समझा सकेंगेय
ऽ राष्ट्रीय आन्दोलनों की विचारधाराओं की समीक्षा कर सकें।
ऽ कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के कार्यों का विश्लेषण कर सकेंगेय
ऽ विधायिका के ह््रास और कार्यपालिका की बढ़ती भूमिका का वर्णन कर सकेंगेय और
ऽ यह स्पष्ट कर सकेंगे कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित की जाती है।

प्रस्तावना
प्रत्येक सभ्य समाज कारगर और दक्ष शासन की आशा करता हैद्य यह भूमिका सरकार निभाती है जो राज्य के चार बुनियादी तत्वों में एक होती है। कोई भी राज्य एक सरकार के बिना संभव नहीं। सरकार सिर्फ जनता की सुरक्षा ही नहीं करती, उनकी बुनियादी जरूरतें भी पूरा करती है और उनका सामाजिक-आर्थिक विकास सुनिश्चित करती है। इस तरह हम कह सकते हैं कि एक सरकार संस्थाओं का समूह होती है जो कानूनी उपायों से नियंत्रण का काम करती है तथा कानून तोड़नेवालों को दंड देती है। इसके लिए आवश्यक है कि सरकार की जनता को नियंत्रित करने की शक्ति को जनता स्वैच्छा से सामाजिक स्वीकृति और मान्यता दे। एक सरकार आमतौर पर अपने कार्यों को अपने अंगों में विभाजित कर देती है और प्रत्येक अंग कुछ विशेष कार्य करता है। सरकार मुख्यतः तीन प्रकार के कार्य करती है – कानून बनाना, कानूनों को लागू करना और विवादों का निपटारा करना।

इस इकाई में शासन के तीन प्रमुख अंगों को, उनके कार्यों को और उनसे जुड़े विभिन्न प्रावधानों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। यह किसी शासन के विभिन्न अंगों के संबंध को भी स्पष्ट करती है। ऊपर शासन के जो तीन कार्य बतलाए गए हैं उनसे संबंधित अंग हैं – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका।

शासन के अंग
जैसा कि कहा गया है कि किसी शासन के तीन अंग होते हैं – विधायिका जो कानून बनाती है, कार्यपालिका जो उन्हें लागू करती है, तथा न्यायपालिका जो कानूनों की व्याख्या और विवादों का निपटारा करती है। शासन के इन अंगों का ढाँचा इस तरह का होता है कि वे समुचित ढंग से अपने कार्य पूरे कर सकें। किसी शासन के तीन अंगों के बीच शक्ति-विभाजन की इस व्यवस्था को ‘शक्तियों का अलगाव‘ कहते हैं। यह राजनीतिक व्यवस्था अमेरिका में सबसे अधिक बलवती है। वहाँ कांग्रेस कानून बनाती है, राष्ट्रपति उन्हें लागू करता है, तथा सर्वोच्च न्यायालय व दूसरे संघीय न्यायालय उनकी व्याख्या करते और न्याय देते हैं। शासन के ये तीनों अंग एक दूसरे से स्वतंत्र होते हैं। विधायिका में जनता के प्रतिनिधि होने चाहिए क्योंकि वे सबसे महत्वपूर्ण काम करते हैं – ऐसे कानून बनाना जिनसे जनता शासित हो। इस तरह विधायिका में जनता का निष्पक्ष और व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के प्रयास किए जाते हैं। कार्यपालिका विधायिका के बनाए कानूनों को लागू करती है। इसलिए कार्यपालिका में सक्षम और दस लोगों को होना आवश्यक है। सरकार का तीसरा अंग न्यायपालिका है जो कानूनों की व्याख्या करती है तथा इन कानूनों और संविधान के अनुसार मुकद्दमों का फैसला करती है।

कार्यपालिका
कार्यपालिका का अर्थ और उसके प्रकार
कार्यपालिका सरकार का कार्यकारी अंग है। कार्यपालिका ही विभिन्न नीतियों का निर्धारण और फिर क्रियान्वयन करती है। श्कार्यपालिकाश् शब्द का शाब्दिक अर्थ महत्वपूर्ण निर्णयों पर अमल करने, अर्थात् उन्हें लागू करने की शक्ति है। जे. डब्ल्यू गार्नर कहते हैंः ‘एक व्यापक और सामूहिक अर्थ में कार्यपालिका वाले अंग में…… वे सभी कार्यकारी और संगठन शामिल हैं जिनका सरोकार राज्य की इच्छा से है जो कानूनों के रूप में निर्धारित और व्यक्त होती है … इस तरह यह सरकार के पूरे संगठन को समेटती है। इस तरह कर वसूल करने वाले, निरीक्षक, आयुक्त, पुलिस वाले तथा शायद सेना और नौसेना के अधिकारी भी कार्यपालिका के संगठन के अंग होते हैं।‘

‘कार्यपालिका‘ शब्द के व्यापक और संकीर्ण, दोनों प्रकार के अर्थ होते हैं। मगर राजनीतिक अध्ययन के क्षेत्र में इसके संकीर्ण अर्थ का ही व्यवहार किया जाता है। कार्यपालिका का प्रमुख और उसके मुख्य सहकर्मी ही सरकार के तंत्र को चलाते हैं, राष्ट्रीय नीतियों का निर्धारण करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि वे नीतियाँ सही ढंग से लागू हों।

निम्नलिखित तालिका विश्व में श्कार्यपालिकाश् के विभिन्न प्रकारों को दर्शाती हैः
कुछ व्यस्थाओं में या तो राजा या निर्वाचित राष्ट्रपति एक नाम-मात्र कार्यपालिका हो सकता है। उसे ‘नाम-मात्र‘ बनाने वाला तथ्य यह है कि उसे यथार्थ शक्तियाँ प्राप्त नहीं होतीं। वह ‘मात्र एक सांविधानिक प्रमुख होता है जो कुछ आलंकारिक कार्य करता है पर जिसे मामूली

कार्यपालिका

नाममात्र यथार्थ
वंशगत निर्वाचित एकैकवादी बहुलवादी
राजनीतिक अराजनीतिक
(अस्थाय) (स्थायी

लोकतांत्रिक सर्वाधिकारवादी उपनिवेशी

संसदीय राष्ट्रपतीय अर्ध-संसदीय या
अर्ध-राष्ट्रीयता

शक्तियाँ ही प्राप्त होती हैं या नहीं होती। वैसे पूरा प्रशासन उसी के नाम से चलाया जाता है। राजा या तो ग्रेट ब्रिटेन की तरह वंशगत होता है या मलेशिया की तरह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से निर्वाचित होता है। ग्रेट ब्रिटेन, नेपाल, जापान और सऊदी अरब जैसे कुछ देशों में वंशगत उत्तराधिकार की प्रथा अभी भी प्रचलित है। जहाँ ग्रेट ब्रिटेन की तरह संविधानिक राजतंत्र है वहाँ यथार्थ शक्ति राजा या रानी के हाथों में नहीं, निर्वाचित मंत्रिपरिषद के हाथों में होती है। इसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है और मंत्रिपरिषद विधायिका के आगे जबावदेह होती है।

लेकिन दुनिया के सभी राजा नाम मात्र प्रमुख नहीं हैं। अभी भी ऐसे राजा हैं जिन्हें पूरी शक्तियाँ प्राप्त हैं, जैसे जोर्डन और सऊदी अरब में। कुछ राजाओं को ‘यथार्थ‘ कार्यपालिका की श्रेणी में रखा जा सकता है क्योंकि उन्हें निरपेक्ष और असीमित शक्तियाँ प्राप्त हैं।

यथार्थ कार्यपालिका को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है – एकैकवादी (सिंगुलर) और बहुलवादी (प्ल्यूरल)। एकैकवादी कार्यपालिका वह है जिसमें प्रमुख एक ही व्यक्ति होता है और दूसरे उसकी शक्तियों में भागीदार नहीं होते, जैसे अमेरिका में। वहाँ संविधान ने एक ही व्यक्ति अर्थात राष्ट्रपति को सारे अधिकार दे रखे हैं। बहुलवादी कार्यपालिका में सभी शक्तियाँ एक मंत्रिसमूह के हाथों में होती है। आज की दुनिया में इसका एकमात्र उदाहरण स्विटजरलैण्ड है जहाँ सरकार की सत्ता सात मंत्रियों (प्रेसिडेंट्स) के हाथों में होती है जो विधायिका द्वारा चार वर्षों के लिए चुने जाते हैं। इसे फेडरल कौंसिल (संघीय परिषद) कहा जाता है। प्रेसिडेंट्स में से एक को महासंघ का औपचारिक राष्ट्रपति चुना जाता है और वह वे सभी आलंकारिक कर्तव्य निभाता है जो किसी देश में सामान्यतः राज्य प्रमुख द्वारा निभाए जाते हैं।

कार्यपालिका की संरचना
कार्यपालिका आमतौर पर दो प्रकार के अधिकारियों से बनी होती हैः (अ) राजनीतिक कार्यपालिका, अर्थात् राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल या मंत्रिपरिषद, और (ब) स्थायी कार्यपालिका अर्थात् नौकरशाही जिनका कार्यकाल, चाहे जो भी सरकार सत्ता में आए, स्थिर होता है। राजनीतिक कार्यपालिका या तो अमेरिका की तरह सीधे जनता द्वारा चुनी जाती है जहाँ राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली है या भारत व ग्रेट ब्रिटेन की तरह अप्रत्यक्ष रूप से, विधायिका द्वारा चुनी जाती है। चीन में राष्ट्रपति राष्ट्रीय जन कांग्रेस द्वारा निर्वाचित होता है। वही राज्य का प्रमुख और राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता है।

जैसा कि ऊपर दी गई तालिका से स्पष्ट है, राजनीतिक कार्यपालिका की भी तीन श्रेणियाँ होती हैं। लोकतंत्र में सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं और अपने निर्वाचकों के आगे जवाबदेह होते हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटेन में मंत्रिमंडल हाउस ऑफ कामंस के नकारात्मक मत के कारण सत्ता के बाहर हो जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति भी सत्ता से हटाया जा सकता है मगर अविश्वास प्रस्ताव नहीं बल्कि महाभियोग की प्रक्रिया के द्वारा। हाल ही में अमेरिका में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर महाभियोग चलाया गया पर वे बच निकले क्योंकि सीनेट उन्हें दंड देने में असमर्थ रही।

एक सर्वाधिकारवादी राज्य में वास्तविक कार्यपालिका को जनता या उसके निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं हटा सकते। ऐसे राज्य में जनता को सरकार के कामों की आलोचना या भर्त्सना करने की स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती। आज बर्मा, इराक, नाइजीरिया और अफगानिस्तान में ऐसे ही सर्वाधिकारवादी राज्य हैं जिनमें कार्यपालिका को निरपेक्ष शक्तियाँ प्राप्त हैं। इससे पहले हिटलर के नाजी जर्मनी और मुसोलिनी के फासीवादी इटली में ऐसे ही सर्वाधिकारवादी शासन रह चके हैं।

अंत में, एक उपनिवेशी कार्यपालिका वह है जो उपनिवेशी सरकार के अधीन काम करती है।

लोकतांत्रिक मॉडल को दो श्रेणियाँ में बाँटा जा सकता है – संसदीय व राष्ट्रपतीय शासन प्रणालियों में। संसदीय प्रणाली में भारत और ग्रेट ब्रिटेन की तरह सरकार को (प्रधानमंत्री के नेतृत्व में) एक मंत्रिपरिषद् चलाती है जो सामूहिक रूप से विधायिका के आगे जवाबदेह होती है। राज्य का प्रमुख नाम-मात्र का कार्यपालक होता है जिसके नाम से मंत्रिपरिषद् शासन करती है। भारत में राष्ट्रपति व ग्रेट ब्रिटेन में रानी नाम-मात्र के ही राज्य प्रमुख हैं। दूसरे प्रकार का लोकतांत्रिक मॉडल राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली है, जैसा कि अमेरिका में है। वहाँ शक्तियों का बंटवारा कार्यपालिकाविधायिका-संबंध का आधार है। वास्तविक कार्यपालक राष्ट्रपति होता है। वह न तो विधायिका का सदस्य होता है न विधायिका उसे हटा सकती है। उसका कार्यकाल निश्चित होता है।

इन दो मॉडलों के बीच फ्रांसीसी कार्यपालिका का मॉडल आता है जिसे अर्ध-संसदीय या अर्धराष्ट्रपतीय कह सकते हैं। वहाँ वास्तविक कार्यपालक राष्ट्रपति होता है, उसी के नियंत्रण में प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल होते हैं और ये साथ ही साथ संसद के आगे जवाबदेह भी होते हैं। इस तरह फ्रांसीसी मॉडल संसदीय और राष्ट्रपतीय, दोनों शासन प्रणालियों की कुछ विशेषताएँ लिए हुए है।

कार्यपालिका के कार्य
आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था में कार्यपालिका के प्रभुत्व में अविश्वास की जगह उसके नेतृत्व में एक विश्वास पैदा हुआ है। आज शासन के तीन अंगों की समान शक्तियों के शास्त्रीय सिद्धान्त का पुनर्निरूपण आवश्यक है क्योंकि कार्यपालिका सही अर्थों में सरकार बन चुकी है। कार्यपालिका के अनेक कार्यों में देश का प्रशासन चलाना पहला और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। सरकार को आंतरिक शांति व व्यवस्था सुनिश्चित करनी और बनाए रखनी पड़ती है। कार्यपालिका को विदेश-संबंधों का संचालन करना, दूसरे देशों से समझौते करना, युद्ध की घोषणा करना व शांति-संधि करना, फौजों को लामबंद करना, आवश्यक होने पर आपातकाल की घोषणा करना, मुद्रा का पुनर्मूल्यन व अवमूल्यन करना, आवश्यक वस्तुओं के दाम तय करना तथा देश की जनता के कल्याण से जुड़े दूसरे कार्यकलाप भी संपन्न करना पड़ता है।

हाल में कार्यपालिका ने कुछ विधायी काम करने भी शुरू कर दिए हैं भले ही यह उसके कार्यक्षेत्र में नहीं आता। कानूनों की रूपरेखा तैयार करके उसे विधायिका के आगे रखने में कार्यपालिका पर्याप्त पहल कर रही है। यह बात ब्रिटेन और भारत जैसी संसदीय सरकारों के लिए खासकर सही है। भारत में विधायिका का सत्र न चल रहा हो तो कार्यपालिका अध्यादेश जारी कर कानून बना सकती है। विधायिका द्वारा पारित विधेयक को राज्य-प्रमुख स्वीकृति देने से इंकार भी कर सकता है। अमेरिका तक में, जहाँ शक्तियाँ विभाजित हैं, राष्ट्रपति अपने ‘संदेश‘ भेजकर या अपने ‘मित्रों‘ की सहायता से कांग्रेस से एक विधेयक पारित कराकर विधायिका को प्रभावित कर सकता है।

कार्यपालिका के कार्यों में वृद्धि प्रत्यायोजित विधि-निर्माण (डेलीगेटेड लेजिस्लेशन) की वृद्धि का परिणाम भी है। संसद के बनाए कानूनों में आमतौर पर ब्यौरे नहीं होते। बाद में इस कमी को कार्यपालिका दूर करती है।

कार्यपालिका कुछ न्यायिक कार्य भी करती है। सभी देशों में राज्य-प्रमुख को अपराधियों को क्षमादान करने, सजा कम करने या रिहा करने का अधिकार प्राप्त होता है। इसे उसका ‘दया का विशेषाधिकार‘ कहते हैं। वह न्यायाधीशों की नियुक्ति भी करता है। बहुत से विवाद प्रशासनिक पंचाटों (ट्रिब्यूनल्स) द्वारा हल किए जाते हैं। कुछ देशों में मंत्रियों को अपील की पंचाटों की तरह काम करने का अधिकार प्राप्त होता है। फ्रांस में प्रशासनिक कानूनों और अदालतों की एक अलग व्यवस्था है।

कार्यपालिका ‘राष्ट्र के कोष‘ को भी नियत्रित करती है। कार्यपालिका ही बजट तैयार करके मंजूरी के लिए सदन के सामने रखती है। वास्तव में कार्यपालिका ही देश में करों का ढाँचा तय करती हैय संसद केवल उसे अपनी स्वीकृति देती है। संसद द्वारा पारित किए जाने के बाद बजट के प्रावधान लागू हों, इसे भी कार्यपालिका ही सुनिश्चित करती है। इसके लिए कार्यपालिका के पास लेखा-परीक्षण के अनेक संगठन होते हैं जो देश के वित्तीय पहरेदारों का काम करते हैं।

नौकरशाही अर्थात् स्थायी कार्यपालिका निर्णय प्रक्रिया के एक-एक चरण से जुड़ी होती है और प्रशासन में निरंतरता बनाए रखती है। अकसर राजनीतिक कार्यपालक नौकरशाही की तकनीकी विशेषज्ञता और ज्ञान के कारण उस पर निर्भर होते हैं।

अपनी रचना द फंक्शंस ऑफ द एक्जीक्यूटिव में चेस्टर बर्नार्ड ने कार्यपालिका के कार्यकलाप का संबंध ‘उद्देश्यों की दृढ़ता, नीति-निर्माण के आरंभ, साधनों के उपयोग, कामकाज के साधनों के नियंत्रण, काम की प्रेरणा तथा समन्वित कार्य को प्रेरणा‘ से जोड़ा है।

कार्यपालिका की बढ़ती भूमिका
आज प्रतिनिधिक लोकतंत्र की जगह एक हद तक उस चीज ने ले ली है जिसे आर एच. एच. क्रासमैन के शब्दों में ‘कार्यपालक लोकतंत्र‘, बल्कि ‘नौकरशाही लोकतंत्र‘ भी कहा जा सकता है। कार्यपालिका राजनीतिक संगठन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। रोड़ी ने कहा है, ‘एक तरफ तो प्रतिनिधि सभाओं की बुद्धिमता वे सामर्थ्य संबंधी पहले वाला उत्पाद कम हुआ है तो दूसरी तरफ जनता द्वारा निर्वाचित कार्यपालक शक्ति के कोई एक सदी के अनुभवों ने पहले के संदेहों को दूर करके भरोसा पैदा किया है। इसके अलावा लोकतांत्रिक सरकारों की तेजी से बढ़ती समस्याओं और कार्यकलापों ने विधायिका की अनेक शक्तियों को कार्यपालिका के हवाले करने की मजबूरी सी पैदा कर दी है।‘ संसदीय लोकतंत्रों की स्थिति खास तौर पर ऐसी ही है। विधायिका के निचले सदन में अपने बहुमत के कारण राजनीतिक कार्यपालिका सारे कानून पारित करा लेती है। ब्रिटेन की तरह के सख्त दलीय अनुशासन के कारण कार्यपालिका पर विधायिका का नाम-मात्र का नियंत्रण रह जाता है। फिर कार्यपालिका भी आमतौर पर एकजुट होती है जबकि विधायिका के सदस्य दलगत आधारों पर बंटे होते हैं, और इसके कारण कार्यपालिका को उन पर वर्चस्व प्राप्त होता है। शासन के अंग्रेजी मॉडल के बारे में ग्रीब्ज ने जो कुछ कहा है वह दूसरे देशों की व्यवस्थाओं पर भी बड़ी हद तक लागू होता है – यह कि कार्यपालिका श्व्यवहार में हमारे विधि– निर्माणतंत्र का पहला सदन बन चुकी है।‘

फिर भी कार्यपालिका के नेतृत्व पर अंकुश समय की माँग है। राजनीतिक व्यवस्था का भाग्य उन राजनेताओं की भूमिका पर निर्भर है जो एक शासन की स्थापना, संचालन और स्थायित्व के लिए जिम्मेदार कहे जाते हैं। इसलिए आवश्यकता कार्यपालिका की सत्ता पर समुचित अंकुश लगाने की है। इसके कारण वह दक्षता के साथ काम करेगी और सौंपे गए अनेकानेक कार्यों को सही ढंग से पूरा करेगी। इन कार्यों में, एडलई स्टीवेंसन के शब्दों में, श्एक कल्याणकारी सेवा की स्थापना समाज-कल्याण को पूरी जनता के लिए विस्तार देना तथा करुणा की पुनर्स्थापनाश् शामिल हैं।

बोध प्रश्न 1
नोटः क) अपने उत्तरों के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) संसदीय व राष्ट्रपतीय कार्यपालिकाओं के प्रमुख अंतर स्पष्ट कीजिए।
2) कार्यपालिका के किन्हीं दो कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
3) आज कार्यपालिका क्यों अधिक शक्तिशाली बन चुकी है?

बोध प्रश्न 1
1) संसदीय व राष्ट्रपतीय शासन आज लोकतंत्र के दो सबसे प्रचलित रूप हैं। एक संसदीय सरकार कार्यपालिका और विधायिका के अंतरंग संबंध पर आधारित होती है। वहीं शक्तियों का अलगाव राष्ट्रपतीय प्रणाली का आधार होता है। भारत व ब्रिटेन में संसदीय सरकारें हैं। यहाँ राज्य का प्रमुख नाम मात्र का कार्यपालक होता है जबकि व्यवहार में मंत्रिमंडल कार्यपालिका के वास्तविक कार्य करता है और विधायिका के आगे जवाबदेह होता है। अमेरिका राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली की बेहतरीन मिसाल है जहाँ वास्तविक कार्यपालक अर्थात् राष्ट्रपति का कार्यकाल निश्चित होता है।

2) कार्यपालिका के कुछ कार्य इस प्रकार हैंरू आंतरिक व बाह्य नीतियाँ बनाना, कानून लागू करना, व्यवस्था बनाए रखना, मुद्रा पर नियंत्रण, युद्ध की घोषणा करना व शांति संधि करना। कार्यपालिका अकसर विधेयक तैयार करके उन्हें कानूनों का रूप दिलाती है। वह राजकोष को नियंत्रित करती हैं, राजस्व उगाहती है और आर्थिक योजनाओं का संचालन करती है। राज्य का प्रमुख दया के विशेषाधिकार का प्रयोग करके अपराधियों को क्षमादान दे सकता है या उनकी सजाएँ कम कर सकता है। राजनीतिक कार्यपालिका नीतियाँ बनाती है जिन्हें फिर असैन्य अधिकारी लागू करते हैं।

3) अत्यंत परस्पर-निर्भर विश्व में कार्यपालिका हर जगह अधिक शक्तिशाली होती जा रही है। चूँकि वह बड़ी हद तक विधि-निर्माण, वित्त, युद्ध व शांति पर नियंत्रण रखती है, वह अधिक शक्तियाँ बटोरने लगती है। हर प्रमुख संकट कार्यपालिका को बल देता है कि वह अपनी सत्ता को जताए। विधायिका द्वारा पारित अनेक कानून कार्यपालिका को और अधिक शक्तियाँ प्रदान करते हैं।